Tuesday, September 4, 2007

भूमिका

स्व. श्री हरिप्रसाद अवधिया रचित छत्तीसगढ़ का प्रथम आँचलिक उपन्यास 'धान के देश में' के लिये श्री पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी लिखित भूमिका

कुछ वर्षों से छत्तीसगढ़ में हिंदी साहित्य की अच्छी श्री वृद्धि हो रही है। कितने ही तरुण साहित्यकार हिंदी साहित्य के क्षेत्र में अवतीर्ण हो रहे हैं। यह सच है कि अधिकांश तरुण साहित्यकारों की प्रवृति गद्य रचना की अपेक्षा पद्य रचना की ओर अधिक है। गद्य रचना में भी कथाओं की रचना की ओर अधिकांश नवयुवक जितना ध्यान देते हैं उतना गंभीर विषयों की विवेचना की ओर नहीं। उसका कारण भी है, तारुण्य में कल्पना की जो प्रखरता रहति है वह प्रौढ़ावस्था या वृद्धावस्था में नहीं रह जाती। सभी तरुण कल्पना का एक मायाजगत निर्मित कर प्रेम और सौन्दर्य की अनुभूति के लिये व्यग्र रहते हैं। यही कारण है कि अपने प्रारंभिक काल में कितने ही नवयुवक कवता और कहानी की रचना में विशेष उत्साह प्रदर्शित करते हैं। कुछ समय के बाद जब वे संसार के कर्मक्षेत्र में प्रविष्ट होते हैं तब उनमें से अधिकांश का यह उत्साह लुप्त सा हो जाता है। कुछ लोग यह समझते हैं कि ऐसे लेखक जब साहित्य के क्षेत्र से पृथक हो जाते हैं तब साहित्य में एक गतिरोध सा उत्पन्न हो जाता है। पर ऐसी बात नहीं है। जिन्हें साहित्य के प्रति अनुराग होता है उन्हें किसी भी परिस्थिति में रचना के प्रति विरक्ति नहीं होती। महत्वाकांक्षा से प्रेरित होकर जो लोग साहित्य के क्षेत्र में आते हैं उनकी अभीष्ट-सिद्धि न होने पर विरक्ति होना अस्वाभाविक नहीं। आजकल साहित्य के क्षेत्र में भी राजनीति के क्षेत्र की तरह प्रचार की भावना बढ़ती जा रही है। लोग दलबद्ध हो कर प्रचार कार्य करते हैं। उस प्रचार के भीतर एक विशेष महत्वाकांक्षा ही काम कर रही है। पर सच पूछिये तो इससे साहित्य के निर्माण में विशेष लाभ नहीं होता। हम लोग हो-हल्ला मचा कर कुछ समय के लिये कुछ लोगों को भले ही प्रभावित कर लें परन्तु अंत में हम लोगों का यह प्रचार कार्य निष्फल ही होता है। मैंने स्वयं अपने इस जीवनकाल में कितने ही कवियों और कलाकारों का उदय देखा और उनका अस्त भी। अतएव महत्वाकांक्षा से प्रेरित होकर जो लोग साहित्य के क्षेत्र में सस्ती कीर्ति पाने का प्रयत्न करते हैं, उन्हें अंत में हतोत्साह होना पड़ता है। सच्चे साहित्यकारों के लिये जो बात सबसे अधिक मुख्य है वह है उनका अंतःसुख। उसी अंतःसुख के कारण वे साहित्य के क्षेत्र में यश और अपयश की चिंता न कर लिखते ही जाते हैं। जिनमें विशेष रचना-कौशल रहता है उन्हें सफलता भी मिल जाती है। साहित्य के इतिहास में यह देखा गया है कि विषम परिस्थितियों में रह कर जिन साहित्यकारों ने अपूर्व ग्रंथों की रचना की वैसी रचनायें उन्हीं के द्वारा सुख-सुविधा और विलास की परिस्थिति में रह कर नहीं लिखी गई। इसलिये साहित्य को मैं विशुद्ध आनंद का फल मानता हूँ। वही आनंद साहित्यकारों को सच्ची प्रेरणा देता है।

मैं उपन्यासों का प्रेमी पाठक हूँ। बाल्यकाल से ही उपन्यास पढ़ता चला आ रहा हूँ। वृद्धावस्था में हम सब लोगों की अपनी एक विशेष रुचि हो जाती है। फिर भी उपन्यासों में कथा रस का उपभोग करने की क्षमता रहती है। हम उपन्यासों को पढ़ कर उनके माया जगत में ऐसे लीन हो जाते हैं कि हम सचमुच आत्म विस्मृत हो जाते हैं। फिर भी यह सच है कि विशेष स्थिति में विशेष उपन्यास रुचिकर होते हैं। यह सर्वथा सम्भव है कि एक अवस्था में जिन कथाओं को पढ़कर हमें विशेष आनंद हुआ है, उन्हीं से अन्य अवस्था में विरक्ति भी हो सकती है। कुछ ऐसी भी कथायें होती हैं जिन्हें हम कवल एक बार पढ़कर फेंक देते हैं, उन्हें फिर पढ़ने की इच्छा नहीं होती। ऐसे भी उपन्यास होते हैं जिन्हें बार-बार पढ़ने से भी हमें विरक्ति नहीं होती। ऐसे कितने ही उपन्यास हैं जिन्हें मैं पच्चीसों बार पढ़ चुका हूँ और जब मुझे काम करने की व्यग्रता नहीं रहती तब उन्हीं उपन्यासों के द्वारा मुझे साहित्य का विशुद्ध आनंद प्राप्त हो जाता है।

वर्तमान युग छत्तीसगढ़ के लिये नव-जागरण-काल है। अभी तक हिंदी साहित्य-जगत में छत्तीसगढ़ का स्थान उपेक्षणीय-सा था। यह सच है कि पण्डित माधवराव सप्रे, पण्डित लोचनप्रसाद पाण्डेय, पण्डित बनमालीप्रसाद शुक्ल, पण्डित मुकुटधर पाण्डेय तथा बाबू मावली प्रसाद जी ने हिंदी साहित्य के क्षेत्र में अच्छी ख्याति अर्जित की परन्तु अभी तक उनकी रचनाओं का कोई संग्रह प्रकाशित नहीं हो सका है। छत्तीसगढ़ में प्रकाशन संस्था का अभाव होने के कारण कितने ही पुराने लेखकों की भी प्रतिभा के विकास के लिये यथेष्ट अवसर नहीं प्राप्त होते। एक बार एक प्रकाशक ने कहा था कि साहित्य को प्रकाश में लाने वाले हम प्रकाशक हैं। हम लोगों से लेखकों की प्रतिभा प्रकाश में आती है। यह अतिशयोक्ति नहीं है। साहित्य के क्षेत्र में प्रकाशन का स्थान उपेक्षणीय नहीं होता। रायपुर में रघुवर प्रसाद पटेरिया जी से जब मेरा परिचय हुआ तब उन्होंने प्रकाशन कार्य करने की इच्छा प्रकट की। मैं उनके साथ बम्बई गया। उस समय केशव बाबू और नर्मदाप्रसाद खरे भी मेरे साथ थे। जिस उद्देश्य से हम लोग बम्बई गये थे वह तो सफल नहीं हुआ परन्तु पटेरिया जी का घर मेरे समान लेखकों के लिये एक आश्रम हो गया। वहीं सुन्दरलाल त्रिपाठी और पण्डित रामदयाल तिवारी जी से विशेष परिचय हुआ। अच्छा प्रकाशक रहने से साहित्यकारों का एक दल अपने आप निर्मित हो जाता है और उस प्रकाशक से उनको प्रेरणा भी मिलती है। मैं यह मानता हूँ कि उसी समय से छत्तीसगढ़ में साहित्य के लिये नव-जागरण-काल आया। उस समय श्री घनश्याम प्रसाद 'श्याम' जी ने भी कम काम नहीं किया। स्वराज्य प्रसाद द्विवेदी ने उसी समय अपनी रचनाओं के द्वारा विशेष कीर्ति अर्जित की। रायपुर में हिंदी साहत्य का विकास क्षिप्र गति से होने लगा। श्री गोविन्दलाल वोरा और मधुकर खेर जी से मैं परिचित हुआ। जब कुछ दिनों के लिये मुझे साप्ताहिक महाकोशल में काम करने का अवसर मिला तब मैं विश्वेन्द्र ठाकुर, श्री नारायण लाल परमा, श्री मनहर चौहान जी से परिचित हुआ। तभी श्री हरिप्रसाद अवधिया जी से मेरा घनिष्ठ सम्बंध हुआ।

हरिप्रसाद अवधिया जी की रचनाओं से मैं पहले ही परिचित हो चुका था यद्यपि मुझे उनका दर्शन करने का सौभाग्य तब हुआ जब मैं महाकोशल में काम करता था। उनका जन्म स्थान रायपुर है। सन् 1918 में उनका जन्म हुआ था। सत्रह वर्ष की अवस्था से ही वे कहानियाँ लिखने लगे। उनकी 'नौ पैसे' शीर्षक कहानी पहली रचना है। वह इलाहाबाद से प्रकाशित होने वाली 'नई कहानियाँ' नामक मासिक पत्रिका में प्रकाशित हुई थी। तब से वे आज तक बराबर लिखते जाते हैं। उनकी रचनायें 'सरस्वती', 'माधुरी', 'विशाल भारत', 'नव भारत' और 'साप्ताहिक हिन्दुस्तान' में भी प्रकाशित हुई हैं। सन् 1948 में वे एम.ए. हुये और साहित्य के साथ साथ शिक्षा के क्षेत्र में भी अवतीर्ण हुये। जब मैंने उनकी रचनायें पढ़ीं तब मैंने उन्हें उपन्यास लिखने के लिये कहा। सच तो यह है कि उस समय जो भी तरुण साहित्यकार मेरे पास आते थे, उन सभी को मैं उपन्यास लिखने के लिये प्रेरित करता था। लमनहर चौहान जी ने मुझको अपना एक उपन्यास दिखलाया। उस छोटी अवस्था में भी उनका रचना-कौशल देखकर मैं विस्मित हो गया। विश्वेन्द्र ठाकुर और परमार जी कहानियाँ लिखा करते थे। उनसे भी मैंने छत्तीसगढ़ के जन-जीवन को लेकर उपन्यास लिखने का आग्रह किया। मुझे सबसे बड़ी प्रसन्नता यह है कि अवधिया जी ने "धान के देश में" नाम देकर पहली बार उपन्यास की रचना की है। उपन्यास रचना में उन्हें कितनी सफलता हुई है इसका निर्णय तो सुविज्ञ आलोचक और मर्मज्ञ पाठक ही करेंगे। अवधिया जी पर मेरा विशेष स्नेह है। अपने स्नेह पात्रों की रचनाओं में हम लोग गुण-दोष की विवेचना नहीं करते। मैं तो यही कहूँगा कि उनकी इस प्रथम कृति से मुझे असन्तोष नहीं हुआ है। मुझे यह आशा भी है कि जब वे अन्य उपन्यास लिखेंगे तो उन्हें उत्तरात्तर अधिक से अधिक सफलता प्राप्त होगी।

मुझे तो सबसे बड़ा हर्ष इस बात पर हुआ कि एक "छत्तीसगढ़ प्रकाशन संस्था" से छत्तीसगढ़ के लेखकों की रचनाओं का प्रकाशन आरम्भ हुआ। मेरी तो कामना यही है कि छत्तीसगढ़ की यह प्रकाशन संस्था छत्तीसगढ़ के लेखकों को प्रकाश में लाने के कार्य में सफल हो। पुस्तकों का जितना ही प्रचार होगा उतना ही अधिक लोक शिक्षा का भी प्रसार होगा। अभी तक रायपुर में कुछ लेखकों ने बड़े उत्साह से अपनी रचनाओं का स्वयं प्रकाशन किया परन्तु उनका यथेष्ट प्रचार नहीं हुआ। साहित्य के विकास में लेखकों के साथ साथ प्रकाशकों और पुस्तक विक्रेताओं को भी मैं महत्व देता हूँ। इसलिये मैं चाहता हूँ कि इस पुस्तक का विशेष प्रचार हो और छत्तीसगढ़ के लिये यह प्रकाशन कार्य एक वरदान हो।

पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी
राजनाँदगाँव
शनिवार, चैत्र शुक्ल 2, विक्रम संवत् 2022,
दिनांक 3-04-1965
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