Monday, May 3, 2010

क्या आपने कभी आलू, प्याज, टमाटर के विज्ञापन देखे हैं?

यह तो तय है कि आपने आज तक कभी आलू, प्याज, टमाटर, लहसुन, अदरक, गेहूँ, दाल, चाँवल (कृपया बासमती को अपवाद मानें), साग-सब्जियाँ आदि के विज्ञापन न तो कभी देखे होंगे और न ही भविष्य में कभी देखेंगे। ये सब तो रोजमर्रा की जरूरत है और इन वस्तुओं को तो आप खरीदेंगे ही। जब आप इन्हें वैसे ही खरीदेंगे तो भला इन चीजों का विज्ञापन कर के कौन बेवकूफ अपने रुपये गारत करेगा?

विज्ञापन तो उन वस्तुओं का होता है जो आपके लिये कतइ जरूरी नहीं हैं और उनके बिना आपका काम मजे के साथ चल सकता है। किन्तु विज्ञापन के माध्यम से आपका ब्रेन-वाशिंग करके आपके दिमाग में बुरी तरह से घुसा दिया जाता है कि जिस वस्तु का विज्ञापन किया जा रहा है वह आपके लिये निहायत जरूरी है; उसके बिना आपका जीवन निरर्थक है। उदाहरणार्थ यदि आप कोल्ड-ड्रिंक नहीं पियेंगे, तो आपको कोई घास नहीं डालेगा, फलाँ साबुन इस्तेमाल नहीं करेंगे तो जमाने से पीछे रह जायेंगे आदि।

सही बात तो यह है कि इन विज्ञापनों से आपको लुभाकर व्यापार के नाम से आप को लूटा जाता है। मात्र बीस-पच्चीस पैसे के त्रिफला (हर्रा-बहेरा-आँवला) चूर्ण को दो-तीन रुपये में बेच दिया जाता है, मुफ्त के पानी को आकर्षक पैकिंग में डालकर दो से पन्द्रह रुपये में बेचा जाता है। और मजे की बात यह है कि आप बड़ी खुशी के साथ इन चीजों को खरीदने के लिये अपनी गाढ़ी कमाई के रुपये खर्च कर डालते हैं।

इन विज्ञापनों की तासीर यह है कि ये बच्चों पर बहुत अधिक प्रभाव डालते हैं और वे लोग ही आपको विज्ञापित चीजें खरीदने के लिये मजबूर करते हैं। सही है कि यदि आपके जिगर का टुकड़ा किसी चीज के लिये जिद करे तो आप उसकी इच्छा कैसे पूरी नहीं करेंगे?

तो अब से जब भी किसी वस्तु को खरीदना हो तो कृपया पहले सोचें कि वह वस्तु क्या आपके लिये जरूरी है? साथ ही अपने बच्चों को भी शिक्षा दें कि विज्ञापन लुभाते अवश्य है किन्तु वास्तव में यह सिर्फ हमें उल्लू बनाते हैं और विज्ञापनरूपी इस मरीचिका के पीछे भागने के बजाय इससे बच कर रहना ही उचित है।
Post a Comment