Sunday, June 22, 2008

क्या वास्तव में स्त्री देह है?

हमारी अल्पज्ञता स्पष्ट रूप से झलकती है अनुजा जी के इस कथन से कि "देह से आगे भी स्त्री होती है या होगी इस सोच-समझ को विकसित होने में अभी कितनी और सदियां और लगेंगी कुछ कहा नहीं जा सकता।"

हमें कम से कम इस बात का ज्ञान तो होना ही चाहिये कि भारत में सदियों से स्त्री को देह से कहीं बहुत आगे माना जाता रहा है। यह सही है कि भारतीय समाज में महिलाओं का दर्जा अलग-अलग समय में अलग-अलग तरह का रहा है किन्तु यह भी सत्य है कि अत्यन्त प्राचीन युग से ही भारतवर्ष में महिलाओं का उच्च स्थान रहा है। वे लक्ष्मी, सरस्वती, दुर्गा, काली आदि देवियों के रूप में पूजी जाती रही हैं। पतञ्जलि तथा कात्यायन की कृतियों में स्पष्ट उल्लेख है कि वैदिक युग में शिक्षा के क्षेत्र में महिलाओं का समानाधिकार था। ऋग् वेद की ऋचाएँ बताती हैं कि महिलाओं को अपना वर चयन करने का पूर्ण अधिकार था और उनका विवाह पूर्ण वयस्क अवस्था में हुआ करता था। नारी पुरुष से अधिक शक्तिशाली थी, है और रहेगी। शिव में सामर्थ्य नहीं था महिषासुर के वध का, सिर्फ काली ही उसे मार सकती थी। महिषासुर वध कथा में महिषासुर बुराई का प्रतीक है। ये कथा संदेश देती है कि बुराई को दूर करने में पुरुष की अपेक्षा नारी अधिक सक्षम है।

सदियों से नारी, कहीं प्रत्यक्ष तो कहीं परोक्ष रूप में, पुरुष की प्रेरणा रही है। इतिहास साक्षी है कि पुरुष के द्वारा किये गये प्रत्येक महान कार्य के पीछे उसकी प्रेरणा नारी ही रही है। यदि रत्नावली ने "लाज न आवत आपको..." न कहा होता तो हम आज "रामचरितमानस" जैसे पावन महाकाव्य से वंचित रह जाते। नारी के द्वारा किसी व्यक्ति, समाज और यहाँ तक कि राष्ट्र के विचारों में आमूल परिवर्तन कर देने का प्रत्यक्ष उदाहरण शिवाजी की माता जिजाजी हैं।

भारतीय संस्कृति में सदैव नारी को श्रेष्ठ माना गया है। ' से आगे भी स्त्री होती है या होगी इस सोच-समझ को विकसित होने में अभी कितनी और सदियां और लगेंगी कुछ कहा नहीं जा सकता' जैसे सोच के लिये न तो मैं अनुजा जी की आलोचना कर रहा हूँ और न ही उन्हें गलत निरूपित कर रहा हूँ। मैं तो सिर्फ यह कहना चाहता हूँ कि इस प्रकार की गलत धारणा के लिये हमारी अशिक्षा और अल्प-शिक्षा ही दोषी है। हम अपनी संस्कृति को भूल चुके हैं। हमारी शिक्षा नीति हमें अपने संस्कृति के अध्ययन से वंचित रखती है। हमारी संस्कृति में अन्य संस्कृतियों की मिलावट हो गई है और इसका परिणाम है गलत धारणाओं का बनना। मध्य युग में हमारी संस्कृति में मुगल संस्कृति के मिलावट के परिणामस्वरूप बाल विवाह, सती प्रथा, विधवा-विवाह का निषेध आदि कुप्रथाओं का प्रचलन हुआ और आज हमारी संस्कृति में पश्चिमी संस्कृति के मिलावट के कारण अनेक प्रकार के भ्रम उत्पन्न हो रहे हैं। आज स्त्री को हेय, तुच्छ या देह समझना सिर्फ शिक्षा के सही प्रकार से विकास न होने कारण ही है।

Saturday, June 21, 2008

लड़कियों की पहली पसंद टपोरी लड़के

लड़कों को लड़कियों से दोस्ती करनी हो तो उन्हें ज्यादा टेंशन लेने की जरूरत नहीं है। टपोरी बनो, गंदी आदतें डालो, खराब व्यहार करो और लड़कियाँ आगे-पीछे घूमेंगी। वैज्ञानिकों ने अपने शोध के आधार पर बताया कि बुरे आचरण वाले लड़कों की ज्यादा लड़कियों से दोस्ती होती है। अध्ययन के दौरान उन्होंने पाया कि छली-कपटी, असंवेदनशील और घमंडी लड़कों के साथ लड़कियों की अच्छी पटती है।

जापान के क्योटो में मानवीय व्यवहार और सामाजिक क्रांति विषय को लेकर हुई बैठक में एक रिपोर्ट पेश की गई जिससे स्पष्ट होता है कि बुरी आदत-व्यवहार वाले व्यक्तियों के अंदर सेक्स की गुणवत्ता अधिक होती है। लॉस क्रूसेस के न्यू मेक्सिको सटेट यूनिव्हर्सिटी के अध्ययनकर्ता पीटर जेम्स ने कहा कि तथ्य का सत्यापन जेम्स बांड से होता है। वे बहुत ही बहिर्मुखी हैं और दूसरे का कत्ल भी आसानी से कर देते हैं लेकिन वे लड़कियों के बीच चर्चा का विषय हैं।

इलिनॉक्स प्रांत के ब्रेडले यूनिव्हर्सिटी की फैकल्टी डेविड स्मिट ने 57 देशों के 35,000 लोगों का सर्व्हे किया। उन्होंने पाया कि बुरी आदतों वाले पुरुषों का महिलाओं पर अच्छा प्रभाव पड़ता है और उनकी थोड़े समय की दोस्ती हमेशा सफल रहती है। अध्ययन से प्राप्त परिणामों के आधार पर उन्होंने कहा कि खराब प्रवृति के व्यक्ति गलत ढंग से दूसरे की प्रियतमा के साथ संबंध जोड़ना चाहते हैं। जॉनसन ने अपनी टीम के साथ मिल कर 200 कालेजों के विद्यार्थियों का परीक्षण किया। उन्होंने देखा कि बुरे आचरण करने वाले लड़कों की सहेलियाँ अधिक थीं। और ऐसे लड़कों को थोड़े समय के लिये रिश्ता कायम करना काफी पसंद था। उनकी रिपोर्ट को न्यू साइंटिस्ट पत्रिका में प्रकाशित किया गया। हालाकि इस व्यक्तित्व और आदत का मेल सिर्फ लड़कों में ही होता है, बुरे आचरण वाली लड़कियाँ लड़कों से उतनी अधिक प्रभावित नहीं होतीं।

(नव-भारत रायपुर से साभार)

Friday, June 20, 2008

हिममानव - वास्तविकता या कपोल कल्पना?

ब्रिटेन के डर्बीशायर इलाके की एक महिला ने यती का एक चित्र जारी किया है। यह चित्र उसने कथित तौर पर हिमालयवासियों के आँखों देखे विवरण के आधार पर बनाया है। यती यानी हिम मानव एक ऐसा जीव है जिसके बारे में ढेरों किंवदंतियाँ हैं और अब तक इसकी कोई तस्वीर नहीं है। वैज्ञानिक इस विवरण को दिलचस्पी के साथ देख रहे हैं जिसे इस महिला ने जारी किया है।

वेबदुनिया में इस समाचार को पढ़ कर विचार आया कि वास्तव में हिम मानव होते हैं या ये केवल कपोल कल्पना है? बचपन से ही रहस्यमय हिममानव के विषय में सुनते और पढ़ते आया हूँ। दिसम्बर 2007 में टीवी पर प्रसारित होने वाले कार्यक्रम “.डेस्टीनेशन ट्रुथ” में दावा किया गया था कि उन्होंने मंजू नदी के किनारे 2,850 मीटर की उंचाई पर येती के पदचिन्ह खोज निकाला है। उनका कहना था कि उन्हें येती (हिममानव) के तीन पद चिह्न मिले हैं।

येति नाम से जाने जाने वाले हिममानव को देखने का दावा सैकड़ों लोग करते हैं। दावा करने वालों के अनुसार हिममानव नौ फीट लंबा, भारी-भरकम (200 किलो के करीब वजन वाला) तथा घने बालों से युक्त प्राणी होता है जो मनुष्य की तरह दो पैरों पर चलता भी है। शेरपा के दो शब्दों "येह" और "तेह" से मिलकर "येति" शब्द बना है। येह का अर्थ है "चट्टान" और तेह का "जंतु", अर्थात् "येति" का अर्थ हुआ "चट्टान का जंतु"।

सन् 1832 में हिममानव के बारे में पहली बार विवरण मिलने के बाद से अब तक इस विषय में सैकड़ों कथा-कहानियाँ प्रचलन में आ चुकी हैं, कई रोचक फिल्में बन चुकी हैं और अनेकों पुस्तकें लिखी जा चुकी हैं। किन्तु आज तक सही प्रकार से पता नहीं चल पाया है कि हिममानव वास्तविकता है या कपोल कल्पना?

Saturday, June 14, 2008

क्या आप MRP से अधिक दाम देकर चीजें खरीदते हैं?

आपको MRP से अधिक दाम देकर खरीदी करनी होगी यदि आप छत्तीसगढ़ आये तो। जी हाँ, पूरे छत्तीसगढ़ में एक रुपये से कम वाले सिक्के नहीं चलते।

छत्तीसगढ़ में आप किसी दुकानदार को रेजगारी के साथ साढ़े तीन रुपये देकर एक विल्स सिगरेट मांगेंगे तो वह आपको नहीं देगा। वो आपसे सिगरेट की कीमत चार रुपये मांगेगा (जो कि MRP से अधिक है)। या कहेगा कि सात रुपये देकर दो विल्स ले लो। एक रुपये से कम वाले सिक्के तो वह किसी कीमत पर आपसे नहीं लेगा। आप जिद करेंगे तो कहेगा चार रुपये देकर एक विल्स सिगरेट के साथ एक टॉफी ले लो। आपको टॉफी की कतइ जरूरत नहीं है पर आपको लेना होगा

बहस झंझट से हर आदमी बचना चाहता है इसलिये अधिकतर लोग खुदरा पैसों की चिन्ता नहीं करते और दुकानदार को वो खुदरा पैसे मुफ्त में मिल जाते हैं। अब जरा सोचिये यदि एक दुकानदार एक दिन में 2-3 हजार सिगरेट बेचता है तो वह लोगों से दिन भर में हजार-डेढ़ हजार रुपये जबरन वसूली कर लेता है क्योंकि उसे प्रति सिगरेट आठ आने अधिक मिलते हैं।

चार साल पहले मैं परिवार के साथ पचमढ़ी भ्रमण के लिये गया था तो उस समय महाराष्ट्र में मुझे खरीदी के समय वापसी में चवन्नी, अठन्नी आदि खुदरा सिक्के मिले थे (अब मैं वहाँ के दुकानदारों से खुदरा पैसे लेने के लिये मना तो नहीं कर सकता था)। आज भी वे सिक्के मेरे पास बेकार पड़े हैं क्योंकि वे छत्तीसगढ़ में नहीं चलते। अब उसे यदि चलाना है तो मुझे छत्तीसगढ़ से बाहर जाना होगा।

क्यों नहीं चलते खुदरा सिक्के छत्तीसगढ़ में?

इस प्रश्न का जवाब मुझे कुछ भी नहीं सूझता। यदि कोई इसका उत्तर जानता हो तो कृपया बताने का कष्ट करें।

Sunday, June 8, 2008

कैसे मान लें कि पिछले माह आप जिंदा थे?

हमने बड़े बाबू को अपना लाइफ सर्टिफिकेट दे कर कहा, "बड़े बाबू, बाहर चले जाने के कारण पिछले माह का पेंशन नहीं ले पाया था, दोनों माह का पेंशन बना दीजिये।"

बड़े बाबू ने लाइफ सर्टिफिकेट का मुआयना किया फिर बोले, "अरे! ये तो इस माह का लाइफ सर्टिफिकेट है, पिछले माह का लाइफ सर्टिफिकेट कहाँ है?"

"भइ, जब मैं इस माह जिंदा हूँ तो निश्चित है कि पिछले माह भी जिंदा था।" हमारा तर्क था।

"कैसे मान लें कि पिछले माह आप जिंदा थे? सबूत कहाँ है आपके पिछले माह जिंदा होने का?" बड़े बाबू ने कहा।

"अरे भाई, जब मैं अभी आपके सामने जीता-जागता खड़ा हूँ, तो पिछले माह मरा हुआ कैसे हो सकता था?" हमने भी तर्क किया।

"देखिये साहब, कुछ नियम-कानून होते हैं। जब कानून यह है कि जिंदा रहने के सबूत के लिये लाइफ सर्टिफिकेट पेश करना चाहिये तो आपको सर्टिफिकेट पेश किये बिना पेंशन नहीं मिल सकता। आप इस माह का पेंशन ले सकते हैं पर पिछले माह का पेंशन लेने के लिये आपको उस माह का लाइफ सर्टिफिकेट लाना ही होगा।"

यहाँ मैं यह स्पष्ट कर दूँ कि उपरोक्त घटना के विषय में मझे बहुत पहले एक पेंशनर सज्जन ने बताया था। उन दिनों पेंशन लेने के लिये हर माह लाइफ सर्टिफिकेट प्रस्तुत करना पड़ता था। आजकल साल में एक बार ही लाइफ सर्टिफिकेट देना होता है।

ऐसे और भी कई नियम हैं जो कि परेशानी बढ़ाते हैं। आप मकान बनाने के लिये कर्ज लेते हैं तो कर्ज की रकम पाने के लिये आर्किटेक्ट से सर्टिफिकेट ले कर पेश करना जरूरी है जिसके लिये आपको अतिरिक्त पैसे खर्च करने पड़ते हैं। किसी सक्षम अधिकारी द्वारा मकान बनने के प्रोग्रेस का निरीक्षण से काम नहीं चल सकता। यह भी हो सकता है कि आप मकान बनवायें ही नहीं पर आर्किटेक्ट का सर्टिफिकेट दे कर कर्ज की रकम प्राप्त कर लें। आप किराये के मकान में रहते हैं, बिजली बिल आपके मकान मालिक के नाम से आता है, और आपके यहां फोन भी नहीं लगा है तो बिजली बिल या फोन बिल न होने के कारण आपका एड्रेस प्रूफ नहीं हो सकता और बैंक में खाता खोलना, कर्ज प्राप्त करना जैसे आपके कई महत्वपूर्ण कामों में रुकावट आ सकती है।

अभी हमारे शहर में एक संकरे सड़क को बीच में खोद कर डिव्हाइडर बनाया जा रहा है, उसका चौड़ीकरण बाद में होगा। जनता को भले ही परेशानी हो, डिव्हाइडर पहले बनाया जायेगा और चौड़ीकरण बाद में होगा। शायद डिव्हाइडर बनाने वाले ठेकेदार की पहुँच ज्यादा हो और उसने सड़क चौड़ीकरण हेतु रकम स्वीकृत होने के पहले ही डिव्हाइडर बनाने हेतु रकम स्वीकृत करवा लिया हो। अब जिस काम के लिये पहले सैंकशन मिला हो वह काम तो पहले ही होगा।

Saturday, June 7, 2008

वेब में प्रोफेशनल की परिभाषाएँ

द्विवेदी जी के ब्लॉग की प्रविष्टियों ने "प्रोफेशनल" होने के प्रति जिज्ञासा को प्रबल कर दिया और यह जानने की उत्सुकता हुई कि इस विषय में वेब क्या कहता है। वेब में किसी विषय की परिभाषाओं को जानने के लिये गूगल सर्च इंजिन एक बहुत अच्छा साधन है। मैंने गूगल सर्च इंजिन में define:professional टाइप कर के खोजा तो निम्न परिणाम मिले (मैंने यथासम्भव हिन्दी अनुवाद भी कर दिया है):

Definitions of professional on the Web:
[वेब में प्रोफेशनल की परिभाषाएँ:]

* engaged in a profession or engaging in as a profession or means of livelihood; "the professional man or woman possesses distinctive qualifications ...
* a person engaged in one of the learned professions
* an athlete who plays for pay
* engaged in by members of a profession; "professional occupations include medicine and the law and teaching"
* master: an authority qualified to teach apprentices

[किसी प्रोफेशन मे लगना या लगे रहना या आजीविका प्राप्ति का साधन; "प्रोफेशनल पुरुष या महिला के पास विशेष योग्यताएँ होती हैं ...
एक व्यक्ति जो किसी दक्ष प्रोफेशन में लगा हो।
एक खिलाड़ी जो भुगतान हेतु खेलता है।
किसी प्रोफेशन के सदस्य के रूप में लगना; "प्रोफेशनल कारोबार में चिकित्सा, विधि और शिक्षण सम्मिलित हैं।
महारथी (master): नौसिखियों को सिखाने के लिये एक योग्य अधिकारी]
wordnet.princeton.edu/perl/webwn

* A professional can be either a person in a profession (certain types of skilled work requiring formal training / education) or in sports (a sportsman / sportwoman doing sports for payment). Sometimes it is also used to indicate a special level of quality of goods or tools.

[प्रोफेशनल एक व्यक्ति होता है जो या तो किसी प्रोफेशन (कोई कुशलतापूर्वक किया जाने वाला कार्य जिसके लिये औपचारिक प्रशिक्षण/शिक्षण की आवश्यकता होती है) में लगा होता है या फिर (एक खिलाड़ी पुरुष या महिला, जो कि भुगतान के लिये खेले, के द्वारा खेले गये) खेलों में लगा होता है।]
en.wikipedia.org/wiki/Professional

* A player who receives payment for teaching or playing in tournaments. Usually shortened to Pro.

[एक खिलाड़ी जो खेल प्रतियोगिताओं (tournaments) में खेलने या शिक्षण देने के लिये भुगतान प्राप्त करता है। सामान्यतः छोटे रूप में प्रो कहलाता है।]
www.worldgolf.com/wglibrary/reference/dictionary/ppage.html

* Occupations that require knowledge in a field of science or learning typically acquired through education or training pertinent to the specialized field, as distinguished from general education. ...

[कारोबार जिसके लिये विज्ञान के क्षेत्र में ज्ञान या शिक्षण अथवा प्रशिक्षण के द्वारा उपयुक्त विशिष्ट क्षेत्र में विशेष अध्ययन की आवश्यकता होती है, जो कि सामान्य शिक्षा से हट कर होती है ...]
www.opm.gov/feddata/demograp/PartThree.doc

* work which requires the application of theories, principles and methods typically acquired through completion of a baccalaureate degree or higher or comparable experience; requires the consistent exercise of discretion and judgement in the research, analysis, interpretation and application of ...

[ऐसा कार्य जिसके लिये स्नातक उपाधि या उच्चतर या समकक्ष अनुभव के समाप्ति के पश्चात् विशेष रूप से अर्जित किये गये सिद्धांतों, नियमों तथा विधियों के अनुप्रयोग की आवश्यकता होती है; शोध, विश्लेषण, कर्म की व्याख्या आदि के लिये विवेकाधिकार और निर्णय के दृढ़ अभ्यास की आवश्यकता होती है।]
www.state.wv.us/ADMIN/PERSONNEL/clascomp/Docs/define.htm

* (pro·fes·sion·al) (pro-fesh´ə-nəl) 1. pertaining to one's profession or occupation. 2. one who is a specialist in a particular field or occupation.

[1. अपने प्रोफेशन या कारोबार से सम्बन्धित होना। 2. ऐसा व्यक्ति जिसे किसी विशेष क्षेत्र या कारोबार में विशिष्टता प्राप्त हो।]
www.mercksource.com/pp/us/cns/cns_hl_dorlands.jspzQzpgzEzzSzppdocszSzuszSzcommonzSzdorlandszSzdorlandzSzdmd_p_35zPzhtm

* A person who practices an occupation involving high standards of intellectual knowledge after successfully completing the required education and training.

[ऐसा व्यक्ति जो उपयुक्त शिक्षण और प्रशिक्षण की सफलता के पश्चात् उच्च मानदण्डों वाले बौद्धिक ज्ञान का अभ्यास करता है।]
www.faststart.state.ri.us/bfs_glossary.html

उपरोक्त परिभाषाओं से इतना तो स्पष्ट है कि प्रोफेशनल होने के लिये विशिष्ट शिक्षण, प्रशिक्षण तथा अभ्यास की आवश्यकता होती है।

कुछ परिभाषाओं में प्रोफेशन का भुगतान से सम्बन्ध भी बताया गया है। मेरा भी यही मानना है कि न केवल "प्रोफेशन" का बल्कि उसके साथ "बिजनेस" और "सर्व्हिस" शब्दों का भी सीधा सम्बन्ध भुगतान या कमाई से होता है। क्यों हम अपने बच्चों को सफल व्यापारी बनाना चाहते हैं? ताकि उन्हें प्रतिफल के रूप में उपयुक्त आजीविका, मान-सम्मान और नाम प्राप्त हो। क्यों हम अपने बच्चों को चिकित्सा या विधि आदि की उच्च शिक्षा दिलवाते हैं? ताकि वे सफल प्रोफेशनल बनें और उन्हें प्रतिफल के रूप में उपयुक्त आजीविका, मान-सम्मान और नाम प्राप्त हो। क्यों हम अपने बच्चों को इंजीनियरिंग, कम्प्यूटर साइंस आदि की उच्च शिक्षा दिलवाते हैं? ताकि उन्हें उच्च पदों वाली नौकरियाँ मिलें और प्रतिफल के रूप में उपयुक्त आजीविका, मान-सम्मान और नाम प्राप्त हो।

हमारी प्रथम आवश्यकता "आजीविका" है और आजीविका कमाई से चलती है। आजीविका के बाद दूसरी आवश्यकता उस आजीविका की सुरक्षा होती है। आज के खर्च चलाने लायक कमाई कर लेने के बाद आदमी कल की आजीविका को भी सुरक्षित देखना चाहता है। इसीलिये वह आजीविका का स्थाई साधन (सरकारी या अच्छे संस्थान में नौकरी, जमा-जमाया बिजनेस या प्रोफेशन आदि) पाने का प्रयास करता है। मान-सम्मान, नाम कमाना आदि इसके बाद ही आता है। यदि अन्य साधनों से हमारी कमाई इतनी न हो कि हम कम्प्यूटर, इंटरनेट आदि का खर्च न उठा पायें तो लाख योग्यताएँ होने के बावजूद भी हम चिट्ठाकारी नहीं कर सकते।

यदि हम अपना पसीना बहा कर कमाये गये रकम को चिट्ठाकारी के लिये खर्च करते हैं, अन्य महत्वपूर्ण कार्यों से समय निकाल कर उस समय को चिट्ठाकारी के लिये देते हैं तो उसके प्रतिफल के रूप में हमें अवश्य ही कमाई की कामना भी होनी चाहिये, तभी चिट्ठाकारी प्रोफेशनल हो पायेगी अन्यथा वह केवल शौकिया ही बनी रहेगी।

Friday, June 6, 2008

अभी बहुत समय लगेगा हिन्दी चिट्ठाकार को प्रोफेशनल बनने में

"चिट्ठाकारी तो अभी शौकिया ही रहेगी"

उपरोक्त वाक्यांश श्री दिनेशराय द्विवेदी जी के पोस्ट 'चिट्ठाकारों के लिए सबसे जरुरी क्या है?' में श्री नीरज रोहिल्ला द्वारा की गई टिप्पणी का अंश है। यह वाक्यांश एक बहुत बड़े सत्य को उद्घाटित करता है। वास्तव में हिन्दी चिट्ठाकारी 'शौकिया' है और अभी बहुत दिनों तक 'शौकिया' ही रहेगी क्योंकि हिन्दी चिट्ठाकार केवल अपने लिये (या अपने जैसे चिट्ठाकारों के) लिये लिखता है न कि पाठकों के लिये। और इसीलिये हिन्दी चिट्ठों के पाठक भी आम लोग नहीं बल्कि सिर्फ हिन्दी चिट्ठाकार ही होते हैं। गौर करने वाली बात यह है कि वकील का मुवक्किल वकील ही नहीं होता, डॉक्टर का मरीज डॉक्टर ही नहीं होता किन्तु हिन्दी चिट्ठाकार का पाठक हिन्दी चिट्ठाकार ही होता है।

ऐसे बहुत कम वकील मिलेंगे जो केवल शौक के लिये वकालत करते हैं, ऐसे बहुत कम डॉक्टर मिलेंगे जो केवल शौक के लिये डॉक्टरी करते हैं पर ऐसे बहुत से चिट्ठाकार मिलेंगे जो केवल शौक के लिये चिट्ठाकारी करते हैं। 'वकालत' एक प्रोफेशन है, 'डॉक्टरी' एक प्रोफेशन है, 'अंग्रेजी और अन्य भाषा में चिट्ठाकारी' भी एक प्रोफेशन है क्योंकि इनसे अनेकों लोगों की आजीविका चलती है किन्तु हिन्दी चिट्ठाकार की आजीविका 'हिन्दी चिट्ठाकारी' से नहीं चलती इसलिये 'हिन्दी चिट्ठाकारी' प्रोफेशन नहीं है। हिन्दी चिट्ठाकार 'चिट्ठाकारी' को अपने आय का साधन नहीं समझता। भले ही वह यह समझता है कि चिट्ठाकारी से कुछ कमाई भी हो जाये तो अच्छा है किन्तु वह चिट्ठाकारी को केवल कमाई का साधन ही नहीं समझता, क्योंकि चिट्ठाकारी उसका शौक है प्रोफेशन नहीं। हिन्दी चिट्ठाकार की यह सोच आनन-फानन में तुरन्त बदल जाने वाली नहीं है इसलिये अभी हिन्दी चिट्ठाकार को प्रोफेशनल बनने में बहुत समय लगेगा।

Thursday, June 5, 2008

गैस-डीजल-पेट्रोल

और भी मँहगी हो गईं गैस-डीजल-पेट्रोल।
खर्च बढ़ी दस फीसदी अकल हो गई गोल॥
अकल हो गई गोल कुछ भी समझ न आये।
सभी रहे हैं सोच कैसे जायें क्या खायें?
साइकिल ले लें आज से खायें छोटे कौर।
भूलें सपना कार का मँहगाई बढ़ गई और॥

Sunday, June 1, 2008

आत्माओं से बातचीत

बात सन् 1967 की है। मेरे पूज्य पिताजी को कहीं से आत्माओं से बातचीत (planchette) करने की विधि का पता चला। मैंने हायर सेकेंडरी (ग्यारहवी कक्षा) की परीक्षा दी थी और गर्मी की छुट्टियाँ मना रहा था। पिताजी ने अपनी स्कूल टीचर की नौकरी किसी कारणवश छोड़ दी थी अतः उनकी भी छुट्टियाँ ही थीं। एक दिन दोपहर को आत्माओं से बातचीत करने का प्रयोग करने का निश्चय किया गया। पिताजी ने एक कार्ड बोर्ड पर प्लेंचेट चार्ट बनाया। कमरे के एक फर्श को गंगाजल छिड़क कर पवित्र किया और उस पर प्लेंचेट चार्ट रख दिया। अगरबत्ती जला कर पूजा करने के बाद प्लेंचेट के बीचोबीच तांबे की एक ढिबरी रखी और उस पर मैं, पिताजी और मेरी दादी माँ ने तर्जनी उंगली रख दिया। मेरी माँ तथा अन्य भाई-बहन दर्शक के रूप में कमरे में बैठे थे। सभी मौन थे और वातावरण एकदम शांत था। पिताजी ने मन ही मन आत्मा का आह्वान करना शुरू किया। कुछ ही देर में हम सभी आश्चर्यचकित रह गये क्योंकि ढिबरी प्लेंचेट चार्ट पर घूम रही थी।
Planchette Chart

पिताजी ने कहा, "क्या पवित्र आत्मा आ चुकी है?" और जवाब में ढिबरी yes लिखे हुये गोले पर पहुँची और फिर वापस अपने नियत स्थान पर आ गई। उसके बाद पिताजी ने लगभग एक-डेढ़ घंटे तक आत्मा से अनेकों प्रश्न पूछे। जवाब में ढिबरी एक के बाद एक अंग्रेजी के अक्षरों तक जाती और एक शब्द बन जाने के बाद अपने नियत स्थान पर वापस आ जाती। इस प्रकार शब्द और वाक्य बनते जाते थे तथा प्रश्नों के उत्तर मिलते जाते थे। आत्मा से मिले प्रश्नों के कुछ उत्तर सही लगे थे किन्तु प्रायः उत्तर गलत थे।

प्रयोग समाप्त करने के बाद परिवार के सभी सदस्यों में चर्चा होती रही और सभी का मत यह बना कि आत्मा आई तो थी किन्तु प्रश्नों के उत्तर संतोषजनक नहीं थे। शायद सही के बजाय कोई गलत आत्मा आ गई थी। अब तो हमें प्लेंचेट करने की एक लत सी लग गई। दोपहर के भोजन के बाद रोज प्लेंचेट करना हमारी दिनचर्या का एक अंग बन गया। यद्यपि संतोषजनक उत्तर नहीं मिलते थे किन्तु हमें गर्मी की दोपहर में समय बिताने तथा मनोरंजन का एक नया साधन मिल गया था।

इस प्रकार रोज प्लेंचेट करते लगभग एक माह बीत गया। रोज की तरह एक दिन प्लेंचेट करने के लिये हमने ढिबरी पर अपनी उंगलियाँ रखी ही थीं कि बिना किसी आह्वान के ढिबरी चार्ट पर घूमने लगी, शब्द और वाक्य बनने लग गये। चार्ट पर ढिबरी की गति इतनी तेज थी कि हमारी उंगलियाँ ढिबरी पर टिक नहीं पा रही थीं, कभी किसी की उंगली ढिबरी से अलग हो जाती थी तो कभी किसी की। जिसकी उंगली ढिबरी से अलग हो जाती थी वह फिर से अपनी उंगली शीघ्रतापूर्वक उस पर रख देता था। इस प्रकार से निम्न संदेश हमें प्राप्त हुआः

'मैं गोकुल प्रसाद अवधिया (मेरे दादा जी) हूँ। यह बताने के लिये कि तुम लोग इस प्रयोग को करना बंद कर दो, मैं अपनी मर्जी से आया हूँ। इस प्रयोग के करते रहने से कभी भी कुछ अशुभ और अनिष्ट होने की आशंका है।'

हम लोग स्तब्ध रह गये। कुछ क्षणों के बाद जब हम संयत हुये तो पिताजी ने कहा, "ठीक है, अब से हम इस प्रयोग को नहीं किया करेंगे। पर यहाँ से जाने के पहले क्या आप हमारे प्रश्नों के उत्तर देने की कृपा करेंगे?"

उत्तर 'हाँ' में था।

उस रोज के अनेकों प्रश्न और उत्तर मुझे आज भी याद हैं जो नीचे दिये जा रहे हैं:

'मृत्यु के बाद तो मोह समाप्त हो जाता है फिर आप क्यों हमें संदेश देने आये हैं?' (पिताजी का प्रश्न था)

"मोह समाप्त हो तो जाता है किन्तु पूर्ण रूप से नहीं, जब तक मोक्ष न मिल जाये मोह का कुछ न कुछ अंश बना रहता है।"

'क्या सात लोक या आसमान होते हैं?'

"हाँ"

'आप किस लोक में हैं?'

"5वाँ"

'क्या मैं पास होउंगा?' (मेरा प्रश्न था)

"हाँ"

'किस डिवीजन में?'

"सेकण्ड डिवीजन में"

'मुझे तो फर्स्ट डिवीजन की उम्मीद है?'

"सेकण्ड डिवीजन"

(जब परीक्षा परिणाम आया तो मुझे 58.8% मिले थे।)

'मेरे प्राविडेंट फंड का पैसा मिलेगा?'(पिताजी का प्रश्न था)

"हाँ, किन्तु केवल तुम्हारा अंशदान मिलेगा, म्युनिस्पाल्टी का अंशदान नहीं मिलेगा।"

'कब मिलेगा?'

"21 जून 1967 को"

(सच मे ही 21 जून 1967 को पिताजी के प्राविडेंट फंड के अपने अंशदान का ही भुगतान हुआ था। मुझे आज भी याद है कि उसी दिन मेरे लिये पिताजी ने उन्हीं पैसों में से फिलिप्स कंपनी का रेडियो खरीदा था और घर में रेडियो को फिट करने के बाद मैने विविध भारती का मनचाहे गीत कार्यक्रम लगाया था तथा उसमें फिल्म "राजा और रंक" का "रंग बसंती..." गीत प्रसारित हो रहा था।)

और भी प्रश्न पूछे गये थे जो कि विशेष उल्लेखनीय नहीं है।

उस दिन के बाद से पिताजी ने न तो फिर कभी प्लेंचेट का प्रयोग किया और न ही हमें करने दिया।

इस पोस्ट से मेरा आशय अलौकिक शक्तियों का प्रचार-प्रसार नहीं है। एक घटना जो मेरे साथ बीती थी याद आ गई और मैने पोस्ट कर दिया। वैसे प्लेंचेट के प्रयोग को परामनोविज्ञान मान्यता देती है।

 
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