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Friday, March 5, 2010

ललित जी ने उचकाया ... हमने फाग गाया

फाग तो बहुत सारे पढ़े आपने, लीजिये आज रंगपंचमी के दिन सुन भी लीजिये। बहुत बेसुरा गला है हमारा पर क्या करें दो पैग लगाने के बाद ललित जी ने उचका दिया और हम चढ़ गये चने के झाड़ पर याने कि शुरू कर दिया फाग गाना। आज रंग पंचमी है तो सोचा कि आपको भी सुना दे हमारा गाया हुआ फाग। आज तक आपने अदा जी और शैल जी के कर्णप्रिय स्वर सुने हैं पर आज हमारा कर्कश गान सुन लीजिये।


पतली कमर मोर लचके

Thursday, February 18, 2010

मोहे रहि रहि मदन सतावै, पिया बिना नींद नहि आवै

नींद नहि आवै पिया बिना नींद नहि आवै।
मोहे रहि रहि मदन सतावै पिया बिना नींद नहि आवै॥

सखि लागत मास असाढ़ा, मोरे प्रान परे अति गाढ़ा,
अरे वो तो बादर गरज सुनावै, परदेसी पिया नहि आवै।
पिया बिना नींद नहि आवै॥

सखि सावन मास सुहाना, सब सखियाँ हिंडोला ताना,
अरे तुम झूलव संगी सहेली, मैं तो पिया बिना फिरत अकेली।
पिया बिना नींद नहि आवै॥

सखि भादों गहन गम्भीरा, मोरे नैन बहे जल-नीरा,
अरे मैं तो डूबत हौं मँझधारे, मोहे पिया बिना कौन उबारे।
पिया बिना नींद नहि आवै॥

सखि क्वार मदन तन दूना, मोरे पिया बिना मन्दिर सूना,
अरे मैं तो का से कहौं दुख रोई, मैं तो पिया बिना सेज ना सोई।
पिया बिना नींद नहि आवै॥

सखि कातिक मास देवारी, सब सखिया अटारी बारी,
अरे तुम पहिरौ कुसुम रंग सारी, मैं तो पिया बिना फिरत उघारी।
पिया बिना नींद नहि आवै॥

सखि अगहन अगम अंदेसू, मैं तो लिख-लिख भेजौं संदेसू,
अरे मैं तो नित उठ सुरुज मनावौं, परदेसी बलम को बुलावौं।
पिया बिना नींद नहि आवै॥

सखि पूस जाड़ अधिकाई, मोहे पिया बिना सेज ना भाई,
अरे मोरे तन-मन-जोबन छीना, परदेसी गवन नहि कीना।
पिया बिना नींद नहि आवै॥

सखि माघ आम बौराये, चहुँ ओर बसंत बिखराये,
अरे वो तो कोयल कूक सुनावै, मोरे पापी पिया नहि आवै।
पिया बिना नींद नहि आवै॥

सखि फागुन मस्त महीना, सब सखियन मंगल कीन्हा,
अरे तुम खेलव रंग गुलालै, मोहे पिया बिना कौन दुलारै।
पिया बिना नींद नहि आवै॥

आप इसे मेरी स्वरचित रचना मत समझ लीजियेगा क्योंकि यह किसी अन्य की रचना है जिनका नाम तक मुझे पता नहीं है। वास्तव में यह ताल धमाल के साथ गाया जाने वाला फागगीत है जिसे बारहमासी फाग के नाम से जाना जाता है।

चलते-चलते

जमुना गहरी कइसे भरौं जमुना गहरी

ठाढ़े भरौं राजा राम देखत हैं
निहुरे भरौं भीजै चुनरी
जमुना गहरी ...

धीरे चलौं घर बालक रोवत है
जल्दी चलौं छलकै गगरी
जमुना गहरी ...

Monday, February 8, 2010

कर गईं मस्त मुझे फागुन की हवा ... व्हीडियों देख कर समझ सकते हैं कि कैसे?

वैसे तो हमारे ब्लोग जगत में तरह-तरह की हवाएँ बहती हैं। जब टिप्पणी हवा बहती है तो सभी टिप्पणीमय हो जाते हैं और कभी कभी विवाद की हवा बहती है तो वह उग्र रूप धारण करके आँधी भी बन जाती है। पर आज ललित जी ने ब्लोगजगत में "फागुनी बयार" बहाई है। अब फागुनी हवा बहे तो मजाल है किसी की कि मदमस्त न हो? सो हम भी मस्ती में आ गये और अनायास ही होठों पर आ गये सन् 1978 में प्रदर्शित वासु चटर्जी की फिल्म दिल्लगी के गीत के ये बोल - "कर गईं मस्त मुझे फागुन की हवा"।



आज की आपाधापी में तो फाग सिर्फ होली के समय सिर्फ एक दो दिन ही गाये जाते हैं किन्तु पहले के दिनों में वसन्त पंचमी के दिन से ही फाग गाने की शुरुवात हो जाती थी जो कि रंग पंचमी तक चलती थी। याद आ गये वो दिन जब हम झांझ, मंजीरों, नगाड़ों आदि के ताल धमाल के साथ फाग गाया करते थे:
आज श्याम संग सब सखियन मिलि ब्रज में होली खेलै ना
हाँ प्यारे ललना ब्रज में होली खेलै ना

इत ते निकसी नवल राधिका उत ते कुँअर कन्हाई ना
हाँ प्यारे ललना उत ते कृष्ण कन्हाई ना
हिल मिल फाग परस्पर खेलैं शोभा बरनि ना जाई ना
आज श्याम संग सब सखियन मिलि ब्रज में होली खेलै ना

बाजत झांझ मृदंग ढोल डफ मंजीरा शहनाई ना
हाँ प्यारे ललना मंजीरा शहनाई ना
उड़त गुलाल लाल भये बादर केसर कीच मचाई नाआज श्याम संग सब सखियन मिलि ब्रज में होली खेलै ना
हमारे यहाँ गाये जाने वाले अधिकतर फाग 'चन्द्रसखी' के द्वारा रचे गये हैं जो कि कृष्ण भक्ति के भाव से ओत प्रोत हैं। एक उदाहरण देखियेः
जाने दे जमुना पानी मोहन जाने दे जमुना पानी
मोऽहन जाने दे जमुना पानी

रोज के रोज भरौं जमुना जल
नित उठ साँझ-बिहानी
मोऽहन जाने दे जमुना पानी

चुनि-चुनि कंकर सैल चलावत
गगरी करत निसानी
मोऽहन जाने दे जमुना पानी

केहि कारन तुम रोकत टोकत
सोई मरम हम जानी
मोऽहन जाने दे जमुना पानी

हम तो मोहन तुम्हरी मोहनिया
नाहक झगरा ठानी
मोऽहन जाने दे जमुना पानी

ले चल मोहन कुंज गलिन में
हम राजा तुम रानी
मोऽहन जाने दे जमुना पानी

चन्द्रसखी भजु बालकृष्ण छवि
हरि के चरन चित लानी
मोऽहन जाने दे जमुना पानी
ऐसे और भी फाग का संग्रह है हमारे पास जिन्हें हम होली तक के अपनी प्रविष्टियों में प्रस्तुत करने का प्रयास करेंगे।