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Tuesday, May 18, 2010

हिन्दी ब्लोगर्स - गूगल खोज परिणाम के अनुसार

कुछ अत्यन्त लोकप्रिय ब्लोगर्स

समीर लाल
खोज परिणाम लगभग 92,700

अनूप शुक्ल
खोज परिणाम लगभग 75,600






ज्ञानदत्त पाण्डेय
खोज परिणाम लगभग 76,300







P.C. Rampuria (ताऊ)
खोज परिणाम लगभग 3,620






कुछ नियमित लेखन करने वाले ब्लोगर्स

raviratlami (रवि रतलामी)
खोज परिणाम लगभग 161,000






पी.सी.गोदियाल
खोज परिणाम लगभग 128,000






दिनेशराय द्विवेदी
खोज परिणाम लगभग 74,700






राज भाटिया
खोज परिणाम लगभग 16,400
 





कुछ छत्तीसगढ़ के ब्लोगर्स

ललित शर्मा
खोज परिणाम लगभग 139,000






अनिल पुसदकर
खोज परिणाम लगभग 20,800






राजकुमार सोनी
खोज परिणाम लगभग 29,700






जी.के. अवधिया
खोज परिणाम लगभग 178,000






अपने पसंदीदा ब्लोगर्स के खोज परिणाम आप स्वयं भी गूगल सर्च करके देख सकते हैं, ध्यान रहे कि खोज करते समय ब्लोगर का नाम इनव्हर्टेड कामाज के बीच होना चाहिये।

भूल सुधार

ललित शर्मा जी ने निम्न टिप्पणी करके बताया है कि ताऊ जी के खोज परिणाम के मामले में हमसे एक गलती हो गई हैः

ऊपर जो P.C. ramapuria के नाम से सर्च रिजल्ट दिये गये हैं वो ताऊ के असली
सर्च रिजल्ट नही हैं. ताऊ ने उपरोक्त नाम से कमेंट करना काफ़ी पहले बंद कर दिया है.
ताऊ अब ताऊ के नाम से कमेंट करते हैं और इस ताऊ शब्द से सर्च करने पर मुझे
2,52,000 रिज्ल्ट प्राप्त हुये. यह सुधार अपेक्षित है.
अतः कृपया ताऊ जी के खोज परिणाम को 3,620 स्थान पर 2,52,000 पढ़ा जाये।


ललित जी को धन्यवाद देते हुए हम अपनी भूल के लिए खेद प्रकट करते हैं।

Tuesday, December 8, 2009

कल किया था एक सवाल ... जिसका जवाब है महिला ब्लोगर ने किया था कमाल!

अब आप पूछेंगे कि कैसे किया था महिला ब्लोगर ने कमाल? अभी बताता हूँ किन्तु उसके पहले आपको यह बता दूँ कि इस प्रश्न का सम्बन्ध व्यवहार विज्ञान से है और 'विशेष परिस्थिति में मनुष्य किस प्रकार से सोचता है' यही जानने के लिये इस प्रश्न को किया जाता है।

तो परिस्थिति यह थी कि सारे ब्लोगर्स विकट स्थिति में फँसे थे। चारों ओर रेत का विशाल सागर लहरा रहा था। अब बताइये कि ब्लोगर्स के लिये पहली सबसे बड़ी और समस्या क्या थी? वह थी उस विकट स्थिति याने कि रेगिस्तान से हर हाल में जल्दी से जल्दी बाहर निकलना। आखिर खाने पीने का जो भी सामान बचा लिया गया था वह कितने समय तक चलने वाला था?

बिना किसी प्रकार की सहायता के वे बाहर निकल नहीं सकते थे और सहायता देने के लिये वहाँ पर कोई भी नहीं था। तो कैसे मिलती सहायता? चूँकि वह रेगिस्तान एयर रूट के बीच में आता था इसलिये वहाँ पर से किसी न किसी प्लेन के गुजरने की पूरी पूरी सम्भावना थी। अब मान लीजिये कि कोई प्लेन उनके ऊपर से गुजरती भी तो वे उस प्लेन के भीतर के लोगों को अपने वहाँ फँसे होने के विषय में कोई संकेते कैसे दे पाते? संकेत देने का एक ही तरीका था सूर्य के प्रकाश को परावर्तित करके प्लेन के लोगों का ध्यान आकर्षित करना। ध्वनि संकेत कुछ भी काम नहीं आने वाला था। वे लोग कितना भी जोर लगा कर चिल्लाते या बंदूक पिस्तोल दाग कर आवाज करते, उनकी आवाज ऊपर आकाश में उड़ते हुए प्लेन तक पहुँचने वाली नहीं थी। यदि आवाज किसी प्रकार से वहाँ तक पहुँच भी जाती तो प्लेन के इंजिन के आवाज में दब जाने वाली थी। तो संकेते देने का एकमात्र तरीका था सनलाकइट को रिफ्लेक्ट करना जो कि सिर्फ दर्पन की सहायता से ही किया जा सकता था। और दर्पन केवल महिला ब्लोगर के मेकअप बॉक्स में ही मौजूद था।

दर्पन के द्वारा सूर्य के प्रकाश को सभी दिशाओं में परावर्तित करके भी संकेत भेजने का प्रयास किया जा सकता था ताकि यदि आसपास को गाँव, बस्ती या नगर जैसी रिहायशी स्थान हो तो वहाँ के लोगों को संदेश मिल जाये कि कोई रेगिस्तान में फँसा है।

तो बन्धुओं! आधे घंटे के भीतर ही उन ब्लोगर्स के ऊपर से एक प्लेन गुजरी तो उन्होंने दर्पन से सूर्य के प्रकाश को परावर्तित कर के उस प्लेन तक अपना संकेत भेजा। उनका संकेत मिलते ही प्लेन के स्टाफ ने समीप के उन सभी स्थानों में सूचना भेज दी और तत्काल सहायता भेज कर सभी ब्लोगर्स को रेगिस्तान से निकाल लिया गया।

तो किया ना कमाल महिला ब्लोगर ने अपना मेकअप बॉक्स बचा कर!

कुछ लोग कह सकते हैं कि प्रकाश संकेत तो टार्च से भी भेजा जा सकता था पर दिन में सूर्य के प्रकाश की वजह से टार्च का प्रकाश तो काम करने से रहा और रात में भी यह कहा नहीं जा सकता कि टार्च का प्रकाश काम कर पाता भी कि नहीं क्योंकि वह था तो टार्च ही, कोई शक्तिशाली सर्चलाइट थोड़े ही था।

कल के मेरे पोस्ट "किस ब्लोगर ने किया कमाल?" के सवाल के जवाब तो बहुत लोगों ने दिया टिप्पणी करके, जिसके लिये मैं सभी टिप्पणीकारों का आभारी हूँ, किन्तु लगता है कि सवाल को किसी ने भी गम्भीरता से नहीं लिया। हाँ अन्तर सोहिल जी ने कुछ सही दिशा में सोचते हुए टिप्पणी की थी किः

अन्तर सोहिल said...

कोई न कोई तो उन्हें ढूंढने जरूर आयेगा और संभव है कि हेलीकाप्टर से आये तो रात में तो टार्च से अच्छा साईन कुछ नही हो सकता और दिन के लिये जिसके पास माचिस है वो कुछ जला कर धुआं भी कर सकता है।
सच है कि "खुद के मरे बिना स्वर्ग नहीं दिखता"। क्योंकि घटना काल्पनिक थी और कोई भी ब्लोगर खुद नहीं फँसा था इसलिये किसी ने गम्भीरतापूर्वक सवाल का जवाब भी नहीं सोचा।

आखिर में एक बात और। वह यह कि पोस्ट तो हमने किया और दुनिया भर की तारीफ बटोर लिया ललित शर्मा जी ने क्योंकि उन्होंने बंदूक, पिस्तोल, चाकू आदि बचा लिये थे। इसी को कहते हैं "धक्का खाय पुजारी और मजा करे गिरधारी!" :-)

बधाई हो ललित जी!!!

चलते-चलते

एक दिन हम बहुत खुश थे तो खुशी खुशी में खुद ही खाना बनाने में भिड़ गये। श्रीमती जी भी खुश हो गईं कि चलो एक दिन के लिये ही सही खाना पकाने से छुट्टी तो मिली। हम किचन में थे और वे ड्राइंगरूम में बैठकर अपनी एक सहेली से गप शप करने में व्यस्त हो गईं।

कुछ ही देर में हमने किचन से ही चिल्लाकर पूछा, "अरे, नमक कहाँ रखा है?"

श्रीमती जी की ड्राइंगरूम से आवाज आई, "आपको तो कुछ मिलता ही नहीं। वो जो गरममसाला का डिब्बा है ना, जिस पर हल्दी लिखा हुआ कागज चिपका है, उसी में तो है नमक।"

Thursday, August 27, 2009

हिन्दी ब्लोग्स में हिज्जों और व्याकरण की गलतियाँ

यह खुशी की बात है कि हिन्दी ब्लोग्स की संख्या दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही हैं। नित नये नये लोग हिन्दी ब्लोगर्स बनते जा रहे हैं। पर जब कभी भी हिन्दी ब्लोग्स में "हम मुर्ख हैं", "बातें कि जाये" आदि पढ़ता हूँ तो मन क्षोभ से भर उठता है। अंग्रेजी के ब्लोग्स तथा वेबसाइट्स में इस बात का पूरा पूरा ध्यान दिया जाता है कि हिज्जों और व्याकरण की गलतियाँ न रह जायें और इसीलिए वहाँ पर ढूँढने से भी गलतियाँ नहीं मिलती।

यह सही है कि सभी हिन्दी ब्लोगर्स की मुख्य भाषा हिन्दी नहीं है इसलिए हिज्जों और व्याकरण की गलतियाँ होनी तो स्वाभाविक ही है। मगर कई बार उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ जैसे हिन्दीभाषी क्षेत्र के ब्लोग्स में भी हिज्जे और व्याकरण की गलतियाँ मिलती हैं। इसका मुख्य कारण सिर्फ यही लगता है कि हम हिन्दीभाषी ब्लोगर्स अपनी प्रविष्टियाँ आनन फानन में बिना जाँचे ही प्रकाशित कर देते हैं। यदि हम अपनी प्रविष्टियाँ प्रकाशित करने के पहले एक बार उसे पढ़ लें तो इस प्रकार की गलतियाँ हो ही नहीं सकती।

हिन्दी को इंटरनेट की प्रमुख भाषाओं में से एक बनाने के लिए हमें उसकी गुणवत्ता पर पूरा पूरा ध्यान रखना ही होगा। इसके लिए हम सभी हिन्दी ब्लोगर्स को संकल्प लेना होगा कि अपनी प्रविष्टि प्रकाशित करने के पूर्व हम सुनिश्चित हो जाएँ कि कहीं कोई हिज्जे या व्याकरण की गलती तो नहीं रह गई है।