Showing posts with label घड़ा. Show all posts
Showing posts with label घड़ा. Show all posts

Monday, April 19, 2010

कहाँ गईं वो घड़ों-सुराहियों की दूकानें

गर्मी की शुरुवात होते ही घड़ों-सुराहियों की दूकानें दिखनी शुरू हो जाती थीं किन्तु आज इन दूकानों को खोजना पड़ता है। मिट्टी के घड़ों में शीतल किये गये सोंधी-सोंधी मनभावन गंध लिये हुए पानी का स्वाद ही निराला होता था जो किसी भी प्यासे को तृप्त कर देता था। आज फ्रिज, वाटरकूलर आदि के प्रयोग ने इन घड़ों-सुराहियों की दूकानों को विलुप्तप्राय कर दिया है।

स्कूल के जमाने में पढ़े "किस्सा हातिमताई" का उद्धरण याद आता है कि सवाल का जवाब खोजते-खोजते यवन के शहजादे हातिम को भारत आना पड़ जाता है और प्यास लगने पर पानी माँग करने पर उसे दूध का गिलास थमा दिया जाता है जिससे उसके मुख से बरबस निकल जाता है कि धन्य है यह देश जहाँ प्यासे को पानी की जगह दूध पिलाया जाता है।

प्यासे की प्यास बुझाने को हमारी संस्कृति में बहुत महान और पुण्य का कार्य माना गया है। किन्तु आज के इस बाजारवाद ने हमारी मानसिकता को इस प्रकार से बदल दिया है कि हम अपनी संस्कृति को पूरी तरह से भूल गये हैं और पानी बेचने की चीज बन गई है। पानी को पॉलीथीन पैकेट और बोतलों में बंद करके बेचने के कार्यरूप राक्षस ने ही परम्परागत कुम्भकारों की घड़ों-सुराहियों की दूकानों को निगल डाला है।

भारत जैसे देश में पानी को बेचना ही घिनौना कार्य है पर यहाँ तो लोग प्यासों की मजबूरी का फायदा उठा कर पानी की अधिक से अधिक कीमत वसूल कर रहे हैं। जलपानगृहों और भोजनालयों में जानबूझ कर घड़े नहीं रखे जाते ताकि पैकेज्ड पानी की अधिक से अधिक बिक्री हो।

पता नहीं हमारी यह आधुनिकता की अंधी दौड़ हमें पतन के गर्त में और कितनी गहराई तक ले जायेगी?