Saturday, December 5, 2009

दो कलाकार .. काम किया जिन्होंने एक साथ सिर्फ एक बार

जहाँ फिल्मी कलाकारों की जोड़ियाँ और तिकड़ी मशहूर हुई है वहीं कुछ ऐसे कलाकार भी हैं जिन्होंने एक साथ केवल एक ही बार काम किया और फिर बाद में वे फिर कभी इकट्ठे काम नहीं कर पाये, कारण चाहे जो भी रहा हो।


  • राज कपूर और हेमा मालिनी फिल्म सपनों का सौदागर के बाद फिर कभी एक फिल्म में नहीं आये। उल्लेखनीय हैकि सपनों का सौदागर हेमा मालिनी की पहली फिल्म थी।
  • दिलीप कुमार और नूतन ने केवल एक बार ही एक साथ काम किया है, फिल्म कर्मा।
  • दिलीप कुमार और अमिताभ बच्चन की एकमात्र फिल्म है शक्ति।
  • जितेन्द्र और सायरा बानो की केवल एक ही फिल्म आई है आज तक, जी हाँ आपको भी याद गया होगा कि फिल्म है आखरी दाँव।
  • जितेन्द्र और शर्मिला टैगोर की एक मात्र फिल्म है मेरे हमसफर।
  • अमिताभ बच्चन और माला सिन्हा ने एक साथ केवल फिल्म संजोग में काम किया है।
  • अमिताभ बच्चन और जितेन्द्र को एक साथ लेकर केवल एक ही फिल्म फिल्म बनी फिल्म का नाम है गहरी चाल।
  • अमिताभ बच्चन और नूतन की एकमात्र फिल्म है सौदागर।
  • अमिताभ बच्चन और रीना राय एक साथ केवल फिल्म नसीब में आये। यद्यपि फिल्म अंधा कानून में भी दोनों कारोल था पर पूरे फिल्म में दोनों कलाकारों का एक साथ कोई भी दृश्य नहीं है।
  • अमिताभ बच्चन और नाना पाटेकर की एक ही फिल्म है, नाम है कोहराम।
  • शत्रुघ्न सिन्हा और विद्या सिन्हा केवल एक बार फिल्म मगरूर में ही एक साथ आये।
  • राकेश रोशन और हेमा मालिनी की एकमात्र फिल्म है पराया धन। यह राकेश रोशन की पहली फिल्म थी।
  • राज कुमार और डैनी की एकमात्र फिल्म है बुलंदी।
  • राज कुमार और नाना पाटेकर को एक साथ लेकर एक ही फिल्म बनी है तिरंगा।
  • शत्रुघ्न सिन्हा और राज कुमार की केवल एक ही फिल्म है चंबल की कसम।
  • शत्रुघ्न सिन्हा और रजनीकांत एक साथ फिल्म असली नकली में ही आये।
  • शेखर सुमन और रेखा की एक ही फिल्म है उत्सव।
  • आमिर खान और नीलम की एकमात्र फिल्म है अफ़साना प्यार का।
  • एक ही परिवार के तीन पीढ़ियों के कलाकारों को एक साथ लेकर केवल एक ही फिल्म बनी है, फिल्म का नाम है "कल आज और कल" तथा कलाकार हैं पृथ्वीराज कपूर, राज कपूर और रणधीर कपूर।
  • दिलीप कुमार और राजकुमार का नाम इस लिस्ट में जाता यदि उनकी पहली फिल्म पैगाम के 32 साल बाद सुभाष घई ने दोनों को अपनी फिल्म सौदागर में फिर से एक बार काम करने का अवसर दिया होता।
(यह जानकारी मैंने कई वर्ष पहले एकत्रित की थी, यदि इसमे कोई परिवर्तन हुआ हो कृपया सूचित करने का कष्ट करें।)

चलते-चलते

साहिर लुधियानवी, जयदेव और विजय आनंद एक दूसरे के अच्छे मित्र थे। बात सन् 1961 से भी पहले की है। दिन भर के काम के के बाद बैठे थे तीनों यूँ ही थकान उतारने। गप-शप के बीच जयदेव ने ये शेर सुनायाः

हमको तो गर्दिशेहालात पे रोना आया
रोने वाले तुझे किस बात पे रोना आया

शेर सुना कर जयदेव ने साहिर से कहा कि इस शेर को कहने वाला शायर एक प्रश्न छोड़ गया है और तुम्हें उसका जवाब देना है। साहिर भी कम नहीं थे। उन्होंने जवाब देने के लिये उस बैठक में ही एक पूरा गजल बना डाला और जयदेव को सुनाया जो इस प्रकार हैः

कभी खुद पे कभी हालात पे रोना आया
बात निकली तो हरेक बात पे रोना आया

हम तो समझे थे कि हम भूल गये हैं तुमको
क्या हुआ आज ये किस बात पे रोना आया

किस लिये जीते हैं हम किसके लिये जीते हैं
बारहा ऐसे सवालात पे रोना आया

कौन रोता है किसी और के खातिर दोस्त
सबको अपनी ही किसी बात पे रोना आया

जयदेव ने उनके इस गजल की खूब तारीफ़ की और कहा कि वे इसके लिये एक अच्छी सी धुन अवश्य बनायेंगे। विजय आनंद ने भी साहिर से कहा कि वे इस गीत को अपने निर्देशन वाली किसी न किसी फिल्म में अवश्य लेंगे। कुछ दिनों बाद ही विजय आनंद को फिल्म हम दोनों के निर्देशन का काम सौंपा गया और अपने वादे के मुताबिक उन्होंने उस फिल्म में गीत को ले लिया। तो इस प्रकार बातों बातों में ही बन गया था ये गजल!

Friday, December 4, 2009

विचित्र जीव है ये पत्नी नाम की प्राणी

आपकी एक एक बात का लेखा जोखा रहता है इसके पास। बहुत विचित्र जीव है ये पत्नी नाम की प्राणी। पति अपने बारे में जितना नहीं जानता उससे अधिक पत्नी जानती है उसके विषय में। मजाल है कि पति की कोई बात पत्नी से छुप जाये!

शादी के पहले ऑफिस जाते समय हमारी माता जी हमारा टिफिन तैयार करती थीं। हमारी खुराक से अधिक खाना रहता था उसमें। मेरा व्यक्तिगत अनुभव है कि प्रायः प्रत्येक ऑफिस में एक न एक सहकर्मी जरूर ऐसा होता है जो कभी भी अपना टिफिन नहीं लाता पर खायेगा जरूर दूसरों की टिफिन से। हमारे टिफिन का अतिरिक्त खाना हमारे एक ऐसे ही सहयोगी के काम आता था। शादी होने के बाद कुछ दिनों तक तो माता जी ही टिफिन तैयार करती रहीं फिर धीरे से इस कार्यभार को हमारी श्रीमती जी ने अपने हाथों में ले लिया। लंच समय में जब हमने टिफिन खोला तो देखा पाँच पराठों की जगह तीन ही पराठे और चाँवल भी रोज की अपेक्षा आधा। इधर हमारे टिफिनविहीन मित्र भी तत्काल आ धमके। हमारी खाना खाने की गति बहुत धीमी है। हम जब तक एक पराठा खतम करते, मित्र ने दो पराठे उदरस्थ कर लिया। चाँवल का भी अधिकतम हिस्सा उनके ही उदर में समा गया। हम तो रह गये भूखे।

ऑफिस से आने पर श्रीमती जी से जब कहा कि खाना कम क्यों रखा था तो जवाब मिला, " कम? कम कहाँ था? क्या मैं नहीं जानती कि आप कितना खाते हैं? मैंने तो अपने हिसाब से कुछ अधिक ही खाना रखा था। लगता है कि आपका खाना दूसरे लोग खा जाते हैं।"

हमने कहा, "हाँ भइ, अब कोई एकाध रोटी खा ले तो क्या फर्क पड़ता है? मना करते अच्छा भी तो नहीं लगता।"

वे बोलीं, "क्यों अच्छा नहीं लगता? क्या आपके मित्रों को तनखा नहीं मिलती? वो अपना खाना खुद क्यों नहीं लाते? अब से आपका इस प्रकार से रोज रोज दूसरों को खाना खिलाना बिल्कुल नहीं चलेगा।"

बताइए अब हम क्या कहते? इधर ऑफिस में हमारे मित्र को तो आदत लगी हुई थी रोज हमारे साथ खाने की, उन्हें क्या पता कि अब हमें भूखे मरना पड़ता है। अन्ततः दो-तीन दिन बाद कह ही दिया, "यार, तुम अपना खाना लाया करो नहीं तो नजदीक के भोजनालय में चला जाया करो।"

इस प्रकार से श्रीमती जी ने हमसे वह कहलवा लिया जो कि शादी के पहले हम कभी भी नहीं कह सकते थे।

तो मित्रों, पत्नी अपने पति की एक-एक बात, एक-एक आदत को अच्छी तरह से जानती है। आप कब झूठ बोल रहे हैं, कब पीकर आये हैं, किस दिन आपकी सेलरी मिलती है, कब ओव्हरटाइम का पेमेन्ट होता है, सब कुछ जानती है वह।

अक्सर पति त्रस्त रहते हैं पत्नी के उनके बारे में सभी कुछ जानने की वजह से। वे समझते हैं कि पति के लिये पत्नी "साँप के मुँह में छुछूंदर" है जिसे न तो निगलते बनता है और न ही उगलते। पर पत्नियाँ जहाँ एक तरफ पतियों को अपनी मुट्ठी में रखने का भरपूर प्रयास करती हैं वहीं दूसरी तरफ पति पर आये किसी भी विपत्ति को दूर करने के लिये जी जान तक लगा देती हैं।

जीवन में पति-पत्नी के बीच बहुत सारे तकरार, नोक-झोंक चलते हैं किन्तु यह भी सत्य है कि वे दोनों ही एक-दूसरे के पूरक भी हैं। एक के बिना दूसरे का जीवन अधूरा है। पत्नी पति की प्रेरणा होती है। अनेक उदाहरण मिल जायेंगे इसके और सबसे बड़ा उदाहरण तो तुलसीदास जी का है। यदि रत्नावली ने यह न कहा होता किः

"लाज न आवत आपको, दौरे आयहु साथ।
धिक् धिक् ऐसे प्रेम को, कहा कहौं मैं नाथ॥
अस्थिचर्ममय देह यह, ता पर ऐसी प्रीति।
तिसु आधो रघुबीरपद, तो न होति भवभीति॥"

तो आज हम रामचरितमानस से ही वंचित रहते।

श्री गोपाल प्रसाद व्यास जी ने सही ही लिखा हैः

यदि ईश्वर में विश्वास न हो,
उससे कुछ फल की आस न हो,
तो अरे नास्तिको! घर बैठे,
साकार ब्रह्‌म को पहचानो!
पत्नी को परमेश्वर मानो!

(पूरी कविता यहाँ पढ़ें - पत्नी को परमेश्वर मानो!)

तो साहब, हँसी-ठिठोली, हास-परिहास, घात-प्रतिघात, ब्याज-स्तुति, ब्याज-निंदा तो चलते ही रहते हैं। ये सब न हों तो जीवन में रस ही क्या रह जाता है?

एक बात तो माननी ही पड़ेगी, पत्नी चाहे पति को गुलाम बनाये या चाहे पति की गुलामी करे, होती वह सच्चा साथी है। जीवन के सारे सुख-दुःख में साथ निभाने वाली वही होती है!

'अवधिया' या संसार में, मतलब के सब यार।
पत्नी ही बस साथ दे, बाकी रिश्ते बेकार॥

चलते-चलते

पति, "तुम मेरे रिश्तेदारों की बनिस्बत अपने रिश्तेदारों को ज्यादा प्यार करती हो।"

पत्नी, "गलत! मैं अपनी सास से अधिक तुम्हारी सास को प्यार करती हूँ।"

Thursday, December 3, 2009

कभी सोचा भी न था कि लिखने लगूँगा

आज रोज एक पोस्ट लिख लेता हूँ तो मुझे स्वयं के ऊपर बहुत आश्चर्य होता है क्योंकि कभी सोचा भी नहीं था कि लिखने लगूँगा। चार साल पहले मैं नेट में आया था कमाई करने के चक्कर में। साल भर तक नेट को कमाई करने के तरीके जानने के लिये खंगालता रहा। इसी चक्कर में ब्लोगिंग (अंग्रेजी) के बारे में पता चला तो अपने कुछ अंग्रेजी ब्लोग बना डाले और सपने देखने लगा सपना कि एडसेंस से धन बरसने लगेगा और बन जाउँगा मैं धनकुबेर। रोज देखा करता था अपने एडसेंस खाते के बैलेंस को जो कि एक डेढ़ महीनों तक जीरो ही रहा। निराशा तो आती थी पर निराशा से अधिक क्रोध आता था अपने आप पर यह सोच कर कि लोग कमा सकते हैं पर मैं कुछ भी नहीं कमा रहा। फिर धीरे धीरे दो तीन-सेंट रोज के हिसाब से एडसेंस में रकम आने लगी। आठ माह बाद सौ डालर हो जाने पर पहला चेक मिला गूगल से। दूसरा उसके पाँच माह बाद, तीसरा फिर तीन माह बाद। इस प्रकार से कमाई शुरू हो गई।

लगभग एक साल तक तो नेट में हिन्दी और हिन्दी ब्लोग के विषय में पता ही नहीं चला। फिर नेट में हिन्दी के बारे में पता चलने के बाद डोमेननेम, होस्टिंग आदि लेकर अपना एक हिन्दी वेबसाइट भी बना लिया क्योंकि उन दिनों हिन्दी साइट में भी एडसेंस के विज्ञापन आते थे।

तो मैं बता रहा था कि मैंने सोचा भी नहीं था कि मैं कभी लिखने लगूँगा। कवि, लेखक, साहित्यकार, पत्रकार कुछ भी तो नहीं हूँ मैं, कभी रहा भी नहीं था। हाँ, मेरे पिता, स्व. श्री हरिप्रसाद अवधिया, अवश्य साहित्यकार थे, साहित्य की हर विधा में लिखा था उन्होंने। मन में विचार आया कि क्यों न एक हिन्दी ब्लोग बनाकर पिताजी के उपन्यास "धान के देश में" को नेट में डाला जाये। बस बना डाला अपना ब्लोग पिता जी के उपन्यास के नाम पर ही। पिताजी के उपन्यास के पूरा हो जाने पर उनकी अन्य कविता कहानियों को डालने लगा पर धीरे-धीरे वे सब भी मेरे ब्लोग में डल गईं। अब कहाँ से कोई पोस्ट लाता मैं? मजबूर होकर कुछ कुछ लिखने लगा। विश्वास नहीं था कि कोई पसंद करेगा मेरे लिखे को। पर आप लोगों का स्नेह मुझे मिलने लगा और मैंने लिखना जारी रखा। अब तो थोड़ी सी पहचान भी बन गई है मेरी।

इस हिन्दी लेखन के चक्कर में कमाई तो बहुत कम हो गई और रोज हिन्दी लिखने की एक लत अलग से लग गई याने कि "आये थे हरि भजन को और ओटन लगे कपास"

चलते-चलते

धर्मार्थ अस्पताल में डॉक्टर से एक व्यक्ति ने आकर कहा, "मोशन क्लियर नहीं हो रहा है डॉ. साब।"

डॉक्टर ने दवा दे दी।

दूसरे दिन फिर वह आ गया और बोला, "आज भी मोशन क्लियर नहीं हुआ।"

डॉक्टर ने पिछले दिन से अधिक स्ट्रॉग दवा दी।

तीसरे दिन फिर वह आ गया और बोला, "आप की दवा ने आज भी असर नहीं किया।"

डॉक्टर ने और अधिक स्ट्रॉग दवा दी।

चौथे दिन फिर वह आ पहुँचा और बताया कि अभी भी दवा ने असर नहीं किया।

डॉक्टर ने झल्ला कहा, "अरे यार, तुमको मैंने कल जो जुलाब दिया था उसको घोड़े को भी खिला दो तो उसकी टट्टी निकल जाये! आखिर तुम हो क्या बला? करते क्या हो तुम?"

"मैं हिन्दी ब्लोगर हूँ साहब।"

सुनकर डॉक्टर साहब कुछ नरम पड़े और जेब से बीस का एक नोट निकाल कर उसे देते हुए कहा, "ये बीस रुपये लो और जाकर खाना खा लो, कल जरूर मोशन क्लियर हो जायेगा।"

Wednesday, December 2, 2009

हाँ चोर हूँ मैं ... दूसरों के मैटर चुराता हूँ

जी हाँ, दूसरों के मैटर चुराता हूँ मैं। चुराता हूँ क्या अभी कल ही एक मैटर चुराया है मैंने और ऊपर से तुर्रा यह कि जिनका मैटर चुराया है उन्हें मेल करके बता भी दिया कि मैंने उनका मैटर चुराया है याने कि "एक तो चोरी ऊपर से सीनाजोरी"!

मैं बात कर रहा हूँ 'श्री सुरेश चिपलूनकर' जी के लेख "साइट पर विज्ञापन/खबरें देखिये, पैसा कमाईये…" की जिसे कि कुछ फेरबदल करके मैंने अपने ब्लोग "इंटरनेट भारत" में "कमाई करें साइट पर विज्ञापन/खबरें देखकर" नाम से पोस्ट कर दिया।

पर मैं चोर नहीं कलाकार हूँ। मैं अपनी इस चोरी को चोरी न कह कर कलाकारी का नाम दूँगा क्योंकि चोरी करना चौंसठ कलाओं में से एक है - "चौर्यकला"। चाणक्य की राजनीति में भी चौर्यकला को महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। संस्कृत के प्रसिद्ध नाट्यों में चौर्यकला को यथोचित स्थान दिया गया है। महाकवि 'विशाखदत्त' रचित संस्कृत नाट्य "मुद्राराक्षस" में राक्षस की मुद्रा अर्थात् अंगूठी को चाणक्य का एक शिष्य चोरी कर के ही लाता है। 'शूद्रक' रचित संस्कृत नाट्यकाव्य "मृच्छकटिकम" के आधार पर अभिनेता शशिकपूर जी ने फिल्म "उत्सव" बनाया था जिसमें "चौर्यकला" को महत्व देने के लिये एक चोर की भी भूमिका थी। 'स्व. श्री हबीब तनवीर' जी का नाटक "चरणदास चोर" का नायक "चौर्यकला" का उत्कृष्ट प्रदर्शन करता है!

इंटरनेट के वर्तमान युग में तो चौर्यकला सबसे महत्वपूर्ण कला हो गई हैं। कुछ भी लिखना है, खासकर अंग्रेजी में, तो गूगल सर्च कीजिये। चार-पाँच लेखो से अलग-अलग पैराग्राफ को कॉपी करके पेस्ट कर दीजिये और हो गया आपका लेख तैयार। याने कि "हींग लगे न फिटकिरी और रंग आये चोखा"! आप चाहें तो किसी एक लेख को ही कॉपी पेस्ट कर सकते हैं किन्तु ऐसी स्थिति में उसे रीराइट कर लेना बेहतर होता है।

हमारे पाठकों में से शायद ही कोई ऐसा हो जिसने अपने जीवन में कभी कोई चीज चुराई न हो। मतलब कि "हम सब चोर हैं" और यह तो आप जानते ही हैं कि "चोर चोर मौसेरे भाई" होते हैं। मैं मान कर चल रहा हूँ कि आप सब मेरे मौसेरे भाई हैं, इसीलिये मैंने इस पोस्ट को लिखा है।

चलते-चलते

हाँ या ना में जवाब दो।

"क्या तुमने चोरी करना छोड़ दिया?"

Tuesday, December 1, 2009

मेरा "अवधिया चाचा" से दूर से भी कोई सम्बन्ध नहीं है

ललित शर्मा जी से फोन पर मेरी बात हुई तो उन्होंने शंका जाहिर की कि कहीं "अवधिया चाचा" मेरा छद्मनाम तो नहीं है? यह भी पता चला कि बहुत से लोग ऐसा ही समझते हैं। इस पोस्ट के माध्यम से मैं स्पष्ट कर देना उचित समझता हूँ कि मेरा इस "अवधिया चाचा" से दूर-दूर का भी कोई सम्बन्ध नहीं है। अभी मेरे इतने बुरे दिन नहीं आये हैं कि मुझे कोई छद्मनाम रखना पड़े और मेरा विश्वास है कि कभी मेरे बुरे दिन आयेंगे भी नहीं। मैं तो किसी भी बात को खुल्लमखुल्ला कहने में ही विश्वास रखता हूँ, नाम बदल कर परोक्ष रूप से कुछ कहना मेरी आदत नहीं है। अतः बन्धुओं! यदि आपको भी इस प्रकार की भ्रान्ति है तो आशा करता हूँ कि इस पोस्ट को पढ़ने के अपनी इस भ्रान्ति को दिल से निकाल देंगे।

यह तो हुआ स्पष्टीकरण।

अब आते हैं उस बात पर जिसे मैं आज अपने पोस्ट में बताना चाहता था। आप हिन्दी के अनेक ऐसे शब्दों को जानते होंगे जिसके अन्त में 'ज' या 'जा' आता है, जैसे कि पंकज, नीरज, गिरिजा, तनुजा इत्यादि।

तो क्या है यह 'ज'? वास्तव में 'ज' एक प्रत्यय है। जब किसी शब्द के अन्त में एक या एक से अधिक अक्षरों को जोड़कर एक नया शब्द बना दिया जाता है तो अन्त में जोड़े गये अक्षरों को प्रत्यय कहते हैं। जैसे कि "प्राचीन" शब्द के अन्त में 'तम' लगा दें तो नया शब्द "प्राचीनतम" बन जाता है।

तो अन्त में लगने वाले ज प्रत्यय का अर्थ क्या होता है?

'ज' प्रत्यय संस्कृत के "जायते" शब्द से बना है और इसका अर्थ होता है जन्म लेना। जिसने 'पंक' अर्थात 'कीचड़' से जन्म लिया वह 'पंकज' याने कि 'कमल'। जिसने 'गिरि' अर्थात् 'पर्वत' से जन्म लिया वह 'गिरिजा' याने कि 'पार्वती'।

'ज' प्रत्यय वाले शब्दों में "द्विज" एक विशिष्ट शब्द है। 'द्वि' अर्थात दो बार तथा "द्विज" याने कि "जिसने दो बार जन्म लिया"। द्विज ब्राह्मण को कहते हैं क्योंकि ऐसा माना जाता है कि ब्राह्मणों का पहला जन्म माता के गर्भ से होता है और दूसरा जन्म उपनयन संस्कार होने पर होता है। द्विज पक्षियों को भी कहते हैं क्योंकि पक्षी का एक बार जन्म अण्डे के रूप में होता है और दूसरी बार पक्षी के रूप में।

अब जब आपने प्रत्यय को जान लिया है तो उपसर्ग को भी जान लें। उपसर्ग प्रत्यय का ठीक उलटा होता है। जब किसी शब्द के आरम्भ में एक या एक से अधिक अक्षरों को जोड़कर एक नया शब्द बना दिया जाता है तो आरम्भ में जोड़े गये अक्षरों को उपसर्ग कहते हैं। जैसे कि "प्रभात" के पहले 'सु' जोड़ दिया तो नया शब्द बन गया "सुप्रभात"।

चलते-चलते

इमरजेंसी के दिनों में ऑफिस के अटैन्डेन्स रजिस्टर में देर से ऑफिस आने का कारण बताने के लिये एक कॉलम और बनाया गया था। जो भी देर से आता वह देर होने का कारण भी लिखता था जैसे कि रास्ते में सायकल पंचर हो गई, ट्रैफिक जाम में फँस गया आदि। शुरू-शुरू में तो हर आदमी अपने-अपने देर से आने का कारण लिखता था पर कुछ महीने बीत जाने पर कुछ ऐसा रवैया बन गया कि सबसे पहले देर से आने वाला कोई कारण लिख देता था और उसके बाद वाले सिर्फ उसके नीचे यथा (डिटो) का निशान (-do-) बना दिया करते थे।

एक दिन सबसे पहले देर से आने वाले ने ऑफिस में देर से आने का कारण लिखा "मेरी पत्नी ने जुड़वें बच्चों को जन्म दिया" और उसके बाद आने वाले सारे लोगों ने आदत के अनुसार उसके नीचे यथा (डिटो) का निशान (-do-) बना दिया।

Monday, November 30, 2009

इस ब्लोगिंग ने आपकी बुद्धि को भ्रष्ट कर दिया है - श्रीमती अवधिया

श्रीमती अवधिया उवाच:

"हे आर्यपुत्र! इस ब्लोगिंग ने आपकी बुद्धि को भ्रष्ट कर दिया है। आप विक्षिप्त होते जा रहे हैं। वर्तमान में प्रचलित भाषा को आपकी बुद्धि ग्रहण नहीं कर पाती इसलिये मुझे आपके ब्लोग की भाषा में ही आपसे वार्तालाप करना पड़ रहा है। आपकी स्मरण शक्ति मंद होते जा रही है। आपको मेरा कुछ ध्यान ही नहीं रहता। आप दिन-रात अपने ब्लोगिंग में ही लिप्त रहने लगे हैं। आप मुझ पर कटाक्ष करने वाले पोस्ट लिख-लिख कर अपना टीआरपी बढ़ाने लगे हैं। अब मैं आपकी अर्धांगिनी न रह कर केवल आपके टीआरपी बढ़ाने का साधन मात्र बन कर रह गई हूँ

हे गर्दभबुद्धि नाथ! तनिक स्मरण कीजिये कि मैंने विवाहपूर्व अतिसुन्दर, प्रसन्नवदन इंजीनियर लड़के के प्रणय-निवेदन को अस्वीकार करके आपका वरण किया था क्योंकि आप मेरी प्रिय सखी के अग्रज थे और मुझे विदित था कि आपको मेरी ही भाँति चलचित्र दर्शन में अनन्य रुचि है। विवाहोपरान्त आपने मुझे अनेक चलचित्रों के दर्शन करवाये किन्तु शनैः-शनैः चलचित्र-दर्शन की संख्या कम होने लगी। आज आप चलचित्रों पर पोस्ट तो लिखते हैं किन्तु अपनी इस प्राणप्रिया को चलचित्र-दर्शन करवाने में किंचित मात्र भी रुचि नहीं दर्शाते।

हे महापातकी पतिदेव! हमारे विवाह के पश्चात् आप मेरे दर्शन किये बिना व्याकुल रहा करते थे किन्तु लगभग एक वर्ष की अवधि व्यतीत होने पर आपको परस्त्री दर्शन में ही अधिक सुख की प्राप्ति होने लगी। आप कामजनित अधर्म में लिप्त हो गये। फिर भी मैं सहन करती रही। हे निष्ठुर! आप मेरे समक्ष ही मेरी सखियों से मृदु वार्तालाप करने में व्यस्त रहने लगे, फिर भी मैंने धैर्य ही धारण किया।

हे मूर्खाधिराज स्वामी! अब यह ब्लोगिंग आपको मुझसे दिन-प्रति-दिन दूर ले जाती जा रही है। वर्षों से आपने मुझे किसी चलचित्र का दर्शन नहीं करवाया है। किसी जलपानगृह में गये कितना समय व्यतीत हो चुका है यह मुझे स्मरण नहीं। मैंने बहुत सहन किया किन्तु अब और धैर्य धारण कर पाने में स्वयं को असमर्थ पा रही हूँ। मेरा क्रोध अपनी चरमस्थिति में पहुँचते जा रहा है। आप यह समझने की भूल कदापि न करें कि मैं कैकेयी की भाँति कुपित होकर कोप-भवन में चली जाउँगी। मुझे अच्छी प्रकार से विदित है कि मेरे कोप-भवन चले जाने पर आप कदापि मुझे मनाने के लिये नहीं आने वाले हैं। मेरे कोप-भवन चले जाने से तो आप और भी प्रसन्न होकर अपने पोस्ट लिखने में व्यस्त हो जायेंगे। मैं आपको यह विदित करा देना उचित समझती हूँ कि मैं रामायण काल की नारी न होकर आधुनिक काल अर्थात् इक्कीसवीं सदी की नारी हूँ। यदि पति का सम्मान करना जानती हूँ तो पति के अहं को चूर-चूर करना भी मुझे अच्छी प्रकार से आता है।

अतः हे अज्ञानी आर्यपुत्र! आज रविवार के दिन यदि आपने मुझे चलचित्र-दर्शन नहीं करवाया तो मैं रणचण्डी का रूप धारण कर लूँगी, मेरे क्रोध की ज्वाला प्रज्वलित हो जायेगी। मेरे उस क्रोध की ज्वाला से आपके इस कम्प्यूटर का कैसा विनाश होगा इस बात का अनुमान लगाने योग्य बुद्धि, आपकी मति के कुंद हो जाने के बाद भी, अभी भी आपके पास शेष बचा हैं।"

पत्नी के वचन सुनकर एवं रौद्ररूप देख कर भयभीत अवधिया ने तत्काल कम्प्यूटर बंद कर दिया और अपनी अर्धांगिनी को चलचित्र दर्शन करवाने की तैयारी आरम्भ कर दी।

चलते-चलते

मनाली के एक होटल के कमरे में ठहरी दो सहेलियों ने घूम कर आने के बाद अपने वस्त्र बदले। वस्त्र बदलते वक्त भूल से खिड़की खुली रह गई थी अतः परिणामस्वरूप एक को ठंड ने जकड़ लिया और एक को एक करोड़पति युवक ने।

Sunday, November 29, 2009

क्या आप जानते हैं कि दादा साहेब फालके से पहले भी फिल्में बनाई गई थीं भारत में?

7 जुलाई 1886 को मुंबई (पूर्व नाम बंबई) के वाटकिंस हॉटल में ल्युमेरे ब्रदर्स ने छः लघु चलचित्रों का प्रदर्शन किया था। उन छोटी-छोटी फिल्मों ने ध्वनिविहीन होने बावजूद भी दर्शकों का मनोरंजन किया था।

इन लघु चलचित्रों से प्रभावित होकर श्री एच.एस. भटवडेकर और श्री हीरालाल सेन नामक व्यक्तियों ने ल्युमेरे ब्रदर्स की तरह क्रमशः मुंबई (पूर्व नाम बंबई) और कोलकाता (पूर्व नाम कलकत्ता) में लघु चलचित्रों का निर्माण प्रारंभ कर दिया। सन् 1899 मे श्री भटवडेकर ने भारत के प्रथम लघु चलचित्र बनाने में सफलता प्राप्त की।

दादा साहेब फालके ने अपने लंदन प्रवास के दौरान ईसा मसीह के जीवन पर आधारित एक चलचित्र देखा। वह फिल्म ल्युमेरे ब्रदर्स की फिल्मों की तरह लघु चलचित्र न होकर लंबी फिल्म थी। उस फिल्म को देख कर दादा साहेब फालके के मन में पौराणिक कथाओं पर आधारित चलचित्रों के निर्माण करने की प्रबल इच्छा जागृत हुई। स्वदेश आकर उन्होंने राजा हरिश्चंद्र बनाई जो कि भारत की पहली लंबी फिल्म थी और सन् 1913 में प्रदर्शित हुई। उस चलचित्र ने (ध्वनिविहीन होने के बावजूद भी) लोगों का भरपूर मनोरंजन किया और दर्शकों ने उसकी खूब तारीफ की। यह एक लघु चलचित्र न होकर लंबी फिल्म थी इसीलिये इसे भारत के पहली फिल्म होने का श्रेय मिला। तो यह थी भारत में चलचित्र निर्माण की शुरवात।

उसके बाद तो चलचित्र निर्माण ने भारत के एक उद्योग का रूप धारण कर लिया और तीव्रता पूर्वक उसका विकास होने लगा। उन दिनों हिमांशु राय जर्मनी के यू.एफ.ए. स्टुडिओ में निर्माता के रूप में कार्यरत थे। वे अपनी पत्नी देविका रानी के साथ स्वदेश वापस आ गये और अपने देश में चलचित्रों का निर्माण करने लगे। उनकी पत्नी देविका रानी स्वयं उनकी फिल्मों में नायिका (हीरोइन) का कार्य करती थी। पति-पत्नी दोनों को खूब सफलता मिली और दोनों ने मिलकर बांबे टाकीज स्टुडिओ की स्थापना की।

उन दिनों केवल मूक फिल्में ही बना करती थीं। इन मूक फिल्मों का जिस भी थियेटर में प्रदर्शन होता था वहाँ पर फिल्म के परदे के पास से एक उद्घोषक भोंपू लेकर खड़ा रहता था जो कि फिल्म की कथा का वर्णन दर्शकों के सामने किया करता था।

1930 के आसपास चलचित्रों में ध्वनि के समावेश करने का तकनीक विकसित हो जाने से सवाक् (बोलती) फिल्में बनने लगीं। आलम आरा भारत की पहली सवाक् फिल्म थी जो कि सन् 1931 में प्रदर्शित हुई। 1933 में प्रदर्शित फिल्म कर्मा इतनी अधिक लोकप्रिय हुई कि उस फिल्म की नायिका देविका रानी को लोग फिल्म स्टार के नाम से संबोधित करने लगे और वे भारत की प्रथम महिला फिल्म स्टार बनीं।

मूक फिल्मों के जमाने तक मुंबई (पूर्व नाम बंबई) देश में चलचित्र निर्माण का केन्द्र बना रहा परंतु सवाक् फिल्मों का निर्माण शुरू हो जाने से और हमारे देश में विभिन्न भाषाओं का चलन होने के कारण चेन्नई (पूर्व नाम मद्रास) में दक्षिण भारतीय भाषाओं वाली चलचित्रों का निर्माण होने लगा। इस तरह भारत का चलचित्र उद्योग दो भागों में विभक्त हो गया।

उन दिनों प्रभात स्टुडिओ, बांबे टाकीज और न्यू थियेटर्स भारत के प्रमुख स्टुडिओ थे और ये प्रायः गंभीर किंतु मनोरंजक फिल्में बना कर दर्शकों का मनोरंजन किया करती थीं। ये तीनों स्टुडिओ देश के बड़े बैनर्स कहलाते थे। उन दिनों सामाजिक अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाने वाली, धार्मिक तथा पौराणिक, ऐतिहासिक, देशप्रेम से सम्बंधित चलचित्रों का निर्माण हुआ करता था और उन्हें बहुत अधिक पसंद भी किया जाता था। उस समय के कुछ प्रसिद्ध एवं लोकप्रिय फिल्में हैं - व्ही. शांताराम की फिल्म "दुनिया ना माने", फ्रैंज ओस्टन की फिल्म "अछूत कन्या", दामले और फतेहलाल की फिल्म "संत तुकाराम", मेहबूब खान की फिल्में "वतन", "एक ही रास्ता" और "औरत", अर्देशीर ईरानी की फिल्म "किसान कन्या" आदि।

व्ही. शांताराम की "डा. कोटनीस की अमर कहानी", मेहबूब ख़ान की "रोटी", चेतन आनंद की "नीचा नगर", उदय शंकर की "कल्पना", ख्वाज़ा अहमद अब्बास की "धरती के लाल", सोहराब मोदी की "सिकंदर", "पुकार" और "पृथ्वी वल्लभ", जे.बी.एच. वाडिया की "कोर्ट डांसर", एस.एस. वासन की "चंद्रलेखा", विजय भट्ट की "भरत मिलाप" और "राम राज्य", राज कपूर की "बरसात" और "आग" उन दिनों की अविस्मरणीय फिल्में हैं।

आरंभ में स्टुडिओ पद्धति का प्रचलन रहा। हरेक स्टुडिओ के अपने वेतनभोगी निर्माता, निर्देशक, संगीतकार, नायक, नायिका तथा अन्य कलाकार हुआ करते थे। पर बाद चलचित्र निर्माण में रुचि रखने वाले लोग स्वतंत्र निर्माता के रूप में फिल्म बनाने लगे। इन स्वतंत्र निर्माताओं ने स्टुडिओं को किराये पर लेना तथा कलाकारों से ठेके पर काम करवाना शुरू कर दिया. चूँकि ठेके में काम करने में अधिक आमदनी होती थी, कलाकारों ने वेतन लेकर काम करना लगभग बंद कर दिया। इस प्रकार स्टुडिओ पद्धति का चलन समाप्त हो गया और स्टुडिओं को केवल किराये पर दिया जाने लगा।

बाद के दिनों में तकनीकी का और भी विकास होने से स्टुडियो से बाहर जाकर आउटडोर शूटिंग का चलन हुआ।

यही था भारत में चलचित्र निर्माण का प्रारंभ।

चलते-चलते

बांबे टाकीज में फिल्म जीवन नैया बन रही थी और फिल्म में हीरो (नज़ाम-उल-हुसैन) हीरोइन (देविका रानी) को फिल्म की कहानी में भगाने के स्थान पर सचमुच ही भगा ले गये। हिमांशु राय भी कम न थे, खोजबीन करवा के दोनों को पकड़ मंगवाया। देविकारानी को तो क्षमा कर दिया उन्होंने पर नज़ाम-उल-हुसैन को बांबे टाकीज से निकाल बाहर कर दिया।

अब समस्या यह थी कि हीरो कहाँ से लायें? अचानक उनके जेहन में बिजली सी कौंधी कि उनके स्टुडियो का प्रयोगशाला सहायक (laboratory assistant) कुमुदलाल कांजीलाल गांगुली नौजवान भी है और खूबसूरत भी, हीरो का रोल अवश्य फब जायेगा उसे। आदेश दे दिया उसे कि हीरो का रोल करो। बेचारे कुमुदलाल ने बहुत कहा कि मुझे अभिनय का क ख ग भी नहीं आता पर उनकी एक न चली, नौकरी जो करनी थी। कुमुदलाल का फिल्मी नाम भी रख दिया हिमांशुराय ने - फिल्मी नाम था अशोक कुमार। फिल्म बनी और चली भी, ये बात अलग है कि फिल्म देविकारानी की वजह से ही चली पर अशोक कुमार बन गये मशहूर हीरो।


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जाम्बवन्त द्वारा हनुमान को प्रेरणा - किष्किन्धाकाण्ड (13)