धान के देश में!
जी.के. अवधिया का ब्लॉग
Saturday, February 6, 2010
हम पोस्ट लिखते हैं नामी बनकर ... वे चुटकियों में उड़ा देते हैं बेनामी बनकर
›
Anonymous said... याने कि बेनामी ने कहा ... अरे भाई कुछ कहना है तो सामने आकर कहो! बुरका ओढ़ कर क्यों कहते हो। प्रशंसा करो, आलोचना करो, जो चाह...
12 comments:
Friday, February 5, 2010
कहाँ है आज वसन्त की मादकता?
›
वसन्त ऋतु है अभी! किन्तु मुझे तो मादकता का किंचितमात्र भी अनुभव नहीं हो रहा है। टेसू और सेमल के रक्तवर्ण पुष्प, जो कि वसन्त के श्रृंगार माने...
6 comments:
Thursday, February 4, 2010
"कुकुर के मुँह में लउड़ी हुड़सना" ... याने कि किसी को जबरन छेड़ना
›
मानव मस्तिष्क भी विचित्र वस्तु है। कभी-कभी यह किसी को जबरन छेड़ कर मौज लेता है। इसे ही छत्तीसगढ़ी हाना (लोकोक्ति) में "कुकुर के मुँह में ...
11 comments:
Wednesday, February 3, 2010
क्या हिन्दी का कम से कम एक ब्लॉग ऐसा नहीं बन सकता जो पूरी दुनिया में धूम मचा दे?
›
अंग्रेजी के ऐसे अनेक ब्लॉग्स हैं जिनमें संसार भर से प्रतिदिन हजारों से लेकर लाखों की संख्या में लोग आते हैं। किसी एग्रीगेटर से नहीं बल्कि सर...
19 comments:
Tuesday, February 2, 2010
ब्लोगिंग तो मौज लेने के लिये होती है ... ब्लोगिंग फॉर्मूले
›
"नमस्कार लिख्खाड़ानन्द जी!" "नमस्काऽऽर! आइये आइये टिप्पण्यानन्द जी!" "लिख्खाड़ानन्द जी, हम तो आपके लेखन के कायल हैं! ...
28 comments:
‹
›
Home
View web version