Saturday, August 21, 2010
रेल्वे के एक टिकट के साथ फ्लाइट का एक टिकट मुफ्त
आपको शायद पता हो कि यात्रा.कॉम का रेल्वे टिकट बुकिंग के लिए इण्डियन रेल्वे कैटरिंग एण्ड टूरिज्म कार्पोरेशन लिमिटेड IRCTC, जो कि आनलाइन रेल्वे टिकट बुकिंग के लिए भारत की सबसे बड़ी ईकामर्स साइट है, के साथ अनुबन्ध है और यात्रा.कॉम के माध्यम से आसानी के साथ घर बैठे ही रेल्वे टिकट बुकिंग कराया जा सकता है।
आनलाइन रेल्वे बुकिंग के अपने बिजनेस को प्रमोट करने के लिए यात्रा.कॉम ने सीमित समय के लिए एक स्कीम जारी किया है जिसके तहत प्रत्येक रेल्वे टिकट के आनलाइन बुकिंग के साथ एक डोमेस्टिक फ्लाइट टिकट बिल्कुल मुफ्त देने का आफर है।
आप भी इस आफर का लाभ उठा कर मुफ्त फ्लाइट टिकट प्राप्त कर सकते हैं! याद रखें कि यह आफर सिर्फ सीमित समय के लिए ही है।
Friday, August 20, 2010
ठगों के गिरोह - जो रेशमी रूमाल को अस्त्र बना कर बगैर रक्तपात किए हत्या कर दिया करते थे
आज ठगी का अर्थ किसी को बहला-फुसला कर या धोखा देकर लूट लेने से लगाया जाता है याने कि ठग का अर्थ वही समझा जाता है जो कि अंग्रेजी के शब्द 'चीट' (cheat) का होता है। किन्तु अठारहवीं शताब्दी में भारत में ठगों के गिरोह हुआ करते थे जो कि अपनी साहसिक, रोमांचकारी किन्तु हत्या के घृणित कृत्य किया करते थे। उन दिनों इन ठगो के गिरोहों का व्यापक जाल सम्पूर्ण भारत में कन्याकुमारी से कश्मीर तक फैला हुआ था। इन गिरोहों में पाँच-दस व्यक्तियों से लेकर सैकड़ों व्यक्ति तक हुआ करते थे जिनमें हिन्दू और मुसलमान दोनों ही शामिल रहते थे। स्त्रियाँ भी इन गिरोहों का सदस्य होती थीं। उस काल में आज की तरह रेल-मोटर जैसी सुविधाएँ न होने के कारण लोग काफिला बना कर रथों, बैलगाड़ियों, घोड़ों, ऊँटों आदि जानवरों पर सवार होकर तथा पैदल चल कर यात्रा किया करते थे। साथ के सामान को ढोने के लिए गधों और खच्चरों का इस्तेमाल किया जाता था। काफिले के लोगों की संख्या के अनुसार एक से अधिक ठगों के गिरोह मिलकर ठगी का धन्धा किया करते थे।
यद्यपि इन ठगों के गिरोहों में मुसलमान भी हुआ करते थे किन्तु इन ठगों की इष्ट काली देवी हुआ करती थी। सम्भवतः ठगी का आरम्भ तान्त्रिकों से हुआ था और इसीलिए उनका धर्म-विश्वास तान्त्रिक ढंग पर था। ठगों के पूजा-स्थल गोपनीय हुआ करते थे। ये ठग प्रायः बगैर रक्तपात किए हत्या किया करते थे। इनका हत्या करने का ढंग भी अपनी तरह का अनूठा था। इनका मुख्य अस्त्र एक रेशमी रूमाल हुआ करता था, जिसमें एक मंसूरी पैसा बंधा रहता था। अपने रेशमी रूमाल को वे इस सफाई के साथ अपने शिकार के गले में डालते थे कि वह पैसा शिकार के टेंटुए से कस जाता था और क्षण भर में ही बलवान से बलवान आदमी की ऐसी मृत्यु हो जाया करती थी कि वह 'चीं' तक न कर पाता था। शिकारों की संख्या चाहे सौ-दो सौ ही क्यों ना हो, संकेत होने पर एक ही क्षण में सभी के गले में फाँसी लग जाती थी।
ठगों के ये गिरोह सैनिक पद्धति पर संगठित हुआ करते थे तथा उनमें भिन्न-भिन्न पदाधिकारी भी होते थे। पदाधिकारियों के आधीन अलग-अलग दल होते थे जिनके विभिन्न प्रकार के काम नियत होते थे। 'सोथा' नामक दल के सदस्यों का कार्य होता था भद्रवेश में सम्पन्न लोगों की तरह यात्रा करना तथा मुसाफिरों को अपनी वाक्पटुता के जाल में फँसा कर उनसे हेल-मेल करके उनके काफिलों में शामिल हो जाना। 'सोथा' दल के किसी काफिले में शामिल हो जाने के बाद 'भटोट' नामक दल भी 'सोथा' की सहायता से उस काफिले में शामिल हो जाया करता था। 'भटोट' दल के सदस्यों का कार्य शिकार के गले में पैसे बंधे रेशमी रूमाल से फाँसी डालना। गिरोह के नए रंगरूटों के दल को 'कबूला' कहा जाता था और इनका काम मुर्दों को रफा-दफा करना हुआ करता था। शिकार को फाँसी लगाते समय उनकी सहायता के लिए तत्पर रहने वालों के दल को 'समासिया' कहा जाता था। 'लगाई' नाम के दल के लोगों का काम होता था फाँसी के लिए नियत स्थान के पास पहले से ही कब्रें खोद कर तैयार रखना। कहाँ पर कौन आकर काफिले में शामिल होगा और किस स्थान पर शिकारों को फाँसी दी जाएगी ये सारी बातें पूर्व से ही योजनाबद्ध हुआ करती थीं। फाँसी देने के लिए संकेत नियत रहता था, दल के सरदार के द्वारा संकेत देने को 'झिलूम देना' कहा जाता था। जहाँ पर शिकारों को फाँसी देना होता था उस स्थान पर डेरा डलवा दिया जाता था। फाँसी देने का समय नियत होता था और उस समय काफिले के प्रत्येक व्यक्ति के साथ एक-एक ठग हो जाया करते थे। ज्योंही सरदार "पान लाओ" जैसी कोई पूर्व-नियत बात कहकर झिलूम देता था, शिकारों के गले फाँसी से कस जाया करते थे।
इन ठगों के अनेक प्रकार के समुदाय हुआ करते थे। "मेघपूना" नामक ठगों का एक समुदाय केवल बच्चों के अपहरण का कार्य किया करता था। अवसर आने पर विभिन्न समुदाय एक साथ मिलकर काम किया करते थे। अपढ़ तथा गँवार लोगों के साथ पढ़े-लिखे व्यक्ति भी ठगों के इन गिरोहों में हुआ करते थे।
देखा जाए तो अठारहवीं शताब्दी का वह काल भारत के लिए सर्वत्र अराजकता का काल था। बादशाह का पतन हो चुका था और राजे और नवाब अपने राज्य को बढ़ाने के लिए एक दूसरे से युद्ध किया करते थे। पिण्डारी और रुहेले के दल सरे आम गाँवों और कस्बों को लूट लिया करते थे और ठग सैकड़ों तथा हजारों की तादाद में लोगों की हत्या कर दिया करते थे। राजाओ-नवाबों के आपसी युद्ध का फायदा अंग्रेजों ने खूब उठाया और भारत के अधिपति बन बैठे थे। ठगों के इन गिरोहों ने ये अंग्रेज शासकों के नाक में दम कर रखा था इसलिए अंग्रेजी शासन ने ठगों के गिरोहों के उन्मूलन को अपना प्रथम लक्ष्य बना लिया था और कर्नल स्लीमेन (colonel slimane) की अध्यक्षता में बने ठग उन्मूलन कमीशन ने चुन-चुन कर ठगों का सफाया कर डाला।
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सूचनाः
यात्रा एवं पर्यटन से सम्बन्धित जानकारी देने के उद्देश्य से मैंने "यात्रा एवं पर्यटन" नामक एक नया ब्लोग बनाया है और आशा करता हूँ वह आप सभी को पसंद आयेगा।
देखें "यात्रा एवं पर्यटन" का पहला पोस्ट - मांडू (माण्डवगढ़)
यद्यपि इन ठगों के गिरोहों में मुसलमान भी हुआ करते थे किन्तु इन ठगों की इष्ट काली देवी हुआ करती थी। सम्भवतः ठगी का आरम्भ तान्त्रिकों से हुआ था और इसीलिए उनका धर्म-विश्वास तान्त्रिक ढंग पर था। ठगों के पूजा-स्थल गोपनीय हुआ करते थे। ये ठग प्रायः बगैर रक्तपात किए हत्या किया करते थे। इनका हत्या करने का ढंग भी अपनी तरह का अनूठा था। इनका मुख्य अस्त्र एक रेशमी रूमाल हुआ करता था, जिसमें एक मंसूरी पैसा बंधा रहता था। अपने रेशमी रूमाल को वे इस सफाई के साथ अपने शिकार के गले में डालते थे कि वह पैसा शिकार के टेंटुए से कस जाता था और क्षण भर में ही बलवान से बलवान आदमी की ऐसी मृत्यु हो जाया करती थी कि वह 'चीं' तक न कर पाता था। शिकारों की संख्या चाहे सौ-दो सौ ही क्यों ना हो, संकेत होने पर एक ही क्षण में सभी के गले में फाँसी लग जाती थी।
ठगों के ये गिरोह सैनिक पद्धति पर संगठित हुआ करते थे तथा उनमें भिन्न-भिन्न पदाधिकारी भी होते थे। पदाधिकारियों के आधीन अलग-अलग दल होते थे जिनके विभिन्न प्रकार के काम नियत होते थे। 'सोथा' नामक दल के सदस्यों का कार्य होता था भद्रवेश में सम्पन्न लोगों की तरह यात्रा करना तथा मुसाफिरों को अपनी वाक्पटुता के जाल में फँसा कर उनसे हेल-मेल करके उनके काफिलों में शामिल हो जाना। 'सोथा' दल के किसी काफिले में शामिल हो जाने के बाद 'भटोट' नामक दल भी 'सोथा' की सहायता से उस काफिले में शामिल हो जाया करता था। 'भटोट' दल के सदस्यों का कार्य शिकार के गले में पैसे बंधे रेशमी रूमाल से फाँसी डालना। गिरोह के नए रंगरूटों के दल को 'कबूला' कहा जाता था और इनका काम मुर्दों को रफा-दफा करना हुआ करता था। शिकार को फाँसी लगाते समय उनकी सहायता के लिए तत्पर रहने वालों के दल को 'समासिया' कहा जाता था। 'लगाई' नाम के दल के लोगों का काम होता था फाँसी के लिए नियत स्थान के पास पहले से ही कब्रें खोद कर तैयार रखना। कहाँ पर कौन आकर काफिले में शामिल होगा और किस स्थान पर शिकारों को फाँसी दी जाएगी ये सारी बातें पूर्व से ही योजनाबद्ध हुआ करती थीं। फाँसी देने के लिए संकेत नियत रहता था, दल के सरदार के द्वारा संकेत देने को 'झिलूम देना' कहा जाता था। जहाँ पर शिकारों को फाँसी देना होता था उस स्थान पर डेरा डलवा दिया जाता था। फाँसी देने का समय नियत होता था और उस समय काफिले के प्रत्येक व्यक्ति के साथ एक-एक ठग हो जाया करते थे। ज्योंही सरदार "पान लाओ" जैसी कोई पूर्व-नियत बात कहकर झिलूम देता था, शिकारों के गले फाँसी से कस जाया करते थे।
इन ठगों के अनेक प्रकार के समुदाय हुआ करते थे। "मेघपूना" नामक ठगों का एक समुदाय केवल बच्चों के अपहरण का कार्य किया करता था। अवसर आने पर विभिन्न समुदाय एक साथ मिलकर काम किया करते थे। अपढ़ तथा गँवार लोगों के साथ पढ़े-लिखे व्यक्ति भी ठगों के इन गिरोहों में हुआ करते थे।
देखा जाए तो अठारहवीं शताब्दी का वह काल भारत के लिए सर्वत्र अराजकता का काल था। बादशाह का पतन हो चुका था और राजे और नवाब अपने राज्य को बढ़ाने के लिए एक दूसरे से युद्ध किया करते थे। पिण्डारी और रुहेले के दल सरे आम गाँवों और कस्बों को लूट लिया करते थे और ठग सैकड़ों तथा हजारों की तादाद में लोगों की हत्या कर दिया करते थे। राजाओ-नवाबों के आपसी युद्ध का फायदा अंग्रेजों ने खूब उठाया और भारत के अधिपति बन बैठे थे। ठगों के इन गिरोहों ने ये अंग्रेज शासकों के नाक में दम कर रखा था इसलिए अंग्रेजी शासन ने ठगों के गिरोहों के उन्मूलन को अपना प्रथम लक्ष्य बना लिया था और कर्नल स्लीमेन (colonel slimane) की अध्यक्षता में बने ठग उन्मूलन कमीशन ने चुन-चुन कर ठगों का सफाया कर डाला।
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सूचनाः
यात्रा एवं पर्यटन से सम्बन्धित जानकारी देने के उद्देश्य से मैंने "यात्रा एवं पर्यटन" नामक एक नया ब्लोग बनाया है और आशा करता हूँ वह आप सभी को पसंद आयेगा।
देखें "यात्रा एवं पर्यटन" का पहला पोस्ट - मांडू (माण्डवगढ़)
Thursday, August 19, 2010
अपना अलेक्सा रैंक देखा तो पता चला की हमारा ब्लोग 31 जुलाई 2000 से आनलाइन है
हम ब्लोग की दुनिया में कब, क्यों और कैसे आए यह बिल्कुल भूल चुके हैं। आज एकाएक विचार आया कि अपने ब्लोग का अलैक्सा रैंक देख लिया जाए। देखा तो पाया कि अलैक्सा में हमारे ब्लोग का विश्व रैंक 408,205 और भारत रैंक 39,420 है। हमारे लिए यह एक संतुष्टि की बात थी किन्तु अधिक प्रसन्नता यह देखकर हुई कि हमारा ब्लोग हमारा ब्लोग 31 जुलाई 2000 से आनलाइन है; हम तो भूल ही चुके थे कि हमने अपना ब्लोग कब बनाया था।
यदि आप अपने ब्लोग का अलैक्सा रैंक देखना चाहें तो http://www.alexa.com/ में जाकर देख सकते हैं।
अपना अलैक्सा रैंक देख लेने के बाद उत्सुकता हुई कि जाने माने ब्लोग्स के भी अलैक्सा रैंक देखा जाए, जिसका परिणाम यह प्राप्त हुआः
याने कि अलेक्सा रैकिंग के अनुसार उपरोक्त ब्लोग्स का क्रम हुआः
हम ब्लोग की दुनिया में कब, क्यों और कैसे आए यह बिल्कुल भूल चुके हैं। आज एकाएक विचार आया कि अपने ब्लोग का अलैक्सा रैंक देख लिया जाए। देखा तो पाया कि अलैक्सा में हमारे ब्लोग का विश्व रैंक 408,205 और भारत रैंक 39,420 है। हमारे लिए यह एक संतुष्टि की बात थी किन्तु अधिक प्रसन्नता यह देखकर हुई कि हमारा ब्लोग हमारा ब्लोग 31 जुलाई 2000 से आनलाइन है; हम तो भूल ही चुके थे कि हमने अपना ब्लोग कब बनाया था।
यदि आप अपने ब्लोग का अलैक्सा रैंक देखना चाहें तो http://www.alexa.com/ में जाकर देख सकते हैं।
अपना अलैक्सा रैंक देख लेने के बाद उत्सुकता हुई कि जाने माने ब्लोग्स के भी अलैक्सा रैंक देखा जाए, जिसका परिणाम यह प्राप्त हुआः
| ब्लोग | चिट्ठा जगत सक्रियता | अलैक्सा विश्व रैंकिंग | अलैक्सा भारत रैंकिंग |
| ताऊ डॉट इन | 1 | 357,766 | 38,787 |
| उडन तश्तरी | 2 | 493,355 | 51,392 |
| मानसिक हलचल | 3 | 561,648 | 67,046 |
| लोक संघर्ष | 4 | 1,672,515 | 257,948 |
| हिन्दी युग्म | 5 | 213,304 | 16,611 |
| ज्ञान दर्पण | 6 | 173,987 | 14,569 |
| हिन्दी ब्लाग टिप्स | 7 | 448,902 | 56,969 |
| फ़ुरसतिया | 8 | 770,580 | 99,378 |
| छींटे और बौछारें | 9 | 512,893 | 56,374 |
| ललित डॉट कॉम | 10 | 358,751 | 29,459 |
याने कि अलेक्सा रैकिंग के अनुसार उपरोक्त ब्लोग्स का क्रम हुआः
| क्रमांक | ब्लोग | विश्व रैंकिग | इंडिया रैंकिग |
| 1. | ज्ञान दर्पण | 173,987 | 14,569 |
| 2. | हिंदी युग्म | 213,304 | 16,611 |
| 3. | ताऊ डॉट इन | 357,766 | 38,787 |
| 4. | ललित डॉट कॉम | 358,751 | 29,459 |
| 5. | उड़न तश्तरी | 493,355 | 51,392 |
| 6. | हिन्दी ब्लाग टिप्स | 448,902 | 56,969 |
| 7. | छींटे बौछारें | 512,893 | 56,374 |
| 8. | मानसिक हलचल | 561,648 | 67,046 |
| 9. | फ़ुरसतिया | 770,580 | 99,378 |
| 10. | लोक संघर्ष | 1,672,515 | 257,948 |
तुलसी का पुनः भारत आगमन
(स्व. श्री हरिप्रसाद अवधिया रचित कविता)
भक्ति के प्रभाव से निष्कपट मुक्ति भाव से
संत तुकाराम सदेह स्वर्ग को सिधारे
किन्तु तुलसीदास समय के अन्तराल को
पार कर सदेह ही भारत में पुनः पधारे
सम्वत् सोलह सौ अस्सी बाद सन (उन्नीस सौ) पच्यासी में
धर्म दशा देखने पहुँचे दिल्ली द्वारे
जनता के मन में 'मानस' के प्रति कुछ रहे न रहे
गूँज रहे थे धर्म निरपेक्षता के नारे।
फिर तुलसीदास ने काशी में जा कर देखा
तो अपनी धर्म नगरी को ज्यों का त्यों पाया
लेकिन रह गये दंग रंग देख पण्डों का
फैली थी सब तरफ भंग दण्ड की माया
और प्रयागराज के भरद्वाज आश्रम में
रामायण के बदले 'सत्यकथा' को पाया
भक्ति प्रदर्शित करती थीं महिलाएँ सब
परम पवित्र थी उनकी कंचन काया।
अपने ही कलियुग वर्णन को तुलसी ने
यत्र-तत्र-सर्वत्र साकार रूप में देखा
भारत में धोती-साड़ी गायब थी जनता की
लगा न सके वे पेंट-कोट ब्लाउज का लेखा
सोचा तुलसी ने अंग्रेजी में मानस लिख दूँ
जिसमें कहीं भी न पाई जावे लक्ष्मण रेखा
काम हमारा यह होगा भारत के हित में
गड़ रहा जहाँ नित कान्वेण्ट का मेखा।
अपनी इस भारत यात्रा में तुलसी जी ने
देखे अनगिनती डिप्लोमेटिक रावण
हर घर में थी अशोक वाटिका सुशोभित
थिरक रहा था दहेज दैत्य का नर्तन
'मोहि कपट छल छिद्र न माया' कह कर
लाद दिया था मानव पर रूखा बन्धन
इसीलिये गायब थे तुलसी के राम यहाँ
पनप रहा था प्रवंचना का काला धन
सन्तों को बने असन्त देखा दास तुलसी ने
गाते अपनी डफली पर अपना राग
आतंक, त्रास, उग्रता, पशुता और नीचता,
जगा चुके थे सभी अपना अपना भाग
पुण्य भूमि में सन्तों को भी दुष्टों ने ललकारा
विचरण करते तुलसी ने देखे अनेकों नाग
अपने ही वर्णित कलियुग वर्णन को साकार देख
तुलसीदास चले गये भारत को त्याग।
(रचना तिथिः 22-08-1985)
भक्ति के प्रभाव से निष्कपट मुक्ति भाव से
संत तुकाराम सदेह स्वर्ग को सिधारे
किन्तु तुलसीदास समय के अन्तराल को
पार कर सदेह ही भारत में पुनः पधारे
सम्वत् सोलह सौ अस्सी बाद सन (उन्नीस सौ) पच्यासी में
धर्म दशा देखने पहुँचे दिल्ली द्वारे
जनता के मन में 'मानस' के प्रति कुछ रहे न रहे
गूँज रहे थे धर्म निरपेक्षता के नारे।
फिर तुलसीदास ने काशी में जा कर देखा
तो अपनी धर्म नगरी को ज्यों का त्यों पाया
लेकिन रह गये दंग रंग देख पण्डों का
फैली थी सब तरफ भंग दण्ड की माया
और प्रयागराज के भरद्वाज आश्रम में
रामायण के बदले 'सत्यकथा' को पाया
भक्ति प्रदर्शित करती थीं महिलाएँ सब
परम पवित्र थी उनकी कंचन काया।
अपने ही कलियुग वर्णन को तुलसी ने
यत्र-तत्र-सर्वत्र साकार रूप में देखा
भारत में धोती-साड़ी गायब थी जनता की
लगा न सके वे पेंट-कोट ब्लाउज का लेखा
सोचा तुलसी ने अंग्रेजी में मानस लिख दूँ
जिसमें कहीं भी न पाई जावे लक्ष्मण रेखा
काम हमारा यह होगा भारत के हित में
गड़ रहा जहाँ नित कान्वेण्ट का मेखा।
अपनी इस भारत यात्रा में तुलसी जी ने
देखे अनगिनती डिप्लोमेटिक रावण
हर घर में थी अशोक वाटिका सुशोभित
थिरक रहा था दहेज दैत्य का नर्तन
'मोहि कपट छल छिद्र न माया' कह कर
लाद दिया था मानव पर रूखा बन्धन
इसीलिये गायब थे तुलसी के राम यहाँ
पनप रहा था प्रवंचना का काला धन
सन्तों को बने असन्त देखा दास तुलसी ने
गाते अपनी डफली पर अपना राग
आतंक, त्रास, उग्रता, पशुता और नीचता,
जगा चुके थे सभी अपना अपना भाग
पुण्य भूमि में सन्तों को भी दुष्टों ने ललकारा
विचरण करते तुलसी ने देखे अनेकों नाग
अपने ही वर्णित कलियुग वर्णन को साकार देख
तुलसीदास चले गये भारत को त्याग।
(रचना तिथिः 22-08-1985)
Tuesday, August 17, 2010
अमूमन हम सभी झूठ बोलते हैं।
हमारे मोबाइल की घंटी बजी। अरे यह तो गुप्ता जी की काल है। तीन माह पहले हमने तीन दिनों के भीतर वापस करने का वादा करके जो उनसे पाँच सौ रुपये उधार लिए थे, जरूर उसी के लिये फोन किया होगा। हमने लड़के को मोबाइल देते हुए उससे कहा, "बेटे, गुप्ता अंकल को कह दो कि पापा घर में नहीं हैं।"
जी हाँ, अमूमन हम सभी झूठ बोलते हैं। कोई कर्ज के तगादे से बचने के लिए झूठ बोलता है, कोई अपने बॉस या अधिकारी से अपनी गलती छिपाने के लिए झूठ बोलता है तो कोई महबूबा की नजरों में चढ़ने के लिए झूठ बोलता है। फिल्म "जॉनी मेरा नाम" का एक संवाद याद आ रहा है जिसमें देवानंद ने ऐसा ही एक झूठ बोला थाः
"..... लेकिन जब दरवाजा खुला तो मैं दंग रह गया। दो हसीन आँखें मुझे देख रही थीं और दिल धड़क-धड़क कर कह रहा था कि जॉनी बेटे तरी मंजिल यही पर है, लेकिन याद रख कि अगर इन्हे मालूम हो गया कि तू चोर है, उचक्का है, छोटी छोटी चोरयों के इल्जाम में जेल जा चुका है और हाल ही में जेल तोड़कर आया है तो इन आँखों मे तेरे लिए सिवाय नफरत के कुछ भी ना होगा .... बस फिर क्या था बात बात में मुँह से झूठ निकलने लगा..."
कभी परिस्थितियाँ हमें विवश करती हैं झूठ बोलने के लिये तो कभी हमारे ही बनाये नियम-कायदे हम से झूठ बोलवाते हैं।
हमारे जीवन में ऐसी अनेकों परिस्थितियाँ आती हैं कि झूठ बोलना हमारे लिये मज़बूरी हो जाती है। अब जरा सोचिये कि आप अपनी प्रेमिका (यदि आप महिला हैं तो प्रेमी समझ लें) से छुप कर मिलने जा रहे हैं। इस बीच रास्ते में यदि कोई परिचित मिल जाये और पूछे कि कहाँ जा रहे हो तो क्या करेंगे आप? झूठ ही तो बोलेंगे न?
नियम-कानून का तो कहना ही क्या। ये तो हमसे सबसे ज्यादा झूठ बोलवाते हैं। छुट्टी के लिये आवेदन पत्र में आप कारण 'परिवार के साथ सिनेमा जाना है' तो नहीं लिख सकते न? 'तबियत खराब है' जैसा कोई झूठा कारण ही लिखना पड़ेगा। हम एक ऐसे सज्जन को जानते हैं जिन्होंने छुट्टियाँ लेने के लिये अपने ससुराल पक्ष के अनेकों रिश्तेदारों को मार डाला है। जबकि जानने वाले जानते हैं कि अभी तक उनकी शादी ही नहीं हुई है। पता नहीं जब उनकी शादी होगी तो फिर क्या झूठ बोलकर छुट्टी लेंगे?
कुछ लोगों को दूसरों की परेशानी देख कर मजा आता है। ऐसे लोग दूसरों से इसलिये झूठ बोल देते हैं ताकि वे परेशान हो जायें और उनकी परेशानी का आनन्द उठाया जा सके।
हमारे परिचितों में एक सज्जन तो ऐसे हैं जो सिर्फ झूठ ही बोलते हैं। लगता है कि कभी भूल से वे सच बोल देंगे तो उनका खाना ही हजम नहीं होगा या फिर डॉक्टर ने उन्हें सच बोलने से मना किया हुआ है।
इस झूठ ने तो धर्मराज युधिष्ठिर को भी नहीं छोड़ा था। उन्हें 'अश्वत्थामा हतो' कहना ही पड़ा था। यह बात अलग है कि बाद में 'नरो वा कुंजरो' कह कर उन्होंने अपने झूठ की लीपा-पोती कर दी थी।
झूठ का एक और रूप भी होता है - बात को इस प्रकार से गोल-गोल कहना कि उसका स्पष्ट अर्थ ही न निकले। झूठ के इस रूप का प्रयोग व्यापक तौर से होता है। और भला क्यों न हो। जब देवर्षि नारद जी ने विश्वमोहिनी से ब्याह करने की कामना से भगवान विष्णु से उनका रूप माँगा था तो विष्णु जी ने भी तो झूठ के इसी रूप का प्रयोग किया था -
"कुपथ माग रुज ब्याकुल रोगी। बैद न देइ सुनहु मुनि जोगी॥
एहि बिधि हित तुम्हार मैं ठयऊ। कहि अस अंतरहित प्रभु भयऊ॥"
उपरोक्त सभी झूठों के अलावा एक झूठ और भी होता है - वह है किसी के कल्याण के लिये झूठ बोलना और इस प्रकार के झूठ को पावन झूठ की संज्ञा दी जा सकती है।
जी हाँ, अमूमन हम सभी झूठ बोलते हैं। कोई कर्ज के तगादे से बचने के लिए झूठ बोलता है, कोई अपने बॉस या अधिकारी से अपनी गलती छिपाने के लिए झूठ बोलता है तो कोई महबूबा की नजरों में चढ़ने के लिए झूठ बोलता है। फिल्म "जॉनी मेरा नाम" का एक संवाद याद आ रहा है जिसमें देवानंद ने ऐसा ही एक झूठ बोला थाः
"..... लेकिन जब दरवाजा खुला तो मैं दंग रह गया। दो हसीन आँखें मुझे देख रही थीं और दिल धड़क-धड़क कर कह रहा था कि जॉनी बेटे तरी मंजिल यही पर है, लेकिन याद रख कि अगर इन्हे मालूम हो गया कि तू चोर है, उचक्का है, छोटी छोटी चोरयों के इल्जाम में जेल जा चुका है और हाल ही में जेल तोड़कर आया है तो इन आँखों मे तेरे लिए सिवाय नफरत के कुछ भी ना होगा .... बस फिर क्या था बात बात में मुँह से झूठ निकलने लगा..."
कभी परिस्थितियाँ हमें विवश करती हैं झूठ बोलने के लिये तो कभी हमारे ही बनाये नियम-कायदे हम से झूठ बोलवाते हैं।
हमारे जीवन में ऐसी अनेकों परिस्थितियाँ आती हैं कि झूठ बोलना हमारे लिये मज़बूरी हो जाती है। अब जरा सोचिये कि आप अपनी प्रेमिका (यदि आप महिला हैं तो प्रेमी समझ लें) से छुप कर मिलने जा रहे हैं। इस बीच रास्ते में यदि कोई परिचित मिल जाये और पूछे कि कहाँ जा रहे हो तो क्या करेंगे आप? झूठ ही तो बोलेंगे न?
नियम-कानून का तो कहना ही क्या। ये तो हमसे सबसे ज्यादा झूठ बोलवाते हैं। छुट्टी के लिये आवेदन पत्र में आप कारण 'परिवार के साथ सिनेमा जाना है' तो नहीं लिख सकते न? 'तबियत खराब है' जैसा कोई झूठा कारण ही लिखना पड़ेगा। हम एक ऐसे सज्जन को जानते हैं जिन्होंने छुट्टियाँ लेने के लिये अपने ससुराल पक्ष के अनेकों रिश्तेदारों को मार डाला है। जबकि जानने वाले जानते हैं कि अभी तक उनकी शादी ही नहीं हुई है। पता नहीं जब उनकी शादी होगी तो फिर क्या झूठ बोलकर छुट्टी लेंगे?
कुछ लोगों को दूसरों की परेशानी देख कर मजा आता है। ऐसे लोग दूसरों से इसलिये झूठ बोल देते हैं ताकि वे परेशान हो जायें और उनकी परेशानी का आनन्द उठाया जा सके।
हमारे परिचितों में एक सज्जन तो ऐसे हैं जो सिर्फ झूठ ही बोलते हैं। लगता है कि कभी भूल से वे सच बोल देंगे तो उनका खाना ही हजम नहीं होगा या फिर डॉक्टर ने उन्हें सच बोलने से मना किया हुआ है।
इस झूठ ने तो धर्मराज युधिष्ठिर को भी नहीं छोड़ा था। उन्हें 'अश्वत्थामा हतो' कहना ही पड़ा था। यह बात अलग है कि बाद में 'नरो वा कुंजरो' कह कर उन्होंने अपने झूठ की लीपा-पोती कर दी थी।
झूठ का एक और रूप भी होता है - बात को इस प्रकार से गोल-गोल कहना कि उसका स्पष्ट अर्थ ही न निकले। झूठ के इस रूप का प्रयोग व्यापक तौर से होता है। और भला क्यों न हो। जब देवर्षि नारद जी ने विश्वमोहिनी से ब्याह करने की कामना से भगवान विष्णु से उनका रूप माँगा था तो विष्णु जी ने भी तो झूठ के इसी रूप का प्रयोग किया था -
"कुपथ माग रुज ब्याकुल रोगी। बैद न देइ सुनहु मुनि जोगी॥
एहि बिधि हित तुम्हार मैं ठयऊ। कहि अस अंतरहित प्रभु भयऊ॥"
उपरोक्त सभी झूठों के अलावा एक झूठ और भी होता है - वह है किसी के कल्याण के लिये झूठ बोलना और इस प्रकार के झूठ को पावन झूठ की संज्ञा दी जा सकती है।
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