नीर अर्थात् सलिल, नीरद, नीरज, जल या पानी! यह नीर कभी नयन से बरसता है तो कभी मेघ से बरसता है। नयन से नीर जहाँ गम में बरसता है वहीं खुशी में भी बरसता है। प्रियतम के विरह में प्रियतमा कहने लगती हैः
प्रियतम तो परदेस बसे हैं, नयन नीर बरसाये रे
तो दूसरी ओर तुलसीदास जी कहते हैं:
नयन नीर पुलकित अति गाता
यह नीर जिस किसी के संसर्ग में आता है उसे निर्मल कर देता है। इसीलिये कबीर कहते हैं:
कबिरा मन निर्मल भया जैसे गंगा नीर
रहीम कहते हैं कि इस नीर याने कि पानी के बिना उबरना मुश्किल हैः
पानी गये न ऊबरे मोती मानुस चून
विचित्र है पानी की महिमा! कभी पानी पिलाना पुण्य का काम होता था पर आज पानी बेचना कमाई का काम है। आज के जमाने में आगे बढ़ना है तो दूसरों का पानी उतारते रहिये।