Wednesday, April 25, 2012

किसी को नहीं पता कि घोटालों का रुपया आखिर कहाँ जाता है

घोटाले होते हैं, और उसके बाद उसकी जाँच होती है जो कि पच्चीसों साल तक चलती है। पच्चीस साल के बाद जाँच का यह यह निष्कर्ष आता है कि फलाँ दोषी नहीं पाया गया, यह बात अलग है कि उसने किसी दोषी को बचाने का प्रयास अवश्य किया किन्तु वह स्वयं निर्दोष है। जाँच करने वाले को बस इस बात की फिक्र होती है कि कौन दोषी है और कौन नहीं किन्तु इस बात की फिक्र नहीं होती कि घोटाले में गोलमाल हुए सैकड़ों करोड़ रुपयों का क्या हुआ? किसी को पता नहीं चलता कि उन रुपयों को जमीन खा गई या आसमान निगल गया। किसी को यह भी नहीं लगता कि उन रुपयों का पता करके उसे वापस देश के खजाने में लाना चाहिए और लोकहित में उसका उपयोग होना चाहिए।

यह जान कर कि फलाँ दोषी नहीं है लोग संतुष्ट हो जाते हैं और घोटाला प्रकरण बंद कर दिया जाता है। जै हो हमारे देश की भोली-भाली जनता का। जनता को कभी नहीं लगता कि घोटाले में गायब हुए सैकड़ों करोड़ रुपये जनता की ही खून-पसीने की कमाई थी और उसका उपयोग जनता के हित के लिए ही होना था।

Tuesday, April 24, 2012

कहिनी के भाई सहिनी

कहिनी के भाई सहिनी

तउन बसाइन तीन गाँव
दू उजाड़ एक बसबेच् नइ करिस

तिहाँ बसिन तीन कुम्हार
दू अंधरा एक के आँखीच् नइ रहिस

तउन बनाइन तीन हँड़िया
दू फुटहा एक के पेंदीच् नइ रहिस

तेला बेचिन तीन पइसा
दू खोटहा एक चलतेच् नइ रहिस

तेखर कोड़ाइन तीन तरिया
दू सुक्खा एक में पानीच् नइ रहिस

तिहाँ ले पकड़िन तीन मछरी
दू सरहा एक के पोटाच् नइ रहिस

वो मछरी मन के कोनो गिराहिक मिलही तो बताहू जी संगी मन!

Monday, April 23, 2012

क्या सरकारों का गठन इसलिए होता है कि वे उग्रवाद के समक्ष झुकती रहें?

देश और प्रदेशों की जनता अपना मत दे कर जनप्रतिनिधियों का चुनाव करती हैं ताकि उन्हें ऐसी सरकार मिले जो देश और प्रदेशों में अमन-चैन बनाये रखे, भ्रष्टाचार को खत्म करे, मँहगाई को बढ़ने न दे, उग्रवाद और आतंकवाद का सफाया करे। पर जब से देश को स्वतन्त्रता मिली है, देश और राज्यों में ऐसी एक भी सरकार नजर नहीं आई है जिसने जनता की उपरोक्त अपेक्षाओं को पूरा किया हो, उल्टे भ्रष्टाचार, मँहगाई, उग्रवाद और आतंकवाद आदि में दिन दूनी और रात चौगुनी गति से वृद्धि ही होती चली गई है।

भ्रष्टाचार में तो सरकारों में बैठे हुए जनप्रतिनिधी स्वयं ही लिप्त नजर आते रहे हैं, ऐसे में मँहगाई न बढ़े तो और क्या हो? उग्रवाद और आतंकवाद के समक्ष सरकारें बौनी नजर आती हैं। यदि आतंकवादी पकड़े भी जाते हैं तो उन्हें सजा नहीं मिलती, उल्टे उन्हें हर प्रकार की सुख-सुविधाओं से नवाजा जाता है। अफजल, कसाब आदि इस बात के प्रत्यक्षद उदाहरण हैं।

आतंकवादियों के पास एक ऐसा हथियार है जिसका तोड़ हमारी सरकारों के पास है ही नहीं, यह हथियार है 'अपहरण'। बस किसी का अपहरण कर लो और जितने चाहे उतने कैदी आतंकवादियों को उसके बदले में छुड़वा लो। केन्द्र सरकार ने ही अनेक बार आतंकवादियों के इस हथियार के सामने घुटने टेके हैं और कैदी वहशियों को विवश होकर रिहा किया है। जब केन्द्र सरकार ही विवश है तो भला राज्य सरकारें विवश क्यों न हों? एक इतालवी नागरिक की रिहाई के लिए ओडिसा सरकार ने दुर्दान्त हत्यारों को छोड़ दिया। अब छत्तीसगढ़ सरकार की बारी है।

अंग्रजों के शासनकाल में उन्होंने बेशक हमें लूटा पर यह जरूर ध्यान रखा कि कोई दूसरा हमें लूट न पाये। यही कारण है कि उन्होंने कड़े कदम उठा कर देश भर में लुटेरे ठगों, पिंडारियों और मुल्तानी पठानों, जिन्हें 'रोहिल्ला' के नाम से भी जाना जाता था, का सफाया कर दिया। उन्होंने दुर्दान्त लुटेरों का सफाया तब किया था जबकि उनके पास आज के जैसी तकनीक नहीं थी। आज तकनीक इतनी बढ़ी-चढ़ी हुई है कि आतंकवादियों का पता आसानी के साथ लगाया जा सकता है किन्तु, लगता है कि, हमारी सरकारें नहीं चाहतीं कि आतंकवादियों का पता लगाकर उन्हें सजा दी जाए। तभी तो मुट्ठी-भर आतंकवादियों से पुलिस और सेना बल से युक्त सरकारों के नाक में दम कर रखा है।

ऐसे में यही सोच कर संतोष करना पड़ता है कि शायद लुटते रहना ही इस देश की जनता की नियति है।

Saturday, April 21, 2012

सद्विचार

  • अश्रु  कायर बहाते हैं। अतः साहसी बनें और किसी अवसर के खो जाने पर कभी भी आँसू न बहायें।
  • दूसरों की शिकायत करने वाला व्यक्ति हमेशा अशांत रहता है और कभी भी सफल नहीं हो पाता। सफलता और शांति पाने के लिये बेहतर है कि स्वयं को बदलें।
  • स्वर्ग में जाकर गुलामी बनने की अपेक्षा नर्क में जाकर राजा बनना बेहतर है।
  • भले ही आपका जन्म सामान्य हो, आपकी मृत्यु इतिहास बन सकती है।
  • अन्धेरी रात के बाद चमकीला सुबह अवश्य ही आता है।
  • 'उत्तम होना' एक कार्य नहीं बल्कि स्वभाव होता है।
  • असफलता मुझे स्वीकार्य है किन्तु प्रयास न करना स्वीकार्य नहीं है।
  • 'आँखों से देखा' एक बार अविश्वसनीय हो सकता है किन्तु 'अनुभव से सीखा' कभी भी अविश्वसनीय नहीं हो सकता।
  • कल की असफलता वह बीज है जिसे आज बोने पर आने वाले कल में सफलता का फल मिलता है।
  • भूत इतिहास होता है, भविष्य रहस्य होता है और वर्तमान ईश्वर का वरदान होता है।
  • कोई भी कार्य सही या गलत नहीं होता, हमारी सोच उसे सही या गलत बनाती है।
  • कठिन परिश्रम का कोई भी विकल्प नहीं होता।
  • यदि आपको कोई कार्य कठिन लगता है तो इसका अर्थ है कि आप उस कार्य को गलत तरीके से कर रहे हैं।
  • दूसरों की गलती निकालना बहुत सरल है पर स्वयं की गलती निकालना बहुत दुष्कर है।   
  • यदि किसी समस्या को सुलझाया जा सकता है तो फिर फिक्र करने की क्या आवश्यकता है और यदि नहीं सुलझाया जा सकता तो फिर फिक्र करने से क्या फायदा है?
  • सद्कार्य वे फूल हैं जिनसे प्रेम की माला बनती है।
  • हर अच्छा कार्य आरम्भ में असम्भव होता है।
  • जो कार्य आज हमें सरल लगते हैं वही कभी हमारे लिए ही कठिन थे।         
  • सच्ची खुशी तब मिलती है जब आपके कार्य तथा वाणी से स्वयं के साथ दूसरों को भी लाभ मिलता है।
  • जहाँ प्रेम है वहीं जीवन है।
  • हम किसी बड़ी खुशी के इंतजार में छोटी-छोटी खुशियों को अनदेखा कर देते हैं, छोटी-छोटी खुशियों का आनन्द लीजिए, एक दिन वही छोटी छोटी खुशियाँ आपको बड़ी खुशी लगने लगेगी।

Friday, April 20, 2012

मुफ्त में कीजिये अपना डाटा रिकवर

लेखः मुकेश कैन

एक छोटी सी गलती और डाटा गायब!

किसी ने अनजाने में डाटा ड्राईव को फॉर्मेट कर दिया तो डाटा गायब!

किसी जरुरी फाइल को शिफ्ट के साथ डिलीट दबा दिया और फाइल पूरी तरह से कंप्यूटर से गायब!

क्या करेंगे आप अगर ऐसा हो जाये तो?

आम लोगो को डाटा रिकवरी वालो के पास जाना पड़ता है, जिसका वो 2000 से 20000 तक या उससे भी ज्यादा चार्ज करते है। और अगर डाटा रिकवरी सॉफ्टवेर खरीदना चाहें तो ये सॉफ्टवेयर आम आदमी की खरीद से बाहर होते हैं। क्योकि आम आदमी को इस तरह के सॉफ्टवेयर की कम ही जरूरत होती है। लेकिन जब जरूरत होती है तो आसानी से मिलना मुश्किल होता है। यदि किसी साईट पर मिलते भी हैं तो वे डेमो वर्जन होते हैं, जिनका आप पूरीतरह से उपयोग ही नहीं कर सकते।

आइये ले चलते है आप को एक फुल वर्जन फ्री सॉफ्टवेयर की तरफ। और एक सॉफ्टवेयर डाउनलोड करने वाली अच्छी सॉफ्टवेर साईट की तरफ जहा से आप जरूरत के फ्री सॉफ्टवेयर्स आसानी से डाउनलोड कर सकते है -

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इस साइट के माध्यम से आपके कंप्यूटर में rcsetup142.exe फाइल डाउनलोड हो जायेगी जिसके माध्यम से आप डिलीट अथवा गलती से फॉर्मेट की हुई पेन ड्राइव, हार्ड ड्राइव, एक्सटर्नल ड्राइव से डाटा रिकवर कर सकते हैं, वह भी बगैर किसी की मदद से तथा फ्री! यह हर प्रकार से आपकी मदद करेगा। आप की फोटो, वीडियो, अथवा दोकुमेंट रिकवर कर देगा अगर डिलीट फाइल है तो नार्मल रिकवर से फाइल रिकवर हो जायेगी और अगर फॉर्मेट ड्राइव है तो डीप स्केन से काम हो जायेगा।

तो rcsetup142.exe  डाउनलोड करने के लिए क्लिक करे

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और बाकी काम के सॉफ्टवेर डाउनलोड करने के लिए क्लिक करे

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Thursday, April 19, 2012

मलूकदास के दोहे

दया धरम हिरदे बसै, बोलै अमरित बैन।
तेई ऊँचे जानिये, जिनके नीचे नैन॥

आदर मान, महत्व, सत, बालापन को नेहु।
यह चारों तबहीं गए जबहिं कहा कछु देहु॥

मान सहित विष खाय के संभु भए जगदीस ।
बिना मान अमृत पिए राहु कटायो सीस॥

अजगर करै न चाकरी, पंछी करै न काम।
दास 'मलूका कह गए, सबके दाता राम॥

Sunday, April 15, 2012

क्रिकेट से सम्बन्धित कुछ तथ्य

श्री मुकेश कैन द्वारा प्रेषित

  • 1877 -पहला टेस्ट मैच:- मेल्बौर्न में ऑस्ट्रेलिया और इंग्लैंड के बीच खेला गया जिसमे ऑस्ट्रेलिया 45 रन से जीता
  • 1880 - इंग्लैंड में पहला टेस्ट मैच खेला गया जिसे इंग्लैंड ने ऑस्ट्रेलिया से 5 विकेट से जीता
  • 1889 - साउथ अफ्रीका ने पहला टेस्ट मैच खेला
  • 1900 - पाँच बॉल की जगह छ: बॉल प्रति ओवर इस्तेमाल होना शुरू हुआ
  • 1910 - मैदान के ऊपर से बॉल पार करने के लिए पहली बार छ: रन देना शुरू हुआ
  • 1912 - पहली बार त्रिकोनिये श्रृंखला इंग्लैंड में खेली गई जिसमे इंग्लैंड, ऑस्ट्रेलिया और साउथ अफ्रीका ने भाग लिया
  • 1928 - वेस्ट इंडीज ने पहला टेस्ट मैच खेला
  • 1930 - न्यू जीलैंड ने पहला टेस्ट मैच खेला
  • 1932 - भारत ने पहला टेस्ट मैच खेला
  • 1948 - पहला पाँच-दिवसीय टेस्ट इंग्लैंड में खेला गया
  • 1952 - पाकिस्तान ने पहला टेस्ट मैच खेला
  • 1960 - पहला रद्द मैच : ब्रिस्बने में ऑस्ट्रेलिया और वेस्ट इंडीस के बीच रद्द हुआ
  • 1971 - पहला एक दिवसीय इंटरनेशनल : ऑस्ट्रेलिया और इंग्लैंड के बीच मेलबर्न में खेला गया
  • 1975 पहला वर्ल्ड कप : वेस्ट इंडीज और आस्ट्रलिया के बीच फाइनल मैच लोर्ड में खेला गया जिसे वेस्ट इंडीज ने जीता
  • 1976 - पहला महिला मैच : लोर्ड में इंग्लैंड और ऑस्ट्रेलिया के बीच खेला गया
  • 1982 - श्री लंका ने पहला टेस्ट मैच खेला
  • 1992 - जिम्बाब्वे ने पहला टेस्ट मैच खेला
  • 2000 - साउथ अफ्रीका के कप्तान हंसी क्रोने को बुकीस से मैच फिक्स करने के लिये रिश्वत लेने के अपराध में मैच खेलने पर ताउम्र प्रतिबंध लगाया गया, बंगलादेश ने अपना पहला टेस्ट मैच खेला
  • 2001 - सर डोनाल्ड ब्रेडमेन की 92 वर्ष की उम्र में मृत्य हुई
  • 2003 - ट्वेटी20 कप : पहला ट्वेटी20 इवेनिंग टूर्नामेंट इंग्लैंड में आयोजित किया गया
  • 2004 लारा पहले व्यक्ति बने जिसने टेस्ट मैच में 400 रन बनाये (इंग्लैंड के खिलाफ)
  • 2005 - ICC ने एक दिन के मैच में पॉवर प्ले का इस्तेमाल शुरू किया

Thursday, April 12, 2012

वृद्ध लोगों को वर्तमान में जीने के बजाय अतीत में जीने की आदत सी हो जाती है।

है तो यह वैशाख का महीना किन्तु दोपहर में घर से बाहर निकलने पर लगता है कि यह वैशाख नहीं बल्कि ज्येष्ठ माह है जिसमें ग्रीष्म अपनी चरमावस्था में होती है और गर्मी की भीषणता असहनीय हो जाती है। दोपहर की धूप में कुछ दूर जाने पर प्रतीत होता है कि भगवान भास्कर अपनी प्रखर किरणों से सम्पूर्ण धरा को भस्मीभूत कर देने के लिए आतुर हैं।

ऐसे में लगता है कि पूरी दुपहरिया कूलर वाले ठण्डे कमरे में काटने में ही सुख है। आज की तकनीकी ने तो एसी, कूलर जैसी सुविधाएँ उपलब्ध करा दी है किन्तु मुझे वह जमाना भी याद आता है जब इस प्रकार की सुविधाएँ थी ही नहीं जिसके कारण हम अपने घर के पटाव वाले कमरे में हाथ पंखा डुलाते हुए ग्रीष्मकाल में ठण्डक पाने के सुख का अनुभव किया करते थे। इतनी सम्पन्नता तो थी नहीं कि कमरे के दरवाजे-खिड़कियों में खस की टट्टी लगवाकर और उसमें छिड़काव करके कमरे को वातानुकूलित-सा बना सकें। सो खस से बने हाथ पंखें को पानी से गीला कर ठण्डक का आनन्द लेते थे। आज मुझे लगता है कि कूलर वाले कमरे की ठण्डक की अपेक्षा उस खस के हाथ पंखे की ठण्डक में कहीं अधिक आनन्द था।

वैसे आप यह भी समझ सकते हैं कि वृद्ध लोगों को वर्तमान में जीने के बजाय अतीत में जीने की आदत सी हो जाती है।

Sunday, April 8, 2012

भारत में प्रथम

  • भारत में प्रथम रुपये का सिक्का - 1542 में शेरशाह सूरी द्वारा ढलवाया गया
  • भारत में प्रथम छापाखाना (प्रिंटिंग प्रेस) - 1556 में गोवा में एक पुर्तगाली द्वारा शुरू किया गया
  • भारत में प्रथम जनगणना - 1872 में
  • भारत में प्रथम अंग्रेजी समाचार पत्र - बंगाल गज़ट (1790 में जेम्स आगस्तुस द्वारा कलकत्ता से प्रकाशित)
  • भारत में प्रथम डाक टिकट - 1852 में कराँची में जारी किया गया
  • भारत में टेलीग्राफ लाइन - 1854 में कलकत्ता से आगरा तक शुरू हुआ जो 1280 कि.मी. लंबा था और जिसे 1857 में लाहौर तक बढ़ाया गया
  • भारत में प्रथम रेल्वे लाइन - बंबई से थाने (16 अप्रैल 1853 को शुरू)
  • भारत में हाइड्रोइलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट - शिवसमुद्रम ( 1902 में कावेरी नदी पर)
  • भारत में प्रथम सिनेमाघर - कलकत्ता में बना (1907 में जे.एफ. मदन के द्वारा बनवाया गया)
  • भारत का प्रथम फिल्म - राजा हरिश्चन्द्र (दादा साहेब फाल्के ने बनाया जो 1913 में प्रदर्शित हुआ)
  • भारत का प्रथम सवाक् फिल्म - आलमआरा (निर्देशक अर्देशिर ईरानी, 1931 में प्रदर्शित)
  • भारत का प्रथम स्वदेशी रंगीन फिल्म - किसान कन्या (1937 में प्रदर्शित)
  • भारत का प्रथम संविधान संशोधन - 1950 में
  • भारत की प्रथम पंचवर्षीय योजना - 1951
  • भारत का प्रथम आम चुनाव - 1952 में
  • भारत का प्रथम कृत्रिम उपग्रह - आर्यभट्ट (19 अप्रैल 1975)

Saturday, April 7, 2012

या कुरसी अरु पावरवा पर...

या कुरसी अरु पावरवा पर न्याय सदाशय सब तजि डारौं।
वोटर को ललचाय रिझाय के जब तब आपन काम निकारौं॥
पावरवा को पावत ही मतदाताओं को ततकाल बिसारौं।
लूट खसोट धन पाउँ उसे स्विस बैंक जमा करि भाग सवारौं॥

Friday, April 6, 2012

लक्ष्य प्राप्त करना चाहते हो तो हनुमान जी के चरित्र से शिक्षा लो

चैत्र माह की पूर्णिमा अर्थात् हनुमान जयन्ती। आज ही के दिन वानरराज केसरी और अंजना के घर हनुमान जी का जन्म हुआ था। समस्त भारतवर्ष में आज के दिन हनुमान जी के भक्त श्रद्धा और उल्लास के साथ हनुमान जयन्ती का पर्व मनाते हैं। मान्यता है कि हनुमान जी भगवान शंकर के ग्यारहवें रुद्र के अवतार हैं।



हम कार्य करते हैं लक्ष्य की प्राप्ति के लिए। किन्तु किए गये कार्य के परिणामस्वरूप कभी लक्ष्य प्राप्त होता है तो कभी नहीं भी होता। यदि हम रामभक्त हनुमान जी के चरित्र का अध्ययन करें तो हमें पता चलता है कि उन्होंने जो भी कार्य किया, वह सफल ही हुआ। दुर्गम से दुर्गम कार्य को हनुमान जी ने सुगमता के साथ पूर्ण किया। इसीलिए गोस्वामी श्री तुलसीदास जी "हनुमान चालीसा" में लिखते हैं -

दुर्गम काज जगत के जेते। सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते॥

रामायण में आदिकवि वाल्मीकि ने हनुमान जी के चरित्र को सर्वोच्च बना दिया है। सीता की खोज में जाने वाले वानरों में सिर्फ हनुमान जी पर ही श्री राम को सर्वाधिक भरोसा था, यही वजह है कि उन्होंने सीता जी से भेंट होने पर पहचान स्वरूप देने के लिए अपनी मुद्रिका किसी अन्य वानर को देने के स्थान पर सिर्फ हनुमान जी को ही दिया था। श्री राम को पूर्ण विश्वास था कि हनुमान अवश्य ही सीता जी को खोज कर उनसे भेंट करेंगे।

लक्ष्य की प्राप्ति के लिए प्रमुख बातें हैं -

लक्ष्य के प्रति समर्पित होना - चाहे राम को सुग्रीव का मित्र बनाने का कार्य हो, चाहे सीता जी की खोज का कार्य, हनुमान जी सदैव अपने लक्ष्य के प्रति समर्पित रहते हैं।

लक्ष्य प्राप्ति के लिए सुगम मार्ग का निर्धारण करना - लंका नगरी में प्रवेश करना एक अत्यन्त कठिन कार्य था किन्तु हनुमान जी इसके लिए भी सुगम मार्ग निकाल ही लेते हैं।

आत्मविश्वास से परिपूर्ण होना - हनुमान जी आत्मविश्वास से कितने परिपूर्ण थे यह इसी बात से पता चलता है कि दुश्मन की नगरी लंका में वे एक बार भी विचलित नहीं होते।

कठिन से कठिन समय में भी त्वरित निश्चय लेना - सीता जी से भेंट होने के बाद लंका से वापस आने के पहले हनुमान जी तत्काल निश्चित कर लेते हैं कि शत्रु को अपना बल प्रदर्शित करके उसका नुकसान भी करना है ताकि शत्रु का आत्मबल कम हो जाए।

यदि हम हनुमान जी के चरित्र से शिक्षा ग्रहण करते हुए अपने लक्ष्य की प्राप्ति हेतु कार्य करें तो लक्ष्य की प्राप्ति में कदापि कोई सन्देह न रहे।

Thursday, April 5, 2012

विक्रम बेताल - भ्रष्टाचार कथा

हमेशा की तरह बेताल ने कहानी शुरू की, "सुन विक्रम! जिसे तू जम्बूद्वीप अथवा आर्यावर्त के नाम से जानता है, कालान्तर में उस देश का नाम भारतवर्ष हो गया। भारतवर्ष में अनेक राज्य थे और विभिन्न राजा उन राज्यों में राज्य किया करते थे। राष्ट्रीय भावना की कमी होने के कारण वे राजा आपस में ही लड़ते रहते थे। उनकी आपसी फूट की इस कमजोरी का लाभ विदेशियों ने उठाया और भारतवर्ष पहले तो यवनों और बाद में मलेच्छों के अधीन हो गया। सहस्र से भी अधिक वर्षों तक भारत परतन्त्र ही रहा। जब भारतवर्ष मलेच्छों के अधीन था तो उसी समय द्वितीय विश्वयुद्ध छिड़ गया। इस विश्वयुद्ध ने मलेच्छों की शक्ति को क्षीण कर दिया जिसके कारण मलेच्छों को भारतवर्ष को स्वतन्त्र करने के लिए विवश होना पड़ा।

"भारतवर्ष के स्वतन्त्र हो जाने के बाद 64 वर्षों तक निरन्तर विकास की गंगा बहती रही। किन्तु विकास की गति से कई गुना अधिक गति से भ्रष्टाचार भी निरन्तर बढ़ता गया। अनेक प्रकार के घोटाले हुए। देश का धन काले धन के रूप में विदेशी बैंकों में जमा होने लगा।"

इतनी कथा सुनाकर बेताल ने विक्रम से पूछा, "बता विक्रम स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद भारत में भ्रष्टाचार तीव्र गति से क्यों बढ़ा?"

विक्रम ने उत्तर दिया, "द्वितीय विश्वयुद्ध भारत तथा उन अन्य देशों के लिए जो मलेच्छों के गुलाम थे, एक वरदान सिद्ध हुआ। इसी वरदान स्वरूप भारत को स्वतन्त्रता मिली। किन्तु भारत को अभिशाप स्वरूप ऐसे राजनेता भी मिले जिन्होंने अपने स्वार्थपूर्ति के लिए देश को गर्त में ढकेल दिया। उन राजनेताओं के प्रचार स्वरूप भारत की प्रजा समझने लगी कि भारत का विकास हो रहा है जबकि विकास के नाम पर विदेशी शिक्षा, सभ्यता, संस्कृति को ही उन राजनेताओं ने भारत में पनपाया और आगे बढ़ाया। मलेच्छों का एकमात्र उद्देश्य था भारत को लूटना। अतः उन्होंने अपने इस उद्देश्य को ध्यान में रखकर ही भारत में ऐसा संविधान बनाया था जो लुटेरों के पक्ष में हो। भारत की प्रजा को मानसिक रूप से सदा के लिए गुलाम बनाने के लिए भी उन्होंने विशेष शिक्षा-नीति तैयार किया था। जहाँ भारत की प्राचीन शिक्षा-नीति परोपकार, कर्तव्यनिष्ठा, धैर्य, सन्तोष आदि की शिक्षा देती थी वहीं मलेच्छों की शिक्षा-नीति व्यक्ति को स्वार्थ, भ्रष्टाचार आदि की शिक्षा देती थी। स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात भारत की बागडोर जिन राजनेताओं के हाथ में आई वे वस्तुतः दिखने में भारतीय तो थे किन्तु मन से अंग्रेज ही थे। उनकी शिक्षा-दीक्षा भी अंग्रेजों के देश में हुई थी। उन राजनेताओं का भी उद्देश्य अंग्रेजों की भाँति भारत को लूटना ही था। इसी कारण से उन्होंने अंग्रेजों के बनाए संविधान, न्याय-व्यवस्था, शिक्षा-नीति आदि को ज्यों का त्यों, या किंचित फेर-बदल के साथ अपना लिया ताकि भारत को लूटने का कार्य आगे भी जारी रहे। स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात् भी जो देश अपनी संस्कृति और सभ्यता को भूल कर विदेशी संस्कृति और सभ्यता को ही अपनाता है उस देश का पतन निश्चित होता है और उस देश में भ्रष्टाचार तथा घोटालों का तीव्र गति से बढ़ना एक सामान्य बात होती है।"

विक्रम के उत्तर देते ही बेताल वापस पेड़ पर जाकर लटक गया।

Tuesday, April 3, 2012

क्या यही हैं वो विधान? जिससे बना मेरा भारत महान!

सरकारी नौकर बनने के लिए कुछ न कुछ न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता की आवश्यकता होती है। किन्तु शैक्षणिक योग्यताओं वाले सरकारी नौकरों को अपने नियन्त्रण में रखकर सरकार चलाने वाले मन्त्री, सांसद, विधायक आदि बनने के लिए किसी भी प्रकार की न्यूतम शैक्षणिक योग्यता की आवश्यकता नहीं होती।

यदि कोई सरकारी कर्मचारी किसी अपराधिक प्रकरण में फँस जाये तो उसे अदालत से निर्दोष सिद्ध होते तक निल्बित कर दिया जाता है किन्तु अपराधिक पृष्ठभूमि के लोग बाहुबल और धन बल के आधार पर सदन के सदस्य बनकर मन्त्रीपद भी आरूढ़ हो सकते हैं क्योंकि न्यायालय द्वारा उन्हें दण्डित न किये जाने तक उन्हें दूध का धुला माना जाता है।

ऐसा माना जाता है सरकारी नौकर को 58-60 साल की उम्र के बाद सेवा के योग्य नहीं रहता, यही कारण है कि उसे सेवानिवृत कर दिया जाता है किन्तु जन प्रतिनिधि हमेशा योग्य होता है, चाहे उसकी उम्र कितनी भी अधिक क्यों न हो.

सरकारी नौकरी में पेंशन पाने के लिए कम से कम बीस साल तक नौकरी करना अनिवार्य है किन्तु जनप्रतिनिधि को पेंशन पाने के लिए सिर्फ एक बार चुनाव जीत लेना ही पर्याप्त है।

Sunday, April 1, 2012

कल चमन था आज इक सहरा हुआ

प्रख्यात कलाकार श्री जतिन दास द्वारा निर्मित प्रतिमा इस्पात नगरी भिलाई का मुर्गा चौक में एक पुष्प के समान शोभायमान थी और उसके कारण मुर्गा चौक चमन था किन्तु आज वह चौक कलापुष्प विहीन सहरा में तब्दील हो गया है।


ऐसा होता है हमारे कलाकारों की कलाकृति का हश्र!

रामनवमी की शुभकामनाएँ!


लोकाभिरामं रणरंगधीरं राजीवनेत्रं रघुवंशनाथम्!
कारुण्यरूपं करुणाकरन्तं श्रीरामचन्द्रं शरणं प्रपध्ये॥

 
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