बिरला ही कोई व्यक्ति होगा जो फिल्मी गीतों का दीवाना न हो। भारतीय फिल्मों के गीत न केवल भारत में अपितु संसार भर के देशों में भी लोकप्रिय होते रहे हैं। एक जमाना था जब रूस में तो राज कपूर की फिल्मों के गीतों की तूती बोलती थी, रशियन लोग हिन्दी गाने गुनगुना कर खुश होते थे। फिल्मी गीतों पर आधारित रेडियो प्रोग्राम बिनाका गीतमाला ने कई दशकों तक रेडियो श्रोताओं को सम्मोहित कर के रखा था। रेडियो सीलोन, विविध भारती, आल इण्डिया रेडियो आदि का अस्तित्व ही फिल्मी गीतों से था।
भारत में सिनेमा के आने के पहले नाटक और नौटंकियों का चलन था। उस जमाने में बहुत सी नौटंकी कम्पनियाँ हुआ करती थीं जो कि पूरे भारत में अपना ताम-झाम लेकर घूम-घूम कर नाटक-नौटंकी दिखाया करती थीं, भारत में जगह-जगह लगने वाले मेलों में तो इन नौटंकी कम्पनियों की धूम हुआ करती थी। फिल्म "तीसरी कसम" की नायिका तो ऐसी ही एक नौटंकी कम्पनी की हीरोइन ही थी तथा फिल्म "गीत गाता चल" में भी नौटंकी कम्पनियों का बहुत अच्छा सन्दर्भ है। इन नाटकों तथा नौटंकियों में संवाद के साथ गीत गाने का भी चलन था, वास्तव में लोग नाच-गाना देखने के लिए ही नौटंकियों में जाया करते थे। बाद में सिनेमा का चलन हो जाने पर शनैः-शनैः नौटंकी कम्पनियाँ समाप्त हो गईं तथा सिनेमा को ही नाटक-नौटंकियों का एक नया रूप माना जाने लगा। यही कारण है कि फिल्मों में गानों का रिवाज चल निकला।
सिनेमा के प्रारम्भिक दिनों में फिल्म में काम सिर्फ उन्हीं कलाकारों को काम मिलता था जिन्हें गायन तथा संगीत का बी ज्ञान हो क्योंकि उन्हें अपना गाना खुद ही गाना पड़ता था। फिर सन् 1935 में न्यू थियेटर ने अपनी फिल्म "धूप छाँव" में प्लेबैक गायन का सिस्टम शुरू किया और इस नये सिस्टम ने भारतीय फिल्म संगीत के स्वरूप को ही पूरी तरह से बदल डाला। प्रभात पिक्चर्स ने केशवराव भोले को, जिन्हें कि पश्चिमी ऑर्केस्ट्रा का पर्याप्त अनुभव था, गानों में पियानो, हवायन गिटार और वायलिन जैसे पाश्चात्य वाद्ययंत्रों के प्रयोग के लिए नियुक्त किया जिसके परिणामस्वरूप शान्ता आप्टे, जिसके ऊपर फिल्म "दुनिया ना माने" (1937) में एक पूर्ण अंग्रेजी गाना फिल्माया गया, प्रभात पिक्चर्स की अग्रणी कलाकार बन गईं। सन् 1939 में व्ही. शान्तारम ने फिल्म "आदमी" में एक बहुभाषी गाना रखा। प्लेबैक सिस्टम का प्रयोग शुरू हो जाने पर ऐसे गायकों को भी फिल्मों में गाने का मौका मिलने लगा जिन्हें अभिनय में रुचि नहीं थी। पारुल घोष, अमीरबाई कर्नाटकी, जोहराबाई अम्बालावाली, राजकुमारी, अरुण कुमार आदि शरू-शुरू के प्लेबैक सिंगर थे।
के.एल. सहगल, पंकज मलिक, के.सी. डे आदि के समय में गाने सिर्फ शास्त्रीय संगीत के आधार पर बनाये जाते थे और उनमें बहुत कम वाद्य यन्त्रों का प्रयोग किया जाता था किन्तु प्लेबैक सिस्टम आने के बाद गानों में लोक-संगीत तथा पाश्चात्य संगीत का भी पुट आने लगा। भारत के अनेक क्षेत्रों में अनेक प्रकार के लोक-संगीत होने का बहुत बड़ा फायदा फिल्म संगीत को मिलने लगा। फिल्मी गीतों की धुनों में बंगाली, पंजाबी आदि लोक-संगीतों का प्रयोग करके गानों को मधुरतर से मधुरतम रूप दिया जाने लगा और लोग उन धुनों पर थिरकने लगे। लोगों में उन दिनों फिल्मी गानों के प्रति उन्माद का कैसा आलम था इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि सन् 1925 में बनी फिल्म इन्द्रसभा में 71 गाने थे।
कालान्तर में नौशाद, सी. रामचंद्र, चित्रगुप्त, हेमंत कुमार, रोशन, एस.डी. बर्मन, खय्याम, जयदेव, सलिल चौधरी, मदन मोहन, शंकर जयकिशन, ओ.पी. नैयर, कल्याणजी आनंदजी, लक्ष्मीकांत प्यारेलाल, आर.डी. बर्मन जैसे तीव्र कल्पनाशील संगीतकारों और मोहम्मद रफ़ी, मुकेश, किशोर कुमार, महेन्द्र कपूर, लता मंगेशकर, सुमन कल्याणपुर, आशा भोंसले जैसे प्रतिभावान गायक गायिकाओं के संगम से फिल्म संगीत दिन-प्रतिदिन निखरता ही चला गया।
सन् 1950 से 1975-80 तक भारतीय फिल्म संगीत का स्वर्णकाल रहा। फिर उसके बाद मैलोडियस संगीत ह्रास के दिन आने लगे, फिल्मी गानों में मैलोडी के स्थान पर हारमोनी बढ़ने लग गई और फिल्म संगीत का एक नया रूप आया जिसका चलन अभी भी है।
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Friday, October 7, 2011
Wednesday, June 9, 2010
संगीतप्रेमी श्वान बनाम हिज मास्टर्स व्हायस... संगीत... मेलॉडी... हारमोनी...
क्या आपको हिज मास्टर्स व्हायस के रेकॉर्ड्स याद हैं जिसमें संगीत का आनन्द लेते हुए श्वान महाशय का चित्र हुआ करता था? अवश्य ही याद होगा क्योंकि आप इन एसपी और एलपी रेकार्ड्स को अपने रेकॉर्ड प्लेयर पर सुना करते थे
और आनन्द-विभोर हो जाया करते थे। पर हमारे बचपन के दिनों में तो, जब रेकॉर्ड प्लेयर नाम की चीज ही नहीं थी, हमारे घर में ग्रामोफोन हुआ करता था जिसका तवा बगैर बिजली के स्प्रिंग द्वारा घूमा करता था और उसमें से बिना किसी स्पीकर के सिर्फ डॉयफ्राम और भोंपू की सहायता से गाने की आवाज आया करती थी - "चली कौन से देश गुजरिया तू सजधज के, जाऊँ पिया के देश ओ रसिया मैं सजधज के..."। छत्तीसगढ़ी गाने का भी एक रेकॉर्ड हुआ करता था हमारे यहाँ - "नरवा तीर में मोर कारी नौरंगी सँवरपड़री टोरथे भाजी नरवा तीर में ..."
तो हम बात कर रहे थे हिज मास्टर्स व्हायस के रेकॉर्ड्स की। कितना सार्थक प्रतीक चिह्न था संगीत के रेकॉर्ड्स बनाने वाली इस कंपनी हिज मास्टर्स व्हायस का! चित्र को देखते ही लगने लगता था कि संगीत में सिर्फ मनुष्य को तो क्या प्राणीमात्र को प्रभावित की शक्ति है, संगीत को सुनकर श्वान महाशय भी भाव-विभोर हो सकते हैं।
ऐसा माना जाता है कि मेलॉडी भारतीय संगीत की आत्मा है जबकि पाश्चात्य संगीत का आधार हारमोनी है। आखिर क्या है ये मेलॉडी और हारमोनी?
क्योंकि मेलॉडी और हारमोनी संगीत के अन्तर्गत आते हैं इसलिये पहले संगीत को ही समझना अधिक उचित होगा। संगीत को आप केवल इतने से ही समझ सकते हैं कि कर्णप्रिय लगने वाली ध्वनि संगीत कहलाती है और कानों को कर्कश लगने वाली ध्वनि शोर कहलाता है। कोयल की कूक हमें मधुर प्रतीत होती है अतः वह एक संगीत है किन्तु कौवे का काँव-काँव करना शोर होता है। बाँसुरी से जब लयबद्ध धुन निकलती है तो वह संगीत होता है किन्तु उसी बाँसुरी में यदि जोर की फूँक मार दी जाये तो निकलने वाली ध्वनि कर्कश होने के कारण शोर कहलायेगा।
जब एक ही स्वर से संगीत का प्रभाव उत्पन्न किया जाता है तो मेलॉडी होता है याने कि यदि कंठ से 'ओऽऽऽऽऽऽऽऽम' की ध्वनि निकल रही हो तो बाँसुरी, वीणा आदि वाद्ययंत्रों से भी, कंठस्वर के साथ ही साथ, 'ओऽऽऽऽऽऽऽऽम' ध्वनि ही निकलेगी और उन समस्त ध्वनियों का संयोग मेलॉडी होगा। इसके विपरीत जब विभिन्न स्वरों के मेल से संगीत का प्रभाव उत्पन्न होता है तो वह हारमोनी कहलाता है। कल्पना कीजिये कि आप किसी समुद्र के तट पर बैठे हैं, लहरों की गर्जना अलग हो रही है, हवा चलने की हहर-हहर करती आवाज अलग आ रही है और दूर समुद्र में किसी नाव पर बैठे हुए माझी के गीत का स्वर अलग सुनाई पड़ रहा है किन्तु इन समस्त ध्वनियों को मेल आपको आनन्द-विभोर कर रहा है। यही है हारमोनी! ध्वनियों का मेल तो सड़क पर भी होता है, सड़क पर जाम लग गया है, कई गाड़ियों के हार्न बज रहे हैं, किनारे पर गन्ना रस निकालने वाली मशीन से 'चूँऽऽऽचररऽऽ' करती अलग प्रकार की आवाज निकल रही है, एक आदमी अपने आगे वाले आदमी को चिल्ला कर कह रहा है 'अबे साइड हो'... किन्तु सड़क पर होने वाली इन ध्वनियों का मेल आपको मधुर लगने के बजाय कर्कश लगता है इसलिये यह शोर होता है न कि हारमोनी। याने कि संगीत में जब कंठस्वर से अलग सुर निकल रहा हो, वायलिन से अलग और बाँसुरी से कुछ अलग किन्तु इन सभी सुरों का मेल मधुर हो तो हारमोनी होगा।
भारतीय फिल्म संगीत के स्वर्णिम काल (1950-80) में हमारे संगीतकारों ने मेलॉडी और हारमोनी का इतना सुन्दर प्रयोग किया कि उनकी धुनें अमर हो गईं।
यह तो आप सभी जानते हैं कि संगीत के सात सुर होते हैं, चलिये आज उन सुरों के नाम भी जान लें:
उपरोक्त सात सुरों के पाँच सहायक स्वर भी होते हैं - कोमल रे, कोमल ग, तीव्र म, कोमल ध और कोमल नि।
आपकी जानकारी के लिये मैं बता दूँ कि मैं कोई संगीत विशेषज्ञ नहीं हूँ किन्तु संगीत के विषय में थोड़ी सी जानकारी मुझे थी उसे आज मैंने इस पोस्ट में प्रस्तुत कर दिया। शायद आप लोगों में से कुछ को पसन्द आये।
और आनन्द-विभोर हो जाया करते थे। पर हमारे बचपन के दिनों में तो, जब रेकॉर्ड प्लेयर नाम की चीज ही नहीं थी, हमारे घर में ग्रामोफोन हुआ करता था जिसका तवा बगैर बिजली के स्प्रिंग द्वारा घूमा करता था और उसमें से बिना किसी स्पीकर के सिर्फ डॉयफ्राम और भोंपू की सहायता से गाने की आवाज आया करती थी - "चली कौन से देश गुजरिया तू सजधज के, जाऊँ पिया के देश ओ रसिया मैं सजधज के..."। छत्तीसगढ़ी गाने का भी एक रेकॉर्ड हुआ करता था हमारे यहाँ - "नरवा तीर में मोर कारी नौरंगी सँवरपड़री टोरथे भाजी नरवा तीर में ..."
तो हम बात कर रहे थे हिज मास्टर्स व्हायस के रेकॉर्ड्स की। कितना सार्थक प्रतीक चिह्न था संगीत के रेकॉर्ड्स बनाने वाली इस कंपनी हिज मास्टर्स व्हायस का! चित्र को देखते ही लगने लगता था कि संगीत में सिर्फ मनुष्य को तो क्या प्राणीमात्र को प्रभावित की शक्ति है, संगीत को सुनकर श्वान महाशय भी भाव-विभोर हो सकते हैं।
ऐसा माना जाता है कि मेलॉडी भारतीय संगीत की आत्मा है जबकि पाश्चात्य संगीत का आधार हारमोनी है। आखिर क्या है ये मेलॉडी और हारमोनी?
क्योंकि मेलॉडी और हारमोनी संगीत के अन्तर्गत आते हैं इसलिये पहले संगीत को ही समझना अधिक उचित होगा। संगीत को आप केवल इतने से ही समझ सकते हैं कि कर्णप्रिय लगने वाली ध्वनि संगीत कहलाती है और कानों को कर्कश लगने वाली ध्वनि शोर कहलाता है। कोयल की कूक हमें मधुर प्रतीत होती है अतः वह एक संगीत है किन्तु कौवे का काँव-काँव करना शोर होता है। बाँसुरी से जब लयबद्ध धुन निकलती है तो वह संगीत होता है किन्तु उसी बाँसुरी में यदि जोर की फूँक मार दी जाये तो निकलने वाली ध्वनि कर्कश होने के कारण शोर कहलायेगा।
जब एक ही स्वर से संगीत का प्रभाव उत्पन्न किया जाता है तो मेलॉडी होता है याने कि यदि कंठ से 'ओऽऽऽऽऽऽऽऽम' की ध्वनि निकल रही हो तो बाँसुरी, वीणा आदि वाद्ययंत्रों से भी, कंठस्वर के साथ ही साथ, 'ओऽऽऽऽऽऽऽऽम' ध्वनि ही निकलेगी और उन समस्त ध्वनियों का संयोग मेलॉडी होगा। इसके विपरीत जब विभिन्न स्वरों के मेल से संगीत का प्रभाव उत्पन्न होता है तो वह हारमोनी कहलाता है। कल्पना कीजिये कि आप किसी समुद्र के तट पर बैठे हैं, लहरों की गर्जना अलग हो रही है, हवा चलने की हहर-हहर करती आवाज अलग आ रही है और दूर समुद्र में किसी नाव पर बैठे हुए माझी के गीत का स्वर अलग सुनाई पड़ रहा है किन्तु इन समस्त ध्वनियों को मेल आपको आनन्द-विभोर कर रहा है। यही है हारमोनी! ध्वनियों का मेल तो सड़क पर भी होता है, सड़क पर जाम लग गया है, कई गाड़ियों के हार्न बज रहे हैं, किनारे पर गन्ना रस निकालने वाली मशीन से 'चूँऽऽऽचररऽऽ' करती अलग प्रकार की आवाज निकल रही है, एक आदमी अपने आगे वाले आदमी को चिल्ला कर कह रहा है 'अबे साइड हो'... किन्तु सड़क पर होने वाली इन ध्वनियों का मेल आपको मधुर लगने के बजाय कर्कश लगता है इसलिये यह शोर होता है न कि हारमोनी। याने कि संगीत में जब कंठस्वर से अलग सुर निकल रहा हो, वायलिन से अलग और बाँसुरी से कुछ अलग किन्तु इन सभी सुरों का मेल मधुर हो तो हारमोनी होगा।
भारतीय फिल्म संगीत के स्वर्णिम काल (1950-80) में हमारे संगीतकारों ने मेलॉडी और हारमोनी का इतना सुन्दर प्रयोग किया कि उनकी धुनें अमर हो गईं।
यह तो आप सभी जानते हैं कि संगीत के सात सुर होते हैं, चलिये आज उन सुरों के नाम भी जान लें:
- षडज - सा
- ऋषभ - रे
- गान्धार - गा
- मध्यम - म
- पंचम - प
- धैवत - ध
- निषाद - नि
उपरोक्त सात सुरों के पाँच सहायक स्वर भी होते हैं - कोमल रे, कोमल ग, तीव्र म, कोमल ध और कोमल नि।
आपकी जानकारी के लिये मैं बता दूँ कि मैं कोई संगीत विशेषज्ञ नहीं हूँ किन्तु संगीत के विषय में थोड़ी सी जानकारी मुझे थी उसे आज मैंने इस पोस्ट में प्रस्तुत कर दिया। शायद आप लोगों में से कुछ को पसन्द आये।
Friday, April 2, 2010
धकड़िक फकछक धकड़िक फकछक और सुहानी रात ढल चुकी ...
हम ऑटो में बैठे तो उसमें लगे एफएम रेडियो से गाना सुनाई पड़ा "सुहानी रात ढल चुकी ..."।
हम खुश हो गये कि चलो पुराना गाना सुनने को मिलेगा। पर ज्योंही बोल खत्म हुआ कि "धकड़िक फकछक" "धकड़िक फकछक"। ये कौन सा ताल है भाई? और ये क्या? "ना जाने तुम कब आओगे" के बदले "ना जाने तुम कब आओगे"? ये "आओगे" से जाओगे" कैसे हो गया?
गम्भीर अर्थ लिये हुए गानों के साथ बेमेल ताल और बीच-बीच में कुछ भी समझ में न आने वाले अंग्रेजी बोल। ये हैं आज के रीमिक्स गाने। धकड़िक फकछक धकड़िक फकछक .... दम्म दम्म ...। ये हैं आज के ताल। हमें तो ऐसा लगता है कि कोई सर के ऊपर हथौड़ा मार रहा है। पर किया ही क्या जा सकता है? यही आज की पसंद है।
क्या ये रीमिक्स दूसरों की संपत्ति पर दिन दहाड़े डाका नहीं है? एक डाकू क्या करता है? केवल दूसरों की संपत्ति को लूट खसोट कर अपना करार देने के सिवाय? आज पुराने गानों का रीमिक्स बनाने वाला भी लुटेरों की श्रेणी में ही तो आता है। उसके भीतर इतनी कल्पनाशीलता तो होती ही नहीं है कि कोई नई यादगार धुन का निर्माण कर सके, हाँ, दूसरों के द्वारा परिश्रम करके बनाये गये सुरीले धुनों को विकृत अवश्य कर सकता है।
आपको जानकारी होगी कि पुराने लोकप्रिय गीतों की रचना का श्रेय किसी एक व्यक्ति ने कभी भी नहीं लिया क्योंकि वे गीत सामूहिक परिश्रम के परिणाम थे। आज भी यदि आप में से किसी के पास पुराने गीतों के रेकार्ड (लाख या प्लास्टिक का तवा) तो आप उस पर छपे हुये विवरण में पढ़ सकते हैं कि गायक/गायिका - अबस, संगीत निर्देशक - कखग, गीतकार - क्षत्रज्ञ आदि आदि इत्यादि। मेरे कहने का आशय यह है कि एक फिल्मी गीत की संरचना किसी व्यक्तिविशेष की नहीं होती।
फिर इतने लोगों के परिश्रम से बनी संरचना को मनमाने रूप में बदल देने का अधिकार किसी को कैसे मिल जाता है?
एक घटना याद आ रही है। प्रसिद्ध गीतकार शैलेन्द्र ने फिल्म श्री 420 के एक गीत में लिखा था -
"रातों दसों दिशाओं में कहेंगी अपनी कहानियाँ.........."
इसी पर संगीतकार जयकिशन और गीतकार शैलेन्द्र के बीच जोरदार तकरार हो गया था। जयकिशन का ऐतराज था कि दिशाएँ दस नहीं आठ होती हैं और शैलेन्द्र को शब्द बदलने के लिये दबाव डालने का प्रयास किया था। पर शैलेन्द्र अपने बोलों पर अड़े रहे। उन्होंने साफ साफ कह दिया कि तुम्हें धुन बनाने से मतलब होना चाहिये, गीत के बोलों से नहीं। गीत लिखना मेरा काम है और मैं जानता हूँ कि मुझे क्या लिखना है, यदि धुन बना सकते बनाओ अन्यथा किसी और से गीत लिखवा लो।
तात्पर्य यह कि वे गीतकार इतने स्वाभिमानी थे कि अपने लिखे गीत के एक शब्द में जरा भी परिवर्तन सहन नहीं कर पाते थे। (हमारे यहाँ पृथ्वी और आकाश को भी दिशा ही माना गया है और इस प्रकार से वास्तव में दस दिशायें ही होती हैं।)
हमारा प्रश्न यह है कि रीमिक्स बनाने वालों को गाने के ताल को बदलने के साथ ही साथ गीतकार के शब्दों को बदलने का अधिकार किसने दे दिया?
जिन गानों के रीमिक्स आज बन रहे हैं उनके गीतकार, संगीतकार, गायक, री-रेकार्डिंग तकनीशियन आदि में से प्रायः बहुतों का स्वर्गवास हो चुका है। क्या उनकी आत्मा इन रीमिक्स गानो को सुनकर रोती नहीं होंगी?
हम खुश हो गये कि चलो पुराना गाना सुनने को मिलेगा। पर ज्योंही बोल खत्म हुआ कि "धकड़िक फकछक" "धकड़िक फकछक"। ये कौन सा ताल है भाई? और ये क्या? "ना जाने तुम कब आओगे" के बदले "ना जाने तुम कब आओगे"? ये "आओगे" से जाओगे" कैसे हो गया?
गम्भीर अर्थ लिये हुए गानों के साथ बेमेल ताल और बीच-बीच में कुछ भी समझ में न आने वाले अंग्रेजी बोल। ये हैं आज के रीमिक्स गाने। धकड़िक फकछक धकड़िक फकछक .... दम्म दम्म ...। ये हैं आज के ताल। हमें तो ऐसा लगता है कि कोई सर के ऊपर हथौड़ा मार रहा है। पर किया ही क्या जा सकता है? यही आज की पसंद है।
क्या ये रीमिक्स दूसरों की संपत्ति पर दिन दहाड़े डाका नहीं है? एक डाकू क्या करता है? केवल दूसरों की संपत्ति को लूट खसोट कर अपना करार देने के सिवाय? आज पुराने गानों का रीमिक्स बनाने वाला भी लुटेरों की श्रेणी में ही तो आता है। उसके भीतर इतनी कल्पनाशीलता तो होती ही नहीं है कि कोई नई यादगार धुन का निर्माण कर सके, हाँ, दूसरों के द्वारा परिश्रम करके बनाये गये सुरीले धुनों को विकृत अवश्य कर सकता है।
आपको जानकारी होगी कि पुराने लोकप्रिय गीतों की रचना का श्रेय किसी एक व्यक्ति ने कभी भी नहीं लिया क्योंकि वे गीत सामूहिक परिश्रम के परिणाम थे। आज भी यदि आप में से किसी के पास पुराने गीतों के रेकार्ड (लाख या प्लास्टिक का तवा) तो आप उस पर छपे हुये विवरण में पढ़ सकते हैं कि गायक/गायिका - अबस, संगीत निर्देशक - कखग, गीतकार - क्षत्रज्ञ आदि आदि इत्यादि। मेरे कहने का आशय यह है कि एक फिल्मी गीत की संरचना किसी व्यक्तिविशेष की नहीं होती।
फिर इतने लोगों के परिश्रम से बनी संरचना को मनमाने रूप में बदल देने का अधिकार किसी को कैसे मिल जाता है?
एक घटना याद आ रही है। प्रसिद्ध गीतकार शैलेन्द्र ने फिल्म श्री 420 के एक गीत में लिखा था -
"रातों दसों दिशाओं में कहेंगी अपनी कहानियाँ.........."
इसी पर संगीतकार जयकिशन और गीतकार शैलेन्द्र के बीच जोरदार तकरार हो गया था। जयकिशन का ऐतराज था कि दिशाएँ दस नहीं आठ होती हैं और शैलेन्द्र को शब्द बदलने के लिये दबाव डालने का प्रयास किया था। पर शैलेन्द्र अपने बोलों पर अड़े रहे। उन्होंने साफ साफ कह दिया कि तुम्हें धुन बनाने से मतलब होना चाहिये, गीत के बोलों से नहीं। गीत लिखना मेरा काम है और मैं जानता हूँ कि मुझे क्या लिखना है, यदि धुन बना सकते बनाओ अन्यथा किसी और से गीत लिखवा लो।
तात्पर्य यह कि वे गीतकार इतने स्वाभिमानी थे कि अपने लिखे गीत के एक शब्द में जरा भी परिवर्तन सहन नहीं कर पाते थे। (हमारे यहाँ पृथ्वी और आकाश को भी दिशा ही माना गया है और इस प्रकार से वास्तव में दस दिशायें ही होती हैं।)
हमारा प्रश्न यह है कि रीमिक्स बनाने वालों को गाने के ताल को बदलने के साथ ही साथ गीतकार के शब्दों को बदलने का अधिकार किसने दे दिया?
जिन गानों के रीमिक्स आज बन रहे हैं उनके गीतकार, संगीतकार, गायक, री-रेकार्डिंग तकनीशियन आदि में से प्रायः बहुतों का स्वर्गवास हो चुका है। क्या उनकी आत्मा इन रीमिक्स गानो को सुनकर रोती नहीं होंगी?
Saturday, January 23, 2010
बड़ी बेसब्री से इंतजार किया करते थे हम बुधवार का
एक समय था जब हमें लगता था कि कैसे जल्दी से जल्दी बुधवार आ जाये और जब बुधवार आ जाता था तो फिर बेसब्री के साथ इंतजार हो जाता था रात्रि के आठ बजने का। हमारा खयाल है कि सिर्फ हमें ही नहीं बल्कि आप को भी ऐसा लगता रहा होगा। हम बात कर रहे हैं अपने समय की सर्वाधिक लोकप्रिय रेडियो कार्यक्रम "बिनाका गीतमाला" की जिसके भारत के करोड़ों लोग दीवाने थे।
बिनाका गीतमाला रेडियो पर प्रसारित होने वाला भारतीय फिल्मों के गीतों पर आधारित प्रथम काउंट डाउन (count down) कार्यक्रम था जिसकी जो कि सन् 1952 से शुरू होकर सन् 1994 तक चली। एक समय में बिनाका गीतमाला इतना अधिक लोकप्रिय था कि लोग इसे सुनने के लिये अपने जरूरी से जरूरी काम को भी टाल दिया करते थे। भारत के करोड़ों लोग इस प्रोग्राम के दीवाने थे।
बिनाका गीतमाला का प्रसारण "सीलोन ब्रॉडकास्टिंग कार्पोरेशन", जिसे कि रेडियो सीलोन के नाम से जाना जाता था और जो बाद में "श्रीलंका ब्रॉडकास्टिंग कार्पोरेशन" हो गया, से प्रत्येक बुधवार की रात्रि 8 बजे हुआ करता था। आरम्भ में यह प्रोग्राम आधे घंटे का हुआ करता था किन्तु बाद में इसकी लोकप्रियता को ध्यान में रख कर इसे एक घंटे का कर दिया गया था। संगीत के इस अत्यन्त लोकप्रिय कार्यक्रम में लोकप्रियता के आधार पर भारतीय फिल्मों के गीतों को सुनवाया जाता था और इसे विख्यात उद्घोषक अमीन सयानी अपनी मनमोहक अंदाज एवं आवाज के साथ प्रस्तुत किया करते थे। भारतीय फिल्मों की मेलॉडियस संगीत और अमीन सयानी की कर्णप्रिय आवाज पूरे एक घंटे तक श्रोताओं को भाव विभोर कर के रेडियो से चिपका के रख दिया करती थी।
बिनाका गीतमाला में गीतों को उनकी लोकप्रियता के क्रम के अनुसार सुनवाया जाता था। चयन किये गये सोलह गानों में सबसे कम लोकप्रिय गाना सबसे पहले और सबसे अधिक लोकप्रिय गाना सबसे अंत में बजा करता था। कार्यक्रम का आरम्भ शानदार बिगुल बजने के साथ हुआ करता था। गानों के रेकॉर्ड की बिक्री गानों की लोकप्रियता का पैमाना हुआ करता था।
बाद में बिनाका गीतमाला के नाम को दो बार बदला गया। पहली बार इसका नाम बदल कर सिबाका गीतमाला किया गया और दूसरी बार कोलगेट गीतमाला। कालान्तर में सिबाका गीतमाला को सिबाका संगीतमाला के नाम से विविध भारती से भी प्रसारित किया गया।
बिनाका गीतमाला के आरम्भ होने के 39 वर्षों के बाद टेलीविजन पर फिल्मी गीतों के काउंट डाउन (count down) कार्यक्रम सुपरहिट मुकाबला शुरू हो गया जिसके कारण इस इस कार्यक्रम का प्रभाव कम होने लगा। लोकप्रियता कम हो जाने पर कार्यक्रम के 42वें वर्ष में इसे बंद कर दिया गया।
नीचे प्रस्तुत है बिनाका गीतमाला के अनुसार वर्षवार सर्वाधिक लोकप्रिय गीतों की सूचीः
बिनाका गीतमाला रेडियो पर प्रसारित होने वाला भारतीय फिल्मों के गीतों पर आधारित प्रथम काउंट डाउन (count down) कार्यक्रम था जिसकी जो कि सन् 1952 से शुरू होकर सन् 1994 तक चली। एक समय में बिनाका गीतमाला इतना अधिक लोकप्रिय था कि लोग इसे सुनने के लिये अपने जरूरी से जरूरी काम को भी टाल दिया करते थे। भारत के करोड़ों लोग इस प्रोग्राम के दीवाने थे।
बिनाका गीतमाला का प्रसारण "सीलोन ब्रॉडकास्टिंग कार्पोरेशन", जिसे कि रेडियो सीलोन के नाम से जाना जाता था और जो बाद में "श्रीलंका ब्रॉडकास्टिंग कार्पोरेशन" हो गया, से प्रत्येक बुधवार की रात्रि 8 बजे हुआ करता था। आरम्भ में यह प्रोग्राम आधे घंटे का हुआ करता था किन्तु बाद में इसकी लोकप्रियता को ध्यान में रख कर इसे एक घंटे का कर दिया गया था। संगीत के इस अत्यन्त लोकप्रिय कार्यक्रम में लोकप्रियता के आधार पर भारतीय फिल्मों के गीतों को सुनवाया जाता था और इसे विख्यात उद्घोषक अमीन सयानी अपनी मनमोहक अंदाज एवं आवाज के साथ प्रस्तुत किया करते थे। भारतीय फिल्मों की मेलॉडियस संगीत और अमीन सयानी की कर्णप्रिय आवाज पूरे एक घंटे तक श्रोताओं को भाव विभोर कर के रेडियो से चिपका के रख दिया करती थी।
बिनाका गीतमाला में गीतों को उनकी लोकप्रियता के क्रम के अनुसार सुनवाया जाता था। चयन किये गये सोलह गानों में सबसे कम लोकप्रिय गाना सबसे पहले और सबसे अधिक लोकप्रिय गाना सबसे अंत में बजा करता था। कार्यक्रम का आरम्भ शानदार बिगुल बजने के साथ हुआ करता था। गानों के रेकॉर्ड की बिक्री गानों की लोकप्रियता का पैमाना हुआ करता था।
बाद में बिनाका गीतमाला के नाम को दो बार बदला गया। पहली बार इसका नाम बदल कर सिबाका गीतमाला किया गया और दूसरी बार कोलगेट गीतमाला। कालान्तर में सिबाका गीतमाला को सिबाका संगीतमाला के नाम से विविध भारती से भी प्रसारित किया गया।
बिनाका गीतमाला के आरम्भ होने के 39 वर्षों के बाद टेलीविजन पर फिल्मी गीतों के काउंट डाउन (count down) कार्यक्रम सुपरहिट मुकाबला शुरू हो गया जिसके कारण इस इस कार्यक्रम का प्रभाव कम होने लगा। लोकप्रियता कम हो जाने पर कार्यक्रम के 42वें वर्ष में इसे बंद कर दिया गया।
नीचे प्रस्तुत है बिनाका गीतमाला के अनुसार वर्षवार सर्वाधिक लोकप्रिय गीतों की सूचीः
| वर्ष | गीत | फिल्म | संगीतकार | गीतकार | गायक/गायिका |
| 1953 | ये जिन्दगी उसी की है | अनारकली | सी रामचंद | राजेन्द कृष्ण | लता मंगेषकर |
| 1954 | जायें तो जायें कहाँ | टैक्सी ड्राइव्हर | सचिनदेव बर्मन | साहिर लुधियानवी | तलत महमूद/लता मंगेषकर |
| 1955 | मेरा जूता है जापानी | श्री 420 | शंकर जयकिशन | शैलेन्द्र | मुकेश |
| 1956 | ऐ दिल है मुश्किल जीना यहाँ | सीआईडी | ओ पी नैयर | मजरूह सुल्तानपुरी | मोहम्मद रफी, गीतादत्त |
| 1957 | जरा सामने तो आओ छलिये | जनम जनम के फेरे | एस एन त्रिपाठी | भरत व्यास | मोहम्मद रफी, लता मंगेषकर |
| 1958 | है अपना दिल तो आवारा | सोलहवाँ साल | सचिनदेव बर्मन | मजरूह सुल्तानपुरी | हेमन्त कुमार |
| 1959 | हाल कैसा है जनाब का | चलती का नाम गाड़ी | सचिनदेव बर्मन | मजरूह सुल्तानपुरी | हेमन्त कुमार, आशा भोसले |
| 1960 | जिंदगी भर नहीं भूलेगी वो बरसात की रात | बरसात की रात | रोशन | साहिर लुधियानवी | मोहम्मद रफी, लता मंगेषकर |
| 1961 | तेरी प्यारी प्यारी सूरत को | ससुराल | शंकर जयकिशन | हसरत जयपुरी | मोहम्मद रफी |
| 1962 | एहसान तेरा होगा मुझपर | जंगली | शंकर जयकिशन | हसरत जयपुरी | मोहम्मद रफी/लता मंगेषकर |
| 1963 | जो वादा किया वो निभाना पड़ेगा | ताजमहल | रोशन | साहिर लुधियानवी | मोहम्मद रफी, लता मंगेषकर |
| 1964 | मेरे मन की गंगा | संगम | शंकर जयकिशन | शैलेन्द्र | मुकेश, वैजयन्तीमाला |
| 1965 | जिस दिल में सा था प्यार तेरा | सहेली | कल्याणजी आनन्दजी | इन्दीवर | मुकेश/लता मंगेषकर |
| 1966 | बहारों फूल बरसाओ | सूरज | शंकर जयकिशन | हसरत जयपुरी | मोहम्मद रफी |
| 1967 | सावन का महीना पवन करे सोर | मिलन | लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल | आनन्द बख्शी | मुकेश, लता मंगेषकर |
| 1968 | दिल विल प्यार व्यार | शागिर्द | लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल | आनन्द बख्शी | लता मंगेषकर |
| 1969 | कैसे रहूँ चुप | इन्तेकाम | लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल | राजेन्द्र कृष्ण | लता मंगेषकर |
| 1970 | बिंदिया चमकेगी | दो रास्ते | लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल | आनन्द बख्शी | लता मंगेषकर |
| 1971 | जिंदगी एक सफर है सुहाना | अंदाज | शंकर जयकिशन | हसरत जयपुरी | किशोर कुमार/आशा भोसले |
| 1972 | दम मारो दम | हरे रामा हरे कृष्णा | राहुलदेव बर्मन | आनन्द बख्शी | आशा भोसले |
| 1973 | यारी है ईमान मेरा यार मेरी जिंदगी | जंजीर | कल्याणजी आनन्दजी | गुलशन बावरा | मन्ना डे |
| 1974 | मेरा जीवन कोरा कागज कोरा ही रह गया | कोरा कागज | कल्याणजी आनन्दजी | एम जी हश्मत | किशोर कुमार |
| 1975 | बाकी कुछ बचा तो मँहगाई मार गई | रोटी कपड़ा और मकान | लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल | वर्मा मलिक | लता मंगेषकर, मुकेश, जानीबाबू, नरेन्द्र |
| 1976 | कभी कभी मेरे दिल में खयाल आता है | कभी कभी | खैयाम | साहिर लुधियानवी | मुकेश |
| 1977 | हुस्न हाजिर है मुहब्बत की सजा पाने को | लैला मजनूँ | मदन मोहन | साहिर लुधियानवी | लता मंगेषकर |
| 1978 | अँखियों के झरोखे से मैंने देखा जो | अँखियों के झरोखे से | रवीन्द्र जैन | रवीन्द्र जैन | हेमलता |
| 1979 | खइके पान बनारस वाला | डॉन | कल्याणजी आनन्द जी | अंजान | किशोर कुमार |
| 1980 | डफली वाले डफली बजा | सरगम | लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल | आनन्द बख्शी | लता मंगेषकर, मोहम्मद रफी |
| 1981 | मेरे अँगने में तुम्हारा क्या काम है | लावारिस | कल्याणजी आनन्दजी | अंजान | अमिताभ बच्चन, अलका याग्निक |
| 1982 | अंग्रेजी में कहते हैं | खुद्दार | राजेश रोशन | मजरूह सुल्तानपुरी | किशोर कुमार, लता मंगेषकर |
| 1983 | शायद मेरी शादी का खयाल | सौतन | उषा खन्ना | सावन कुमार | किशोर कुमार, लता मंगेषकर |
| 1984 | तू मेरा हीरो है | हीरो | लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल | आनन्द बख्शी | अनुराधा पौढ़वाल, मनहर उधास |
| 1985 | सुन सायबा सुन | राम तेरी गंगा मैली | रवीन्द्र जैन | रवीन्द्र जैन | लता मंगेषकर |
| 1986 | यशोदा का नन्दलाला | संजोग | लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल | अंजान | लता मंगेषकर |
| 1987 | चिट्ठी आई है | नाम | लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल | आनन्द बख्शी | पंकज उधास |
| 1988 | पापा कहते हैं | कयामत से कयामत तक | आनन्द मिलिन्द | मजरूह सुल्तानपुरी | अलका याग्निक, उदित नारायण |
| 1989 | माय नेम इज लखन | राम लखन | लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल | आनन्द बख्शी | मोहम्मद अज़ीज़ |
| 1990 | गोरी है कलाइयाँ | आज का अर्जुन | भप्पी लहरी | अंजान | लता मंगेषकर, शब्बीर कुमार |
| 1991 | देखा है पहली बार | साजन | नदीम-श्रवण | समीर | अलका याग्निक, एस पी बालसुब्रमनियम |
| 1992 | मैने प्यार तुम्हीं से किया है | फूल और काँटे | नदीम-श्रवण | समीर | कुमार सानू, अनुराधा पौढ़वाल |
| 1993 | चोली के पीछे | खलनायाक | लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल | आनन्द बख्शी | अलका याग्निक, इला अरुण |
लेबल:
अमीन सयानी,
गाना,
गाने,
गीत,
बिनाका गीतमाला,
संगीत
Friday, November 27, 2009
गाने के रेकॉर्डिंग के लिये माइक्रोफोन को गरम करना पड़ता था
आपको जानकर आश्चर्य होगा कि फिल्मों में गानों के रेकॉर्डिंग के आरम्भिक दिनों में माइक्रोफोन इतने कमजोर हुआ करते थे कि अनेक बार रेकॉर्डिंग शुरू करने के पहले माइक्रोफोन को आँच दिखा कर गरम करना पड़ता था। गाना रेकॉर्ड करने के लिये माइक्रोफोन को बीच में रख कर गायक और साजिंदे उसके चारों ओर घेरा बनाते थे। जब माइक्रो फोन अधिक गरम हो जाता था तो घेरे को भी बड़ा करना पड़ता था ताकि रेकॉर्डिंग एक जैसा हो।
उन दिनों साज के नाम पर हारमोनियम, तबला, बाँसुरी जैसे केवल गिने-चुने वाद्ययंत्र ही उपलब्ध थे। साज कम होने के कारण आवाज का महत्व अधिक था। आवाज का महत्व अधिक होने के कारण ही एक अंतराल तक के.एल. सहगल, पंकज मलिक, के.सी. डे जैसे गायक फिल्म संगीत के क्षेत्र में छाये रहे। फिल्मों में काम करने के लिये गीत-संगीत का ज्ञान होना अनिवार्य होता था क्योंकि प्ले बैक का सिस्टम नहीं था। कलाकारों को अपना गाना स्वयं गाना पड़ता था।
फिर जमाना बदला, नये-नये तकनीक आने लगे, साजों में भी वृद्धि होने लगी। सन् 1944 में संगीतकार नौशाद ने पहली बार फिल्म 'रतन' में साज और आवाज का भरपूर प्रयोग किया और फिल्म संगीत को एक नई दिशा मिली। नौशाद, सी. रामचंद्र, चित्रगुप्त, हेमंत कुमार, रोशन, एस.डी. बर्मन, खय्याम, जयदेव, सलिल चौधरी, मदन मोहन, शंकर जयकिशन, ओ.पी. नैयर, कल्याणजी आनंदजी, लक्ष्मीकांत प्यारेलाल, आर.डी. बर्मन जैसे तीव्र कल्पनाशील संगीतकारों और मोहम्मद रफ़ी, मुकेश, किशोर कुमार, महेन्द्र कपूर, लता मंगेशकर, सुमन कल्याणपुर, आशा भोंसले जैसे प्रतिभावान गायक गायिकाओं के संगम ने फिल्म संगीत को मधुर और सर्वप्रिय बना दिया। धुनों में साज और आवाज के समुचित अनुपात उन्हें और भी अधिक मधुर बना देते थे और सार्थक शब्द संरचना सोने में सुहागा का काम करती थीं।
सन् 1950 से 1980 तक का समय फिल्म संगीत का स्वर्ण युग रहा। मेलॉडियस संगीत उस काल के फिल्मों की आत्मा बन गई। एक एक गीत को परदे पर देखने और सुनने के लिये लोग अनेक बार एक ही फिल्म को देखने जाते थे और अधिकतम फिल्में सिल्व्हर जुबली, गोल्डन जुबली तथा प्लेटिम जुबली मनाया करती थीं। सारे के सारे संगीतकार अपनी धुनों को सुमधुर सुरों से सजाने के लिये अथक परिश्रम किया करते थे। शैलेन्द्र, हसरत जयपुरी, साहिर लुधियानवी, मजरूह सुल्तानपुरी, राजेन्द्र कृष्ण आदि भी गीतों को सार्थक बनाने के लिये एड़ी चोटी का जोर लगा दिया करते थे। गायक गायिकाओं के कर्णप्रिय कंठस्वर उन दिनों के संगीत में चार चाँद लगा दिया करती थीं। कई बार तो फिल्में पिट जाती थीं पर उनका संगीत गूंजते रहता था। पारसमणि (गीत - उइ माँ, उइ माँ ये क्या हो गया........, सलामत रहो........), लुटेरा (गीत - किसी को पता ना चले बात का........), बादशाह (गीत - अभी कमसिन हो, नादां हो जानेजाना........) जैसी स्टंट फिल्मों के भी गीत आज तक लोकप्रिय हैं।
सभी संगीतकार अपनी मौलिकता बनाये रखना चाहते थे और सभी की अपनी अपनी स्टाइल थी। बर्मन दा अपनी धुनों में लोक संगीत का बहुत अच्छा समावेश कर लेते थे। आपको शायद पता हो कि सचिन देव बर्मन त्रिपुरा के राजपरिवार से सम्बंधित थे। बर्मन दा को वर्ल्ड म्युजिक कान्टेस्ट (world music contest) का जूरी होने का गौरव भी प्राप्त था। सलिल चौधरी भारतीय और पश्चिमी दोनों ही संगीत में पारंगत थे और दोनों का बहुत अच्छा समावेश किया करते थे। शंकर जयकिशन ज्यादातर एकॉर्डियन और बांसुरी के मेल से अपनी धुनों को सजाया करते थे। कल्याणजी आनंदजी क्लार्नेट का बहुत अच्छा इस्तेमाल करते थे। फिल्म नागिन में हेमंत कुमार के लिये बीन की धुन को कल्याणजी आनंदजी ने ही क्लार्नेट पर बजाया था। लक्ष्मीकांत प्यारेलाल ढोलक और बांसरी के प्रयोग से अपनी धुनों को मधुर बनाते थे। ओ.पी. नैयर ने संगीत की कोई शिक्षा ही नहीं प्राप्त की थी फिर भी इतनी मधुर धुनें बनाते थे कि लोग सुन कर झूम उठते थे।
सन् 1980 के बाद से मेलॉडी के स्थान पर डिस्को, पॉप इत्यादि पश्चिमी धुनों का प्रचलन बढ़ता गया। निरर्थक गीत लिखे जाने लगे और धुनों में वाद्ययंत्रों की बहुलता बढने लगी। गीतों की उम्र कम होने लगीं। ऐसा प्रतीत होता है कि अब तो शोर ही संगीत का पर्याय सा हो गया है।
चलते-चलते
"वो सुबह हमीं से आयेगी" या "वो सुबह कभी तो आयेगी"?
साहिर साहब ने एक गीत लिखा था "वो सुबह हमीं से आयेगी" किन्तु फिल्म "फिर सुबह होगी" में उन्होंने अपने उसी गीत को "वो सुबह कभी तो आयेगी" के रूप में बदल दिया था। प्रस्तुत हैं दोनों गीतः
वो सुबह हमीं से आयेगी
जब धरती करवट बदलेगी, जब क़ैद से क़ैदी छूटेंगे
जब पाप घरौंदे फूटेंगे, जब ज़ुल्म के बन्धन टूटेंगे
उस सुबह को हम ही लायेंगे, वो सुबह हमीं से आयेगी
वो सुबह हमीं से आयेगी
मनहूस समाजों ढांचों में, जब जुर्म न पाले जायेंगे
जब हाथ न काटे जायेंगे, जब सर न उछाले जायेंगे
जेलों के बिना जब दुनिया की, सरकार चलाई जायेगी
वो सुबह हमीं से आयेगी
संसार के सारे मेहनतकश, खेतो से, मिलों से निकलेंगे
बेघर, बेदर, बेबस इन्सां, तारीक बिलों से निकलेंगे
दुनिया अम्न और खुशहाली के, फूलों से सजाई जायेगी
वो सुबह हमीं से आयेगी
वहीं वे अपने उसी गीत को कैसे निराशावादी रूप दे देते हैः
वो सुबह कभी तो आयेगी
इन काली सदियों के सर से, जब रात का आंचल ढलकेगा
जब दुख के बादल पिघलेंगे, जब सुख का सागर छलकेगा
जब अम्बर झूम के नाचेगा, जब धरती नज़्में गायेगी
वो सुबह कभी तो आयेगी
जिस सुबह की खातिर जुग-जुग से, हम सब मर-मर कर जीते हैं
जिस सुबह के अमृत की धुन में, हम जहर के प्याले पीते हैं
इन भूखी प्यासी रूहों पर, इक दिन तो करम फर्मायेगी
वो सुबह कभी तो आयेगी
माना कि अभी तेरे मेरे, अर्मानों की कीमत कुछ भी नहीं
मिट्टी का भी है कुछ मोल मगर, इन्सानों की कीमत कुछ भी नहीं
इन्सानों की इज्जत जब झूठे, सिक्कों में न तोली जायेगी
वो सुबह कभी तो आयेगी
दौलत के लिये जब औरत की, इस्मत को न बेचा जायेगा
चाहत को न कुचला जायेगा, ग़ैरत को न बेचा जायेगा
अपनी काली करतूतों पर, जब ये दुनिया शर्मायेगी
वो सुबह कभी तो आयेगी
बीतेंगे कभी तो दिन आख़िर, ये भूख के और बेकारी के
टूटेंगे कभी तो बुत आख़िर, दौलत की इजारादारी के
जब एक अनोखी दुनिया की बुनियाद उठाई जायेगी
वो सुबह कभी तो आयेगी
मजबूर बुढ़ापा जब सूनी, राहों की धूल न फांकेगा
मासूम लड़कपन जब गंदी, गलियों भीख न मांगेगा
ह़क मांगने वालों को जिस दिन, सूली न दिखाई जायेगी
वो सुबह कभी तो आयेगी
फ़ाको की चिताओं पर जिस दिन, इन्सां न जलाये जायेंगे
सीनों के दहकते दोज़ख में, अर्मां न जलाये जायेंगे
ये नरक से भी गन्दी दुनिया, जब स्वर्ग बनाई जायेगी
वो सुबह कभी तो आयेगी
उन दिनों साज के नाम पर हारमोनियम, तबला, बाँसुरी जैसे केवल गिने-चुने वाद्ययंत्र ही उपलब्ध थे। साज कम होने के कारण आवाज का महत्व अधिक था। आवाज का महत्व अधिक होने के कारण ही एक अंतराल तक के.एल. सहगल, पंकज मलिक, के.सी. डे जैसे गायक फिल्म संगीत के क्षेत्र में छाये रहे। फिल्मों में काम करने के लिये गीत-संगीत का ज्ञान होना अनिवार्य होता था क्योंकि प्ले बैक का सिस्टम नहीं था। कलाकारों को अपना गाना स्वयं गाना पड़ता था।फिर जमाना बदला, नये-नये तकनीक आने लगे, साजों में भी वृद्धि होने लगी। सन् 1944 में संगीतकार नौशाद ने पहली बार फिल्म 'रतन' में साज और आवाज का भरपूर प्रयोग किया और फिल्म संगीत को एक नई दिशा मिली। नौशाद, सी. रामचंद्र, चित्रगुप्त, हेमंत कुमार, रोशन, एस.डी. बर्मन, खय्याम, जयदेव, सलिल चौधरी, मदन मोहन, शंकर जयकिशन, ओ.पी. नैयर, कल्याणजी आनंदजी, लक्ष्मीकांत प्यारेलाल, आर.डी. बर्मन जैसे तीव्र कल्पनाशील संगीतकारों और मोहम्मद रफ़ी, मुकेश, किशोर कुमार, महेन्द्र कपूर, लता मंगेशकर, सुमन कल्याणपुर, आशा भोंसले जैसे प्रतिभावान गायक गायिकाओं के संगम ने फिल्म संगीत को मधुर और सर्वप्रिय बना दिया। धुनों में साज और आवाज के समुचित अनुपात उन्हें और भी अधिक मधुर बना देते थे और सार्थक शब्द संरचना सोने में सुहागा का काम करती थीं।
सन् 1950 से 1980 तक का समय फिल्म संगीत का स्वर्ण युग रहा। मेलॉडियस संगीत उस काल के फिल्मों की आत्मा बन गई। एक एक गीत को परदे पर देखने और सुनने के लिये लोग अनेक बार एक ही फिल्म को देखने जाते थे और अधिकतम फिल्में सिल्व्हर जुबली, गोल्डन जुबली तथा प्लेटिम जुबली मनाया करती थीं। सारे के सारे संगीतकार अपनी धुनों को सुमधुर सुरों से सजाने के लिये अथक परिश्रम किया करते थे। शैलेन्द्र, हसरत जयपुरी, साहिर लुधियानवी, मजरूह सुल्तानपुरी, राजेन्द्र कृष्ण आदि भी गीतों को सार्थक बनाने के लिये एड़ी चोटी का जोर लगा दिया करते थे। गायक गायिकाओं के कर्णप्रिय कंठस्वर उन दिनों के संगीत में चार चाँद लगा दिया करती थीं। कई बार तो फिल्में पिट जाती थीं पर उनका संगीत गूंजते रहता था। पारसमणि (गीत - उइ माँ, उइ माँ ये क्या हो गया........, सलामत रहो........), लुटेरा (गीत - किसी को पता ना चले बात का........), बादशाह (गीत - अभी कमसिन हो, नादां हो जानेजाना........) जैसी स्टंट फिल्मों के भी गीत आज तक लोकप्रिय हैं।
सभी संगीतकार अपनी मौलिकता बनाये रखना चाहते थे और सभी की अपनी अपनी स्टाइल थी। बर्मन दा अपनी धुनों में लोक संगीत का बहुत अच्छा समावेश कर लेते थे। आपको शायद पता हो कि सचिन देव बर्मन त्रिपुरा के राजपरिवार से सम्बंधित थे। बर्मन दा को वर्ल्ड म्युजिक कान्टेस्ट (world music contest) का जूरी होने का गौरव भी प्राप्त था। सलिल चौधरी भारतीय और पश्चिमी दोनों ही संगीत में पारंगत थे और दोनों का बहुत अच्छा समावेश किया करते थे। शंकर जयकिशन ज्यादातर एकॉर्डियन और बांसुरी के मेल से अपनी धुनों को सजाया करते थे। कल्याणजी आनंदजी क्लार्नेट का बहुत अच्छा इस्तेमाल करते थे। फिल्म नागिन में हेमंत कुमार के लिये बीन की धुन को कल्याणजी आनंदजी ने ही क्लार्नेट पर बजाया था। लक्ष्मीकांत प्यारेलाल ढोलक और बांसरी के प्रयोग से अपनी धुनों को मधुर बनाते थे। ओ.पी. नैयर ने संगीत की कोई शिक्षा ही नहीं प्राप्त की थी फिर भी इतनी मधुर धुनें बनाते थे कि लोग सुन कर झूम उठते थे।
सन् 1980 के बाद से मेलॉडी के स्थान पर डिस्को, पॉप इत्यादि पश्चिमी धुनों का प्रचलन बढ़ता गया। निरर्थक गीत लिखे जाने लगे और धुनों में वाद्ययंत्रों की बहुलता बढने लगी। गीतों की उम्र कम होने लगीं। ऐसा प्रतीत होता है कि अब तो शोर ही संगीत का पर्याय सा हो गया है।
चलते-चलते
"वो सुबह हमीं से आयेगी" या "वो सुबह कभी तो आयेगी"?
साहिर साहब ने एक गीत लिखा था "वो सुबह हमीं से आयेगी" किन्तु फिल्म "फिर सुबह होगी" में उन्होंने अपने उसी गीत को "वो सुबह कभी तो आयेगी" के रूप में बदल दिया था। प्रस्तुत हैं दोनों गीतः
वो सुबह हमीं से आयेगी
जब धरती करवट बदलेगी, जब क़ैद से क़ैदी छूटेंगे
जब पाप घरौंदे फूटेंगे, जब ज़ुल्म के बन्धन टूटेंगे
उस सुबह को हम ही लायेंगे, वो सुबह हमीं से आयेगी
वो सुबह हमीं से आयेगी
मनहूस समाजों ढांचों में, जब जुर्म न पाले जायेंगे
जब हाथ न काटे जायेंगे, जब सर न उछाले जायेंगे
जेलों के बिना जब दुनिया की, सरकार चलाई जायेगी
वो सुबह हमीं से आयेगी
संसार के सारे मेहनतकश, खेतो से, मिलों से निकलेंगे
बेघर, बेदर, बेबस इन्सां, तारीक बिलों से निकलेंगे
दुनिया अम्न और खुशहाली के, फूलों से सजाई जायेगी
वो सुबह हमीं से आयेगी
वहीं वे अपने उसी गीत को कैसे निराशावादी रूप दे देते हैः
वो सुबह कभी तो आयेगी
इन काली सदियों के सर से, जब रात का आंचल ढलकेगा
जब दुख के बादल पिघलेंगे, जब सुख का सागर छलकेगा
जब अम्बर झूम के नाचेगा, जब धरती नज़्में गायेगी
वो सुबह कभी तो आयेगी
जिस सुबह की खातिर जुग-जुग से, हम सब मर-मर कर जीते हैं
जिस सुबह के अमृत की धुन में, हम जहर के प्याले पीते हैं
इन भूखी प्यासी रूहों पर, इक दिन तो करम फर्मायेगी
वो सुबह कभी तो आयेगी
माना कि अभी तेरे मेरे, अर्मानों की कीमत कुछ भी नहीं
मिट्टी का भी है कुछ मोल मगर, इन्सानों की कीमत कुछ भी नहीं
इन्सानों की इज्जत जब झूठे, सिक्कों में न तोली जायेगी
वो सुबह कभी तो आयेगी
दौलत के लिये जब औरत की, इस्मत को न बेचा जायेगा
चाहत को न कुचला जायेगा, ग़ैरत को न बेचा जायेगा
अपनी काली करतूतों पर, जब ये दुनिया शर्मायेगी
वो सुबह कभी तो आयेगी
बीतेंगे कभी तो दिन आख़िर, ये भूख के और बेकारी के
टूटेंगे कभी तो बुत आख़िर, दौलत की इजारादारी के
जब एक अनोखी दुनिया की बुनियाद उठाई जायेगी
वो सुबह कभी तो आयेगी
मजबूर बुढ़ापा जब सूनी, राहों की धूल न फांकेगा
मासूम लड़कपन जब गंदी, गलियों भीख न मांगेगा
ह़क मांगने वालों को जिस दिन, सूली न दिखाई जायेगी
वो सुबह कभी तो आयेगी
फ़ाको की चिताओं पर जिस दिन, इन्सां न जलाये जायेंगे
सीनों के दहकते दोज़ख में, अर्मां न जलाये जायेंगे
ये नरक से भी गन्दी दुनिया, जब स्वर्ग बनाई जायेगी
वो सुबह कभी तो आयेगी
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