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Saturday, March 6, 2010

कौवा स्नान ... सर्वोत्तम स्नान ...

चाहे ठंड का मौसम हो या बरसात के दिन हों या फिर ग्रीष्म ऋतु ही क्यों न हो, कुछ लोग ऐसे होते हैं जिन्हें अपने शरीर से पानी के छू जाने से भी बहुत डर लगता है। ऐसे लोगों के लिये नहाना एक बहुत बड़े पराक्रम का कार्य होता है। लोटे में पानी भर कर सिर पर डालने के पहले बहुत देर तक हिम्मत जुटानी पड़ती है। ऐसे लोगों के लिये कौवा स्नान ही सर्वोत्तम स्नान है। कहा जाता है कि कौवा अपने चोंच को पानी में डुबाकर सोच लेता है कि उसने नहा लिया। इस कथन में कहाँ तक सच्चाई है यह तो पता नहीं पर इस प्रकार के स्नान को ही कौवा स्नान कहा जाता है।

पूजा-अर्चना के समय आखिर देवी देवताओं को भी एक फूल को पानी में डुबा कर फूल के उस पानी को देवी देवता की प्रतिमा पर छिड़कते हुए "स्नानं ध्यानं समर्पायामि" कहते हुए कौवा स्नान ही तो कराया जाता है। यह बात अलग है कि देवी-देवताओं के इस स्नान को कौवा स्नान न कह कर मन्त्र स्नान कह दिया जाता है। पर आप ही सोचिये क्या नाम बदल देने से काम भी बदल जाता है?

तो हम कह रहे थे कि मनुष्य के लिये भी यह कौवा स्नान ही सर्वोत्तम स्नान है। बस उँगली को पानी में डुबाकर निकालिये और उँगली में लगे पानी को "स्नानं ध्यानं समर्पयामि" कहते हुए अपने शरीर पर छिड़क लीजिये। बस हो गया नहाना।

कौवा स्नान के फायदेः

  • शरीर की गर्मी न निकल पाने की व्याकुलता में आप ठंडई और लस्सी जैसे पौष्टिक चीजों का सेवन अधिक करते हैं जिससे आपको पर्याप्त स्वास्थ्य-लाभ होता है।
  • शरीर पर मैल की परत जम जाने के कारण आप अधिक मोटे-ताजे याने कि हृष्ट-पुष्ट नजर आते हैं।
  • इत्र-सेंट आदि का अधिक से अधिक इस्तेमाल करने लगते हैं (भाई आखिर शरीर के दुर्गन्ध को तो किसी न किसी प्रकार से छिपाना भी तो जरूरी है ना!) और नवाब की संज्ञा पाते हैं।
  • मन्दिर आदि पवित्र किन्तु गैरजरूरी स्थानों में जाने की जहमत से बचे रहते हैं।
चलते-चलते

"यार, मैंने सुना है कि कई लोग महीनों तक बिना नहाये रह जाते हैं।"

"पता नहीं यार लोग कैसे महीनों तक बिना नहाये रह जाते हैं, यहाँ तो अठारह-बीस दिनों में ही खुजली छूटने लग जाती है।"