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Wednesday, November 3, 2010

मोहम्मद रफी की आवाज में दुर्लभ किन्तु मधुर छत्तीसगढ़ी गाना

सन् 1965 में पहली छत्तीसगढ़ी फिल्म बनी थी "कहि देबे सन्देश"। फिल्म के निर्माता थे मनु नायक। "कहि देबे सन्देश" का संगीतकार मलय चक्रवर्ती ने इस फिल्म में अत्यन्त ही मधुर एवं कर्णप्रिय संगीत प्रदान किया था किन्तु वे गीत आज दुर्लभ हो गए हैं।

प्रस्तुत है उसी फिल्म कहि देबे सन्देश का गीत जिसे मोहम्मद रफी साहब ने मधुर आवाज प्रदान किया थाः

Thursday, February 4, 2010

"कुकुर के मुँह में लउड़ी हुड़सना" ... याने कि किसी को जबरन छेड़ना

मानव मस्तिष्क भी विचित्र वस्तु है। कभी-कभी यह किसी को जबरन छेड़ कर मौज लेता है। इसे ही छत्तीसगढ़ी हाना (लोकोक्ति) में "कुकुर के मुँह में लउड़ी हुड़सना" कहा जाता है। मनोविज्ञान के अनुसार यह एक मानसिक खेल है जो अक्सर महज मौज-मजा लेने के लिये किया जाता है और संसार का शायद ही कोई व्यक्ति हो जिसने कभी भी ऐसा न किया हो। एक सीमा तक ही यह खेल जारी रहे तो कुछ अधिक नुकसानदायक नहीं है यह किन्तु प्रायः यह खेल अपनी सीमा पार कर जाती है और साधारण चुहलबाजी एक विवाद का रूप धारण कर लेती है। बेहतरी इसी में है कि हम इस मानसिक खेल से बच कर ही रहें।

लोकोक्ति की बात चली है तो आपको हम यह बता दें कि जब जीवन का यथार्थ ज्ञान नपे-तुले शब्दों में मुखरित होता है तो वह लोकोक्ति बन जाता है याने कि लोकोक्ति एक प्रकार से "गागर में सागर" होता है। छत्तीसगढ़ी में लोकोक्ति को "हाना" के नाम से जाना जाता है। छत्तीसगढ़ी भाषा में बहुत से सुन्दर हाना हैं जिन्हें उनके हिन्दी अर्थसहित जानकर आपको बहुत आनन्द आयेगा। यहाँ पर हम कुछ ऐसे ही रोचक छत्तीसगढ़ी हाना उनके हिन्दी अर्थ सहित प्रस्तुत कर रहे हैं:
  • "अपन पूछी ला कुकुर सहरावै" अर्थात् अपनी तारीफ स्वयं करना याने कि अपने मुँह मियाँ मिट्ठू बनना।
  • "चलनी में दूध दुहय अउ करम ला दोष दै" अर्थात् खुद गलत काम करना और किस्मत को दोषी ठहराना।
  • "घर के जोगी जोगड़ा आन गाँव के सिद्ध" अर्थात् घर के ज्ञानी को नहीं पूछना और दूसरे गाँव के ज्ञानी को सिद्ध बताना याने कि आप कितने ही ज्ञानी क्यों न हों घर में आपको ज्ञानी नहीं माना जाता।
  • "अपन मरे बिन सरग नइ दिखय" अर्थात् स्वयं किये बिना कोई कार्य नहीं होता।
  • "आज के बासी काल के साग अपन घर में काके लाज!" अर्थात् अपने घर में रूखी-सूखी खाने में काहे की शर्म।
  • "अजान बैद परान घातिया" अर्थात् नीम-हकीम खतरा-ए-जान।
  • "कउवा के रटे ले बइला नइ मरय" अर्थात् कौवा के रटने से बैल मर नहीं जाता याने कि किसी के कहने से किसी की मृत्यु नहीं होती।
  • "उप्पर में राम-राम तरी में कसाई" अर्थात् मुँह में राम बगल में छुरी।
  • "करनी दिखय मरनी के बेर" अर्थात् किये गये अच्छे या बुरे कर्मों की परीक्षा मृत्यु के समय होती है।
  • "खेलाय-कुदाय के नाव नइ गिराय पराय के नाव" अर्थात् प्रशंसा कम मिलती है और अपयश अधिक।