जिस प्रकार से टीवी चैनल्स वाले सीरियल्स बनाते समय इस बात का पूरा-पूरा ध्यान रखते हैं कि उनके दर्शक क्या देखना चाहते हैं, उसी प्रकार से एक ब्लोगर को भी इस बात का ध्यान रखना, कि उसके पाठक क्या पढ़ना चाहते हैं, निहायत ही जरूरी है। वास्तव में आपकी लिखी सामग्री (content) ही पाठकों को खींच कर आपके ब्लॉग में लाती है। अंग्रेजी में तो कहा जाता हैः
'Content is king.'
अर्थात्, यदि हिन्दी में कहें तो, "सामग्री ही साम्राज्ञी है।"
किन्तु हममें से अधिकांश हिन्दी ब्लोगर वह लिखते हैं जो उन्हें पसंद है, किन्तु यह जरूरी नहीं है कि एक व्यक्ति की पसंद सभी लोगों को भी पसंद आए। कई बार तो हम यह सोच कर भी लिख देते हैं कि कुछ न कुछ तो लिखना है। अब आप ही बताइए कि इस प्रकार के उद्देश्यहीन लेखन को क्या पाठक पसंद कर सकता है? फिर ऐसे लेखन का क्या फायदा जिसे कि कोई पढ़े ही नहीं। यह तो वही बात हुई कि जंगल में मोर नाचा किसी ना देखा।
तो आइए जानने की कोशिश करें कि पाठक क्या चाहता है?
वास्तव में पाठक सन्तुष्टि चाहता है। वह चाहता है कि उसे घिसी पिटी चीज पढ़ने को न मिले। उसने जो कुछ भी पढ़ा है उससे उसे कुछ नई जानकारी मिली है, उसके ज्ञान में कुछ वृद्धि हुई है। यदि पाठक ऐसे लेख को पढ़ता है जिसे पढ़कर उसे कुछ भी प्राप्त नहीं होता तो उसे क्षोभ होता है और जिस ब्लॉग में उसे ऐसी सामग्री पढ़ने को मिली है उस ब्लॉग से वह कन्नी काट लेता है। इसके विपरीत यदि उसे किसी ब्लॉग की सामग्री को पढ़कर कुछ नयापन मिले, उसे सन्तुष्टि हो तो वह उस ब्लॉग का चाहने वाला बन जाता है। याद रखिए कि पाठक को उसके पसंद की सामग्री मिलेगी तो वह उसे अवश्य ही पढ़ेगा।
एक बात यह भी है कि पाठक हमेशा नई-नई जानकारी चाहता है और ऐसे में एक बहुत बड़ा प्रश्न उठता है कि आखिर रोज रोज आखिर नई जानकारी लायें कहाँ से?
यह यक्षप्रश्न है कि आखिर रोज हम अपनी सामग्री में कहाँ से नयापन लायें? सच्चाई भी यही है कि हम हमेशा नई जानकारी नहीं प्राप्त कर सकते। पर हाँ किसी पुरानी जानकारी को ऐसी शैली में प्रस्तुत कर सकते हैं कि उसमें नयापन झलकने लगे। प्रायः सभी सफल लेखक यही करते हैं और इस प्रकार के प्रस्तुतीकरण को पाठक भी पसंद करते हैं।
कभी कभी ऐसा भी हो जाता है कि हम पाठकों को ऐसी सामग्री देना चाहते हैं जिनके विषय में हम जानते हैं कि यह उनके लिये हितकारी है किन्तु उनकी रुचि के अनुरूप नहीं है। ऐसी स्थिति में आप अपने लेख को इस चतुराई से (tactfully) लिखें कि पाठक को वह सुरुचिपूर्ण लगे। मतलब यह कि कड़वी दवा के ऊपर शक्कर की परत।
किन्तु इस बात का भी विशेष ध्यान रखना है अच्छी बातों की अपेक्षा बुरी बातें लोगों को अधिक आकर्षित करती हैं और इसी कारण से अश्लीलता और फूहड़ता अधिकांश पाठकों को आसानी के साथ आकर्षित कर लेती हैं। लोगों की इसी मनोवृति का फायदा उठाते हुए आज के अधिकांश टीवी चैनल्स अपने दर्शकों को, "जोई रोगी भावै सोई बैद बतावै" के तर्ज पर, धड़ल्ले के साथ अश्लीलता और फूहड़ता परस रहे हैं। उन्हें इस बात से कुछ भी सरोकार नहीं है कि ऐसा करने से समाज और देश का कितना अहित हो रहा है, उन्हें तो सिर्फ अपने टीआरपी बढ़ा कर अधिक से अधिक विज्ञापन बटोरने का ही ध्यान रहता है। पर हमें ऐसा कतइ नहीं करना है। हमें तो ऐसे पोस्ट लिखना है जो लोगों में जागरूकता पैदा करे और समाज तथा देश का हित करे।
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Thursday, April 28, 2011
Thursday, August 26, 2010
मैं एक हिन्दी ब्लोगर - अपंग, असहाय और निर्धन
मै एक हिन्दी ब्लोगर हूँ। 03-09-2007 को अपना हिन्दी ब्लोग बनाकर मैंने अपना पहला पोस्ट लिखा था और तब से आज तक मात्र कुछ माह को छोड़कर अपने ब्लोग में प्रायः रोज ही एक पोस्ट लिखते चला आ रहा हूँ।
क्यों लिखता हूँ मैं? क्या उद्देश्य है पोस्ट लिखने के पीछे मेरा?
आज जब ऐसे सवाल मेरे मन में उठते हैं तो याद आता है कि जब मैंने अपना हिन्दी ब्लोग बनाया था तो उस समय मेरे पास बहुत सारे उद्देश्य थे। मसलन अपने पोस्ट के माध्यम से अच्छी अच्छी जानकारी देना विशेषतः भारतीय संस्कृति और सभ्यता के विषय में, नेट में हिन्दी को बढ़ावा देकर हिन्दी की सेवा करना और साथ ही साथ हिन्दी ब्लोगिंग से कुछ कमाई कर के स्वयं भी लाभ लेना। पर आज सोचता हूँ तो लगता है कि ऐसा कुछ भी तो नहीं कर पाया मैं। मुझे पता ही नहीं चला कि कब मेरे उद्देश्य बदल कर ढेर सारी टिप्पणियाँ पाना और संकलकों के हॉटलिस्ट में ऊपर ही ऊपर चढ़ते जाना बन गए। आज मैं टिप्पणियों के पैबन्द और संकलकों की बैसाखी पाकर अत्यन्त ही सन्तुष्ट जीव बन गया हूँ।
मैं जानता हूँ कि नेट में आने वाले करोड़ों हिन्दीभाषियों में से मुझे शायद ही कोई पढ़ता है पर क्यों ना बनूँ मैं सन्तुष्ट जीव? आखिर कुछ ऐसे लोग भी तो हैं जो मुझे पढ़ते हैं या फिर पढ़ने का दिखावा ही कर लेते हैं। क्या यह कम है मेरे लिए? आज तक मैंने जो कुछ भी लिखा है यदि मैंने उसे स्तर के पत्र-पत्रिकाओं में छपने भेजा होता तो अवश्य ही मेरी वे सब रचनाएँ वहाँ की कचरा पेटी की शोभा बढ़ाती होतीं और कहाँ मिलते मुझे पढ़ने वाले? तो क्यों ना बनूँ मैं सन्तुष्ट जीव?
मुझे सन्तुष्ट रहना है इसलिए यही सोचा करता हूँ कि हिन्दी में बहुत सारे महान साहित्यकार हुए हैं पर क्या किसी की भी रचना कभी 'बेस्टसेलर' बनी है? क्या किसी ने 'मैक्सिम गोर्की' के "द मदर", 'चार्ल्स डिकन्स' के "अ टेल ऑफ टू सिटीज़" आदि जैसी पुस्तकें हिन्दी में लिखी हैं जिनके पाठक संसार भर में हैं? संसार की बात छोड़ें, अपने ही देश में ही 'जयशंकर प्रसाद' की "कामायनी", 'मैथिलीशरण गुप्त' जी के "साकेत" जैसी रचनाओं को कितने लोग पढ़ते हैं? घर में "रामचरित मानस" रहने पर भी किसने उसे पूरा पढ़ा है? तो फिर यदि मेरे लिखे को कोई पढ़ने वाला नहीं है तो इससे क्या फर्क पड़ जाता है? क्यों ना रहूँ मैं सन्तुष्ट? मुझे टिप्पणियाँ मिलती हैं, संकलकों के हॉटलिस्ट में मेरा पोस्ट ऊपर चढ़ता है यह क्या कम है मेरे लिए?
और लोग क्यों टिप्पणियाँ करते हैं यह तो मैं नहीं कह सकता पर मैं हर रोज हिन्दी के सैंकड़ों नहीं तो कम से कम पचास-साठ पोस्टों में जाकर इसलिए टिप्पणियाँ किया करता हूँ कि मुझे भी कम से कम पन्द्रह-बीस टिप्पणियाँ मिल जाए। "आप हर मरतबा एक बकवाइस लिखकर पाटक का टाइम खोटी करती है। बकवाइस बंद किरिए। ऐहसान होगी." जैसी टिप्पणियाँ पाकर भी मैं खुश होता हूँ! ऐसी टिप्पणियों को न मिटा कर मैं हिन्दी भाषा पर और खुद पर भी उपकार करता हूँ। इसे मिटा दूँगा तो हिन्दी में की गई एक टिप्पणी कम हो जाएगी और टिप्पणियाँ कम होने से नेट में हिन्दी का वर्चस्व कैसे बढ़ेगा? इसे मिटा दूँगा तो हॉटलिस्ट में मेरा पोस्ट नीचे उतर आएगा; और सबसे बड़ी बात तो यह है कि इसे मिटा दूँगा तो मुझ पर अपनी आलोचना न सह पाने का इल्जाम भी लग जाएगा। तो आखिर क्यों मिटाऊँ मैं इसे? आखिर ये टिप्पणियाँ ही तो हैं जो मुझे गुदगुदाती हैं और मेरे पोस्ट को संकलकों के हॉटलिस्ट में ऊपर चढ़ा कर मुझे संतुष्टि प्रदान करती हैं।
मैं अपंग हूँ क्योंकि मैं अपने दम पर आगे नहीं बढ़ सकता। पर क्या हुआ? संकलकों की बैसाखी तो है मेरे पास! मैं निर्धन हूँ क्योंकि मेरे पास ऐसी लेखन क्षमता का धन नहीं है जो हजारों-लाखों की संख्या में पाठक जुटा सके। पर क्या हुआ? टिप्पणी देने वाले तो हैं मेरे पास! मैं असहाय हूँ क्योंकि मैं चाहकर भी अपनी इस स्थिति से उबर नहीं सकता। पर क्या हुआ? सन्तुष्ट और आत्ममुग्ध तो हूँ मैं!
क्यों लिखता हूँ मैं? क्या उद्देश्य है पोस्ट लिखने के पीछे मेरा?
आज जब ऐसे सवाल मेरे मन में उठते हैं तो याद आता है कि जब मैंने अपना हिन्दी ब्लोग बनाया था तो उस समय मेरे पास बहुत सारे उद्देश्य थे। मसलन अपने पोस्ट के माध्यम से अच्छी अच्छी जानकारी देना विशेषतः भारतीय संस्कृति और सभ्यता के विषय में, नेट में हिन्दी को बढ़ावा देकर हिन्दी की सेवा करना और साथ ही साथ हिन्दी ब्लोगिंग से कुछ कमाई कर के स्वयं भी लाभ लेना। पर आज सोचता हूँ तो लगता है कि ऐसा कुछ भी तो नहीं कर पाया मैं। मुझे पता ही नहीं चला कि कब मेरे उद्देश्य बदल कर ढेर सारी टिप्पणियाँ पाना और संकलकों के हॉटलिस्ट में ऊपर ही ऊपर चढ़ते जाना बन गए। आज मैं टिप्पणियों के पैबन्द और संकलकों की बैसाखी पाकर अत्यन्त ही सन्तुष्ट जीव बन गया हूँ।
मैं जानता हूँ कि नेट में आने वाले करोड़ों हिन्दीभाषियों में से मुझे शायद ही कोई पढ़ता है पर क्यों ना बनूँ मैं सन्तुष्ट जीव? आखिर कुछ ऐसे लोग भी तो हैं जो मुझे पढ़ते हैं या फिर पढ़ने का दिखावा ही कर लेते हैं। क्या यह कम है मेरे लिए? आज तक मैंने जो कुछ भी लिखा है यदि मैंने उसे स्तर के पत्र-पत्रिकाओं में छपने भेजा होता तो अवश्य ही मेरी वे सब रचनाएँ वहाँ की कचरा पेटी की शोभा बढ़ाती होतीं और कहाँ मिलते मुझे पढ़ने वाले? तो क्यों ना बनूँ मैं सन्तुष्ट जीव?
मुझे सन्तुष्ट रहना है इसलिए यही सोचा करता हूँ कि हिन्दी में बहुत सारे महान साहित्यकार हुए हैं पर क्या किसी की भी रचना कभी 'बेस्टसेलर' बनी है? क्या किसी ने 'मैक्सिम गोर्की' के "द मदर", 'चार्ल्स डिकन्स' के "अ टेल ऑफ टू सिटीज़" आदि जैसी पुस्तकें हिन्दी में लिखी हैं जिनके पाठक संसार भर में हैं? संसार की बात छोड़ें, अपने ही देश में ही 'जयशंकर प्रसाद' की "कामायनी", 'मैथिलीशरण गुप्त' जी के "साकेत" जैसी रचनाओं को कितने लोग पढ़ते हैं? घर में "रामचरित मानस" रहने पर भी किसने उसे पूरा पढ़ा है? तो फिर यदि मेरे लिखे को कोई पढ़ने वाला नहीं है तो इससे क्या फर्क पड़ जाता है? क्यों ना रहूँ मैं सन्तुष्ट? मुझे टिप्पणियाँ मिलती हैं, संकलकों के हॉटलिस्ट में मेरा पोस्ट ऊपर चढ़ता है यह क्या कम है मेरे लिए?
और लोग क्यों टिप्पणियाँ करते हैं यह तो मैं नहीं कह सकता पर मैं हर रोज हिन्दी के सैंकड़ों नहीं तो कम से कम पचास-साठ पोस्टों में जाकर इसलिए टिप्पणियाँ किया करता हूँ कि मुझे भी कम से कम पन्द्रह-बीस टिप्पणियाँ मिल जाए। "आप हर मरतबा एक बकवाइस लिखकर पाटक का टाइम खोटी करती है। बकवाइस बंद किरिए। ऐहसान होगी." जैसी टिप्पणियाँ पाकर भी मैं खुश होता हूँ! ऐसी टिप्पणियों को न मिटा कर मैं हिन्दी भाषा पर और खुद पर भी उपकार करता हूँ। इसे मिटा दूँगा तो हिन्दी में की गई एक टिप्पणी कम हो जाएगी और टिप्पणियाँ कम होने से नेट में हिन्दी का वर्चस्व कैसे बढ़ेगा? इसे मिटा दूँगा तो हॉटलिस्ट में मेरा पोस्ट नीचे उतर आएगा; और सबसे बड़ी बात तो यह है कि इसे मिटा दूँगा तो मुझ पर अपनी आलोचना न सह पाने का इल्जाम भी लग जाएगा। तो आखिर क्यों मिटाऊँ मैं इसे? आखिर ये टिप्पणियाँ ही तो हैं जो मुझे गुदगुदाती हैं और मेरे पोस्ट को संकलकों के हॉटलिस्ट में ऊपर चढ़ा कर मुझे संतुष्टि प्रदान करती हैं।
मैं अपंग हूँ क्योंकि मैं अपने दम पर आगे नहीं बढ़ सकता। पर क्या हुआ? संकलकों की बैसाखी तो है मेरे पास! मैं निर्धन हूँ क्योंकि मेरे पास ऐसी लेखन क्षमता का धन नहीं है जो हजारों-लाखों की संख्या में पाठक जुटा सके। पर क्या हुआ? टिप्पणी देने वाले तो हैं मेरे पास! मैं असहाय हूँ क्योंकि मैं चाहकर भी अपनी इस स्थिति से उबर नहीं सकता। पर क्या हुआ? सन्तुष्ट और आत्ममुग्ध तो हूँ मैं!
Sunday, August 22, 2010
संकलक, पाठक और टिप्पणियाँ
संकलक एक इंटरनेट से सम्बन्धित शब्द है। संकलकों का काम होता है किसी एक विषय या भाषा के ब्लोग्स को एक स्थान पर दिखाना। जैसे कि समाचार संकलक समाचारों को एक ही स्थान पर दिखाते हैं तो हिन्दी भाषा के संकलक हिन्दी ब्लोग्स को एक स्थान पर! संकलकों का उद्देश्य होता है ब्लोग्स में पाठक भेजना।
जहाँ किसी ब्लोग में संकलकों से पाठक आते हैं वहीं अन्य तरीकों से भी आते हैं जैसे कि ब्लोग का अनुसरण कर के या विभिन्न सर्च इंजिनों में सर्च कर के। किसी पोस्ट में आने वाले पाठकों में से कुछ पाठक पोस्ट को पढ़कर चले जाते हैं, कुछ लोग अपनी टिप्पणी भी करते हैं और ऐसा भी होता है कि कई पाठक पोस्ट को बिना पढ़े भी चले जाते हैं।
यह आवश्यक नहीं है कि जो लोग टिप्पणी करते हैं वे किसी संकलक से ही पोस्ट में आए हों, वे कहीं पर से भी आए हो सकते हैं। मान लीजिए किसी संकलक ने किसी पोस्ट में कुल 31 पाठक भेजे और उस पोस्ट में 37 टिप्पणियाँ हैं। अब जिस संकलक ने पोस्ट में पाठक भेजे हैं वह अपने डिफॉल्ट हॉटलिस्ट में पोस्ट में की गई टिप्पणियों की संख्या को दर्शाता है तो क्या यह उचित है? संकलक से पोस्ट में जाने वाले 31 पाठकों में से कुछ ने ही तो टिप्पणी की होगी और शेष टिप्पणियाँ अन्य प्रकार से आए पाठकों की होगी। तो क्या यह 31 पाठक भेज कर 37 टिप्पणियों का श्रेय लेना नहीं है? और इसके उलटे उस संकलक ने किसी पोस्ट में 96 पाठक भेजे हैं किन्तु उस पोस्ट में मात्र 3 टिप्पणियाँ है तो उस पोस्ट को अपने डिफॉल्ट हॉटलिस्ट में न दिखाना क्या उस पोस्ट के साथ अन्याय नहीं है? संकलक के द्वारा भेजे गए पाठकों के आधार पर ही संकलक की डिफॉल्ट हॉटलिस्ट नहीं होनी चाहिए?
वैसे भी संकलकों का कार्य पोस्ट में महज पाठक भेजना होता है टिप्पणियाँ करवाना नहीं।
जहाँ किसी ब्लोग में संकलकों से पाठक आते हैं वहीं अन्य तरीकों से भी आते हैं जैसे कि ब्लोग का अनुसरण कर के या विभिन्न सर्च इंजिनों में सर्च कर के। किसी पोस्ट में आने वाले पाठकों में से कुछ पाठक पोस्ट को पढ़कर चले जाते हैं, कुछ लोग अपनी टिप्पणी भी करते हैं और ऐसा भी होता है कि कई पाठक पोस्ट को बिना पढ़े भी चले जाते हैं।
यह आवश्यक नहीं है कि जो लोग टिप्पणी करते हैं वे किसी संकलक से ही पोस्ट में आए हों, वे कहीं पर से भी आए हो सकते हैं। मान लीजिए किसी संकलक ने किसी पोस्ट में कुल 31 पाठक भेजे और उस पोस्ट में 37 टिप्पणियाँ हैं। अब जिस संकलक ने पोस्ट में पाठक भेजे हैं वह अपने डिफॉल्ट हॉटलिस्ट में पोस्ट में की गई टिप्पणियों की संख्या को दर्शाता है तो क्या यह उचित है? संकलक से पोस्ट में जाने वाले 31 पाठकों में से कुछ ने ही तो टिप्पणी की होगी और शेष टिप्पणियाँ अन्य प्रकार से आए पाठकों की होगी। तो क्या यह 31 पाठक भेज कर 37 टिप्पणियों का श्रेय लेना नहीं है? और इसके उलटे उस संकलक ने किसी पोस्ट में 96 पाठक भेजे हैं किन्तु उस पोस्ट में मात्र 3 टिप्पणियाँ है तो उस पोस्ट को अपने डिफॉल्ट हॉटलिस्ट में न दिखाना क्या उस पोस्ट के साथ अन्याय नहीं है? संकलक के द्वारा भेजे गए पाठकों के आधार पर ही संकलक की डिफॉल्ट हॉटलिस्ट नहीं होनी चाहिए?
वैसे भी संकलकों का कार्य पोस्ट में महज पाठक भेजना होता है टिप्पणियाँ करवाना नहीं।
Thursday, August 19, 2010
अपना अलेक्सा रैंक देखा तो पता चला की हमारा ब्लोग 31 जुलाई 2000 से आनलाइन है
हम ब्लोग की दुनिया में कब, क्यों और कैसे आए यह बिल्कुल भूल चुके हैं। आज एकाएक विचार आया कि अपने ब्लोग का अलैक्सा रैंक देख लिया जाए। देखा तो पाया कि अलैक्सा में हमारे ब्लोग का विश्व रैंक 408,205 और भारत रैंक 39,420 है। हमारे लिए यह एक संतुष्टि की बात थी किन्तु अधिक प्रसन्नता यह देखकर हुई कि हमारा ब्लोग हमारा ब्लोग 31 जुलाई 2000 से आनलाइन है; हम तो भूल ही चुके थे कि हमने अपना ब्लोग कब बनाया था।
यदि आप अपने ब्लोग का अलैक्सा रैंक देखना चाहें तो http://www.alexa.com/ में जाकर देख सकते हैं।
अपना अलैक्सा रैंक देख लेने के बाद उत्सुकता हुई कि जाने माने ब्लोग्स के भी अलैक्सा रैंक देखा जाए, जिसका परिणाम यह प्राप्त हुआः
याने कि अलेक्सा रैकिंग के अनुसार उपरोक्त ब्लोग्स का क्रम हुआः
हम ब्लोग की दुनिया में कब, क्यों और कैसे आए यह बिल्कुल भूल चुके हैं। आज एकाएक विचार आया कि अपने ब्लोग का अलैक्सा रैंक देख लिया जाए। देखा तो पाया कि अलैक्सा में हमारे ब्लोग का विश्व रैंक 408,205 और भारत रैंक 39,420 है। हमारे लिए यह एक संतुष्टि की बात थी किन्तु अधिक प्रसन्नता यह देखकर हुई कि हमारा ब्लोग हमारा ब्लोग 31 जुलाई 2000 से आनलाइन है; हम तो भूल ही चुके थे कि हमने अपना ब्लोग कब बनाया था।
यदि आप अपने ब्लोग का अलैक्सा रैंक देखना चाहें तो http://www.alexa.com/ में जाकर देख सकते हैं।
अपना अलैक्सा रैंक देख लेने के बाद उत्सुकता हुई कि जाने माने ब्लोग्स के भी अलैक्सा रैंक देखा जाए, जिसका परिणाम यह प्राप्त हुआः
| ब्लोग | चिट्ठा जगत सक्रियता | अलैक्सा विश्व रैंकिंग | अलैक्सा भारत रैंकिंग |
| ताऊ डॉट इन | 1 | 357,766 | 38,787 |
| उडन तश्तरी | 2 | 493,355 | 51,392 |
| मानसिक हलचल | 3 | 561,648 | 67,046 |
| लोक संघर्ष | 4 | 1,672,515 | 257,948 |
| हिन्दी युग्म | 5 | 213,304 | 16,611 |
| ज्ञान दर्पण | 6 | 173,987 | 14,569 |
| हिन्दी ब्लाग टिप्स | 7 | 448,902 | 56,969 |
| फ़ुरसतिया | 8 | 770,580 | 99,378 |
| छींटे और बौछारें | 9 | 512,893 | 56,374 |
| ललित डॉट कॉम | 10 | 358,751 | 29,459 |
याने कि अलेक्सा रैकिंग के अनुसार उपरोक्त ब्लोग्स का क्रम हुआः
| क्रमांक | ब्लोग | विश्व रैंकिग | इंडिया रैंकिग |
| 1. | ज्ञान दर्पण | 173,987 | 14,569 |
| 2. | हिंदी युग्म | 213,304 | 16,611 |
| 3. | ताऊ डॉट इन | 357,766 | 38,787 |
| 4. | ललित डॉट कॉम | 358,751 | 29,459 |
| 5. | उड़न तश्तरी | 493,355 | 51,392 |
| 6. | हिन्दी ब्लाग टिप्स | 448,902 | 56,969 |
| 7. | छींटे बौछारें | 512,893 | 56,374 |
| 8. | मानसिक हलचल | 561,648 | 67,046 |
| 9. | फ़ुरसतिया | 770,580 | 99,378 |
| 10. | लोक संघर्ष | 1,672,515 | 257,948 |
Thursday, August 12, 2010
क्या हिन्दी ब्लोग्स कभी व्यावसायिक हो पाएँगे?
ब्लोग याने कि वेबलॉग की शुरुवात हुई थी निजी किन्तु सार्वजनिक दैनन्दिनी के रूप में। अंग्रेजी ब्लोग्स की बात करें तो यह कहा जा सकता है बहुत ही तेजी के साथ उनकी की लोकप्रियता बढ़ती चली गई। लोकप्रियता बढ़ने के साथ ही साथ निजी-सार्वजनिक दैनन्दिनी वाले उनके रूप में भी परिवर्तन होता चला गया और वे व्यावसायिक होते चले गए। आज अंग्रेजी के प्रायः ब्लोग्स पूर्ण रूप से व्यावसायिक हैं। अंग्रेजी ब्लोग्स की व्यावसायिकता ने 'वर्क एट होम', 'वर्क फ्रॉम होम', 'फायर योर बॉस' आदि नई मान्यताओं को जन्म दिया। अनेक लोग अपनी नौकरी छोड़कर सफल व्यावसायिक ब्लोगर्स बन गए!
हिन्दी ब्लोग्स के साथ ऐसी बात नहीं रही, उन्हें उस प्रकार से लोकप्रियता नहीं मिल पाई जिस प्रकार से अंग्रेजी ब्लोग्स को मिली। वास्तव में हिन्दी जानने वाले नेट यूजर्स की एक बहुत बड़ी संख्या आज भी हिन्दी ब्लोग्स के अस्तित्व से ही अन्जान है। हिन्दी ब्लोग्स सर्च इंजिनों में अपनी पहचान नहीं बना पाए, उन्हें सदैव एग्रीगेटरों के सहारे की आवश्यकता बनी रही है। यही कारण है कि ब्लोगवाणी जैसे लोकप्रिय एग्रीगेटर के बंद हो जाने का अवसाद आज भी अधिकतर हिन्दी ब्लोगर्स के भीतर बना हुआ है। एग्रीगेटर्स के सहारे टिके होने के कारण हिन्दी ब्लोग्स को प्रायः हिन्दी ब्लोगर्स ही पढ़ते हैं। प्रायः सामान्य नेट यूजर्स की रुचि एग्रीगेटर्स में नहीं नहीं होती, वे सर्च इंजिनों में अपने रुचि के विषयों को ही खोजते हैं। इसी कारण से हिन्दी ब्लोग्स के पाठकों की कमी बनी रहती है जिसके कारण से हिन्दी ब्लोग्स में व्यावसायिकता की क्षमता नहीं बन पाती।
तो क्या कभी हिन्दी ब्लोग्स कभी व्यावसायिक हो पाएँगे?
हमारा तो मानना है कि अवश्य बन पाएँगे यदि हिन्दी ब्लोगर्स पाठक बढ़ाने के उद्देश्य से पाठकों की रुचियों को ध्यान में लेखन करें। टिप्पणियों की संख्या के बादले पाठकों की संख्या को अधिक महत्वपूर्ण समझें। जाने-अनजाने में हम ब्लोगरों और हमारे एग्रीगेटरों ने ही टिप्पणियों को महत्वपूर्ण बना दिया है। चिट्ठाजगत यदि 'धड़ाधड़ टिप्पणियाँ' के बदले धड़ाधड़ पठन को डीफॉल्ट हॉटलिस्ट बना दे याने कि मुख्य हॉट लिस्ट में अधिक टिप्पणियाँ पाने वाले ब्लोग्स के स्थान पर अधिक पढ़े जाने वाले ब्लोग्स दिखाई देने लगें तो ब्लोगरगण टिप्पणियाँ बढ़ाने की अपेक्षा पाठक बढ़ाने की ओर अधिक ध्यान देने लग जायेंगे। ऐसा करने से कई प्रकार के तिकड़म कर के टिप्पणी बढ़ाने वाले भी हतोस्साहित होंगे तथा चिट्ठाजगत के साख में भी वृद्धि होगी।
कुछ लोगों को यह भी लग सकता है कि आखिर हम हिन्दी ब्लोग्स की तुलना अंग्रेजी ब्लोग्स से क्यों करते हैं? इस प्रश्न का उत्तर बहुत ही सरल है। स्वयं को जानने के लिए हमें तुलना करनी ही पड़ती है, यदि हम तुलना ना करें तो न तो कभी हम स्वयं को जान पायेंगे और न ही कभी आत्म-मुग्धता से हमें मुक्ति मिल पायेगी। तुलना ही है जो कि हमें उन्नति की ओर अग्रसर करती है।
हिन्दी ब्लोग्स के साथ ऐसी बात नहीं रही, उन्हें उस प्रकार से लोकप्रियता नहीं मिल पाई जिस प्रकार से अंग्रेजी ब्लोग्स को मिली। वास्तव में हिन्दी जानने वाले नेट यूजर्स की एक बहुत बड़ी संख्या आज भी हिन्दी ब्लोग्स के अस्तित्व से ही अन्जान है। हिन्दी ब्लोग्स सर्च इंजिनों में अपनी पहचान नहीं बना पाए, उन्हें सदैव एग्रीगेटरों के सहारे की आवश्यकता बनी रही है। यही कारण है कि ब्लोगवाणी जैसे लोकप्रिय एग्रीगेटर के बंद हो जाने का अवसाद आज भी अधिकतर हिन्दी ब्लोगर्स के भीतर बना हुआ है। एग्रीगेटर्स के सहारे टिके होने के कारण हिन्दी ब्लोग्स को प्रायः हिन्दी ब्लोगर्स ही पढ़ते हैं। प्रायः सामान्य नेट यूजर्स की रुचि एग्रीगेटर्स में नहीं नहीं होती, वे सर्च इंजिनों में अपने रुचि के विषयों को ही खोजते हैं। इसी कारण से हिन्दी ब्लोग्स के पाठकों की कमी बनी रहती है जिसके कारण से हिन्दी ब्लोग्स में व्यावसायिकता की क्षमता नहीं बन पाती।
तो क्या कभी हिन्दी ब्लोग्स कभी व्यावसायिक हो पाएँगे?
हमारा तो मानना है कि अवश्य बन पाएँगे यदि हिन्दी ब्लोगर्स पाठक बढ़ाने के उद्देश्य से पाठकों की रुचियों को ध्यान में लेखन करें। टिप्पणियों की संख्या के बादले पाठकों की संख्या को अधिक महत्वपूर्ण समझें। जाने-अनजाने में हम ब्लोगरों और हमारे एग्रीगेटरों ने ही टिप्पणियों को महत्वपूर्ण बना दिया है। चिट्ठाजगत यदि 'धड़ाधड़ टिप्पणियाँ' के बदले धड़ाधड़ पठन को डीफॉल्ट हॉटलिस्ट बना दे याने कि मुख्य हॉट लिस्ट में अधिक टिप्पणियाँ पाने वाले ब्लोग्स के स्थान पर अधिक पढ़े जाने वाले ब्लोग्स दिखाई देने लगें तो ब्लोगरगण टिप्पणियाँ बढ़ाने की अपेक्षा पाठक बढ़ाने की ओर अधिक ध्यान देने लग जायेंगे। ऐसा करने से कई प्रकार के तिकड़म कर के टिप्पणी बढ़ाने वाले भी हतोस्साहित होंगे तथा चिट्ठाजगत के साख में भी वृद्धि होगी।
कुछ लोगों को यह भी लग सकता है कि आखिर हम हिन्दी ब्लोग्स की तुलना अंग्रेजी ब्लोग्स से क्यों करते हैं? इस प्रश्न का उत्तर बहुत ही सरल है। स्वयं को जानने के लिए हमें तुलना करनी ही पड़ती है, यदि हम तुलना ना करें तो न तो कभी हम स्वयं को जान पायेंगे और न ही कभी आत्म-मुग्धता से हमें मुक्ति मिल पायेगी। तुलना ही है जो कि हमें उन्नति की ओर अग्रसर करती है।
Thursday, August 5, 2010
हम भी कई बार वही काम करते हैं जिसे करके बहुत से लोग सफलतम व्यक्ति बन गये - याने कि चोरी!
चोरी!
शायद ही कोई व्यक्ति होगा जिसने अपने जीवन में कभी चोरी न की हो। कोई बचपने में घर के ही अचार चुराता है तो युवावस्था में किसी का दिल चुरा लेता है। भगवान श्री कृष्ण का तो एक नाम ही "माखनचोर" है। हमारी संस्कृति में चोरी को चौंसठ कलाओं में से एक माना गया है - चौर्य कला। इस कला में महारथ रखने वाला तो "आँखों से अंजन चुरा लेता है"। इसके उल्टे चोरी यदि फूहड़ता के साथ की जाये तो वह चोरी अपनी चुगली आप कर देती है।
लेखन के क्षेत्र में भी चोरी एक आम बात है। कितने ही लेखक अंग्रेजी जासूसी उपन्यासों की सामग्री चुरा कर हिन्दी के सफलतम जासूसी उपन्यासकार बन बैठे हैं। कवि और शायर अन्य प्रख्यात कवियों और शायरों की किसी पंक्ति को चुरा कर अपनी कविता या शायरी का शीर्षक बना लिया करते हैं। हम भी अपने लेखन में किसी प्रख्यात लेखक के भाव तथा शब्द चुरा लिया करते हैं। कई बार तो हम अपने पोस्ट में किसी प्रख्यात रचनाकार के लेखन को, जो हमें बहुत अधिक पसंद आता है, ज्यों का त्यों उतार दिया करते हैं। याने कि पोस्ट हमारा पर लेखन किसी और का। यह चोरी नही है तो और क्या है? पर हाँ, ऐसे समय में हम उस रचनाकार का उल्लेख करना भी कभी नहीं भूलते। उदाहरण के लिये हमें छत्तीसगढ़ के प्रख्यात साहित्यकार पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी जी के निम्न विचार बहुत अच्छे लगेः
बख्शी जी के उपरोक्त विचार हमें न केवल साहित्य के क्षेत्र के लिये वरन ब्लोगिंग के क्षेत्र के लिये भी अत्यन्त सार्थक लगते हैं। साहित्य के समान ब्लोगिंग भी विशुद्ध आनन्द का फल है और वही आनन्द ब्लोगरों को सच्ची प्रेरणा देता है।
बख्शी जी का यह भी मानना है किः
(स्व. श्री हरिप्रसाद अवधिया जी के उपन्यास "धान के देश में" की भूमिका से)
हमें भी यही लगता है कि कथाओं और उपन्यासों के जैसे ही कुछ ब्लोग पोस्ट भी ऐसे होते हैं जिन्हें हम केवल एक बार पढ़कर भूल जाते हैं और कुछ पोस्ट ऐसे भी होते हैं जिन्हें बार बार पढ़कर भी मन नहीं भरता।
मैं भी कथाओं और उपन्यासों का प्रेमी पाठक हूँ। किशोरावस्था में ही मैंने देवकीनन्दन खत्री, वृन्दावनलाल वर्मा, मुंशी प्रेमचंद, भगवतीचरण वर्मा, आचार्य चतुरसेन, गुरुदत्त आदि प्रख्यात रचनाकारों की कई रचनाओं को पढ़ लिया था। चन्द्रकान्ता, चन्द्रकान्ता संतति, चित्रलेखा, गोदान, वयं रक्षामः, वैशाली की नगरवधू, सोना और खून आदि उपन्यासों को मैंने एक नहीं अनेक बार पढ़ा है। आज तो लोगों की रुचि भारी-भरकम उपन्यासों को पढ़ने में रह ही नहीं गई है, और जिन लोगों की रुचि इनमें है उनके पास, आज के इस व्यस्ततम जमाने में, इन्हें पढ़ने के लिये समय ही नहीं है। ऐसे लोगों को कथाओं का रसपान कराने के लिये कई बार हम अपने पोस्ट में प्रख्यात रचनाकारों के लेखन के अंश को उद्धरित कर दिया करते हैं।
आज प्रस्तुत है आचार्य चतुरसेन जी के उपन्यास "सोना और खून" से लिया गया एक छोटा सा अंश जिसमें नवाब और उनकी बेगम की आपसी नोक-झोंक को अत्यन्त रोचकता के साथ पेश किया गया है, आप भी पढ़कर मजा लें:
शायद ही कोई व्यक्ति होगा जिसने अपने जीवन में कभी चोरी न की हो। कोई बचपने में घर के ही अचार चुराता है तो युवावस्था में किसी का दिल चुरा लेता है। भगवान श्री कृष्ण का तो एक नाम ही "माखनचोर" है। हमारी संस्कृति में चोरी को चौंसठ कलाओं में से एक माना गया है - चौर्य कला। इस कला में महारथ रखने वाला तो "आँखों से अंजन चुरा लेता है"। इसके उल्टे चोरी यदि फूहड़ता के साथ की जाये तो वह चोरी अपनी चुगली आप कर देती है।
लेखन के क्षेत्र में भी चोरी एक आम बात है। कितने ही लेखक अंग्रेजी जासूसी उपन्यासों की सामग्री चुरा कर हिन्दी के सफलतम जासूसी उपन्यासकार बन बैठे हैं। कवि और शायर अन्य प्रख्यात कवियों और शायरों की किसी पंक्ति को चुरा कर अपनी कविता या शायरी का शीर्षक बना लिया करते हैं। हम भी अपने लेखन में किसी प्रख्यात लेखक के भाव तथा शब्द चुरा लिया करते हैं। कई बार तो हम अपने पोस्ट में किसी प्रख्यात रचनाकार के लेखन को, जो हमें बहुत अधिक पसंद आता है, ज्यों का त्यों उतार दिया करते हैं। याने कि पोस्ट हमारा पर लेखन किसी और का। यह चोरी नही है तो और क्या है? पर हाँ, ऐसे समय में हम उस रचनाकार का उल्लेख करना भी कभी नहीं भूलते। उदाहरण के लिये हमें छत्तीसगढ़ के प्रख्यात साहित्यकार पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी जी के निम्न विचार बहुत अच्छे लगेः
यह सच है कि अधिकांश तरुण साहित्यकारों की प्रवृति गद्य रचना की अपेक्षा पद्य रचना की ओर अधिक है। गद्य रचना में भी कथाओं की रचना की ओर अधिकांश नवयुवक जितना ध्यान देते हैं उतना गंभीर विषयों की विवेचना की ओर नहीं। उसका कारण भी है, तारुण्य में कल्पना की जो प्रखरता रहति है वह प्रौढ़ावस्था या वृद्धावस्था में नहीं रह जाती। सभी तरुण कल्पना का एक मायाजगत निर्मित कर प्रेम और सौन्दर्य की अनुभूति के लिये व्यग्र रहते हैं। यही कारण है कि अपने प्रारंभिक काल में कितने ही नवयुवक कवता और कहानी की रचना में विशेष उत्साह प्रदर्शित करते हैं। कुछ समय के बाद जब वे संसार के कर्मक्षेत्र में प्रविष्ट होते हैं तब उनमें से अधिकांश का यह उत्साह लुप्त सा हो जाता है। कुछ लोग यह समझते हैं कि ऐसे लेखक जब साहित्य के क्षेत्र से पृथक हो जाते हैं तब साहित्य में एक गतिरोध सा उत्पन्न हो जाता है। पर ऐसी बात नहीं है। जिन्हें साहित्य के प्रति अनुराग होता है उन्हें किसी भी परिस्थिति में रचना के प्रति विरक्ति नहीं होती। महत्वाकांक्षा से प्रेरित होकर जो लोग साहित्य के क्षेत्र में आते हैं उनकी अभीष्ट-सिद्धि न होने पर विरक्ति होना अस्वाभाविक नहीं। आजकल साहित्य के क्षेत्र में भी राजनीति के क्षेत्र की तरह प्रचार की भावना बढ़ती जा रही है। लोग दलबद्ध हो कर प्रचार कार्य करते हैं। उस प्रचार के भीतर एक विशेष महत्वाकांक्षा ही काम कर रही है। पर सच पूछिये तो इससे साहित्य के निर्माण में विशेष लाभ नहीं होता। हम लोग हो-हल्ला मचा कर कुछ समय के लिये कुछ लोगों को भले ही प्रभावित कर लें परन्तु अंत में हम लोगों का यह प्रचार कार्य निष्फल ही होता है। मैंने स्वयं अपने इस जीवनकाल में कितने ही कवियों और कलाकारों का उदय देखा और उनका अस्त भी। अतएव महत्वाकांक्षा से प्रेरित होकर जो लोग साहित्य के क्षेत्र में सस्ती कीर्ति पाने का प्रयत्न करते हैं, उन्हें अंत में हतोत्साह होना पड़ता है। सच्चे साहित्यकारों के लिये जो बात सबसे अधिक मुख्य है वह है उनका अंतःसुख। उसी अंतःसुख के कारण वे साहित्य के क्षेत्र में यश और अपयश की चिंता न कर लिखते ही जाते हैं। जिनमें विशेष रचना-कौशल रहता है उन्हें सफलता भी मिल जाती है। साहित्य के इतिहास में यह देखा गया है कि विषम परिस्थितियों में रह कर जिन साहित्यकारों ने अपूर्व ग्रंथों की रचना की वैसी रचनायें उन्हीं के द्वारा सुख-सुविधा और विलास की परिस्थिति में रह कर नहीं लिखी गई। इसलिये साहित्य को मैं विशुद्ध आनंद का फल मानता हूँ। वही आनंद साहित्यकारों को सच्ची प्रेरणा देता है।(स्व. श्री हरिप्रसाद अवधिया जी के उपन्यास "धान के देश में" की भूमिका से)
बख्शी जी के उपरोक्त विचार हमें न केवल साहित्य के क्षेत्र के लिये वरन ब्लोगिंग के क्षेत्र के लिये भी अत्यन्त सार्थक लगते हैं। साहित्य के समान ब्लोगिंग भी विशुद्ध आनन्द का फल है और वही आनन्द ब्लोगरों को सच्ची प्रेरणा देता है।
बख्शी जी का यह भी मानना है किः
वृद्धावस्था में हम सब लोगों की अपनी एक विशेष रुचि हो जाती है। फिर भी उपन्यासों में कथा रस का उपभोग करने की क्षमता रहती है। हम उपन्यासों को पढ़ कर उनके माया जगत में ऐसे लीन हो जाते हैं कि हम सचमुच आत्म विस्मृत हो जाते हैं। फिर भी यह सच है कि विशेष स्थिति में विशेष उपन्यास रुचिकर होते हैं। यह सर्वथा सम्भव है कि एक अवस्था में जिन कथाओं को पढ़कर हमें विशेष आनंद हुआ है, उन्हीं से अन्य अवस्था में विरक्ति भी हो सकती है। कुछ ऐसी भी कथायें होती हैं जिन्हें हम केवल एक बार पढ़कर फेंक देते हैं, उन्हें फिर पढ़ने की इच्छा नहीं होती। ऐसे भी उपन्यास होते हैं जिन्हें बार-बार पढ़ने से भी हमें विरक्ति नहीं होती। ऐसे कितने ही उपन्यास हैं जिन्हें मैं पच्चीसों बार पढ़ चुका हूँ और जब मुझे काम करने की व्यग्रता नहीं रहती तब उन्हीं उपन्यासों के द्वारा मुझे साहित्य का विशुद्ध आनंद प्राप्त हो जाता है।
(स्व. श्री हरिप्रसाद अवधिया जी के उपन्यास "धान के देश में" की भूमिका से)
हमें भी यही लगता है कि कथाओं और उपन्यासों के जैसे ही कुछ ब्लोग पोस्ट भी ऐसे होते हैं जिन्हें हम केवल एक बार पढ़कर भूल जाते हैं और कुछ पोस्ट ऐसे भी होते हैं जिन्हें बार बार पढ़कर भी मन नहीं भरता।
मैं भी कथाओं और उपन्यासों का प्रेमी पाठक हूँ। किशोरावस्था में ही मैंने देवकीनन्दन खत्री, वृन्दावनलाल वर्मा, मुंशी प्रेमचंद, भगवतीचरण वर्मा, आचार्य चतुरसेन, गुरुदत्त आदि प्रख्यात रचनाकारों की कई रचनाओं को पढ़ लिया था। चन्द्रकान्ता, चन्द्रकान्ता संतति, चित्रलेखा, गोदान, वयं रक्षामः, वैशाली की नगरवधू, सोना और खून आदि उपन्यासों को मैंने एक नहीं अनेक बार पढ़ा है। आज तो लोगों की रुचि भारी-भरकम उपन्यासों को पढ़ने में रह ही नहीं गई है, और जिन लोगों की रुचि इनमें है उनके पास, आज के इस व्यस्ततम जमाने में, इन्हें पढ़ने के लिये समय ही नहीं है। ऐसे लोगों को कथाओं का रसपान कराने के लिये कई बार हम अपने पोस्ट में प्रख्यात रचनाकारों के लेखन के अंश को उद्धरित कर दिया करते हैं।
आज प्रस्तुत है आचार्य चतुरसेन जी के उपन्यास "सोना और खून" से लिया गया एक छोटा सा अंश जिसमें नवाब और उनकी बेगम की आपसी नोक-झोंक को अत्यन्त रोचकता के साथ पेश किया गया है, आप भी पढ़कर मजा लें:
बड़े नवाब मिर्जा अलीबेग अस्सी की उम्र में जब मरे तो उनके साहबज़ादे मिर्जा अख़्तरबेग की उम्र बीस बरस की थी। बड़ी मानता-मनौती मानने पर बड़े नवाब को बुढ़ौती में बेटे का मुँह देखना नसीब हुआ था। इसीलिए उनकी परवरिश भी लाड़-प्यार में हुई थी। उन दिनों जहांगीराबाद की रियासत में ऐशो-इशरत की कमी न थी। सिर्फ इतना ही नहीं कि छोटे नवाब ऐशो-इशरत की गोद में पलकर किसी कदर आवार हो गए, उनकी तालीम भी बहुत मामूली हुई। इन सब कारणों से ज्यों ही बड़े नवाब मरे और इन्हें हाथ की छूट हुई तो बेहद फिज़ूलखर्चियाँ करने लगे। बदइन्तजामी इतनी बढ़ी कि आमदनी आधी भी न रही।
इनकी ऐयाशी और फिज़ूलखर्ची बड़े नवाब के जमाने में आरम्भ हो गई थीं। उन्होंने यह सोचकर कि शादी कर देने से वह खानादारी में फँसकर ठीक हो जाएगा, उनकी शादी चौदह साल की उम्र में ही कर दी थी। शुरू-शुरू में तो नए मियाँ-बीबी खूब घुल-मिल कर रहे। बीबी का मिज़ाज़ जरा तेज था। वह भी एक नवाब की बेटी थी। पर मियाँ की वह बहुत लल्लो-चप्पो करती रहती थी।......... परंतु धीरे-धीरे यह प्रेम का पौधा सूखने लगा और छोटे नवाब इधर-उधर फिर दिल का सौदा करने लगे। इससे बेग तिनक गईं। और फिर आए दिन मान-मनौवल, फसाद-झगड़े उठने लगे। इसी बीच बड़े नवाब का इन्तकाल हो गया और छोटे नवाब की पगड़ी बँधी। इसके एक साल बाद ही नवाब के लड़का पैदा हुआ। लड़का सुन्दर और स्वस्थ था। पहला बच्चा था, इसलिये हवेली में बाजे बजने लगे। बधाइयाँ गाई जाने लगीं। तवायफ़ों की महफ़िल हुई। लेकिन जब दाई ने छठवीं के दिन लड़के को लाकर नवाब की गोद में डाला और उम्मीद की कि कोई भारी इनाम मिलेगा, तो नवाब ने बिगड़कर कहा, "इस लड़के की सूरत हमसे नहीं मिलती, चुनाँचे यह हमारा लड़का ही नहीं।"
नवाब साहब की इस बात से तहलका मच गया। हकीकत यह थी कि उनके आवारा दोस्तों ने कुछ ऐसी इशारेबाजियाँ पहले ही से कर रखी थीं, जिनसे नवाब का दिल वहम से भर गया था। वह अनपढ़ और बेवकूफ़ तो था ही, लड़के को देखते ही ऐसी बेहूदा बात कह बैठा।
बेगम ने सुना तो अपना सिर पीट लिया। रो-धोकर उसने सारा घर सिर पर उठा लिया। ..... इसी दौरान बेगम को पता लगा कि नवाब ने एक तवायफ़ से आशनाई कर ली है। ...... बेगम से एक दिन उसकी मुँह-दर-मुँह नोक-झोंक हो गई।
नवाब ने कहा, "बेगम, तुमने यह हक-नाहक का कैसा हंगामा खड़ा कर दिया है? बखुदा इससे बाज आओ, वरना हमसे बुरा कोई न होगा।"
"क्या कर लोगे तुम?"
"कसम कलामे-पाक की, मैं तुम्हारी खाल खिंचवाकर भूसा भरवा दूँगा।"
"तो तुफ़ है तुम पर जो करनी में कसर करो।"
"नाहक एक खूने-नाहक का अजाब मेरे सिर होगा।"
"तुम्हें क्या डर है! करनी कर गुजरो, ज्यादा से ज्यादा फाँसी हो जाएगी।"
"फाँसी क्यों हो जाएगी?"
"यह कम्पनी बहादुर की अमलदारी है। तुम्हारी खाला का राज नहीं।"
"बखुदा, बड़ी मुँहफट हो।"
"मगर अस्मतदार हूँ।"
"चे खुश। अस्मतदार हो तो कहो यह लौंडा कहाँ से पेट में डाल लाईं?"
"शरम नहीं आती यह बेहूदा कलाम जुबान पर लाते?"
"हम तो लाखों में कहेंगे। कुछ डर है!"
"नकटा जिए बुरे हवाल, डर काहे का! डर तो उसे हो जिसे अपनी इज्जत का कुछ खयाल हो।"
"हम खानदानी रईस हैं। हमारी इज्जत का तुम क्या जानो।"
"बड़े आए इज्जतवाले। तभी तो मुई उस वेसवा का थूक चाटते हो।"
"तो इससे तुम्हें क्या! यह हमने कोई नई बात नहीं की। हमारे हमकौम रईस-नवाब सभी कोई रखैल, रंडी रखते हैं। हमने रख ली तो तुम्हारा क्या नुकसान किया?"
"अच्छा, हमारा कोई नुकसान ही नहीं किया?"
"हमारा फर्ज ब्याहता के साथ रहने का है, हर्गिज फरामोश न करेंगे। और अगर ज्यादा बावेला न मचाकर घर में खामोश बैठोगी तो हम तुम्हारी खातिरदारी मिस्ल साबिक बल्कि उससे भी ज्यादा करेंगे। हालाँकि तुम इस सलूक के काबिल नहीं।"
"क्या कहने हैं! मियाँ होश की दवा करो। मेरा जो हक है मुँह पर झाड़ू मारकर लूँगी। होई हँसी-ठठ्ठा है!"
"तुमने बेहयाई पर कमर कस ली है तो लाचारी है।"
"मैं बेहया लोगों के कहने का बुरा नहीं मानती। अब्बाजान को मैंने सब हकीकत लिख दी है। वे आया ही चाहते हैं। उनसे निबटना। देखूँगी, कैसे तीसमारखां हो!"
"देखूँगा उन्हें, कितनी तोपें लेकर आते हैं!"
यह कहते और गुस्से से काँपते हुए नवाब बाहर चले गए।
Monday, August 2, 2010
हिन्दी ब्लोगिंग की महत्वपूर्ण बातें
- किसी भी नये ब्लोगर को उसके पहले ही पोस्ट पर इतना स्वागत् और इतनी वाहवाही मिलती है जितनी कि उसे अपने जीवन में पहले कभी न मिली हो!
- ब्लोगरों की हर वो रचना जो कि समस्त पत्र-पत्रिकाओं से 'खेद सहित वापस' आ गई रहती है ब्लोग में आसानी के साथ खप जाती है और उसे वाहवाही भी मिलती है।
- ब्लोगरों को लिखने के लिये किसी विषय का मोहताज नहीं रहना पड़ता। कुछ भी लिखो, किसी भी विषय पर लिखो, कभी कविता लिखो, कभी कहानी लिखो तो कभी घिसे-पिटे समाचारों की रिपोर्टिंग कर दो अर्थात् चाहे जो कुछ भी करो सब चलता है!
- एक ब्लोगर के लिखे को अन्य ब्लोगर अवश्य पढ़ते हैं।
- अन्य भाषाओं विशेषकर अंग्रेजी भाषा के ब्लोग लेखकों को अपने पोस्ट की सामग्री कंटेंट के स्तर का ध्यान रखना पड़ता है क्योंकि उनके बीच "कंटेंट इज़ किंग" वाली धारणा काम करती है, उन्हें अपने पाठकों की संख्या अधिक से अधिक बढ़ाने की फिक्र रहती है जो कि स्तर की सामग्री पढ़ने के लिये ही आते हैं। हिन्दी ब्लोग लेखकों के लिये टिप्पणियों का बहुत महत्व होता है क्योंकि माना जाता है कि जिसके पोस्ट में जितनी अधिक टिप्पणियाँ वह उतना ही महान ब्लोगर।
- यद्यपि हिन्दी ब्लोगिंग में विषयों का विशेष महत्व नहीं है किन्तु ब्लोग, ब्लोगिंग, अन्य ब्लोगर, ब्लोगर मीट आदि ऐसे विषय हैं जिन पर पोस्ट लिखकर अधिक से अधिक टिप्पणी पाई जा सकती है।
- प्रायः ब्लोगर लोग एक दूसरे की पीठ ठोकते हैं याने कि टिप्पणियों का "इस हाथ दे उस हाथ ले" सिलसिला धड़ल्ले के साथ चलता है।
- ब्लोगरों को उनका पोस्ट विभिन्न सर्च इंजिनों में आते हैं या नहीं, लोग पोस्ट को सर्च करके पढ़ते हैं या नहीं, गूगल पेज रैंक, अलेक्सा रैंक आदि से कुछ भी मतलब नहीं रहता। उन्हें मतलब रहता है सिर्फ हिन्दी ब्लोग संकलकों तथा उनके हॉट और सक्रियता सूचियों से।
- हिन्दी ब्लोगिंग में अपने पोस्ट को हिट करवाने और संकलकों के हॉटलिस्ट में शामिल करने के सत्रह सौ साठ तरीके उपलब्ध हैं।
- ब्लोगरों को 'हॉट और कोल्ड' के चक्कर में पड़ने, संकलको को गाली देने, अपना गुट बनाने, चर्चा करने, लिंकस तथा सक्रियता के चक्कर में पड़ने, फर्जीवाडा बताने, बेनामी बनाने, लड़ने-झगडते, दोस्त और दुश्मन बनाने, कोर्ट-कचहरी की धमकी देने, टंकी पर चढ़ने, दूसरों के धर्म की छीछालेदर करने तथा अपने धर्म को दूसरों के धर्म से महान बताने आदि बातों का पूर्ण अधिकार होता है।
- यदि कोई ब्लोगर आपके पोस्ट की आलोचना करे तो उसे दूसरे गुट का बताया जा सकता है और ब्लोगरों के अलावा इंटरनेट में सर्फ करने वाले अन्य लोग यदि हिन्दी ब्लोग्स की आलोचना करें तो उन्हें मजमा लगाने वाले छिद्राण्वेषी कहा जा सकता है।
- अपनी टिप्पणी के समर्थन में अपने समर्थकों से अन्य टिप्पणी लिखवाई जा सकती है।
- 'बेगैरत', 'बेहुर्मत', 'स्वार्थी', 'खुदगर्ज' आदि नामों के मुखौटे लगाकर अपनी टिप्पणी को प्रभावशाली बनाने वाली टिप्पणी लिखी जा सकती है।
- हिन्दी ब्लोगिंग में लोग आते अपनी मर्जी से हैं और फिर वहाँ से जाने का मन ही नहीं करता, बस वहीं फँसे रह जाते हैं।
Wednesday, July 28, 2010
क्या करने आयें हिन्दी ब्लोग्स में?
कल चौक में मुहल्ले के कुछ युवा आपस में बतिया रहे थे। हमें पता है कि इन लोगों का अधिकतर समय आर्कुट और फेसबुक में विचरण करते हुए ही व्यतीत होता है। हमने सोचा कि ये लोग रोज नेट में सर्फिंग करते ही हैं तो क्यों ना इन्हें हिन्दी ब्लोग्स के प्रति आकर्षित किया जाये? यही सोचकर हम भी उनकी मण्डली में पहुँच गये। उम्र में बड़े होने के कारण वे सब हमें भैया सम्बोधित करते हैं। उन्होंने सम्मानपूर्वक हमें आसन दे दिया।
हमने पूछा, "तुम लोग सारा दिन नेट पर बैठते हो तो हिन्दी ब्लोग्स में क्यों नहीं आते?"
"दो-चार बार गये तो हैं भैया हिन्दी ब्लोग्स में, पर हमें कुछ जँचा नहीं।" महेन्द्र ने हमारे प्रश्न का उत्तर दिया।
हमने फिर पूछा, "क्या नहीं जँचा?"
इस पर कृष्ण कुमार ने कहा, "अब आप ही बताइये भैया क्या करने जायें हम हिन्दी ब्लोग्स में? यह जानने के लिये कि कहाँ पर बस और ट्रक की भिड़ंत हो गई है और कितने लोग मर गये हैं या घायल हो गये हैं? या यह जानने के लिये कि कहाँ पर खिलाड़ियों का कोटा कितना हो गया है? जिन बातों को हम दिन में पच्चीस बार टीव्ही में देख चुके होते हैं उन्हों को हिन्दी ब्लोग्स में फिर से पढ़ने आयें क्या?"
कृष्ण कुमार की बात पूरी होते ना होते पिंटू बोल उठा, "या यह पढ़ने के लिये कि कोई ब्लोगर यात्रा कर रहा था तो उसके कपड़े चोरी हो गये? कब और कहाँ पर कितने ब्लोगर आपस में मिले? ब्लोगर मीट में नाश्ते में परोसे गये समोसे कुरकुरे और स्वादिष्ट थे? गाय-भैंस, कुत्ते- बिल्ली के पिल्लों आदि के चित्र देखने आयें क्या?"
महेन्द्र ने बताया, "एक ब्लोग में मैं गया था तो उसमें इतनी जोरदार फिलॉसफी थी कि सिर से ऊपर ही ऊपर से गुजर गई। एक दो पैरा पढ़ने के बाद आगे पढ़ना दुश्वार हो गया।"
किसी ने कहा, "हमें क्या पड़ी है कि किसका जन्मदिन कब है जानने की? और किसने अपना जन्मदिन कैसे मनाया इससे भी हमें क्या मतलब है?"
एक और ने कहा, "भैया, मैं प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर रहा हूँ और ये किशन फलाँ विषय में शोधकार्य कर रहा है। आप बताइये कि क्या हेल्प मिल सकता है हमें हिन्दी ब्लोग्स से?"
एक दक्षिण भारतीय युवक भी था वहाँ पर। उसने कहा, "भैया, मैं कामचलाऊ हिन्दी बोल जरूर लेता हूँ पर मुझे ठीक से हिन्दी नहीं आती। मैं हिन्दी सीखना चाहता हूँ। आप मुझे ऐसा ब्लोग बतायें जहाँ जाकर मैं हिन्दी सीख सकूँ!"
अब हम क्या कह सकते थे? वहाँ से खिसक लेने में ही हमने अपनी भलाई समझी और चुपचाप खिसक आये।
हमने पूछा, "तुम लोग सारा दिन नेट पर बैठते हो तो हिन्दी ब्लोग्स में क्यों नहीं आते?"
"दो-चार बार गये तो हैं भैया हिन्दी ब्लोग्स में, पर हमें कुछ जँचा नहीं।" महेन्द्र ने हमारे प्रश्न का उत्तर दिया।
हमने फिर पूछा, "क्या नहीं जँचा?"
इस पर कृष्ण कुमार ने कहा, "अब आप ही बताइये भैया क्या करने जायें हम हिन्दी ब्लोग्स में? यह जानने के लिये कि कहाँ पर बस और ट्रक की भिड़ंत हो गई है और कितने लोग मर गये हैं या घायल हो गये हैं? या यह जानने के लिये कि कहाँ पर खिलाड़ियों का कोटा कितना हो गया है? जिन बातों को हम दिन में पच्चीस बार टीव्ही में देख चुके होते हैं उन्हों को हिन्दी ब्लोग्स में फिर से पढ़ने आयें क्या?"
कृष्ण कुमार की बात पूरी होते ना होते पिंटू बोल उठा, "या यह पढ़ने के लिये कि कोई ब्लोगर यात्रा कर रहा था तो उसके कपड़े चोरी हो गये? कब और कहाँ पर कितने ब्लोगर आपस में मिले? ब्लोगर मीट में नाश्ते में परोसे गये समोसे कुरकुरे और स्वादिष्ट थे? गाय-भैंस, कुत्ते- बिल्ली के पिल्लों आदि के चित्र देखने आयें क्या?"
महेन्द्र ने बताया, "एक ब्लोग में मैं गया था तो उसमें इतनी जोरदार फिलॉसफी थी कि सिर से ऊपर ही ऊपर से गुजर गई। एक दो पैरा पढ़ने के बाद आगे पढ़ना दुश्वार हो गया।"
किसी ने कहा, "हमें क्या पड़ी है कि किसका जन्मदिन कब है जानने की? और किसने अपना जन्मदिन कैसे मनाया इससे भी हमें क्या मतलब है?"
एक और ने कहा, "भैया, मैं प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर रहा हूँ और ये किशन फलाँ विषय में शोधकार्य कर रहा है। आप बताइये कि क्या हेल्प मिल सकता है हमें हिन्दी ब्लोग्स से?"
एक दक्षिण भारतीय युवक भी था वहाँ पर। उसने कहा, "भैया, मैं कामचलाऊ हिन्दी बोल जरूर लेता हूँ पर मुझे ठीक से हिन्दी नहीं आती। मैं हिन्दी सीखना चाहता हूँ। आप मुझे ऐसा ब्लोग बतायें जहाँ जाकर मैं हिन्दी सीख सकूँ!"
अब हम क्या कह सकते थे? वहाँ से खिसक लेने में ही हमने अपनी भलाई समझी और चुपचाप खिसक आये।
Monday, July 12, 2010
बड़ी बुरी लत है ब्लोगिंग की
जबसे ब्लोगिंग की लत लगी है हमको, हमेशा परेशान रहते हैं। ना दिन में चैन और ना रात में नींद। दिमाग रूपी आकाश में ब्लोग, ब्लोगर, पोस्ट, टिप्पणियाँ रूपी मेघ ही घुमड़ते रहते हैं। परेशान रहा करते हैं कि आज तो ले-दे के पोस्ट लिख लिया है हमने पर कल क्या लिखेंगे? कई बार मन में आता है कि कल से हर रोज लिखना बंद। निश्चय कर लेते हैं कि आज के बाद से अब सप्ताह में सिर्फ एक या दो पोस्ट लिखेंगे पर ज्योंही आज बीतता है और कल आता है कि कुलबुलाहट शुरू हो जाती है। तर्जनी, मध्यमा, अनामिका, कनिष्ठा और अंगुष्ठ याने कि सारी की सारी उँगलियाँ रह-रह कर कम्प्यूटर के कीबोर्ड की ओर जाने लगती हैं। जब तक एक पोस्ट ना लिख लें, चैन ही नहीं पड़ता। पर रोज-रोज आखिर लिखें तो लिखें भी क्या? इसलिये कई बार कुछ भी नहीं सूझता तो चौथी-पाँचवी कक्षा में पढ़े दोहों को ही याद करके पोस्ट कर देते हैं जैसे किः
ब्लोगर को ना सताइये ....
देखा ना? 'निर्बल' लिखते-लिखते 'ब्लोगर' लिख मारे। हमेशा दिमाग में ब्लोग, ब्लोगर आदि चलता रहे तो यही तो होगा आखिर। अच्छा हुआ कि अपनी गलती ध्यान में आ गई और सुधार लिया किः
निर्बल को न सताइये जाकी मोटी हाय।
मुये चाम की साँस से लौह भस्म होइ जाय॥
यदि निर्बल के स्थान पर ब्लोगर पोस्ट हो गया होता तो सारे के सारे ब्लोगर हम पर चढ़ बैठते कि सर्वशक्तिमान ब्लोगर को हमने निर्बल कैसे बना दिया।
उधर श्रीमती जी अलग मुँह फुलाये रहती हैं कि हम घर का कोई काम-काज ही नहीं करते, यहाँ तक कि साग-सब्जी तक लेने नहीं जाते। हमेशा बड़बड़ाती रहती हैं आग लगे इनके कम्प्यूटर में ...। पर ब्लोगिंग के लत ने हमें इतना बेशर्म बना दिया है कि उनकी बड़बड़ाहट का हम पर कुछ भी असर नहीं होता, बड़बड़ाती रहें वो अपनी बला से।
ऐसा भी नहीं हो पाता कि पोस्ट लिख लेने के बाद हम घर के काम-धाम में जुट जायें क्योंकि हर दो-तीन या पाँच मिनट में:
अंदाज अपना आईने में देखते हैं वो
और ये भी देखते हैं कोई देखता ना हो
के तर्ज में पर देखना रहता है कि टिप्पणी आई कि नहीं, और आई तो कितनी टिप्पणियाँ आई हैं? और इस जुनून में हम कम्प्यूटर से चिपके ही रहते हैं। टिप्पणियाँ आती हैं तो मन विभोर हो जाता है, हम आत्म-मुग्ध हो जाते हैं और पत्नी जी के गुस्से के साथ ही साथ दुनिया-जहान के सारे दुख-तकलीफों से होने वाली कुढ़न से कहीं बहुत दूर पहुँच जाते हैं, भीतर ही भीतर वैसा ही कुछ होने लगता है जैसे कि तीन पैग पेट के भीतर चले जाने पर होता है।
और यदि एक भी टिप्पणी ना मिले तो....
हम तो मनाते हैं कि भगवान ना करे कि ऐसी स्थिति आये किन्तु "आसमां पे है खुदा और जमीं पे हम"। आसमां वाला जमीं वाले की सुनता कहाँ है और प्रायः एक भी टिप्पणी ना मिलने वाली स्थिति आती ही रहती है। टिप्पणियाँ ना मिलने पर मन मायूस हो जाता है। खुद से कहने लगते हैं - 'तुफ है तुझपर जो एक ऐसा पोस्ट नहीं लिख सकता जिसमें टिप्पणियाँ आयें, अपने आप को बहुत भारी ब्लोगर समझता है। अब पता चला तुझे तेरी औकात! डूब के मर जा चुल्लू भर पानी में।'
पर अपने आप को आखिर धिक्कारा भी कब तक जा सकता है इसलिये यही सोचकर तसल्ली दे लेते हैं अपने आपको कि लोगों में इतनी अकल नहीं है जो हम जैसे महान ब्लोगर के पोस्ट को समझ पायें। जब पोस्ट को समझेंगे ही नहीं तो भला टिप्पणी कहाँ से करेंगे?
तो भैया, कहाँ तक बुराइयाँ गिनायें ब्लोगिंग की, बस इतना ही कह सकते हैं कि ब्लोगिंग की लत बड़ी बुरी होती है।
ब्लोगर को ना सताइये ....
देखा ना? 'निर्बल' लिखते-लिखते 'ब्लोगर' लिख मारे। हमेशा दिमाग में ब्लोग, ब्लोगर आदि चलता रहे तो यही तो होगा आखिर। अच्छा हुआ कि अपनी गलती ध्यान में आ गई और सुधार लिया किः
निर्बल को न सताइये जाकी मोटी हाय।
मुये चाम की साँस से लौह भस्म होइ जाय॥
यदि निर्बल के स्थान पर ब्लोगर पोस्ट हो गया होता तो सारे के सारे ब्लोगर हम पर चढ़ बैठते कि सर्वशक्तिमान ब्लोगर को हमने निर्बल कैसे बना दिया।
उधर श्रीमती जी अलग मुँह फुलाये रहती हैं कि हम घर का कोई काम-काज ही नहीं करते, यहाँ तक कि साग-सब्जी तक लेने नहीं जाते। हमेशा बड़बड़ाती रहती हैं आग लगे इनके कम्प्यूटर में ...। पर ब्लोगिंग के लत ने हमें इतना बेशर्म बना दिया है कि उनकी बड़बड़ाहट का हम पर कुछ भी असर नहीं होता, बड़बड़ाती रहें वो अपनी बला से।
ऐसा भी नहीं हो पाता कि पोस्ट लिख लेने के बाद हम घर के काम-धाम में जुट जायें क्योंकि हर दो-तीन या पाँच मिनट में:
अंदाज अपना आईने में देखते हैं वो
और ये भी देखते हैं कोई देखता ना हो
के तर्ज में पर देखना रहता है कि टिप्पणी आई कि नहीं, और आई तो कितनी टिप्पणियाँ आई हैं? और इस जुनून में हम कम्प्यूटर से चिपके ही रहते हैं। टिप्पणियाँ आती हैं तो मन विभोर हो जाता है, हम आत्म-मुग्ध हो जाते हैं और पत्नी जी के गुस्से के साथ ही साथ दुनिया-जहान के सारे दुख-तकलीफों से होने वाली कुढ़न से कहीं बहुत दूर पहुँच जाते हैं, भीतर ही भीतर वैसा ही कुछ होने लगता है जैसे कि तीन पैग पेट के भीतर चले जाने पर होता है।
और यदि एक भी टिप्पणी ना मिले तो....
हम तो मनाते हैं कि भगवान ना करे कि ऐसी स्थिति आये किन्तु "आसमां पे है खुदा और जमीं पे हम"। आसमां वाला जमीं वाले की सुनता कहाँ है और प्रायः एक भी टिप्पणी ना मिलने वाली स्थिति आती ही रहती है। टिप्पणियाँ ना मिलने पर मन मायूस हो जाता है। खुद से कहने लगते हैं - 'तुफ है तुझपर जो एक ऐसा पोस्ट नहीं लिख सकता जिसमें टिप्पणियाँ आयें, अपने आप को बहुत भारी ब्लोगर समझता है। अब पता चला तुझे तेरी औकात! डूब के मर जा चुल्लू भर पानी में।'
पर अपने आप को आखिर धिक्कारा भी कब तक जा सकता है इसलिये यही सोचकर तसल्ली दे लेते हैं अपने आपको कि लोगों में इतनी अकल नहीं है जो हम जैसे महान ब्लोगर के पोस्ट को समझ पायें। जब पोस्ट को समझेंगे ही नहीं तो भला टिप्पणी कहाँ से करेंगे?
तो भैया, कहाँ तक बुराइयाँ गिनायें ब्लोगिंग की, बस इतना ही कह सकते हैं कि ब्लोगिंग की लत बड़ी बुरी होती है।
Thursday, July 1, 2010
एडमाया - हिन्दी ब्लोगिंग से कमाई का नया साधन!
गूगल एडसेंस की तर्ज पर ऑनलाइन विज्ञापन करने वाली एक नई भारतीय कंपनी आई है एडमाया!
पूर्व में गूगल एडसेंस के विज्ञापन हिन्दी भाषा वाली साइट्स में दिखाये जाते थे किन्तु नवंबर 2007 से गूगल ने हिन्दी साइट्स में अपने विज्ञापन दिखाने बंद कर दिये क्योंकि हिन्दी उनकी अधिकृत भाषा की सूची में नहीं है। ऐसे में एडसेंस की ही तर्ज पर विज्ञापन दिखाने वाली नई कंपनी एडमाया का आना हिन्दी ब्लोगर्स के लिये स्वागतेय है। एडमाया विशेष तौर पर हिन्दी साइट्स के लिये ही है और हिन्दी के ब्लोग्स में अपने विज्ञापन दिखाती है। एडमाया के विज्ञापन "प्रति क्लिक भुगतान" विज्ञापन होते हैं याने कि किसी ने आपके ब्लोग पर एडमाया के विज्ञापन पर क्लिक किया और आपकी कमाई हुई!
एडमाया में अपना पंजीकरण (registration) करना बहुत ही आसान है। बस यहाँ क्लिक करके एडमाया के रजिस्ट्रेशन फॉर्म को भर दीजिये और लगभग चौबीस घंटे प्रतीक्षा कीजिये स्वीकृति मेल आने का। स्वीकृति मेल आने के बाद एडमाया में लागिन करके विज्ञापन का कोड प्राप्त करके अपने ब्लोग में उसे लगा दीजिये। बस इतना ही तो आपको करना है।
एडमाया से फिलहाल बहुत अधिक कमाई की उम्मीद तो नहीं की जा सकती क्योंकि एक तो अभी यह कंपनी एकदम नई है और इन्हें अभी सीमित संख्या में ही विज्ञापन मिला हुआ है, और दूसरे हिन्दी ब्लोग्स के पास पाठकों की कमी भी है। फिर भी कुछ भी कमाई ना होने से कुछ तो कमाई के होने को तो बेहतर ही माना जायेगा कहा भी गया है; "नहीं मामा से काना मामा अच्छा"!
और हाँ, इस बात का अवश्य ही ध्यान रखें कि एडमाया के विज्ञापन को लगाने के बाद न तो स्वयं ही अपने विज्ञापनों पर क्लिक करना है और न ही अपने परिजनों, मित्रों या परिचितों से क्लिक करवाना है। ऐसा करना वास्तव में धोखा देना है और आपके इस धोखे की पोल देर-सबेर खुल ही जाना है जो कि सोने की अंडा देने वाली मुर्गी को एक बार में ही मार डालना सिद्ध होगा।
आप एडमाया में विज्ञापनदाता के रूप में भी पंजीकरण करवा के अपने ब्लोग का विज्ञापन भी रु. के न्यूनतम दर पर कर सकते हैं!
पूर्व में गूगल एडसेंस के विज्ञापन हिन्दी भाषा वाली साइट्स में दिखाये जाते थे किन्तु नवंबर 2007 से गूगल ने हिन्दी साइट्स में अपने विज्ञापन दिखाने बंद कर दिये क्योंकि हिन्दी उनकी अधिकृत भाषा की सूची में नहीं है। ऐसे में एडसेंस की ही तर्ज पर विज्ञापन दिखाने वाली नई कंपनी एडमाया का आना हिन्दी ब्लोगर्स के लिये स्वागतेय है। एडमाया विशेष तौर पर हिन्दी साइट्स के लिये ही है और हिन्दी के ब्लोग्स में अपने विज्ञापन दिखाती है। एडमाया के विज्ञापन "प्रति क्लिक भुगतान" विज्ञापन होते हैं याने कि किसी ने आपके ब्लोग पर एडमाया के विज्ञापन पर क्लिक किया और आपकी कमाई हुई!
एडमाया में अपना पंजीकरण (registration) करना बहुत ही आसान है। बस यहाँ क्लिक करके एडमाया के रजिस्ट्रेशन फॉर्म को भर दीजिये और लगभग चौबीस घंटे प्रतीक्षा कीजिये स्वीकृति मेल आने का। स्वीकृति मेल आने के बाद एडमाया में लागिन करके विज्ञापन का कोड प्राप्त करके अपने ब्लोग में उसे लगा दीजिये। बस इतना ही तो आपको करना है।
एडमाया से फिलहाल बहुत अधिक कमाई की उम्मीद तो नहीं की जा सकती क्योंकि एक तो अभी यह कंपनी एकदम नई है और इन्हें अभी सीमित संख्या में ही विज्ञापन मिला हुआ है, और दूसरे हिन्दी ब्लोग्स के पास पाठकों की कमी भी है। फिर भी कुछ भी कमाई ना होने से कुछ तो कमाई के होने को तो बेहतर ही माना जायेगा कहा भी गया है; "नहीं मामा से काना मामा अच्छा"!
और हाँ, इस बात का अवश्य ही ध्यान रखें कि एडमाया के विज्ञापन को लगाने के बाद न तो स्वयं ही अपने विज्ञापनों पर क्लिक करना है और न ही अपने परिजनों, मित्रों या परिचितों से क्लिक करवाना है। ऐसा करना वास्तव में धोखा देना है और आपके इस धोखे की पोल देर-सबेर खुल ही जाना है जो कि सोने की अंडा देने वाली मुर्गी को एक बार में ही मार डालना सिद्ध होगा।
आप एडमाया में विज्ञापनदाता के रूप में भी पंजीकरण करवा के अपने ब्लोग का विज्ञापन भी रु. के न्यूनतम दर पर कर सकते हैं!
Monday, June 21, 2010
जरूरी थोड़े ही है कि हर कोई मुझे पढ़े
मैं लिखता हूँ क्योंकि मेरा ब्लोग है। अब जब लिखता हूँ तो मेरी अपेक्षा भी यही रहती है कि अधिक से अधिक लोग मुझे पढ़ें। पर क्या यह जरूरी है कि हर कोई मुझे पढ़े? मेरे विचार से तो यह बिल्कुल ही जरूरी नहीं है क्योंकि मैं लिखता हूँ अपनी रुचियों और विचारों के आधार पर; और दूसरों को पढ़ता भी हूँ अपनी उन्हीं रुचियों और विचारों को ध्यान में रखकर। राजनीति, क्रिकेट जैसे विषय आजकल के अत्यन्त लोकप्रिय विषय हैं किन्तु मुझमें इन विषयों के प्रति किंचित मात्र भी रुचि नहीं है अतः मैं इन विषयों पर लिखी गई सामग्री को चाहकर भी नहीं पढ़ पाता। इसी प्रकार से मेरे पोस्ट में जो कुछ भी लिखा जाता है उन पर प्रायः अतीत का प्रभाव और महत्व ही अधिक होता है। शायद मेरी आयु का अधिक हो जाना ही इसका कारण हो। यह स्वाभाविक बात है कि वृद्धजन प्रायः अतीत में ही जीते हैं। अस्तु, जो लोग वर्तमान में जीने के आदी हैं और जिनके लिये अतीत का कुछ विशेष महत्व ही नहीं है, वे भला मेरे पोस्ट को क्योंकर पढ़ सकेंगे?
अनेक विद्वानों ने ब्लोग की अलग-परिभाषाएँ दी हैं। हिन्दी ब्लोगजगत में जो कुछ भी चल रहा है उससे तो लगता है कि "तुम मुझे पढ़ो, मैं तुम्हें पढ़ूँ और तुम मुझे टिप्पणी दो, मैं तुम्हें टिप्पणी दूँ" ही ब्लोग की परिभाषा बन कर रह गई है। पर मेरी तुच्छ बुद्धि के अनुसार तो ब्लोग जानकारी के आदान-प्रदान का माध्यम है। मैं यही मानता हूँ कि अच्छी तथा ज्ञानवर्धक जानकारी से अवगत करा कर भाषा, समाज, देश और अधिक से अधिक लोगों का कल्याण करते हुए स्वयं का भी हित साध लेना ही ब्लोगिंग का उद्देश्य होना चाहिये।
मुझे इस बात का दुःख नहीं होता कि फलाँ ने मेरे पोस्ट को क्यों नहीं पढ़ा और अपनी टिप्पणी क्यों नहीं दी; बल्कि मुझे तो खुशी इस बात की होती है कि कुछ समय पहले मुझे केवल 40-50 लोग ही पढ़ते थे पर अब मेरे लिखे को लगभग 150 लोग पढ़ते हैं।
अनेक विद्वानों ने ब्लोग की अलग-परिभाषाएँ दी हैं। हिन्दी ब्लोगजगत में जो कुछ भी चल रहा है उससे तो लगता है कि "तुम मुझे पढ़ो, मैं तुम्हें पढ़ूँ और तुम मुझे टिप्पणी दो, मैं तुम्हें टिप्पणी दूँ" ही ब्लोग की परिभाषा बन कर रह गई है। पर मेरी तुच्छ बुद्धि के अनुसार तो ब्लोग जानकारी के आदान-प्रदान का माध्यम है। मैं यही मानता हूँ कि अच्छी तथा ज्ञानवर्धक जानकारी से अवगत करा कर भाषा, समाज, देश और अधिक से अधिक लोगों का कल्याण करते हुए स्वयं का भी हित साध लेना ही ब्लोगिंग का उद्देश्य होना चाहिये।
मुझे इस बात का दुःख नहीं होता कि फलाँ ने मेरे पोस्ट को क्यों नहीं पढ़ा और अपनी टिप्पणी क्यों नहीं दी; बल्कि मुझे तो खुशी इस बात की होती है कि कुछ समय पहले मुझे केवल 40-50 लोग ही पढ़ते थे पर अब मेरे लिखे को लगभग 150 लोग पढ़ते हैं।
Saturday, May 29, 2010
थोड़ा अध्ययन, थोड़ा अनुभव और थोड़ी कल्पनाशीलता ... और क्या चाहिये पोस्ट लिखने के लिये?
बड़े जोश और उत्साह के साथ लोग आ रहे हैं ब्लोगिंग के क्षेत्र में। जब कोई अपना ब्लोग बना लेता है उसे कुछ कुछ अन्तराल में अपडेट भी करना होता है जिसके लिये सामग्री (content) की जरूरत होती है याने कि पोस्ट लिखनी पड़ती है।
अंग्रेजी ब्लोगिंग में तो ये पोस्ट लिखना एक भारी समस्या बनकर रह गई है। विषय आधारित ब्लोग्स हैं वहाँ पर और प्रत्येक विषय में लाखों करोड़ों-पोस्ट पोस्ट पहले से ही लिखे जा चुके हैं। वहाँ का आलम तो यह है कि मशीनी लेखन किया जा रहा है। ऐसे ऐसे सॉफ्टवेयर्स बन गये हैं जो कि किसी भी अच्छे पोस्ट के आशय को ज्यों का त्यों रखते हुए उसकी भाषा को बदल देते हैं और पुराना लेख नया लगने लगता है। अंग्रेजी ब्लोग में कमाई होने के कारण लेख और बने बनाये ब्लोग्स की खरीदी-बिक्री हो रही है वहाँ पर। शायद आपको पता हो कि तीन डालर से लेकर पच्चीस डालर तक एक लेख की कीमत है वहाँ पर, लेख की जैसी गुणवत्ता, वैसी ही कीमत!
अस्तु, बात हो रही थी अपने ब्लोग को अपडेट करने की, प्रसंगवश बात जरा दूसरी दिशा में मुड़ गई थी। शुरू-शुरू में लगने लगता है कि रोज-रोज आखिर लिखने के लिये हमेशा कुछ नया कहाँ से लायें? किन्तु वास्तव में देखा जाये तो यह कोई बड़ी समस्या नहीं है। आपका अध्ययन, आपका अनुभव और आपकी कल्पनाशीलता आपको पूरी-पूरी क्षमता प्रदान करती है लेखन की। बस एक बार लिखना शुरू कीजिये और देखिये कि कितना अच्छा लिख लेते हैं आप। गहन अध्ययन है आपका इसलिये लिखने के लिये विषय की कमी नहीं है आपके पास। आप बहुत सी ऐसी बातें जानते हैं जिन्हें शायद दूसरे लोग नहीं जानते। तो अपनी जानकारी को अपने पोस्ट के जरिये दूसरों तक पहुँचाइये ना! आपका ब्लोग अपडेट होता रहेगा और लोगों की जानकारी भी बढ़ती रहेगी। और फिर जितना अधिक आप लिखेंगे उतना ही अधिक आपका आत्मविश्वास भी बढ़ता चला जायेगा।
विश्वास मानिये कि अच्छे-अच्छे विषयों पर लिखे गये आपके पोस्ट हिन्दी को इंटरनेट के आकाश में एक नई ऊँचाई तक पहुचा देंगे।
अंग्रेजी ब्लोगिंग में तो ये पोस्ट लिखना एक भारी समस्या बनकर रह गई है। विषय आधारित ब्लोग्स हैं वहाँ पर और प्रत्येक विषय में लाखों करोड़ों-पोस्ट पोस्ट पहले से ही लिखे जा चुके हैं। वहाँ का आलम तो यह है कि मशीनी लेखन किया जा रहा है। ऐसे ऐसे सॉफ्टवेयर्स बन गये हैं जो कि किसी भी अच्छे पोस्ट के आशय को ज्यों का त्यों रखते हुए उसकी भाषा को बदल देते हैं और पुराना लेख नया लगने लगता है। अंग्रेजी ब्लोग में कमाई होने के कारण लेख और बने बनाये ब्लोग्स की खरीदी-बिक्री हो रही है वहाँ पर। शायद आपको पता हो कि तीन डालर से लेकर पच्चीस डालर तक एक लेख की कीमत है वहाँ पर, लेख की जैसी गुणवत्ता, वैसी ही कीमत!
अस्तु, बात हो रही थी अपने ब्लोग को अपडेट करने की, प्रसंगवश बात जरा दूसरी दिशा में मुड़ गई थी। शुरू-शुरू में लगने लगता है कि रोज-रोज आखिर लिखने के लिये हमेशा कुछ नया कहाँ से लायें? किन्तु वास्तव में देखा जाये तो यह कोई बड़ी समस्या नहीं है। आपका अध्ययन, आपका अनुभव और आपकी कल्पनाशीलता आपको पूरी-पूरी क्षमता प्रदान करती है लेखन की। बस एक बार लिखना शुरू कीजिये और देखिये कि कितना अच्छा लिख लेते हैं आप। गहन अध्ययन है आपका इसलिये लिखने के लिये विषय की कमी नहीं है आपके पास। आप बहुत सी ऐसी बातें जानते हैं जिन्हें शायद दूसरे लोग नहीं जानते। तो अपनी जानकारी को अपने पोस्ट के जरिये दूसरों तक पहुँचाइये ना! आपका ब्लोग अपडेट होता रहेगा और लोगों की जानकारी भी बढ़ती रहेगी। और फिर जितना अधिक आप लिखेंगे उतना ही अधिक आपका आत्मविश्वास भी बढ़ता चला जायेगा।
विश्वास मानिये कि अच्छे-अच्छे विषयों पर लिखे गये आपके पोस्ट हिन्दी को इंटरनेट के आकाश में एक नई ऊँचाई तक पहुचा देंगे।
Tuesday, May 4, 2010
नापसन्द बटन याने कि बन्दर के हाथ में उस्तरा
कितना लिखें इस नापसन्द के बारे में? अब तो इस विषय में लिखने के लिये हमारी लेखनी भी सकुचाती है। वैसे भी नापसन्द के विषय में बहुत से लोगों के विचार पोस्ट और टिप्पणियों के माध्यम से आ ही चुके हैं। इतना होने के बावजूद भी हमें इस विषय में लिखना ही पड़ रहा है क्योंकि यह नापसन्द बटन कुछ विघ्नसन्तोषियों के लिये वरदान सिद्ध हो रहा है।
भले ही ब्लोगवाणी ने नापसन्द बटन को इसके सदुपयोग के लिये बनाया होगा किन्तु इस बटन का सदुपयोग तो आज तक कहीं नजर नहीं आया, दिखाई देता है तो सिर्फ इसके दुरुपयोग ही दुरुपयोग। डॉ. श्रीमती अजित गुप्ता, पं.डी.के.शर्मा"वत्स", प्रशान्त प्रियदर्शी जैसे और भी कई अन्य ब्लोगर्स, जो बगैर किसी के निन्दाचारी किये सामान्य पोस्टें लिखते हैं, के पोस्टों पर भी नापसन्द के चटके लग चुके हैं। और तो और ब्लोगर्स के जन्मदिन दर्शाने वाले ब्लोग पर प्रायः ही नापसन्द का चटका पाया जाता है, पता नहीं किन लोगों को ब्लोगर्स के जन्मदिन भी नापसन्द हैं?
कल तो हमारा पोस्ट "क्या आपने कभी आलू, प्याज, टमाटर के विज्ञापन देखे हैं?" ब्लोगवाणी में प्रकाशित होते ही फटाफट दो नापसन्द के चटके लग गये उस पर जबकि हमने उस पोस्ट में ऐसी कोई बात नहीं लिखी थी जिसे कोई भला आदमी नापसन्द कर पाये। ऐसा लगा हमें कि ये नापसन्दीलाल लोग इन्तिजार करते हुए बैठे थे कि कब हमारा पोस्ट प्रकाशित हो और हम उस पर नापसन्द का चटका लगायें। वैसे इन लोगों के नापसन्द करने से हमें कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि हम तो नापसन्द के इन चटकों से निरुत्साहित होने से रहे, उलटे हम और उत्साहित हो कर दस बीस और पोस्ट लिख दें और कहें कि करो नापसन्द जितना कर सकते हो। तुम जितना नापसन्द करोगे उससे दुगुना हम पोस्ट लिख देंगे।
हमारे विचार से तो कुल मिला कर यही कहा जा सकता है कि खुन्नस रखने वालों के लिये नापसन्द का यह बटन "बन्दर के हाथों उस्तरा" ही साबित हो रहा है।
भले ही ब्लोगवाणी ने नापसन्द बटन को इसके सदुपयोग के लिये बनाया होगा किन्तु इस बटन का सदुपयोग तो आज तक कहीं नजर नहीं आया, दिखाई देता है तो सिर्फ इसके दुरुपयोग ही दुरुपयोग। डॉ. श्रीमती अजित गुप्ता, पं.डी.के.शर्मा"वत्स", प्रशान्त प्रियदर्शी जैसे और भी कई अन्य ब्लोगर्स, जो बगैर किसी के निन्दाचारी किये सामान्य पोस्टें लिखते हैं, के पोस्टों पर भी नापसन्द के चटके लग चुके हैं। और तो और ब्लोगर्स के जन्मदिन दर्शाने वाले ब्लोग पर प्रायः ही नापसन्द का चटका पाया जाता है, पता नहीं किन लोगों को ब्लोगर्स के जन्मदिन भी नापसन्द हैं?
कल तो हमारा पोस्ट "क्या आपने कभी आलू, प्याज, टमाटर के विज्ञापन देखे हैं?" ब्लोगवाणी में प्रकाशित होते ही फटाफट दो नापसन्द के चटके लग गये उस पर जबकि हमने उस पोस्ट में ऐसी कोई बात नहीं लिखी थी जिसे कोई भला आदमी नापसन्द कर पाये। ऐसा लगा हमें कि ये नापसन्दीलाल लोग इन्तिजार करते हुए बैठे थे कि कब हमारा पोस्ट प्रकाशित हो और हम उस पर नापसन्द का चटका लगायें। वैसे इन लोगों के नापसन्द करने से हमें कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि हम तो नापसन्द के इन चटकों से निरुत्साहित होने से रहे, उलटे हम और उत्साहित हो कर दस बीस और पोस्ट लिख दें और कहें कि करो नापसन्द जितना कर सकते हो। तुम जितना नापसन्द करोगे उससे दुगुना हम पोस्ट लिख देंगे।
हमारे विचार से तो कुल मिला कर यही कहा जा सकता है कि खुन्नस रखने वालों के लिये नापसन्द का यह बटन "बन्दर के हाथों उस्तरा" ही साबित हो रहा है।
Wednesday, March 10, 2010
डॉक्टर हैं पर क्यों दे अपने ब्लोग में डॉक्टरी जानकारी? ... बेवकूफ समझ रखा है हमें?
"यार, ठीक है कि तुम अपने ब्लोग में अपनी कविताएँ लिखते हो। पर तुम चिकित्सक भी हो। क्यों नहीं चिकित्सा सम्बन्धी जानकारी वाला अपना एक और ब्लोग बना लेते?"
"तुम तो जानते हो यार, कितना बिजी रहता हूँ मैं। पेशेन्ट्स से हमेशा घिरा रहता हूँ। कई बार तो खाना-पीना, यहाँ तक कि नींद-चैन भी, हराम हो जाती है अपने इस पेशे के कारण। ऐसे में बड़ी मुश्किल से समय निकाल कर कविता लिखता हूँ और अपने पोस्ट में प्रकाशित भी करता हूँ। अब समय कहाँ है मेरे पास दूसरा ब्लोग बनाने के लिये। और मानलो मैं अपना दूसरा ब्लोग बनाकर उसमें बताऊँ कि इथिकल क्या होता है, जेनरिक क्या होता है तो भला उसे कौन समझेगा?"
"अरे भाई, यदि तुम अच्छे से समझाओगे तो कोई क्यों नहीं समझेगा?"
"तुम तो बस बाल की खाल निकालने बैठ जाते हो। अरे भाई, अगर मैं लोगों को बता दूँ कि मैं उन्हें तीन-तीन, चार-चार सौ रुपये कीमत वाली जो इथिकल दवाइयाँ प्रेस्क्राइब करता हूँ उसके बदले में वह यदि मात्र दो-तीन रुपये वाली जेनरिक दवा खा ले तो भी ठीक हो जायेगा तो मेरे रेपुटेशन का क्या होगा? इथिकल कंपनी के जो एमआर मेरे पास आते हैं और हर साल मुझे नई कार दे जाते हैं वो क्या ऐसे में मेरे पास आयेंगे? ये जो मैं हर साल कार, टीव्ही, फ्रिज बदल लेता हूँ ये सब उन्हीं की मेहरबानी से तो है। अब मैं अपने ब्लोग में इथिकल के बदले जेनरिक जैसी सस्ती दवाओं से इलाज के बारे में लिखने लगूँगा तो वो सारी इथिकल कंपनियाँ और उनके एमआर खुश होंगे क्या?
"और यदि अपने ब्लोग में लोगों को बताऊँ कि एक्झर्शन के कारण हल्का बुखार है तो एक पैरॉसीटामोल की गोली खा लो, साधारण सा दर्द है तो निमुसुलाइड गोली खा लो तो भला लोग मेरे पास इलाज कराने क्यों आने लगे? वो लोग मेरे पास नहीं आयेंगे तो मैं खून, पेशाब आदि जाँच करवाने के लिये पैथॉलाजिकल लैब किन्हें भेजूँगा? उन सारे लैब से मिलने वाले मेरे कमीशन का क्या होगा?
"तुम तो भैया, हमारा धंधा ही चौपट करवाने पर तुले हो पर हम इतने बेवकूफ नहीं हैं जो तुम्हारा कहना मान लें। इतना खर्च करके डॉक्टर बने हैं तो पैसा पीटने के लिये बने हैं, ब्लोग लिखकर फोकट में जानकारी देने के लिये थोड़े ही बने हैं। इसलिये समझ लो कि हम अपने ब्लोग में सिर्फ कविताएँ ही लिखेंगे।"
"तुम तो जानते हो यार, कितना बिजी रहता हूँ मैं। पेशेन्ट्स से हमेशा घिरा रहता हूँ। कई बार तो खाना-पीना, यहाँ तक कि नींद-चैन भी, हराम हो जाती है अपने इस पेशे के कारण। ऐसे में बड़ी मुश्किल से समय निकाल कर कविता लिखता हूँ और अपने पोस्ट में प्रकाशित भी करता हूँ। अब समय कहाँ है मेरे पास दूसरा ब्लोग बनाने के लिये। और मानलो मैं अपना दूसरा ब्लोग बनाकर उसमें बताऊँ कि इथिकल क्या होता है, जेनरिक क्या होता है तो भला उसे कौन समझेगा?"
"अरे भाई, यदि तुम अच्छे से समझाओगे तो कोई क्यों नहीं समझेगा?"
"तुम तो बस बाल की खाल निकालने बैठ जाते हो। अरे भाई, अगर मैं लोगों को बता दूँ कि मैं उन्हें तीन-तीन, चार-चार सौ रुपये कीमत वाली जो इथिकल दवाइयाँ प्रेस्क्राइब करता हूँ उसके बदले में वह यदि मात्र दो-तीन रुपये वाली जेनरिक दवा खा ले तो भी ठीक हो जायेगा तो मेरे रेपुटेशन का क्या होगा? इथिकल कंपनी के जो एमआर मेरे पास आते हैं और हर साल मुझे नई कार दे जाते हैं वो क्या ऐसे में मेरे पास आयेंगे? ये जो मैं हर साल कार, टीव्ही, फ्रिज बदल लेता हूँ ये सब उन्हीं की मेहरबानी से तो है। अब मैं अपने ब्लोग में इथिकल के बदले जेनरिक जैसी सस्ती दवाओं से इलाज के बारे में लिखने लगूँगा तो वो सारी इथिकल कंपनियाँ और उनके एमआर खुश होंगे क्या?
"और यदि अपने ब्लोग में लोगों को बताऊँ कि एक्झर्शन के कारण हल्का बुखार है तो एक पैरॉसीटामोल की गोली खा लो, साधारण सा दर्द है तो निमुसुलाइड गोली खा लो तो भला लोग मेरे पास इलाज कराने क्यों आने लगे? वो लोग मेरे पास नहीं आयेंगे तो मैं खून, पेशाब आदि जाँच करवाने के लिये पैथॉलाजिकल लैब किन्हें भेजूँगा? उन सारे लैब से मिलने वाले मेरे कमीशन का क्या होगा?
"तुम तो भैया, हमारा धंधा ही चौपट करवाने पर तुले हो पर हम इतने बेवकूफ नहीं हैं जो तुम्हारा कहना मान लें। इतना खर्च करके डॉक्टर बने हैं तो पैसा पीटने के लिये बने हैं, ब्लोग लिखकर फोकट में जानकारी देने के लिये थोड़े ही बने हैं। इसलिये समझ लो कि हम अपने ब्लोग में सिर्फ कविताएँ ही लिखेंगे।"
Wednesday, February 3, 2010
क्या हिन्दी का कम से कम एक ब्लॉग ऐसा नहीं बन सकता जो पूरी दुनिया में धूम मचा दे?
अंग्रेजी के ऐसे अनेक ब्लॉग्स हैं जिनमें संसार भर से प्रतिदिन हजारों से लेकर लाखों की संख्या में लोग आते हैं। किसी एग्रीगेटर से नहीं बल्कि सर्च इंजिन से खोज कर। ऐसे ब्लॉग्स को बुकमार्क करके रखा है लोगों ने ताकि रोज उनमें सिर्फ एक क्लिक से पहुँच सकें।
चन्द्रधर शर्मा 'गुलेरी' जी ने हिन्दी में एक कहानी "उसने कहा था" ऐसी लिखी कि संसार भर में वह लोकप्रिय हो गया। संसार के सभी प्रमुख भाषाओं में उसका अनुवाद पाया जाता है। इससे सिद्ध हो जाता है कि हिन्दी भाषा में संसार भर में धूम मचाने की भरपूर शक्ति है। फिर क्यों आज हिन्दी का एक भी ब्लॉग ऐसा नहीं है जो कि संसार भर में धूम मचा सके? पाठकगण खोज कर उस ब्लॉग में आयें। क्यों नहीं है हिन्दी में ऐसा एक भी ब्लॉग? क्या हिन्दी में भी हम ऐसा नहीं कर सकते?
मित्रों! यह मेरी निराशा नहीं है बल्कि मैं यह पोस्ट आप सभी को प्रोत्साहित करने के लिये लिख रहा हूँ कि आप हिन्दी में कुछ ऐसा लिखें जिसे पढ़ने के लिये पाठक टूट पड़ें। कब तक हम आपस में एक दूसरे को पढ़ते रहेंगे? क्या एक अखबार को सिर्फ दूसरा अखबार वाला ही पढ़ता है? एक पत्रिका को दूसरी पत्रिका वाला ही पढ़ता है? फिर क्यों एक ब्लॉग को दूसरा ब्लॉगर ही पढ़े? जिस प्रकार से अखबार, पत्रिका आदि का महत्व पाठक के बिना नहीं है उसी प्रकार से ब्लोग भी पाठक के बिना महत्वहीन है। मैं जानता हूँ कि आप सभी अपने अपने विषय में माहिर हैं और मुझे विश्वास है कि आप अवश्य ही पाठकों को खींच कर लाने वाली सामग्री प्रस्तुत करेंगे।
चन्द्रधर शर्मा 'गुलेरी' जी ने हिन्दी में एक कहानी "उसने कहा था" ऐसी लिखी कि संसार भर में वह लोकप्रिय हो गया। संसार के सभी प्रमुख भाषाओं में उसका अनुवाद पाया जाता है। इससे सिद्ध हो जाता है कि हिन्दी भाषा में संसार भर में धूम मचाने की भरपूर शक्ति है। फिर क्यों आज हिन्दी का एक भी ब्लॉग ऐसा नहीं है जो कि संसार भर में धूम मचा सके? पाठकगण खोज कर उस ब्लॉग में आयें। क्यों नहीं है हिन्दी में ऐसा एक भी ब्लॉग? क्या हिन्दी में भी हम ऐसा नहीं कर सकते?
मित्रों! यह मेरी निराशा नहीं है बल्कि मैं यह पोस्ट आप सभी को प्रोत्साहित करने के लिये लिख रहा हूँ कि आप हिन्दी में कुछ ऐसा लिखें जिसे पढ़ने के लिये पाठक टूट पड़ें। कब तक हम आपस में एक दूसरे को पढ़ते रहेंगे? क्या एक अखबार को सिर्फ दूसरा अखबार वाला ही पढ़ता है? एक पत्रिका को दूसरी पत्रिका वाला ही पढ़ता है? फिर क्यों एक ब्लॉग को दूसरा ब्लॉगर ही पढ़े? जिस प्रकार से अखबार, पत्रिका आदि का महत्व पाठक के बिना नहीं है उसी प्रकार से ब्लोग भी पाठक के बिना महत्वहीन है। मैं जानता हूँ कि आप सभी अपने अपने विषय में माहिर हैं और मुझे विश्वास है कि आप अवश्य ही पाठकों को खींच कर लाने वाली सामग्री प्रस्तुत करेंगे।
Saturday, January 16, 2010
सर्वाधिक कमाई करने वाले ब्लोग्स
हिन्दी ब्लोग्स से तो फिलहाल कमाई का कुछ अवसर नजर नहीं आ रहा है किन्तु अंग्रेजी तथा अन्य भाषा के ब्लोग्स भरपूर कमाई कर रहे हैं। शायद आपको जानकर आश्चर्य होगा कि सबसे अधिक कमाई करने वाले ब्लोग की मासिक आय $200,000 प्रतिमाह है। प्रस्तुत है सबसे अधिक कमाई करने वाले 30 ब्लोग्स ब्लोग्स का विवरण सहित सूचीः
सौजन्यः http://www.incomediary.com/top-earning-blogs/
यदि अंग्रेजी तथा अन्य भाषाओं के ब्लोग्स से कमाई हो रही है तो हिन्दी के ब्लोग्स से भला कमाई क्यों नहीं हो सकती? यदि हम सभी मिलकर हिन्दी ब्लोग्स में अच्छे कंटेन्ट्स देने और हिन्दी का एक विशाल पाठक वर्ग तैयार करने के लिये ठान लें तो वह दिन दूर नहीं होगा जब कि आप अपने हिन्दी ब्लोग से कमाई कर रहे होंगे।
| Rank | Website | Owner | Monthly Earnings | Main Income |
1 | Techcrunch | Michael Arrington | $200,000 | Advertising Banners |
2 | Mashable | Pete Cashmore | $180,000 | Advertising Banners |
3 | Timothy Sykes | Timothy Sykes | $150,000 | Affiliate Sales |
4 | Perez Hilton | Mario Lavandeira | $140,000 | Advertising Banners |
5 | Gothamist | Jake Dobkin | $80,000 | Pay Per Click |
| 6 | Venture Beat | Matt Marshall | $62,000 | Pay Per Click |
| 7 | Slash Gear | Ewdison Then | $60,000 | Pay Per Click |
| 8 | Life Hacker | Nick Denton | $60,000 | Advertising Banners |
9 | Smashing Magazine | Vitaly Friedman | $58,500 | Advertising Banners |
| 10 | Tuts Plus | Collis Taeed | $55,000 | Advertising Banners |
| 11 | Dooce | Heather B. Armstrong | $50,000 | Pay Per Click |
12 | Steve Pavlina | Steve Pavlina | $45,000 | Pay Per Click |
13 | TPM | Josh Marshall | $45,000 | Pay Per Click |
14 | Car Advice | Alborz Fallah | $42,000 | Advertising Banners |
15 | Problogger | Darren Rowse | $40,000 | Advertising Banners |
16 | JohnChow | John Chow | $35,000 | Affiliate Sales |
17 | Kotaku | Nick Denton | $32,000 | Advertising Banners |
18 | Shoemoney | Jeremy Schoemaker | $30,000 | Private Advertising |
19 | Coolest Gadgets | Allan Carlton | $30,000 | Advertising Banners |
| 20 | Joystiq | AOL | $18,000 | CPM Advertising |
| 21 | PC Mech | David Risley | $16,000 | Affiliate Sales |
| 22 | Freelance Switch | Collis Ta’eed | $13,000 | Membership Area |
23 | Abduzeedo | Fabio Sasso | $11,000 | Advertising Banners |
24 | Sizlopedia | Saad Hamid | $9,000 | Pay Per Click |
25 | Retire at 21 | Michael Dunlop | $5,000 | Affiliate Sales |
26 | Noupe | Noupe | $4,930 | Advertising Banners |
27 | Uber Affiliate | Paul Bourque | $4,500 | Second Tear Affiliates |
28 | Click For Nick | Nick Skeba | $3,900 | Pay Per Click |
29 | Tyler Cruz | Tyler Cruz | $3,200 | Advertising Banners |
| 30 | Just Creative Design | Jacob Cass | $3,000 | Services |
सौजन्यः http://www.incomediary.com/top-earning-blogs/
यदि अंग्रेजी तथा अन्य भाषाओं के ब्लोग्स से कमाई हो रही है तो हिन्दी के ब्लोग्स से भला कमाई क्यों नहीं हो सकती? यदि हम सभी मिलकर हिन्दी ब्लोग्स में अच्छे कंटेन्ट्स देने और हिन्दी का एक विशाल पाठक वर्ग तैयार करने के लिये ठान लें तो वह दिन दूर नहीं होगा जब कि आप अपने हिन्दी ब्लोग से कमाई कर रहे होंगे।
Friday, January 8, 2010
सोच रहा हूँ कि टिप्पणियों की एक दूकान खोल ही लूँ
"क्या बात है टिप्पण्यानन्द जी? किस सोच में डूबे हुए हैं?"
"भाई लिख्खाड़ानन्द जी! क्या बतायें हाथ बहुत तंग है आज कल। कुछ कमाई-धमाई की जुगत में लगा हुआ हूँ। सोच रहा हूँ कि टिप्पणियों की एक दूकान खोल ही लूँ।"
"टिप्पणियों की दूकान?"
"हाँ भई, टिप्पणियों की दूकान! आजकल हिन्दी ब्लॉगजगत में खूब माँग है टिप्पणियों की। वहाँ पर हाल यह है कि लोग यही चाहते हैं कि पोस्ट को भले ही कोई मत पढ़े पर टिप्पणी अवश्य कर दे। होड़ मची है हमारे ब्लोगरों में अधिक से अधिक टिप्पणी पाने के लिये। करोड़ों हिन्दीभाषी इंटरनेट यूजरों के होते हुए भी हिन्दी ब्लोगों के पाठकों की संख्या मात्र कुछ सौ तक ही सीमित है इससे साफ है कि हिन्दी ब्लोगर को हिन्दी ब्लोगर लोग ही पढ़ते हैं। अब जब पाठक ही नहीं हैं तो पाठकों की संख्या को भला पोस्ट की लोकप्रियता और गुणवत्ता का पैमाना कैसे माना जाये? इसलिये टिप्पणियों की संख्या ही इस पैमाने का काम करती हैं। इसीलिये आपस में एक दूसरे के पोस्ट पर टिप्पणी करने का चलन हो गया है। यदि एक ब्लोगर ने किसी दूसरे ब्लोगर के पोस्ट पर टिप्पणी किया है तो दूसरे ब्लोगर का कर्तव्य बनता कि कि वह भी जाकर पहले ब्लोगर के पोस्ट में टिप्पणी करे। टिप्पणियाँ पाने के लिये बहुत से गुट बन गये हैं। जैसे नेता लोग भीड़ बढ़ाने के लिये रुपये देकर ट्रकों में लोगों को लाते हैं उसी प्रकार से टिप्पणियाँ पाने के लिये एक से बढ़कर एक हथकंडे अपनाये जाते हैं, लोग ईमेल और फोन कर के एक दूसरे को बताते हैं कि मेरी पोस्ट लग गई है और अब आपको टिप्पणी करना है। पर बहुत से ऐसे ब्लॉगर भी हैं जो लिखते तो बहुत अच्छे हैं पर उनके पोस्ट में टिप्पणियाँ ही नहीं आती। हम तो ऐसे ब्लोगरों को ही अपना ग्राहक बनायेंगे। जोरदार चलेगी अपनी दूकान। उचित दाम लेकर सही टिप्पणी देंगे तो भला कोई क्यों नहीं खरीदेगा हमसे टिप्पणियाँ?"
"विचार तो आपका बहुत अच्छा है! सच में खूब चलेगी आपकी दूकान। पर यह तो बताइये कि आपने ऐसे कैसे कह दिया कि लोग यही चाहते हैं कि पोस्ट को भले ही कोई मत पढ़े पर टिप्पणी अवश्य कर दे?"
"अरे आप किसी पोस्ट और उसकी टिप्पणियों को पढ़ कर तो देखिये! आप को खुद पता चल जायेगा कि हमने ऐसा क्यों कहा। पोस्ट गम्भीर है तो उसमें टिप्पणी हँसी-मजाक और नोंक-झोंक वाली मिलेंगी। ऐसी टिप्पणियाँ मिलेंगी जिनका पोस्ट के विषय से दूर-दूर का भी कोई सम्बन्ध नहीं है। तो ऐसी टिप्पणी पोस्ट को पढ़ने के बाद तो नहीं की जा सकती ना? और यदि पोस्ट को पढ़ने के बाद की गई होंगी तो स्पष्ट है कि टिप्पणी करने वाला या तो गम्भीर पोस्ट लिखने वाले की खिल्ली उड़ाना चाहता है या फिर उसे नीचा दिखा कर उसका कद छोटा कर देना चाहता है। भाई टिप्पणी करके किसी का सहयोग करने का यह अर्थ तो नहीं है ना कि हमारे ही सहयोग से सामने वाले का कद हमसे भी ज्यादा ऊँचा हो जाये?
"अच्छा अब यह बताइये कि रेट क्या रखेंगे आप टिप्पणियों के?"
"रेट तो टिप्पणी की क्वालिटी के अनुसार रखेंगे। "nice", "वाह! वाह!!", "बेहतरीन!", "बहुत सुन्दर!", "क्या खूब!" जैसी एक दो शब्दों वाली टिप्पणियों के रेट रहेंगे मात्र दस रुपये प्रति टिप्पणी! "गहरी बात कह गये!", "बहुत अच्छा लिखा है!" जैसी एक वाक्य वाली टिप्पणियों के रेट होंगे बीस रुपये प्रति टिप्पणी!"
"इतने कम रेट टिप्पण्यानन्द जी? भाई माना कि ये टिप्पणियाँ छोटी हैं पर लोगों के ब्लोग में जाने और टिप्पणी करने में समय तो लगता ही है। इतना अधिक समय गवाँ कर इतने सस्ते में कैसे टिप्पणियाँ बेच पायेंगे आप?"
"दिक्कत की कोई बात नहीं है लिख्खाड़ानन्द जी! हमें कौन सा किसी ब्लॉग में जाना है, पोस्ट को पढ़ना है और टिप्पणी करना है? ऐसी टिप्पणियों के लिये ऑटोमेटेड टिप्पणी करने वाली सॉफ्टवेयर आती है ना, बस वही खरीद लेंगे। एक बार उसमें टिप्पणियों और ब्लोगों के यूआरएल को फीड भर कर देना है। फिर तो अपने आप ही टिप्पणियाँ होती रहेंगी। हाँ टिप्पणी खरीदने वाले के लिये शर्त सिर्फ यही रहेगी कि कम से कम एक हजार रुपये की टिप्पणी खरीदना होगा उसे, क्योंकि मात्र पाँच दस टिप्पणियों के लिये तो हम ऑटोमेटेड साफ्टवेयर में बार बार ब्लोगों के यूआरएल तो बदलने से रहे।"
"वाह! तब तो खूब कमाई होगी आपकी!"
"बिल्कुल होगी जी! और फिर किसी की टाँगें खींचने, गाली गलौज करने जैसी स्पेशल टिप्पणियाँ करवाने वाले भी बहुत लोग मिलेंगे। इस प्रकार की स्पेशल टिप्पणियों के रेट भी स्पेशल रखेंगे हम। हमारे नियम के अनुसार टिप्पणियों के दाम मिल जाने के बाद चौबीस घंटे के भीतर टिप्पणियाँ की जायेंगी और यदि कोई तुरन्त टिप्पणी करवाना चाहेगा तो फिर अर्जेंट चार्जेस अलग लगेंगे।"
"अच्छा यदि कोई लंबी टिप्पणी खरीदना चाहे तो?"
"तब तो उनके रेट भी तगड़े रहेंगे, कम से कम एक हजार रुपये प्रति टिप्पणी क्योंकि ऐसी टिप्पणियों के लिये तो ऑटोमेटेड टिप्पणी करने वाली सॉफ्टवेयर से तो काम लिया नहीं जा सकता, खुद ब्लोग में जाकर पोस्ट को पढ़ना पड़ेगा।"
"तो चलिये जल्दी खोलिये अपनी टिप्पणियों की दूकान। हम भी कुछ टिप्पणियाँ खरीद लिया करेंगे आपसे।"
"अरे आपको भला टिप्पणियाँ खरीदने की क्या क्या जरूरत है, आप तो महान और धुरन्धर लिख्खाड़ हैं! लोग तो आपके पोस्ट का इंतजार करते बैठे रहते हैं। इधर पोस्ट प्रकाशित हुई नहीं कि टिप्पणियाँ आनी चालू हो जाती हैं।"
"हाँ भाई, टिप्पणियाँ तो खूब मिल जाती हैं हमें! पर ऐसे ही थोड़े मिल जाती हैं हमें ये टिप्पणियाँ। खूब मेहनत करनी पड़ती है हमें इनके लिये। हजारों ब्लोगों में जा जा कर टिप्पणी करते हैं हम तब कहीं जाकर सौ-पचास टिप्पणी मिल पाती है। हाँ तो हम कह रहे थे कि टिप्पणियाँ तो जरूर खरीदेंगे हम आपसे। टिप्पणियाँ जितनी अधिक मिले उतना ही ज्यादा अच्छा होता है।"
"फिर तो लिख्खाड़ानन्द जी हम भी आपके लिये डिस्काउंटेड रेट लगायेंगे। आखिर आप हमारे मित्र जो हैं।"
"तो कब खुल रही है आपकी टिप्पणियों की दूकान?"
"बहुत ही जल्दी! ऑटोमेटेड टिप्पणी करने वाली सॉफ्टवेयर के लिये ऑर्डर दे रखा है। बस सॉफ्टवेयर आई कि दूकान खुली।"
(मेरे लिये हर्ष की बात है कि यह धान के देश में ब्लोग का 401वाँ पोस्ट है!)
"भाई लिख्खाड़ानन्द जी! क्या बतायें हाथ बहुत तंग है आज कल। कुछ कमाई-धमाई की जुगत में लगा हुआ हूँ। सोच रहा हूँ कि टिप्पणियों की एक दूकान खोल ही लूँ।"
"टिप्पणियों की दूकान?"
"हाँ भई, टिप्पणियों की दूकान! आजकल हिन्दी ब्लॉगजगत में खूब माँग है टिप्पणियों की। वहाँ पर हाल यह है कि लोग यही चाहते हैं कि पोस्ट को भले ही कोई मत पढ़े पर टिप्पणी अवश्य कर दे। होड़ मची है हमारे ब्लोगरों में अधिक से अधिक टिप्पणी पाने के लिये। करोड़ों हिन्दीभाषी इंटरनेट यूजरों के होते हुए भी हिन्दी ब्लोगों के पाठकों की संख्या मात्र कुछ सौ तक ही सीमित है इससे साफ है कि हिन्दी ब्लोगर को हिन्दी ब्लोगर लोग ही पढ़ते हैं। अब जब पाठक ही नहीं हैं तो पाठकों की संख्या को भला पोस्ट की लोकप्रियता और गुणवत्ता का पैमाना कैसे माना जाये? इसलिये टिप्पणियों की संख्या ही इस पैमाने का काम करती हैं। इसीलिये आपस में एक दूसरे के पोस्ट पर टिप्पणी करने का चलन हो गया है। यदि एक ब्लोगर ने किसी दूसरे ब्लोगर के पोस्ट पर टिप्पणी किया है तो दूसरे ब्लोगर का कर्तव्य बनता कि कि वह भी जाकर पहले ब्लोगर के पोस्ट में टिप्पणी करे। टिप्पणियाँ पाने के लिये बहुत से गुट बन गये हैं। जैसे नेता लोग भीड़ बढ़ाने के लिये रुपये देकर ट्रकों में लोगों को लाते हैं उसी प्रकार से टिप्पणियाँ पाने के लिये एक से बढ़कर एक हथकंडे अपनाये जाते हैं, लोग ईमेल और फोन कर के एक दूसरे को बताते हैं कि मेरी पोस्ट लग गई है और अब आपको टिप्पणी करना है। पर बहुत से ऐसे ब्लॉगर भी हैं जो लिखते तो बहुत अच्छे हैं पर उनके पोस्ट में टिप्पणियाँ ही नहीं आती। हम तो ऐसे ब्लोगरों को ही अपना ग्राहक बनायेंगे। जोरदार चलेगी अपनी दूकान। उचित दाम लेकर सही टिप्पणी देंगे तो भला कोई क्यों नहीं खरीदेगा हमसे टिप्पणियाँ?"
"विचार तो आपका बहुत अच्छा है! सच में खूब चलेगी आपकी दूकान। पर यह तो बताइये कि आपने ऐसे कैसे कह दिया कि लोग यही चाहते हैं कि पोस्ट को भले ही कोई मत पढ़े पर टिप्पणी अवश्य कर दे?"
"अरे आप किसी पोस्ट और उसकी टिप्पणियों को पढ़ कर तो देखिये! आप को खुद पता चल जायेगा कि हमने ऐसा क्यों कहा। पोस्ट गम्भीर है तो उसमें टिप्पणी हँसी-मजाक और नोंक-झोंक वाली मिलेंगी। ऐसी टिप्पणियाँ मिलेंगी जिनका पोस्ट के विषय से दूर-दूर का भी कोई सम्बन्ध नहीं है। तो ऐसी टिप्पणी पोस्ट को पढ़ने के बाद तो नहीं की जा सकती ना? और यदि पोस्ट को पढ़ने के बाद की गई होंगी तो स्पष्ट है कि टिप्पणी करने वाला या तो गम्भीर पोस्ट लिखने वाले की खिल्ली उड़ाना चाहता है या फिर उसे नीचा दिखा कर उसका कद छोटा कर देना चाहता है। भाई टिप्पणी करके किसी का सहयोग करने का यह अर्थ तो नहीं है ना कि हमारे ही सहयोग से सामने वाले का कद हमसे भी ज्यादा ऊँचा हो जाये?
"अच्छा अब यह बताइये कि रेट क्या रखेंगे आप टिप्पणियों के?"
"रेट तो टिप्पणी की क्वालिटी के अनुसार रखेंगे। "nice", "वाह! वाह!!", "बेहतरीन!", "बहुत सुन्दर!", "क्या खूब!" जैसी एक दो शब्दों वाली टिप्पणियों के रेट रहेंगे मात्र दस रुपये प्रति टिप्पणी! "गहरी बात कह गये!", "बहुत अच्छा लिखा है!" जैसी एक वाक्य वाली टिप्पणियों के रेट होंगे बीस रुपये प्रति टिप्पणी!"
"इतने कम रेट टिप्पण्यानन्द जी? भाई माना कि ये टिप्पणियाँ छोटी हैं पर लोगों के ब्लोग में जाने और टिप्पणी करने में समय तो लगता ही है। इतना अधिक समय गवाँ कर इतने सस्ते में कैसे टिप्पणियाँ बेच पायेंगे आप?"
"दिक्कत की कोई बात नहीं है लिख्खाड़ानन्द जी! हमें कौन सा किसी ब्लॉग में जाना है, पोस्ट को पढ़ना है और टिप्पणी करना है? ऐसी टिप्पणियों के लिये ऑटोमेटेड टिप्पणी करने वाली सॉफ्टवेयर आती है ना, बस वही खरीद लेंगे। एक बार उसमें टिप्पणियों और ब्लोगों के यूआरएल को फीड भर कर देना है। फिर तो अपने आप ही टिप्पणियाँ होती रहेंगी। हाँ टिप्पणी खरीदने वाले के लिये शर्त सिर्फ यही रहेगी कि कम से कम एक हजार रुपये की टिप्पणी खरीदना होगा उसे, क्योंकि मात्र पाँच दस टिप्पणियों के लिये तो हम ऑटोमेटेड साफ्टवेयर में बार बार ब्लोगों के यूआरएल तो बदलने से रहे।"
"वाह! तब तो खूब कमाई होगी आपकी!"
"बिल्कुल होगी जी! और फिर किसी की टाँगें खींचने, गाली गलौज करने जैसी स्पेशल टिप्पणियाँ करवाने वाले भी बहुत लोग मिलेंगे। इस प्रकार की स्पेशल टिप्पणियों के रेट भी स्पेशल रखेंगे हम। हमारे नियम के अनुसार टिप्पणियों के दाम मिल जाने के बाद चौबीस घंटे के भीतर टिप्पणियाँ की जायेंगी और यदि कोई तुरन्त टिप्पणी करवाना चाहेगा तो फिर अर्जेंट चार्जेस अलग लगेंगे।"
"अच्छा यदि कोई लंबी टिप्पणी खरीदना चाहे तो?"
"तब तो उनके रेट भी तगड़े रहेंगे, कम से कम एक हजार रुपये प्रति टिप्पणी क्योंकि ऐसी टिप्पणियों के लिये तो ऑटोमेटेड टिप्पणी करने वाली सॉफ्टवेयर से तो काम लिया नहीं जा सकता, खुद ब्लोग में जाकर पोस्ट को पढ़ना पड़ेगा।"
"तो चलिये जल्दी खोलिये अपनी टिप्पणियों की दूकान। हम भी कुछ टिप्पणियाँ खरीद लिया करेंगे आपसे।"
"अरे आपको भला टिप्पणियाँ खरीदने की क्या क्या जरूरत है, आप तो महान और धुरन्धर लिख्खाड़ हैं! लोग तो आपके पोस्ट का इंतजार करते बैठे रहते हैं। इधर पोस्ट प्रकाशित हुई नहीं कि टिप्पणियाँ आनी चालू हो जाती हैं।"
"हाँ भाई, टिप्पणियाँ तो खूब मिल जाती हैं हमें! पर ऐसे ही थोड़े मिल जाती हैं हमें ये टिप्पणियाँ। खूब मेहनत करनी पड़ती है हमें इनके लिये। हजारों ब्लोगों में जा जा कर टिप्पणी करते हैं हम तब कहीं जाकर सौ-पचास टिप्पणी मिल पाती है। हाँ तो हम कह रहे थे कि टिप्पणियाँ तो जरूर खरीदेंगे हम आपसे। टिप्पणियाँ जितनी अधिक मिले उतना ही ज्यादा अच्छा होता है।"
"फिर तो लिख्खाड़ानन्द जी हम भी आपके लिये डिस्काउंटेड रेट लगायेंगे। आखिर आप हमारे मित्र जो हैं।"
"तो कब खुल रही है आपकी टिप्पणियों की दूकान?"
"बहुत ही जल्दी! ऑटोमेटेड टिप्पणी करने वाली सॉफ्टवेयर के लिये ऑर्डर दे रखा है। बस सॉफ्टवेयर आई कि दूकान खुली।"
(मेरे लिये हर्ष की बात है कि यह धान के देश में ब्लोग का 401वाँ पोस्ट है!)
Wednesday, January 6, 2010
कमाई कम हो तो काम कैसे चले?
इस हिन्दी ब्लोगिंग ने एक लंबे समय से हमारे अंग्रेजी लेखन को बिल्कुल बंद करा दिया और नतीजा यह हुआ कि हमें एडसेंस से हर महीने मिलने वाला चेक अब तीन तीन महीनों के बाद मिलने लगा याने कि कमाई कम हो गई। अब कमाई कम हो तो काम कैसे चले? इसलिये हमने सोचा कि कुछ ना कुछ तो करना ही पड़ेगा। वैसे भी नये साल में कुछ ना कुछ नया करना भी चाहिये।
तो हमने एक जुगत लगाई। दो रोज पहले अंग्रेजी का एक नया ब्लोग Indian Images बनाया। अब ये नया ब्लोग है तो अंग्रेजी का पर अंग्रेजी उसमें नाममात्र को ही है और विज्ञापन चकाचक आ रहे हैं। याने कि "हींग लगे ना फिटकरी और रंग आये चोखा"!

तो लगे हाथों आप भी जरा घूम आइये ना हमारे इस नये ब्लोग के दो चार पेजों में! आप वहाँ घूमेंगे तो ये आपकी मेहरबानी होगी हम पर क्योंकि आपके वहाँ जाने का मतलब है ट्रैफिक बढ़ना याने कि सर्च इंजिनों के नजदीक पहुँचना। यदि आप साइट और एड प्लेसमेंट के विषय में अपनी राय हमें देंगे तो और भी बड़ी मेहरबानी होगी आपकी हम पर।
चलिये अब कुछ आपके फायदे की बात भी कर लेते हैं। आप चाहें तो आप भी एडसेंस से इस प्रकार से कुछ कमाई कर सकते हैं। इसके लिये सबसे पहले तो आप जीमेल में अपना एक नया ईमेल बना लीजिये। जी हाँ, आप जीमेल में आप जितने चाहें उतने ईमेल बना सकते हैं, गूगल को इस पर कोई ऐतराज नहीं है।
अब आप अपने इस नये जीमेल वाले आईडी से ब्लोगर खाते में लागिन कीजिए। लागिन कर लेने के बाद एक नया अंग्रेजी ब्लोग बना लें। घबराइये नहीं, मैं आपको अपने अंग्रेजी ब्लोग के लिए अंग्रेजी लेख लिखने के लिए नहीं कह रहा हूँ पर आप एक दो लाइन तो अंग्रेजी लिख ही सकते हैं, एक शीर्षक तो बना ही सकते हैं। अंग्रेजी लिखने के नाम से बस आपको इतना ही करना है। बाकी काम आपके चित्र, व्हीडियो आदि के संग्रह कर देंगे। याने कि आपको अपने संग्रह के किसी चित्र, या व्हीडियो के लिए अंग्रेजी में एक फबता सा शीर्षक देना है और अपने ब्लोग में उस चित्र या व्हीडियो को पोस्ट कर देना है। हो सके तो चित्र से मेल खाता एकाध अंग्रेजी का वाक्य भी जोड़ दें, यह सोने में सुगन्ध का काम करेगा।
हाँ अंग्रेजी ब्लोग बनाने के पहले आप सुनिश्चित कर लें कि आपके ब्लोगर खाते की डिफॉल्ट भाषा अंग्रेजी ही है क्योंकि यदि यह हिन्दी होगी तो आपको एडसेंस विज्ञापन नहीं मिलेंगे। इसके लिए आप ब्लोगर खाते के डैशबोर्ड को एकदम नीचे तक स्क्रोल करें। वहाँ आपको लेंग्वेज आप्शन दिखाई देगा। उसे क्लिक करने पर आपको पता चल जायेगा कि आपका डिफॉल्ट लेंग्वेज क्या है। वहाँ यदि पहले से ही अंग्रेजी है तब तो कोई बात नहीं है और यदि वहाँ हिन्दी है तो उसे बदल कर अंग्रेजी कर लें। निश्चिंत रहिए, इससे आपके हिन्दी ब्लोग में कोई भी फर्क नहीं पड़ने वाला है।
अब यदि पहले से ही आपका एडसेंस खाता बना हुआ है तो चार पाँच पोस्ट कर लेने के बाद मोनेटाइज कर लीजिये, एडसेंस के विज्ञापन आने शुरू हो जायेंगे। और यदि अब तक आपका एडसेंस खाता नहीं खुला है तो आपको इसके लिये छः माह प्रतीक्षा करनी होगी क्योंकि एडसेंस विज्ञापन मिलने के लिये किसी भी ब्लोग को कम से कम छः माह तक सक्रिय रहना जरूरी है। तो अपने अंग्रेजी ब्लोग में रोज एक पोस्ट लगाना जारी रखें और छः महीने बाद मोनेटाइज बटन को क्लिक करें और वहाँ जो भी जानकारी मांगा जाए देते जाइये। बस आपका एडसेंस खाता खुल जायेगा।
तो हमने एक जुगत लगाई। दो रोज पहले अंग्रेजी का एक नया ब्लोग Indian Images बनाया। अब ये नया ब्लोग है तो अंग्रेजी का पर अंग्रेजी उसमें नाममात्र को ही है और विज्ञापन चकाचक आ रहे हैं। याने कि "हींग लगे ना फिटकरी और रंग आये चोखा"!

तो लगे हाथों आप भी जरा घूम आइये ना हमारे इस नये ब्लोग के दो चार पेजों में! आप वहाँ घूमेंगे तो ये आपकी मेहरबानी होगी हम पर क्योंकि आपके वहाँ जाने का मतलब है ट्रैफिक बढ़ना याने कि सर्च इंजिनों के नजदीक पहुँचना। यदि आप साइट और एड प्लेसमेंट के विषय में अपनी राय हमें देंगे तो और भी बड़ी मेहरबानी होगी आपकी हम पर।
चलिये अब कुछ आपके फायदे की बात भी कर लेते हैं। आप चाहें तो आप भी एडसेंस से इस प्रकार से कुछ कमाई कर सकते हैं। इसके लिये सबसे पहले तो आप जीमेल में अपना एक नया ईमेल बना लीजिये। जी हाँ, आप जीमेल में आप जितने चाहें उतने ईमेल बना सकते हैं, गूगल को इस पर कोई ऐतराज नहीं है।
अब आप अपने इस नये जीमेल वाले आईडी से ब्लोगर खाते में लागिन कीजिए। लागिन कर लेने के बाद एक नया अंग्रेजी ब्लोग बना लें। घबराइये नहीं, मैं आपको अपने अंग्रेजी ब्लोग के लिए अंग्रेजी लेख लिखने के लिए नहीं कह रहा हूँ पर आप एक दो लाइन तो अंग्रेजी लिख ही सकते हैं, एक शीर्षक तो बना ही सकते हैं। अंग्रेजी लिखने के नाम से बस आपको इतना ही करना है। बाकी काम आपके चित्र, व्हीडियो आदि के संग्रह कर देंगे। याने कि आपको अपने संग्रह के किसी चित्र, या व्हीडियो के लिए अंग्रेजी में एक फबता सा शीर्षक देना है और अपने ब्लोग में उस चित्र या व्हीडियो को पोस्ट कर देना है। हो सके तो चित्र से मेल खाता एकाध अंग्रेजी का वाक्य भी जोड़ दें, यह सोने में सुगन्ध का काम करेगा।
हाँ अंग्रेजी ब्लोग बनाने के पहले आप सुनिश्चित कर लें कि आपके ब्लोगर खाते की डिफॉल्ट भाषा अंग्रेजी ही है क्योंकि यदि यह हिन्दी होगी तो आपको एडसेंस विज्ञापन नहीं मिलेंगे। इसके लिए आप ब्लोगर खाते के डैशबोर्ड को एकदम नीचे तक स्क्रोल करें। वहाँ आपको लेंग्वेज आप्शन दिखाई देगा। उसे क्लिक करने पर आपको पता चल जायेगा कि आपका डिफॉल्ट लेंग्वेज क्या है। वहाँ यदि पहले से ही अंग्रेजी है तब तो कोई बात नहीं है और यदि वहाँ हिन्दी है तो उसे बदल कर अंग्रेजी कर लें। निश्चिंत रहिए, इससे आपके हिन्दी ब्लोग में कोई भी फर्क नहीं पड़ने वाला है।
अब यदि पहले से ही आपका एडसेंस खाता बना हुआ है तो चार पाँच पोस्ट कर लेने के बाद मोनेटाइज कर लीजिये, एडसेंस के विज्ञापन आने शुरू हो जायेंगे। और यदि अब तक आपका एडसेंस खाता नहीं खुला है तो आपको इसके लिये छः माह प्रतीक्षा करनी होगी क्योंकि एडसेंस विज्ञापन मिलने के लिये किसी भी ब्लोग को कम से कम छः माह तक सक्रिय रहना जरूरी है। तो अपने अंग्रेजी ब्लोग में रोज एक पोस्ट लगाना जारी रखें और छः महीने बाद मोनेटाइज बटन को क्लिक करें और वहाँ जो भी जानकारी मांगा जाए देते जाइये। बस आपका एडसेंस खाता खुल जायेगा।
Monday, January 4, 2010
क्या टिप्पणियाँ ही किसी पोस्ट की गुणवत्ता का मापदंड हैं?
टिप्पणियों के मोह से आज कोई भी हिन्दी ब्लोगर अछूता नहीं है। टिप्पणियों का मोह कोई अस्वाभाविक बात नहीं है किन्तु जिस प्रकार से हिन्दी ब्लोगजगत में टिप्पणियाँ पा लेने का मोह है उससे तो लगता है कि टिप्पणियाँ ही किसी पोस्ट की गुणवत्ता का मापदंड है। याने कि जिस पोस्ट में जितनी अधिक टिप्पणियाँ वह उतना ही अच्छा पोस्ट! इस लिहाज से तो विवादास्पद पोस्ट ही सबसे अच्छे हैं जहाँ पर बहुत सारी टिप्पणियाँ मिलती हैं, भले ही उन टिप्पणियों में गाली-गलौज तक शामिल हो।
टिप्पणी आखिर है क्या? एक प्रतिक्रिया मात्र तो है यह। यह मानव स्वभाव है कि जब कभी भी वह किसी के विचार को पढ़ता या सुनता है तो उसके अंदर भी प्रतिक्रिया स्वरूप कुछ न कुछ विचार अवश्य उठते हैं। जब लोग अपने भीतर उठने वाले इन विचारों को व्यक्त कर देते हैं तो वह टिप्पणी की संज्ञा प्राप्त कर लेती है। प्रतिक्रियात्मक विचार तो सभी पाठकों के भीतर उठते हैं किन्तु यह जरूरी नहीं है कि वे सभी अपने विचारों को व्यक्त ही करें। विचारों की अभिव्यक्ति के लिये लेखन क्षमता भी चाहिये।
मैं तो समझता हूँ कि किसी पोस्ट की गुणवत्ता तय करने वाले वास्तव में उसके पाठकगण हैं न कि टिप्पणियाँ। नेट में आम पाठकों में एक बड़ा वर्ग ऐसे पाठकों का भी होता है जिनमें लेखन क्षमता नहीं होती और इसी लिये वे पोस्ट पढ़ कर भी टिप्पणी नहीं करते। ऐसे पोस्टों की कमी नहीं है जिनमें टिप्पणियाँ तो नहीं के बराबर हैं किन्तु पढ़े बहुत अधिक लोगों के द्वारा गये हैं और बहुत अधिक पसंद भी किये गये हैं। डिग.कॉम में जाकर देखें तो सैकड़ों की संख्या में डिग (पसंद) प्राप्त करने वाले पोस्टों में टिप्पणी ही नहीं है या है भी तो नहीं के बराबर।
ऐसा लगता है कि हिन्दी ब्लोगजगत में पाठक के ब्लोगर भी होने के कारण उसमें लेखन क्षमता भी होती ही है और वे अच्छी प्रकार से टिप्पणी कर लेते हैं इसीलिये यह भ्रान्ति बन गई है कि टिप्पणियाँ ही पोस्ट का मापदंड है। शायद इसीलिये यहाँ पर टिप्पणी मोह भी अधिक है।
जब हिन्दी ब्लोगों को आम पाठक मिलने शुरू हो जायेंगे तो टिप्पणी मोह अपने आप कम हो जायेगा और लोग अधिक से अधिक पाठक तैयार करने में ही अपनी सफलता मानना शुरू कर देंगे।
टिप्पणी आखिर है क्या? एक प्रतिक्रिया मात्र तो है यह। यह मानव स्वभाव है कि जब कभी भी वह किसी के विचार को पढ़ता या सुनता है तो उसके अंदर भी प्रतिक्रिया स्वरूप कुछ न कुछ विचार अवश्य उठते हैं। जब लोग अपने भीतर उठने वाले इन विचारों को व्यक्त कर देते हैं तो वह टिप्पणी की संज्ञा प्राप्त कर लेती है। प्रतिक्रियात्मक विचार तो सभी पाठकों के भीतर उठते हैं किन्तु यह जरूरी नहीं है कि वे सभी अपने विचारों को व्यक्त ही करें। विचारों की अभिव्यक्ति के लिये लेखन क्षमता भी चाहिये।
मैं तो समझता हूँ कि किसी पोस्ट की गुणवत्ता तय करने वाले वास्तव में उसके पाठकगण हैं न कि टिप्पणियाँ। नेट में आम पाठकों में एक बड़ा वर्ग ऐसे पाठकों का भी होता है जिनमें लेखन क्षमता नहीं होती और इसी लिये वे पोस्ट पढ़ कर भी टिप्पणी नहीं करते। ऐसे पोस्टों की कमी नहीं है जिनमें टिप्पणियाँ तो नहीं के बराबर हैं किन्तु पढ़े बहुत अधिक लोगों के द्वारा गये हैं और बहुत अधिक पसंद भी किये गये हैं। डिग.कॉम में जाकर देखें तो सैकड़ों की संख्या में डिग (पसंद) प्राप्त करने वाले पोस्टों में टिप्पणी ही नहीं है या है भी तो नहीं के बराबर।
ऐसा लगता है कि हिन्दी ब्लोगजगत में पाठक के ब्लोगर भी होने के कारण उसमें लेखन क्षमता भी होती ही है और वे अच्छी प्रकार से टिप्पणी कर लेते हैं इसीलिये यह भ्रान्ति बन गई है कि टिप्पणियाँ ही पोस्ट का मापदंड है। शायद इसीलिये यहाँ पर टिप्पणी मोह भी अधिक है।
जब हिन्दी ब्लोगों को आम पाठक मिलने शुरू हो जायेंगे तो टिप्पणी मोह अपने आप कम हो जायेगा और लोग अधिक से अधिक पाठक तैयार करने में ही अपनी सफलता मानना शुरू कर देंगे।
Friday, January 1, 2010
कर दिया ना कबाड़ा इस नये साल ने ... हमारा तो हेडर ही गायब हो गया
नया साल आ गया! खुशी के साथ हम अपना ब्लॉग में गये किन्तु यह क्या? यहाँ तो हमारा हेडर ही गायब है। इस नये साल ने हमें हमारे ब्लॉग का हेडर गायब करके शायद कोई नये प्रकार का गिफ्ट दिया है। चलिये कोई बात नहीं, हम समझते हैं कि ब्लोगर में शायद कुछ परेशानी आ गई होगी जिसे गूगल वाले जल्दी ही ठीक कर लेंगे और हमारा हेडर फिर से वापस आ जायेगा।
अब नये साल से कुछ महत्वपूर्ण प्रश्न
नया साल तुम क्या लाये हो?
विश्व-शान्ति है क्या तुममें?
या उर में विस्फोट छियाये हो?
ये प्रश्न मैं नहीं कर रहा बल्कि उन्तीस साल पहले 01-01-1981 के दिन मेरे पिता स्व. श्री हरिप्रसाद अवधिया ने नये साल से ये प्रश्न किये थे अपनी कविता "नया साल तुम क्या लाये हो?" में। ये प्रश्न आज भी अपनी जगह पर खड़े हैं।
प्रस्तुत है वही कविताः
नया साल तुम क्या लाये हो?
(स्व. श्री हरिप्रसाद अवधिया रचित कविता)
नया साल तुम क्या लाये हो?
विश्व-शान्ति है क्या तुममें?
या उर में विस्फोट छियाये हो?
नया साल तुम क्या लाये हो?
उल्लास नया है,
आभास नया है,
पर थोड़े दिन के ही खातिर,
फिर तो दिन और रात बनेंगे
बदमाशी में शातिर
वर्तमान में तुम भाये हो,
नया साल तुम क्या लाये हो?
असुर न देव बनेंगे,
जो जो हैं वे वही रहेंगे,
शोषण कभी न पोषण बनेगा
रक्त पियेगा बर्बर मानव
जो चलता था वही चलेगा।
फिर क्यों जग को भरमाये हो?
नया साल तुम क्या लाये हो?
पिछला वर्ष गया है,
आया समय नया है।
क्या भीषण आघातों से
मानवता का किला ढहेगा?
बोलो, तुम क्यों सकुचाये हो?
नया साल तुम क्या लाये हो?
(रचना तिथिः 01-01-1981)
चलते-चलते
एक और प्रस्तुति:
नया साल है
(स्व. श्री हरिप्रसाद अवधिया रचित कविता)
नया साल है-
लेकिन कौन खुशहाल है?
जो पहले चलता था
वही अब भी बहाल है।
नये वर्ष में-
क्या स्वभाव बदल जायेगा?
जो बदरंग रंग जमा था अब तक,
वही रंग फिर रंग लायेगा।
दुनिया पशुता का कमाल है
नया साल है।
वर्ष आते और जाते रहते हैं,
साथ में खुशियाँ और गम लाते रहते हैं,
सच तो यह है कि-
काल का चक्र एक-सा चलता है,
वर्ष नहीं बदलते पर
भावना का संसार बदलता है
और संसार एक जंजाल है,
नया साल है।
कल्याण का संकल्प दृढ़ है तो,
अवश्य ही नया साल है,
अन्यथा न नूतन है न पुरातन है वरन्
सृष्टि में निरन्तर महाकाल है,
नया साल है।
(रचना तिथिः 01-01-1982)
अब नये साल से कुछ महत्वपूर्ण प्रश्न
नया साल तुम क्या लाये हो?
विश्व-शान्ति है क्या तुममें?
या उर में विस्फोट छियाये हो?
ये प्रश्न मैं नहीं कर रहा बल्कि उन्तीस साल पहले 01-01-1981 के दिन मेरे पिता स्व. श्री हरिप्रसाद अवधिया ने नये साल से ये प्रश्न किये थे अपनी कविता "नया साल तुम क्या लाये हो?" में। ये प्रश्न आज भी अपनी जगह पर खड़े हैं।
प्रस्तुत है वही कविताः
नया साल तुम क्या लाये हो?
(स्व. श्री हरिप्रसाद अवधिया रचित कविता)
नया साल तुम क्या लाये हो?
विश्व-शान्ति है क्या तुममें?
या उर में विस्फोट छियाये हो?
नया साल तुम क्या लाये हो?
उल्लास नया है,
आभास नया है,
पर थोड़े दिन के ही खातिर,
फिर तो दिन और रात बनेंगे
बदमाशी में शातिर
वर्तमान में तुम भाये हो,
नया साल तुम क्या लाये हो?
असुर न देव बनेंगे,
जो जो हैं वे वही रहेंगे,
शोषण कभी न पोषण बनेगा
रक्त पियेगा बर्बर मानव
जो चलता था वही चलेगा।
फिर क्यों जग को भरमाये हो?
नया साल तुम क्या लाये हो?
पिछला वर्ष गया है,
आया समय नया है।
क्या भीषण आघातों से
मानवता का किला ढहेगा?
बोलो, तुम क्यों सकुचाये हो?
नया साल तुम क्या लाये हो?
(रचना तिथिः 01-01-1981)
चलते-चलते
एक और प्रस्तुति:
नया साल है
(स्व. श्री हरिप्रसाद अवधिया रचित कविता)
नया साल है-
लेकिन कौन खुशहाल है?
जो पहले चलता था
वही अब भी बहाल है।
नये वर्ष में-
क्या स्वभाव बदल जायेगा?
जो बदरंग रंग जमा था अब तक,
वही रंग फिर रंग लायेगा।
दुनिया पशुता का कमाल है
नया साल है।
वर्ष आते और जाते रहते हैं,
साथ में खुशियाँ और गम लाते रहते हैं,
सच तो यह है कि-
काल का चक्र एक-सा चलता है,
वर्ष नहीं बदलते पर
भावना का संसार बदलता है
और संसार एक जंजाल है,
नया साल है।
कल्याण का संकल्प दृढ़ है तो,
अवश्य ही नया साल है,
अन्यथा न नूतन है न पुरातन है वरन्
सृष्टि में निरन्तर महाकाल है,
नया साल है।
(रचना तिथिः 01-01-1982)
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