धान के देश में!

जी.के. अवधिया का ब्लॉग

Saturday, December 25, 2010

विश्व-साहित्य की प्रमुखतम कृति - रामायण

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जरा कल्पना करें कि आपने कभी कोई रचना नहीं पढ़ी है और आपके पास किसी प्रकार का सन्दर्भ नहीं है। ऐसी स्थिति में क्या आप कुछ लिख पाएँगे? वाल्मीकि...
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Friday, December 24, 2010

तुम क्यों लिखते हो?

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पोस्ट का शीर्षक मेरा अपना नहीं है बल्कि रामाधारी सिंह 'दिनकर' जी की एक कविता का है। पता नहीं दिनकर जी ने अपनी कविता में यह प्रश्न कि...
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Thursday, December 23, 2010

क्या किसी ब्लोगर को यह दिखाई नहीं पड़ता ....

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हम लुटते रहे थे, लुटते रहे हैं और लुटते रहेंगे हजारों वर्षों पूर्व सिकन्दर, मोहम्मद बिन कासिम, महमूद गज़नवी, मोहम्मद गोरी आदि के द्वारा हम...
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Monday, December 20, 2010

भारत में मुसलमानों की सफलता के कारण

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(सामग्री 'आचार्य चतुरसेन' के उपन्यास "सोमनाथ" से साभार) हिन्दू और मुस्लिम संस्कृतियाँ लगभग चार हजार वर्षों तक हिन्दू स...
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Saturday, December 18, 2010

हम.... याने कि करमहीन खेती करे, बैल मरे या सूखा पड़े

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शिरीष के सूखे फल की भाँति, जो कि वृक्ष के फूल-पत्ते झड़ जाने तथा पेड़ के ठूँठ जैसा हो जाने के बावजूद भी, पेड़ से लटकते और खड़खड़ाते ही रहता है, ह...
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