पल तो पल होता है! कब आता है और कब निकल जाता है पता ही नहीं चल पाता! फिर भी अनेक बार ऐसा होता है कि वही पल युग बन जाता है, बिताए नहीं बीतता। क्या समय की गति भी अलग-अलग समय में अलग-अलग होती है?
क्यों कभी समय पंख लगा कर उड़े चला जाता है और कभी काटे भी नहीं कट पाता?
उत्सव की रात को सभी अपने एक साथ होते हैं और घर में सायंकाल किसी की मृत्यु हो गई हो और रातभर उसकी लाश पड़ी हो तो भी सभी अपने एक साथ होते हैं किन्तु पहली रात अर्थात् उत्सव वाली रात के बीतने का पता भी नहीं चल पाता और दूसरी रात काटे नहीं कटती।
क्यों होता है ऐसा?
क्यों खुशी के दिनों के बीतने का पता भी नहीं चल पाता और क्यों दुःख के दिन पहाड़-से लगने लगते हैं?
ऐसा प्रतीत होता है कि महान वैज्ञानिक आइंसटाइन का विशिष्ट सापेक्षता का सिद्धान्त (Special Theory of Relativity) समय पर भी लागू होता है। समय की गति हमारे मन की अवस्था के सापेक्ष होता है। हम सुखी होते हैं तो हमारे लिए समय की गति तेज होती है और जब हम दुखी होते हैं तो हमारे लिए हमारे लिए उसी समय की गति धीरे हो जाती है। इसीलिए रहीम कवि ने कहा हैः
रहिमन चुप ह्वै बैठिए देख दिनन के फेर।
जब नीके दिन आइहैं बनत न लगिहै देर॥
केवल धीर मनुष्य ही अपने मन की अवस्था पर नियन्त्रण रख सकता है और उसके लिए समय की गति सदैव एक समान होती है। इसीलिए हमारी संस्कृति हमें धीर बनने की शिक्षा देती है।
Thursday, October 28, 2010
Monday, October 25, 2010
शिक्षा का उद्देश्य ज्ञानार्जन या धनार्जन?
आज अपने बच्चों को यदि आप अच्छी शिक्षा दिलवाना चाहते हैं तो आपको फीस, पुस्तकें आदि के लिए लाखों रुपये सालाना खर्च करना पड़ता है। विद्यालय और महाविद्यालय शिक्षा के केन्द्र न होकर शिक्षा की दूकानें बन कर रह गई हैं। जितनी महँगी दूकान में जाकर आप खरीदी करेंगे उतना ही अच्छा(?) माल आपको मिलेगा। माल याने कि शिक्षा। अब इतना रुपया खर्च करके शिक्षा प्राप्त करने वाला यदि अपनी शिक्षा के बदले में मोटी पगार वाली नौकरी की कामना करे या यदि उसने डॉक्टरी की शिक्षा ली है तो एक बहुत आलीशान मगर मँहगा अस्पताल, जहाँ से रोज इफरात कमाई हो, का मालिक बनना पसंद करे तो इसमें भला अस्वाभाविक क्या है? कई लाख रुपये खर्च करके इंजीनियर बनने वाला मोटे पगार के साथ ही ऊपर की कमाई ना करे तो इतना खर्च करके इंजीनियर बनने का क्या फायदा? इफरात रुपया लुटा कर डॉक्टर की डिग्री पाने वाला डॉक्टर यदि चिकित्सा के साथ ही अस्पताल को फाइव स्टार होटल बनाकर उससे कमाई ना करे तो डॉक्टर बनने के लिए इफरात रुपया लुटाने का क्या फायदा?
और यदि इफरात रुपया खर्च करने में आप समर्थ नहीं हैं तो आपकी सन्तान को अच्छी शिक्षा के अभाव में धनार्जन से वंचित रहना पड़ेगा। किन्तु उदरपूर्ति के लिए धन तो आवश्यक है इसलिए वे या तो हम्माली, आटो रिक्शा चलाना आदि जैसे कार्य करने लगेंगे या फिर अधिक से अधिक वे सरकारी दफ्तरों में स्टोर-कीपर, क्लर्क आदि जैसी छोटी-मोटी नौकरी करने लगेंगे।
आज यदि कोई कहे कि विद्या का मोल नहीं होता, यह एक अनमोल वस्तु है, तो यह बात गले से नीचे नहीं उतरेगी। किन्तु हमारे देश में युगों यही मान्यता रही है कि विद्या धन अनमोल है। इसी कारण से हमारे देश में गुरु विद्या का दान किया करते थे, शिष्य को इतना ज्ञान होता था कि वह गुरु के द्वारा दिए गए विद्या का मोल चुका ही नहीं सकता इसीलिए वह गुरु के सम्मान प्रदर्शन के लिए गुरु-दक्षिणा देता था, फीस याने कि विद्या का दाम नहीं। प्राचीनकाल में नालन्दा, विक्रमशिला जैसे विश्वविद्यालयों और कालान्तर में वाराणसी जैसे शिक्षा केन्द्र के माध्यम से समस्त संसार को शिक्षित करने वाले भारतवर्ष का विश्व में मान इसीलिए था क्योंकि इस देश में विद्या खरीदने-बेचने की चीज न होकर दान में देने की वस्तु थी। हमारे यहाँ विद्या का व्यापार नहीं होता था। भारत की इसी विशेषता ने भारत को सम्पूर्ण विश्व में विद्या के क्षेत्र में अग्रणी बना दिया था। अधिक नहीं मात्र चार सौ साल पहले अर्थात् सत्रहवी शताब्दी तक भारत शिक्षा के प्रचार में यूरोप के सभी देशों से आगे था और हमारे देश में पढ़े-लिखे लोगों का प्रतिशत अन्य देशों की अपेक्षा बहुत अधिक था। हजारों की संख्या में ब्राह्मण शिक्षक अपने-अपने घरों में लाखों शिष्यों को मुफ्त शिक्षा प्रदान किया करते थे। समस्त भारत में जहाँ संस्कृत-साहित्य की शिक्षा के लिए विद्यापीठ थे वहीं साथ ही साथ उर्दू-फारसी की शिक्षा के लिए विद्यापीठ तथा मक़तब और मदरसे कायम थे। छोटे-छोटे गाँवों में भी ग्राम-पंचायतों के नियन्त्रण में पाठशालाएँ चला करती थीं। और उन दिनों आत्मनिर्भरता की शिक्षा दी जाती थी, धन का महत्व उतना ही बताया जाता था जितना कि होना चाहिए। इसीलिए कहा गया थाः
साँईं इतना दीजिए जामे कुटुम समाय।
मैं भी भूखा ना रहूँ साधु न भूखा जाय॥
इसी बात पर जोर दिया जाता था कि धनार्जन उतना ही आवश्यक है जितने की वास्तव में जरूरत है। आवश्यकता से अधिक धनार्जन को अनावश्यक माना जाता था।
किन्तु इन चार सौ वर्षों में ऐसा कुछ उलट-फेर हुआ कि इस देश की सन्तानों ने विदेशी भाषा और साहित्य के अध्ययन को अपनी भाषा और साहित्य के अध्ययन से अधिक महत्व देना शुरू कर दिया। अंग्रेजी पढ़े-लिखे लोगों की एक अलग जमात बन गई जिन्हें अपने देशवासियों से सहानुभूति ही नहीं रही या रही भी तो बहुत कम। देश के प्राचीन गौरव, परम्परा, इतिहास आदि से उन्हें कुछ मतलब ही नहीं रहा। और इसका परिणाम यह है कि आज हम तथा हमारे बच्चे अपनी संस्कृति और सभ्यता को हेय दृष्टि से देखते हैं।
परतन्त्र देश स्वतन्त्र तो हो गया किन्तु शिक्षा परतन्त्रता वाली ही रही। स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद भी शिक्षा के क्षेत्र में हम परतन्त्र ही रहे। यही कारण है कि हम अन्य देशों की शिक्षा-पद्धति को अपने देश की शिक्षा-पद्धति से उत्तम मानते हैं। गुरु-शिष्य परम्परा तो बहुत पहले ही खत्म हो गई थी, बाद में गुरुकुल की परम्परा भी समाप्त हो गई। आज संसार को शिक्षा देने वाले भारत के लोगों को उच्च शिक्षा के लिए विदेश जाना पड़ता है। सिर्फ इतना ही नहीं, इस देश के पास अपनी मौलिक शिक्षा-नीति बनाने की सामर्थ्य ही नहीं रह गई है और यहाँ पर दूसरों की शिक्षा-नीति के आधार पर शिक्षा देना एक विवशता बन गई है। यही कारण है कि विद्या व्यापार की वस्तु बन चुकी है, शिक्षा का उद्देश्य ज्ञानार्जन न होकर धनार्जन हो चुका है। भले ही विद्या और चिकित्सा जैसी वस्तुओं को बेचना पड़े, मिथ्या-भाषण करना पड़े, भ्रष्टाचार करना पड़े या किसी का गला ही क्यों ना काटना पड़ जाए, धनार्जन होना ही चाहिए क्योंकि हमने धन कमाने के लिए शिक्षा प्राप्त की है और वह भी मुफ्त में नहीं बल्कि धन लुटाकर!
और यदि इफरात रुपया खर्च करने में आप समर्थ नहीं हैं तो आपकी सन्तान को अच्छी शिक्षा के अभाव में धनार्जन से वंचित रहना पड़ेगा। किन्तु उदरपूर्ति के लिए धन तो आवश्यक है इसलिए वे या तो हम्माली, आटो रिक्शा चलाना आदि जैसे कार्य करने लगेंगे या फिर अधिक से अधिक वे सरकारी दफ्तरों में स्टोर-कीपर, क्लर्क आदि जैसी छोटी-मोटी नौकरी करने लगेंगे।
आज यदि कोई कहे कि विद्या का मोल नहीं होता, यह एक अनमोल वस्तु है, तो यह बात गले से नीचे नहीं उतरेगी। किन्तु हमारे देश में युगों यही मान्यता रही है कि विद्या धन अनमोल है। इसी कारण से हमारे देश में गुरु विद्या का दान किया करते थे, शिष्य को इतना ज्ञान होता था कि वह गुरु के द्वारा दिए गए विद्या का मोल चुका ही नहीं सकता इसीलिए वह गुरु के सम्मान प्रदर्शन के लिए गुरु-दक्षिणा देता था, फीस याने कि विद्या का दाम नहीं। प्राचीनकाल में नालन्दा, विक्रमशिला जैसे विश्वविद्यालयों और कालान्तर में वाराणसी जैसे शिक्षा केन्द्र के माध्यम से समस्त संसार को शिक्षित करने वाले भारतवर्ष का विश्व में मान इसीलिए था क्योंकि इस देश में विद्या खरीदने-बेचने की चीज न होकर दान में देने की वस्तु थी। हमारे यहाँ विद्या का व्यापार नहीं होता था। भारत की इसी विशेषता ने भारत को सम्पूर्ण विश्व में विद्या के क्षेत्र में अग्रणी बना दिया था। अधिक नहीं मात्र चार सौ साल पहले अर्थात् सत्रहवी शताब्दी तक भारत शिक्षा के प्रचार में यूरोप के सभी देशों से आगे था और हमारे देश में पढ़े-लिखे लोगों का प्रतिशत अन्य देशों की अपेक्षा बहुत अधिक था। हजारों की संख्या में ब्राह्मण शिक्षक अपने-अपने घरों में लाखों शिष्यों को मुफ्त शिक्षा प्रदान किया करते थे। समस्त भारत में जहाँ संस्कृत-साहित्य की शिक्षा के लिए विद्यापीठ थे वहीं साथ ही साथ उर्दू-फारसी की शिक्षा के लिए विद्यापीठ तथा मक़तब और मदरसे कायम थे। छोटे-छोटे गाँवों में भी ग्राम-पंचायतों के नियन्त्रण में पाठशालाएँ चला करती थीं। और उन दिनों आत्मनिर्भरता की शिक्षा दी जाती थी, धन का महत्व उतना ही बताया जाता था जितना कि होना चाहिए। इसीलिए कहा गया थाः
साँईं इतना दीजिए जामे कुटुम समाय।
मैं भी भूखा ना रहूँ साधु न भूखा जाय॥
इसी बात पर जोर दिया जाता था कि धनार्जन उतना ही आवश्यक है जितने की वास्तव में जरूरत है। आवश्यकता से अधिक धनार्जन को अनावश्यक माना जाता था।
किन्तु इन चार सौ वर्षों में ऐसा कुछ उलट-फेर हुआ कि इस देश की सन्तानों ने विदेशी भाषा और साहित्य के अध्ययन को अपनी भाषा और साहित्य के अध्ययन से अधिक महत्व देना शुरू कर दिया। अंग्रेजी पढ़े-लिखे लोगों की एक अलग जमात बन गई जिन्हें अपने देशवासियों से सहानुभूति ही नहीं रही या रही भी तो बहुत कम। देश के प्राचीन गौरव, परम्परा, इतिहास आदि से उन्हें कुछ मतलब ही नहीं रहा। और इसका परिणाम यह है कि आज हम तथा हमारे बच्चे अपनी संस्कृति और सभ्यता को हेय दृष्टि से देखते हैं।
परतन्त्र देश स्वतन्त्र तो हो गया किन्तु शिक्षा परतन्त्रता वाली ही रही। स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद भी शिक्षा के क्षेत्र में हम परतन्त्र ही रहे। यही कारण है कि हम अन्य देशों की शिक्षा-पद्धति को अपने देश की शिक्षा-पद्धति से उत्तम मानते हैं। गुरु-शिष्य परम्परा तो बहुत पहले ही खत्म हो गई थी, बाद में गुरुकुल की परम्परा भी समाप्त हो गई। आज संसार को शिक्षा देने वाले भारत के लोगों को उच्च शिक्षा के लिए विदेश जाना पड़ता है। सिर्फ इतना ही नहीं, इस देश के पास अपनी मौलिक शिक्षा-नीति बनाने की सामर्थ्य ही नहीं रह गई है और यहाँ पर दूसरों की शिक्षा-नीति के आधार पर शिक्षा देना एक विवशता बन गई है। यही कारण है कि विद्या व्यापार की वस्तु बन चुकी है, शिक्षा का उद्देश्य ज्ञानार्जन न होकर धनार्जन हो चुका है। भले ही विद्या और चिकित्सा जैसी वस्तुओं को बेचना पड़े, मिथ्या-भाषण करना पड़े, भ्रष्टाचार करना पड़े या किसी का गला ही क्यों ना काटना पड़ जाए, धनार्जन होना ही चाहिए क्योंकि हमने धन कमाने के लिए शिक्षा प्राप्त की है और वह भी मुफ्त में नहीं बल्कि धन लुटाकर!
Saturday, October 23, 2010
स्वप्न वासवदत्ता - अंक 6 (संस्कृत नाटक का संपादित सरल हिन्दी रूपान्तर)
पिछला अंक - स्वप्न वासवदत्ता - अंक 5 (संस्कृत नाटक का संपादित सरल हिन्दी रूपान्तर)
(कंचुकी का प्रवेश)
कंचुकीः प्रतिहारी! प्रतिहारी!
प्रतिहारीः (प्रवेश करके) आर्य! मैं, विजया, यहाँ का प्रतिहारी हूँ। क्या आदेश है?
कंचुकीः विजया, वत्स देश को विजित कर विशेष रूप से उदित हुए वत्सराज से निवेदन करो कि महासेन के राज्य उज्जयिनी से रैभ्य गोत्र का कंचुकी आपकी सेवा में उपस्थित होना चाहता है। उस कंचुकी के साथ आर्या वसुधारा नामक वासवदत्ता की धाय भी है जिन्हें देवी अंगारवती ने भेजा है।
प्रतिहारीः आर्य! सन्देश के लिए यह न तो उचित स्थान है और न ही उचित समय।
कंचुकीः क्यों? स्थान और समय उचित क्यों नहीं हैं?
प्रतिहारीः वत्सराज के पूर्व प्रासाद में आज कोई वीणा-वादन कर रहा था। उसे सुनकर महाराज ने कहा यहो घोषवती वीणा का स्वर प्रतीत हो रहा है।
कंचुकीः अच्छा! उसके बाद?
प्रतिहारीः वह वास्तव में घोषवती वीणा ही थी। पूछने पर वीणा-वादके बताया कि यह वीणा उसे नर्मदा के तीर एक कुंज में मिला था, यदि महाराज चाहें तो इसे ले सकते हैं। उस वीणा को महाराज के पास लाने पर महाराज उसे हृदय से लगाकर अचेत हो गए। चेत में आने पर "हा घोषवती! तू मुझे पुनः प्राप्त हो गई किन्तु वासवदत्ता नहीं मिली" कहकर और आर्या वासवदत्ता का स्मरण कर विलाप करने लगे। उनके नेत्र अश्रुपूर्ण हो गए। इसीलिए स्थान और समय उपयुक्त नहीं है।
कंचुकीः देवि! तुम जाकर निवेदन कर दो क्योंकि हमारा सन्देश भी वासवदत्ता से ही सम्बन्धित है।
प्रतिहारीः जैसी आपकी आज्ञा! महाराज पूर्व प्रासाद से यहाँ ही आ रहे हैं, उनके आने पर निवेदन कर दूँगी।
कंचुकीः ऐसा ही करो देवि!
(दोनों का प्रस्थान)
(उदयन और विदूषक का प्रवेश)
उदयनः (घोषवती वीणा को देखकर) हे मधुरवादिनी! हे घोषवती! तेरा स्थान तो देवि वासवदत्ता की जंघाओं और स्तन-युगल के मध्य था। तूने इतना समय पक्षियों के रज से भरे वन में कैसे व्यतीत किया? घोषवती! तू निश्चय ही स्नेहरहित है इसीलिए तूने देवि वासवदत्ता को विस्मृत कर दिया है।
विदूषकः मित्र! दुःख प्रकाशन बहुत हो चुका। अब और विलाप न करें। शान्ति धारण करें।
उदयनः मित्र! इस घोषवती ने मेरी सुप्त कामना को जागृत कर दिया है। मित्र वसन्तक! इस घोषवती को शिल्पियों के पास ले जाकर इसका पुनरुद्धार करवाओ।
विदूषकः जैसी आज्ञा!
(वीणा को लेकर विदूषक का प्रस्थान)
प्रतिहारीः (प्रवेश करके) महाराज की जय हो! अवन्तिनरेश महासेन के यहाँ से रैभ्य गोत्र के कंचुकी और देवी अंगारवती द्वारा भेजी गईं महारानी वासवदत्ता की धाय आर्या वसुधारा द्वार पर उपस्थित हैं।
उदयनः तो तुम पहले देवि पद्मावती को यहाँ बुला लाओ।
प्रतिहारीः जैसी आज्ञा!
(प्रतिहारी का प्रस्थान)
उदयनः (स्वगत्) प्रतीत होता है कि देवि वासवदत्ता के साथ घटित दुर्घटना का समाचार महाराज महासेन को प्राप्त हो गया है।
(पद्मावती और प्रतिहारी का प्रवेश)
प्रतिहारीः देवि! पधारें।
पद्मावतीः (प्रवेश करके) आर्यपुत्र की जय हो!
उदयनः बैठो देवि! महाराज महाराज महासेन के कंचुकी और देवि अंगारवती की भेजी वासवदत्ता की धाय आर्या वसुधारा द्वार पर उपस्थित हैं।
पद्मावतीः तो क्या आर्यपुत्र मेरे समक्ष ही उनसे भेंट करेंगे?
उदयनः अवश्य! इसमें दोष ही क्या है?
पद्मावतीः सम्भव है कि आर्यपुत्र की द्वितीय भार्या को देखकर उनकी भावनाएँ आहत हों!
उदयनः तुम्हें देखने का उन्हें पूर्ण अधिकार है! उनके अधिकार से उन्हें वंचित करना उनका अनादर होगा। मैं उनका अनादर करके दोष का पात्र नहीं बनना चाहता। अतः तुम मेरे साथ ही बैठो।
पद्मावतीः जैसी आर्यपुत्र की आज्ञा! (बैठकर) आर्यपुत्र! मेरा हृदय व्याकुल हो रहा है, न जाने मेरे पिता और माता ने क्या सन्देश भेजा होगा!
उदयनः देवि! मेरा भी हृदय व्याकुल हो रहा है। मैं उनकी कन्या को हर कर ले आया था किन्तु उसकी रक्षा न कर सका। चंचल भाग्य ने उसकी रक्षा करने के मेरे गुण का नाश कर दिया। पिता अवश्य ही कुपित होंगे। मैं स्वयं को उनका अपराधी अनुभव कर रहा हूँ।
पद्मावतीः आर्यपुत्र! इसमें आपका तनिक भी दोष नहीं है। दैव प्रबल होता है। काल से भला कैसे किसी की रक्षा की जा सकती है?
प्रतिहारीः (प्रवेश करके) महाराज की जय हो! कंचुकी और धाय द्वार पर उपस्थित हैं।
उदयनः शीघ्र से शीघ्र उन्हें आदरसहित यहाँ लाओ।
प्रतिहारीः जैसी आपकी आज्ञा!
(कंचुकी का प्रस्थान)
कंचुकीः अपने सम्बन्धी के राज्य में आकर जितनी मुझे प्रसन्नता हो रही है, राजपुत्री का स्मरण करके उससे भी अधिक मुझे विषाद हो रहा है। कितना अच्छा होता यदि भले ही वत्सराज का राज्य उन्हें पुनः प्राप्त न होता किन्तु उनकी पूर्वपत्नी जीवित होतीं।
(प्रतिहारी का कंचुकी और धाय के साथ प्रवेश)
प्रतिहारीः महाराज की जय हो! कंचुकी और आर्या वसुधारा उपस्थित हैं।
कंचुकीः वत्सराज की जय हो!
धायः महाराज की जय हो!
उदयनः (आदरसहित) हे आर्य! समस्त पृथ्वी के नरेशों के उदय अथवा अस्त कर देने में समर्थ अवन्तिनरेश सकुशल तो हैं?
कंचुकीः वे सकुशल हैं और आपकी कुशलता की कामना करते हैं।
उदयनः (आसन से उठकर) अवन्तिनरेश की मेरे लिए क्या आज्ञा है?
कंचुकीः आपकी शिष्टता आपके अभिजात्य कुल के अनुकूल है, किन्तु आप आसन ग्रहण करें और महाराज महासेन का सन्देश सुनें।
उदयनः जैसी महासेन की आज्ञा! (बैठता है)
कंचुकीः प्रसन्नता की बात है कि शत्रुओं द्वारा अपहृत आपका राज्य सौभाग्यवश आपको पुनः प्राप्त हुआ! राज्यश्री का भोग शक्तिहीन राजा अधिक काल तक नहीं कर सकते। आपके शत्रु शक्तिहीन थे इसलिए आपका राज्य पुनः शक्तिशाली राजा के पास लौट आया।
उदयनः यह सब महाराज महासेन के प्रताप से ही हुआ है। मेरे पराजित हो जाने पर भी उन्होंने मुझसे पुत्रवत व्यवहार ही रखा। मैं उनकी कन्या को हर लाया किन्तु उसकी रक्षा नहीं कर सका, तथापि मेरे प्रति उनका आदरभाव बना हुआ है।
कंचुकीः हमारे महाराज ने यही सन्देश भिजवाया है कि वे आपका आदर करते हैं और उनके हृदय में आपके प्रति किसी प्रकार की दुर्भावना नहीं है। अब देवि अंगारवती का सन्देश आर्या वसुधारा आपसे कहेंगीं।
उदयनः हे माता! देवि अंगारवती सकुशल तो हैं।
धायः वे स्वस्थ हैं और सर्वत्र आपकी कुशलता पूछती हैं।
उदयनः हा! धिक! मैं उनकी कन्या की रक्षा नहीं कर सका।
कंचुकीः धैर्य धारण करें वत्सराज! महाराज महासेन की कन्या मर कर भी नहीं मरी हैं क्योंकि आप उनका स्नेहपूर्वक स्मरण करते हैं। काल से कौन किसी की रक्षा कर सकता है? डोर के टूट जाने पर घड़े को कौन बचा सकता है? वनस्पतियों की भाँति ही मनुष्य भी समय आने पर पल्लवित होते हैं और समय आने पर कुम्हला जाते हैं।
उदयनः मैं महाराज महासेन की दुहिता, अपनी प्रिय शिष्या तथा प्रियतमा को कैसे विस्मृत कर सकता हूँ! मेरे लिए तो उनका विस्मरण जन्म-जन्मान्तर तक सम्भव नहीं है।
धायः महाराज! महिषी अंगारवती ने कहा है - यद्यपि वासवदत्ता हम सब को छोड़ कर चली गई तथापि तुम मुझे और महाराज महासेन को गोपालक और पालक की भाँति प्रिय हो। तुम हमारे मनोनीत जामाता हो। तुम्हें उज्जयिनी लाया ही गया था वासवदत्ता से तुम्हारे विवाह के उद्देश्य से। तुम हमारी इच्छा को न जान पाये और वासवदत्ता के साथ अग्नि के सात फेरे लिए बिना ही वासवदत्ता को साथ लेकर चले गए तो हमने तुम्हारा और वासवदत्ता का चित्र बनवाकर तुम दोनों का विवाह सम्पन्न किया। अब हम उसी चित्रफलक को तुम्हारे पास भेज रहे हैं जिससे कि तुम्हें सुख और शान्ति प्राप्त हो सके।
उदयनः माता का सन्देश उनकी महानता के अनुरूप ही है! मुझ अपराधी पर उन्होंने अपना स्नेह बनाए रखा है। मेरे लिए उनका यह सन्देश सौ राज्यों की प्राप्ति से भी बढ़कर है।
पद्मावतीः आर्यपुत्र! मैं आर्या वासवदत्ता के चित्र को को देखकर उनका अभिवादन करना चाहती हूँ।
धायः अवश्य भर्तृदारिके! आप वासवदत्ता के चित्र को अवश्य देखें।
पद्मावतीः (चित्र देखकर, स्वगत्) यह तो आर्या अवन्तिका के चित्र के सदृश प्रतीत हो रहा है। (प्रकट) आर्यपुत्र! क्या यह चित्र आर्या वासवदत्ता के सदृश है?
उदयनः सदृश ही नहीं, मुझे तो प्रतीत हो रहा है कि वे स्वयं मेरे समक्ष उपस्थित हैं।
पद्मावतीः मैं आर्यपुत्र के चित्र को भी देखकर निश्चय करना चाहती हूँ कि चित्रकार ने चित्र को आर्यपुत्र के सदृश ही बनाया है या नहीं।
धायः (चित्र देकर) देखें, देखें, भद्रिके!
पद्मावतीः (चित्र देखकर) इस प्रतिकृति का तो आर्यपुत्र से अच्छा सादृश्य है।
उदयनः देवि! चित्रों को देखकर आप उद्विग्न क्यों हैं?
पद्मावतीः आर्या वासवदत्ता के चित्र के सदृश एक व्यक्ति यहाँ भी है।
उदयनः वासवदत्ता के सदृश?
पद्मावतीः हाँ, आर्यपुत्र!
उदयनः तो शीघ्र उसे यहाँ बुलाओ।
पद्मावतीः विवाह के पूर्व किसी ब्राह्मण ने उसे अपनी भगिनी बता कर थाती के रूप में मुझे सौंपा था। विवाहित होने के कारण वे किसी परपुरुष के समक्ष नहीं आतीं।
उदयनः यदि वह किसी ब्राह्मण की भगिनी है तो उसे कोई अन्य ही होना चाहिए। सम्भवतः उसका रूप वासवदत्ता के सदृश हो।
प्रतिहारीः (प्रवेश करके) महाराज की जय हो। द्वार पर उज्जयिनी से आया एक ब्राह्मण उपस्थित है जो कह रहा है कि उसकी भगिनी महारानी के पास थाती है। वे अपनी भगिनी को लेने आए हैं।
पद्मावतीः आर्यपुत्र! सम्भवतः यह वही ब्राह्मण हो सकते हैं।
उदयनः (प्रतिहारी से) ब्राह्मण को शीघ्र यहाँ उपस्थित करो।
प्रतिहारीः जैसी महाराज की आज्ञा! (प्रस्थान करता है)
उदयनः (पद्मावती से) देवि! तुम भी आर्या को यहाँ बुला लो।
पद्मावतीः आर्यपुत्र की जैसी आज्ञा।
(पद्मावती का प्रस्थान)
(प्रतिहारी के साथ यौगन्धरायण का ब्राह्मण के वेष में प्रवेश)
यौगन्धरायणः (स्वगत्) आर्या वासवदत्ता को महाराज से कुछ काल तक अलग रखने में महाराज का कल्याण करना ही मेरा उद्देश्य था। मेरा कार्य अब सिद्ध हो चुका है। अब देखूँ, महाराज की प्रतिक्रया है।
प्रतिहारीः आर्य! इधर आएँ, महाराज यहाँ हैं।
यौगन्धरायणः महाराज की जय हो!
उदयनः (स्वगत्) यह स्वर तो परिचित-सा प्रतीत हो रहा है।
(पद्मावती और अवन्तिका के वेष वासवदत्ता का प्रवेश)
पद्मावतीः आएँ आर्ये! आएँ! आपके लिए प्रिय संवाद है!
वासवदत्ताः वह क्या?
पद्मावतीः आपके भ्राता आपको लेने आए हैं।
वासवदत्ताः यह मेरा सौभाग्य है कि उन्होंने मेरा स्मरण किया।
पद्मावतीः आर्यपुत्र, यही आर्या ही वह थाती हैं।
उदयनः देवि! थाती लौटा दो। सौभाग्य से यहाँ रैभ्य और आर्या वसुधारा थाती लौटाने के साक्षी के रूप में उपस्थित हैं।
पद्मावतीः (यौगन्धरायण से) आर्य! मैं आपकी भगिनी आपको लौटा रही हूँ।
धायः (अवन्तिका को ध्या से देखकर) यह क्या? यह तो राजकुमारी वासवदत्ता हैं।
उदयनः क्या? अवन्तिनरेश की पुत्री? तो देवि तुम पद्मावती के साथ अन्तःपुर में प्रवेश करो।
यौगन्धरायणः नहीं नहीं। आप उन्हें अन्तःपुर में प्रवेश की आज्ञा न दीजिए, वे मेरी भगिनी हैं। आप भरत के कुल में उत्पन्न ज्ञानवान राजा हैं, राजधर्म के ज्ञाता हैं, आप बलपूर्वक मेरी भगिनी का हरण क्यों कर रहे हैं।
उदयनः तब मुझे रूपसादृश्य देखना होगा। देवि! किंचित यवनिका हटा दो।
यौगन्धरायणः स्वामी की जय हो!
वासवदत्ताः आर्यपुत्र की जय हो!
उदयनः अरे! यह तो यौगन्धरायण हैं और यह देवि वासवदत्ता! यह सत्य है अथवा मैं स्वप्न देख रहा हूँ? पूर्व में भी मैंने एक बार स्वप्न में देवि वासवदत्ता को देखा था।
यौगन्धरायणः महाराज, आर्या वासवदत्ता को आपसे अलग करने का मैं अपराधी हूँ। किन्तु मैंने यह अपराध महाराज और राज्य के कल्याण के उद्देश्य से किया है अतः मेरा अपराध क्षमा करें।
उदयनः आर्य यौगन्धरायण! आपके ही यत्न से इस डूबते हुए राज्य की रक्षा हुई है। आप अपराधी कदापि नही हैं।
पद्मावतीः (वासवदत्ता के चरणों में गिरकर) आर्ये आपके साथ सखी-भाव से व्यहार करके मैंने अपराध किया है। यह अपराध मुझसे अनजाने में हुआ है अतः मुझे क्षमा करें।
वासवदत्ताः (पद्मावती को उठाते हुए) उठो सुहागन! उठो! तुमसे कोई अपराध नहीं हुआ है।
पद्मावतीः अनुग्रहीत हुई।
उदयनः आर्य यौगन्धरायण देवि वासवदत्ता को मुझसे अलग करने में तो आपका उद्देश्य राज्य का कल्याण था किन्तु उन्हें देवि पद्मावती के आश्रय में रखने से आपका क्या तात्पर्य था?
यौगन्धरायणः पुष्पकभद्र और दैवचिन्तक आदि ज्योतिषियों ने भविष्यवाणी की थी कि आर्या पद्मावती आपकी रानी बनेंगी, इसीलिए मैंने आर्या वासवदत्ता को उनके सानिध्य में रखा।
उदयनः क्या यह सब रुम्णवान् को भी ज्ञात था?
यौगन्धरायणः महाराज, यह तो समस्त विश्वस्त अमात्यों को ज्ञात था।
उदयनः ओह, रुम्णवान तो बहुत बड़ा शठ है।
यौगन्धरायणः स्वामी! इस शुभ समाचार को महाराज महासेन तक पहुँचाने के लिए आर्य रैभ्य और आर्या वसुधारा को आज ही लौटने की आज्ञा दें।
उदयनः नहीं, नहीं, देवी पद्मावती और देवि वासवदत्ता सहित हम सब महाराज महासेन के समक्ष उपस्थित होंगे।
यौगन्धरायणः जैसी महाराज की आज्ञा! मेरा आशीर्वाद है कि हिमालय और विन्ध्याचल की भाँति अलंकारों से अलंकृत इस ससागरा पृथ्वी का आप सिंहवत् शासन करें।
(सब का प्रस्थान)
(कंचुकी का प्रवेश)
कंचुकीः प्रतिहारी! प्रतिहारी!
प्रतिहारीः (प्रवेश करके) आर्य! मैं, विजया, यहाँ का प्रतिहारी हूँ। क्या आदेश है?
कंचुकीः विजया, वत्स देश को विजित कर विशेष रूप से उदित हुए वत्सराज से निवेदन करो कि महासेन के राज्य उज्जयिनी से रैभ्य गोत्र का कंचुकी आपकी सेवा में उपस्थित होना चाहता है। उस कंचुकी के साथ आर्या वसुधारा नामक वासवदत्ता की धाय भी है जिन्हें देवी अंगारवती ने भेजा है।
प्रतिहारीः आर्य! सन्देश के लिए यह न तो उचित स्थान है और न ही उचित समय।
कंचुकीः क्यों? स्थान और समय उचित क्यों नहीं हैं?
प्रतिहारीः वत्सराज के पूर्व प्रासाद में आज कोई वीणा-वादन कर रहा था। उसे सुनकर महाराज ने कहा यहो घोषवती वीणा का स्वर प्रतीत हो रहा है।
कंचुकीः अच्छा! उसके बाद?
प्रतिहारीः वह वास्तव में घोषवती वीणा ही थी। पूछने पर वीणा-वादके बताया कि यह वीणा उसे नर्मदा के तीर एक कुंज में मिला था, यदि महाराज चाहें तो इसे ले सकते हैं। उस वीणा को महाराज के पास लाने पर महाराज उसे हृदय से लगाकर अचेत हो गए। चेत में आने पर "हा घोषवती! तू मुझे पुनः प्राप्त हो गई किन्तु वासवदत्ता नहीं मिली" कहकर और आर्या वासवदत्ता का स्मरण कर विलाप करने लगे। उनके नेत्र अश्रुपूर्ण हो गए। इसीलिए स्थान और समय उपयुक्त नहीं है।
कंचुकीः देवि! तुम जाकर निवेदन कर दो क्योंकि हमारा सन्देश भी वासवदत्ता से ही सम्बन्धित है।
प्रतिहारीः जैसी आपकी आज्ञा! महाराज पूर्व प्रासाद से यहाँ ही आ रहे हैं, उनके आने पर निवेदन कर दूँगी।
कंचुकीः ऐसा ही करो देवि!
(दोनों का प्रस्थान)
(उदयन और विदूषक का प्रवेश)
उदयनः (घोषवती वीणा को देखकर) हे मधुरवादिनी! हे घोषवती! तेरा स्थान तो देवि वासवदत्ता की जंघाओं और स्तन-युगल के मध्य था। तूने इतना समय पक्षियों के रज से भरे वन में कैसे व्यतीत किया? घोषवती! तू निश्चय ही स्नेहरहित है इसीलिए तूने देवि वासवदत्ता को विस्मृत कर दिया है।
विदूषकः मित्र! दुःख प्रकाशन बहुत हो चुका। अब और विलाप न करें। शान्ति धारण करें।
उदयनः मित्र! इस घोषवती ने मेरी सुप्त कामना को जागृत कर दिया है। मित्र वसन्तक! इस घोषवती को शिल्पियों के पास ले जाकर इसका पुनरुद्धार करवाओ।
विदूषकः जैसी आज्ञा!
(वीणा को लेकर विदूषक का प्रस्थान)
प्रतिहारीः (प्रवेश करके) महाराज की जय हो! अवन्तिनरेश महासेन के यहाँ से रैभ्य गोत्र के कंचुकी और देवी अंगारवती द्वारा भेजी गईं महारानी वासवदत्ता की धाय आर्या वसुधारा द्वार पर उपस्थित हैं।
उदयनः तो तुम पहले देवि पद्मावती को यहाँ बुला लाओ।
प्रतिहारीः जैसी आज्ञा!
(प्रतिहारी का प्रस्थान)
उदयनः (स्वगत्) प्रतीत होता है कि देवि वासवदत्ता के साथ घटित दुर्घटना का समाचार महाराज महासेन को प्राप्त हो गया है।
(पद्मावती और प्रतिहारी का प्रवेश)
प्रतिहारीः देवि! पधारें।
पद्मावतीः (प्रवेश करके) आर्यपुत्र की जय हो!
उदयनः बैठो देवि! महाराज महाराज महासेन के कंचुकी और देवि अंगारवती की भेजी वासवदत्ता की धाय आर्या वसुधारा द्वार पर उपस्थित हैं।
पद्मावतीः तो क्या आर्यपुत्र मेरे समक्ष ही उनसे भेंट करेंगे?
उदयनः अवश्य! इसमें दोष ही क्या है?
पद्मावतीः सम्भव है कि आर्यपुत्र की द्वितीय भार्या को देखकर उनकी भावनाएँ आहत हों!
उदयनः तुम्हें देखने का उन्हें पूर्ण अधिकार है! उनके अधिकार से उन्हें वंचित करना उनका अनादर होगा। मैं उनका अनादर करके दोष का पात्र नहीं बनना चाहता। अतः तुम मेरे साथ ही बैठो।
पद्मावतीः जैसी आर्यपुत्र की आज्ञा! (बैठकर) आर्यपुत्र! मेरा हृदय व्याकुल हो रहा है, न जाने मेरे पिता और माता ने क्या सन्देश भेजा होगा!
उदयनः देवि! मेरा भी हृदय व्याकुल हो रहा है। मैं उनकी कन्या को हर कर ले आया था किन्तु उसकी रक्षा न कर सका। चंचल भाग्य ने उसकी रक्षा करने के मेरे गुण का नाश कर दिया। पिता अवश्य ही कुपित होंगे। मैं स्वयं को उनका अपराधी अनुभव कर रहा हूँ।
पद्मावतीः आर्यपुत्र! इसमें आपका तनिक भी दोष नहीं है। दैव प्रबल होता है। काल से भला कैसे किसी की रक्षा की जा सकती है?
प्रतिहारीः (प्रवेश करके) महाराज की जय हो! कंचुकी और धाय द्वार पर उपस्थित हैं।
उदयनः शीघ्र से शीघ्र उन्हें आदरसहित यहाँ लाओ।
प्रतिहारीः जैसी आपकी आज्ञा!
(कंचुकी का प्रस्थान)
कंचुकीः अपने सम्बन्धी के राज्य में आकर जितनी मुझे प्रसन्नता हो रही है, राजपुत्री का स्मरण करके उससे भी अधिक मुझे विषाद हो रहा है। कितना अच्छा होता यदि भले ही वत्सराज का राज्य उन्हें पुनः प्राप्त न होता किन्तु उनकी पूर्वपत्नी जीवित होतीं।
(प्रतिहारी का कंचुकी और धाय के साथ प्रवेश)
प्रतिहारीः महाराज की जय हो! कंचुकी और आर्या वसुधारा उपस्थित हैं।
कंचुकीः वत्सराज की जय हो!
धायः महाराज की जय हो!
उदयनः (आदरसहित) हे आर्य! समस्त पृथ्वी के नरेशों के उदय अथवा अस्त कर देने में समर्थ अवन्तिनरेश सकुशल तो हैं?
कंचुकीः वे सकुशल हैं और आपकी कुशलता की कामना करते हैं।
उदयनः (आसन से उठकर) अवन्तिनरेश की मेरे लिए क्या आज्ञा है?
कंचुकीः आपकी शिष्टता आपके अभिजात्य कुल के अनुकूल है, किन्तु आप आसन ग्रहण करें और महाराज महासेन का सन्देश सुनें।
उदयनः जैसी महासेन की आज्ञा! (बैठता है)
कंचुकीः प्रसन्नता की बात है कि शत्रुओं द्वारा अपहृत आपका राज्य सौभाग्यवश आपको पुनः प्राप्त हुआ! राज्यश्री का भोग शक्तिहीन राजा अधिक काल तक नहीं कर सकते। आपके शत्रु शक्तिहीन थे इसलिए आपका राज्य पुनः शक्तिशाली राजा के पास लौट आया।
उदयनः यह सब महाराज महासेन के प्रताप से ही हुआ है। मेरे पराजित हो जाने पर भी उन्होंने मुझसे पुत्रवत व्यवहार ही रखा। मैं उनकी कन्या को हर लाया किन्तु उसकी रक्षा नहीं कर सका, तथापि मेरे प्रति उनका आदरभाव बना हुआ है।
कंचुकीः हमारे महाराज ने यही सन्देश भिजवाया है कि वे आपका आदर करते हैं और उनके हृदय में आपके प्रति किसी प्रकार की दुर्भावना नहीं है। अब देवि अंगारवती का सन्देश आर्या वसुधारा आपसे कहेंगीं।
उदयनः हे माता! देवि अंगारवती सकुशल तो हैं।
धायः वे स्वस्थ हैं और सर्वत्र आपकी कुशलता पूछती हैं।
उदयनः हा! धिक! मैं उनकी कन्या की रक्षा नहीं कर सका।
कंचुकीः धैर्य धारण करें वत्सराज! महाराज महासेन की कन्या मर कर भी नहीं मरी हैं क्योंकि आप उनका स्नेहपूर्वक स्मरण करते हैं। काल से कौन किसी की रक्षा कर सकता है? डोर के टूट जाने पर घड़े को कौन बचा सकता है? वनस्पतियों की भाँति ही मनुष्य भी समय आने पर पल्लवित होते हैं और समय आने पर कुम्हला जाते हैं।
उदयनः मैं महाराज महासेन की दुहिता, अपनी प्रिय शिष्या तथा प्रियतमा को कैसे विस्मृत कर सकता हूँ! मेरे लिए तो उनका विस्मरण जन्म-जन्मान्तर तक सम्भव नहीं है।
धायः महाराज! महिषी अंगारवती ने कहा है - यद्यपि वासवदत्ता हम सब को छोड़ कर चली गई तथापि तुम मुझे और महाराज महासेन को गोपालक और पालक की भाँति प्रिय हो। तुम हमारे मनोनीत जामाता हो। तुम्हें उज्जयिनी लाया ही गया था वासवदत्ता से तुम्हारे विवाह के उद्देश्य से। तुम हमारी इच्छा को न जान पाये और वासवदत्ता के साथ अग्नि के सात फेरे लिए बिना ही वासवदत्ता को साथ लेकर चले गए तो हमने तुम्हारा और वासवदत्ता का चित्र बनवाकर तुम दोनों का विवाह सम्पन्न किया। अब हम उसी चित्रफलक को तुम्हारे पास भेज रहे हैं जिससे कि तुम्हें सुख और शान्ति प्राप्त हो सके।
उदयनः माता का सन्देश उनकी महानता के अनुरूप ही है! मुझ अपराधी पर उन्होंने अपना स्नेह बनाए रखा है। मेरे लिए उनका यह सन्देश सौ राज्यों की प्राप्ति से भी बढ़कर है।
पद्मावतीः आर्यपुत्र! मैं आर्या वासवदत्ता के चित्र को को देखकर उनका अभिवादन करना चाहती हूँ।
धायः अवश्य भर्तृदारिके! आप वासवदत्ता के चित्र को अवश्य देखें।
पद्मावतीः (चित्र देखकर, स्वगत्) यह तो आर्या अवन्तिका के चित्र के सदृश प्रतीत हो रहा है। (प्रकट) आर्यपुत्र! क्या यह चित्र आर्या वासवदत्ता के सदृश है?
उदयनः सदृश ही नहीं, मुझे तो प्रतीत हो रहा है कि वे स्वयं मेरे समक्ष उपस्थित हैं।
पद्मावतीः मैं आर्यपुत्र के चित्र को भी देखकर निश्चय करना चाहती हूँ कि चित्रकार ने चित्र को आर्यपुत्र के सदृश ही बनाया है या नहीं।
धायः (चित्र देकर) देखें, देखें, भद्रिके!
पद्मावतीः (चित्र देखकर) इस प्रतिकृति का तो आर्यपुत्र से अच्छा सादृश्य है।
उदयनः देवि! चित्रों को देखकर आप उद्विग्न क्यों हैं?
पद्मावतीः आर्या वासवदत्ता के चित्र के सदृश एक व्यक्ति यहाँ भी है।
उदयनः वासवदत्ता के सदृश?
पद्मावतीः हाँ, आर्यपुत्र!
उदयनः तो शीघ्र उसे यहाँ बुलाओ।
पद्मावतीः विवाह के पूर्व किसी ब्राह्मण ने उसे अपनी भगिनी बता कर थाती के रूप में मुझे सौंपा था। विवाहित होने के कारण वे किसी परपुरुष के समक्ष नहीं आतीं।
उदयनः यदि वह किसी ब्राह्मण की भगिनी है तो उसे कोई अन्य ही होना चाहिए। सम्भवतः उसका रूप वासवदत्ता के सदृश हो।
प्रतिहारीः (प्रवेश करके) महाराज की जय हो। द्वार पर उज्जयिनी से आया एक ब्राह्मण उपस्थित है जो कह रहा है कि उसकी भगिनी महारानी के पास थाती है। वे अपनी भगिनी को लेने आए हैं।
पद्मावतीः आर्यपुत्र! सम्भवतः यह वही ब्राह्मण हो सकते हैं।
उदयनः (प्रतिहारी से) ब्राह्मण को शीघ्र यहाँ उपस्थित करो।
प्रतिहारीः जैसी महाराज की आज्ञा! (प्रस्थान करता है)
उदयनः (पद्मावती से) देवि! तुम भी आर्या को यहाँ बुला लो।
पद्मावतीः आर्यपुत्र की जैसी आज्ञा।
(पद्मावती का प्रस्थान)
(प्रतिहारी के साथ यौगन्धरायण का ब्राह्मण के वेष में प्रवेश)
यौगन्धरायणः (स्वगत्) आर्या वासवदत्ता को महाराज से कुछ काल तक अलग रखने में महाराज का कल्याण करना ही मेरा उद्देश्य था। मेरा कार्य अब सिद्ध हो चुका है। अब देखूँ, महाराज की प्रतिक्रया है।
प्रतिहारीः आर्य! इधर आएँ, महाराज यहाँ हैं।
यौगन्धरायणः महाराज की जय हो!
उदयनः (स्वगत्) यह स्वर तो परिचित-सा प्रतीत हो रहा है।
(पद्मावती और अवन्तिका के वेष वासवदत्ता का प्रवेश)
पद्मावतीः आएँ आर्ये! आएँ! आपके लिए प्रिय संवाद है!
वासवदत्ताः वह क्या?
पद्मावतीः आपके भ्राता आपको लेने आए हैं।
वासवदत्ताः यह मेरा सौभाग्य है कि उन्होंने मेरा स्मरण किया।
पद्मावतीः आर्यपुत्र, यही आर्या ही वह थाती हैं।
उदयनः देवि! थाती लौटा दो। सौभाग्य से यहाँ रैभ्य और आर्या वसुधारा थाती लौटाने के साक्षी के रूप में उपस्थित हैं।
पद्मावतीः (यौगन्धरायण से) आर्य! मैं आपकी भगिनी आपको लौटा रही हूँ।
धायः (अवन्तिका को ध्या से देखकर) यह क्या? यह तो राजकुमारी वासवदत्ता हैं।
उदयनः क्या? अवन्तिनरेश की पुत्री? तो देवि तुम पद्मावती के साथ अन्तःपुर में प्रवेश करो।
यौगन्धरायणः नहीं नहीं। आप उन्हें अन्तःपुर में प्रवेश की आज्ञा न दीजिए, वे मेरी भगिनी हैं। आप भरत के कुल में उत्पन्न ज्ञानवान राजा हैं, राजधर्म के ज्ञाता हैं, आप बलपूर्वक मेरी भगिनी का हरण क्यों कर रहे हैं।
उदयनः तब मुझे रूपसादृश्य देखना होगा। देवि! किंचित यवनिका हटा दो।
यौगन्धरायणः स्वामी की जय हो!
वासवदत्ताः आर्यपुत्र की जय हो!
उदयनः अरे! यह तो यौगन्धरायण हैं और यह देवि वासवदत्ता! यह सत्य है अथवा मैं स्वप्न देख रहा हूँ? पूर्व में भी मैंने एक बार स्वप्न में देवि वासवदत्ता को देखा था।
यौगन्धरायणः महाराज, आर्या वासवदत्ता को आपसे अलग करने का मैं अपराधी हूँ। किन्तु मैंने यह अपराध महाराज और राज्य के कल्याण के उद्देश्य से किया है अतः मेरा अपराध क्षमा करें।
उदयनः आर्य यौगन्धरायण! आपके ही यत्न से इस डूबते हुए राज्य की रक्षा हुई है। आप अपराधी कदापि नही हैं।
पद्मावतीः (वासवदत्ता के चरणों में गिरकर) आर्ये आपके साथ सखी-भाव से व्यहार करके मैंने अपराध किया है। यह अपराध मुझसे अनजाने में हुआ है अतः मुझे क्षमा करें।
वासवदत्ताः (पद्मावती को उठाते हुए) उठो सुहागन! उठो! तुमसे कोई अपराध नहीं हुआ है।
पद्मावतीः अनुग्रहीत हुई।
उदयनः आर्य यौगन्धरायण देवि वासवदत्ता को मुझसे अलग करने में तो आपका उद्देश्य राज्य का कल्याण था किन्तु उन्हें देवि पद्मावती के आश्रय में रखने से आपका क्या तात्पर्य था?
यौगन्धरायणः पुष्पकभद्र और दैवचिन्तक आदि ज्योतिषियों ने भविष्यवाणी की थी कि आर्या पद्मावती आपकी रानी बनेंगी, इसीलिए मैंने आर्या वासवदत्ता को उनके सानिध्य में रखा।
उदयनः क्या यह सब रुम्णवान् को भी ज्ञात था?
यौगन्धरायणः महाराज, यह तो समस्त विश्वस्त अमात्यों को ज्ञात था।
उदयनः ओह, रुम्णवान तो बहुत बड़ा शठ है।
यौगन्धरायणः स्वामी! इस शुभ समाचार को महाराज महासेन तक पहुँचाने के लिए आर्य रैभ्य और आर्या वसुधारा को आज ही लौटने की आज्ञा दें।
उदयनः नहीं, नहीं, देवी पद्मावती और देवि वासवदत्ता सहित हम सब महाराज महासेन के समक्ष उपस्थित होंगे।
यौगन्धरायणः जैसी महाराज की आज्ञा! मेरा आशीर्वाद है कि हिमालय और विन्ध्याचल की भाँति अलंकारों से अलंकृत इस ससागरा पृथ्वी का आप सिंहवत् शासन करें।
(सब का प्रस्थान)
(अंक 6 समाप्त)
Friday, October 22, 2010
स्वप्न वासवदत्ता - अंक 5 (संस्कृत नाटक का संपादित सरल हिन्दी रूपान्तर)
पिछला अंक - स्वप्न वासवदत्ता - अंक 4 (संस्कृत नाटक का संपादित सरल हिन्दी रूपान्तर)
(पद्मिनिका का प्रवेश)
पद्मिनिकाः मधुरिके! मधुरिके!
मधुरिकाः (प्रवेश करके) आई सखी, आई।
पद्मिनिकाः मधुरिके! राजकुमारी पद्मावती सिर की पीड़ा से अत्यन्त व्यथित हैं। जा सखी, आर्या अवन्तिका को बुला ला। उनसे कहना कि राजकुमारी सिर की पीड़ा से व्यथित हैं, वे स्वयं चली आएँगीं।
मधुरिकाः किन्तु सखी पद्मिनिका, वे करेंगी क्या?
पद्मिनिकाः वे मधुर कथाएँ सुनाकर राजकुमारी के व्याधि को हरने का प्रयास करेंगी।
मधुरिकाः अच्छा! तो राजकुमारी कहाँ विश्राम कर रही हैं?
पद्मिनिकाः समुद्रगृह में। तू शीघ्र आर्या अवन्तिका को बुला ला। मैं आर्य वसन्तक की खोज में जा रही हूँ ताकि वे राजकुमारी की व्याधि का समाचार दे सकें।
मधुरिकाः तो मैं जाती हूँ। (प्रस्थान)
पद्मिनिकाः (स्वगत्) अब मैं आर्य वसन्तक को कहाँ खोजूँ?
(विदूषक का प्रवेश)
विदूषकः (स्वगत्) ऐसा प्रतीत होता है कि आज इस शुभ घड़ी तथा सुख के अवसर पर प्रिया-वियोग से व्याकुल अन्तर वाले वत्सराज के हृदय में पद्मावती के विवाहरूपी समीर से कामाग्नि भड़क उठी है।
पद्मिनिकाः (विदूषक को देखकर) आर्य वसन्तक! क्या आपको ज्ञात है कि राजकुमारी पद्मावती सिर की पीड़ा से व्याकुल हैं?
विदूषकः नहीं देवि! मुझे ज्ञात नहीं है।
पद्मिनिकाः अच्छा तो आप स्वामी तक यह समाचार पहुँचा दें। मैं सिर की पीड़ा के निवारण के लिए लेप लेने जाती हूँ।
विदूषकः अच्छा, आर्या पद्मावती कहाँ हैं?
पद्मिनिकाः समुद्रगृह में।
विदूषकः तो जाओ देवि! मैं भी श्रीमान् से निवेदन करने जाता हूँ।
(दोनों का प्रस्थान)
(उदयन का प्रवेश)
उदयनः (स्वगत्) यद्यपि काल ने मेरा देवि पद्मावती से विवाह करवाकर मुझपर पुनः भार डाल दिया है, तथापि मेरा हृदय लावाणक में अग्नि-दग्ध होकर मृत्यु को प्राप्त करनेवाली अवन्तिराज की सुकन्या को विस्मृत नहीं कर पा रहा है।
विदूषकः (प्रवेश करके) शीघ्रता करें श्रीमान्! शीघ्रता करें।
उदयनः कैसी शीघ्रता?
विदूषकः आर्या पद्मावती सिर की पीड़ा से व्याकुल हैं।
उदयनः तुमसे किसने कहा?
विदूषकः पद्मिनिका ने।
उदयनः हा! कष्ट! देवि पद्मावती के सानिध्य से मेरे हृदय का दुःख तनिक मन्द हुआ था किन्तु अब यह उनकी व्याधि मुझे नया दुःख प्रदान करने आ गई। देवि पद्मावती कहाँ हैं?
विदूषकः वे समुद्रगृह में विश्राम कर रही हैं।
उदयनः चलो, मार्ग दिखाओ।
विदूषकः चलें, चलें श्रीमान्!
(दोनों चलते हैं)
विदूषकः यह रहा समुद्रगृह। श्रीमान् प्रवेश करें।
उदयनः पहले तुम प्रवेश करो।
विदूषकः अच्छा श्रीमान! (प्रवेश करके) ओह! विपदा आ पड़ी। आप वहीं रुकें श्रीमान, मैं भी आपके ही पास आ रहा हूँ।
उदयनः क्यों?
विदूषकः वह देखिए, भूमि पर सर्प है, दीप के आलोक में मुझे दिखाई पड़ गया।
उदयनः (देखकर, मुस्कान के साथ) मूर्ख! तू तोरणद्वार से गिरी हुई निशा की मन्द वायु से हिलती हुई इस पुष्पमाला को सर्प कह रहा है।
विदूषकः (ध्यान से देखकर) आप सत्य कह रहे हैं श्रीमान! मैं भ्रमित हो गया था।
(दोनों का समुद्रगृह में प्रवेश)
विदूषकः प्रतीत होता है कि आर्या पद्मावती यहाँ आने के पश्चात् पुनः चली गईं।
उदयनः नहीं मित्र! देवि यहाँ आईं ही नहीं।
विदूषकः आपको कैसे ज्ञात हुआ?
उदयनः न तो शैय्या में सिकुड़न है और न ही लेप से वस्त्र मलिन हुए हैं। रुग्ण की व्यथा हरने वाली किसी प्रकार की शोभा भी यहाँ दृष्टिगत नहीं हो रही है। और न ही कोई व्यथित व्यक्ति किसी स्थान में आकर इतना शीघ्र उस स्थान का त्याग करता है।
विदूषकः तो देव! आप कुछ काल तक इसी शैय्या में बैठकर आर्या के आने की प्रतीक्षा करें।
उदयनः अच्छा। (शैय्या पर लेटकर) निद्रा आ रही है। तुम कोई कथा कहो।
विदूषकः कहता हूँ श्रीमान्! आप हुंकार करते जाइए।
उदयनः बहुत अच्छा।
विदूषकः उज्जयिनी नामक एक रमणीय नगरी है।
उदयनः क्या कहा? उज्जयिनी!
विदूषकः आपको यदि यह कथा रुचिकर न लग रहा हो तो दूसरी कथा कहता हूँ।
उदयनः अवश्य ही इस कथा में मेरी रुचि है किन्तु इसे सुनकर मुझे अवन्तिराज की कन्या का स्मरण हो उठता है।
विदूषकः अस्तु, मैं दूसरी कथा कहता हूँ। ब्रह्मदत्त नगर में काम्पिल्य नामक राजा रहा करता था।
उदयनः क्या? क्या?
विदूषकः ब्रह्मदत्त नगर में काम्पिल्य नामक राजा रहा करता था।
उदयनः मूर्ख नगर का नाम काम्पिल्य था और राजा का नाम ब्रह्मदत्त था।
विदूषकः नगर काम्पिल्य था और राजा ब्रह्मदत्त?
उदयनः हाँ।
विदूषकः अच्छा, मैं इसे कण्ठस्त कर लूँ, तब तक श्रीमान प्रतीक्षा करें। (अनेक बार दुहराने के बाद) अब सुनें! यह क्या? श्रीमान् को तो निद्रा आ गई। ओह कितनी शीतल समीर है। चलूँ, कुछ ओढ़ने के लिए ले आउँ।
(विदूषक का प्रस्थान)
(अवन्तिका के वेष में वासवदत्ता का चेटी के साथ प्रवेश)
चेटीः आर्ये! आप समुद्रगृह में शीघ्र प्रवेश करें। राजकुमारी पद्मावती सिर की पीड़ा से व्याकुल हैं। तब तक मैं लेप लेकर आती हूँ।
(चेटी का प्रस्थान)
वासवदत्ताः (स्वगत्) आह! दैव कितने निर्दय हैं। आर्यपुत्र की विरह-व्यथा का निवारण करने वाली पद्मावती भी रुग्ण हो गईं। अस्तु, प्रवेश करूँ। (प्रवेश करके यत्र-तत्र देखते हुए) इन सेवकों को पद्मावती का कुछ भी ध्यान नहीं है। उसके समीप केवल एक दीपक छोड़कर सभी चले गए हैं। तनिक पद्मावती के पास बैठ जाऊँ। दूर बैठने पर पद्मावती सोचेंगी कि उनके प्रति मेरा पर्याप्त स्नेह नहीं है अतः शैय्या पर ही बैठूँ। (शैय्या पर बैठती है)। अद्भुत! इसके पास बैठकर मेरा हृदय कितना आह्लादित है! इसकी श्वास की चाल से प्रतीत होता है कि रुग्णता समाप्त हो गई है। यह तो शैय्या के अर्द्धभाग में ही सो रही है, मानो शेष अर्द्धभाग में आलिंगन के प्रयोजन से मुझे बुला रही हो। इसकी इच्छा पूर्ण करने के लिए इस अर्द्धभाग में लेट जाती हूँ। (लेट जाती है)
उदयनः (निद्रित अवस्था में) हा वासवदत्ता!
वासवदत्ताः (सहसा उठते हुए) अरे! यह तो आर्यपुत्र हैं, पद्मावती नहीं। कहीं मैं पहचान तो नहीं ली गई? यदि पहचान ली गई तो आर्य यौगन्धरायण की योजना निष्फल हो जाएगी।
उदयनः हा अवन्तिराजपुत्री!
वासवदत्ताः संयोगवश आर्यपुत्र निद्रा में ही हैं। यहाँ अन्य कोई नहीं है अतः मुहूर्त भर इनके दर्शन कर दृष्टि को सन्तुष्ट कर लूँ।
उदयनः हा प्रिय शिष्ये! हा प्रिये! तुम कुछ कह क्यों नहीं रही हो?
वासवदत्ताः कहती हूँ, स्वामिन्! कहती हूँ।
उदयनः क्या तुम मुझसे रुष्ट हो?
वासवदत्ताः नहीं, रुष्ट नहीं मात्र दुःखी हूँ।
उदयनः रुष्ट नहीं हो तो तुमने अलंकार क्यों धारण नहीं किए हैं? क्या विरीचिका को स्मरण कर रही हो?
वासवदत्ताः विरीचिका का स्मरण तो आप ही कर रहे हैं।
उदयनः तो इस अपराध के लिए मैं तुमसे क्षमा-याचना करता हूँ।
(हाथ फैला देते हैं)
वासवदत्ताः दीर्घ काल से यहाँ बैठी हूँ। कोई देख न ले। चलूँ। पर शैय्या से लटकते इनके हाथ को पुनः शैय्या पर रख दूँ।
(उदयन के हाथ को शैय्या पर रखती है)
उदयनः (निद्रा से जागकर, तथापि अर्द्धनिद्रित अवस्था में) वासवदत्ता! रुको, रुको। रुको वासवदत्ता।
(वासवदत्ता शीघ्रता के साथ प्रस्थान करती है, उदयन भी द्वार की ओर बढ़ते हुए द्वार के चौखट से टकरा कर गिर जाते हैं)
उदयनः (उठकर) हा! धिक्! अर्द्धनिद्रित अवस्था में मैं चौखट से टकरा गया। यह भी ज्ञात न हो पाया कि यह सत्य था कि स्वप्न?
विदूषकः (प्रवेश कर) श्रीमान् जाग गए!
उदयनः मित्र! सुसंवाद सुनो! वासवदत्ता जीवित है।
विदूषकः (दुःखी होकर) खेद! आर्या वासवदत्ता अब कहाँ? वे तो कब का परलोक सिधार गईं।
उदयनः नहीं नहीं। रुम्णवान् ने मुझसे कपट किया था। वासवदत्ता अभी मुझे निद्रा से जगाकर गई है।
विदूषकः असम्भव! मैंने आपसे उज्जयिनी की कथा कही थी इसीलिए आप सोते हुए आर्या का ही स्मरण करते रहे। उन्हें आपने स्वप्न में ही देखा होगा।
उदयनः यदि यह स्वप्न था तो मेरा न जागना ही धन्य होता और यदि यह भ्रम है तो जीवनपर्यन्त यह भ्रम बना रहे।
विदूषकः मित्र! इस नगर में अवन्तिसुन्दरी नामक यक्षिणी रहती है। कहीं आपने उसे ही तो नहीं देखा?
उदयनः नहीं मित्र! नहीं। अभी मैंने देवि वासवदत्ता के सुन्दर मुख को देखा है जिस पर अलकें बिखरी हुई थीं। उनके नेत्र अञ्जनरहित थे। मेरी इस भुजा के रोम अब तक खड़े हैं क्योंकि इसको उसने अपने हाथों से शैय्या पर रखा था। स्वप्न में ही सही।
विदूषकः श्रीमान्! अब आप और अधिक अनर्थ चिन्तन न करें। आइए, चतुःशाला में चलें।
(दोनों चतुःशाला में प्रवेश करते हैं)
(कंचुकी का प्रवेश)
कंचुकीः वत्सराज की जय हो! आपके शत्रु आरुणि पर आक्रमण करके वत्स राज्य को पुनः प्राप्त करने के लिए, आपके अमात्य रुम्णवान् एक विशाल सेना लेकर हमारे महाराज दर्शक के पास उपस्थित हुए हैं। हमारी विजयिनी राजदल, हथदल, रथदल तथा पदातिदल भी युद्ध के लिए सन्नद्ध होकर आपके अमात्य की सेना में सम्मिलित होने के लिए तत्पर हैं। अतः युद्ध के लिए तत्पर हो जाइए। हमारी विजय अवश्यम्भावी है। आपके गुणों से अनुरक्त वत्स देश की प्रजा विजयी होकर आपके आगमन की प्रतीक्षा कर रही है।
उदयनः मैं युद्ध के लिए तत्पर हूँ। मैं युद्धभूमि में भयानक कर्म में दक्ष आरुणि का वध कर डालूँगा।
(सबका प्रस्थान)
(पद्मिनिका का प्रवेश)
पद्मिनिकाः मधुरिके! मधुरिके!
मधुरिकाः (प्रवेश करके) आई सखी, आई।
पद्मिनिकाः मधुरिके! राजकुमारी पद्मावती सिर की पीड़ा से अत्यन्त व्यथित हैं। जा सखी, आर्या अवन्तिका को बुला ला। उनसे कहना कि राजकुमारी सिर की पीड़ा से व्यथित हैं, वे स्वयं चली आएँगीं।
मधुरिकाः किन्तु सखी पद्मिनिका, वे करेंगी क्या?
पद्मिनिकाः वे मधुर कथाएँ सुनाकर राजकुमारी के व्याधि को हरने का प्रयास करेंगी।
मधुरिकाः अच्छा! तो राजकुमारी कहाँ विश्राम कर रही हैं?
पद्मिनिकाः समुद्रगृह में। तू शीघ्र आर्या अवन्तिका को बुला ला। मैं आर्य वसन्तक की खोज में जा रही हूँ ताकि वे राजकुमारी की व्याधि का समाचार दे सकें।
मधुरिकाः तो मैं जाती हूँ। (प्रस्थान)
पद्मिनिकाः (स्वगत्) अब मैं आर्य वसन्तक को कहाँ खोजूँ?
(विदूषक का प्रवेश)
विदूषकः (स्वगत्) ऐसा प्रतीत होता है कि आज इस शुभ घड़ी तथा सुख के अवसर पर प्रिया-वियोग से व्याकुल अन्तर वाले वत्सराज के हृदय में पद्मावती के विवाहरूपी समीर से कामाग्नि भड़क उठी है।
पद्मिनिकाः (विदूषक को देखकर) आर्य वसन्तक! क्या आपको ज्ञात है कि राजकुमारी पद्मावती सिर की पीड़ा से व्याकुल हैं?
विदूषकः नहीं देवि! मुझे ज्ञात नहीं है।
पद्मिनिकाः अच्छा तो आप स्वामी तक यह समाचार पहुँचा दें। मैं सिर की पीड़ा के निवारण के लिए लेप लेने जाती हूँ।
विदूषकः अच्छा, आर्या पद्मावती कहाँ हैं?
पद्मिनिकाः समुद्रगृह में।
विदूषकः तो जाओ देवि! मैं भी श्रीमान् से निवेदन करने जाता हूँ।
(दोनों का प्रस्थान)
(उदयन का प्रवेश)
उदयनः (स्वगत्) यद्यपि काल ने मेरा देवि पद्मावती से विवाह करवाकर मुझपर पुनः भार डाल दिया है, तथापि मेरा हृदय लावाणक में अग्नि-दग्ध होकर मृत्यु को प्राप्त करनेवाली अवन्तिराज की सुकन्या को विस्मृत नहीं कर पा रहा है।
विदूषकः (प्रवेश करके) शीघ्रता करें श्रीमान्! शीघ्रता करें।
उदयनः कैसी शीघ्रता?
विदूषकः आर्या पद्मावती सिर की पीड़ा से व्याकुल हैं।
उदयनः तुमसे किसने कहा?
विदूषकः पद्मिनिका ने।
उदयनः हा! कष्ट! देवि पद्मावती के सानिध्य से मेरे हृदय का दुःख तनिक मन्द हुआ था किन्तु अब यह उनकी व्याधि मुझे नया दुःख प्रदान करने आ गई। देवि पद्मावती कहाँ हैं?
विदूषकः वे समुद्रगृह में विश्राम कर रही हैं।
उदयनः चलो, मार्ग दिखाओ।
विदूषकः चलें, चलें श्रीमान्!
(दोनों चलते हैं)
विदूषकः यह रहा समुद्रगृह। श्रीमान् प्रवेश करें।
उदयनः पहले तुम प्रवेश करो।
विदूषकः अच्छा श्रीमान! (प्रवेश करके) ओह! विपदा आ पड़ी। आप वहीं रुकें श्रीमान, मैं भी आपके ही पास आ रहा हूँ।
उदयनः क्यों?
विदूषकः वह देखिए, भूमि पर सर्प है, दीप के आलोक में मुझे दिखाई पड़ गया।
उदयनः (देखकर, मुस्कान के साथ) मूर्ख! तू तोरणद्वार से गिरी हुई निशा की मन्द वायु से हिलती हुई इस पुष्पमाला को सर्प कह रहा है।
विदूषकः (ध्यान से देखकर) आप सत्य कह रहे हैं श्रीमान! मैं भ्रमित हो गया था।
(दोनों का समुद्रगृह में प्रवेश)
विदूषकः प्रतीत होता है कि आर्या पद्मावती यहाँ आने के पश्चात् पुनः चली गईं।
उदयनः नहीं मित्र! देवि यहाँ आईं ही नहीं।
विदूषकः आपको कैसे ज्ञात हुआ?
उदयनः न तो शैय्या में सिकुड़न है और न ही लेप से वस्त्र मलिन हुए हैं। रुग्ण की व्यथा हरने वाली किसी प्रकार की शोभा भी यहाँ दृष्टिगत नहीं हो रही है। और न ही कोई व्यथित व्यक्ति किसी स्थान में आकर इतना शीघ्र उस स्थान का त्याग करता है।
विदूषकः तो देव! आप कुछ काल तक इसी शैय्या में बैठकर आर्या के आने की प्रतीक्षा करें।
उदयनः अच्छा। (शैय्या पर लेटकर) निद्रा आ रही है। तुम कोई कथा कहो।
विदूषकः कहता हूँ श्रीमान्! आप हुंकार करते जाइए।
उदयनः बहुत अच्छा।
विदूषकः उज्जयिनी नामक एक रमणीय नगरी है।
उदयनः क्या कहा? उज्जयिनी!
विदूषकः आपको यदि यह कथा रुचिकर न लग रहा हो तो दूसरी कथा कहता हूँ।
उदयनः अवश्य ही इस कथा में मेरी रुचि है किन्तु इसे सुनकर मुझे अवन्तिराज की कन्या का स्मरण हो उठता है।
विदूषकः अस्तु, मैं दूसरी कथा कहता हूँ। ब्रह्मदत्त नगर में काम्पिल्य नामक राजा रहा करता था।
उदयनः क्या? क्या?
विदूषकः ब्रह्मदत्त नगर में काम्पिल्य नामक राजा रहा करता था।
उदयनः मूर्ख नगर का नाम काम्पिल्य था और राजा का नाम ब्रह्मदत्त था।
विदूषकः नगर काम्पिल्य था और राजा ब्रह्मदत्त?
उदयनः हाँ।
विदूषकः अच्छा, मैं इसे कण्ठस्त कर लूँ, तब तक श्रीमान प्रतीक्षा करें। (अनेक बार दुहराने के बाद) अब सुनें! यह क्या? श्रीमान् को तो निद्रा आ गई। ओह कितनी शीतल समीर है। चलूँ, कुछ ओढ़ने के लिए ले आउँ।
(विदूषक का प्रस्थान)
(अवन्तिका के वेष में वासवदत्ता का चेटी के साथ प्रवेश)
चेटीः आर्ये! आप समुद्रगृह में शीघ्र प्रवेश करें। राजकुमारी पद्मावती सिर की पीड़ा से व्याकुल हैं। तब तक मैं लेप लेकर आती हूँ।
(चेटी का प्रस्थान)
वासवदत्ताः (स्वगत्) आह! दैव कितने निर्दय हैं। आर्यपुत्र की विरह-व्यथा का निवारण करने वाली पद्मावती भी रुग्ण हो गईं। अस्तु, प्रवेश करूँ। (प्रवेश करके यत्र-तत्र देखते हुए) इन सेवकों को पद्मावती का कुछ भी ध्यान नहीं है। उसके समीप केवल एक दीपक छोड़कर सभी चले गए हैं। तनिक पद्मावती के पास बैठ जाऊँ। दूर बैठने पर पद्मावती सोचेंगी कि उनके प्रति मेरा पर्याप्त स्नेह नहीं है अतः शैय्या पर ही बैठूँ। (शैय्या पर बैठती है)। अद्भुत! इसके पास बैठकर मेरा हृदय कितना आह्लादित है! इसकी श्वास की चाल से प्रतीत होता है कि रुग्णता समाप्त हो गई है। यह तो शैय्या के अर्द्धभाग में ही सो रही है, मानो शेष अर्द्धभाग में आलिंगन के प्रयोजन से मुझे बुला रही हो। इसकी इच्छा पूर्ण करने के लिए इस अर्द्धभाग में लेट जाती हूँ। (लेट जाती है)
उदयनः (निद्रित अवस्था में) हा वासवदत्ता!
वासवदत्ताः (सहसा उठते हुए) अरे! यह तो आर्यपुत्र हैं, पद्मावती नहीं। कहीं मैं पहचान तो नहीं ली गई? यदि पहचान ली गई तो आर्य यौगन्धरायण की योजना निष्फल हो जाएगी।
उदयनः हा अवन्तिराजपुत्री!
वासवदत्ताः संयोगवश आर्यपुत्र निद्रा में ही हैं। यहाँ अन्य कोई नहीं है अतः मुहूर्त भर इनके दर्शन कर दृष्टि को सन्तुष्ट कर लूँ।
उदयनः हा प्रिय शिष्ये! हा प्रिये! तुम कुछ कह क्यों नहीं रही हो?
वासवदत्ताः कहती हूँ, स्वामिन्! कहती हूँ।
उदयनः क्या तुम मुझसे रुष्ट हो?
वासवदत्ताः नहीं, रुष्ट नहीं मात्र दुःखी हूँ।
उदयनः रुष्ट नहीं हो तो तुमने अलंकार क्यों धारण नहीं किए हैं? क्या विरीचिका को स्मरण कर रही हो?
वासवदत्ताः विरीचिका का स्मरण तो आप ही कर रहे हैं।
उदयनः तो इस अपराध के लिए मैं तुमसे क्षमा-याचना करता हूँ।
(हाथ फैला देते हैं)
वासवदत्ताः दीर्घ काल से यहाँ बैठी हूँ। कोई देख न ले। चलूँ। पर शैय्या से लटकते इनके हाथ को पुनः शैय्या पर रख दूँ।
(उदयन के हाथ को शैय्या पर रखती है)
उदयनः (निद्रा से जागकर, तथापि अर्द्धनिद्रित अवस्था में) वासवदत्ता! रुको, रुको। रुको वासवदत्ता।
(वासवदत्ता शीघ्रता के साथ प्रस्थान करती है, उदयन भी द्वार की ओर बढ़ते हुए द्वार के चौखट से टकरा कर गिर जाते हैं)
उदयनः (उठकर) हा! धिक्! अर्द्धनिद्रित अवस्था में मैं चौखट से टकरा गया। यह भी ज्ञात न हो पाया कि यह सत्य था कि स्वप्न?
विदूषकः (प्रवेश कर) श्रीमान् जाग गए!
उदयनः मित्र! सुसंवाद सुनो! वासवदत्ता जीवित है।
विदूषकः (दुःखी होकर) खेद! आर्या वासवदत्ता अब कहाँ? वे तो कब का परलोक सिधार गईं।
उदयनः नहीं नहीं। रुम्णवान् ने मुझसे कपट किया था। वासवदत्ता अभी मुझे निद्रा से जगाकर गई है।
विदूषकः असम्भव! मैंने आपसे उज्जयिनी की कथा कही थी इसीलिए आप सोते हुए आर्या का ही स्मरण करते रहे। उन्हें आपने स्वप्न में ही देखा होगा।
उदयनः यदि यह स्वप्न था तो मेरा न जागना ही धन्य होता और यदि यह भ्रम है तो जीवनपर्यन्त यह भ्रम बना रहे।
विदूषकः मित्र! इस नगर में अवन्तिसुन्दरी नामक यक्षिणी रहती है। कहीं आपने उसे ही तो नहीं देखा?
उदयनः नहीं मित्र! नहीं। अभी मैंने देवि वासवदत्ता के सुन्दर मुख को देखा है जिस पर अलकें बिखरी हुई थीं। उनके नेत्र अञ्जनरहित थे। मेरी इस भुजा के रोम अब तक खड़े हैं क्योंकि इसको उसने अपने हाथों से शैय्या पर रखा था। स्वप्न में ही सही।
विदूषकः श्रीमान्! अब आप और अधिक अनर्थ चिन्तन न करें। आइए, चतुःशाला में चलें।
(दोनों चतुःशाला में प्रवेश करते हैं)
(कंचुकी का प्रवेश)
कंचुकीः वत्सराज की जय हो! आपके शत्रु आरुणि पर आक्रमण करके वत्स राज्य को पुनः प्राप्त करने के लिए, आपके अमात्य रुम्णवान् एक विशाल सेना लेकर हमारे महाराज दर्शक के पास उपस्थित हुए हैं। हमारी विजयिनी राजदल, हथदल, रथदल तथा पदातिदल भी युद्ध के लिए सन्नद्ध होकर आपके अमात्य की सेना में सम्मिलित होने के लिए तत्पर हैं। अतः युद्ध के लिए तत्पर हो जाइए। हमारी विजय अवश्यम्भावी है। आपके गुणों से अनुरक्त वत्स देश की प्रजा विजयी होकर आपके आगमन की प्रतीक्षा कर रही है।
उदयनः मैं युद्ध के लिए तत्पर हूँ। मैं युद्धभूमि में भयानक कर्म में दक्ष आरुणि का वध कर डालूँगा।
(सबका प्रस्थान)
(अंक 5 समाप्त)
Thursday, October 21, 2010
स्वप्न वासवदत्ता - अंक 4 (संस्कृत नाटक का संपादित सरल हिन्दी रूपान्तर)
(पिछला अंक - स्वप्न वासवदत्ता - अंक 2-3 (संस्कृत नाटक का संपादित सरल हिन्दी रूपान्तर)
(विदूषक का प्रवेश)
विदूषकः (प्रसन्नता के साथ) अन्ततः अनर्थ सलिल के भँवर से वत्सराज का उद्धार हुआ। उनके विवाहमंगल के दिन देखने को मिले। अत्यन्त प्रसन्नता की बात है कि आज मैं पुनः राजप्रासाद में बैठा हूँ, स्नान के लिए मुझे अन्तःपुर की दीर्घिकाएँ पुनः उपलब्ध हैं, लड्डू आदि सुमधुर भोजन कर रहा हूँ और अप्सराओं के संसर्ग के सिवाय अन्य सभी सुख मुझे प्राप्त हैं। कुछ दोष है तो मात्र इतना ही की भोजन मेरा पचा नहीं है जिसके कारण कोमल शैय्या पर भी मुझे निद्रा नहीं आ रही है। प्रतीत हो रहा है कि वात के समस्त लक्षण उपस्थित हो गए हैं। किन्तु अच्छे भोजन और अच्छा स्वास्थ्य के जीवन का वास्तविक सुख कहाँ?
(चेटी का प्रवेश)
चेटीः अरे! आर्य वसन्तक तो यहाँ हैं! आर्य! मैं न जाने कबसे आपको खोज रही हूँ।
विदूषकः भद्रे! मुझे खोजने में भला आपका निमित्त क्या है?
चेटीः हमारी भट्टिनी जानना चाह रही हैं कि क्या जामाता ने स्नान कर लिया है?
विदूषकः भला किसलिए जानना चाहती हैं देवि!
चेटीः ताकि पुष्प तथा अञ्जन प्रस्तुत किया जाए।
विदूषकः श्रीमान् स्नान से निवृत हो चुके हैं देवि! भोजन को छोड़कर समस्त सामग्री ले आओ।
चेटीः भोजन क्यों नहीं आर्य?
विदूषकः क्योंकि मुझ अभागे का उदर कोकिला की चक्षुओं की भाँति घूम रहा है।
चेटीः तो ऐसा ही होता रहे।
विदूषकः तो प्रस्थान करो देवि! मैं भी श्रीमान के पास जा रहा हूँ।
(पद्मावती और अवन्तिका रूपी वासवदत्ता का चेटी के साथ प्रवेश)
चेटीः भद्रदारिके! प्रमदवन में आने में आपका प्रयोजन क्या है?
पद्मावतीः प्रिये! मैं देखना चाहती हूँ कि शेफालिका के पुष्प-गुच्छ अभी खिले कि नहीं?
चेटीः अवश्य ही वे खिल चुके हैं भद्रदारिके! डालियों में लदे हुए वे पुष्प मोती की माला के मध्य गुँथे हुए मूँगे की भाँति प्रतीत हो रहे हैं। भद्रदारिके कुछ काल तक इस शिलापट्ट पर विश्राम करें तब तक मैं पुष्प तोड़ लाती हूँ।
पद्मावतीः (वासवदत्ता से) आर्ये! यहाँ विश्राम करें?
वासवदत्ताः (बैठते हुए) अवश्य!
(पद्मावती भी बैठ जाती है)
(चेटी का प्रस्थान तथा कुछ काल पश्चात् पुनः प्रवेश)
चेटीः देखें भद्रदारिके! देखें! शेफालिका के पुष्प मेरे आँचल में किस प्रकार रक्तवर्ण संखिया से चमक रहे हैं!
पद्मावतीः (पुप्षों को देखकर, वासवदत्ता से) आर्ये ये पुष्प कितने अद्भुत् प्रतीत हो रहे हैं!
वासवदत्ताः अहो! अत्यन्त सुन्दर पुष्प हैं ये!
चेटीः भद्रदारिके! क्या और पुष्प तोड़ लाऊँ?
पद्मावतीः नहीं, अब और पुष्प मत तोड़ो।
वासवदत्ताः प्रिय! और पुष्प तोड़ने से क्यों रोक रही हो?
पद्मावतीः क्योंकि आर्यपुत्र को इन पुष्पों को दिखाकर मैं उनकी दृष्टि में सम्मानित होना चाहती हूँ।
वासवदत्ताः सखी! क्या पति तुम्हें अत्यन्त प्रिय हैं?
पद्मावतीः यह तो मुझे ज्ञात नहीं आर्ये! किन्तु आर्यपुत्र के वियोग में मैं अत्यन्त उत्कण्ठित हो जाती हूँ।
वासवदत्ताः (स्वगत्) इसका यह कथन मेरे लिए कितना कष्टकर है।
चेटीः भद्रदारिका को पति का प्रिय होना उनके उत्तम विचारों के अनुकूल है।
पद्मावतीः किन्तु मेरे हृदय में एक सन्देह है।
वासवदत्ताः कैसा सन्देह?
पद्मावतीः क्या आर्या वासवदत्ता का आर्यपुत्र के प्रति प्रेम मेरे प्रेम जितना ही था?
वासवदत्ताः निस्सन्देह उससे भी अधिक!
पद्मावतीः भला आप यह निश्चित रूप से कैसे कह रही हैं?
वासवदत्ताः (स्वगत्) आर्यपुत्र के पक्षपात के कारण मुझसे पुनः सदाचार की सीमा का उल्लंघन हो गया। अच्छा ऐसा कहूँ। (प्रकट) यदि उनका प्रेम कम होता तो वे अपने आत्मीयजनों को त्याग न पातीं।
पद्मावतीः हाँ, यह सम्भव है।
चेटीः भद्रदारिके! आप भी अपने पति से वीणा सीखने का आग्रह करें।
पद्मावतीः यह आग्रह तो किया था मैंने आर्यपुत्र से।
वासवदत्ताः तो उन्होंने क्या कहा?
पद्मावतीः कुछ भी उत्तर न देकर वे दीर्घ निःश्वास में डूब गए।
वासवदत्ताः इसका क्या तात्पर्य निकाला तुमने?
पद्मावतीः इसका स्पष्ट तात्पर्य है कि आर्या वासवदत्ता के गुणों का स्मरण करके आर्यपुत्र ने मेरे समक्ष अपने अपने अश्रुओं को प्रसंगवश रोक लिया।
वासवदत्ताः (स्वगत्) यदि यह सत्य है तो संसार में मुझसा धन्य और कौन होगा?
चेटीः भद्रिके! सारसों की उस पंक्ति को देखें जो कोकनद सी श्वेत प्रतीत हो रही है!
(उदयन और विदूषक का प्रवेश)
चेटीः (उनके प्रवेश को देखकर) भद्रदारिके, स्वामी पधार रहे हैं।
पद्मावतीः (वासवदत्ता से) आर्ये! आपके कारण मैं आर्यपुत्र के दर्शन त्याग रही हूँ। चलिए, हम इस माधवी लतामण्डप में प्रवेश करें।
(पद्मावती, वासवदत्ता और चेटी माधवी लतामण्डप में छिप जाते हैं)
विदूषकः ही ही ही ही। पवन के अविरल प्रवाह से गिरे हुए कुसुमों से यह प्रमदवन अत्यन्त रमणीय हो रहा है। उधर चलें श्रीमान्!
उदयनः मित्र वसन्तक! मैं वासवदत्ता को विस्मृत नहीं कर पा रहा हूँ। उज्जयिनी में जब मैंने प्रथम बार अवन्ती की राजकन्या को स्वच्छन्द विचरण करते देखा था तो मेरी अवस्था अकथनीय-सी हो गई थी। प्रतीत होता था कि कामदेव के पाँचों बाणों ने मेरे हृदय को भेद दिया था।
विदूषकः ऐसा प्रतीत होता है कि देवि पद्मावती यहाँ आकर लौट चुकी हैं।
उदयनः यह कैसे जाना?
विदूषकः श्रीमान्, शेफालिका की डालियों से तोड़े गए पुष्प-गुच्छों को देखकर।
उदयनः वसन्तक! कितना विस्मयकारी है इन पुष्पों का सौन्दर्य!
वासवदत्ताः (स्वगत्) वसन्तक नाम का उच्चारण सुनकर तो मुझे प्रतीत हो रहा है जैसे मैं उज्जयिनी में ही हूँ।
उदयनः वसन्तक! आओ उस शिला पर बैठकर देवि पद्मावती की प्रतीक्षा करें।
विदूषकः बहुत अच्छा। (बैठता है, फिर सहसा उठकर) ही ही। शरत्काल की यह धूप अब असह्य प्रतीत हो रही है। आइए, इस माधवी लता-मण्डप में चलें।
उदयनः (उठकर) अच्छा चलो।
(दोनों घूमते हैं)
पद्मावतीः आर्य वसन्तक तो आकुलता में अनर्थ किए दे रहे हैं। भला अब क्या उपाय करें?
चेटीः भद्रिके! लता पर लटकते मधुमक्खी के इस छत्ते को हिला कर स्वामी को विमार्ग करूँ?
पद्मावतीः ऐसा ही कर।
(चेटी वैसा ही करती है)
विदूषकः बचाओ! बचाओ! श्रीमान् वहीं रुकें। आगे न आएँ।
उदयनः (दूर से) भला क्यों?
विदूषकः मधुमक्खियाँ यहाँ डंक मार रही हैं।
उदयनः तो मित्र, तुम भी यहाँ आ जाओ। मधुकरों को भयातुर न करो। देखो, मधुमस्त मधुकरों की मदनदग्ध प्रियाएँ उन्हें आलिंगन कर रही हैं। हमारी पदध्वनि से उद्विग्न होकर वे अपनी प्रिय मधुकरों से विलग होकर विरहित हो जाएँगी। अतः यहीं बैठना ही उचित है।
(विदूषक लौटकर उदयन के पास बैठता है)
चेटीः भद्रदारिके! अब तो हम यहाँ बन्दी हो गईं।
पद्मावतीः प्रसन्नता है कि आर्यपुत्र बैठे हैं।
वासवदत्ताः (स्वगत्) सौभाग्य से आर्यपुत्र पूर्ण स्वस्थ हैं। (वासवदत्ता के नेत्रों में अश्रु आ जाते हैं)
चेटीः कुमारी! आर्या के नेत्रों में अश्रु क्यों हैं?
वासवदत्ताः मधुकरों के अविनय से काश पुष्प के उड़ते रज के मेरे नेत्रों में पड़ने से मेरे नेत्र अश्रुमय हो गए हैं।
पद्मावतीः सत्यकथन आर्या!
विदूषकः इस निर्जन प्रमदवन में मैं आपसे कुछ पूछना चाहता हूँ।
उदयनः पूछो।
विदूषकः आपको प्रियतर कौन है? पूर्वपत्नी वासवदत्ता अथवा वर्तमानपत्नी पद्मावती?
उदयनः तुम्हारे इस प्रश्न से तो मुझ पर महासंकट आ पड़ा है।
पद्मावतीः आर्ये! आर्यपुत्र कितने संकट में हैं।
वासवदत्ताः (स्वगत्) मैं भाग्यहीन भी तो संकट में हूँ।
विदूषकः निःसंकोच बताएँ श्रीमान्। वे दोनों ही यहाँ नहीं हैं। एक की मृत्यु हो चुकी है और दूसरी कहीं अन्यत्र हैं।
उदयनः मित्र, मैं कुछ कह नहीं सकता। तू बड़ा वाचाल है।
विदूषकः (जीभ काटकर) सौगन्ध खाकर कहता हूँ, मैं किसी अन्य से नहीं कहूँगा।
उदयनः कुछ भी न कह पाने के लिए विवश हूँ मित्र।
पद्मावतीः आर्य वसन्तक भी कितने मूर्ख हैं, अभी भी वे आर्यपुत्र के हृदय को नहीं जान पाए।
विदूषकः आपको कहना ही पड़ेगा। बिना कहे मैं आपको इस शिलापट्ट से एक डग भी न जाने दूँगा। आप यहाँ मेरे बन्दी हैं।
उदयनः क्या बलपूर्वक कहलाओगे?
विदूषकः हाँ बलपूर्वक ही कहलाउँगा।
उदयनः देखता हूँ कि तुम मुझ पर कैसे बल प्रयोग करते हो।
विदूषकः श्रीमान प्रसन्न हों, मुझे क्षमा करें। मैं मित्रभाव से प्रार्थना कर रहा हूँ, बलपूर्वक नहीं। अपने हृदय की बात से मुझे अवगत कराएँ।
उदयनः अब तो विवशता है, कहना ही पड़ा। तो मित्र सुनो। यद्यपि अपने रूप, शील, गुण और माधुर्य के कारण पद्मावती मुझे अत्यन्त प्रिय है किन्तु वासवदत्ता के प्रति अपनी आसक्ति को मैं विस्मृत करने में असमर्थ हूँ।
वासवदत्ताः (स्वगत्) यह सुनकर तो मेरे समस्त दुःखों का अन्त हो गया। अहो, अज्ञातवास में भी बड़ा गुण है।
चेटीः भद्रिके! देखा आपने? स्वामी कितने अनुदार हैं।
पद्मावतीः नहीं प्रिये! आर्यपुत्र अत्यन्त उदार हैं। यह उनकी उदारता ही है कि वे आर्या वासवदत्ता के गुणों का स्मरण कर हैं।
वासवदत्ताः भद्रे! तुम्हारे वचन तुम्हारे अभिजात्य कुल के अनुरूप ही हैं।
उदयनः मैं तो कह चुका। अब तुम कहो तुम्हें कौन अधिक प्रिय है - वासवदत्ता या पद्मावती?
पद्मावतीः अब आर्यपुत्र ने भी आर्य वसन्तक के मार्ग का अवलम्बन किया।
विदूषकः मित्र! प्रलाप से भला क्या लाभ? मेरे लिए तो दोनों ही देवियाँ परम आदरणीय हैं।
उदयनः मूर्ख! मुझसे बलपूर्वक कहला कर अब स्वयं क्यों नहीं कहता?
विदूषकः तो क्या मुझसे बलपूर्वक कहलाएँगे?
उदयनः बलपूर्वक ही सही।
विदूषकः तब तो कहला चुके! करिए आप बलप्रयोग, मैं कुछ भी नहीं कहने वाला।
उदयनः प्रसन्न हों महाब्राह्मण! बलपूर्वक नहीं, अपनी इच्छानुसार ही कहें।
विदूषकः देवि पद्मावती क्रोध और अहंकार से रहित तरुणी, दर्शनीया और मधुरभाषिणी हैं। वे मेरी क्षुधापूर्ति का पर्याप्त खयाल रखती हैं और मुझे सुस्वादु भोजन करवाती हैं। अतः वे मेरी आदरणीय हैं। तथापि, देवि वासवदत्ता मेरे लिए बहुत अधिक आदरणीया थीं।
वासवदत्ताः (स्वगत्) आर्य वसन्तक! आपके वचन ने तो मुझे धन्य कर दिया।
उदयनः मित्र वसन्तक! मैं तुम्हारे इस विचार से वासवदत्ता को अवश्य ही अवगत कराउँगा।
विदूषकः हे मित्र! आर्या वासवदत्ता अब कहाँ? खेद! वे तो परलोक सिधार गईं।
उदयनः (दुःखी होकर) वासवदत्ता परलोक सिधार गई? हाँ, सत्य कहा तुमने, वे अब नहीं हैं। तुम्हारे इस परिहास ने मेरे हृदय को विदीर्ण कर दिया है, इसीलिए मित्र! अभ्यासवश मेरे मुख से यह बात निकल गई।
पद्मावतीः इस नृशंस ने तो रमणीय कथा-प्रसंग का नाश ही कर दिया।
वासवदत्ताः (स्वगत्) मैं तो आश्वस्त हुई। छिपकर इन बातों को सुनना कितना प्रिय प्रतीत हो रहा है।
विदूषकः आप धैर्य धारण करें। दैव बलवान है। उसके समक्ष किसी की शक्ति कार्य नहीं करती।
उदयनः मित्र! तुम मेरी अवस्था को नहीं समझ सकते। प्रिय के प्रति असीम अनुराग को विस्मृत नहीं किया जा सकता और प्रिय के स्मरण से दुःख पुनः नवीन हो जाता है। अश्रु बहाकर शान्ति-लाभ करना ही जीवन का रूप है।
विदूषकः मित्र! यह क्या? आपके नेत्रों में अश्रु हैं और अश्रुओं से आपका मुख भीग गया है। आप यहीं बैठिए, मैं मुँह धोने के लिए जल लेकर आता हूँ।
पद्मावतीः आर्ये! आर्यपुत्र के नेत्रों में अश्रु भरे हैं अतः वे हमें देख नहीं पाएँगे। अब हम यहाँ से निकल चलें।
वासवदत्ताः तुम्हारे लिए उत्कण्ठित पति को इस अवस्था में छोड़ जाना उचित नहीं है, अतः तुम रुक जाओ। मैं चली जाती हूँ।
चेटीः (पद्मावती से) आर्या ने उचित कहा। भद्रदारिके चलिए स्वामी के पास चलें।
पद्मावतीः क्या सचमुच मैं आर्यपुत्र के पास जाऊँ।
वासवदत्ताः हाँ, हाँ, तुम जाओ।
(उदयन के पास जाती हुई वासवदत्ता से मार्ग में कमलपत्र में जल लिए विदूषक आ मिलता है)
विदूषकः देवि पद्मावती! आप आ गईं?
पद्मावतीः आर्य वसन्तक! क्या बात है?
विदूषकः बात यह है.... बात यह है कि ...
पद्मावतीः हाँ, हाँ, कहें आर्य।
विदूषकः बात यह है कि वायुचालित काश पुष्प के रज महाराज के नेत्रों में पड़ जाने के कारण उनका मुख अश्रुओं से भीग गया है। उनका मुख धोने के लिए यह जल है।
(पद्मावती विदूषक से जल अपने हाथों में ले लेती है)
पद्मावतीः (स्वगत्) अहा! उदार स्वामी के परिजन भी उदार ही होते हैं। (उदयन के पास जाकर, प्रकट) आर्यपुत्र की जय हो! मुख धोने के लिए यह जल है।
उदयनः आह! पद्मावती! (वसन्तक की ओर मुख करके) वसन्तक, यह क्या?
वसन्तकः (कान में धीरे से) आर्या पद्मावती से मैंने आपके नेत्रों में काश-पुष्प-रज पड़ जाने की बात कही है।
उदयनः (वसन्तक के कान में) यह तुमने बहुत अच्छा किया। (जल से मुख धोकर) पद्मावती! बैठो।
पद्मावतीः जैसी आपकी आज्ञा! (बैठ जाती है)
उदयनः (स्वगत्) यह नववधू निस्सन्देह धीर स्वभाव वाली है किन्तु स्त्रियाँ स्वभावतः कातर होती हैं इसलिए सत्य को सुनकर यह दुःखी हो जाएगी। (प्रकट) प्राणवल्लभे! शरत् के चन्द्र के समान श्वेत काश के पुष्पों के रज नेत्रों में पड़ जाने से अश्रु आ गए थे।
विदूषकः क्या आपको स्मरण है कि मगधराज ने आपके सत्कार के लिए आपको बुलवाया था? सच है कि सत्कार से प्रीति में वृद्धि होती है। अपराह्न की बेला हो चुकी है अतः चलिए मगधराज के दर्शनों के लिए चलें।
उदयनः बहुत उचित कहा मित्र! चलें, प्रस्थान करें।
(सबका प्रस्थान)
(अंक 4 समाप्त)
अगला अंक - स्वप्न वासवदत्ता - अंक 5 (संस्कृत नाटक का संपादित सरल हिन्दी रूपान्तर)
(विदूषक का प्रवेश)
विदूषकः (प्रसन्नता के साथ) अन्ततः अनर्थ सलिल के भँवर से वत्सराज का उद्धार हुआ। उनके विवाहमंगल के दिन देखने को मिले। अत्यन्त प्रसन्नता की बात है कि आज मैं पुनः राजप्रासाद में बैठा हूँ, स्नान के लिए मुझे अन्तःपुर की दीर्घिकाएँ पुनः उपलब्ध हैं, लड्डू आदि सुमधुर भोजन कर रहा हूँ और अप्सराओं के संसर्ग के सिवाय अन्य सभी सुख मुझे प्राप्त हैं। कुछ दोष है तो मात्र इतना ही की भोजन मेरा पचा नहीं है जिसके कारण कोमल शैय्या पर भी मुझे निद्रा नहीं आ रही है। प्रतीत हो रहा है कि वात के समस्त लक्षण उपस्थित हो गए हैं। किन्तु अच्छे भोजन और अच्छा स्वास्थ्य के जीवन का वास्तविक सुख कहाँ?
(चेटी का प्रवेश)
चेटीः अरे! आर्य वसन्तक तो यहाँ हैं! आर्य! मैं न जाने कबसे आपको खोज रही हूँ।
विदूषकः भद्रे! मुझे खोजने में भला आपका निमित्त क्या है?
चेटीः हमारी भट्टिनी जानना चाह रही हैं कि क्या जामाता ने स्नान कर लिया है?
विदूषकः भला किसलिए जानना चाहती हैं देवि!
चेटीः ताकि पुष्प तथा अञ्जन प्रस्तुत किया जाए।
विदूषकः श्रीमान् स्नान से निवृत हो चुके हैं देवि! भोजन को छोड़कर समस्त सामग्री ले आओ।
चेटीः भोजन क्यों नहीं आर्य?
विदूषकः क्योंकि मुझ अभागे का उदर कोकिला की चक्षुओं की भाँति घूम रहा है।
चेटीः तो ऐसा ही होता रहे।
विदूषकः तो प्रस्थान करो देवि! मैं भी श्रीमान के पास जा रहा हूँ।
(पद्मावती और अवन्तिका रूपी वासवदत्ता का चेटी के साथ प्रवेश)
चेटीः भद्रदारिके! प्रमदवन में आने में आपका प्रयोजन क्या है?
पद्मावतीः प्रिये! मैं देखना चाहती हूँ कि शेफालिका के पुष्प-गुच्छ अभी खिले कि नहीं?
चेटीः अवश्य ही वे खिल चुके हैं भद्रदारिके! डालियों में लदे हुए वे पुष्प मोती की माला के मध्य गुँथे हुए मूँगे की भाँति प्रतीत हो रहे हैं। भद्रदारिके कुछ काल तक इस शिलापट्ट पर विश्राम करें तब तक मैं पुष्प तोड़ लाती हूँ।
पद्मावतीः (वासवदत्ता से) आर्ये! यहाँ विश्राम करें?
वासवदत्ताः (बैठते हुए) अवश्य!
(पद्मावती भी बैठ जाती है)
(चेटी का प्रस्थान तथा कुछ काल पश्चात् पुनः प्रवेश)
चेटीः देखें भद्रदारिके! देखें! शेफालिका के पुष्प मेरे आँचल में किस प्रकार रक्तवर्ण संखिया से चमक रहे हैं!
पद्मावतीः (पुप्षों को देखकर, वासवदत्ता से) आर्ये ये पुष्प कितने अद्भुत् प्रतीत हो रहे हैं!
वासवदत्ताः अहो! अत्यन्त सुन्दर पुष्प हैं ये!
चेटीः भद्रदारिके! क्या और पुष्प तोड़ लाऊँ?
पद्मावतीः नहीं, अब और पुष्प मत तोड़ो।
वासवदत्ताः प्रिय! और पुष्प तोड़ने से क्यों रोक रही हो?
पद्मावतीः क्योंकि आर्यपुत्र को इन पुष्पों को दिखाकर मैं उनकी दृष्टि में सम्मानित होना चाहती हूँ।
वासवदत्ताः सखी! क्या पति तुम्हें अत्यन्त प्रिय हैं?
पद्मावतीः यह तो मुझे ज्ञात नहीं आर्ये! किन्तु आर्यपुत्र के वियोग में मैं अत्यन्त उत्कण्ठित हो जाती हूँ।
वासवदत्ताः (स्वगत्) इसका यह कथन मेरे लिए कितना कष्टकर है।
चेटीः भद्रदारिका को पति का प्रिय होना उनके उत्तम विचारों के अनुकूल है।
पद्मावतीः किन्तु मेरे हृदय में एक सन्देह है।
वासवदत्ताः कैसा सन्देह?
पद्मावतीः क्या आर्या वासवदत्ता का आर्यपुत्र के प्रति प्रेम मेरे प्रेम जितना ही था?
वासवदत्ताः निस्सन्देह उससे भी अधिक!
पद्मावतीः भला आप यह निश्चित रूप से कैसे कह रही हैं?
वासवदत्ताः (स्वगत्) आर्यपुत्र के पक्षपात के कारण मुझसे पुनः सदाचार की सीमा का उल्लंघन हो गया। अच्छा ऐसा कहूँ। (प्रकट) यदि उनका प्रेम कम होता तो वे अपने आत्मीयजनों को त्याग न पातीं।
पद्मावतीः हाँ, यह सम्भव है।
चेटीः भद्रदारिके! आप भी अपने पति से वीणा सीखने का आग्रह करें।
पद्मावतीः यह आग्रह तो किया था मैंने आर्यपुत्र से।
वासवदत्ताः तो उन्होंने क्या कहा?
पद्मावतीः कुछ भी उत्तर न देकर वे दीर्घ निःश्वास में डूब गए।
वासवदत्ताः इसका क्या तात्पर्य निकाला तुमने?
पद्मावतीः इसका स्पष्ट तात्पर्य है कि आर्या वासवदत्ता के गुणों का स्मरण करके आर्यपुत्र ने मेरे समक्ष अपने अपने अश्रुओं को प्रसंगवश रोक लिया।
वासवदत्ताः (स्वगत्) यदि यह सत्य है तो संसार में मुझसा धन्य और कौन होगा?
चेटीः भद्रिके! सारसों की उस पंक्ति को देखें जो कोकनद सी श्वेत प्रतीत हो रही है!
(उदयन और विदूषक का प्रवेश)
चेटीः (उनके प्रवेश को देखकर) भद्रदारिके, स्वामी पधार रहे हैं।
पद्मावतीः (वासवदत्ता से) आर्ये! आपके कारण मैं आर्यपुत्र के दर्शन त्याग रही हूँ। चलिए, हम इस माधवी लतामण्डप में प्रवेश करें।
(पद्मावती, वासवदत्ता और चेटी माधवी लतामण्डप में छिप जाते हैं)
विदूषकः ही ही ही ही। पवन के अविरल प्रवाह से गिरे हुए कुसुमों से यह प्रमदवन अत्यन्त रमणीय हो रहा है। उधर चलें श्रीमान्!
उदयनः मित्र वसन्तक! मैं वासवदत्ता को विस्मृत नहीं कर पा रहा हूँ। उज्जयिनी में जब मैंने प्रथम बार अवन्ती की राजकन्या को स्वच्छन्द विचरण करते देखा था तो मेरी अवस्था अकथनीय-सी हो गई थी। प्रतीत होता था कि कामदेव के पाँचों बाणों ने मेरे हृदय को भेद दिया था।
विदूषकः ऐसा प्रतीत होता है कि देवि पद्मावती यहाँ आकर लौट चुकी हैं।
उदयनः यह कैसे जाना?
विदूषकः श्रीमान्, शेफालिका की डालियों से तोड़े गए पुष्प-गुच्छों को देखकर।
उदयनः वसन्तक! कितना विस्मयकारी है इन पुष्पों का सौन्दर्य!
वासवदत्ताः (स्वगत्) वसन्तक नाम का उच्चारण सुनकर तो मुझे प्रतीत हो रहा है जैसे मैं उज्जयिनी में ही हूँ।
उदयनः वसन्तक! आओ उस शिला पर बैठकर देवि पद्मावती की प्रतीक्षा करें।
विदूषकः बहुत अच्छा। (बैठता है, फिर सहसा उठकर) ही ही। शरत्काल की यह धूप अब असह्य प्रतीत हो रही है। आइए, इस माधवी लता-मण्डप में चलें।
उदयनः (उठकर) अच्छा चलो।
(दोनों घूमते हैं)
पद्मावतीः आर्य वसन्तक तो आकुलता में अनर्थ किए दे रहे हैं। भला अब क्या उपाय करें?
चेटीः भद्रिके! लता पर लटकते मधुमक्खी के इस छत्ते को हिला कर स्वामी को विमार्ग करूँ?
पद्मावतीः ऐसा ही कर।
(चेटी वैसा ही करती है)
विदूषकः बचाओ! बचाओ! श्रीमान् वहीं रुकें। आगे न आएँ।
उदयनः (दूर से) भला क्यों?
विदूषकः मधुमक्खियाँ यहाँ डंक मार रही हैं।
उदयनः तो मित्र, तुम भी यहाँ आ जाओ। मधुकरों को भयातुर न करो। देखो, मधुमस्त मधुकरों की मदनदग्ध प्रियाएँ उन्हें आलिंगन कर रही हैं। हमारी पदध्वनि से उद्विग्न होकर वे अपनी प्रिय मधुकरों से विलग होकर विरहित हो जाएँगी। अतः यहीं बैठना ही उचित है।
(विदूषक लौटकर उदयन के पास बैठता है)
चेटीः भद्रदारिके! अब तो हम यहाँ बन्दी हो गईं।
पद्मावतीः प्रसन्नता है कि आर्यपुत्र बैठे हैं।
वासवदत्ताः (स्वगत्) सौभाग्य से आर्यपुत्र पूर्ण स्वस्थ हैं। (वासवदत्ता के नेत्रों में अश्रु आ जाते हैं)
चेटीः कुमारी! आर्या के नेत्रों में अश्रु क्यों हैं?
वासवदत्ताः मधुकरों के अविनय से काश पुष्प के उड़ते रज के मेरे नेत्रों में पड़ने से मेरे नेत्र अश्रुमय हो गए हैं।
पद्मावतीः सत्यकथन आर्या!
विदूषकः इस निर्जन प्रमदवन में मैं आपसे कुछ पूछना चाहता हूँ।
उदयनः पूछो।
विदूषकः आपको प्रियतर कौन है? पूर्वपत्नी वासवदत्ता अथवा वर्तमानपत्नी पद्मावती?
उदयनः तुम्हारे इस प्रश्न से तो मुझ पर महासंकट आ पड़ा है।
पद्मावतीः आर्ये! आर्यपुत्र कितने संकट में हैं।
वासवदत्ताः (स्वगत्) मैं भाग्यहीन भी तो संकट में हूँ।
विदूषकः निःसंकोच बताएँ श्रीमान्। वे दोनों ही यहाँ नहीं हैं। एक की मृत्यु हो चुकी है और दूसरी कहीं अन्यत्र हैं।
उदयनः मित्र, मैं कुछ कह नहीं सकता। तू बड़ा वाचाल है।
विदूषकः (जीभ काटकर) सौगन्ध खाकर कहता हूँ, मैं किसी अन्य से नहीं कहूँगा।
उदयनः कुछ भी न कह पाने के लिए विवश हूँ मित्र।
पद्मावतीः आर्य वसन्तक भी कितने मूर्ख हैं, अभी भी वे आर्यपुत्र के हृदय को नहीं जान पाए।
विदूषकः आपको कहना ही पड़ेगा। बिना कहे मैं आपको इस शिलापट्ट से एक डग भी न जाने दूँगा। आप यहाँ मेरे बन्दी हैं।
उदयनः क्या बलपूर्वक कहलाओगे?
विदूषकः हाँ बलपूर्वक ही कहलाउँगा।
उदयनः देखता हूँ कि तुम मुझ पर कैसे बल प्रयोग करते हो।
विदूषकः श्रीमान प्रसन्न हों, मुझे क्षमा करें। मैं मित्रभाव से प्रार्थना कर रहा हूँ, बलपूर्वक नहीं। अपने हृदय की बात से मुझे अवगत कराएँ।
उदयनः अब तो विवशता है, कहना ही पड़ा। तो मित्र सुनो। यद्यपि अपने रूप, शील, गुण और माधुर्य के कारण पद्मावती मुझे अत्यन्त प्रिय है किन्तु वासवदत्ता के प्रति अपनी आसक्ति को मैं विस्मृत करने में असमर्थ हूँ।
वासवदत्ताः (स्वगत्) यह सुनकर तो मेरे समस्त दुःखों का अन्त हो गया। अहो, अज्ञातवास में भी बड़ा गुण है।
चेटीः भद्रिके! देखा आपने? स्वामी कितने अनुदार हैं।
पद्मावतीः नहीं प्रिये! आर्यपुत्र अत्यन्त उदार हैं। यह उनकी उदारता ही है कि वे आर्या वासवदत्ता के गुणों का स्मरण कर हैं।
वासवदत्ताः भद्रे! तुम्हारे वचन तुम्हारे अभिजात्य कुल के अनुरूप ही हैं।
उदयनः मैं तो कह चुका। अब तुम कहो तुम्हें कौन अधिक प्रिय है - वासवदत्ता या पद्मावती?
पद्मावतीः अब आर्यपुत्र ने भी आर्य वसन्तक के मार्ग का अवलम्बन किया।
विदूषकः मित्र! प्रलाप से भला क्या लाभ? मेरे लिए तो दोनों ही देवियाँ परम आदरणीय हैं।
उदयनः मूर्ख! मुझसे बलपूर्वक कहला कर अब स्वयं क्यों नहीं कहता?
विदूषकः तो क्या मुझसे बलपूर्वक कहलाएँगे?
उदयनः बलपूर्वक ही सही।
विदूषकः तब तो कहला चुके! करिए आप बलप्रयोग, मैं कुछ भी नहीं कहने वाला।
उदयनः प्रसन्न हों महाब्राह्मण! बलपूर्वक नहीं, अपनी इच्छानुसार ही कहें।
विदूषकः देवि पद्मावती क्रोध और अहंकार से रहित तरुणी, दर्शनीया और मधुरभाषिणी हैं। वे मेरी क्षुधापूर्ति का पर्याप्त खयाल रखती हैं और मुझे सुस्वादु भोजन करवाती हैं। अतः वे मेरी आदरणीय हैं। तथापि, देवि वासवदत्ता मेरे लिए बहुत अधिक आदरणीया थीं।
वासवदत्ताः (स्वगत्) आर्य वसन्तक! आपके वचन ने तो मुझे धन्य कर दिया।
उदयनः मित्र वसन्तक! मैं तुम्हारे इस विचार से वासवदत्ता को अवश्य ही अवगत कराउँगा।
विदूषकः हे मित्र! आर्या वासवदत्ता अब कहाँ? खेद! वे तो परलोक सिधार गईं।
उदयनः (दुःखी होकर) वासवदत्ता परलोक सिधार गई? हाँ, सत्य कहा तुमने, वे अब नहीं हैं। तुम्हारे इस परिहास ने मेरे हृदय को विदीर्ण कर दिया है, इसीलिए मित्र! अभ्यासवश मेरे मुख से यह बात निकल गई।
पद्मावतीः इस नृशंस ने तो रमणीय कथा-प्रसंग का नाश ही कर दिया।
वासवदत्ताः (स्वगत्) मैं तो आश्वस्त हुई। छिपकर इन बातों को सुनना कितना प्रिय प्रतीत हो रहा है।
विदूषकः आप धैर्य धारण करें। दैव बलवान है। उसके समक्ष किसी की शक्ति कार्य नहीं करती।
उदयनः मित्र! तुम मेरी अवस्था को नहीं समझ सकते। प्रिय के प्रति असीम अनुराग को विस्मृत नहीं किया जा सकता और प्रिय के स्मरण से दुःख पुनः नवीन हो जाता है। अश्रु बहाकर शान्ति-लाभ करना ही जीवन का रूप है।
विदूषकः मित्र! यह क्या? आपके नेत्रों में अश्रु हैं और अश्रुओं से आपका मुख भीग गया है। आप यहीं बैठिए, मैं मुँह धोने के लिए जल लेकर आता हूँ।
पद्मावतीः आर्ये! आर्यपुत्र के नेत्रों में अश्रु भरे हैं अतः वे हमें देख नहीं पाएँगे। अब हम यहाँ से निकल चलें।
वासवदत्ताः तुम्हारे लिए उत्कण्ठित पति को इस अवस्था में छोड़ जाना उचित नहीं है, अतः तुम रुक जाओ। मैं चली जाती हूँ।
चेटीः (पद्मावती से) आर्या ने उचित कहा। भद्रदारिके चलिए स्वामी के पास चलें।
पद्मावतीः क्या सचमुच मैं आर्यपुत्र के पास जाऊँ।
वासवदत्ताः हाँ, हाँ, तुम जाओ।
(उदयन के पास जाती हुई वासवदत्ता से मार्ग में कमलपत्र में जल लिए विदूषक आ मिलता है)
विदूषकः देवि पद्मावती! आप आ गईं?
पद्मावतीः आर्य वसन्तक! क्या बात है?
विदूषकः बात यह है.... बात यह है कि ...
पद्मावतीः हाँ, हाँ, कहें आर्य।
विदूषकः बात यह है कि वायुचालित काश पुष्प के रज महाराज के नेत्रों में पड़ जाने के कारण उनका मुख अश्रुओं से भीग गया है। उनका मुख धोने के लिए यह जल है।
(पद्मावती विदूषक से जल अपने हाथों में ले लेती है)
पद्मावतीः (स्वगत्) अहा! उदार स्वामी के परिजन भी उदार ही होते हैं। (उदयन के पास जाकर, प्रकट) आर्यपुत्र की जय हो! मुख धोने के लिए यह जल है।
उदयनः आह! पद्मावती! (वसन्तक की ओर मुख करके) वसन्तक, यह क्या?
वसन्तकः (कान में धीरे से) आर्या पद्मावती से मैंने आपके नेत्रों में काश-पुष्प-रज पड़ जाने की बात कही है।
उदयनः (वसन्तक के कान में) यह तुमने बहुत अच्छा किया। (जल से मुख धोकर) पद्मावती! बैठो।
पद्मावतीः जैसी आपकी आज्ञा! (बैठ जाती है)
उदयनः (स्वगत्) यह नववधू निस्सन्देह धीर स्वभाव वाली है किन्तु स्त्रियाँ स्वभावतः कातर होती हैं इसलिए सत्य को सुनकर यह दुःखी हो जाएगी। (प्रकट) प्राणवल्लभे! शरत् के चन्द्र के समान श्वेत काश के पुष्पों के रज नेत्रों में पड़ जाने से अश्रु आ गए थे।
विदूषकः क्या आपको स्मरण है कि मगधराज ने आपके सत्कार के लिए आपको बुलवाया था? सच है कि सत्कार से प्रीति में वृद्धि होती है। अपराह्न की बेला हो चुकी है अतः चलिए मगधराज के दर्शनों के लिए चलें।
उदयनः बहुत उचित कहा मित्र! चलें, प्रस्थान करें।
(सबका प्रस्थान)
(अंक 4 समाप्त)
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