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Tuesday, March 30, 2010

कहाँ गई आत्मा?


इधर कई सालों से मैंने आत्मा को नहीं देखा है; क्या आपने देखा है उसे?

नेता हैं पर जनता का ही रक्त चूस रहे हैं और राष्ट्र तक को बेच खा रहे हैं। कहाँ गई उनकी आत्मा?

व्यापारी है किन्तु व्यापार के नाम से ग्राहकों को लूट रहे हैं; उचित मुनाफा लेकर जीवनयापन करने के बदले ग्राहकों को लूट-लूट कर तिजोरी भरना ही उनका उद्देश्य बन गया है? कहाँ गई उनकी आत्मा?

चिकित्सक हैं किन्तु सिर्फ उन्हीं की चिकित्सा करते हैं जो बदले में मोटी रकम दे सके; गरीब चिकित्सा के बिना मर रहे हैं। कहाँ गई उनकी आत्मा?

शिक्षा संस्थान हैं किन्तु विद्या का दान नहीं व्यापार कर रहे हैं। कहाँ गई उनकी आत्मा?

संगीत है किन्तु मेलॉडी नहीं है; शोर-शराबा संगीत ही का पर्याय बन गया है। कहाँ गई संगीत की आत्मा?

कविताएँ हैं किन्तु काव्यात्मक विकलता नहीं है; क्रौञ्च वध से उत्पन्न करुणा नहीं है। कहाँ गई कविता की आत्मा?

कहाँ गई आत्मा?

क्या आत्मा मर चुकी है?