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Wednesday, July 21, 2010

बुढ़ापे में जवानी के रोमांस की याद भी जीवन में रस घोलती है

"यार सच बताना आजकल तेरा किसके साथ चक्कर चल रहा है?"

"किसी के साथ नहीं यार।"

"झूठ मत बोल, मुझे सब पता है..."


परस्पर मित्रों, चाहे वह पुरुष वर्ग के हों या स्त्रीवर्ग के, के बीच ऐसे संवाद होते प्रायः आपने सुना होगा। हो सकता है कि कुछ लोगों को ऐसे संवाद भद्र न लगते हों किन्तु वास्तविकता यह है कि ऐसे संवाद जीवन में रस घोलते हैं, कहने वालों के भी और सुनने वालों के भी। ये संवाद जीवन में महज इसलिये रस घोलते हैं क्योंकि इनमें विपरीतलिंगीय आकर्षण का रस होता है। यह आकर्षण ही प्रेम में परिवर्तित होता है जो कि जीवन का मुख्य रस है।

संसार में ऐसा कोई भी मनुष्य नहीं होगा जिसने कभी किसी से प्रेम न किया होगा या सही अर्थों में कहें तो जिसे कभी किसी से प्रेम न हुआ होगा, क्योंकि प्रेम किया नहीं जाता स्वतः ही हो जाता है। सच कहा जाये तो प्रेम रस ही जीवन की संजीवनी है। प्रेम की मधुर भावना के बिना मानव-जीवन का अस्तित्व हो ही नहीं सकता।

साहित्य सृजन में भी प्रेम की यह भावना अत्यन्त महत्वपूर्ण कार्य करती है। रत्नावली ने रामबोला को

"लाज न आवत आपको, दौरे आयहु साथ।
धिक् धिक् ऐसे प्रेम को, कहा कहौं मैं नाथ॥
अस्थिचर्ममय देह यह, ता पर ऐसी प्रीति।
तिसु आधो रघुबीरपद, तो न होति भवभीति॥"


कहकर धिक्कारा न होता तो न तो रामबोला के भीतर के प्रेम ने वैराग्य का रूप धारण किया होता, न रामबोला तुलसीदास बना होता और न ही रामचरितमानस की रचना हुई होती।

अनेक बार तो प्रेम करने वाले को इस बात का ज्ञान ही नहीं हो पाता कि उसे किसी से प्रेम हो गया है किन्तु उस व्यक्ति के क्रियाकलाप दर्शा देते हैं कि वह प्रेमरोग से ग्रसित हो चुका है। इस बात का बहुत ही सुन्दर उदाहरण चन्द्रधर शर्मा 'गुलेरी' जी ने अपने कहानी "उसने कहा था" में यह लिख कर दिया हैः

दूसरे-तीसरे दिन सब्जीवाले के यहाँ, दूधवाले के यहाँ अकस्मात दोनों मिल जाते। महीना-भर यही हाल रहा। दो-तीन बार लड़के ने फिर पूछा, ‘तेरी कुडमाई हो गई?’ और उत्तर में वही ‘धत्त’ मिला। एक दिन जब फिर लड़के ने वैसे ही हँसी में चिढ़ाने के लिये पूछा तो लड़की, लड़के की संभावना के विरूध्द, बोली, ”हाँ, हो गई।”

”कब?”

”कल, देखते नहीं, यह रेशम से कढा हुआ सालू।”

लड़की भाग गई। लड़के ने घर की राह ली। रास्ते में एक लड़के को मोरी में ढकेल दिया, एक छावड़ी वाले की दिन-भर की कमाई खोई, एक कुत्ते पर पत्थर मारा और एक गोभीवाले के ठेले में दूध उडेल दिया। सामने नहा कर आती हुई किसी वैष्णवी से टकरा कर अन्धे की उपाधि पाई। तब कहीं घर पहुँचा।

फनीश्वरनाथ रेणु जी अपनी कहानी "पंचलाइट" में कितनी सुन्दरता किन्तु सरलता के साथ दर्शा देते हैं कि मुनरी को गोधन से प्रेम हो चुका है, सिर्फ यह लिखकरः

गुलरी काकी की बेटी मुनरी के मुँह में बार-बार एक बात आकर मन में लौट जाती है। वह कैसे बोले? वह जानती है कि गोधन पंचलैट बालना जानता है। लेकिन, गोधन का हुक्का-पानी पंचायत से बंद है। मुनरी की माँ ने पंचायत में फरियाद की थी कि गोधन रोज उसकी बेटी को देखकर 'सलम-सलम' वाला सलीमा का गीत गाता है - 'हम तुमसे मोहोब्बत करके सलम'! .... बस पंचों को मौका मिला। दस रुपया जुरमाना! न देने से हुक्का-पानी बंद। आज तक गोधन पंचायत से बाहर है। उससे कैसे कहा जाये? मुनरी उसका नाम कैसे ले? और उधर जाति का पानी उतर रहा है।

मुनरी ने चालाकी से अपनी सहेली कनेली के कान में बात डाल दी - "कनेली! ...चिगो, चिध-ऽ-ऽ चिन...!" कनेली मुस्कुराकर रह गई - "गोधन तो बंद है!"

मुनरी बोली, "तू कह तो सरदार से!"

सहेलियों के समक्ष गुप्त बातों को प्रदर्शित करने के लिये प्रायः सम्पूर्ण हिन्दीभाषी प्रदेशों की लड़कियाँ आज भी 'चि' या 'च' वाली सांकेतिक भाषा का प्रयोग करती हैं, यही कारण है कि हमने जब अपने कल के पोस्ट "थोड़ी खुशियाँ थोड़े गम...." में जब लिखा थाः

उन दिनों छोटी बहन की सहेली बहन से कहा करती थी, "चजचल्दी चचचलचना चरे! चतेचरा चभाचई चघूचर चघूचर चके चदेचख चरचहा चहै चमुचझे"। और बहन मुस्कुरा के जवाब देती, "चतो चक्या चहो चगचया? चतू चही चतो चमेचरी चभाचभी चबचनेचगी"।

तो संगीता स्वरूप जी ने भी उसी सांकेतिक भाषा में अपनी निम्न टिप्पणी दी थीः

संगीता स्वरुप ( गीत ) on July 20, 2010 12:24 PM said...

    जन्मदिन की शुभकामनायें....

    चतो चब चहन चकी चस चहे चली चब चहन चकी चभा चभा चभी चन चहीं चब चनी ?

(वैसे तो सभी सुधी पाठकों को यह समझ में आ ही गया होगा कि ऊपर सांकेतिक भाषा में क्या लिखा गया है, और यदि न समझ पाये हों तो सिर्फ शुरू के च को छोड़कर पढ़ लें।)

कल के हमारे पोस्ट में हम नहीं लिख पाये थे कि एक दिन हमने बहन की सहेली से कह दिया था, "तुम लोग सांकेतिक भाषा में जो भी बोलती हो उसे मैं समझ जाता हूँ। यकीन नहीं है तो सुन लो, तुम कह रही थी कि जल्दी चलना रे! ....  आगे और बताऊँ क्या"

वह अवाक रह गई थी। फिर मैंने कहा था कि अब मैं अपनी सांकेतिक भाषा में जो कह रहा हूँ उसे समझ कर बताओ तो जानें, यह कह कर मैं तेजी से बोल गया था, "पजूजजा, सजचज सजचज बजतजानजा तजुमज मजुझज सजे पज्यजारज कजरजरजी हजो यजा नजहजी?"

मैंने क्या कहा था वह बिल्कुल ही नहीं समझ सकी थी और कुछ साल बाद मेरे सौभाग्य या दुर्भाग्य से जब मेरी शादी उससे हो गई थी तब उसने मुझसे एक बार पूछा था, "आपने एक बार गुप्त भाषा में क्या कहा था?" तब मैंने उसे बताया था कि मैनें यही कहा था कि "पूजा, सच सच बताना, तुम मुझ से प्यार करती हो या नहीं?"

आज उन बातों की स्मृति से मन विभोर हो रहा है क्योंकि बुढ़ापे में जवानी के रोमांस की याद भी जीवन में रस घोलती है!

Wednesday, November 25, 2009

प्यार से फिर क्यों डरता है दिल

प्यार शब्द इतना प्यारा है कि इसके आकर्षण से कोई भी अछूता नहीं रह सकता।

वैसे तो मानव जीवन भर आकर्षित रहता है प्यार से, किन्तु इसका आकर्षण किशोर अवस्था और युवावस्था के वयःसन्धि याने कि सोलह से पच्चीस वर्ष तक के उम्र मे अपनी चरमसीमा में रहता है। उम्र का ये सोलह से पच्चीस वर्ष का अन्तराल गधा-पचीसी कहलाता है और इस काल में प्रायः लोग आकर्षण को ही प्रेम समझने की भूल कर जाते हैं। विपरीत लिंग वालों का एक दूसरे के प्रति आकर्षित होना प्राणीमात्र का ईश्वर प्रदत्त स्वभाव है। आप चाहे पुरुष हों या महिला, किन्तु आप में से कोई भी ऐसा नहीं होगा जिसे जीवन में कभी न कभी किसी विपरीत लिंग वाले ने आकर्षित न किया हो। जरा अपने कालेज के दिनों को याद कर के देखें, आपको स्वयं ही हमारी इस बात की सत्यता का प्रमाण मिल जायेगा। अजी आप ही क्या, हम स्वयं अपने गधा-पचीसी की उम्र में सैकड़ों बेवकूफियाँ कर चुके हैं। किन्तु अपनी उन बेवकूफियों को अपने इस पोस्ट में बता कर हमें अपने अनुजों तथा अनुजाओं के समक्ष लज्जित होना उचित नहीं लगता।

यहाँ पर यह बता देना हम उचित समझते हैं कि आकर्षण प्रेम नहीं है यद्यपि प्रेम में आकर्षण का होना स्वाभाविक है। जिस प्रकार से लोग आकर्षण को ही प्रेम समझ लेते हैं उसी प्रकार से अक्सर काम-वासना को भी प्रेम समझ लिया जाता है जबकि वासना प्रेम नहीं है। प्रेम में हमेशा वासना का होना भी आवश्यक नहीं है। जहाँ माँ-बेटा, भाई-बहन, बाप-बेटी के बीच स्नेह वासनारहित प्रेम होता है वहीं पति-पत्नी के बीच प्रेम में वासना का होना भी आवश्यक होता है।

विवाहित जीवन के लिये प्रेम का बहुत महत्व है और पति-पत्नी के मध्य प्रेम का होना आवश्यक है। वास्तव में विवाहित जीवन का आधार ही प्रेम होता है।

जिससे प्रेम किया जाता है उसके प्रति समर्पण की भावना होना ही प्रेम को सर्वोत्तम बनाता है। वासनारहित ऐसा प्रेम जिसमें सिर्फ पूर्ण समर्पण की भावना ही निहित होती है, प्लूटोरियन लव्ह अर्थात् आत्मिक प्रेम कहलाता है। कुछ लोगों के अनुसार प्लूटोरियन लव्ह या आत्मिक प्रेम मात्र काल्पनिक आदर्श है किन्तु ऐसे लोग भी हैं जो इसे एक वास्तविकता मानते हैं। सुप्रसिद्ध कहानीकार चन्द्रधर शर्मा 'गुलेरी' जी की विश्वविख्यात कहानी "उसने कहाथा" प्लूटोरियन लव्ह या आत्मिक प्रेम का एक उत्तम उदाहरण है।

चलते-चलते

जब से शादी हुई थी दम्पत्तिद्वय प्रतिसप्ताह रविवार को फिल्म देखने जाया करते थे। इस प्रकार से दस साल बीत गये।

एक रविवार को जब दोनों पिक्चर देखने के लिये निकले तो पति ने पत्नी से कहा, "तुम्हें फिल्में बहुत पसंद हैं इसीलिये, फिल्मों में अधिक रुचि न होने के बावजूद भी, मैं आज तक हर सप्ताह तुम्हें पिक्चर ले जाते रहा हूँ। मुझे तो बाग-बगीचों में घूमना फिरना ज्यादा अच्छा लगता है। यदि आज हम दोनों पिक्चर जाने के बदले किसी बगीचे में जायें तो तुम्हें बुरा तो नहीं लगेगा?"

पत्नी बोली, " मैं तो समझती थी कि आपकी फिल्मों में बहुत अधिक रुचि है इसीलिये आपके साथ फिल्म देखने चली जाया करती थी। मुझे भी फिल्मों में अधिक रुचि नहीं है और मैं भी बाग-बगीचों में घूमना बहुत पसंद करती हूँ।।"

तो बन्धुओं, वर्षों साथ रहने के बावजूद हम अनेक बार एक-दूसरे को पूरी तरह से जान नहीं पाते।


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लक्ष्मण-सुग्रीव संवाद - किष्किन्धाकाण्ड (9)