धान के देश में!

जी.के. अवधिया का ब्लॉग

Saturday, March 19, 2011

मोहे रहि-रहि मदन सतावै पिया बिना नींद नहिं आवै

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टेसू के पेड़ों ने अपने पत्र-पल्लव के वस्त्रों को त्याग कर रक्तवर्ण पुष्प-गुच्छों से अपना श्रृंगार कर लिया है। सेमल के गगनचुम्बी वृक्षों पर भी...
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Wednesday, March 16, 2011

हरि को नचन सिखावैं राधा प्यारी

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जहाँ हिन्दी भक्ति साहित्य को गोप-गोपियों, ग्वालों और कृष्ण के आत्मिक प्रेम का वर्णन रसमय बनाता है, वहीं उनका यह अलौकिक प्रेम फागुन के महीने ...
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Monday, March 14, 2011

भारत को भारत रहने दो

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(स्व. श्री हरिप्रसाद अवधिया रचित कविता) तुलसी का सन्देश यही है सियारम मय जग को जानो, अपने भीतर सबको देखो सबमें अपने को पहचानो। स्वाति...
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Saturday, March 12, 2011

शबरी के बेर

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(स्व. श्री हरिप्रसाद अवधिया रचित खण्ड-काव्य) भारत के दक्षिण भागों में, फैले थे बीहड़ वन-खण्ड। दण्डक-वन कहलाते थे वे, जीव-जन्तु थे वहाँ प...
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Friday, March 11, 2011

फाग में फूहड़ता या फाग भक्ति रस से सराबोर?

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वसन्त ऋतु अपनी युवावस्था को प्राप्त कर चुका है। चहुँ ओर शीतल-मन्द-सुगन्धित बयार बह रही है। आम्रवृक्ष बौर से लद चुके हैं और आम के बौर की सुगन...
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