Friday, October 22, 2010

स्वप्न वासवदत्ता - अंक 5 (संस्कृत नाटक का संपादित सरल हिन्दी रूपान्तर)

पिछला अंक - स्वप्न वासवदत्ता - अंक 4 (संस्कृत नाटक का संपादित सरल हिन्दी रूपान्तर)

(पद्मिनिका का प्रवेश)

पद्मिनिकाः मधुरिके! मधुरिके!

मधुरिकाः (प्रवेश करके) आई सखी, आई।

पद्मिनिकाः मधुरिके! राजकुमारी पद्मावती सिर की पीड़ा से अत्यन्त व्यथित हैं। जा सखी, आर्या अवन्तिका को बुला ला। उनसे कहना कि राजकुमारी सिर की पीड़ा से व्यथित हैं, वे स्वयं चली आएँगीं।

मधुरिकाः किन्तु सखी पद्मिनिका, वे करेंगी क्या?

पद्मिनिकाः वे मधुर कथाएँ सुनाकर राजकुमारी के व्याधि को हरने का प्रयास करेंगी।

मधुरिकाः अच्छा! तो राजकुमारी कहाँ विश्राम कर रही हैं?

पद्मिनिकाः समुद्रगृह में। तू शीघ्र आर्या अवन्तिका को बुला ला। मैं आर्य वसन्तक की खोज में जा रही हूँ ताकि वे राजकुमारी की व्याधि का समाचार दे सकें।

मधुरिकाः तो मैं जाती हूँ। (प्रस्थान)

पद्मिनिकाः (स्वगत्) अब मैं आर्य वसन्तक को कहाँ खोजूँ?

(विदूषक का प्रवेश)

विदूषकः (स्वगत्) ऐसा प्रतीत होता है कि आज इस शुभ घड़ी तथा सुख के अवसर पर प्रिया-वियोग से व्याकुल अन्तर वाले वत्सराज के हृदय में पद्मावती के विवाहरूपी समीर से कामाग्नि भड़क उठी है।

पद्मिनिकाः (विदूषक को देखकर) आर्य वसन्तक! क्या आपको ज्ञात है कि राजकुमारी पद्मावती सिर की पीड़ा से व्याकुल हैं?

विदूषकः नहीं देवि! मुझे ज्ञात नहीं है।

पद्मिनिकाः अच्छा तो आप स्वामी तक यह समाचार पहुँचा दें। मैं सिर की पीड़ा के निवारण के लिए लेप लेने जाती हूँ।

विदूषकः अच्छा, आर्या पद्मावती कहाँ हैं?

पद्मिनिकाः समुद्रगृह में।

विदूषकः तो जाओ देवि! मैं भी श्रीमान् से निवेदन करने जाता हूँ।

(दोनों का प्रस्थान)

(उदयन का प्रवेश)

उदयनः (स्वगत्) यद्यपि काल ने मेरा देवि पद्मावती से विवाह करवाकर मुझपर पुनः भार डाल दिया है, तथापि मेरा हृदय लावाणक में अग्नि-दग्ध होकर मृत्यु को प्राप्त करनेवाली अवन्तिराज की सुकन्या को विस्मृत नहीं कर पा रहा है।

विदूषकः (प्रवेश करके) शीघ्रता करें श्रीमान्! शीघ्रता करें।

उदयनः कैसी शीघ्रता?

विदूषकः आर्या पद्मावती सिर की पीड़ा से व्याकुल हैं।

उदयनः तुमसे किसने कहा?

विदूषकः पद्मिनिका ने।

उदयनः हा! कष्ट! देवि पद्मावती के सानिध्य से मेरे हृदय का दुःख तनिक मन्द हुआ था किन्तु अब यह उनकी व्याधि मुझे नया दुःख प्रदान करने आ गई। देवि पद्मावती कहाँ हैं?

विदूषकः वे समुद्रगृह में विश्राम कर रही हैं।

उदयनः चलो, मार्ग दिखाओ।

विदूषकः चलें, चलें श्रीमान्!

(दोनों चलते हैं)

विदूषकः यह रहा समुद्रगृह। श्रीमान् प्रवेश करें।

उदयनः पहले तुम प्रवेश करो।

विदूषकः अच्छा श्रीमान! (प्रवेश करके) ओह! विपदा आ पड़ी। आप वहीं रुकें श्रीमान, मैं भी आपके ही पास आ रहा हूँ।

उदयनः क्यों?

विदूषकः वह देखिए, भूमि पर सर्प है, दीप के आलोक में मुझे दिखाई पड़ गया।

उदयनः (देखकर, मुस्कान के साथ) मूर्ख! तू तोरणद्वार से गिरी हुई निशा की मन्द वायु से हिलती हुई इस पुष्पमाला को सर्प कह रहा है।

विदूषकः (ध्यान से देखकर) आप सत्य कह रहे हैं श्रीमान! मैं भ्रमित हो गया था।

(दोनों का समुद्रगृह में प्रवेश)

विदूषकः प्रतीत होता है कि आर्या पद्मावती यहाँ आने के पश्चात् पुनः चली गईं।

उदयनः नहीं मित्र! देवि यहाँ आईं ही नहीं।

विदूषकः आपको कैसे ज्ञात हुआ?

उदयनः न तो शैय्या में सिकुड़न है और न ही लेप से वस्त्र मलिन हुए हैं। रुग्ण की व्यथा हरने वाली किसी प्रकार की शोभा भी यहाँ दृष्टिगत नहीं हो रही है। और न ही कोई व्यथित व्यक्ति किसी स्थान में आकर इतना शीघ्र उस स्थान का त्याग करता है।

विदूषकः तो देव! आप कुछ काल तक इसी शैय्या में बैठकर आर्या के आने की प्रतीक्षा करें।

उदयनः अच्छा। (शैय्या पर लेटकर) निद्रा आ रही है। तुम कोई कथा कहो।

विदूषकः कहता हूँ श्रीमान्! आप हुंकार करते जाइए।

उदयनः बहुत अच्छा।

विदूषकः उज्जयिनी नामक एक रमणीय नगरी है।

उदयनः क्या कहा? उज्जयिनी!

विदूषकः आपको यदि यह कथा रुचिकर न लग रहा हो तो दूसरी कथा कहता हूँ।

उदयनः अवश्य ही इस कथा में मेरी रुचि है किन्तु इसे सुनकर मुझे अवन्तिराज की कन्या का स्मरण हो उठता है।

विदूषकः अस्तु, मैं दूसरी कथा कहता हूँ। ब्रह्मदत्त नगर में काम्पिल्य नामक राजा रहा करता था।

उदयनः क्या? क्या?

विदूषकः ब्रह्मदत्त नगर में काम्पिल्य नामक राजा रहा करता था।

उदयनः मूर्ख नगर का नाम काम्पिल्य था और राजा का नाम ब्रह्मदत्त था।

विदूषकः नगर काम्पिल्य था और राजा ब्रह्मदत्त?

उदयनः हाँ।

विदूषकः अच्छा, मैं इसे कण्ठस्त कर लूँ, तब तक श्रीमान प्रतीक्षा करें। (अनेक बार दुहराने के बाद) अब सुनें! यह क्या? श्रीमान् को तो निद्रा आ गई। ओह कितनी शीतल समीर है। चलूँ, कुछ ओढ़ने के लिए ले आउँ।

(विदूषक का प्रस्थान)

(अवन्तिका के वेष में वासवदत्ता का चेटी के साथ प्रवेश)

चेटीः आर्ये! आप समुद्रगृह में शीघ्र प्रवेश करें। राजकुमारी पद्मावती सिर की पीड़ा से व्याकुल हैं। तब तक मैं लेप लेकर आती हूँ।

(चेटी का प्रस्थान)

वासवदत्ताः (स्वगत्) आह! दैव कितने निर्दय हैं। आर्यपुत्र की विरह-व्यथा का निवारण करने वाली पद्मावती भी रुग्ण हो गईं। अस्तु, प्रवेश करूँ। (प्रवेश करके यत्र-तत्र देखते हुए) इन सेवकों को पद्मावती का कुछ भी ध्यान नहीं है। उसके समीप केवल एक दीपक छोड़कर सभी चले गए हैं। तनिक पद्मावती के पास बैठ जाऊँ। दूर बैठने पर पद्मावती सोचेंगी कि उनके प्रति मेरा पर्याप्त स्नेह नहीं है अतः शैय्या पर ही बैठूँ। (शैय्या पर बैठती है)। अद्भुत! इसके पास बैठकर मेरा हृदय कितना आह्लादित है! इसकी श्वास की चाल से प्रतीत होता है कि रुग्णता समाप्त हो गई है। यह तो शैय्या के अर्द्धभाग में ही सो रही है, मानो शेष अर्द्धभाग में आलिंगन के प्रयोजन से मुझे बुला रही हो। इसकी इच्छा पूर्ण करने के लिए इस अर्द्धभाग में लेट जाती हूँ। (लेट जाती है)

उदयनः (निद्रित अवस्था में) हा वासवदत्ता!

वासवदत्ताः (सहसा उठते हुए) अरे! यह तो आर्यपुत्र हैं, पद्मावती नहीं। कहीं मैं पहचान तो नहीं ली गई? यदि पहचान ली गई तो आर्य यौगन्धरायण की योजना निष्फल हो जाएगी।

उदयनः हा अवन्तिराजपुत्री!

वासवदत्ताः संयोगवश आर्यपुत्र निद्रा में ही हैं। यहाँ अन्य कोई नहीं है अतः मुहूर्त भर इनके दर्शन कर दृष्टि को सन्तुष्ट कर लूँ।

उदयनः हा प्रिय शिष्ये! हा प्रिये! तुम कुछ कह क्यों नहीं रही हो?

वासवदत्ताः कहती हूँ, स्वामिन्! कहती हूँ।

उदयनः क्या तुम मुझसे रुष्ट हो?

वासवदत्ताः नहीं, रुष्ट नहीं मात्र दुःखी हूँ।

उदयनः रुष्ट नहीं हो तो तुमने अलंकार क्यों धारण नहीं किए हैं? क्या विरीचिका को स्मरण कर रही हो?

वासवदत्ताः विरीचिका का स्मरण तो आप ही कर रहे हैं।

उदयनः तो इस अपराध के लिए मैं तुमसे क्षमा-याचना करता हूँ।

(हाथ फैला देते हैं)

वासवदत्ताः दीर्घ काल से यहाँ बैठी हूँ। कोई देख न ले। चलूँ। पर शैय्या से लटकते इनके हाथ को पुनः शैय्या पर रख दूँ।

(उदयन के हाथ को शैय्या पर रखती है)

उदयनः (निद्रा से जागकर, तथापि अर्द्धनिद्रित अवस्था में) वासवदत्ता! रुको, रुको। रुको वासवदत्ता।

(वासवदत्ता शीघ्रता के साथ प्रस्थान करती है, उदयन भी द्वार की ओर बढ़ते हुए द्वार के चौखट से टकरा कर गिर जाते हैं)

उदयनः (उठकर) हा! धिक्! अर्द्धनिद्रित अवस्था में मैं चौखट से टकरा गया। यह भी ज्ञात न हो पाया कि यह सत्य था कि स्वप्न?

विदूषकः (प्रवेश कर) श्रीमान् जाग गए!

उदयनः मित्र! सुसंवाद सुनो! वासवदत्ता जीवित है।

विदूषकः (दुःखी होकर) खेद! आर्या वासवदत्ता अब कहाँ? वे तो कब का परलोक सिधार गईं।

उदयनः नहीं नहीं। रुम्णवान् ने मुझसे कपट किया था। वासवदत्ता अभी मुझे निद्रा से जगाकर गई है।

विदूषकः असम्भव! मैंने आपसे उज्जयिनी की कथा कही थी इसीलिए आप सोते हुए आर्या का ही स्मरण करते रहे। उन्हें आपने स्वप्न में ही देखा होगा।

उदयनः यदि यह स्वप्न था तो मेरा न जागना ही धन्य होता और यदि यह भ्रम है तो जीवनपर्यन्त यह भ्रम बना रहे।

विदूषकः मित्र! इस नगर में अवन्तिसुन्दरी नामक यक्षिणी रहती है। कहीं आपने उसे ही तो नहीं देखा?

उदयनः नहीं मित्र! नहीं। अभी मैंने देवि वासवदत्ता के सुन्दर मुख को देखा है जिस पर अलकें बिखरी हुई थीं। उनके नेत्र अञ्जनरहित थे। मेरी इस भुजा के रोम अब तक खड़े हैं क्योंकि इसको उसने अपने हाथों से शैय्या पर रखा था। स्वप्न में ही सही।

विदूषकः श्रीमान्! अब आप और अधिक अनर्थ चिन्तन न करें। आइए, चतुःशाला में चलें।

(दोनों चतुःशाला में प्रवेश करते हैं)

(कंचुकी का प्रवेश)

कंचुकीः वत्सराज की जय हो! आपके शत्रु आरुणि पर आक्रमण करके वत्स राज्य को पुनः प्राप्त करने के लिए, आपके अमात्य रुम्णवान् एक विशाल सेना लेकर हमारे महाराज दर्शक के पास उपस्थित हुए हैं। हमारी विजयिनी राजदल, हथदल, रथदल तथा पदातिदल भी युद्ध के लिए सन्नद्ध होकर आपके अमात्य की सेना में सम्मिलित होने के लिए तत्पर हैं। अतः युद्ध के लिए तत्पर हो जाइए। हमारी विजय अवश्यम्भावी है। आपके गुणों से अनुरक्त वत्स देश की प्रजा विजयी होकर आपके आगमन की प्रतीक्षा कर रही है।

उदयनः मैं युद्ध के लिए तत्पर हूँ। मैं युद्धभूमि में भयानक कर्म में दक्ष आरुणि का वध कर डालूँगा।

(सबका प्रस्थान)
(अंक 5 समाप्त)
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