
ब्रह्म कमल एक प्रकार के अद्वितीय फूल का नाम है जो कि सिर्फ हिमालय, उत्तरी बर्मा और दक्षिण पश्चिम चीन में पाया जाता है। जैसे कि नाम से ही विदित है, ब्रह्म कमल नाम उत्पत्ति के देवता ब्रह्मा जी के नाम पर रखा गया है। इसे Saussurea obvallata के नाम से भी जाना जाता है।
कहा जाता है कि ब्रह्म कमल के पौधों में एक साल में केवल एक बार ही फूल आता है जो कि सिर्फ रात्रि में ही खिलता है। अपने इस गुण के कारण से ब्रह्म कमल को शुभ माना जाता है।
Monday, May 26, 2008
ब्रह्म कमल - हिमालय के अद्वितीय फूल
Sunday, May 25, 2008
संसार में रुपया ही सबसे बड़ा नहीं है किन्तु
ऐसा नहीं है कि संसार में रुपया ही सबसे बड़ा है, रुपये से बढ़ कर एक से एक मूल्यवान वस्तुएँ हैं जैसे कि विद्या, शिक्षा, ज्ञान, योग्यता आदि, किन्तु मुश्किल यह है कि, आज के जमाने में, वे वस्तुएँ भी केवल रुपये अदा करके प्राप्त की जा सकती हैं। आज के जमाने में हर चीज बिकाऊ हैं, पानी तक तो बिकने लगा है फिर शिक्षा हो या चिकित्सा की बात ही क्या है।
यदि आपके पास रुपया नहीं है तो क्या आप अपने औलाद को, उच्च शिक्षा तो दूर, साधारण शिक्षा ही दिलवा सकते हैं? मैं उन दिनों के मुंबई, कलकत्ता जैसे महानगरों की बात तो नहीं करता किन्तु हमारे समय कम से कम रायपुर में तो लोग के.जी., पी.पी. क्या होता है नहीं जानते थे और न ही म्युनिसिपालटी के स्कूलों अलावा अन्य खर्चीले प्रायवेट स्कूल हुआ करते थे। पिताजी हमें म्युनिसिपालटी के स्कूल में ले गये थे जहाँ हमें अपने सीधे हाथ को सिर पर से घुमा कर उलटे कान को छूने के लिये कहा गया (ऐसा माना जाता था कि छः वर्ष की उम्र हो जाने पर हाथों की लंबाई इतनी हो जाती है कि हाथ को सिर पर से घुमाते हुये दूसरी ओर के कान को छूआ जा सकता है, छः वर्ष से कम उम्र में नहीं) और हम भर्ती हो गये थे पहली कक्षा में। कपड़े की एक थैली में एक बाल-भारती पुस्तिका और स्लेट पेंसिल, यही था हमारा बस्ता। आज यदि आप किसी तरह से अपने बच्चे को किसी स्कूल में भर्ती करा भी लें तो उसके बस्ते का खर्च उठाते उठाते ही बेदम हो जायेंगे और बच्चा उसका बोझ उठाते उठाते।
उन दिनों प्रायमरी स्कूल में पढ़ने के लिये कोई फीस नहीं पटानी पड़ती थी। मिडिल स्कूल के लिये आठ आना और हाई स्कूल के लिये भी कुछ ऐसा ही मामूली सा फीस पटाना होता था। चिकित्सा के लिये बड़े बड़े अस्पताल न हो कर गिनी चुनी डिस्पेंसरियाँ ही थीं किन्तु उनके मालिक डॉक्टर की फीस नियत नहीं थी, जहाँ पैसे वालों से अधिक फीस ले लेते थे वहीं गरीबों का मुफ्त इलाज भी कर दिया करते थे। आज आप गरीब हैं या अमीर, इससे डॉक्टर को कोई फर्क नहीं पड़ता। उनकी नियत फीस आपको देना ही होगा।
सोचता हूँ कि पचास सालों में जमाना कहां से कहाँ पहुँच गया। सब कुछ बदल चुका है। अधिक वय के लोगों को अतीत की यादें बहुत प्रिय होती हैं। मैं भी उनमें से एक हूँ इसीलिये आज मेरे विचार भी अतीत में भटकने लग गये थे।
पुराने लोगों को सदैव ही अतीत अच्छा और वर्तमान बहुत बुरा प्रतीत होते रहा है और नये लोगों को पुराने लोग पुराने लोग दकियानूस। खैर यह मानव प्रकृति है। किन्तु कम से कम शिक्षा और चिकित्सा को तो बिकने से रोकना ही होगा, इन पर सभी का समान अधिकार होना चाहिये चाहे वह अमीर हो या गरीब।
Thursday, May 22, 2008
भारतीय फिल्म संगीत
फिल्म संगीत जब शुरू हुआ, केवल गिने-चुने साज ही उपलब्ध थे साथ ही कई प्रकार की तकनीकी कठिनाइयाँ थीं। माइक्रोफोन इतने कमजोर होते थे कि रेकार्डिंग के पहले कुछ समय तक उसे गरम करना पड़ता था। साज कम होने के कारण आवाज का महत्व अधिक था, फिल्मों में काम करने के लिये गीत-संगीत का ज्ञान होना आवश्यक था क्योंकि प्ले बैक का सिस्टम नहीं था, उन दिनों और कलाकारों को अपना गाना स्वयं गाना पड़ता था। आवाज का महत्व अधिक होने के कारण ही एक अंतराल तक के.एल. सहगल, पंकज मलिक, के.सी. डे छाये रहे। फिर जमाना बदला, नये-नये तकनीक आने लगे, साजों में भी वृद्धि होने लगी। सन् 1944 में संगीतकार नौशाद ने पहली बार फिल्म 'रतन' में साज और आवाज का भरपूर प्रयोग किया और फिल्म संगीत को एक नई दिशा मिली। नौशाद, सी. रामचंद्र, चित्रगुप्त, हेमंत कुमार, रोशन, एस.डी. बर्मन, खय्याम, जयदेव, सलिल चौधरी, मदन मोहन, शंकर जयकिशन, ओ.पी. नैयर, कल्याणजी आनंदजी, लक्ष्मीकांत प्यारेलाल, आर.डी. बर्मन जैसे तीव्र कल्पनाशील संगीतकारों और मोहम्मद रफ़ी, मुकेश, किशोर कुमार, महेन्द्र कपूर, लता मंगेशकर, सुमन कल्याणपुर, आशा भोंसले जैसे प्रतिभावान गायक गायिकाओं के संगम ने फिल्म संगीत को मधुर और सर्वप्रिय बना दिया। धुनों में साज और आवाज के समुचित अनुपात उन्हें और भी अधिक मधुर बना देते थे और सार्थक शब्द संरचना सोने में सुहागा का काम करती थीं।
सन् 1950 से 1980 तक का समय फिल्म संगीत का स्वर्ण युग रहा। मेलॉडियस संगीत उस काल के फिल्मों की आत्मा बन गई। एक एक गीत को परदे पर देखने और सुनने के लिये लोग अनेक बार एक ही फिल्म को देखने जाते थे और अधिकतम फिल्में सिल्व्हर जुबली, गोल्डन जुबली तथा प्लेटिम जुबली मनाया करती थीं। सारे के सारे संगीतकार अपनी धुनों को सुमधुर सुरों से सजाने के लिये अथक परिश्रम किया करते थे। शैलेन्द्र, हसरत जयपुरी, साहिर लुधियानवी, मजरूह सुल्तानपुरी, राजेन्द्र कृष्ण आदि भी गीतों को सार्थक बनाने के लिये एड़ी चोटी का जोर लगा दिया करते थे। गायक गायिकाओं के कर्णप्रिय कंठस्वर उन दिनों के संगीत में चार चाँद लगा दिया करती थीं। कई बार तो फिल्में पिट जाती थीं पर उनका संगीत गूंजते रहता था। पारसमणि (गीत - उइ माँ, उइ माँ ये क्या हो गया........, सलामत रहो........), लुटेरा (गीत - किसी को पता ना चले बात का........), बादशाह (गीत - अभी कमसिन हो, नादां हो जानेजाना........) जैसी स्टंट फिल्मों के गीत भी आज तक लोकप्रिय हैं।
सभी संगीतकार अपनी मौलिकता बनाये रखना चाहते थे और सभी की अपनी अपनी स्टाइल थी। बर्मन दा अपनी धुनों में लोक संगीत का बहुत अच्छा समावेश कर लेते थे। आपको शायद पता हो कि सचिन देव बर्मन त्रिपुरा के राजपरिवार से सम्बंधित थे। बर्मन दा को वर्ल्ड म्युजिक कान्टेस्ट (world music contest) का जूरी होने का गौरव भी प्राप्त था। सलिल चौधरी भारतीय और पश्चिमी दोनों ही संगीत में पारंगत थे और दोनों का बहुत अच्छा समावेश किया करते थे। शंकर जयकिशन ज्यादातर एकॉर्डियन और बांसुरी के मेल से अपनी धुनों को सजाया करते थे। कल्याणजी आनंदजी क्लार्नेट का बहुत अच्छा इस्तेमाल करते थे। फिल्म नागिन में हेमंत कुमार के लिये बीन की धुन को कल्याणजी आनंदजी ने ही क्लार्नेट पर बजाया था। लक्ष्मीकांत प्यारेलाल ढोलक और बांसुरी के प्रयोग से अपनी धुनों को मधुर बनाते थे। ओ.पी. नैयर ने संगीत की कोई शिक्षा ही नहीं प्राप्त की थी फिर भी इतनी मधुर धुनें बनाते थे कि लोग सुन कर झूम उठते थे।
सन् 1980 से भारतीय फिल्म संगीत में परिवर्तन होना शुरू हो गया। मेलॉडी के स्थान पर डिस्को, पॉप इत्यादि पश्चिमी धुनों का प्रचलन बढ़ता गया। धुनों में वाद्ययंत्रों की बहुलता बढने लगी। इस प्रकार से भारतीय संगीत का एक नये युग शुरू हो गया।
Wednesday, May 21, 2008
अब फिर दिखेंगे हिन्दी पेजेस में गूगल के विज्ञापन
गूगल ने हाल ही में गूगल सामग्री नेटवर्क (Google content network) को, योग्य तीसरे पक्ष के विक्रेताओं से प्राप्त विज्ञापनों को स्वीकार करने तथा उनका प्रदर्शन करने के लिये, सक्रिय कर दिया है। यह सूचना अभी कुछ समय पहले ही मुझे गूगल से प्राप्त ई-मेल से मिली है।
अभी तक केवल अंग्रेजी के विज्ञापनों को ही पात्रता प्राप्त होने के कारण हिन्दी पेजेस में गूगल के विज्ञापनों का प्रदर्शन नहीं हो रहा था किन्तु अब उपरोक्त परिवर्तन हो जाने से कम से कम छवि विज्ञापनों (image ads) का दिखाई देना शुरू हो जायेगा।
इससे अपने हिन्दी ब्लोग्स/वेबसाइट्स में गूगल विज्ञापन प्रदर्शित करने वालों की निराशा थोड़ी बहुत तो दूर होगी।
मर रे मानव मर!
मर रे मानव मर
भूस्खलन से मर
भूकंप से मर
मुठभेड़ कर और मर
बम विस्फोट से मर
जहरीली शराब पी कर मर
नकली दवा से मर
श्रद्धालु बन, दर्शन हेतु जीप से जा और दुर्घटना से मर
मरने से जरा भी न डर
मरना तेरी नियति है इसलिये तू मर
Tuesday, May 20, 2008
मीडिया प्लेयर में आटो प्ले लिस्ट बना कर पसंदीदा संगीत सुनें।
हजारों-लाखों संगीत फाइल्स में से अपने विशिष्ट पसंद के संगीत को सुनने के लिये आटो प्लेलिस्ट्स (Auto Playlists) बहुत ही उत्तम सुविधा है। मान लीजिये आपके कम्प्यूटर में पुरानी फिल्म संगीत के डेढ़-दो हजार गाने हैं और आज आपकी इच्छा केवल किशोर दा के गाये गानों को ही या आर.डी. बर्मन के संगीत वाले केवल आशा भोंसले के गाये गानों को ही सुनने की हो रही है तो सोचिये कि उन गानों को छाँटने में आपका कितना समय बर्बाद हो जायेगा। किन्तु आटो प्लेलिस्ट्स की सहायता से आप बात की बात में ही उन विशिष्ट गानों की लिस्ट बना सकते हैं जिन्हें आप सुनना चाह रहे हैं।
आटो प्लेलिस्ट्स (Auto Play lists) बनाने के लिये संगीत फाइल्स की टैगिंग होना आवश्यक है। केवल टैगिंग ही वह सुविधा प्रदान करता है जिससे आपके पसंद के गानों को पहचान कर आपका कम्प्यूटर उनकी लिस्ट तैयार कर सके। टैगिंग की विधि नीचे दी जा रही है।
संगीत फाइल्स को टैग कर के मनपसंद नाम दें!
संगीत फाइल्स को टैग (Tag) कर के नया नाम तथा वांछित जानकारी देने के लिये अनेकों टैग एडीटर्स (Tag Editors) उपलब्ध हैं। यदि आप Windows XP का प्रयोग करते हैं तो आपको किसी अलग टैग एडीटर की आवश्यकता नहीं है क्यों कि XP में उपलब्ध विन्डोज मीडिया प्लेयर (वर्सन 9 या उससे ऊपर) में ही संगीत फाइल्स को टैग करने की सुविधा उपलब्ध है। टैगिंग करने के लिये निम्न विधि अपनायें।
* विन्डोड़ मीडिया प्लेयर वर्सन 9 (Windows Media Player version 9) के प्ले लिस्ट या लाइब्रेरी में किसी संगीत फाइल को दाँया क्लिक (right click) करें।
* नये खुलने वाले मीनू में एडव्हान्स्ड टैग एडीटर (Advanced Tag Editor) को क्लिक करें।
* एडव्हांस्ड टैग एडीटर डॉयलाग बॉक्स में ट्रैक की जानकारियाँ प्रविष्ट करें जैसे कि ऊपर के चित्र में किया गया है। अब आर्टिस्ट इन्फो (Artist Info) टैब को क्लिक करें।
* आर्टिस्ट इन्फो में भी वांछित प्रविष्टियाँ करने के बाद चाहें तो अन्य टैब्स को क्लिक कर के जानकारियाँ प्रविष्ट करें और कार्य सम्पन्न हो जाने पर OK को क्लिक कर दें।
इसी प्रकार से सभी संगीत फाइल्स की टैगिंग कर लें।
आटो प्ले लिस्ट बनाना
* विन्डोज मीडिया प्लेयर में लाइब्रेरी खोलें।
* बायीं (left) ओर के विन्डो में आटो प्ले लिस्ट पर दायाँ (right) क्लिक करें।
* नये खुलने वाले विन्डो में न्यू (New) को क्लिक कर दें।
* आटो प्लेलिस्ट (Auto Plalist) डॉयलाग बॉक्स में क्लिक टू एड क्राइटेरिया (Click to add criteria) को क्लिक करें।
* वांछित क्राइटेरिया जैसे कि एलबम आर्टिस्ट (Album Artist) को क्लिक करें।
* Is, Is not..., contains में से किसी एक का चुनाव करके क्लिक तो सेट (Click to set) में उचित प्रविष्टि करें। चाहें तो एण्ड आल्सो इन्क्लुड (And also include) में भी अन्य शर्ते दे सकते हैं। कार्य सम्पन्न होने पर OK को क्लिक कर दें। उदाहरण के लिये यदि आपने 'Is' का चुनाव करके 'किशोर कुमार' प्रविष्ट किया है तो सिर्फ किशोर कुमार के गाये गानों वाली आटो प्लेलिस्ट बन जायेगी।




