Monday, October 5, 2015

पृथ्वी के पर्यायवाची शब्द


  • पृथवी
  • पृथिवी
  • भूमि
  • भूमी
  • अचला
  • अनन्ता
  • रसा
  • विश्वम्भरा
  • स्थिरा
  • धरा
  • धरित्री
  • धरणी
  • धरणि
  • वसुमती
  • वसुधा
  • वुसंधरा
  • अवनि
  • अवनी
  • मही
  • विपुला
  • रत्नगर्भा
  • जगती
  • सागराम्बरा
  • उर्वी
  • गोत्र
  • क्षमा
  • मेदिनी
  • गह्वरी
  • धात्री
  • गौरिला
  • कुम्भिनी
  • भूतधात्री
  • क्षोणी
  • क्षोणि
  • काश्यपी
  • क्षिति
  • सर्वेसृहा

Saturday, October 3, 2015

ज्ञान को आत्मसात करना ही श्रेयस्कर है

एक बार राजा भोज के दरबार में एक शिल्पकार आया और उसने राजा से कहा, "हे राजन्! मैंने यह तीन मूर्तियाँ बड़े परिश्रम से बनाई हैं। इन तीनों मूर्तियों में कुछ न कुछ अन्तर है। उन अन्तरों के आधार पर आप मुझे इन मूर्तियों की कीमत दे दें।"

राज भोज तथा उनके सभी दरबारियों ने पत्थर की उन मूर्तियों को गौर से देखा, वे शिल्पकला की उत्कृष्ट कलाकृति थीं। तीनों हू-ब-हू एक जैसी! रत्ती भर भी कहीं कोई फर्क नहीं। लाख कोशिश करने पर भी वे उन मूर्तियों में किसी प्रकार का कोई अन्तर न निकाल पाये।

राजा भोज विचार करने लगे कि काश! इस समय यहाँ पर कालिदास मौजूद होते। वे जरूर इन मूर्तियों में फर्क ढूँढ लेते। उसी समय कालिदास वहाँ पधारे। राजा ने मूर्तियाँ उनके हाथों में दे दीं। पहले तो कालिदास को भी उन मूर्तियों में किसी प्रकार का अन्तर नजर नहीं आया किन्तु बहुत गौर से देखने पर उन्हें उन मूर्तियों के कानों में छेद दिखाई पड़ा। वे सोचने लगे कि फर्क अवश्य ही कान के इन छेदों के कारण ही होगा।

कालिदास ने सोने का बहुत पतला तार मँगवाया और एक मूर्ति के कान में उस तार को डाला। तार अन्दर घुसते चला गया और अन्त में तार का सिरा दूसरे कान से बाहर निकल आया। दूसरी मूर्ति के कान में तार डालने पर उसका सिरा मुँह से बाहर निकला। पर तीसरे मूर्ति के कान में तार डालने पर तार घुसता ही चला गया, कहीं से भी बाहर नहीं निकला।

यह देखकर कालिदास के मुख पर सन्तुष्टि की मुस्कान आ गई। वे राजा भोज से बोले, "महाराज जिस मूर्ति के दूसरे कान से तार का सिरा निकला उसकी कीमत दो कौड़ी भी नहीं है क्योंकि वह उन लोगों का प्रतीक है जो ज्ञान की बातों को एक कान से सुनते हैं और दूसरे कान से बाहर निकाल देते हैं। दूसरी मूर्ति जिसके मुँह से तार का सिरा निकला वह अवश्य कुछ मूल्यवान है क्योंकि वह ऐसे लोगों को इंगित करती है जो ज्ञान की बातों को सुनते हैं और सुनकर दूसरों को भी बताते हैं, उन बातों को आत्मसात करते हैं या नहीं यह कहा नहीं जा सकता किन्तु ज्ञान की बातों को सुनकर दूसरों को भी बताने का अवश्य कुछ न कुछ मूल्य होता है। और तीसरी मूर्ति जिसके भीतर तार घुसता ही चला गया, कहीं से बाहर नहीं निकला उन लोगों का प्रतीक है जो ज्ञान की बातों को सुनकर आत्मसात कर लेते हैं। इस तीसरी मूर्ति का मूल्य कोई भी नहीं दे सकता, यह अनमोल है।"

कथा का सार यही है कि ज्ञान की बातों को आत्मसात कर लेना और उनका जगत तथा स्वयं के हित में सदुपयोग करना ही श्रेयस्कर है।

Monday, April 20, 2015

मुझ बुड्ढे की भगवान से प्रार्थना

हे सर्वशक्तिमान परमात्मा!

आप जानते ही हैं कि मेरी उम्र साठ साल को पार कर गई है और मैं अब बूढ़ा हो चला हूँ।

मुझे अत्यधिक वाचाल याने कि बातूनी होने से बचाने की कृपा करें। ऐसी कृपा करें कि मैं अपने पुराने चुटकुले सुना-सुनाकर, अपने अतीत के किस्से बता-बता कर और लोगों को बिना माँगी सलाह दे-देकर पकाने की कोशिश करने से हमेशा बचूँ।

यह भी कृपा करें कि मैं लोगों के समक्ष अपनी बातों को, अन्तहीन विस्तार न देकर, संक्षेप में रख सकूँ। मेरी बुद्धि में यह बात सदा बनी रहे कि अपनी बात को अनावश्यक विस्तार देकर लोगों के समय बर्बाद करने वाले वृद्धजनों को लोग और कुछ नहीं, बल्कि एक खूँसट बुड्ढा ही समझते हैं।

अपनी ही हाँकने के बजाय लोगों की बात को सुनने और समझने की क्षमता मुझे प्रदान करने की कृपा करें।

मुझे ऐसा आशीर्वाद दें कि इस उम्र में भी मैं लोगों के सुख-दुःख में साथ दे पाऊँ।

मुझ पर ऐसी कृपा करें कि मैं लोगों के सामने अपने परिजनों की निन्दा करने से हमेशा बचा रहूँ।

मेरे मन में कदापि यह विचार न बना रहे कि 'चूँकि मैं अन्य लोगों से उम्र में बड़ा हूँ ड़सलिए, मैं अन्य लोगों से अधिक बुद्धिमान और ज्ञानी हूँ', मेरे भीतर सदा आभास बना रहे कि यह जरूरी नहीं है कि उम्रदराज आदमी दूसरों से अधिक विवेकी हो।

मेरी इस पूरी प्रार्थना का सार यही है कि हे भगवान! आप मुझ ऐसी कृपा करें कि मैं इस वय में भी अपने अवगुणों से अवगत रह पाऊँ ताकि लोग मुझे सठियाया हुआ बुड्ढा, सनकी बुड्ढा, झक्की बुड्ढा, खूँसट बुड्ढा जैसी उपाधि प्रदान करने से परहेज करें।

Saturday, March 21, 2015

हिन्दू नववर्ष

  • हिन्दू नववर्ष (Hindu New Year) का आरम्भ प्रतिवर्ष चैत्र शुक्ल प्रतिपदा की तिथि से होता है। आज भी चैत्र शुक्ल प्रतिपदा का दिन है और आज से हिन्दू नव संवत्सर 2072 का आरम्भ हो रहा है।

  • हिन्दू मान्यता के अनुसार चैत्र शुक्ल प्रतिपदा का दिन से सृष्टि की रचना का पहला दिन है। ब्रह्मा जी ने आज से लगभग एक अरब 97 करोड़ 39 लाख 49 हजार 111 वर्ष पूर्व आज के दिन ही से सृष्टि की रचना शुरू की थी।

  • रावण का वध करके लंका से अयोध्या वापस आने के बाद भगवान श्री राम का राज्याभिषेक आज ही के दिन, अर्थात् चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के ही दिन, हुआ था।

  • चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के दिन से ही चैत्र नवरात्रि का आरम्भ होता है।

  • आज से लगभग 5113 वर्ष पूर्व चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के दिन ही ज्येष्ठ पाण्डव युधिष्ठिर का राज्याभिषेक हुआ था, जिसकी स्मृति में युगाब्द संवत्सर आरम्भ किया गया।

  • भारत के चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य द्वारा चलाये गये विक्रम संवत का आरम्भ भी आज से 2072 वर्ष पूर्व चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के दिन ही से हुआ था।

  • आज से 1937 वर्ष पूर्व आज ही के दिन से शालिवाहन शक संवत का आरम्भ हुआ था। उल्लेखनीय है कि शालिवाहन ने हूणों को परास्त कर दक्षिण भारत में श्रेष्ठतम राज्य स्थापित किया था।

  • सिख परम्परा के अनुसार चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को गुरु अंगद देव प्रकटोत्सव मनाया जाता है। गुरु अंगद देव सिखों के द्वितीय गुरु हैं।

  • आर्य समाज की स्थापना भी चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के दिन ही हुई थी।

  • सिंध प्रान्त के सुप्रसिद्ध समाज रक्षक संत झूलेलाल, जिन्हें भगवान वरुण का अवतार माना जाता है, भी चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के दिन ही प्रकट हुए थे।

  • उल्लास और उमंग प्रदान करने वाला ऋतुराज वसन्त का आरम्भ भी चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के दिन ही होता है।
  • अंग्रेजी नववर्ष रात्रि के बारह बजे नीरव अन्धकार में आता है जबकि हिन्दू नववर्ष प्रातः सूर्योदय के समय पक्षियों के मधुर कलरव के साथ आता है; अंग्रेजी नववर्ष आने के समय पतझड़ का मौसम होता है जिसके कारण प्रकृति का सौन्दर्य फीका रहता है जबकि हिन्दू नववर्ष आने के समय वसन्त ऋतु होता है जो कि प्रत्येक व्यक्ति के हृदय में हर्ष, उल्लास और उमंग को उद्दीप्त करती है; अग्रेजी नववर्ष मादक पदार्थों का सेवन करके हो-हल्ला मचा कर मनाया जाता है जबकि हिन्दू नववर्ष शान्ति के साथ पूजा-पाठ करके मनाया जाता है।

Friday, March 20, 2015

परिवर्तन

इस संसार में कुछ भी स्थिर नहीं है, परिवर्तन (variance) ही संसार का नियम है। समय बदलने के साथ ही साथ अनेक प्रकार के उलट-फेर (somerset) होना स्वाभाविक बात है। इस सत्य को समस्त विद्वानों ने स्वीकारा है।

किसी ने सच ही कहा है - सदा न जोबन थिर रहे, सदा न जीवै कोय।

रावण का वंश बहुत विशाल था पर हुआ क्या? यही ना -

इक लख पूत सवा लख नाती,
ता रावण घर दिया ना बाती।

यह तो समय बदल जाने की ही बात है।

महाभारत के शान्ति पर्व (80/8) में परिवर्तन (variance, somerset) को लक्ष्य करते हुए वेदव्यास जी लिखते हैं -

असाधुः साधुतामेति साधुर्भवति दारुणः।
अरिश्च मित्रं भवति मित्रं चापि प्रदुष्यति॥

भावार्थः असाधु अर्थात दुष्ट मनुष्य साधु अर्थात भला व्यक्ति बन जाता है और साधु अर्थात भला व्यक्ति दारुण अर्थात दुष्ट बन जाता है, शत्रु मित्र बन जाता है और मित्र शत्रु।

सच पूछा जाय तो मनुष्य बलवान नहीं होता, समय ही बलवान होता है, इसीलिए तो कहा गया है

पुरुष बली नहि होत है समय होत बलवान।
भीलन लूटी गोपिका वहि अर्जुन वहि बान॥

मलिक मोहम्मद जायसी अपनी सुप्रसिद्ध रचना पद्मावत में कहते हैं -

मोतिहि जौं मलीन होइ करा। पुनि सो पानि कहाँ निरमरा॥

भावार्थः एक बार मोती की कान्ति मलिन हो जाने पर उसे फिर से वही कान्ति नहीं मिलती।

समय के साथ परिवर्तन कैसे होता है यह बताते हुए गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं -

तुलसी पावस के समय धरी कोकिलन मौन।
अब तो दादुर बोलिहैं हमें पूछिहै कौन॥

भावार्थः तुलसीदास जी कहते हैं कि पावस ऋतु अर्थात बरसात का मौसम आने पर कोयल मौन धारण कर लेती है, क्योंकि मेढकों के टर्राने की आवाज के बीच कोयल की आवाज कौन सुनेगा?

नरोत्तमदास अपनी प्रसिद्ध खंडकाव्य "सुदामाचरित" में कहते हैं -

कै वह टूटि सी छानी हुती कहँ
कंचन के सब धाम सुहावत।
कै पग मे पनही न हुती कहँ
लै गजराजहु ठाढ़े महावत॥
भूमि कठोर पै रात कटै कहँ
कोमल सेज पै नींद न आवत।
कै जुरतो नहिं कोदो सवाँ, प्रभु
कै परताप ते दाख न भावत॥

भावार्थः कृष्ण के सखा सुदामा का कभी टूटी छत वाली झोपड़ी थी तो अब विशाल भवन है जिसे सारे कमरे सोने से सुसज्जित हैं। कभी सुदामा के पैरों में पनही तक नहीं होती थी और अब उनके लिए हाथी लेकर महावत खड़े रहते हैं। कभी कठोर भूमि पर सोकर रात कटती थी तो अब कोमल शय्या पर भी नींद नहीं आती और कभी मोटा-झोटा अन्न तक भी नहीं मिल पाता था और आज मेवे भी सुदामा को भाते नहीं हैं।

समय के बारे में कवि बिहारी लिखते हैं -

समै पलटि पलटै प्रकृति, को न तजै निज चाल।

भावार्थः समय बदलने पर प्रकृति भी पलट जाती है, इस संसार में भला ऐसा कौन है जो समय के साथ अपनी चाल न बदलता हो।

जयशंकर प्रसाद अपने नाटक "स्कन्दगुप्त" में लिखते हैं -

परिवर्तन ही सृष्टि है, जीवन है। स्थिर होना मृत्यु है, निश्चेष्ट शान्ति मरण है। प्रकृति क्रियाशील है।

सुमित्रानन्दन पंत जी अपनी रचना "पल्लव" में कहते हैं -

आज बचपन का कोमल गात जरा का पीला पात।
चार दिन सुखद चाँदनी रात और फिर अंधकार अज्ञात॥

भावार्थः बचपन में जो कोमल शरीर था वह आज वृद्धावस्था में पीला और झुर्रीदार हो गया है। चार दिन की सुखद चाँदनी होती है फिर अंधेरा ही रह जाता है।

"भारत भारती" में मैथिलीशरण गुप्त जी बताते हैं -

संसार में किसका समय है एक सा रहता सदा,
है निशि-दिवा सी चूमती सर्वत्र विपदा-सम्पदा।
जो आज राजा बन रहा है रंक कल होता वही,
जो आज उत्सव-मग्न है कल शोक से रोता वही॥

भावार्थः इस संसार में भला किसका समय एक सा रहता है! रात और दिन की तरह विपत्ति और सम्पत्ति आते-जाते रहते हैं। जो आज अमीर है वही कल गरीब हो जाता है और जो आज उत्सव मना रहा है उसी को कल शोक से रोना भी पड़ता है।

"चित्रलेखा" उपन्यास में भगवतीचरण वर्मा जी लिखते हैं -

संसार क्या है? शून्य है। और परिवर्तन उस शून्य की चाल है।

बन्धुओं समय कभी भी एक जैसा नहीं होता, आपने ये लोकोक्तियाँ अवश्य ही सुनी होंगी

"सब दिन जात न एक समान"

"कभी दिन बड़े तो कभी रात बड़ी"

"कभी नाव गाड़ी पर, कभी गाड़ी नाव पर"

"चार दिनों की चांदनी फिर अंधियारी रात"

"घूरे के भी दिन फिरते हैं"

अतः समय के अनुसार स्वयं को ढालने में ही बेहतरी है।