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Thursday, April 15, 2010

ना दुश्मनी के ढब हैं ना दोस्ती का तौर

प्रत्येक आदमी किसी ना किसी का दोस्त होता है और किसी ना किसी का दुश्मन भी होता है। शायद ही कोई ऐसा हो जिसकी न तो किसी से दोस्ती हो और न ही किसी से दुश्मनी। यदि कोई ऐसा बिरला व्यक्ति मिल जाये जिसकी किसी न दोस्ती हो और न ही दुश्मनी तो आपका बहुत बड़ा सौभाग्य है क्योंकि वह व्यक्ति पूर्णतः विरक्त ही होगा। ऐसे विरक्त लोगों में सर्वोच्च स्थान कबीरदास जी का ही होना चाहिये क्योंकि वे लिखते हैं

कबिरा खड़ा बजार में माँगे सबकी खैर।
ना काहू से दोस्ती ना काहू से बैर॥


दोस्ती और दुश्मनी दोनों के ही बारे में बहुत सारे मुहावरे भी बने हैं मसलन "वक्त में काम आने वाला ही सच्चा दोस्त होता है", "मूर्ख दोस्त से समझदार दुश्मन अच्छा होता है", "दुश्मन का दुश्मन दोस्त होता है" आदि।

कुछ ऐसे भी लोग होते हैं जिनके बारे में कहा जाता है कि "न इनकी दोस्ती अच्छी और न ही दुश्मनी"। किसी जमाने में दोस्ती के मूल में प्रेम और दुश्मनी के मूल में क्रोध हुआ करता था। पर अब जमाना बदल गया है और आजकल दोस्ती और दुश्मनी दोनों ही के मूल में बस स्वार्थ ही हुआ करता है।