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Tuesday, April 13, 2010

मेरी ईपुस्तक का रिव्ह्यू श्री समीर लाल 'समीर' के द्वारा

मैं आभारी हूँ श्री समीर जी का जिन्होंने मेरी ईपुरस्तक "अंग्रेजी कहावतें हिन्दी भावार्थ" पर रिव्ह्यू लिख कर मेरी ईपुस्तक के विषय में अपने विचार प्रकट किया। प्रस्तुत है उनके द्वारा लिखा गया रिव्ह्यूः

अंग्रेजी कहावतें हिन्दी भावार्थ: एक संग्रहणीय पुस्तक: समीर लाल

एक इन्सान अपने सारे जीवन नित नये अनुभव करता है, अनुभवों से सीखता है और आने वाली पुश्तों को अपने अनुभवों से परिचित कराता है, ताकि उन्हें उस प्रक्रिया से पूरा गुजरने की बजाय पहले से यह भान रहे कि इस राह की मंजिल क्या है और वो नये अनुभव प्राप्त करें.

उदाहरण के तौर पर किसी ने कभी अपनी बीमारी की हालत में दवाई ली होगी और उसी तरह की बीमारी की हालत में किसी और ने दवा के बदले खान पान में परहेज किया होगा. परहेज करने वाला जल्दी ठीक हो गया होगा तो इससे एक सीख प्रप्प्त हुई कि बीमारी की स्थिति में दवा से ज्यादा असरकारक परहेज होता है. चूँकि यह बात और ऐसी ही कई बातें इन्सान ने एक लम्बे अनुभव से सीखीं तो इन्हें अपने आने वाली पुश्तों को समझाने के लिए बड़ी बड़ी कहानियाँ विस्तार से कहने की बजाय, एक एक वाक्य में पूरा अनुभव समेट दिया और उसे नाम मिला मुहावरों को.

विद्वान Miguel de Cervantes ने मुहावरों को परिभाषा दी: "a short sentence based on long experience." अर्थात एक लम्बे अनुभव से सीखे तथ्यों को एक छोटे से वाक्य में कह देना ही मुहावरा है.

पुनः उपर वर्णित बीमारी, दवा और परहेज के अनुभव को मुहावरे के रुप में कहा गया: ’दवा से अधिक प्रभाव परहेज का होता है’ या अंग्रेजी में इसे कहा गया: ’An ounce of prevention is worth a pound of cure'

एक पूरे लम्बे अनुभव का सार: मुहावरा. कैसे बना, क्यूँ बना, किसने बनाया से ज्यादा महत्वपूर्न बात है कि यह एक लम्बे अनुभव के आधार पर बना है, लोग इसे अपना कर लाभांवित हो चुके हैं और यह प्रचलित है. अतः पुनः पूरी प्रक्रिया से गुजरे बिना इसे मान लेने में जीवन का सार है.

अनेकानेक मुहावरे जिन्हें अंग्रेजी में प्रोवर्ब (Proverb) कहते हैं, दुनिया भर में प्रचलित है.

ऐसे ही अनेकों मुहावरों को संकलित करके उसका अंग्रेजी एवं हिन्दी अनुवाद हम तक पहुँचाने का साधुवादी प्रयास किया है श्री जी. के. अवधिया जी ने अपनी पुस्तक "English proverbs with Hindi meaning' 'अंग्रेजी कहावतें हिन्दी भावार्थ’ में. यह एक ई पुस्तक के रुप में उपलब्ध है (पी डी एफ).

आज जैसे ही यह पुस्तक मेरे हाथ लगी, मात्र कुछ ही देर में मैं इसे पूरी पढ़ गया. संकलन, अनुवाद और भावार्थ बहुत प्रभावी ढंग से किया गया है और सभी अंग्रेजी प्रोवर्ब को वर्णक्रमानुसार जमा कर प्रस्तुत किया है.

मेरी समझ से यह एक अनूठा प्रयास है एवं सभी के लिए यह पुस्तक संग्रहणीय है. इस अनुपम प्रयास के लिए श्री जी.के. अवधिया जी का साधुवाद एवं आभार.
समीर लाल
’उड़न तश्तरी’
http://udantashtari.blogspot.com/
 "English Proverbs With  Hindi meaning अंग्रेजी कहावतें - हिन्दी भावार्थ" का नमूना आप यहाँ क्लिक कर के मुफ्त में डाउनलोड कर सकते हैं।

अधिक से अधिक लोग इस ईपुस्तक का फायदा उठा पायें, इसलिये हमने इसकी कीमत मात्र रु.100/- रखा है। डाउनलोड किये गये नमूने को देखने के बाद यदि आप "English Proverbs With  Hindi meaning अंग्रेजी कहावतें - हिन्दी भावार्थ" को खरीदना चाहें निम्न तरीके से खरीद सकते हैं

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इस ईपुस्तक के रिव्ह्यु लिखने के इच्छुक तीन लोगों को मैं यह ईपुस्तक मुफ्त में प्रदान करूँगा ताकि उनके द्वारा किये गये रिव्ह्यु को पढ़कर लोगों को इस पुस्तक के विषय में अधिक से अधिक जानकारी प्राप्त हो सके।

हमें पूर्ण विश्वास है कि "English Proverbs With  Hindi meaning अंग्रेजी कहावतें - हिन्दी भावार्थ" ईपुस्तक न केवल आपके लेखन को परिष्कृत करेगी बल्कि आपके बच्चों का ज्ञानवर्धन भी करेगी।

भविष्य में हम आप लोगों के लिये और भी गुणवत्ता से परिपूर्ण बहुत सी ईपुस्तके प्रस्तुत करने का प्रयास करेंगे।

Sunday, March 21, 2010

हम ... याने कि धोबी का गधा घर का ना घाट का

एक बार इस हिन्दी ब्लोगिंग में क्या घुस गये कि लत लग गई इसकी और इसने हमें "धोबी का गधा घर का ना घाट का" बना कर रख दिया। अंग्रेजी ब्लोगिंग करते थे तो जहाँ एडसेंस से चेक मिलता था वहीं क्लिक बैंक के प्रोडक्ट बिकने पर कमीशन की रकम सीधे हमारे बैंक खाते में जमा हो जाया करती थी। अंग्रेजी ब्लोगिंग का मतलब ही है "आम के आम और गुठलियों के दाम"। तो हम बता रहे थे कि हमारे साथ तो वही मिसल हो गई कि "कौवा चला हंस की चाल, भूल गया अपनी भी चाल"। बड़े लोगों ने ठीक ही कहा है कि "जब गीदड़ की मौत आती है तो शहर की ओर भागता है"। हम भी अंग्रेजी ब्लोगगिंग के जंगल को छोड़ कर हिन्दी ब्लोगिंग के शहर में चले आये। "चौबे जी आये थे छब्बे बनने और दुबे बन कर रह गये"

कमाई-धमाई तो खतम ही हो गई ऊपर से नेट का बिल अलग से पटाना पड़ रहा है।इसी को कहते हैं "धन जाये और धर्मो का नाश"। पर किसी को क्या दोष दें, हम खुद ही तो "आ बैल मुझे मार" जैसे यहाँ आये थे। लगता है कि यह हिन्दी ब्लोगिंग अब हमारे लिये "आई है जान के साथ, जायेगी जनाजे के साथ" बनकर रह गई है। लाख सोचते हैं कि आज नहीं तो कल इस हिन्दी ब्लोगिंग से कमाई होनी शुरू हो जायेगी पर लगता है "इन तिलों में तेल ही नहीं है"। हिन्दी ब्लोगिंग से कमाई तो करमहीन की खेती है, कहते हैं ना "करमहीन खेती करे, बैल मरे या सूखा पड़े"। कमाई तो पाठकों से ही होनी है पर यहाँ तो पाठक आने से रहे। यहाँ पर तो पाठक मिलना "टेढ़ी खीर" है। इतने दिनों से भिड़े हुए हैं यहाँ पर पर अब तक नतीजा सिर्फ "कोयल होय ना उजली सौ मन साबुन लाइ" है।

कमीशन मिलने की आस में अपने ब्लोग के साइडबार में कुछ भारतीय कम्पनियों के विज्ञापन लगा रखे हैं पर उन्हें कोई देखने वाला हो तब ना। ऐसा भी नहीं है कि इन विज्ञापनों से कमाई होती ही नही है, कभी कभी हो भी जाती है पर कमीशन के रूप में मिलने वाली रकम "ऊँट के मुँह में जीरा" ही होती है। आप तो जानते ही है कि "ओस चाटे प्यास नहीं बुझती"। चार छः महीने में यदि हमारे विज्ञापन के माध्यम से कोई फ्लाईट या होटल बुकिंग करा ले तो समझते हैं कि "अंधे के हाथ बटेर" लग गया।

अंग्रेजी ब्लोगिंग में तो लोग आते ही हैं कमाई करने के उद्देश्य से पर हिन्दी ब्लोगिंग वाले तो संतुष्ट प्राणी हैं, उनमें से अधिकतर को तो ब्लोगिंग से धन कमाने की चाह ही नहीं है। हिन्दी ब्लोगिंग तो "अनजान सुजान, सदा कल्याण" वाली दुनिया है, यहाँ पर सभी मस्त लोग हैं। हर कोई अपने ब्लोग को "अपना मकान कोट समान" मान कर चलते हैं, "अपनी अपनी खाल में सब मस्त" हैं और "अपनी अपनी ढपली, अपना अपना राग" अलापते हुए अलमस्त रहते हैं।

तो हम भी हिन्दी ब्लोगिंग के रंग में पूरी तरह से रंग गये हैं। जब अंग्रेजी ब्लोग लिखते थे इंटरनेट मार्केटिंग के लिये प्लानिंग किया करते थे, अब हिन्दी ब्लोग लिखते हैं तो योजना बनाते हैं कि किसकी टाँगें खींची जाये, किसके धर्म की बखिया उधेड़ी जाये, पुरुष हैं इसलिये कैसे नारी को नीचा दिखाया जाये किसी ने कहा है "काजर की कोठरी में कैसे हु जतन करो, काजर की रेख एक लागिहैं पै लागिहैं"। यहाँ एक रेख लगना तो क्या पूरी तरह से कजरारे बन गये हैं और "नवपंक लोचन पंक मुख कर पंक पद पंकारुणम" वाला हमारा एक नया ही रूप उभर कर सामने आ रहा है।

अब तो हम भी यहाँ आकर मस्त हो गये हैं। विषय आधारित ब्लोग न बना कर अपने "आधा तीतर आधा बटेर" ब्लोग से ही खुश रहते हैं। भले ही अब हमारा हाल "आये थे हरि भजन को, ओटन लगे कपास" हो गया है पर किसी को बताते नहीं कि हम "धोबी के गधे, घर के ना घाट के" हो गये हैं। आखिर बताने से "अपनी जाँघ उघारिये, आपहि मरिये लाज" वाली मिसल ही तो चरितार्थ होगी। इसलिये "अब पछताये होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत" मंत्र को ध्यान में रखकर अपने ब्लोग में जो मन मे आता है वो लिख दिया करते हैं।

Monday, March 15, 2010

आना लंगूर के हाथ में हूर का ... बाद में पछताना लंगूर का

आप जितने भी जोड़े देखते होंगे उनमें से पंचान्बे प्रतिशत बेमेल ही मिलेंगे। पता नहीं क्या जादू है कि हमेशा हूर लंगूर के हाथों ही आ फँसती है। हमारे हाथ में भी आखिरकार एक हूर लग ही गई थी आज से चौंतीस साल पहले।

जब शादी नहीं हुई थी हमारी तो बड़े मजे में थे हम। अपनी नींद सोते थे और अपनी नींद जागते थे। न ऊधो का लेना था न माधो का देना। हमारा तो सिद्धान्त ही था "आई मौज फकीर की, दिया झोपड़ा फूँक"। याने कि अपने बारे में हम इतना ही बता सकते हैं कि आगे नाथ न पीछे पगहाकिसी के तीन-पाँच में कभी रहते ही नहीं थे हम। आप काज महाकाज समझ कर बस अपने काम से काम रखते थे हमारे लिये सभी लोग भले थे क्योंकि आप तो जानते ही हैं कि आप भला तो जग भला

पर थे एक नंबर के लंगूर हम। पर पता नहीं क्या देखकर एक हूर हम पर फिदा हो गई। शायद उसने हमारी शक्ल पर ध्यान न देकर हमारी अक्ल को परखा रहा होगा और हमें अक्ल का अंधा पाकर हम पर फिदा हो गई रही होगी। या फिर शायद उसने हमें अंधों में काना राजा समझ लिया होगा। या सोच रखा होगा कि शादी उसी से करो जिसे जिन्दगी भर मुठ्ठी में रख सको।

बस फिर क्या था उस हूर ने झटपट हमारी बहन से दोस्ती गाँठ ली और रोज हमारे घर आने लगी। "अच्छी मति चाहो, बूढ़े पूछन जाओ" वाले अन्दाज में हमारी दादी माँ को रिझा लिया। हमारे माँ-बाबूजी की लाडली बन गई। इधर ये सब कुछ हो रहा था और हमें पता ही नहीं था कि अन्दर ही अन्दर क्या खिचड़ी पक रही है

इतना होने पर भी जब उसे लगा कि दिल्ली अभी दूर है तो धीरे से हमारे पास आना शुरू कर दिया पढ़ाई के बहाने। किस्मत का फेर, हम भी चक्कर में फँसते चले गये। कुछ ही दिनों में आग और घी का मेल हो गया। आखिर एक हाथ से ताली तो बजती नहीं। हम भी "ओखली में सर दिया तो मूसलो से क्या डरना" के अन्दाज में आ गये। उस समय हमें क्या पता था कि अकल बड़ी या भैंस। गधा पचीसी के उस उम्र में तो हमें सावन के अंधे के जैसा हरा ही हरा सूझता था। अपनी किस्मत पर इतराते थे और सोचते थे कि बिन माँगे मोती मिले, माँगे मिले ना भीख

अब अपने किये का क्या इलाज? दुर्घटना घटनी थी सो घट गई। उसके साथ शादी हो गई हमारी। आज तक बन्द हैं हम उसकी मुठ्ठी में और भुगत रहे हैं उसको। अपने पाप को तो भोगना ही पड़ता है। ये तो बाद में समझ में आया कि लंगूर के हाथ में हूर फँसती नहीं बल्कि हूर ही लंगूर को फाँस लेती हैं कई बार पछतावा भी होता है पर अब पछताये होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत

Thursday, March 11, 2010

व्यथा बड़े गुरूजी की

चेलों ने परेशान कर रखा है बड़े गुरूजी को। सारे चेले उनके ऊपर "मान ना मान मैं तेरा मेहमान" बन कर पिल पड़े हैं। रोज ऐसा पोस्ट लिख देते हैं जिससे साबित हो जाये कि बड़े गुरूजी की सोच "अधजल गगरी छलकत जाय" है, बड़े गुरूजी "आँख के अन्धे और नाम के नैनसुख" हैं। बड़े गुरूजी के साथ साथ उनके ब्लोग को भी नहीं छोड़ते, उनके ब्लोग को चेलों ने "ऊँची दुकान फीका पकवान" बना कर रख दिया है। बेचारा बड़े गुरूजी का ब्लोग क्या जाने कि "गेहूँ के साथ घुन भी पिसता है"। चेलों के पोस्ट ऐसे होते हैं जैसे कि "हींग लगे ना फिटकिरी और रंग आये चोखा!" चेलों के इन पोस्ट को टिप्पणियाँ भी खूब मिल जाती हैं और बड़े गुरूजी की धुलाई भी हो जाती है। इसी को कहते हैं "आम के आम और गुठलियों के दाम!"

बड़े गुरूजी यदि कुछ कहते हैं तो उसके कथन को "थोथा चना बाजे घना" बता देते हैं। ये "उल्टा चोर कोतवाल को डाँटे" नहीं है तो क्या है भला? बड़े गुरूजी ने चेलों को शिक्षा देने की कोशिश क्या कर दी कि चेलों के लिये "बिल्ली के भागों छींका टूटा" हो गया। "रानी रूठेगी तो अपना सुहाग लेगी" और बड़े गुरूजी रूठेंगे तो अपना पोस्ट वापस लेंगे।

बड़े गुरूजी को तो यह भी पता नहीं है कि "अकल बड़ी या भैंस?"। सही बात तो यह है कि "अब आया है ऊँट पहाड़ के नीचे"। उनका हाल तो "खिसियानी बिल्ली खम्भा नोचे" जैसा होकर रह गया है और पछता रहे हैं इन्हें चेला बनाकर। पर "अब पछताये होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत!"

अब बड़े गुरूजी इस जुगाड़ में लगे हैं कि चेले मान जायें, पर उनकी कोशिश "का वर्षा जब कृषी सुखाने" बनकर रह जाती है। बड़े गुरूजी तो अब बस इतना ही चाह रहे हैं कि कैसे भी "अन्त भला सो भला" हो जाये।