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Friday, February 5, 2010

कहाँ है आज वसन्त की मादकता?

वसन्त ऋतु है अभी! किन्तु मुझे तो मादकता का किंचितमात्र भी अनुभव नहीं हो रहा है। टेसू और सेमल के रक्तवर्ण पुष्प, जो कि वसन्त के श्रृंगार माने जाते हैं, तो कहीं दृष्टिगत हो ही नहीं रहे हैं। कहाँ हैं आम के बौर? कहाँ गई कोयल की कूक? यह वसन्त का लोप बड़े नगरों की देन है। छोटे गाँवों और वनों में शायद हो वसन्त पर मेरे रायपुर में तो नहीं है।

रीतिकालीन कवि 'सेनापति' ने लिखा थाः

बरन बरन तरु फूले उपवन वन,
सोई चतुरंग संग दल लहियतु है।
बंदी जिमि बोलत विरद वीर कोकिल है,
गुंजत मधुप गान गुन गहियतु है॥
आवे आस-पास पुहुपन की सुवास सोई
सोने के सुगंध माझ सने रहियतु है।
सोभा को समाज सेनापति सुख साज आजु,
आवत बसंत रितुराज कहियतु है॥

यदि आज वे होत तो क्या ऐसी रचना कर पाते?