Saturday, February 13, 2010

तो अब हम भी चलें

मजबूरी है। जाना तो पड़ेगा ही। जिस प्रकार से संसार असार है उसी प्रकार से यह ब्लोगजगत भी असार है। कब तक बने रहेंगे यहाँ? कब तक सींग कटा कर बछड़ों में शामिल होते रहेंगे? कब तक नये लोगों को पुरानी बातें बता बता कर बोर करते रहेंगे? आखिर कब तक? हमारे कई साथी तो इस नश्वर संसार को ही छोड़ कर चले गये हैं अब तक और एक हम हैं कि साठ साल की उम्र होने के बावजूद भी लटके हुए हैं। ठीक वैसे ही जैसे कि शिरीष के फल सूख जाने पर भी पेड़ से लटके ही रहते हैं। फूल-पत्तियाँ झड़ जाती हैं पर ये सूखे और हवा में डोलते फल हैं कि लटके ही रहते हैं। वाह रे शिरीष के फल!

अरे भाई हमने तो हमारे टिप्पण्यानन्द जी के ब्लोग छोड़ने वाली धमकी वाले फॉर्मूले को आजमाने के लिये ये सब लिख डाला वरना पक्के बेशर्म हैं हम। आप हमें अगर भगाओगे भी तो भी नहीं जाने वाले। वैसे तीन चार दिनों के लिये थोड़ा दूर होना पड़ेगा हमें आप लोगों से, आखिर हमारी प्यारी भांजी की शादी जो है १६ तारीख को! सबसे बड़े मामा हैं हम उसके तो वहाँ रहना तो होगा ही हमें। वैसे काम वाम करने के लिये बहुत लोग हैं वहाँ पर, हमारा काम तो केवल उन लोगों के काम पर निगाह रखना ही होगा। फिर भी कोशिश यही रहेगी कि भले ही टिप्पणी कम कर पायें या नहीं ही कर पायें पर कम से कम हमारे पोस्ट तो नियमित रहें। याने कि छुट्टी लेने के बाद भी आप लोगों से मिलने का प्रयास करते ही रहेंगे।

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हनुमान जी का लंका में प्रवेश - सुन्दरकाण्ड (२)

Friday, February 12, 2010

किस चीज का चित्र है ये? ... ललित जी की चित्र पहेली

कल मेरे साथ ललित जी ने यह चित्र लिया था। क्या आप बता सकते हैं कि किस चीज का चित्र है यह?

आपको तो पता ही है कि ललित शर्मा जी आजकल छुट्टी में चल रहे हैं। पर छुट्टी में होने के बावजूद भी उनके पोस्ट आ रहे हैं क्योंकि उन्हें ललित जी ने पहले ही शेड्यूल्ड करके रख दिया था। कल लगभग सवा बजे दिन को उनका फोन आया मेरे पास। बातों ही बातों में उन्होंने बताया कि राजिम मेला घूमने का विचार बन रहा है उनका साथ ही निमन्त्रण मिला उनके साथ मेला चलने के लिये। तो मैंने भी कल आधे दिन की छुट्टी ले ली और बस पकड़ कर एक घंटे के भीतर रायपुर से अभनपुर पहुँच गया। रायपुर से अभनपुर आखिर मात्र २८ कि.मी. की दूरी पर ही तो है। ललित जी वहाँ पर मेरा इन्तिजार करते मिले मुझे अपने मोटरसायकिल के साथ।

उनके मोटरसायकल से ही हम लोग निकल पड़े राजिम के लिये जो कि अभनपुर से मात्र १७ कि.मी. दूरी पर है। राजिम मेला छत्तीसगढ़ का अत्यन्त प्राचीन और सबसे बड़ा मेला है जो कि माघ पूर्णिमा से लेकर महाशिवरात्रि तक चलता है। राजिम महानदी के तट पर स्थित है और यहाँ पर महानदी के साथ पैरी तथा सोंढुर नदियों का त्रिवेणी संगम होता है। इसीलिये राजिम को छत्तीसगढ़ के प्रयाग की संज्ञा दी गई है। महानदी छत्तीसगढ़ की सबसे बड़ी नदी है और प्राचीनकाल में इसे चित्रोत्पला के नाम से जाना जाता था।

ललित जी को फोटोग्राफी और ग्राफिक्स के क्षेत्र में महारथ हासिल है सो उन्होंने बड़े सुन्दर सुन्दर चित्र भी लिये वहाँ पर जिनमें से कुछ यहाँ पर प्रस्तुत कर रहा हूँ





(चित्रों को बड़ा करके देखने के लिये उन पर क्लिक करें।)

राजिम मेला जाने का एक सबसे बड़ा फायदा यह हुआ कि वहाँ पर हमें गीताप्रेस गोरखपुर के स्टॉल में वाल्मीकि रामायण द्वितीय भाग की प्रति, जो हमसे गुम हो गई थी, मिल गई और आज से हमने अपने "संक्षिप्त वाल्मीकि रामायण", जो कि बहुत दिनों से रुका हुआ था, में प्रविष्टियाँ पुनः आरम्भ कर दिया।

"संक्षिप्त वाल्मीकि रामायण" का अगला पोस्टः

हनुमान का सागर पार करना - सुन्दरकाण्ड (1)

Thursday, February 11, 2010

ये ब्लोगिंग है इस ब्लोगिंग का यही है यही है यही है रंग रूप

"नमस्कार लिख्खाड़ानन्द जी!"

"नमस्काऽर! आइये आइये टिप्पण्यानन्द जी!"

"लिख्खाड़ानन्द जी बड़े चालाक हैं आप! उस दिन आपने हमें ब्लोगिंग फॉर्मूले बताये जरूर थे पर पोस्ट हिट कराने के जो असली टॉप फार्मूले हैं उनको गोल कर गये।"

"अरे नहीं भाई! पोस्ट हिट कराने का सबसे हिट फॉर्मूला तो सिर्फ विवादास्पद पोस्ट लिखना है सो हमने आप को बता ही दिया था।"

"पर लिख्खाड़ानन्द जी अब ये विवादास्पद पोस्ट लिखने वाला फॉर्मूला टॉप नहीं रह गया है क्योंकि आजकल लोग नर-नारी और धर्मों के विवाद को ज्यादा तूल नहीं देते। आपने तो देखा ही होगा कि पिछले कुछ समय से नर-नारी और धर्मों के विवाद वाले पोस्ट आ ही नहीं रहे हैं। और एकाध पोस्ट आ भी जाता है तो वो हिट बिल्कुल नहीं होता। हाँ वो साइबर स्क्वैटिंग वाले एक पोस्ट ने जरूर धूम मचाया था। और हम तो ऐसा पोस्ट लिख ही नहीं सकते क्योंकि इसमें तो बहुत कानूनी लोचा है। हमने ऐसा पोस्ट लिखा और किसी ने यदि कोर्ट-कचहरी के चक्कर में घसीट ही दिया तो हमें तो लेने के देने पड़ जायेंगे। भाई, बड़ी मुश्किल से तो मौज लेने के लिये हम ब्लोगिंग करने का समय निकाल पाते हैं, कोर्ट-कचहरी का चक्कर लगाने के लिये कहाँ समय है हमारे पास?"

"कह तो आप रहे हैं सही टिप्पण्यानन्द जी! पर गलत है। अगर पोस्ट हिट कराना है तो रिस्क तो लेना ही पड़ेगा। वो कहते हैं ना 'नो रिस्क नो गेन!' याने कि "चाहे जूते पड़े हजार, तमाशा घुस के देखेंगे!" अब जब ब्लोगिंग रूपी ओखली में सिर दे ही दिया है तो कानूनी लफड़ों की मूसलों से भला क्या डरना?"

"नहीं नहीं लिख्खाड़ानन्द जी! हम तो ऐसा रिस्क बिल्कुल नहीं ले सकते क्योंकि हम कानूनी लफड़ों से बहुत डरते हैं।"

"आप तो बस 'सिटल्ली साव' ही निकले भई! ठीक है, मत लो रिस्क पर आपका पोस्ट भी हिट नहीं होगा।"

"अरे कैसे हमारा पोस्ट हिट नहीं होगा? हम तो करा के ही रहेंगे अपने पोस्ट को हिट!"

"कैसे करवा लोग अपना पोस्ट हिट? भला हम भी तो जानें!"

"वो क्या है लिख्खाड़ानन्द जी! आपकी इस बात को हमने गाँठ बाँध कर धर लिया है कि हिन्दी पोस्ट को पाठकों से कुछ लेना देना नहीं है। अंग्रेजी ब्लोगिंग को विराट कवि सम्मेलन जैसा समझा जा सकता है जहाँ पर कुछ संख्या में कविगण आते हैं और उन्हें सुनने के लिये विशाल संख्या में श्रोतागण पहुँचते हैं। किन्तु हिन्दी ब्लोगिंग कवि सम्मेलन होकर कवि गोष्ठी है जहाँ पर सिर्फ कवि ही कवि आते हैं और एक-दूसरे की कविताएँ सुन-सुना कर वाह वाह करते हैं। यही कारण है कि हिन्दी पोस्ट तब हिट होती है जब वहाँ पर अधिक से अधिक ब्लोगर्स आयें और टिप्पणी करें। इसका मतलब यह है कि हमें सिर्फ ब्लोगर्स की पसंदीदा बातें लिख कर उन्हें अधिक से अधिक संख्या में आकर्षित करना है। इसी बात को ध्यान में रखकर हमने पोस्ट हिट कराने के दो और टॉप फॉर्मूलों की खोज कर ली है। वैसे हम इन फॉर्मूलों को किसी को बताना तो नहीं चाहते थे पर आप से हमारी कौन सी बात छुपी है भला? इसलिये आपको बता देते हैं।"

"तो फिर देर किस बात की? जल्दी बताइये ना!"

"तो दिल थाम लीजिये और सुनिये! एक फॉर्मूला तो यह है कि किसी पोस्ट में की गई भविष्यवाणी की सत्यता साबित करते हुए पोस्ट लिख मारना। बस आप एक ऐसी पोस्ट लिख भर दें और देखें कि कैसे धड़ाधड़ टिप्पणियाँ आनी शुरू होती है! ऐसे पोस्ट का सबसे बड़ा फायदा यह है कि जहाँ भविष्यवाणी की सत्यता के पक्ष में टिप्पणियाँ मिलती हैं वही उसके विपक्ष में भी बहुत सारी टिप्पणियाँ मिल जाती हैं। इस प्रकार से पोस्ट हिट हो जाता है।"

"आपकी बात में तो दम जरूर है टिप्पण्यानन्द जी!"

"धन्यवाद लिख्खाड़ानन्द जी! अब हम आपको पोस्ट हिट कराने का एक और सबसे टॉप फॉर्मूला बताते हैं। बस एक पोस्ट ब्लोगिंग छोड़ देने की धमकी देते हुए लिख दीजिये और देखिये कि वह पोस्ट कितनी अधिक पसंद प्राप्त करती है। ऐसे पोस्ट को पसंद किया जाना साबित करता है कि आपके ब्लोगिंग छोड़ देने को बहुत से लोग पसंद करते हैं। कई लोग तो सिर्फ इसलिये ऐसे पोस्ट को पसंद कर लेते हैं कि उन्हें लगता है कि आपका यह पोस्ट आखरी पोस्ट है और बाद में आपके पोस्ट को पसंद करने और उसमें टिप्पणी लिखने से जान छूट जायेगी!"

"अच्छा टिप्पण्यानन्द जी! अब आप अपनी हिट होने वाली पोस्ट की कुछ झलकी भी तो दीजिये हमें."

"तो लीजिये, पेश करता हूँ

ये ब्लोगिंग है इस ब्लोगिंग का यही है यही है यही है रंग रूप
थोड़ा झगड़ा थोड़ा लफड़ा यही है यही है यही है छाँव धूप

ज्ञान से न विद्या से धन से ना व्यवसाय से
पोस्टों की डोर बंधी है टिप्पणी की आय से
तोड़ो मरोड़ो कुछ भी छोड़ो सब कुछ ही ब्लोगिंग है
ये ब्लोगिंग है .... "

"वाह! वाह!! क्या खूब लिखा है!!! आप की ये पोस्ट तो अभी से ही हिट हो गई जी!!!!

"टिप्पण्यानन्द जी! आज तो कमाल की बातें बतलाईं आपने! चलिये इसी खुशी में हम आपको चाय पिलवाते हैं"

"धन्यवाद लिख्खाड़ानन्द जी! पर मैं जरा जल्दी में हूँ, यदि देर हो जायेगी तो श्रीमती जी का पारा चढ़ जायेगा। इसलिये अब चलते हैं। नमस्कार!"

"नमस्कार!"

अस्वीकरण (डिस्क्लेमर): इस पोस्ट का उद्देश्य निर्मल आनन्द मात्र है अतः कृपया इसे गम्भीरतापूर्वक लेने का प्रयास न करें।

Wednesday, February 10, 2010

ब्लोगिंग के गुर सीख लिये हम .. प्रयास एक वर्णिक छंद रचने का

एक विचार आया कि क्या मैं एक वर्णिक छंद की रचना कर सकता हूँ? वह भी ब्लोगिंग के ऊपर? आपको पता ही है कि मैं कोई कवि नहीं हूँ। वैसे लेखक, साहित्यकार या पत्रकार भी नहीं हूँ। फिर भी प्रयोग के रूप में एक वर्णिक छंद रचने के प्रयास में जुट गया। सोचा कि गुरु|लघु|लघु मात्राओं याने कि भगण का प्रयोग करते हुए लिखा जाये। गण तो याद है ना आपको? अरे वही जो स्कूल में पढ़ा था "यमाताराजभानसलगा" वाला। चलिये अब तो याद आ ही गया होगा।

तो बनी ये पंक्तियाँ

ब्लोगिंग के गुर सीख लिये हम पोस्ट लिखो कुछ जो हिट होइ जाये।
पाठक आय न आय वहाँ पर ब्लोगर धावत धावत आये॥
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अब यहाँ आकर अटक गया मैं क्योंकि कवि तो हूँ ही नहीं। इसलिये सोचा कि क्यों न आप सभी की सहायता ली जाये। अब आगे पूरा करने के लिये बाकी पंक्तियाँ आपको सुझाना है। पंक्तियों में भगण का ही प्रयोग करना है याने कि शब्दों का चयन ऐसा हो कि क्रम से गुरु|लघु|लघु मात्राएँ ही आयें।

उदाहरण के लिये रसखान का यह छंद पढ़ लीजियेः

धूरि भरे अति शोभित श्याम जु तैसि बनी सिर सुंदर चोटी।
खेलत खात फिरै अँगना पग पैजनिया कटि पीरि कछौटी॥
वा छवि को रसखान बिलोकत वारत काम कलानिधि कोटी।
काग के भाग बड़े सजनी हरि हाथ से ले गयो माखन रोटी॥

तो बस फिर देर क्या है? शुरू हो जाइये अगली पंक्ति बनाने के लिये।

और हाँ, आपकी इस सहायता के लिये अग्रिम धन्यवाद!

Tuesday, February 9, 2010

पैसे की मैं बारिश कर दूँ गर तू हो जाये मेरी

शीर्षक पढ़ते ही यही सोचा ना आपने कि "बुड्ढा स्साला सठिया गया है जो इस उमर में भी किसी को अपना बनाने की बात कर रहा है"। तो हम आपको बता दें कि हमारा अब इस उमर में किसी को अपना बनाने जैसा हमारा कोई विचार नहीं है। अपनी बुढ़िया से ही हम इतने परेशान हैं कि किसी और को अपना बनाने की सोच भी नहीं सकते। और फिर पैसों की बारिश करने की बात तो कोई नवयुवक ही कर सकता है जो समझता है कि मैं तो सारी दुनिया को पाल सकता है। किसी जमाने में हम भी यही समझा करते थे कि हम सारी दुनिया को पाल सकते हैं पर अब तो यही सोचते हैं कि काश! सारी दुनिया मिलकर हमें पाल ले!

दरअसल हम आटो से आ रहे थे तो उस आटो में जो गाना बज रहा था उसमें ऐसा ही कुछ कहा जा रहा था कि "पैसे की मैं बारिश कर दूँ गर तू हो जाये मेरी"। इन बोलों को सुनकर लगा कि भाई जमाना बहुत बदल गया है। हमारे जमाने में तो किसी को अपना बनाने के लिये चांद-सितारे तोड़ लाने की बात कही जाती थी पर आज के जमाने में किसी को अपना बनाने के लिये पैसे की बारिश करना ज्यादा जरूरी है। चांद-सितारों का भला माशूका क्या करेगी? पुराने जमाने की माशूकाएँ भोली-भाली होती थीं और सुन्दर चांद-सितारों के लालच में आ जाया करती थीं पर आज के जमाने की माशूकाएँ तो अच्छी तरह से जानती है कि ये चांद-सितारे तो बड़े-बड़े पिंड मात्र हैं जो सिर्फ दूर से सुन्दर दिखाई देते हैं पर वास्तव में बहुत कुरूप हैं। और यदि चांद सितारों की आवश्यकता पड़ ही गई तो पैसे से खरीद ही लेंगे। यही कारण है कि आज के जमाने में माशूका के लिये पैसे की बारिश करनी जरूरी है। वैसे यह बात भी सही है कि संसार में सिर्फ पैसा ही सब कुछ नहीं है, पैसे से अधिक महत्वपूर्ण वस्तुएँ भी हैं। पर मुश्किल यह है कि उन महत्वपूर्ण वस्तुओं को प्राप्त करने के लिये पैसे की ही जरूरत होती है।

बात चाहे चांद सितारे तोड़ने की हो या पैसे की बारिश की, इन्हीं बातों को कह कर आदमी ऐसा फँसता है कि जिन्दगी भर नहीं निकल पाता।

चलते-चलते

गरीब लकड़हारे की वो कहानी तो आपने जरूर ही सुनी होगी जिसकी कुल्हाड़ी तालाब में गिर जाती है। उसी लकड़हारे का पुनर्जन्म आज के जमाने में हो गया। पर रहा वह गरीब लकड़हारा ही। एक बार वह लकड़ी काटने के लिये अपनी पत्नी के साथ जंगल में गया तो उसकी पत्नी फिसल कर तालाब में डूब गई। लकड़हारा के प्रार्थना पर इस बार भी भगवान उसकी सहायता के लिये आ गये।

भगवान ने उसकी पत्नी को तालाब से निकालने के लिये डुबकी लगाया और ऐश्वर्या रॉय को लेकर बाहर निकले और पूछा, "क्या यही है तेरी पत्नी?"

लकड़हारे ने खुश होकर कहा, "हाँ भगवान! यही है।"

इस पर भगवान ने कहा, "पिछले जनम में कितना ईमानदार था तू और इस जनम में बेईमान हो गया।"

लकड़हारा बोला, "ऐसी बात नहीं है प्रभु! पिछली बार पहले आपने सोने की कुल्हाड़ी निकाली थी फिर चांदी की और आखरी में मेरी लोहे की कुल्हाड़ी निकाली थी और अन्त में आपने मुझे तीनों कुल्हाड़ी दे दी थी। इस बार आपने पहले ऐश्वर्या रॉय को निकाला है, मेरे नहीं कहने पर फिर अमिषा पटेल को निकालते फिर आखरी में मेरी घरवाली को निकालते। अब आप सोचिये कि यदि खुश होकर आप मुझे तीनों को ही दे देते तो मेरा क्या होता? एक घरवाली को तो मैं चला नहीं पाता, तीन तीन को कैसे चलाता?"

Monday, February 8, 2010

कर गईं मस्त मुझे फागुन की हवा ... व्हीडियों देख कर समझ सकते हैं कि कैसे?

वैसे तो हमारे ब्लोग जगत में तरह-तरह की हवाएँ बहती हैं। जब टिप्पणी हवा बहती है तो सभी टिप्पणीमय हो जाते हैं और कभी कभी विवाद की हवा बहती है तो वह उग्र रूप धारण करके आँधी भी बन जाती है। पर आज ललित जी ने ब्लोगजगत में "फागुनी बयार" बहाई है। अब फागुनी हवा बहे तो मजाल है किसी की कि मदमस्त न हो? सो हम भी मस्ती में आ गये और अनायास ही होठों पर आ गये सन् 1978 में प्रदर्शित वासु चटर्जी की फिल्म दिल्लगी के गीत के ये बोल - "कर गईं मस्त मुझे फागुन की हवा"।

video

आज की आपाधापी में तो फाग सिर्फ होली के समय सिर्फ एक दो दिन ही गाये जाते हैं किन्तु पहले के दिनों में वसन्त पंचमी के दिन से ही फाग गाने की शुरुवात हो जाती थी जो कि रंग पंचमी तक चलती थी। याद आ गये वो दिन जब हम झांझ, मंजीरों, नगाड़ों आदि के ताल धमाल के साथ फाग गाया करते थे:
आज श्याम संग सब सखियन मिलि ब्रज में होली खेलै ना
हाँ प्यारे ललना ब्रज में होली खेलै ना

इत ते निकसी नवल राधिका उत ते कुँअर कन्हाई ना
हाँ प्यारे ललना उत ते कृष्ण कन्हाई ना
हिल मिल फाग परस्पर खेलैं शोभा बरनि ना जाई ना
आज श्याम संग सब सखियन मिलि ब्रज में होली खेलै ना

बाजत झांझ मृदंग ढोल डफ मंजीरा शहनाई ना
हाँ प्यारे ललना मंजीरा शहनाई ना
उड़त गुलाल लाल भये बादर केसर कीच मचाई नाआज श्याम संग सब सखियन मिलि ब्रज में होली खेलै ना
हमारे यहाँ गाये जाने वाले अधिकतर फाग 'चन्द्रसखी' के द्वारा रचे गये हैं जो कि कृष्ण भक्ति के भाव से ओत प्रोत हैं। एक उदाहरण देखियेः
जाने दे जमुना पानी मोहन जाने दे जमुना पानी
मोऽहन जाने दे जमुना पानी

रोज के रोज भरौं जमुना जल
नित उठ साँझ-बिहानी
मोऽहन जाने दे जमुना पानी

चुनि-चुनि कंकर सैल चलावत
गगरी करत निसानी
मोऽहन जाने दे जमुना पानी

केहि कारन तुम रोकत टोकत
सोई मरम हम जानी
मोऽहन जाने दे जमुना पानी

हम तो मोहन तुम्हरी मोहनिया
नाहक झगरा ठानी
मोऽहन जाने दे जमुना पानी

ले चल मोहन कुंज गलिन में
हम राजा तुम रानी
मोऽहन जाने दे जमुना पानी

चन्द्रसखी भजु बालकृष्ण छवि
हरि के चरन चित लानी
मोऽहन जाने दे जमुना पानी
ऐसे और भी फाग का संग्रह है हमारे पास जिन्हें हम होली तक के अपनी प्रविष्टियों में प्रस्तुत करने का प्रयास करेंगे।

Sunday, February 7, 2010

ब्लोगिंग की समस्यायें

तीन चार रोज पहले पाबला जी ने मुझे फोन करके बताया कि वे मेरे ब्लोग पर टिप्पणी नहीं कर पा रहे हैं। मैंने समझा कि शायद ब्लोगर में कोई अस्थाई समस्या होने के कारण ऐसा हुआ हो अतः उनसे अनुरोध किया कि कुछ समय बाद नये ब्राउजर में मेरा पोस्ट खोल कर टिप्पणी करने का प्रयास करें। बात आई गई हो गई। और लोगों की टिप्पणियाँ आती रहीं मेरे ब्लोग में। पाबला जी के फोन आने के एक दो दिन बाद डॉ. महेश सिन्हा जी ने मुझे मेल करके बताया कि वे भी मेरे ब्लोग में टिप्पणी नहीं दे पा रहे हैं। कुछ और भी मेरे पाठकों से भी मुझे पता चला कि उनके साथ भी यही समस्या आ रही है। यह मेरे लिये बड़ी अजीब बात थी क्योंकि कुछ लोगों की टिप्पणियाँ आ रही थीं और कुछ लोग टिप्पणी कर ही नहीं पा रहे थे। मैंने सोचा कि शायद यह समस्या टेम्पलेट के कारण है इसलिये टेम्पलेट बदल दिया।

कल फिर पाबला जी ने मुझे फोन करके बताया कि मेरे ब्लोग में वे अभी भी टिप्पणी नहीं कर पा रहे हैं। मैंने बहुत प्रकार समस्या का समाधान करने का असफल प्रयास किया और अन्ततः फिर से एक नया टेमप्लेट लाकर अपलोड कर दिया। इससे टिप्पणी वाली समस्या सुलझ गई किन्तु आज राजकुमार ग्वालानी जी ने फोन करके बताया कि मेरा ब्लोग इंटरनेट एक्सप्लोरर में नहीं खुल पा रहा है। याने कि समस्या अभी तक पूरी तरह से अभी भी नहीं सुलझ पाई है।

खैर, इस समस्या को भी सुलझायेंगे ही हम किन्तु फिलहाल इस पोस्ट को इसलिये प्रकाशित कर रहे हैं ताकि आप लोगों को भी पता चले कि कैसी कैसी समस्यायें आती रहती हैं ब्लोगिंग में।