Tuesday, December 30, 2008

बाप दादाओं की तस्वीरों को निकाल कर फेंक दो

"हिन्दी के प्राचीनतम रूप और उसके प्राचीन साहित्य को अजाबघर में रख दो। उसकी अब कोई आवश्यकता नहीं।"

दिल खटास से भर गया है ऐसी बात पढ़ कर।

फिर तो बाप दादाओं की तस्वीरों को भी निकाल कर फेंक दो। क्यों उन्हें कमरे में लगा रखा है, क्या आवश्यकता रह गई है इन तस्वीरों की?

हिन्दी के प्राचीनतम रूप को अजायबघर में रख देने के बाद कौन सी हिन्दी का प्रयोग करोगे? अंग्रेजी शब्दों के सहारे जीवित रहने वाले खिचड़ी हिन्दी की? आज हिन्दी का सही ज्ञान ही लुप्तप्राय हो चुका है। दिल्ली जैसे हिन्दीभाषी क्षेत्र के लोगों को गागर जैसे सामान्य शब्द का अर्थ नहीं पता है (देखें मेरा ये पोस्ट)। अपने अज्ञान को छुपाने का यह बहुत ही अच्छा तरीका है। स्वयं अपना ज्ञान बढ़ाने के बदले दूसरे सभी लोगों को अज्ञानी बना दो।

दुर्गाप्रसाद अग्रवाल जी चिट्ठा चर्चा की टिप्पणी के माध्यम से कहते हैं, "........ और जानता हूं कि हमारे पाठ्यक्रम कितने जड़ हैं. चन्द बरदाई, कबीर, तुलसी, सूर, बिहारी, केशव सब महान हैं, अपने युग में महत्वपूर्ण थे, लेकिन सामान्य हिन्दी के विद्यार्थी को उन्हें पढाने का क्या अर्थ है? तुलसी, सूर, बिहारी की भाषा आज आपकी ज़िन्दगी में कहां काम आएगी? मन्दाक्रांता, छन्द और किसम किसम के अलंकार आज कैसे प्रासंगिक हैं? अगर हम अपने विद्यार्थी को इन सब पारम्परिक चीज़ों के बोझ तले ही दबाये रखेंगे तो वह नई चीज़ें पढने का मौका कब और कैसे पाएगा?....."

भाई जब आप जानते हैं कि हमारे पाठ्यक्रम जड़ हैं तो क्या जरूरत थी आपको उसी जड़ पाठ्यक्रम को चालीस साल तक पढ़ाने की? तुलसी, सूर, बिहारी की भाषा ही वास्तविक हिन्दी भाषा है और यदि हम उस भाषा को समझ नहीं सकते, उनकी तरह लिख नहीं सकते तो इसमें उनकी भाषा का क्या दोष है? दोष है तो हमारी अज्ञानता का। मन्दाक्रांता, छन्द (आप हिन्दी पढ़ाते हैं किन्तु यह भी नहीं जानते कि मन्दाक्रांता छन्द का एक प्रकार है, छन्द जैसा काव्य का कोई अलग अवयव नहीं) और किसम किसम के अलंकार आज भी प्रासंगिक हैं किन्तु हममें अब वैसी काव्य रचने का सामर्थ्य नहीं रह गया है। उन महान कवियों ने हिन्दी को अलंकृत किया था, अब यदि हम हिन्दी को अलंकृत नहीं कर सकते तो क्या उसके वस्त्र भी उतार दें?

मैं ऐसी बातें लिखने से हमेशा परहेज करता हूँ जिनसे किसी प्रकार का विवाद उत्पन्न हो। ऐसी बाते मुझे पसंद ही नहीं हैं। किन्तु आज इस पोस्ट को लिखने से मैं स्वयं को रोक नहीं पाया। जानता हूँ कि क्या होगा। बहुत सारी विरोधी टिप्पणिया ही आयेंगी ना। आने दो। न तो मैं यहाँ पर जो अपने विचार लिख रहा हूँ वह मेरे विरोधी विचार वालों पर जबरदस्ती लद जाने वाला है और न ही विरोधी विचार वाली टिप्पणियाँ मुझ पर लदने वाली हैं।

Thursday, December 25, 2008

हमें गलतफहमी (misunderstanding) से बचना है

ज्ञानदत्त जी के पोस्ट "वर्तमान पीढ़ी और ऊब" के प्रतिक्रियास्वरूप लिखे गये कुछ पोस्ट मैने पढ़े (ज्ञानदत्त जी से प्रेरित, नयी पीढ़ी और पुरानी पीढ़ी, ये फासला क्यों?, मानसिक हलचल की हलचले) इन्हें पढ़ कर लग रहा है कि हमारे बीच कुछ गलफहमियाँ सी उत्पन्न हो गई है। इससे पहले कि गलफहमी और बढ़े उसे खत्म कर देने में ही भलाई है।

मैं समझता हूँ कि ज्ञानदत्त जी का विरोध ऊब से था, कि नई पीढ़ी से। हाँ उन्होंने ऊब को वर्तमान पीढ़ी के साथ सीधा जोड़ दिया यह मेरी समझ में ठीक नहीं हुआ (ज्ञानदत्त जी कृपया अन्यथा लें) ऊब तो पुरानी पीढ़ी में भी थी। मैं स्वयं जब दसवीं कक्षा में था तो कोर्स में शामिल चन्द्रधर शर्मा 'गुलेरी' जी की विख्यात कहानी "उसने कहा था" को पहली बार पढ़ कर ऊब गया था क्योंकि उसे पहली बार पढ़कर मैं समझ नहीं सका था। उस ऊब के कारण उस कहानी को फिर से पढ़ने की इच्छा ही नहीं हो रही थी। पर हर साल परीक्षा में उस कहानी से कम से कम एक प्रश्न अवश्य ही आता था, मुझे उस कहानी को समझने के लिये बार बार पढ़ना ही पड़ा। आज "उसने कहा था" मेरी प्रिय कहानियों में से एक है। हाँ तो मैं कह रहा था कि ऊब सिर्फ वर्तमान पीढ़ी में ही नहीं है, पुरानी पीढ़ी में भी थी। किन्तु आज हर काम के लिये शार्टकट अपनाने, जैसे कि पाठ्यपुस्तक के पाठ पढ़ कर परीक्षा गाइड पर निर्भर रहने, का चलन बढ़ गया है। यह ऊब के बढ़ जाने के परिणामस्वरूप ही है।

यह भी सही है कि ऊब जाना एक स्वाभाविक क्रिया है जिससे कोई भी नहीं बच सकता चाहे वह वर्तमान पीढ़ी का हो या पुरानी पीढ़ी का। किन्तु ऊब के कारण हम शार्टकट रास्ते अपना कर यदि उब को सहने और ऊब से लड़ने का प्रयास करें तो क्या यह अधिक अच्छा नहीं होगा?

और फिर पुरानी पीढ़ी और नई पीढ़ी के बीच कुछ कुछ दूरी याने कि जनरेशन गैप तो सदा से ही चलती आई है। जब हमारी पीढ़ी युवा थी अर्थात् उन दिनों की नई पीढ़ी थी तो हमें भी अपनी पुरानी पीढ़ी दकियानूस लगा करती थी। ईश्वर ने मनुष्य का स्वभाव ही ऐसा बनाया है कि यह दूरी कभी भी मिट नहीं पायेगी। पुरानी पीढ़ी सदा ही अतीत में जीती है और अतीत को वर्तमान से अच्छा समझती है और यह भी स्वाभाविक है कि वर्तमान पीढ़ी वर्तमान को अतीत से अच्छा समझती है। दोनों पीढ़ियों में "कुत्ते बिल्ली का बैर" था, है और हमेशा रहेगा।

तो हम यदि हम पुरानी पीढ़ी और नई पीढ़ी की बात को भूलकर ज्ञानदत्त जी के पोस्ट को पढ़ें तो सारी गलफहमियाँ अपने आप दूर हो जायेंगी।

Tuesday, December 23, 2008

मेरे ब्लॉग की पाठक संख्या क्यों कम है?

और किसी के मन में यह प्रश्न उठे या न उठे पर मेरे मन में तो प्रायः ही यह प्रश्न उठता है कि मेरे ब्लॉग की पाठक संख्या क्यों कम है?

मैं यह समझता हूँ कि यह सिर्फ आपकी लिखी सामग्री है (content) जो कि पाठकों को खींच कर आपके ब्लॉग में लाती है। अंग्रेजी की उक्ति हैः

'Content is king.'

अर्थात् यदि हिन्दी में कहें तो "सामग्री ही साम्राज्ञी है।"

तो जब भी आप अपने ब्लॉग की सामग्री लिखें तो यह सोच कर न लिखें कि कुछ न कुछ तो लिखना है क्योंकि ऐसी सामग्री को कोई भी पाठक पढ़ना पसंद नहीं करता। फिर ऐसे लेखन का क्या फायदा जिसे कि कोई पढ़े ही नहीं। यह तो वही बात हुई कि जंगल में मोर नाचा किसी ना देखा। तो लिखते समय हमेशा अपनी सामग्री की उत्कृष्टता ध्यान रखें।

पाठक क्या चाहता है?

अपने लेख को लोकप्रिय बनाने के लिये यह जानना बहुत जरूरी है कि पाठक क्या चाहता है। यदि पाठक को उसके पसंद की सामग्री मिलेगी तो वह उसे अवश्य ही पढ़ेगा। तो आखिर पाठक क्या चाहता है? वास्तव में पाठक संतुष्टि चाहता है। वह चाहता है कि उसे घिसी पिटी चीज पढ़ने को न मिले। उसने जो कुछ भी पढ़ा है उससे उसे कुछ नई जानकारी मिली है, उसके ज्ञान में कुछ वृद्धि हुई है।

तो ऐसे लेख पढ़ कर जिससे पाठक को कुछ भी प्राप्त नहीं होता, उसे क्षोभ होता है और जिस ब्लॉग में उसे ऐसी सामग्री पढ़ने को मिली है उस ब्लॉग से वह कन्नी काट लेता है। इसके विपरीत यदि उसे किसी ब्लॉग की सामग्री को पढ़कर कुछ नयापन मिले, उसे संतुष्टि हो तो वह उस ब्लॉग का चाहने वाला बन जाता है।

रोज रोज आखिर नई जानकारी लायें कहाँ से?

यह यक्षप्रश्न है कि आखिर रोज हम अपनी सामग्री में कहाँ से नयापन लायें? सच्चाई भी यही है कि हम हमेशा नई जानकारी नहीं प्राप्त कर सकते। पर हाँ किसी पुरानी जानकारी को ऐसी शैली में प्रस्तुत कर सकते हैं कि उसमें नयापन झलकने लगे। प्रायः सभी सफल लेखक यही करते हैं और इस प्रकार के प्रस्तुतीकरण को पाठक भी पसंद करते हैं।

लिखना शुरू करने के पहले
  • जानने का प्रयास करें कि पाठकों की रुचि क्या है। कोशिश करें कि आपका लेखन उनकी रुचि के अनुरूप हो न कि आपकी अपनी रुचि के।

  • जिन ब्लॉगर्स के ब्लॉग अधिक पढ़े जाते हैं उन्हें पढ़ें और विश्लेषण करें कि उनकी सामग्री में क्या विशेषताएँ हैं जिनके कारण लोग उन्हें पढ़ते हैं। इस प्रकार आपको स्वयं के लेखन की कमजोरियों का पता चलेगा। और यह कहने की आवश्यकता ही नहीं है कि अपनी कमजोरी जान लेने पर उन्हें दूर करने का प्रयत्न करना है।

  • उन विषयों पर लिखने के लिये कभी भी न सोचें जिन पर आप अधिकार नहीं रखते। इधर उधर से एकत्रित की गई सामग्री कभी भी किसी को प्रभावित नहीं करती बल्कि कई बार लेखक की स्थिति को हास्यास्पद बना देती है।

  • जो कुछ भी आप लिखना चाहते हैं उसके लिये तरतीबवार पॉइंट्स बना लीजिये ताकि लिखते समय कुछ छूट न जाये।

  • लिखने के पहले स्वयं में पूर्ण आत्मविश्वास बना लें तभी लिखना शुरू करें।
लिख लेने के बाद

अपने लेख को आनन फानन में प्रकाशित न करें। पहले उसे कम से कम एक बार पढ़ें, दो बार पढ़ें तो और भी अच्छा है। विचारों के प्रवाह में लिखते समय प्रायः हिज्जे, व्याकरण और वाक्य विन्यास की गलतियाँ हो जाती हैं और इन गलतियों का पाठक के ऊपर विपरीत प्रभाव पड़ता है। प्रकाशन के पूर्व एक बार पढ़ लेने से हमें अपनी गलतियों की जानकारी हो जाती है और हम उसे सुधार सकते हैं।

पाठक के रुचि के प्रतिकूल सामग्री हो तो?

कभी कभी ऐसा भी हो जाता है कि हम पाठकों को ऐसी सामग्री देना चाहते हैं जिनके विषय में हम जानते हैं कि यह उनके लिये हितकारी है किन्तु उनकी रुचि के अनुरूप नहीं है। ऐसी स्थिति में आप अपने लेख को इस चतुराई से (tactfully) लिखें कि पाठक को वह सुरुचिपूर्ण लगे। मतलब यह कि कड़वी दवा के ऊपर शक्कर की परत।

पाठक संख्या बढ़ाने के लिये क्या करें?

सबसे अहम् बात तो यह है कि लोग जानें कि आपका ब्लॉग अपडेट हो गया है। ब्लोवाणी, चिट्ठाजगत, नारद जैसे हमारे हिन्दी एग्रीगेटर्स आपकी इस समस्या को बहुत हद तक हल कर देते हैं पर अभी भी बहुत से लोग हैं जो कि इन हिन्दी एग्रीगेटर्स के विषय में नहीं जानते अतः ब्लॉग अपडेट के के तत्काल बाद ही उसे पिंग करें। पिंग करने के लिये आप pingoat.com, pingomatic.com जैसी मुफ्त सेवाओं का लाभ उठा सकते हैं। पिंग होने पर आपके ब्लॉग का अपडेशन विश्व के सभी बड़े ब्लॉग डायरेक्टरियों में स्वतः ही शामिल हो जाता है।

digg.com, technorati.com जैसे सोशल बुकमार्किंग साइट्स का (मुफ्त) सदस्य बनें का और अपने फेव्हरिट्स में अपने ब्लॉग को जोड़ दें। इस प्रकार जो लोग इन साइट्स के कई लाख सदस्यों पता चल जाता है कि आपका ब्लॉग अपडेट हो चुका है।

(विशेषकर technorati.com का क्योंकि वह हिन्दी को सपोर्ट करता है। यदि digg.com का प्रयोग करना है तो रोमन हिन्दी का प्रयोग करें।)

अपने लेख को कृति निर्देशिका में भी डाल दें और स्रोत बक्से में लिखें कि

".....(आपका नाम) हिन्दी के प्रति समर्पित लेखक हैं। उनके अन्य लेखों को पढ़ने के लिये आपका ब्लॉग में अवश्य पधारें।

इस प्रकार आपके ब्लोग के विषय में वहाँ आने वाले लोगों को जानकारी मिलेगी तथा आपके ब्लोग का इनबाउंड लिंक बढ़ेगा और सबसे बड़ी बात तो यह होगी कि इन्टरनेट के हिन्दी सामग्री में इजाफा होगा।

Saturday, December 20, 2008

हिन्दी ब्लोग्स में एडसेंस विज्ञापन क्यों बंद हो गये

कल "शास्त्री जी कहते हैं" पोस्ट पर नजर पड़ गई। उसमें की गई टिप्पणियों को पढ़ने से लगा कि बहुत से लोग एडसेंस के विषय में जानने की जिज्ञासा रखते हैं। अतः इस विषय में मुझे जो जानकारी है वह यहाँ बता रहा हूँ (ये अलग बात है कि वर्तमान में एडसेंस के विज्ञापन हिन्दी ब्लोग्स तथा वेबसाइट्स को नहीं मिल पा रहे हैं पर उम्मीद करें कि जल्दी ही हिन्दी में फिर से ये विज्ञापन मिलने लगे, आखिर उम्मीद पे ही तो दुनिया कायम है)

एडसेंस क्या है

वास्तव में गूगल संसार की सबसे बड़ी आनलाइन विज्ञापन कंपनी है। संसार भर से उसे विज्ञापन मिलते हैं जिन्हें कि वह अनगिनत वेबसाइट्स तथा ब्लोग्स में फैला देती है। जब कोई इस विज्ञापन पर क्लिक करता है तो गूगल को विज्ञापनदाता से पैसे मिलते हैं जिसका एक छोटा सा हिस्सा गूगल उसे भी देता है जिसके ब्लोग या वेबसाइट से क्लिक किया गया था। इसे इस प्रकार से समझ सकते हैं कि बड़े शहरों में विज्ञापन एजेंसियाँ विज्ञापनदाताओं से पैसे लेकर उनके विज्ञापन को शहर भर में अनेकों होर्डिंग में दर्शाती है। अब यदि कोई होर्डिंग आपके घर के दीवाल पर लगा हो तो आपके दीवाल को उपयोग करने के एवज में विज्ञापन एजेंसी आपको भी कुछ कुछ रकम देती है।

यहाँ पर यह समझ लेना आवश्यक है कि गूगल को विज्ञापन के पैसे तभी मिलते हैं जब कोई विज्ञापन को क्लिक करता है और उस क्लिक के लिये गूगल जिस ब्लोग या वेबसाइट से क्लिक हुआ है उसके मालिक को पैसे देता है। अब होता यह है कि बहुत से लोग पैसा कमाने के लिये अपने ब्लोग के एडसेंस विज्ञापन पर या तो स्वयं क्लिक करते हैं या फिर अपने मित्रों, रिश्तेदारों और जान पहचान वालों से क्लिक करवाते हैं जिसे कि click fraud कहा जाता है। गूगल आज सिर्फ अपनी ईमानदारी की वजह से संसार की सबसे बड़ी विज्ञापन कंपनी बना हुआ है। उसे बेइमानी जरा भी पसंद नहीं है और वह नहीं चाहता कि उसके विज्ञापनदाताओं को अनावश्यक नुकसान हो। गूगल के पास ऐसे धोखा देने वाले क्लिक्स को पकड़ने का फूलप्रूफ तकनीक है। शास्त्री जी ने सही लिखा है कि "गूगल की नजरें बहुत तेज हैं" क्लिक प्राड करने वालों पर गूगल जरा भी दया नहीं करता और उन्हें बैन करके विज्ञापनों से वंचित कर देता है। एक बार यदि किसी को गूगल ने बैन कर दिया तो उसे कभी भी गूगल एडसेंस से पैसे कमाने का अवसर नहीं मिल पाता। गूगल की इस नीति से अन्य भाषा के बहुत से ब्लोगर और वेबमास्टर (जिन्हें बेइमानी पसंद है) भी त्रस्त हैं। बेइमानी करने वाले लाखों लोगों को गूगल ने बैन करके रखा हुआ है।

हिन्दी ब्लोग्स में एडसेंस विज्ञापन आने क्यों बंद हो गये?

इस प्रश्न के उत्तर में हम विश्वासपूर्वक कुछ कह नहीं सकते क्योंकि गूगल ने इस विषय में अब तक कुछ भी नहीं कहा है। हाँ इस प्रश्न के उत्तर में कि मेरे वेब पेजेस में सार्वजनिक सेवा विज्ञापन क्यों आते हैं गूगल का जवाब हैः

Your site content is primarily in an unsupported language.
If the AdSense code is placed on pages with content primarily in an unsupported language, we may show public service ads or ads in another language. As noted in our program policies, publishers may not display ads on pages with content primarily in an unsupported language, so please remove the ad code from these pages until we're able to support your language.
(देखें: https://www.google.com/adsense/support/bin/answer.py?hl=en&answer=10035)

मुझे नहीं लगता कि हिन्दी ब्लोग्स में विज्ञापन आने या सिर्फ सार्वजनिक सेवा विज्ञापन ही मिलने का कारण क्लिक प्राड है (यानी कि लोगों ने अपने ब्लोग के विज्ञापनों को क्लिक किया इसलिये गूगल ने विज्ञापन भेजने बंद कर दिया) गूगल केवल उन लोगों पर ही कार्यवाही करता है जो कि धोखेबाज होते हैं। वास्तव में गूगल के एडसेंस के लिये सपोर्टिंग भाषाओं की सूची में हिन्दी भाषा शामिल नहीं है (मई 2008 के पहले तक गूगल ने अपनी भाषा नीति में ढिलाई दे रखी थी इसलिये हिन्दी ब्लोग्स में एडसेंस विज्ञापन रहे थे और बाद में इस नीति को सख्त कर दिये जाने के कारण विज्ञापन आने बंद हो गये)

बहुत हद तक तो यही लगता है कि गूगल के सपोर्टिंग भाषाओं की सूची में नहीं होने के कारण ही हमें एडसेंस विज्ञापन नहीं मिल पा रहे हैं। यह भी हो सकता है कि गूगल हिन्दी के लिये अपने "बोट" को विकसित करने में लगा हो क्योंकि गूगल का बोट आपके पेज को पढ़ता है और उसमें सिर्फ उन विज्ञापनों को ही भेजता है जो कि आपके पेज के विषय से संबंधित हों याने कि यदि आपका पेज फर्नीचर के बारे में है तो गूगल उसमें केवल फर्नीचर्स के विज्ञापन भेजेगा। मई 2008 तक हिन्दी पेजेस में जो एडसेंस विज्ञापन रहे थे वे पेज के विषय से संबंधित विज्ञापन हो कर सिर्फ हिन्दी से संबंधित विज्ञापन हुआ करते थे। अब जबकि गूगल ने हिन्दी के अन्य भाषाओं में अनुवाद (http://translate.google.com) की टेक्नोलॉजी विकसित कर लिया है तो इस बात की बहुत अधिक संभावना है कि गूगल अपने बोट को हिन्दी सपोर्ट के लिये विकसित कर रहा हो। पर यह सिर्फ एक अनुमान है, सत्य क्या है यह तो सिर्फ गूगल ही जानता है।

क्या फिर हिन्दी ब्लोग्स में एडसेंस विज्ञापन आयेंगे?

बहुत अधिक संभावना तो इसी बात की है कि हिन्दी पेजेस में जल्दी ही एडसेंस विज्ञापन आने शुरू हो जायेंगे और वह भी आपके पेज के विषय से संबंधित। आज जब संसार की सभी बड़ी कंपनियों ने अपने हिन्दी साइट्स बना लिये हैं, फायरफॉक्स, गूगल क्रोम के हिन्दी संस्करण चुके हैं, भारत में इंटरनेट का प्रयोग दिन दूना रात चौगुना बढ़ते जा रहा है तो कोई कारण नहीं है कि गूगल भारत के विज्ञापनों से होने वाली कमाई से आँख फेर ले। एक प्रश्न के उत्तर में गूगल हेल्प ने कहा थाः


(AdSensePro Stephanie Google employee Jun 21, 1:14 am
From: AdSensePro Stephanie
Date: Fri, 20 Jun 2008 13:14:51 -0700 (PDT)
Local: Sat, Jun 21 2008 1:14 am
Subject: Re: Serving PSAs on unicoded (hindi) pages

If you haven't done so already, I'd encourage you to visit the AdSense
blog at adsense.blogspot.com to keep track of all the latest AdSense
news and updates. If we're able to expand our list of supported
languages, we'll be sure to post an announcement on our blog.)
(देखें: http://groups.google.com/group/adsense-help-features/browse_thread/thread/77476824e7119726/1916d587ba3f179b?lnk=gst&q=hindi#1916d587ba3f179b)

अभी पिछले हफ्ते ही गूगल ने अधिकारिक भाषाओं की लिस्ट में चार नई भाषाओं को जोड़ा है, देखें http://adsense.blogspot.com/2006/12/adsense-for-content-in-4-new-languages.html

तो हम भी उम्मीद कर सकते हैं कि जल्दी ही गूगल अपनी लिस्ट में हिन्दी को भी स्थान दे देगा और हमें विज्ञापन मिलने शुरू हो जायेंगे।

पर जब कभी भी हिन्दी ब्लोग्स में एडसेंस विज्ञापन आये तो याद रखें कि अपने स्वयं के ब्लोग के विज्ञापनों पर भूल कर भी न खुद क्लिक करना है और न ही किसी अन्य से क्लिक करवाना है।

Friday, December 19, 2008

मानो या ना मानो

या आप बता सकते हैं कि भारत का यह चित्र किस वस्तु से बना है?



आप सोच रहे होंगे कि ये ड्राइंग पेपर या प्लास्टिक के बना होगा। जी नहीं! आप गलत सोच रहे हैं। यदि मैं कहूँ कि इसे खाया जा सकता है तो आप समझेंगे कि मैं बकवास कर रहा हूँ। पर आपको जानकर आश्चर्य होगा कि ये केक हैं और शायद इन्हें खाया भी जा चुका होगा।

सौजन्यः Love Guru Yahoo Group

Wednesday, December 17, 2008

हमको जो कोई बूढ़ा समझे बूढ़ा उसका बाप

भाई अगर हम आप लोगों से कुछ साल पहले इस दुनियाँ में आ गये तो इसका मतलब यह तो नहीं हुआ कि आप हमें बूढ़ा बोलें। और यदि बोलते हैं तो बोलते रहिये हम कौन सा ध्यान देने वाले हैं? हम तो सिर्फ अपनी श्रीमती जी की बातों को ही मानते हैं जो कहती हैं कि 'अजी अभी कौनसे बूढ़े हो गये हैं आप?' (यदि हम बूढ़े हो गये तो वे भी तो बुढ़िया मानी जायेंगी और यह तो आप सभी जानते हैं कि कोई भी महिला बुढ़िया कहलाना तो क्या अपनी उम्र को जरा सा खिसकाना भी नहीं चाहेगी, उनका बस चले तो अपनी बेटी को भी अपनी छोटी बहन ही बताना पसंद करेंगी )। वास्तव में हमारा तो सिद्धांत ही है कि 'पत्नी को परमेश्वर मानो'। पत्नी के वचन ब्रह्मवाक्य हैं, पत्नी ने कह दिया याने परमेश्वर ने कह दिया (अब यह अलग बात है कि जब मूड में होती हैं तो यही गुनगुनाती हैं - मैं का करूँ राम मुझे बुड्ढा मिल गया)। अब देखिये ना, अमिताभ जी हमसे भी चार पाँच साल बड़े हैं पर उनको तो कोई बूढ़ा नहीं कहता। फिल्मों में तो वे अभी भी जवानों के जवान हैं। और यदि कहना ही था तो बुजुर्ग न कह कर "ओल्ड ब्वाय" कह लेते, आपकी मंशा भी पूरी हो जाती और हम भी खुश होते।

सत्यानाश हो इस अंग्रेजी का जिसके कारण सभी हमें अंकल पुकारते हैं। अब आप ही सोचिये कि यदि आपको कोई अंकल कहेगा तो क्या आपको अच्छा लगेगा? हमारे पिताजी के समय में तो उम्र में उनसे बहुत छोटे लोग भी उन्हें 'भैया' ही कहते थे, 'काका' नहीं। देखा जाये तो हमारे बुजुर्ग कहलाने में इस अंग्रेजी का ही सबसे ज्यादा हाथ है।

साठ साल की उम्र में भी अयोध्या नरेश दशरथ बूढ़े नहीं हुये थे तभी तो राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न का जन्म हुआ। सौ पुत्रों में से निन्यान्बे पुत्रों की मृत्यु के बाद जब अपना समस्त राजपाट छोड़ के विश्वामित्र तपस्या करने के लिये अपनी पत्नी के साथ वन में गये तब भी वे बूढ़े नहीं हुये थे क्योंकि उसके बाद भी उनके और पुत्र हुये। ययाति तो बूढ़े होने का शाप पाने के बाद भी जवान बने रहे, अपने पुत्र पुरु की जवानी लेकर। फिर हमने तो साठ को स्पर्श भी नहीं किया है पर लगे आप हमे बूढ़ा कहने।

बहुत बेइंसाफी है ये। कितने आदमियों ने हमें बुजर्ग कहा कालिया?

एक ने सरदार, कहा नहीं बल्कि चिट्ठा चर्चा में पोस्ट कर दिया और उसके समस्त पाठकगण के साथ ही साथ अन्य हिन्दी ब्लोगर्स ने मान भी लिया।

हूँऽऽऽ, इसकी सजा मिलेगी। जरूर मिलेगी। अरे ओ सांभा, जरा मेरा कम्प्यूटर तो लाना। हम भी अपने ब्लोग में लिखेंगे "हमको जो कोई बूढ़ा समझे बूढ़ा उसका बाप"

उपसंहार

हमारे दो बुजुर्ग ( हालाँकि ये दोनों शायद बुजुर्ग कहलाना पसंद न करें )
पढ़कर एक अच्छा मसाला मिल गया लिखने के लिये। वैसे हम क्यों बुजुर्ग कहलाना पसंद नहीं करेंगे? करेंगे और जरूर करेंगे। हमें 'सींग कटा कर बछड़ों में शामिल हो कर' जग हँसाई नहीं करवाना है। और फिर आज के जमानें में तो लोग बुजुर्ग को बुजुर्ग कहना भी नहीं चाहते। तो जब हमें यह सम्मान मिला है तो उसे क्यों न लें? वैसे लिखने के लिये मसाला सुझाने के लिये चिट्ठा चर्चा और विवेक जी को धन्यवाद!

सूझ शब्द से याद आया कि एक मित्र ने हमसे पूछ लिया, "यार, तुम ये सब लिख कैसे लेते हो?"

हमने कहा, "बस कलम उठाता हूँ और जो कुछ भी सूझता है लिख देता हूँ।"
(मेरा तात्पर्य है कि कम्प्यूटर में तख्ती नोटपैड खोलता हूँ और जो कुछ भी सूझता है लिख देता हूँ।)

"तब तो लिखना बहुत सरल काम है।"

"हाँ, लिखना तो बहुत सरल है पर यह जो सूझना है ना, वही बहुत मुश्किल है।"

Tuesday, December 16, 2008

वह देश कौन सा है?

पुकार कर अल्ला-हो-अकबर,
संबंध सुधारना चाहता है
ये कह कर कि 'लव्ह दाइ नैबर';
पर अपनी जमीं पे वो सदा
देता शरण आतंकवाद को,
घुसपैठियों को भेजकर
रहता खुश-ओ-आबाद जो।

वह देश कौन सा है?

रक्त की जिसको प्यास है,
कश्मीर जिसकी आस है,
ग्रस्त है हीन भावना से जो
पर 'दादाओं' का खास है;
कहता है खुद को नेक-ओ-मजहबी
पर कट्टरपंथ का दास है;
झूठ पे झूठ बोल कर जो
निकालता अपनी भड़ास है।

वह देश कौन सा है?

करतूत जिसकी सुधरी न तो
निश्चित सजा जो पायेगा
इक पग भी आगे जो बढ़ा
तो जान ही से जायेगा
कमजोर जो समझा हमें
तो ऐसी मुँहकी खायेगा
संसार के मानचित्र से
नक्शा जिसका मिट जायेगा।

वह देश कौन सा है?

Monday, December 15, 2008

इंटरनेट यूजर्स - भारत चौथे स्थान पर (हिन्दी ब्लोग्स की साख में भी वृद्धि)

विश्व भर के इंटरनेट यूजर्स के मामले में अब भारत का स्थान चौथा हो गया है। भारत में इंटरनेट यूजर्स की संख्या 88100000 (88.1 मिलियन) है। देखें: With 81 mn Net users, India gets 4th slot

टाप 10 दस देशों की लिस्ट इस प्रकार है:

यूनाइटेड स्टेट्स आफ अमेरिका 220 मिलियन यूजर्स
चीन 210 मिलियन यूजर्स
जापान 88.1 मिलियन यूजर्स
भारत 81 मिलियन यूजर्स
ब्राजील 53 मिलियन यूजर्स
यूनाइटेड किंगडम 40.2 मिलियन यूजर्स
जर्मनी 39.1 मिलियन यूजर्स
कोरिया 35.5 मिलियन यूजर्स
इटली 32 मिलियन यूजर्स
फ्रांस 31.5 मिलियन यूजर्स

यद्यपि लगता है कि 88.1 मिलियन एक बहुत बड़ी संख्या है पर देखा जाये तो भारत के 300 मिलियन कर्मचारियों की तुलना में भारत में इंटरनेट यूजर्स की तादात अभी बहुत कम है। लगता है कि भारत में अभी भी इंटरनेट सुविधा की कीमत अपेक्षाकृत ज्यादा है और इसी कारण से अधिकतर लोग अपने आफिस से या फिर साइबर कैफे से ही इंटरनेट का प्रयोग करते हैं। पर यह तय है कि निकट भविष्य में इस संख्या में इजाफा ही होना है। यदि जल्दी ही भारत का स्थान चौथे से पहले या कम से कम दूसरे में आ जाये तो यह कोई आश्चर्य की बात नहीं होगी।

अब यदि हम ब्लोग्स की भी चर्चा करें तो आपको जान कर खुशी होगी कि हिंदी ब्लोग्स का मान अब विश्व की निगाह में बढ़ता जा रहा है। सबूत के तौर पर देखें Blog it in Hindi, dude से एक उद्धरणः

When Amitabh Bachchan decided to write his blog in Hindi, it evoked mixed reactions everywhere; but not many know that Hindi blogging in recent times has reached such a height that it really doesn't need big names to endorse it.

(जब अमिताभ बच्चने अपने ब्लोग को हिंदी में लिखने का निश्चय किया तो सभी स्थानों में इसकी मिश्रित प्रतिक्रिया हुई, किन्तु अधिकतर लोग नहीं जानते कि वर्तमान समय में हिन्दी ब्लोगिंग इतनी ऊँचाई पर पहुँच चुकी है कि उसे अपने परिचय के लिये बड़े नामों की आवश्कता नहीं है।)
फिलहाल विश्व भर में ब्लोग्स की कुल संख्या 70000000 से अधिक है जिसमें से 15000000 सक्रिय ब्लोग्स हैं। देखें Blog Count for July: 70 million blogs। एक आकलन के अनुसार प्रतिदिन 120000 नये ब्लोग्स का निर्माण होता है।

अभी भी अन्य भाषाओं के ब्लोग्स तथा वेबसाइट्स की तुलना में हिन्दी ब्लोग्स की संख्या नगण्य ही है।

हिन्दी ब्लोग्स की संख्या कम होने के कुछ कारण ये भी हैं।

  • अभी भी अधिकतर लोगों को हिन्दी लेखन सॉफ्टवेयर्स की जानकारी नहीं है और वे चाह कर भी अपने हिन्दी के ब्लोग्स नहीं बना पाते।

  • अन्य भाषा के ब्लोगर्स का मुख्य उद्देश्य होता है अपने ब्लोग से कमाई करना जबकि हिन्दी ब्लोगर्स अपनी आत्म तुष्टि के लिये ब्लोगिंग करते हैं। यदि आत्म तुष्टि के साथ साथ ब्लोग्स से कुछ अतिरिक्त कमाई होने लगे तो निश्चित तौर पर हिन्दी ब्लोग्स की संख्या बढ़ेगी।

    (वैसे श्री दिनेशराय द्विवेदी के अंग्रेजी ब्लोग Law & Life को देख कर लगा कि अतिरिक्त कमाई के लिये द्विवेदी जी ने एक सार्थक पहल किया है। आखिर कब तक हिन्दी ब्लोगर्स बिना कमाई का लेखन करते रहेंगे, हिन्दी ब्लोग्स से कमाई नहीं तो अंग्रेजी ब्लोग्स से ही सही। वैसे मैंने भी इसी उद्देश्य से GKA's Blog बनाया है।)

  • अन्य भाषा में जो लोग स्वयं को लिखने में अक्षम पाते हैं वे लोग भी अन्य लेखकों से लेख खरीद कर या फिर आर्टिक डायरेक्टरीज़ से प्राप्त होने वाले मुफ्त लेखों का उपयोग कर के अपना ब्लोग बना लेते हैं जबकि हिन्दी में आर्टिकल डायरेक्टरी की सुविधा नहीं के बराबर है।

पर यह निश्चित है कि निकट भविष्य में हिन्दी ब्लोग्स की संख्या अवश्य ही बढ़ेगी।

अंत में:

मैं पहले भी बता चुका हूँ कि मैंने कृति निर्देशिका नामक हिन्दी आर्टिकल डायरेक्टरी का निर्माण किया है। चूँकि वह हिन्दी की डायरेक्टरी थी, गूगल महाराज ने उस पर कृपा की और उसका पेज रैंक 2 हो गया। नतीजे के रूप में उसमें अंग्रेजी के बहुत सारे लेख आने लग गये जिन्हें कि मैं, यह कारण बता कर कि यह डायरेक्टरी सिर्फ हिंदी के लेख स्वीकार करती है, सधन्यवाद प्रकाशन के लिये अस्वीकार कर दिया करता था। परिणाम स्वरूप पेज रैंक गिर कर 1 हो गया और वह डायरेक्टरी दम तोड़ने के कगार पर आ गई क्योंकि उसमें लेखों की संख्या बहुत कम थी (श्री जाकिर हुसैन रजनीश जी की दो कृतियों को छोड़ कर सिर्फ मेरी ही रचनाएँ है)। अंततः उसे मरने से बचाने के लिये मजबूरन मुझे उसमे एक अंग्रेजी लेख वर्ग बनाना तथा अंग्रेजी लेखों को स्वीकार करना पड़ा इससे डायरेक्टरी चल पड़ी (वर्तमान में उसमें 1500 से अधिक लेख हैं) और प्रतिदिन कुछ सेंट एडसेंस के द्वारा कमाई भी होने लगी। किन्तु मुझे दुःख है कि मैं अपनी डायरेक्टरी के लिये हिंदी रचनाएँ नहीं जुटा पाया। अपने समस्त ब्लोगर मित्रों से मैं एक बार फिर से आग्रह करता हूँ कि वे लोग कम से कम अपनी एक रचना (भले ही वह उनके ब्लोग में पूर्व प्रकाशित हो) कृति निर्देशिका को दान के रूप में दे दें जिससे कम से कम यह तो लगे कि ये हिन्दी की डायरेक्टरी है।

Saturday, December 13, 2008

Thursday, December 11, 2008

देश दो - करेंसी एक!

यद्यपि पाकिस्तान को 14th अगस्त, 1947 के दिन, अर्थात् भारत की स्वतंत्रता से एक दिन पूर्व, स्वतंत्रता प्राप्त हुई किन्तु करेंसी के मामले में उसे 30 September, 1948 तक भारत पर ही निर्भर रहना पड़ा था क्योंकि उस दौरान दोनों देशों के मुद्रा प्रबंधन का पूरा भार भारतीय रिजर्व बैंक पर ही था। देखें सन् 1947 के एक रुपये का चित्र जिसमें, Government of India के साथ ही साथ बायीं ओर, Government of Pakistan भी मुद्रित है।

Wednesday, December 10, 2008

कौन शूटर है असली हीरो?

एक शूटर अभिनव बिन्द्रा को दियाः
महाराष्ट्र नेः रु.10 लाख
हरयाणा नेः रु.25 लाख
पंजाब नेः रु.1 करोड़
बिहार नेः रु.11 लाख
छत्तीसगढ़ नेः रु.1 लाख
मध्यप्रदेश नेः रु.5 लाख
चंडीगढ़ नेः रु.5 लाख
तमिलनाडु नेः रु.5 लाख
उड़ीसा नेः रु.5 लाख
केन्द्रीय रेल मंत्री लालू प्रसाद नेः भारतीय रेल के पहले दर्जे में मुफ्त यात्रा का गोल्डन पास (जो आजीवन जारी रहेगा)
BCCI नेः रु.25 लाख का चेक
(टाइम्स आफ इंडिया समाचार)

दूसरा शूटर जो कि देश के हजारों लोगों की रक्षा करते हुये मर जाता है उसके परिवार को दिया जाता है रु.25 लाख
(जी न्यूज)

तो कौन शूटर है असली हीरो?

Monday, December 8, 2008

McClatchy समाचार - जीवित मुंबई हमलावर पाकिस्तानी है


(चित्र McClatchy समाचार के सौजन्य से)

McClatchy समाचार के अनुसार मुंबई हादसे के दौरान पकड़ा गया जीवित हमलावर पाकिस्तान पाकिस्तान के देपालपुर गाँव, जिला फरीदकोट का रहने वाला है तथा उसके वहाँ रहने की पुष्टि ग्रामीणों के द्वारा हो चुकी है। उक्तसमाचार में यह भी बताया गया है कि उसके पिता तथा माता का नाम मोहम्मद अमीर तथा नूर इलाही है।

इस समाचार को पाकिस्तानी ब्लोग "बैठक" मे बैठक ने भी अपने पोस्ट में दर्शाया है।

Friday, December 5, 2008

किसके प्रति रोष है लोगों का?

मुंबइ के हादसे के बाद लोगों में रोष तो है पर किसके प्रति है? आतंकवाद के प्रति या पाकिस्तान के प्रति या राजनीतिबाजों के प्रति या फिर स्वयं अपने ही प्रति कि आखिर हम क्यों कुछ कर नहीं पाये। सब कुछ गडमड सा हो गया है।

मानसिक हलचल में एकदम सही प्रश्न उठाया गया है कि आखिर घायलों के प्रति किसे सहानुभूति है। उनका हालचाल जानने के लिये न तो मोमबत्तियाँ जलाने वाले ही गये और न ही मीडिया गई। मीडिया तो सिर्फ लोगों के रोष को और भी हवा देने में लगी हुई है। लोगों और राजनीतिबाजों के बीच टकराव करवा के उन्हें नई नई स्टोरीज़ जो मिलेंगी। चौबीसों घंटे उन्हें अपना चैनल चलाना है तो दिखाने के लिये नई स्टोरीज़ भी तो चाहिये न?

रोष में आने से या फिर आपस मे कलह करने से कुछ भी नहीं होने वाला है। अब तो भैया यह सोचना है कि जो कुछ भी हुआ है वह फिर से भविष्य में फिर से न हो। भविष्य में आतंकवादी हमारी तरफ नजरें उठा कर देख भी न पायें। और यह तभी हो सकता है जब हम सभी मिलकर एक जुट हो पायेंगे।

Thursday, December 4, 2008

आम लोगों के लिये पेट्रोल महंगा क्यों?

संसार भर में मंदी के चलते कच्चे तेल की कीमत में भारी गिरावट आ गई है। जब कच्चे तेल की कीमत 147 डॉलर प्रति बैरल हो गई थी तो सरकार ने, यह कहकर कि कीमतें न बढ़ाने पर तेल कंपनियां तबाह हो जाएंगी, पेट्रोल-डीजल के दाम को बढ़ा दिया था। किन्तु आज जब कच्चे तेल की कीमत 48 डॉलर प्रति बैरल से भी कम हो चुकी हैं तो सरकार आज भी तेल कंपनियों को बढ़े दामों में पेट्रोल-डीजल क्यों बेचने दे रही है। तेल कंपनियाँ रु.35.00 की खरीदी वाले पेट्रोल को रु.50.00 प्रति लीटर में बेच रही हैं यानी कि 40% से भी अधिक मुनाफा कमा के।

जब दाम बढ़ने पर लोगों को पेट्रोल डीजल को महंगा किया जाता है तो कीमत घट जाने पर क्या सस्ता नहीं करना चाहिये?

Wednesday, December 3, 2008

प्लीज मुझे बचा लो मैं मरना नहीं चाहता

जब दूसरों की जान से खेलने वाले की अपनी जान पर बन आती है तो वह यही कहता है "प्लीज मुझे बचा लो। मैं मरना नहीं चाहता।" यही शब्द जिंदा पकड़े जाने वाले आतंकवादी के भी थे। अपनी जान बख्श देने की मिन्नत करते वक्त जरूर उसके जेहन में कहीं न कहीं रहा होगा कि ये लोग तो भारतीय हैं। सभी पर दया करने वाले। इन्हें तो हमेशा " अहिंसा परमो धर्मः" ही याद रहता है। पर उसे क्या पता कि गीता में श्री कृष्ण ने अर्जुन को यह उपदेश भी दिया है कि "जो तुझे मारे तू उसे मार!"

इन आतंकवादियों को तो यही लगता है कि "उनका खून खून है और दूसरों का पानी।"

अब उसे बचाया तो जरूर गया है किन्तु दया करके नहीं बल्कि कूटनीति के जन्मदाता चाणक्य की दी गई शिक्षाओं पर अमल करने के लिये। यह पता करने के लिये कि 170 से भी अधिक लोगों, जिनमें 40 मुस्लिम तथा 10 विदेशी नागरिक भी शामिल हैं, की जान से खेलने वालों के सहायकों में पाकिस्तानी सरकार भी है या नहीं या फिर पाकिस्तान, जैसा कि वह कहता है, वाकइ में निर्दोष है। और यदि पाकिस्तान उनके सहायकों में से है तो अब अपनी गलती को सुधारने के लिये अपराधियों को भारत के हवाले करता है या नहीं।

Monday, December 1, 2008

नेता जी का नियुक्तिपत्र

नेता जी ने माइक्रोसॉफ्ट के किसी पद में आवेदन के लिये अपना बायोडाटा भेजा।

कुछ रोज बाद उन्हें जवाब मिला जो कि नीचे दिया जा रहा हैः

Dear Mr. Neta Ji,

You do not meet our requirements. Please do not send any further correspondence.
No phone call shall be entertained.

Thanks
Bill Gates.

इस जवाब को पढ़कर नेता जी खुशी से उछल पड़े। उन्होंने तत्काल प्रेस कांफ्रेंस बुला कर कहा, "आप लोगों को जान कर खुशी होगी कि हम को अमरीका में नौकरी मिल गई है। अब हम आप सब को अपना नियुक्ति पत्र पढ़ कर सुनाते हैं। पर पत्र अंग्रेजी में है इसलिये साथ साथ हिन्दी में अनुवाद भी करते जायेंगे।

"Dear Mr. Neta Ji ----- प्यारे नेता जी

"You do not meet -----आप तो मिलते ही नहीं हैं

"our requirement ----- हमको जरूरत है

"Please do not send any further correspondence ----- अब लेटर वेटर भेजने की कोई जरूरत नहीं।

No phone call ----- फोन करने की भी जरूरत नहीं है

shall be entertained ----- बहुत खातिर की जायेगी।

Thanks ----- आपका बहुत बहुत धन्यवाद!

Bill Gates. ---- बिल गेट्स"

Saturday, November 29, 2008

युवकों को वहशी दरिंदे बनाने वाले होते हैं महाकायर

क्यों बार बार सामने आता है आतंकवाद का घिनौना चेहरा? क्यों होते हैं बमों के धमाके?

क्योंकि आज युवावर्ग दिशाहीन हो गया है और उसकी दिशाहीनता से अपना स्वार्थ सिद्ध करते हैं मानवता के घोर दुश्मन और मौत के सौदागर।

दिशाहीन युवकों को गलत दिशा में मोड़ कर और उनके भीतर नफरत का जहर भर कर उन्हें वहशी दरिंदे बना कर अनेक निरीह लोगों की हत्या करवाने तथा अंत में उन्हें कुत्ते की मौत मरने के लिये मजबूर कर देने वाले महाकायर होते हैं। वे वहशी दरिंदों को मरने मारने के लिये खुला छोड़ देते हैं किन्तु वे स्वयं मौत से इतना डरते हैं कि स्वयं चूहे की तरह बिलों में घुसे रहते हैं और कभी सामने नहीं आते। मानवता के इन दुश्मनों को किसी से भी प्रेम नहीं होता, स्वयं अपने देश से भी नहीं। उन्हें प्रेम होता है तो सिर्फ अपने तथा अपने स्वार्थ से।

Saturday, November 22, 2008

यदि कम्प्यूटर के हार्डड्राइव्ह्स न खुलें तो...

"मेरे कम्प्यूटर के हार्डड्राइव्ह्स नहीं खुल रहे हैं।" कल मेरे एक परिचित ने आकर मुझसे कहा, "क्या आप इसे ठीक कर सकते हैं?"

मैंने कहा, "चलिये देख लेते हैं।"

मैंने उनके कम्प्यूटर में जब माय कम्प्यूटर से किसी हार्डड्राइव्ह को खोलने की कोशिश की तो "ओपन विथ" वाला डॉयलाग बाक्स स्क्रीन पर दिखने लगा। मुझे सारा मामला समझ में आ गया और समस्या मात्र दो मिनट में सुलझ गई।

मेरे मन में विचार आया कि ऐसा कभी भी किसी के साथ हो सकता है। इसीलिये ये पोस्ट लिख मारा।

वास्तव में यह एक वायरस की करतूत है जो कि आपके कम्प्यूटर में जबरन autorun.inf नामक एक सिस्टम फाइल बना कर उसमें चुपचाप बैठ जाता है और उस फाइल को ऐसा छुपा देता है कि आपको खोजे न मिले।

इस समस्या से निजात पाने के लिये निम्न विधि अपनायें
  1. स्टार्ट/रन को क्लिक करके cmd टाइप करे और एन्टर बटन दबायें या ओ के को क्लिक करें।
  2. \cd टाइप करें।
  3. attrib -r -h -s autorun.inf टाइप करें।
  4. del autorun.inf टाइप करें। इससे c ड्राइव्ह में स्थित वायरस वाला फाइल डिलीट हो जायेगा।
  5. अब d: टाइप करें ओर स्टेप 4 तथा 5 को दुहरायें।
  6. इसी प्रकार से अन्य ड्राइव्ह्स के वायरस वाले autorun.inf को डिलीट कर लें।
बस आपकी समस्या सुलझ गई!

Monday, November 17, 2008

हमने भी खोल लिया अपना आनलाइन ई-बुक स्टोर

बहुत दिनों से जानने की इच्छा थी कि क्या वाकइ आनलाइन स्टोर से कुछ कमाया जा सकता है? इसीलिये आज से हमने भी अपना एक आनलाइन ई-बुक स्टोर खोल लिया है।

फिलहाल तो इस स्टोर में वे अंग्रेजी ईबुक्स ही हैं जो कि स्क्रिप्ट खरीदने के साथ मिली हैं किन्तु बहुत जल्दी ही इसमें अब हिन्दी के ईबुक्स भी डाल देने की योजना है। फिलहाल तो उपलबद्ध अंग्रेजी ईबुक्स की कीमत को मैंने बहुत कम कर दिया है।

तो यह है मेरा व्यावसायिकता की ओर बढ़ने का पहला कदम।

Saturday, November 15, 2008

ये चंदा रूस का ना ये जापान का


ये चंदा रूस का ना ये जापान का

ना ये अमरीकन प्यारे

ये तो है हिन्दुस्तान का!


जी हाँ, भारत का पहला मानव रहित अंतरिक्ष यान, चंद्रयान, 1, अंततः चंद्रमा की सतह पर पहुँच ही नहीं गया वरन भारतीय तिरंगे से चित्रित "प्रोब" को भी चांद की सतह पर रख दिया।

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के अनुसार भारतीय ध्वज के साथ चित्रित प्रोब ने दिनांक 14-11-2008 को भारतीय समय के अनुसार रात्रि 8-34 बजे (1504 GMT) चंद्रमा की सतह को छुआ।

हमारे वैज्ञानिकों ने ऐसे चन्द्रयान, जो कि चंद्रमा के वायुमंडल की संरचना को मापने सहित विभिन्न प्रयोगों के लिये सक्षम है, को सफलतापूर्वक चांद पर भेज कर साबित कर दिया है कि हमारा भारत भी किसी से कम नहीं है, निश्चित रूप से अब वह एक विश्व शक्ति के रूप में उभर रहा है।

चंद्रयान 1, जिसे कि भारतीय अंतरिक्ष केंद्र से प्रक्षेपित किया गया था, ने तीन हफ्ते पहले चंद्रमा की परिक्रमा करना आरम्भ किया था तथा दिनांक 14-11-2008 को भारतीय समय के अनुसार रात्रि 8-34 बजे 30kg वजन वाले तिरंगे से चित्रित प्रोब को चंद्रमा की सतह पर रख कर मिशन के पहले चरण का समापन किया।

Monday, November 10, 2008

आखिर हिन्दी ब्लोग्स सामान्य पाठकों को कब आकर्षित करेंगे?

हिन्दी ब्लोग्स की टिप्पणियों को पढ़ कर यही प्रतीत होता है कि को आज भी केवल हिन्दी ब्लोगर्स ही एक दूसरे के ब्लोग्स को पढ़ते हैं। सामान्य पाठकों का उनके प्रति कोई आकर्षण कहीं पर भी दृष्टिगत नहीं होता। यह बात तो है कि अभी भी भारत में इंटरनेट का प्रयोग अपेक्षाकृत बहुत कम है। किन्तु यह भी सत्य है कि "ब्लोग" से अब लोग अपरिचित नहीं रहे हैं। अमिताभ बच्चन साहब के ब्लोग(जो कि अंग्रेजी में है) की सैकड़ों टिप्पणियाँ, जो कि सामान्य वर्ग के लोगों के द्वारा की गई होती हैं, सिद्ध करती हैं कि पाठकों की संख्या इतनी भी नगण्य नहीं है कि हमें हिन्दी ब्लोग्स के लिये पाठक ही न मिल पायें। अतः लगता है कि यदि कोई खामी है तो कहीं न कहीं हमारे ब्लोग लेखन में ही है। अब समय आ गया है कि हम अपने लेखन की स्वयं ही समालोचना करें और खामियों को दूर कर के कुछ ऐसा लिखें जो कि आम लोगों को आकर्षित कर सके।

Saturday, November 8, 2008

लिख ले बेटा जो कुछ भी लिखना है! पर कोई पढ़ेगा तब ना?

बहुत दिन हो गये कुछ लिखे हुये। सोचा कुछ लिख लिया जाये। पर सूझ नहीं रहा था कि क्या लिखूँ। भीतर से आवाज आ रही थी कि लिख ले बेटा जो कुछ भी लिखना है! पर कोई पढ़ेगा तब ना?

मैने भी आवाज देने वाले से पूछा, "कोई क्यों नहीं पढ़ेगा?"

"तू अच्छी तरह से जानता है कि हर कोई सिर्फ अपनी पढ़वाना चाहता है, दूसरों की पढ़ना नहीं। तू ही दूसरों को कब कब पढ़ता है?"

"ऐसे में हिन्दी आगे कैसे बढ़ेगी?"

"तू क्यों फिकर कर रहा है? क्या तूने ठेका ले लिया है हिन्दी को आगे बढ़ाने का? तू तो बस ये सोच कि लोग तुझे कैसे पढ़ेंगे, छोड़ हिन्दी-विन्दी की फिकर।"

"अच्छा तो यही बता दो कि लोग मुझे पढ़ें इसके लिये मैं क्या करूँ?"

"ये तो तेरी समस्या है, इसे तू ही सुलझा। अपुन को नहीं पता कि लोग तुझे कैसे पढ़ेंगे।"

"अरे कुछ तो बता।"

कोई जवाब नहीं....

"बता भी ना यार।"

फिर वही चुप्पी ....

फिर हमने भी सोच लिया कि लिया कि लिखेंगे जरूर पर किसी को पढ़वाने के लिये नहीं, अपनी संतुष्टि के लिये। आखिर तुलसीदास जी ने भी तो "स्वांतः सुखाय" लिखा था, किसी को पढ़वाने के लिये नहीं। तो हमें भी क्या उनका अनुसरण नहीं करना चाहिये?

Sunday, July 20, 2008

सारे ब्लोगर्स हमें बहुत याद आये

लगभग एक महीने बाद आप सब से बतियाने का मौका मिला है, और आगे कब मिलेगा अभी तय नहीं है। वो क्या है कि हमारे कम्प्यूटर जी "घुच्च" हो गये। जो बैठे कि उठने का नाम नहीं ले रहे हैं। हमने भी सोच लिया है कि "बच्चू, बैठे रहो, अब हम तुम्हारी मरम्मत न करवा कर नया ही लायेंगे"। और अपने इस जिद में आप सब से जुदाई मोल ले ली है। पर अब हमें पता चल रहा है कि अपने लोगों से दूर होने में क्या दर्द होता है। बार बार ये गीत याद आते है कि "न पूछो ये दिन हमने कैसे बिताये, सारे ब्लोगर्स हमें बहुत याद आये", "तुझे खो दिया हमने पाने के बाद, तेरी याद आई तेरे जाने के बाद", "तेरा जाना, दिल के अरमानों का खो जाना..."

आज हमें एक मित्र के सौजन्य से आप लोगों से मुलाकात करने का अवसर मिल गया है तो सोचा कि सूचना के तौर पर एक छोटा सा पोस्ट लिख मारें। अब कौन जाने कितने दिन और आप लोगों से दूर रहना पड़े।

ऐसा भी नहीं है कि हमें नेट पर आने का मौका न मिल रहा हो। नेट पर आने का मौका तो मिलता है पर इतने अधिक देर के लिये नहीं कि आप लोगों से रू-ब-रू हो पायें, सिर्फ अपना मेल-वेल देख लेते हैं और आप सभी लोगों के पोस्ट्स के कम से कम हेडिंग्स भी देख लिया करते हैं एग्रीगेटर्स में जा कर।

तो अगला अवसर मिलने तक के लिये फिलहाल अलविदा।

Sunday, June 22, 2008

क्या वास्तव में स्त्री देह है?

हमारी अल्पज्ञता स्पष्ट रूप से झलकती है अनुजा जी के इस कथन से कि "देह से आगे भी स्त्री होती है या होगी इस सोच-समझ को विकसित होने में अभी कितनी और सदियां और लगेंगी कुछ कहा नहीं जा सकता।"

हमें कम से कम इस बात का ज्ञान तो होना ही चाहिये कि भारत में सदियों से स्त्री को देह से कहीं बहुत आगे माना जाता रहा है। यह सही है कि भारतीय समाज में महिलाओं का दर्जा अलग-अलग समय में अलग-अलग तरह का रहा है किन्तु यह भी सत्य है कि अत्यन्त प्राचीन युग से ही भारतवर्ष में महिलाओं का उच्च स्थान रहा है। वे लक्ष्मी, सरस्वती, दुर्गा, काली आदि देवियों के रूप में पूजी जाती रही हैं। पतञ्जलि तथा कात्यायन की कृतियों में स्पष्ट उल्लेख है कि वैदिक युग में शिक्षा के क्षेत्र में महिलाओं का समानाधिकार था। ऋग् वेद की ऋचाएँ बताती हैं कि महिलाओं को अपना वर चयन करने का पूर्ण अधिकार था और उनका विवाह पूर्ण वयस्क अवस्था में हुआ करता था। नारी पुरुष से अधिक शक्तिशाली थी, है और रहेगी। शिव में सामर्थ्य नहीं था महिषासुर के वध का, सिर्फ काली ही उसे मार सकती थी। महिषासुर वध कथा में महिषासुर बुराई का प्रतीक है। ये कथा संदेश देती है कि बुराई को दूर करने में पुरुष की अपेक्षा नारी अधिक सक्षम है।

सदियों से नारी, कहीं प्रत्यक्ष तो कहीं परोक्ष रूप में, पुरुष की प्रेरणा रही है। इतिहास साक्षी है कि पुरुष के द्वारा किये गये प्रत्येक महान कार्य के पीछे उसकी प्रेरणा नारी ही रही है। यदि रत्नावली ने "लाज न आवत आपको..." न कहा होता तो हम आज "रामचरितमानस" जैसे पावन महाकाव्य से वंचित रह जाते। नारी के द्वारा किसी व्यक्ति, समाज और यहाँ तक कि राष्ट्र के विचारों में आमूल परिवर्तन कर देने का प्रत्यक्ष उदाहरण शिवाजी की माता जिजाजी हैं।

भारतीय संस्कृति में सदैव नारी को श्रेष्ठ माना गया है। ' से आगे भी स्त्री होती है या होगी इस सोच-समझ को विकसित होने में अभी कितनी और सदियां और लगेंगी कुछ कहा नहीं जा सकता' जैसे सोच के लिये न तो मैं अनुजा जी की आलोचना कर रहा हूँ और न ही उन्हें गलत निरूपित कर रहा हूँ। मैं तो सिर्फ यह कहना चाहता हूँ कि इस प्रकार की गलत धारणा के लिये हमारी अशिक्षा और अल्प-शिक्षा ही दोषी है। हम अपनी संस्कृति को भूल चुके हैं। हमारी शिक्षा नीति हमें अपने संस्कृति के अध्ययन से वंचित रखती है। हमारी संस्कृति में अन्य संस्कृतियों की मिलावट हो गई है और इसका परिणाम है गलत धारणाओं का बनना। मध्य युग में हमारी संस्कृति में मुगल संस्कृति के मिलावट के परिणामस्वरूप बाल विवाह, सती प्रथा, विधवा-विवाह का निषेध आदि कुप्रथाओं का प्रचलन हुआ और आज हमारी संस्कृति में पश्चिमी संस्कृति के मिलावट के कारण अनेक प्रकार के भ्रम उत्पन्न हो रहे हैं। आज स्त्री को हेय, तुच्छ या देह समझना सिर्फ शिक्षा के सही प्रकार से विकास न होने कारण ही है।

Saturday, June 21, 2008

लड़कियों की पहली पसंद टपोरी लड़के

लड़कों को लड़कियों से दोस्ती करनी हो तो उन्हें ज्यादा टेंशन लेने की जरूरत नहीं है। टपोरी बनो, गंदी आदतें डालो, खराब व्यहार करो और लड़कियाँ आगे-पीछे घूमेंगी। वैज्ञानिकों ने अपने शोध के आधार पर बताया कि बुरे आचरण वाले लड़कों की ज्यादा लड़कियों से दोस्ती होती है। अध्ययन के दौरान उन्होंने पाया कि छली-कपटी, असंवेदनशील और घमंडी लड़कों के साथ लड़कियों की अच्छी पटती है।

जापान के क्योटो में मानवीय व्यवहार और सामाजिक क्रांति विषय को लेकर हुई बैठक में एक रिपोर्ट पेश की गई जिससे स्पष्ट होता है कि बुरी आदत-व्यवहार वाले व्यक्तियों के अंदर सेक्स की गुणवत्ता अधिक होती है। लॉस क्रूसेस के न्यू मेक्सिको सटेट यूनिव्हर्सिटी के अध्ययनकर्ता पीटर जेम्स ने कहा कि तथ्य का सत्यापन जेम्स बांड से होता है। वे बहुत ही बहिर्मुखी हैं और दूसरे का कत्ल भी आसानी से कर देते हैं लेकिन वे लड़कियों के बीच चर्चा का विषय हैं।

इलिनॉक्स प्रांत के ब्रेडले यूनिव्हर्सिटी की फैकल्टी डेविड स्मिट ने 57 देशों के 35,000 लोगों का सर्व्हे किया। उन्होंने पाया कि बुरी आदतों वाले पुरुषों का महिलाओं पर अच्छा प्रभाव पड़ता है और उनकी थोड़े समय की दोस्ती हमेशा सफल रहती है। अध्ययन से प्राप्त परिणामों के आधार पर उन्होंने कहा कि खराब प्रवृति के व्यक्ति गलत ढंग से दूसरे की प्रियतमा के साथ संबंध जोड़ना चाहते हैं। जॉनसन ने अपनी टीम के साथ मिल कर 200 कालेजों के विद्यार्थियों का परीक्षण किया। उन्होंने देखा कि बुरे आचरण करने वाले लड़कों की सहेलियाँ अधिक थीं। और ऐसे लड़कों को थोड़े समय के लिये रिश्ता कायम करना काफी पसंद था। उनकी रिपोर्ट को न्यू साइंटिस्ट पत्रिका में प्रकाशित किया गया। हालाकि इस व्यक्तित्व और आदत का मेल सिर्फ लड़कों में ही होता है, बुरे आचरण वाली लड़कियाँ लड़कों से उतनी अधिक प्रभावित नहीं होतीं।

(नव-भारत रायपुर से साभार)

Friday, June 20, 2008

हिममानव - वास्तविकता या कपोल कल्पना?

ब्रिटेन के डर्बीशायर इलाके की एक महिला ने यती का एक चित्र जारी किया है। यह चित्र उसने कथित तौर पर हिमालयवासियों के आँखों देखे विवरण के आधार पर बनाया है। यती यानी हिम मानव एक ऐसा जीव है जिसके बारे में ढेरों किंवदंतियाँ हैं और अब तक इसकी कोई तस्वीर नहीं है। वैज्ञानिक इस विवरण को दिलचस्पी के साथ देख रहे हैं जिसे इस महिला ने जारी किया है।

वेबदुनिया में इस समाचार को पढ़ कर विचार आया कि वास्तव में हिम मानव होते हैं या ये केवल कपोल कल्पना है? बचपन से ही रहस्यमय हिममानव के विषय में सुनते और पढ़ते आया हूँ। दिसम्बर 2007 में टीवी पर प्रसारित होने वाले कार्यक्रम “.डेस्टीनेशन ट्रुथ” में दावा किया गया था कि उन्होंने मंजू नदी के किनारे 2,850 मीटर की उंचाई पर येती के पदचिन्ह खोज निकाला है। उनका कहना था कि उन्हें येती (हिममानव) के तीन पद चिह्न मिले हैं।

येति नाम से जाने जाने वाले हिममानव को देखने का दावा सैकड़ों लोग करते हैं। दावा करने वालों के अनुसार हिममानव नौ फीट लंबा, भारी-भरकम (200 किलो के करीब वजन वाला) तथा घने बालों से युक्त प्राणी होता है जो मनुष्य की तरह दो पैरों पर चलता भी है। शेरपा के दो शब्दों "येह" और "तेह" से मिलकर "येति" शब्द बना है। येह का अर्थ है "चट्टान" और तेह का "जंतु", अर्थात् "येति" का अर्थ हुआ "चट्टान का जंतु"।

सन् 1832 में हिममानव के बारे में पहली बार विवरण मिलने के बाद से अब तक इस विषय में सैकड़ों कथा-कहानियाँ प्रचलन में आ चुकी हैं, कई रोचक फिल्में बन चुकी हैं और अनेकों पुस्तकें लिखी जा चुकी हैं। किन्तु आज तक सही प्रकार से पता नहीं चल पाया है कि हिममानव वास्तविकता है या कपोल कल्पना?

Saturday, June 14, 2008

क्या आप MRP से अधिक दाम देकर चीजें खरीदते हैं?

आपको MRP से अधिक दाम देकर खरीदी करनी होगी यदि आप छत्तीसगढ़ आये तो। जी हाँ, पूरे छत्तीसगढ़ में एक रुपये से कम वाले सिक्के नहीं चलते।

छत्तीसगढ़ में आप किसी दुकानदार को रेजगारी के साथ साढ़े तीन रुपये देकर एक विल्स सिगरेट मांगेंगे तो वह आपको नहीं देगा। वो आपसे सिगरेट की कीमत चार रुपये मांगेगा (जो कि MRP से अधिक है)। या कहेगा कि सात रुपये देकर दो विल्स ले लो। एक रुपये से कम वाले सिक्के तो वह किसी कीमत पर आपसे नहीं लेगा। आप जिद करेंगे तो कहेगा चार रुपये देकर एक विल्स सिगरेट के साथ एक टॉफी ले लो। आपको टॉफी की कतइ जरूरत नहीं है पर आपको लेना होगा

बहस झंझट से हर आदमी बचना चाहता है इसलिये अधिकतर लोग खुदरा पैसों की चिन्ता नहीं करते और दुकानदार को वो खुदरा पैसे मुफ्त में मिल जाते हैं। अब जरा सोचिये यदि एक दुकानदार एक दिन में 2-3 हजार सिगरेट बेचता है तो वह लोगों से दिन भर में हजार-डेढ़ हजार रुपये जबरन वसूली कर लेता है क्योंकि उसे प्रति सिगरेट आठ आने अधिक मिलते हैं।

चार साल पहले मैं परिवार के साथ पचमढ़ी भ्रमण के लिये गया था तो उस समय महाराष्ट्र में मुझे खरीदी के समय वापसी में चवन्नी, अठन्नी आदि खुदरा सिक्के मिले थे (अब मैं वहाँ के दुकानदारों से खुदरा पैसे लेने के लिये मना तो नहीं कर सकता था)। आज भी वे सिक्के मेरे पास बेकार पड़े हैं क्योंकि वे छत्तीसगढ़ में नहीं चलते। अब उसे यदि चलाना है तो मुझे छत्तीसगढ़ से बाहर जाना होगा।

क्यों नहीं चलते खुदरा सिक्के छत्तीसगढ़ में?

इस प्रश्न का जवाब मुझे कुछ भी नहीं सूझता। यदि कोई इसका उत्तर जानता हो तो कृपया बताने का कष्ट करें।

Sunday, June 8, 2008

कैसे मान लें कि पिछले माह आप जिंदा थे?

हमने बड़े बाबू को अपना लाइफ सर्टिफिकेट दे कर कहा, "बड़े बाबू, बाहर चले जाने के कारण पिछले माह का पेंशन नहीं ले पाया था, दोनों माह का पेंशन बना दीजिये।"

बड़े बाबू ने लाइफ सर्टिफिकेट का मुआयना किया फिर बोले, "अरे! ये तो इस माह का लाइफ सर्टिफिकेट है, पिछले माह का लाइफ सर्टिफिकेट कहाँ है?"

"भइ, जब मैं इस माह जिंदा हूँ तो निश्चित है कि पिछले माह भी जिंदा था।" हमारा तर्क था।

"कैसे मान लें कि पिछले माह आप जिंदा थे? सबूत कहाँ है आपके पिछले माह जिंदा होने का?" बड़े बाबू ने कहा।

"अरे भाई, जब मैं अभी आपके सामने जीता-जागता खड़ा हूँ, तो पिछले माह मरा हुआ कैसे हो सकता था?" हमने भी तर्क किया।

"देखिये साहब, कुछ नियम-कानून होते हैं। जब कानून यह है कि जिंदा रहने के सबूत के लिये लाइफ सर्टिफिकेट पेश करना चाहिये तो आपको सर्टिफिकेट पेश किये बिना पेंशन नहीं मिल सकता। आप इस माह का पेंशन ले सकते हैं पर पिछले माह का पेंशन लेने के लिये आपको उस माह का लाइफ सर्टिफिकेट लाना ही होगा।"

यहाँ मैं यह स्पष्ट कर दूँ कि उपरोक्त घटना के विषय में मझे बहुत पहले एक पेंशनर सज्जन ने बताया था। उन दिनों पेंशन लेने के लिये हर माह लाइफ सर्टिफिकेट प्रस्तुत करना पड़ता था। आजकल साल में एक बार ही लाइफ सर्टिफिकेट देना होता है।

ऐसे और भी कई नियम हैं जो कि परेशानी बढ़ाते हैं। आप मकान बनाने के लिये कर्ज लेते हैं तो कर्ज की रकम पाने के लिये आर्किटेक्ट से सर्टिफिकेट ले कर पेश करना जरूरी है जिसके लिये आपको अतिरिक्त पैसे खर्च करने पड़ते हैं। किसी सक्षम अधिकारी द्वारा मकान बनने के प्रोग्रेस का निरीक्षण से काम नहीं चल सकता। यह भी हो सकता है कि आप मकान बनवायें ही नहीं पर आर्किटेक्ट का सर्टिफिकेट दे कर कर्ज की रकम प्राप्त कर लें। आप किराये के मकान में रहते हैं, बिजली बिल आपके मकान मालिक के नाम से आता है, और आपके यहां फोन भी नहीं लगा है तो बिजली बिल या फोन बिल न होने के कारण आपका एड्रेस प्रूफ नहीं हो सकता और बैंक में खाता खोलना, कर्ज प्राप्त करना जैसे आपके कई महत्वपूर्ण कामों में रुकावट आ सकती है।

अभी हमारे शहर में एक संकरे सड़क को बीच में खोद कर डिव्हाइडर बनाया जा रहा है, उसका चौड़ीकरण बाद में होगा। जनता को भले ही परेशानी हो, डिव्हाइडर पहले बनाया जायेगा और चौड़ीकरण बाद में होगा। शायद डिव्हाइडर बनाने वाले ठेकेदार की पहुँच ज्यादा हो और उसने सड़क चौड़ीकरण हेतु रकम स्वीकृत होने के पहले ही डिव्हाइडर बनाने हेतु रकम स्वीकृत करवा लिया हो। अब जिस काम के लिये पहले सैंकशन मिला हो वह काम तो पहले ही होगा।

Saturday, June 7, 2008

वेब में प्रोफेशनल की परिभाषाएँ

द्विवेदी जी के ब्लॉग की प्रविष्टियों ने "प्रोफेशनल" होने के प्रति जिज्ञासा को प्रबल कर दिया और यह जानने की उत्सुकता हुई कि इस विषय में वेब क्या कहता है। वेब में किसी विषय की परिभाषाओं को जानने के लिये गूगल सर्च इंजिन एक बहुत अच्छा साधन है। मैंने गूगल सर्च इंजिन में define:professional टाइप कर के खोजा तो निम्न परिणाम मिले (मैंने यथासम्भव हिन्दी अनुवाद भी कर दिया है):

Definitions of professional on the Web:
[वेब में प्रोफेशनल की परिभाषाएँ:]

* engaged in a profession or engaging in as a profession or means of livelihood; "the professional man or woman possesses distinctive qualifications ...
* a person engaged in one of the learned professions
* an athlete who plays for pay
* engaged in by members of a profession; "professional occupations include medicine and the law and teaching"
* master: an authority qualified to teach apprentices

[किसी प्रोफेशन मे लगना या लगे रहना या आजीविका प्राप्ति का साधन; "प्रोफेशनल पुरुष या महिला के पास विशेष योग्यताएँ होती हैं ...
एक व्यक्ति जो किसी दक्ष प्रोफेशन में लगा हो।
एक खिलाड़ी जो भुगतान हेतु खेलता है।
किसी प्रोफेशन के सदस्य के रूप में लगना; "प्रोफेशनल कारोबार में चिकित्सा, विधि और शिक्षण सम्मिलित हैं।
महारथी (master): नौसिखियों को सिखाने के लिये एक योग्य अधिकारी]
wordnet.princeton.edu/perl/webwn

* A professional can be either a person in a profession (certain types of skilled work requiring formal training / education) or in sports (a sportsman / sportwoman doing sports for payment). Sometimes it is also used to indicate a special level of quality of goods or tools.

[प्रोफेशनल एक व्यक्ति होता है जो या तो किसी प्रोफेशन (कोई कुशलतापूर्वक किया जाने वाला कार्य जिसके लिये औपचारिक प्रशिक्षण/शिक्षण की आवश्यकता होती है) में लगा होता है या फिर (एक खिलाड़ी पुरुष या महिला, जो कि भुगतान के लिये खेले, के द्वारा खेले गये) खेलों में लगा होता है।]
en.wikipedia.org/wiki/Professional

* A player who receives payment for teaching or playing in tournaments. Usually shortened to Pro.

[एक खिलाड़ी जो खेल प्रतियोगिताओं (tournaments) में खेलने या शिक्षण देने के लिये भुगतान प्राप्त करता है। सामान्यतः छोटे रूप में प्रो कहलाता है।]
www.worldgolf.com/wglibrary/reference/dictionary/ppage.html

* Occupations that require knowledge in a field of science or learning typically acquired through education or training pertinent to the specialized field, as distinguished from general education. ...

[कारोबार जिसके लिये विज्ञान के क्षेत्र में ज्ञान या शिक्षण अथवा प्रशिक्षण के द्वारा उपयुक्त विशिष्ट क्षेत्र में विशेष अध्ययन की आवश्यकता होती है, जो कि सामान्य शिक्षा से हट कर होती है ...]
www.opm.gov/feddata/demograp/PartThree.doc

* work which requires the application of theories, principles and methods typically acquired through completion of a baccalaureate degree or higher or comparable experience; requires the consistent exercise of discretion and judgement in the research, analysis, interpretation and application of ...

[ऐसा कार्य जिसके लिये स्नातक उपाधि या उच्चतर या समकक्ष अनुभव के समाप्ति के पश्चात् विशेष रूप से अर्जित किये गये सिद्धांतों, नियमों तथा विधियों के अनुप्रयोग की आवश्यकता होती है; शोध, विश्लेषण, कर्म की व्याख्या आदि के लिये विवेकाधिकार और निर्णय के दृढ़ अभ्यास की आवश्यकता होती है।]
www.state.wv.us/ADMIN/PERSONNEL/clascomp/Docs/define.htm

* (pro·fes·sion·al) (pro-fesh´ə-nəl) 1. pertaining to one's profession or occupation. 2. one who is a specialist in a particular field or occupation.

[1. अपने प्रोफेशन या कारोबार से सम्बन्धित होना। 2. ऐसा व्यक्ति जिसे किसी विशेष क्षेत्र या कारोबार में विशिष्टता प्राप्त हो।]
www.mercksource.com/pp/us/cns/cns_hl_dorlands.jspzQzpgzEzzSzppdocszSzuszSzcommonzSzdorlandszSzdorlandzSzdmd_p_35zPzhtm

* A person who practices an occupation involving high standards of intellectual knowledge after successfully completing the required education and training.

[ऐसा व्यक्ति जो उपयुक्त शिक्षण और प्रशिक्षण की सफलता के पश्चात् उच्च मानदण्डों वाले बौद्धिक ज्ञान का अभ्यास करता है।]
www.faststart.state.ri.us/bfs_glossary.html

उपरोक्त परिभाषाओं से इतना तो स्पष्ट है कि प्रोफेशनल होने के लिये विशिष्ट शिक्षण, प्रशिक्षण तथा अभ्यास की आवश्यकता होती है।

कुछ परिभाषाओं में प्रोफेशन का भुगतान से सम्बन्ध भी बताया गया है। मेरा भी यही मानना है कि न केवल "प्रोफेशन" का बल्कि उसके साथ "बिजनेस" और "सर्व्हिस" शब्दों का भी सीधा सम्बन्ध भुगतान या कमाई से होता है। क्यों हम अपने बच्चों को सफल व्यापारी बनाना चाहते हैं? ताकि उन्हें प्रतिफल के रूप में उपयुक्त आजीविका, मान-सम्मान और नाम प्राप्त हो। क्यों हम अपने बच्चों को चिकित्सा या विधि आदि की उच्च शिक्षा दिलवाते हैं? ताकि वे सफल प्रोफेशनल बनें और उन्हें प्रतिफल के रूप में उपयुक्त आजीविका, मान-सम्मान और नाम प्राप्त हो। क्यों हम अपने बच्चों को इंजीनियरिंग, कम्प्यूटर साइंस आदि की उच्च शिक्षा दिलवाते हैं? ताकि उन्हें उच्च पदों वाली नौकरियाँ मिलें और प्रतिफल के रूप में उपयुक्त आजीविका, मान-सम्मान और नाम प्राप्त हो।

हमारी प्रथम आवश्यकता "आजीविका" है और आजीविका कमाई से चलती है। आजीविका के बाद दूसरी आवश्यकता उस आजीविका की सुरक्षा होती है। आज के खर्च चलाने लायक कमाई कर लेने के बाद आदमी कल की आजीविका को भी सुरक्षित देखना चाहता है। इसीलिये वह आजीविका का स्थाई साधन (सरकारी या अच्छे संस्थान में नौकरी, जमा-जमाया बिजनेस या प्रोफेशन आदि) पाने का प्रयास करता है। मान-सम्मान, नाम कमाना आदि इसके बाद ही आता है। यदि अन्य साधनों से हमारी कमाई इतनी न हो कि हम कम्प्यूटर, इंटरनेट आदि का खर्च न उठा पायें तो लाख योग्यताएँ होने के बावजूद भी हम चिट्ठाकारी नहीं कर सकते।

यदि हम अपना पसीना बहा कर कमाये गये रकम को चिट्ठाकारी के लिये खर्च करते हैं, अन्य महत्वपूर्ण कार्यों से समय निकाल कर उस समय को चिट्ठाकारी के लिये देते हैं तो उसके प्रतिफल के रूप में हमें अवश्य ही कमाई की कामना भी होनी चाहिये, तभी चिट्ठाकारी प्रोफेशनल हो पायेगी अन्यथा वह केवल शौकिया ही बनी रहेगी।

Friday, June 6, 2008

अभी बहुत समय लगेगा हिन्दी चिट्ठाकार को प्रोफेशनल बनने में

"चिट्ठाकारी तो अभी शौकिया ही रहेगी"

उपरोक्त वाक्यांश श्री दिनेशराय द्विवेदी जी के पोस्ट 'चिट्ठाकारों के लिए सबसे जरुरी क्या है?' में श्री नीरज रोहिल्ला द्वारा की गई टिप्पणी का अंश है। यह वाक्यांश एक बहुत बड़े सत्य को उद्घाटित करता है। वास्तव में हिन्दी चिट्ठाकारी 'शौकिया' है और अभी बहुत दिनों तक 'शौकिया' ही रहेगी क्योंकि हिन्दी चिट्ठाकार केवल अपने लिये (या अपने जैसे चिट्ठाकारों के) लिये लिखता है न कि पाठकों के लिये। और इसीलिये हिन्दी चिट्ठों के पाठक भी आम लोग नहीं बल्कि सिर्फ हिन्दी चिट्ठाकार ही होते हैं। गौर करने वाली बात यह है कि वकील का मुवक्किल वकील ही नहीं होता, डॉक्टर का मरीज डॉक्टर ही नहीं होता किन्तु हिन्दी चिट्ठाकार का पाठक हिन्दी चिट्ठाकार ही होता है।

ऐसे बहुत कम वकील मिलेंगे जो केवल शौक के लिये वकालत करते हैं, ऐसे बहुत कम डॉक्टर मिलेंगे जो केवल शौक के लिये डॉक्टरी करते हैं पर ऐसे बहुत से चिट्ठाकार मिलेंगे जो केवल शौक के लिये चिट्ठाकारी करते हैं। 'वकालत' एक प्रोफेशन है, 'डॉक्टरी' एक प्रोफेशन है, 'अंग्रेजी और अन्य भाषा में चिट्ठाकारी' भी एक प्रोफेशन है क्योंकि इनसे अनेकों लोगों की आजीविका चलती है किन्तु हिन्दी चिट्ठाकार की आजीविका 'हिन्दी चिट्ठाकारी' से नहीं चलती इसलिये 'हिन्दी चिट्ठाकारी' प्रोफेशन नहीं है। हिन्दी चिट्ठाकार 'चिट्ठाकारी' को अपने आय का साधन नहीं समझता। भले ही वह यह समझता है कि चिट्ठाकारी से कुछ कमाई भी हो जाये तो अच्छा है किन्तु वह चिट्ठाकारी को केवल कमाई का साधन ही नहीं समझता, क्योंकि चिट्ठाकारी उसका शौक है प्रोफेशन नहीं। हिन्दी चिट्ठाकार की यह सोच आनन-फानन में तुरन्त बदल जाने वाली नहीं है इसलिये अभी हिन्दी चिट्ठाकार को प्रोफेशनल बनने में बहुत समय लगेगा।

Thursday, June 5, 2008

गैस-डीजल-पेट्रोल

और भी मँहगी हो गईं गैस-डीजल-पेट्रोल।
खर्च बढ़ी दस फीसदी अकल हो गई गोल॥
अकल हो गई गोल कुछ भी समझ न आये।
सभी रहे हैं सोच कैसे जायें क्या खायें?
साइकिल ले लें आज से खायें छोटे कौर।
भूलें सपना कार का मँहगाई बढ़ गई और॥

Sunday, June 1, 2008

आत्माओं से बातचीत

बात सन् 1967 की है। मेरे पूज्य पिताजी को कहीं से आत्माओं से बातचीत (planchette) करने की विधि का पता चला। मैंने हायर सेकेंडरी (ग्यारहवी कक्षा) की परीक्षा दी थी और गर्मी की छुट्टियाँ मना रहा था। पिताजी ने अपनी स्कूल टीचर की नौकरी किसी कारणवश छोड़ दी थी अतः उनकी भी छुट्टियाँ ही थीं। एक दिन दोपहर को आत्माओं से बातचीत करने का प्रयोग करने का निश्चय किया गया। पिताजी ने एक कार्ड बोर्ड पर प्लेंचेट चार्ट बनाया। कमरे के एक फर्श को गंगाजल छिड़क कर पवित्र किया और उस पर प्लेंचेट चार्ट रख दिया। अगरबत्ती जला कर पूजा करने के बाद प्लेंचेट के बीचोबीच तांबे की एक ढिबरी रखी और उस पर मैं, पिताजी और मेरी दादी माँ ने तर्जनी उंगली रख दिया। मेरी माँ तथा अन्य भाई-बहन दर्शक के रूप में कमरे में बैठे थे। सभी मौन थे और वातावरण एकदम शांत था। पिताजी ने मन ही मन आत्मा का आह्वान करना शुरू किया। कुछ ही देर में हम सभी आश्चर्यचकित रह गये क्योंकि ढिबरी प्लेंचेट चार्ट पर घूम रही थी।
Planchette Chart

पिताजी ने कहा, "क्या पवित्र आत्मा आ चुकी है?" और जवाब में ढिबरी yes लिखे हुये गोले पर पहुँची और फिर वापस अपने नियत स्थान पर आ गई। उसके बाद पिताजी ने लगभग एक-डेढ़ घंटे तक आत्मा से अनेकों प्रश्न पूछे। जवाब में ढिबरी एक के बाद एक अंग्रेजी के अक्षरों तक जाती और एक शब्द बन जाने के बाद अपने नियत स्थान पर वापस आ जाती। इस प्रकार शब्द और वाक्य बनते जाते थे तथा प्रश्नों के उत्तर मिलते जाते थे। आत्मा से मिले प्रश्नों के कुछ उत्तर सही लगे थे किन्तु प्रायः उत्तर गलत थे।

प्रयोग समाप्त करने के बाद परिवार के सभी सदस्यों में चर्चा होती रही और सभी का मत यह बना कि आत्मा आई तो थी किन्तु प्रश्नों के उत्तर संतोषजनक नहीं थे। शायद सही के बजाय कोई गलत आत्मा आ गई थी। अब तो हमें प्लेंचेट करने की एक लत सी लग गई। दोपहर के भोजन के बाद रोज प्लेंचेट करना हमारी दिनचर्या का एक अंग बन गया। यद्यपि संतोषजनक उत्तर नहीं मिलते थे किन्तु हमें गर्मी की दोपहर में समय बिताने तथा मनोरंजन का एक नया साधन मिल गया था।

इस प्रकार रोज प्लेंचेट करते लगभग एक माह बीत गया। रोज की तरह एक दिन प्लेंचेट करने के लिये हमने ढिबरी पर अपनी उंगलियाँ रखी ही थीं कि बिना किसी आह्वान के ढिबरी चार्ट पर घूमने लगी, शब्द और वाक्य बनने लग गये। चार्ट पर ढिबरी की गति इतनी तेज थी कि हमारी उंगलियाँ ढिबरी पर टिक नहीं पा रही थीं, कभी किसी की उंगली ढिबरी से अलग हो जाती थी तो कभी किसी की। जिसकी उंगली ढिबरी से अलग हो जाती थी वह फिर से अपनी उंगली शीघ्रतापूर्वक उस पर रख देता था। इस प्रकार से निम्न संदेश हमें प्राप्त हुआः

'मैं गोकुल प्रसाद अवधिया (मेरे दादा जी) हूँ। यह बताने के लिये कि तुम लोग इस प्रयोग को करना बंद कर दो, मैं अपनी मर्जी से आया हूँ। इस प्रयोग के करते रहने से कभी भी कुछ अशुभ और अनिष्ट होने की आशंका है।'

हम लोग स्तब्ध रह गये। कुछ क्षणों के बाद जब हम संयत हुये तो पिताजी ने कहा, "ठीक है, अब से हम इस प्रयोग को नहीं किया करेंगे। पर यहाँ से जाने के पहले क्या आप हमारे प्रश्नों के उत्तर देने की कृपा करेंगे?"

उत्तर 'हाँ' में था।

उस रोज के अनेकों प्रश्न और उत्तर मुझे आज भी याद हैं जो नीचे दिये जा रहे हैं:

'मृत्यु के बाद तो मोह समाप्त हो जाता है फिर आप क्यों हमें संदेश देने आये हैं?' (पिताजी का प्रश्न था)

"मोह समाप्त हो तो जाता है किन्तु पूर्ण रूप से नहीं, जब तक मोक्ष न मिल जाये मोह का कुछ न कुछ अंश बना रहता है।"

'क्या सात लोक या आसमान होते हैं?'

"हाँ"

'आप किस लोक में हैं?'

"5वाँ"

'क्या मैं पास होउंगा?' (मेरा प्रश्न था)

"हाँ"

'किस डिवीजन में?'

"सेकण्ड डिवीजन में"

'मुझे तो फर्स्ट डिवीजन की उम्मीद है?'

"सेकण्ड डिवीजन"

(जब परीक्षा परिणाम आया तो मुझे 58.8% मिले थे।)

'मेरे प्राविडेंट फंड का पैसा मिलेगा?'(पिताजी का प्रश्न था)

"हाँ, किन्तु केवल तुम्हारा अंशदान मिलेगा, म्युनिस्पाल्टी का अंशदान नहीं मिलेगा।"

'कब मिलेगा?'

"21 जून 1967 को"

(सच मे ही 21 जून 1967 को पिताजी के प्राविडेंट फंड के अपने अंशदान का ही भुगतान हुआ था। मुझे आज भी याद है कि उसी दिन मेरे लिये पिताजी ने उन्हीं पैसों में से फिलिप्स कंपनी का रेडियो खरीदा था और घर में रेडियो को फिट करने के बाद मैने विविध भारती का मनचाहे गीत कार्यक्रम लगाया था तथा उसमें फिल्म "राजा और रंक" का "रंग बसंती..." गीत प्रसारित हो रहा था।)

और भी प्रश्न पूछे गये थे जो कि विशेष उल्लेखनीय नहीं है।

उस दिन के बाद से पिताजी ने न तो फिर कभी प्लेंचेट का प्रयोग किया और न ही हमें करने दिया।

इस पोस्ट से मेरा आशय अलौकिक शक्तियों का प्रचार-प्रसार नहीं है। एक घटना जो मेरे साथ बीती थी याद आ गई और मैने पोस्ट कर दिया। वैसे प्लेंचेट के प्रयोग को परामनोविज्ञान मान्यता देती है।

Friday, May 30, 2008

मैं परेशान तू मजे में


जीवन में अनेकों बार ऐसी स्थिति आती है कि हम सोचने लगते है मैं तो परेशान हूँ और दूसरे लोग मजे में हैं और यह सोच हमें हीन भावना से ग्रस्त करते जाता है। मनुष्य के व्यवहार से सम्बन्धित इस विषय पर थॉमस एन्थॉनी हैरिस द्वारा लिखित अंग्रेजी पुस्तक I'm OK, You're OK बहुत ही लोकप्रिय है। यह पुस्तक व्यवहार विश्लेषण (Transactional Analysis) पर आधारित है।

श्री हैरिस की पुस्तक I'm OK, You're OK के अनुसार मनुष्यों के आपसी व्यवहार की चार स्थितियाँ होती है -

मैं मजे में तू मजे में (I'm OK, You're OK)
मैं मजे में तू परेशान (I'm OK, You're not OK)
मैं परेशान तू मजे में (I'm not OK, You're OK)
मैं परेशान तू परेशान (I'm not OK, You're not OK)

उपरोक्त परिस्थितियाँ किन्हीं भी दो लोगों के बीच हो सकती हैं चाहे वे पति-पत्नी हों, भाई-भाई हों, बाप-बेटे हों, अफसर-कर्मचारी हों, यानी कि उनके बीच चाहे जैसा भी आपसी सम्बन्ध हों। देखा जाये तो पहली स्थिति आदर्श स्थिति है और चौथी सबसे खराब। मनुष्य के जीवन में आदर्श स्थिति कभी कभार ही आ पाती है और सबसे खराब स्थिति भी कभी-कभी आती है किन्तु दूसरी तथा तीसरी स्थिति संपूर्ण जीवन में बनी रहती है।

श्री हैरिस की पुस्तक इसी बात का विश्लेषण करती है कि उपरोक्त व्यवहारिक स्थितियाँ क्यों बनती हैं। उनका सिद्धांत बताता है कि मनुष्य निम्न तीन प्रकार से सोच-विचार किया करता है:

बचकाने ढंग से (Child): इस प्रकार के सोच-विचार पर मनुष्य की आन्तरिक भावनाएँ तथा कल्पनाएँ हावी रहती है (dominated by feelings)। आकाश में उड़ने की सोचना इसका एक उदाहरण है।

पालक के ढंग से (Parent): यह वो सोच-विचार होता है जिसे कि मनुष्य ने बचपने में अपने पालकों से सीखा होता है (unfiltered; taken as truths)। 'सम्भल के स्कूल जाना', 'दायें बायें देखकर सड़क पार करना' आदि वाक्य बच्चों को कहना इस प्रकार के सोच के उदाहरण है।

वयस्क ढंग से (Adult): बुद्धिमत्तापूर्ण तथा तर्कसंगत सोच वयस्क ढंग का सोच होता है (reasoning, logical)। सोच-विचार करने का यही सबसे सही तरीका है।

हमारे सोच-विचार करने के ढंग के कारण ही हमारे व्यवहार बनते है। जब दो व्यक्ति वयस्क ढंग से सोच-विचार करके व्यवहार करते है तो ही दोनों की संतुष्टि प्रदान करने वाला व्यवहार होता है जो कि "मैं मजे में तू मजे में (I'm OK, You're OK)" वाली स्थिति होती है। जब दो व्यक्तियों में से एक वयस्क ढंग से सोच-विचार करके तथा दूसरा बचकाने अथवा पालक ढंग से सोच-विचार करके व्यवहार करते है तो "मैं मजे में तू परेशान (I'm OK, You're not OK)" या "मैं परेशान तू मजे में (I'm not OK, You're OK)" वाली स्थिति बनती है। किन्तु जब दो व्यक्ति बचकाने या पालक ढंग से सोच-विचार करके व्यवहार करते है तो "मैं परेशान तू परेशान (I'm not OK, You're not OK)" वाली स्थिति बनती है।

उपरोक्त बातों को ध्यान में रखकर व्यवहार करने से ही सभी की संतुष्टि हो सकती है।

Thursday, May 29, 2008

आवारगी ...

आवारगी में हद से गुजर जाना चाहिये
लेकिन कभी कभार तो घर जाना चाहिये

मुझसे बिछड़ कर इन दिनों किस रंग में हैं वो
ये देखने रक़ीब के घर जाना चाहिये
लेकिन कभी कभार ...

उस बुत से इश्क कीजिये लेकिन कुछ इस तरह
पूछे कोई तो साफ मुकर जाना चाहिये
लेकिन कभी कभार ...

अफ़सोस अपने घर का पता हम से खो गया
अब सोचना ये है कि किधर जाना चाहिये
लेकिन कभी कभार ...

बैठे हैं हर फसील में कुछ लोग ताक में
अच्छा है थोड़ी देर से घर जाना चाहिये
लेकिन कभी कभार ...

रब बेमिसाल वज़्म का मौसम भी गया
अब तो मेरा नसीब संवर जाना चाहिये
लेकिन कभी कभार ...

नादान जवानी का ज़माना गुजर गया
अब आ गया बुढ़ापा सुधर जाना चाहिये
लेकिन कभी कभार ...

बैठे रहोगे दश्त में कब तक हसन रज़ा
जीना अगर नहीं है तो मर जाना चाहिये
लेकिन कभी कभार ...

उपरोक्त गज़ल मेरी पसंद के गज़लों में से एक है, उम्मीद है आपको भी पसंद आयेगी। सुनना चाहें तो यहाँ सुन सकते हैं:


Tuesday, May 27, 2008

hindi blog आश्चर्यजनक तथ्य

मन में एक उत्सुकता जागी कि hindi blog कीवर्ड को सर्च इंजिन में कितने लोग खोजते हैं। पता करने के लिये मैंने वर्डट्रैकर में hindi blog टाइप कर के हिट किया। आश्चर्य! पता चला कि इस कीवर्ड को कोई नहीं खोजता।


इस तथ्य को जान कर बड़ी ग्लानि हुई। अपने आप पर तरस आने लगा। खुद से कहा 'वा बेटे, अपने हिन्दी ब्लोग में नया पोस्ट कर के कितना खुश हो जाता है, अब पता चला तेरे हिन्दी ब्लोग की औकात!'

इसके बाद तख्ती में 'हिन्दी ब्लोग' टाइप तथा कॉपी करके वर्डट्रैकर में पेस्ट किया, हिट करने पर पता चला कि वर्डट्रैकर यूनीकोड को सपोर्ट ही नहीं करता।

फिर सोचा चलो यह भी देख लें कि hindi कीवर्ड को भी कोई खोजता है या नहीं। फिर से वर्डट्रैकर में hindi टाइप किया और हिट किया। इस बार परिणाम आया और कुछ संतोष हुआ।

पर परिणाम से पता चला कि लोग hindi songs, hindi movies, hindi mp3, hindi remix, hindi sex आदि ही खोजते हैं, उन्हें hindi content, hindi literature, hindi poem, hindi story, hindi novel, आदि खोजने में किसी प्रकार की रुचि ही नहीं है।

(आप चाहें तो यहाँ क्लिक करके वर्डट्रैकर में जाकर उपरोक्त प्रयोग कर सकते हैं।)

तो साहब! तथ्य उत्साहप्रद नहीं हैं और स्थिति निराशाजनक हैं पर ऐसा भी नहीं है कि स्थिति सुधर न सकती हो। हम सभी मिल कर अथक प्रयास करें, लोगों को नेट में हिन्दी पठन-पाठन के लिये प्रेरित करें तो स्थिति अवश्य ही सुधरेगी।

Wednesday, May 21, 2008

अब फिर दिखेंगे हिन्दी पेजेस में गूगल के विज्ञापन

गूगल ने हाल ही में गूगल सामग्री नेटवर्क (Google content network) को, योग्य तीसरे पक्ष के विक्रेताओं से प्राप्त विज्ञापनों को स्वीकार करने तथा उनका प्रदर्शन करने के लिये, सक्रिय कर दिया है। यह सूचना अभी कुछ समय पहले ही मुझे गूगल से प्राप्त ई-मेल से मिली है।

अभी तक केवल अंग्रेजी के विज्ञापनों को ही पात्रता प्राप्त होने के कारण हिन्दी पेजेस में गूगल के विज्ञापनों का प्रदर्शन नहीं हो रहा था किन्तु अब उपरोक्त परिवर्तन हो जाने से कम से कम छवि विज्ञापनों (image ads) का दिखाई देना शुरू हो जायेगा।

इससे अपने हिन्दी ब्लोग्स/वेबसाइट्स में गूगल विज्ञापन प्रदर्शित करने वालों की निराशा थोड़ी बहुत तो दूर होगी।

मर रे मानव मर!

मर रे मानव मर
भूस्खलन से मर
भूकंप से मर
मुठभेड़ कर और मर
बम विस्फोट से मर
जहरीली शराब पी कर मर
नकली दवा से मर
श्रद्धालु बन, दर्शन हेतु जीप से जा और दुर्घटना से मर
मरने से जरा भी न डर
मरना तेरी नियति है इसलिये तू मर

वेबदुनिया समाचार

Tuesday, May 20, 2008

मीडिया प्लेयर में आटो प्ले लिस्ट बना कर पसंदीदा संगीत सुनें।

हजारों-लाखों संगीत फाइल्स में से अपने विशिष्ट पसंद के संगीत को सुनने के लिये आटो प्लेलिस्ट्स (Auto Playlists) बहुत ही उत्तम सुविधा है। मान लीजिये आपके कम्प्यूटर में पुरानी फिल्म संगीत के डेढ़-दो हजार गाने हैं और आज आपकी इच्छा केवल किशोर दा के गाये गानों को ही या आर.डी. बर्मन के संगीत वाले केवल आशा भोंसले के गाये गानों को ही सुनने की हो रही है तो सोचिये कि उन गानों को छाँटने में आपका कितना समय बर्बाद हो जायेगा। किन्तु आटो प्लेलिस्ट्स की सहायता से आप बात की बात में ही उन विशिष्ट गानों की लिस्ट बना सकते हैं जिन्हें आप सुनना चाह रहे हैं।

आटो प्लेलिस्ट्स (Auto Play lists) बनाने के लिये संगीत फाइल्स की टैगिंग होना आवश्यक है। केवल टैगिंग ही वह सुविधा प्रदान करता है जिससे आपके पसंद के गानों को पहचान कर आपका कम्प्यूटर उनकी लिस्ट तैयार कर सके। टैगिंग की विधि नीचे दी जा रही है।

संगीत फाइल्स को टैग कर के मनपसंद नाम दें!

संगीत फाइल्स को टैग (Tag) कर के नया नाम तथा वांछित जानकारी देने के लिये अनेकों टैग एडीटर्स (Tag Editors) उपलब्ध हैं। यदि आप Windows XP का प्रयोग करते हैं तो आपको किसी अलग टैग एडीटर की आवश्यकता नहीं है क्यों कि XP में उपलब्ध विन्डोज मीडिया प्लेयर (वर्सन 9 या उससे ऊपर) में ही संगीत फाइल्स को टैग करने की सुविधा उपलब्ध है। टैगिंग करने के लिये निम्न विधि अपनायें।

* विन्डोड़ मीडिया प्लेयर वर्सन 9 (Windows Media Player version 9) के प्ले लिस्ट या लाइब्रेरी में किसी संगीत फाइल को दाँया क्लिक (right click) करें।

* नये खुलने वाले मीनू में एडव्हान्स्ड टैग एडीटर (Advanced Tag Editor) को क्लिक करें।

* एडव्हांस्ड टैग एडीटर डॉयलाग बॉक्स में ट्रैक की जानकारियाँ प्रविष्ट करें जैसे कि ऊपर के चित्र में किया गया है। अब आर्टिस्ट इन्फो (Artist Info) टैब को क्लिक करें।


* आर्टिस्ट इन्फो में भी वांछित प्रविष्टियाँ करने के बाद चाहें तो अन्य टैब्स को क्लिक कर के जानकारियाँ प्रविष्ट करें और कार्य सम्पन्न हो जाने पर OK को क्लिक कर दें।

इसी प्रकार से सभी संगीत फाइल्स की टैगिंग कर लें।

आटो प्ले लिस्ट बनाना

* विन्डोज मीडिया प्लेयर में लाइब्रेरी खोलें।
* बायीं (left) ओर के विन्डो में आटो प्ले लिस्ट पर दायाँ (right) क्लिक करें।
* नये खुलने वाले विन्डो में न्यू (New) को क्लिक कर दें।

* आटो प्लेलिस्ट (Auto Plalist) डॉयलाग बॉक्स में क्लिक टू एड क्राइटेरिया (Click to add criteria) को क्लिक करें।


* वांछित क्राइटेरिया जैसे कि एलबम आर्टिस्ट (Album Artist) को क्लिक करें।
* Is, Is not..., contains में से किसी एक का चुनाव करके क्लिक तो सेट (Click to set) में उचित प्रविष्टि करें। चाहें तो एण्ड आल्सो इन्क्लुड (And also include) में भी अन्य शर्ते दे सकते हैं। कार्य सम्पन्न होने पर OK को क्लिक कर दें। उदाहरण के लिये यदि आपने 'Is' का चुनाव करके 'किशोर कुमार' प्रविष्ट किया है तो सिर्फ किशोर कुमार के गाये गानों वाली आटो प्लेलिस्ट बन जायेगी।