Monday, November 30, 2009

इस ब्लोगिंग ने आपकी बुद्धि को भ्रष्ट कर दिया है - श्रीमती अवधिया

श्रीमती अवधिया उवाच:

"हे आर्यपुत्र! इस ब्लोगिंग ने आपकी बुद्धि को भ्रष्ट कर दिया है। आप विक्षिप्त होते जा रहे हैं। वर्तमान में प्रचलित भाषा को आपकी बुद्धि ग्रहण नहीं कर पाती इसलिये मुझे आपके ब्लोग की भाषा में ही आपसे वार्तालाप करना पड़ रहा है। आपकी स्मरण शक्ति मंद होते जा रही है। आपको मेरा कुछ ध्यान ही नहीं रहता। आप दिन-रात अपने ब्लोगिंग में ही लिप्त रहने लगे हैं। आप मुझ पर कटाक्ष करने वाले पोस्ट लिख-लिख कर अपना टीआरपी बढ़ाने लगे हैं। अब मैं आपकी अर्धांगिनी न रह कर केवल आपके टीआरपी बढ़ाने का साधन मात्र बन कर रह गई हूँ

हे गर्दभबुद्धि नाथ! तनिक स्मरण कीजिये कि मैंने विवाहपूर्व अतिसुन्दर, प्रसन्नवदन इंजीनियर लड़के के प्रणय-निवेदन को अस्वीकार करके आपका वरण किया था क्योंकि आप मेरी प्रिय सखी के अग्रज थे और मुझे विदित था कि आपको मेरी ही भाँति चलचित्र दर्शन में अनन्य रुचि है। विवाहोपरान्त आपने मुझे अनेक चलचित्रों के दर्शन करवाये किन्तु शनैः-शनैः चलचित्र-दर्शन की संख्या कम होने लगी। आज आप चलचित्रों पर पोस्ट तो लिखते हैं किन्तु अपनी इस प्राणप्रिया को चलचित्र-दर्शन करवाने में किंचित मात्र भी रुचि नहीं दर्शाते।

हे महापातकी पतिदेव! हमारे विवाह के पश्चात् आप मेरे दर्शन किये बिना व्याकुल रहा करते थे किन्तु लगभग एक वर्ष की अवधि व्यतीत होने पर आपको परस्त्री दर्शन में ही अधिक सुख की प्राप्ति होने लगी। आप कामजनित अधर्म में लिप्त हो गये। फिर भी मैं सहन करती रही। हे निष्ठुर! आप मेरे समक्ष ही मेरी सखियों से मृदु वार्तालाप करने में व्यस्त रहने लगे, फिर भी मैंने धैर्य ही धारण किया।

हे मूर्खाधिराज स्वामी! अब यह ब्लोगिंग आपको मुझसे दिन-प्रति-दिन दूर ले जाती जा रही है। वर्षों से आपने मुझे किसी चलचित्र का दर्शन नहीं करवाया है। किसी जलपानगृह में गये कितना समय व्यतीत हो चुका है यह मुझे स्मरण नहीं। मैंने बहुत सहन किया किन्तु अब और धैर्य धारण कर पाने में स्वयं को असमर्थ पा रही हूँ। मेरा क्रोध अपनी चरमस्थिति में पहुँचते जा रहा है। आप यह समझने की भूल कदापि न करें कि मैं कैकेयी की भाँति कुपित होकर कोप-भवन में चली जाउँगी। मुझे अच्छी प्रकार से विदित है कि मेरे कोप-भवन चले जाने पर आप कदापि मुझे मनाने के लिये नहीं आने वाले हैं। मेरे कोप-भवन चले जाने से तो आप और भी प्रसन्न होकर अपने पोस्ट लिखने में व्यस्त हो जायेंगे। मैं आपको यह विदित करा देना उचित समझती हूँ कि मैं रामायण काल की नारी न होकर आधुनिक काल अर्थात् इक्कीसवीं सदी की नारी हूँ। यदि पति का सम्मान करना जानती हूँ तो पति के अहं को चूर-चूर करना भी मुझे अच्छी प्रकार से आता है।

अतः हे अज्ञानी आर्यपुत्र! आज रविवार के दिन यदि आपने मुझे चलचित्र-दर्शन नहीं करवाया तो मैं रणचण्डी का रूप धारण कर लूँगी, मेरे क्रोध की ज्वाला प्रज्वलित हो जायेगी। मेरे उस क्रोध की ज्वाला से आपके इस कम्प्यूटर का कैसा विनाश होगा इस बात का अनुमान लगाने योग्य बुद्धि, आपकी मति के कुंद हो जाने के बाद भी, अभी भी आपके पास शेष बचा हैं।"

पत्नी के वचन सुनकर एवं रौद्ररूप देख कर भयभीत अवधिया ने तत्काल कम्प्यूटर बंद कर दिया और अपनी अर्धांगिनी को चलचित्र दर्शन करवाने की तैयारी आरम्भ कर दी।

चलते-चलते

मनाली के एक होटल के कमरे में ठहरी दो सहेलियों ने घूम कर आने के बाद अपने वस्त्र बदले। वस्त्र बदलते वक्त भूल से खिड़की खुली रह गई थी अतः परिणामस्वरूप एक को ठंड ने जकड़ लिया और एक को एक करोड़पति युवक ने।

Sunday, November 29, 2009

क्या आप जानते हैं कि दादा साहेब फालके से पहले भी फिल्में बनाई गई थीं भारत में?

7 जुलाई 1886 को मुंबई (पूर्व नाम बंबई) के वाटकिंस हॉटल में ल्युमेरे ब्रदर्स ने छः लघु चलचित्रों का प्रदर्शन किया था। उन छोटी-छोटी फिल्मों ने ध्वनिविहीन होने बावजूद भी दर्शकों का मनोरंजन किया था।

इन लघु चलचित्रों से प्रभावित होकर श्री एच.एस. भटवडेकर और श्री हीरालाल सेन नामक व्यक्तियों ने ल्युमेरे ब्रदर्स की तरह क्रमशः मुंबई (पूर्व नाम बंबई) और कोलकाता (पूर्व नाम कलकत्ता) में लघु चलचित्रों का निर्माण प्रारंभ कर दिया। सन् 1899 मे श्री भटवडेकर ने भारत के प्रथम लघु चलचित्र बनाने में सफलता प्राप्त की।

दादा साहेब फालके ने अपने लंदन प्रवास के दौरान ईसा मसीह के जीवन पर आधारित एक चलचित्र देखा। वह फिल्म ल्युमेरे ब्रदर्स की फिल्मों की तरह लघु चलचित्र न होकर लंबी फिल्म थी। उस फिल्म को देख कर दादा साहेब फालके के मन में पौराणिक कथाओं पर आधारित चलचित्रों के निर्माण करने की प्रबल इच्छा जागृत हुई। स्वदेश आकर उन्होंने राजा हरिश्चंद्र बनाई जो कि भारत की पहली लंबी फिल्म थी और सन् 1913 में प्रदर्शित हुई। उस चलचित्र ने (ध्वनिविहीन होने के बावजूद भी) लोगों का भरपूर मनोरंजन किया और दर्शकों ने उसकी खूब तारीफ की। यह एक लघु चलचित्र न होकर लंबी फिल्म थी इसीलिये इसे भारत के पहली फिल्म होने का श्रेय मिला। तो यह थी भारत में चलचित्र निर्माण की शुरवात।

उसके बाद तो चलचित्र निर्माण ने भारत के एक उद्योग का रूप धारण कर लिया और तीव्रता पूर्वक उसका विकास होने लगा। उन दिनों हिमांशु राय जर्मनी के यू.एफ.ए. स्टुडिओ में निर्माता के रूप में कार्यरत थे। वे अपनी पत्नी देविका रानी के साथ स्वदेश वापस आ गये और अपने देश में चलचित्रों का निर्माण करने लगे। उनकी पत्नी देविका रानी स्वयं उनकी फिल्मों में नायिका (हीरोइन) का कार्य करती थी। पति-पत्नी दोनों को खूब सफलता मिली और दोनों ने मिलकर बांबे टाकीज स्टुडिओ की स्थापना की।

उन दिनों केवल मूक फिल्में ही बना करती थीं। इन मूक फिल्मों का जिस भी थियेटर में प्रदर्शन होता था वहाँ पर फिल्म के परदे के पास से एक उद्घोषक भोंपू लेकर खड़ा रहता था जो कि फिल्म की कथा का वर्णन दर्शकों के सामने किया करता था।

1930 के आसपास चलचित्रों में ध्वनि के समावेश करने का तकनीक विकसित हो जाने से सवाक् (बोलती) फिल्में बनने लगीं। आलम आरा भारत की पहली सवाक् फिल्म थी जो कि सन् 1931 में प्रदर्शित हुई। 1933 में प्रदर्शित फिल्म कर्मा इतनी अधिक लोकप्रिय हुई कि उस फिल्म की नायिका देविका रानी को लोग फिल्म स्टार के नाम से संबोधित करने लगे और वे भारत की प्रथम महिला फिल्म स्टार बनीं।

मूक फिल्मों के जमाने तक मुंबई (पूर्व नाम बंबई) देश में चलचित्र निर्माण का केन्द्र बना रहा परंतु सवाक् फिल्मों का निर्माण शुरू हो जाने से और हमारे देश में विभिन्न भाषाओं का चलन होने के कारण चेन्नई (पूर्व नाम मद्रास) में दक्षिण भारतीय भाषाओं वाली चलचित्रों का निर्माण होने लगा। इस तरह भारत का चलचित्र उद्योग दो भागों में विभक्त हो गया।

उन दिनों प्रभात स्टुडिओ, बांबे टाकीज और न्यू थियेटर्स भारत के प्रमुख स्टुडिओ थे और ये प्रायः गंभीर किंतु मनोरंजक फिल्में बना कर दर्शकों का मनोरंजन किया करती थीं। ये तीनों स्टुडिओ देश के बड़े बैनर्स कहलाते थे। उन दिनों सामाजिक अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाने वाली, धार्मिक तथा पौराणिक, ऐतिहासिक, देशप्रेम से सम्बंधित चलचित्रों का निर्माण हुआ करता था और उन्हें बहुत अधिक पसंद भी किया जाता था। उस समय के कुछ प्रसिद्ध एवं लोकप्रिय फिल्में हैं - व्ही. शांताराम की फिल्म "दुनिया ना माने", फ्रैंज ओस्टन की फिल्म "अछूत कन्या", दामले और फतेहलाल की फिल्म "संत तुकाराम", मेहबूब खान की फिल्में "वतन", "एक ही रास्ता" और "औरत", अर्देशीर ईरानी की फिल्म "किसान कन्या" आदि।

व्ही. शांताराम की "डा. कोटनीस की अमर कहानी", मेहबूब ख़ान की "रोटी", चेतन आनंद की "नीचा नगर", उदय शंकर की "कल्पना", ख्वाज़ा अहमद अब्बास की "धरती के लाल", सोहराब मोदी की "सिकंदर", "पुकार" और "पृथ्वी वल्लभ", जे.बी.एच. वाडिया की "कोर्ट डांसर", एस.एस. वासन की "चंद्रलेखा", विजय भट्ट की "भरत मिलाप" और "राम राज्य", राज कपूर की "बरसात" और "आग" उन दिनों की अविस्मरणीय फिल्में हैं।

आरंभ में स्टुडिओ पद्धति का प्रचलन रहा। हरेक स्टुडिओ के अपने वेतनभोगी निर्माता, निर्देशक, संगीतकार, नायक, नायिका तथा अन्य कलाकार हुआ करते थे। पर बाद चलचित्र निर्माण में रुचि रखने वाले लोग स्वतंत्र निर्माता के रूप में फिल्म बनाने लगे। इन स्वतंत्र निर्माताओं ने स्टुडिओं को किराये पर लेना तथा कलाकारों से ठेके पर काम करवाना शुरू कर दिया. चूँकि ठेके में काम करने में अधिक आमदनी होती थी, कलाकारों ने वेतन लेकर काम करना लगभग बंद कर दिया। इस प्रकार स्टुडिओ पद्धति का चलन समाप्त हो गया और स्टुडिओं को केवल किराये पर दिया जाने लगा।

बाद के दिनों में तकनीकी का और भी विकास होने से स्टुडियो से बाहर जाकर आउटडोर शूटिंग का चलन हुआ।

यही था भारत में चलचित्र निर्माण का प्रारंभ।

चलते-चलते

बांबे टाकीज में फिल्म जीवन नैया बन रही थी और फिल्म में हीरो (नज़ाम-उल-हुसैन) हीरोइन (देविका रानी) को फिल्म की कहानी में भगाने के स्थान पर सचमुच ही भगा ले गये। हिमांशु राय भी कम न थे, खोजबीन करवा के दोनों को पकड़ मंगवाया। देविकारानी को तो क्षमा कर दिया उन्होंने पर नज़ाम-उल-हुसैन को बांबे टाकीज से निकाल बाहर कर दिया।

अब समस्या यह थी कि हीरो कहाँ से लायें? अचानक उनके जेहन में बिजली सी कौंधी कि उनके स्टुडियो का प्रयोगशाला सहायक (laboratory assistant) कुमुदलाल कांजीलाल गांगुली नौजवान भी है और खूबसूरत भी, हीरो का रोल अवश्य फब जायेगा उसे। आदेश दे दिया उसे कि हीरो का रोल करो। बेचारे कुमुदलाल ने बहुत कहा कि मुझे अभिनय का क ख ग भी नहीं आता पर उनकी एक न चली, नौकरी जो करनी थी। कुमुदलाल का फिल्मी नाम भी रख दिया हिमांशुराय ने - फिल्मी नाम था अशोक कुमार। फिल्म बनी और चली भी, ये बात अलग है कि फिल्म देविकारानी की वजह से ही चली पर अशोक कुमार बन गये मशहूर हीरो।


------------------------------------------------------
"संक्षिप्त वाल्मीकि रामायण" का अगला पोस्टः

जाम्बवन्त द्वारा हनुमान को प्रेरणा - किष्किन्धाकाण्ड (13)

Saturday, November 28, 2009

"जब जीरो दिया मेरे भारत ने"... पर कैसे दिया भारत ने जीरो?

बड़े गर्व से हम कहते हैं कि हमारे भारत ने विश्व को शून्य दिया। आइये देखते हैं कि आखिर भारत ने विश्व को शून्य दिया?

यदि शून्य न हो तो क्या आप गणितीय गणना कर सकते हैं?

जी हाँ, कर तो सकते हैं पर उसकी विधि अवश्य ही अत्यंत दुरूह होगी।

किंतु यह भी सत्य है कि कई हजार वर्ष बिना शून्य के ही बीते हैं। लोगों को यह तो ज्ञात होता था कि उनके पास कुछ नहीं है पर इस कुछ भी नहीं के लिये उनके पास कोई गणितीय संकेत नहीं था।

शून्य का आविष्कार किसने और कब किया यह आज तक अंधकार के गर्त में छुपा हुआ है परंतु सम्पूर्ण विश्व में यह तथ्य स्थापित हो चुका है कि शून्य का आविष्कार भारत में ही हुआ। ऐसी भी कथाएँ प्रचलित हैं कि पहली बार शून्य का आविष्कार बेबीलोन में हुआ और दूसरी बार माया सभ्यता के लोगों ने इसका आविष्कार किया पर दोनों ही बार के आविष्कार संख्या प्रणाली को प्रभावित करने में असमर्थ रहे तथा विश्व के लोगों ने इन्हें भुला दिया।

फिर भारतीयों ने तीसरी बार शून्य का आविष्कार किया। भारत में हुए इस तीसरी बार शून्य के आविष्कार ने संख्या प्रणाली को ऐसा प्रभावित किया कि सम्पूर्ण विश्व में शून्य का प्रयोग होने लगा। भारतीयों ने शून्य के विषय में कैसे जाना यह आज भी अनुत्तरित प्रश्न है। अधिकतम विद्वानों का मत है कि पांचवीं शताब्दी के मध्य में शून्य का आविष्कार किया गया।

इंटरनेट के सबसे बड़े विश्वकोष 'विकीपेडिया' के अनुसारः

"सन् 498 में भारतीय गणितज्ञ एवं खगोलवेत्ता आर्यभट ने कहा 'स्थानं स्थानं दसा गुणम्' अर्थात् दस गुना करने के लिये (उसके) आगे (शून्य) रखो। और शायद यही संख्या के दशमलव सिद्धांत का उद्गम रहा होगा। आर्यभट द्वारा रचित गणितीय खगोलशास्त्र ग्रंथ 'आर्यभटीय' के संख्या प्रणाली में शून्य तथा उसके लिये विशिष्ट संकेत सम्मिलित था (इसी कारण से उन्हें संख्याओं को शब्दों में प्रदर्शित करने का भी अवसर मिला)।

"शून्य तथा संख्या के दशमलव के सिद्धांत का सर्वप्रथम अस्पष्ट प्रयोग ब्रह्मगुप्त रचित ग्रंथ ब्रह्मस्फुट सिद्धांत में पाया गया है। इस ग्रंथ में नकारात्मक संख्याओ और बीजगणितीय सिद्धांतों का भी प्रयोग हुआ है।

कुछ शोधकार्यों के अनुसार प्रचीन भारतीय 'बक्षाली' लिपि में भी शून्य का प्रयोग किया गया है और उसके लिये उसमें संकेत भी निश्चित है। बक्षाली लिपि का सही काल अब तक निश्चित नहीं हो पाया है परंतु निश्चित रूप से उसका काल आर्यभट के काल से प्राचीन है। इससे सिद्ध होता है कि भारत में शून्य का प्रयोग पाँचवी शताब्दी से पहले भी होता था।"

उपरोक्त उद्धरणों से स्पष्ट है कि भारत में शून्य का प्रयोग ब्रह्मगुप्त के काल से भी पूर्व के काल में होता था। किन्तु सातवीं शताब्दी, जो कि ब्रह्मगुप्त का काल था, में भारत का यह शून्य कम्बोडिया तक पहुँच चुका था और दस्तावेजों से यह भी ज्ञात होता है कि बाद में ये कम्बोडिया से यह शून्य चीन तथा अन्य मुस्लिम संसार में फैल गया।"

भारतीयों के द्वारा आविष्कारित शून्य ने समस्त विश्व की संख्या प्रणाली को प्रभावित किया और संपूर्ण विश्व को जानकारी मिली कि शून्य का अर्थ 'कुछ नहीं' होता है।

मध्य-पूर्व में स्थित अरब देशों ने भी शून्य को भारतीय विद्वानों से प्राप्त किया।

अंततः बारहवीं शताब्दी में भारत का यह शून्य पश्चिम में यूरोप तक पहुँचा।

चलते-चलते

1) एक केलकुलेटर लें।
2) उसमें अपने 7 अंकों वाली लैंडलाइन फोन नंबर के प्रथम तीन अंकों को डालें, फोन नंबर यदि 8 अंकों वाली हो तो प्रथम 4 अंक डालें। (जैसे यदि फोन नंबर 2382146 हो तो 238)
3) 80 से गुणा कर दें।
4) 1 जोड़ें।
5) 250 से गुणा कर दें।
6) अपने फोन नंबर के अन्तिम चार अंको वाली संख्या को जोड़ दें। (जैसे यदि फोन नंबर 2382146 हो तो 2146)
7) एक बार फिर अपने फोन नंबर के अन्तिम चार अंको वाली संख्या को जोड़ें।
8) 250 घटायें।
9) 2 से भाग दें दें।

अब स्क्रीन में दिखाई पड़ने वाली संख्या को देखें।

अरे! यह तो आपका ही फोन नंबर है।

---------------------------------------------------------------------
"यदि पाँचवी रोटी को खाने से पेट भर जाता है तो पाँचवी रोटी को पहले खाना चाहिये ताकि चार रोटियों की बचत हो सके।"

---------------------------------------------------------------------
"संक्षिप्त वाल्मीकि रामायण" का अगला पोस्टः

तपस्विनी स्वयंप्रभा - किष्किन्धाकाण्ड (12)

Friday, November 27, 2009

गाने के रेकॉर्डिंग के लिये माइक्रोफोन को गरम करना पड़ता था

आपको जानकर आश्चर्य होगा कि फिल्मों में गानों के रेकॉर्डिंग के आरम्भिक दिनों में माइक्रोफोन इतने कमजोर हुआ करते थे कि अनेक बार रेकॉर्डिंग शुरू करने के पहले माइक्रोफोन को आँच दिखा कर गरम करना पड़ता था। गाना रेकॉर्ड करने के लिये माइक्रोफोन को बीच में रख कर गायक और साजिंदे उसके चारों ओर घेरा बनाते थे। जब माइक्रो फोन अधिक गरम हो जाता था तो घेरे को भी बड़ा करना पड़ता था ताकि रेकॉर्डिंग एक जैसा हो।

उन दिनों साज के नाम पर हारमोनियम, तबला, बाँसुरी जैसे केवल गिने-चुने वाद्ययंत्र ही उपलब्ध थे। साज कम होने के कारण आवाज का महत्व अधिक था। आवाज का महत्व अधिक होने के कारण ही एक अंतराल तक के.एल. सहगल, पंकज मलिक, के.सी. डे जैसे गायक फिल्म संगीत के क्षेत्र में छाये रहे। फिल्मों में काम करने के लिये गीत-संगीत का ज्ञान होना अनिवार्य होता था क्योंकि प्ले बैक का सिस्टम नहीं था। कलाकारों को अपना गाना स्वयं गाना पड़ता था।


फिर जमाना बदला, नये-नये तकनीक आने लगे, साजों में भी वृद्धि होने लगी। सन् 1944 में संगीतकार नौशाद ने पहली बार फिल्म 'रतन' में साज और आवाज का भरपूर प्रयोग किया और फिल्म संगीत को एक नई दिशा मिली। नौशाद, सी. रामचंद्र, चित्रगुप्त, हेमंत कुमार, रोशन, एस.डी. बर्मन, खय्याम, जयदेव, सलिल चौधरी, मदन मोहन, शंकर जयकिशन, ओ.पी. नैयर, कल्याणजी आनंदजी, लक्ष्मीकांत प्यारेलाल, आर.डी. बर्मन जैसे तीव्र कल्पनाशील संगीतकारों और मोहम्मद रफ़ी, मुकेश, किशोर कुमार, महेन्द्र कपूर, लता मंगेशकर, सुमन कल्याणपुर, आशा भोंसले जैसे प्रतिभावान गायक गायिकाओं के संगम ने फिल्म संगीत को मधुर और सर्वप्रिय बना दिया। धुनों में साज और आवाज के समुचित अनुपात उन्हें और भी अधिक मधुर बना देते थे और सार्थक शब्द संरचना सोने में सुहागा का काम करती थीं।

सन् 1950 से 1980 तक का समय फिल्म संगीत का स्वर्ण युग रहा। मेलॉडियस संगीत उस काल के फिल्मों की आत्मा बन गई। एक एक गीत को परदे पर देखने और सुनने के लिये लोग अनेक बार एक ही फिल्म को देखने जाते थे और अधिकतम फिल्में सिल्व्हर जुबली, गोल्डन जुबली तथा प्लेटिम जुबली मनाया करती थीं। सारे के सारे संगीतकार अपनी धुनों को सुमधुर सुरों से सजाने के लिये अथक परिश्रम किया करते थे। शैलेन्द्र, हसरत जयपुरी, साहिर लुधियानवी, मजरूह सुल्तानपुरी, राजेन्द्र कृष्ण आदि भी गीतों को सार्थक बनाने के लिये एड़ी चोटी का जोर लगा दिया करते थे। गायक गायिकाओं के कर्णप्रिय कंठस्वर उन दिनों के संगीत में चार चाँद लगा दिया करती थीं। कई बार तो फिल्में पिट जाती थीं पर उनका संगीत गूंजते रहता था। पारसमणि (गीत - उइ माँ, उइ माँ ये क्या हो गया........, सलामत रहो........), लुटेरा (गीत - किसी को पता ना चले बात का........), बादशाह (गीत - अभी कमसिन हो, नादां हो जानेजाना........) जैसी स्टंट फिल्मों के भी गीत आज तक लोकप्रिय हैं।

सभी संगीतकार अपनी मौलिकता बनाये रखना चाहते थे और सभी की अपनी अपनी स्टाइल थी। बर्मन दा अपनी धुनों में लोक संगीत का बहुत अच्छा समावेश कर लेते थे। आपको शायद पता हो कि सचिन देव बर्मन त्रिपुरा के राजपरिवार से सम्बंधित थे। बर्मन दा को वर्ल्ड म्युजिक कान्टेस्ट (world music contest) का जूरी होने का गौरव भी प्राप्त था। सलिल चौधरी भारतीय और पश्चिमी दोनों ही संगीत में पारंगत थे और दोनों का बहुत अच्छा समावेश किया करते थे। शंकर जयकिशन ज्यादातर एकॉर्डियन और बांसुरी के मेल से अपनी धुनों को सजाया करते थे। कल्याणजी आनंदजी क्लार्नेट का बहुत अच्छा इस्तेमाल करते थे। फिल्म नागिन में हेमंत कुमार के लिये बीन की धुन को कल्याणजी आनंदजी ने ही क्लार्नेट पर बजाया था। लक्ष्मीकांत प्यारेलाल ढोलक और बांसरी के प्रयोग से अपनी धुनों को मधुर बनाते थे। ओ.पी. नैयर ने संगीत की कोई शिक्षा ही नहीं प्राप्त की थी फिर भी इतनी मधुर धुनें बनाते थे कि लोग सुन कर झूम उठते थे।

सन् 1980 के बाद से मेलॉडी के स्थान पर डिस्को, पॉप इत्यादि पश्चिमी धुनों का प्रचलन बढ़ता गया। निरर्थक गीत लिखे जाने लगे और धुनों में वाद्ययंत्रों की बहुलता बढने लगी। गीतों की उम्र कम होने लगीं। ऐसा प्रतीत होता है कि अब तो शोर ही संगीत का पर्याय सा हो गया है।

चलते-चलते

"वो सुबह हमीं से आयेगी" या "वो सुबह कभी तो आयेगी"?

साहिर साहब ने एक गीत लिखा था "वो सुबह हमीं से आयेगी" किन्तु फिल्म "फिर सुबह होगी" में उन्होंने अपने उसी गीत को "वो सुबह कभी तो आयेगी" के रूप में बदल दिया था। प्रस्तुत हैं दोनों गीतः

साहिर लुधियानवी

वो सुबह हमीं से आयेगी

जब धरती करवट बदलेगी, जब क़ैद से क़ैदी छूटेंगे
जब पाप घरौंदे फूटेंगे, जब ज़ुल्म के बन्धन टूटेंगे
उस सुबह को हम ही लायेंगे, वो सुबह हमीं से आयेगी
वो सुबह हमीं से आयेगी

मनहूस समाजों ढांचों में, जब जुर्म न पाले जायेंगे
जब हाथ न काटे जायेंगे, जब सर न उछाले जायेंगे
जेलों के बिना जब दुनिया की, सरकार चलाई जायेगी
वो सुबह हमीं से आयेगी

संसार के सारे मेहनतकश, खेतो से, मिलों से निकलेंगे
बेघर, बेदर, बेबस इन्सां, तारीक बिलों से निकलेंगे
दुनिया अम्न और खुशहाली के, फूलों से सजाई जायेगी
वो सुबह हमीं से आयेगी

वहीं वे अपने उसी गीत को कैसे निराशावादी रूप दे देते हैः

वो सुबह कभी तो आयेगी

इन काली सदियों के सर से, जब रात का आंचल ढलकेगा
जब दुख के बादल पिघलेंगे, जब सुख का सागर छलकेगा
जब अम्बर झूम के नाचेगा, जब धरती नज़्में गायेगी
वो सुबह कभी तो आयेगी

जिस सुबह की खातिर जुग-जुग से, हम सब मर-मर कर जीते हैं
जिस सुबह के अमृत की धुन में, हम जहर के प्याले पीते हैं
इन भूखी प्यासी रूहों पर, इक दिन तो करम फर्मायेगी
वो सुबह कभी तो आयेगी

माना कि अभी तेरे मेरे, अर्मानों की कीमत कुछ भी नहीं
मिट्टी का भी है कुछ मोल मगर, इन्सानों की कीमत कुछ भी नहीं
इन्सानों की इज्जत जब झूठे, सिक्कों में न तोली जायेगी
वो सुबह कभी तो आयेगी

दौलत के लिये जब औरत की, इस्मत को न बेचा जायेगा
चाहत को न कुचला जायेगा, ग़ैरत को न बेचा जायेगा
अपनी काली करतूतों पर, जब ये दुनिया शर्मायेगी
वो सुबह कभी तो आयेगी

बीतेंगे कभी तो दिन आख़िर, ये भूख के और बेकारी के
टूटेंगे कभी तो बुत आख़िर, दौलत की इजारादारी के
जब एक अनोखी दुनिया की बुनियाद उठाई जायेगी
वो सुबह कभी तो आयेगी

मजबूर बुढ़ापा जब सूनी, राहों की धूल न फांकेगा
मासूम लड़कपन जब गंदी, गलियों भीख न मांगेगा
ह़क मांगने वालों को जिस दिन, सूली न दिखाई जायेगी
वो सुबह कभी तो आयेगी

फ़ाको की चिताओं पर जिस दिन, इन्सां न जलाये जायेंगे
सीनों के दहकते दोज़ख में, अर्मां न जलाये जायेंगे
ये नरक से भी गन्दी दुनिया, जब स्वर्ग बनाई जायेगी
वो सुबह कभी तो आयेगी

Thursday, November 26, 2009

अपने अमान्य चाइना मोबाइल को बैन होने से ऐसे बचायें

क्या चाइना मोबाइल है आपके पास? कहीं 30 नवम्बर को आपको मोबाइल सेवा मिलनी बंद तो नहीं हो जायेगी?

भारत सरकार ने समस्त अमान्य IMEI नंबर वाले मोबाइल हैंडसेट्स पर प्रतिबन्ध लगाने का निर्णय लिया है। प्रतिबन्धित मोबाइल सेट को 30 नवम्‍बर के बाद मोबाइल सेवाएँ मिलनी बंद हो जायेंगी। तो क्यों न आप अपने अमान्य IMEI नंबर वाले मोबाइल को 30 नवम्‍बर के पहले ही मान्य IMEI नंबर में बदलवा लें।

आपकी जानकारी के लिये मैं यह बता दूँ कि IMEI (International Mobile Equipment Identity) नंबर 15 अंकों वाली एक कूट संख्या होती है जो प्रत्येक मोबाइल हैंडसेट के लिये अलग और विशिष्ट (unique) होती है। यही कूट संख्या आपके मोबाइल हेंडसेट की पहचान होती है।

अपना IMEI नंबर कैसे जानें?

आप अपने मोबाइल स्क्रीन में *#06# टाइप करें, इसके टाइप होते ही आपके मोबाइल स्क्रीन पर आपका IMEI नंबर दिखाई देने लगेगा। जैसे कि IMEI : 352982031923785

कैसे जानें कि यह IMEI नंबर मान्य है या नहीं?

अपने मोबाइल से 53232 नंबर में निम्न संदेश भेजें:

IMEI आपके पन्द्रह अंकों वाली संख्या

उदाहरणः

IMEI 352982031923785

आपको इस एसएमएस के लिये रु.3/- चार्ज के रूप में लगेंगे।

यदि आपका IMEI नंबर मान्य होगा तो आपके सन्देश के जवाब में सफलता (SUCCESS) आयेगा अन्यथा अमान्य (INVELID) आयेगा।

यदि IMEI नंबर अमान्य हो तो क्या करें?

अपने पास के किसी अधिकृत GII Service Center में जाकर नया IMEI नंबर प्राप्त कर लें जिसके लिये आपको रु.199/- खर्च करने होंगे।

अपने पास के अधिकृत GII Service Center जानने के लिये यहाँ क्लिक करें।

चलते-चलते


"बिल्कुल मुफ्त" याने कि लोगों को लूटने के लिये सबसे बड़ा हथियार

फ्री, मुफ्त, फोकट जैसे शब्द अचूक हथियार हैं लोगों का आकर्षित करने के लिये। "बिल्कुल मुफ्त" पर लोगों का ध्यान बरबस ही चला जाता है।

अब मुफ्त में मिलने वाली चीज को भला कौन छोड़ना पसंद करेगा? वो कहते हैं ना "माले मुफ्त दिले बेरहम"।

किन्तु इस मुफ्त पाने के चक्कर में हम लोगों को कितना लूटा जाता है यह बहुत कम लोगों को ही पता होगा।

आप एक साबुन खरीदने जाते हैं। दुकानदार आपको बताता हैः

दो साबुन खरीदने पर एक साबुन बिल्कुल मुफ्त!

कितना खुश हो जाते हैं आप कि एक साबुन आपको मुफ्त मिल रहा है और आप एक के बजाय तीन साबुन खरीद लेते हैं।

अब मान लीजिये एक साबुन का दाम पन्द्रह रुपये हैं तो दो साबुन के दाम अर्थात् तीस रुपये में आपको तीन साबुन मिलते हैं। जरा सोचिये, साबुन बनाने वाली कम्पनी बेवकूफ तो है नहीं जो कि बिना किसी लाभ के साबुन बेचेगी। तीस रुपये में तीन साबुन बेचने पर भी उसे लाभ ही हो रहा है। इसका स्पष्ट अर्थ यह है कि एक साबुन का मूल्य मात्र दस रुपये हैं। तो इस हिसाब से कम्पनी को साबुन का दाम पन्द्रह रुपये से कम करके दस रुपये कर देना चाहिये। पर कम्पनी दाम कम न कर के आपको एक मुफ्त साबुन का लालच देती है और आप लालच में आकर एक साबुन के बदले तीन साबुन खरीद लेते हैं जबकि दो अतिरिक्त खरीदे गये साबुनों की आपको फिलहाल कतइ आवश्यकता नहीं है। यदि कम्पनी ने दाम कम कर दिया होता तो आप दस रुपये में एक ही साबुन खरीदते और बाकी बीस रुपये का कहीं और सदुपयोग करते। इस तरह से दाम न घटाने का कम्पनी को एक और फायदा होता है वह यह कि यदि आप केवल एक साबुन खरीदेंगे तो आपको पन्द्रह रुपये देने पड़ेंगे। इस प्रकार से सिर्फ एक साबुन खरीदने पर मुनाफाखोर कम्पनी आपके पाँच रुपये जबरन लूट लेगी। बताइये यह व्यापार है या लूट?

भाई मेरे, यदि साबुन बिल्कुल मुफ्त है तो मुफ्त में दो ना, चाहे कोई दो साबुन खरीदे या ना खरीदे। ये दो साबुन खरीदने की शर्त क्यों रखते हो?

"एक साबुन खरीदने पर एक शैम्पू बिल्कुल फ्री!" जैसे स्कीम्स भी मात्र आपको लूटने का ही तरीका है।

विडम्बना तो यह है कि अपनी गाढ़ी कमाई की रकम को लुटाने के लिये हम सभी मजबूर हैं क्योंकि सरकार ऐसे मामलों अनदेखा करती रहती है। इन कम्पनियों से सभी राजनीतिक दलों को मोटी रकम जो मिलती है चन्दे के रूप में।

इंटरनेट में भी ये फ्री शब्द अपना खूब जादू चलाता है, बिल्कुल फ्री ईबुक, बिल्कुल फ्री डाउनलोड जैसे कई फ्री मिलेंगे आपको। एक बार आप इस फ्री के चक्कर में पड़े कि हमेशा के लिये आपको अपने मेलबॉक्स मे विज्ञापन वाले ईमेल्स को झेलते रहना होगा। गनीमत है कि ये बीमार अभी तक अंग्रेजी और अन्य भाषाओं में ही है, हिन्दी अभी इससे बचा हुआ है। किन्तु एक बार हिन्दी व्यावसायिक हुई नहीं कि ये बीमारी भी तत्काल फैल जायेगी।

सच बात तो यह है कि फ्री या मुफ्त में कोई किसी को कुछ भी नहीं देता। किसी जमाने में पानी मुफ्त मिला करता था पर आज तो उसके भी दाम देने पड़ते हैं।

यदि कोई कुछ भी चीज मुफ्त में देता है तो अवश्य ही उसका स्वार्थ रहता है उसमें।

चलते-चलते

ट्रेन में एक पढ़े लिखे शहरी सज्जन और एक देहाती साथ साथ बैठे थे। शहरी सज्जन का टाइम पास नहीं हो पा रहा था इसलिये उसने देहाती से कहा कि कुछ बातचीत करो यार!

देहाती बोला, "मैं भला आपसे क्या बातचीत कर सकता हूँ? मैं तो गँवार हूँ और आप पढ़े लिखे।"

"तो कुछ पहेली ही हो जाये, पर पहेली शर्त के साथ होगी" शहरी ने कहा।

देहाती फिर बोला, "साहब आप मुझसे ज्यादा बुद्धिमान हैं इसलिये यदि मैं कोई पहेली पूछूँगा और आप नहीं बता पायेंगे तो आपको मुझे सौ रुपये देने होंगे। पर जब आप पहेली पूछेंगे और मैं नहीं बता पाउँगा तो मैं आपको पचास रुपये ही दूँगा।"

शहरी मान गया और बोला, "अच्छा तो तुम्हीं शुरू करो।"

"वह कौन सी चिड़िया है जो उड़ती है तो उसके पंख आसमान में होते हैं और पैर जमीन पर?"

बहुत सोचने पर भी शहरी को जवाब नहीं सूझा इसलिये उसने देहाती को सौ रुपये देते हुए कहा, "मैं हार गया भाई, लो ये सौ रुपये और बताओ कि वो कौन सी चिड़िया होती है?"

सौ रुपये जेब में रख कर वापस पचास का नोट शहरी को देते हुए देहाती बोला, "मैं भी नहीं जानता, ये लीजिये आपके पचास रुपये।"

-------------------------------------------------------------------------------------------------------------------

दुकानदार के पास एक देहाती पहले ग्राहक के रूप में आ पहुँचा।

"ये साफा कितने का है?" देहाती ने पूछा।

"चालीस रुपये का।" दुकानदार ने कहा।

देहाती को गाँव से निकलते समय गाँव के सयाने ने समझाया था कि शहर वाले गाँव वालों को लूट लेते हैं। बिना मोलभाव किये कोई सामान मत लेना। इसलिये उसने दुकानदार से कहा, "बीस रुपये में दोगे तो दो।"

दुकानदार का नियम था कि पहले ग्राहक को वापस नहीं जाने देना है, भले ही घाटा खाना पड़े। इसलिये वह बोला, "ठीक है, बीस में ही ले लो।"

देहाती को लगा कि शायद उसने बीस रुपये में माँग कर गलती कर दी है। उसने फिर कहा, "नहीं बीस रुपये में मँहगा है, दस में देते हो तो दो।"

"ठीक है भाई, दस में ही ले लो।"

देहाती को सयाने की बात फिर से याद आ गई और उसने सोचा कि दस रुपये में ये साफा देकर दुकानदार मुझे लूट रहा है। इसलिये उसने कहा, "नहीं मैं तो इसे पाँच रुपये में लूँगा।"

अब दुकानदार ने झल्ला कर कहा, "मेरा नियम है कि मैं पहले ग्राहक को खाली नहीं जाने देता इसलिये भाई मेरे, तू अपने पाँच रुपये भी अपने पास रख और इसे मुफ्त में ले जा।"

"तो फिर दो साफा देना।"

---------------------------------------------------------------------------------------
"संक्षिप्त वाल्मीकि रामायण" का अगला पोस्टः

वानरों को सीता की खोज का आदेश - किष्किन्धाकाण्ड (10)

Wednesday, November 25, 2009

प्यार से फिर क्यों डरता है दिल

प्यार शब्द इतना प्यारा है कि इसके आकर्षण से कोई भी अछूता नहीं रह सकता।

वैसे तो मानव जीवन भर आकर्षित रहता है प्यार से, किन्तु इसका आकर्षण किशोर अवस्था और युवावस्था के वयःसन्धि याने कि सोलह से पच्चीस वर्ष तक के उम्र मे अपनी चरमसीमा में रहता है। उम्र का ये सोलह से पच्चीस वर्ष का अन्तराल गधा-पचीसी कहलाता है और इस काल में प्रायः लोग आकर्षण को ही प्रेम समझने की भूल कर जाते हैं। विपरीत लिंग वालों का एक दूसरे के प्रति आकर्षित होना प्राणीमात्र का ईश्वर प्रदत्त स्वभाव है। आप चाहे पुरुष हों या महिला, किन्तु आप में से कोई भी ऐसा नहीं होगा जिसे जीवन में कभी न कभी किसी विपरीत लिंग वाले ने आकर्षित न किया हो। जरा अपने कालेज के दिनों को याद कर के देखें, आपको स्वयं ही हमारी इस बात की सत्यता का प्रमाण मिल जायेगा। अजी आप ही क्या, हम स्वयं अपने गधा-पचीसी की उम्र में सैकड़ों बेवकूफियाँ कर चुके हैं। किन्तु अपनी उन बेवकूफियों को अपने इस पोस्ट में बता कर हमें अपने अनुजों तथा अनुजाओं के समक्ष लज्जित होना उचित नहीं लगता।

यहाँ पर यह बता देना हम उचित समझते हैं कि आकर्षण प्रेम नहीं है यद्यपि प्रेम में आकर्षण का होना स्वाभाविक है। जिस प्रकार से लोग आकर्षण को ही प्रेम समझ लेते हैं उसी प्रकार से अक्सर काम-वासना को भी प्रेम समझ लिया जाता है जबकि वासना प्रेम नहीं है। प्रेम में हमेशा वासना का होना भी आवश्यक नहीं है। जहाँ माँ-बेटा, भाई-बहन, बाप-बेटी के बीच स्नेह वासनारहित प्रेम होता है वहीं पति-पत्नी के बीच प्रेम में वासना का होना भी आवश्यक होता है।

विवाहित जीवन के लिये प्रेम का बहुत महत्व है और पति-पत्नी के मध्य प्रेम का होना आवश्यक है। वास्तव में विवाहित जीवन का आधार ही प्रेम होता है।

जिससे प्रेम किया जाता है उसके प्रति समर्पण की भावना होना ही प्रेम को सर्वोत्तम बनाता है। वासनारहित ऐसा प्रेम जिसमें सिर्फ पूर्ण समर्पण की भावना ही निहित होती है, प्लूटोरियन लव्ह अर्थात् आत्मिक प्रेम कहलाता है। कुछ लोगों के अनुसार प्लूटोरियन लव्ह या आत्मिक प्रेम मात्र काल्पनिक आदर्श है किन्तु ऐसे लोग भी हैं जो इसे एक वास्तविकता मानते हैं। सुप्रसिद्ध कहानीकार चन्द्रधर शर्मा 'गुलेरी' जी की विश्वविख्यात कहानी "उसने कहाथा" प्लूटोरियन लव्ह या आत्मिक प्रेम का एक उत्तम उदाहरण है।

चलते-चलते

जब से शादी हुई थी दम्पत्तिद्वय प्रतिसप्ताह रविवार को फिल्म देखने जाया करते थे। इस प्रकार से दस साल बीत गये।

एक रविवार को जब दोनों पिक्चर देखने के लिये निकले तो पति ने पत्नी से कहा, "तुम्हें फिल्में बहुत पसंद हैं इसीलिये, फिल्मों में अधिक रुचि न होने के बावजूद भी, मैं आज तक हर सप्ताह तुम्हें पिक्चर ले जाते रहा हूँ। मुझे तो बाग-बगीचों में घूमना फिरना ज्यादा अच्छा लगता है। यदि आज हम दोनों पिक्चर जाने के बदले किसी बगीचे में जायें तो तुम्हें बुरा तो नहीं लगेगा?"

पत्नी बोली, " मैं तो समझती थी कि आपकी फिल्मों में बहुत अधिक रुचि है इसीलिये आपके साथ फिल्म देखने चली जाया करती थी। मुझे भी फिल्मों में अधिक रुचि नहीं है और मैं भी बाग-बगीचों में घूमना बहुत पसंद करती हूँ।।"

तो बन्धुओं, वर्षों साथ रहने के बावजूद हम अनेक बार एक-दूसरे को पूरी तरह से जान नहीं पाते।


---------------------------------------------------------------------------------------
"संक्षिप्त वाल्मीकि रामायण" का अगला पोस्टः

लक्ष्मण-सुग्रीव संवाद - किष्किन्धाकाण्ड (9)

Tuesday, November 24, 2009

चाय तो रोज ही पीते होंगे आप... पर क्या आप जानते हैं कि चाय के पेड़ की उम्र कितनी होती है?

हजारों कप चाय पी चुके होंगे आप आपने जीवन में, किन्तु कभी आपके मन में यह विचार भी न आया होगा कि चाय के विषय में कुछ जान लें। भाई, जिस पेय को हम रोजाना पीते हैं उसके विषय में थोड़ी सी तो जानकारी होनी ही चाहिये हमें।

भारतवर्ष में पुरातनकाल से ही चाय के विषय में जानकारी थी। प्राचीनकाल में हमारे देश में प्रायः इसका प्रयोग औषधि के रूप में किया जाता था। उन दिनों चाय की खेती नहीं होती थी बल्कि चाय के पेड़-पौधे पर्वतीय क्षेत्रों के वनों में स्वयं ही उग जाया करते थे। माना तो यह भी जाता है कि रामायणकाल में रावण के वैद्य सुषेण ने लक्ष्मण की मूर्च्छा दूर करने के लिये जिस संजीवनी बूटी का प्रयोग किया था वह भी चाय प्रजाति की ही एक वनस्पति थी और उसे लाने के लिये ही हनुमान जी को भेजा गया था। यह भी मान्यता है कि चाय की खोज गौतम बुद्ध ने की थी। कहा जाता है कि एक बार जब वे समाधिस्त अवस्था में थे तो उनके पेय पात्र में चाय की कुछ पत्तियाँ गिर गई थीं जिसे उन्होंने पी लिया था। चाय की खोज के विषय में और भी बहुत सी कहानियाँ प्रचलित हैं।

भारत में बागान बना कर बकायदा चाय की खेती करना ईस्ट इंडिया कम्पनी ने आरम्भ किया। पहला चाय बागान आसाम में सन् 1837 में स्थापित किया गया था। भारत में चाय को लोकप्रिय पेय बनाने का श्रेय भी अंग्रेजों को ही जाता है। बचपन में हमारी दादी हमें बताती थीं कि ब्रुक बांड, लिपटन आदि चाय कंपनी वाले लोग चाय के प्रचार के लिये ड्रमों में चाय लेकर मुहल्ले-मुहल्ले घूमते थे और घर-घर में लोटा-लोटा चाय मुफ्त में दिया करते थे। इस प्रकार से लोग चाय पीने के आदी हो गये।

आपको जान कर आश्चर्य होगा कि चाय के पेड़ की उम्र लगभग सौ वर्ष होती है किन्तु अधिक उम्र के चाय पेड़ों की पत्तियों के स्वाद में कड़ुआपन आ जाने के कारण प्रायः चाय बागानों में पचास साठ वर्ष बाद ही पुराने पेड़ों को उखाड़ कर नये पेड़ लगा दिये जाते हैं। चाय के पेड़ों की कटिंग करके उसकी ऊँचाई को नहीं बढ़ने दिया जाता ताकि पत्तियों को सुविधापूर्वक तोड़ा जा सके। यदि कटिंग न किया जावे तो चाय के पेड़ भी बहुत ऊँचाई तक बढ़ सकते हैं।

चाय के पेड़ के विषय में उपरोक्त जानकारी मुझे मेरे जलपाईगुड़ी प्रवास के दौरान वहाँ के लोगों से मिली थी इसलिये मेरी इस जानकारी को अधिकृत नहीं कहा जा सकता। ज्ञानी बन्धुओं से आग्रह है कि यदि यह सही है तो इसका अनुमोदन करें और गलत होने पर खंडन कर दें।

चलते-चलते

एक व्यक्ति एक रेस्टॉरेंट में चाय-नाश्ता के लिये रोज जाता था। वेटर को किसी न किसी बहाने से तंग करने में उसे बेहद मजा आता था इसलिये वह उसे रोज ही तंग किया करता था और टिप तो कभी देता ही नहीं था। कई महीने इसी प्रकार से बीत जाने पर एक दिन उसे लगा कि वह वेटर को नाहक सता कर बहुत गलत काम करता है। उसने निश्चय कर लिया कि आइंदे से वेटर को कभी नहीं सतायेगा और उसके साथ अच्छा व्यवहार करेगा।

उस रोज रेस्टॉरेंट में पहुँच कर उसने वेटर से कहा, "भाई, मुझे माफ कर देना। मैंने अब तक तुम्हें बहुत सताया है। अब से तुम्हें कभी भी नहीं सताउँगा और आज तुम्हें मोटी टिप भी दूँगा।"

वेटर बोला, "ठीक है साहब, तो फिर आज से मैं भी आपके लिये कप में चाय डालने से पहले थूका नहीं करूँगा।"

---------------------------------------------------------------------------------------
"संक्षिप्त वाल्मीकि रामायण" का अगला पोस्टः

हनुमान-सुग्रीव संवाद - किष्किन्धाकाण्ड (8)

Monday, November 23, 2009

क्यों उछाल रही है मीडिया सन् 2012 को? सिर्फ TRP बढ़ाने के लिये या फिर वास्तव में सन् 2012 में कुछ रहस्य छुपा है?

मैं टी.व्ही. बहुत कम देखता हूँ किन्तु कल शाम को यूँ ही आजतक चैनल लगाया तो उसमें सन् 2012 की ही कहानी चल रही थी। मीडिया में सन् 2012 की चर्चा होते ही रहती है तो क्या यह चर्चा सिर्फ TRP बढ़ाने के लिये ही है या फिर वास्तव में सन् 2012 में कुछ रहस्य छुपा है?

कल आज तक चैनल में बताया जा रहा था कि जहाँ माया कैलेंडर के अनुसार 21-12-2012 को पृथ्वी के विनाश हो जाने की भविष्यवाणी है वहीं मिस्र के एक पिरामिड के भीतर से प्राप्त लेख के अनुसार 21-12-2012 से पृथ्वी पर एक स्वर्ण युग के आरम्भ होने की भविष्यवाणी की गई है। इस स्वर्ण युग में पृथ्वी में विकास की सीमा अपनी चरम स्थिति में पहुँच जायेगी और लोग सुख-सुविधा से सम्पन्न रहेंगे।

मैंने इस विषय पर जब इंटरनेट को खंगाला तो मुझे एक और रोचक जानकारी मिलीं।

About.com Hinduism के एक लेख में पढ़ने को मिला कि "ब्रह्म-वैवर्त पुराण" में भगवान श्री कृष्ण ने देवि गंगा को बताया है कि कलियुग के आरम्भ से 5,000 वर्ष बाद एक स्वर्णयुग का आरम्भ होगा जो कि 10,000 वर्षों तक चलता रहेगा। इस लेख में बताया गया है कि इस स्वर्ण युग के आरम्भ के दिनांक की गणना करने पर 21-12-2012 का दिन ही आता है।

माया सभ्यता और मिस्र की सभ्यता के साथ ही साथ हमारे पौराणिक ग्रंथों में भी सन् 2012 का विशिष्ट रूप से उल्लेख होना क्या संयोग मात्र है या इसमें कुछ रहस्य छुपा हुआ है?


---------------------------------------------------------------------------------------
"संक्षिप्त वाल्मीकि रामायण" का अगला पोस्टः

सुग्रीव का अभिषेक - किष्किन्धाकाण्ड (7)

Sunday, November 22, 2009

महन्त जी कैसे हैं? ... कोई नई रख ली है या ... उर्फ कहानी सम्पन्न महन्त और उसके प्यारे कुत्ते की

धन-धान्य से परिपूर्ण एक मठ था। अत्यन्त ही श्री सम्पन्न! मठ का महन्त ही मठ की सम्पत्ति का स्वामी होता है अतः उस मठ के महन्त जी भी धनकुबेर ही थे।

उस मठ में बाहर से आनेवाले साधु महात्माओं और श्रद्धालुजनों के ठहरने के लिये एक धर्मशाला थी। एक बार तिब्बत से एक लामा उस मठ में दर्शन के लिये पधारे और वहाँ के धर्मशाला में एक रात के लिये ठहर गये। बातों ही बातों में लामा ने महन्त जी को बताया कि उनके देश में एक संस्था ऐसी है जो कुत्तों को भी इंसान की तरह बोलना सिखा देती है। महन्त जी ने भी एक कुत्ता पाल रखा था। उस कुत्ते को वे बहुत चाहते थे। एक प्रकार से वह कुत्ता महन्त जी की कमजोरी थी। महन्त जी की इच्छा हुई कि अपने कुत्ते को बोलना सिखा दें। उन्होंने लामा से तिब्बत की उस संस्था के विषय में समस्त जानकारी ले ली।

कुत्ते को बोलना सिखाने का कोर्स तीन माह का था और फीस बड़ी तगड़ी थी, समझ लीजिये कि दस लाख रुपये। दूसरे दिन महन्त जी ने अपने प्रिय शिष्य को बुला कर कुत्ता उसके हवाले किया, फीस और दिगर खर्चा-पानी के लिये रकम दी और कुत्ते को बोलना सिखा कर वापस ले आने की आज्ञा दे दी।

महन्त जी का वह चेला 'चेला' कम और 'चालू' ज्यादा था। कुत्ते को लेकर वह तिब्बत न जाकर सीधे अपने पसंद के महानगर में जा पहुँचा। वहाँ पहुँचते ही उसने कुत्ते को मार कर उससे पीछा छुड़ाया और खूब ऐश के साथ समय बिताने लग गया।

तीन महीना बीत जाने पर नियत समय में वह अकेले फिर से वापस महन्त जी के पास मठ में पहुँच गया।

उसके साथ कुत्ते को न देखकर महन्त जी ने पूछा, "क्यों, कुत्ता कहाँ है? उसने बोलना सीखा कि नहीं?"

चेले ने कहा, "गुरूजी! आपका कुत्ता तो बहुत बुद्धिमान निकला और बहुत अच्छी तरह से बोलना सीख गया। वह भी आपसे उतना ही प्यार करता था जितना कि आप उसे। जब मैं उसे ले कर वापस आ रहा था तो उसको आपकी ही चिन्ता थी। रास्ते में उसने मुझसे पूछा था कि महन्त जी कैसे हैं? कोई नई रख ली है या उसी बुधियारिनबाई से काम चलाते हैं?"

फिर चेले ने रोनी सूरत बनाकर आगे कहा, "मैंने सोचा कि कुत्ता तो कुत्ता है, अगर मठ में सभी से यही पूछता फिरेगा तो गुरूजी की कितनी बदनामी होगी। इसीलिये मुझे उसे मार डालना पड़ा।"


चलते-चलते

संस्कृत के प्राध्यापक ने कक्षा मे विद्यार्थियों से निम्न श्लोक का अर्थ पूछाः

त्रिया चरित्रं पुरुषस्य भाग्यं, देवो न जानसि कुतो मनुष्यः॥

एक विद्यार्थी ने यह अर्थ बताया, "(त्रिया चरित्रं अर्थात्) त्रिया के चरित्र और (पुरुषस्य भाग्यं अर्थात्) पुरुष के भाग्य को (देवो न जानसि अर्थात्) देवता भी नही जान सकते (कुतो मनुष्यः अर्थात्) फिर मनुष्य तो कुत्ता है।"

---------------------------------------------------------------------------------------
दो मक्खियाँ फिल्म देख कर निकलीं और एक ने दूसरी से 'आटो कर लें या तांगा' के तर्ज में पूछा, "अब घर जाने के लिये आदमी कर लें या कुत्ता?"


---------------------------------------------------------------------------------------
"संक्षिप्त वाल्मीकि रामायण" का अगला पोस्टः

तारा का विलाप - किष्किन्धाकाण्ड (6)

Saturday, November 21, 2009

वाह रे माया सभ्यता! खुद के मरने खपने की तो खबर नहीं थी और पृथ्वी के अंत का भविष्यवाणी कर गये ...

बहुत जोरदार बहस छिड़ी हुई है अंग्रेजी इंटरनेट जगत में। इस बहस का विषय है एक कथित भविष्यवाणी जिसके अनुसार सन् 2012 में महाविनाश हो जाने वाला है, नामोनिशान मिट जायेगा इस धरती का। भविष्यवाणी के अनुसार 21 दिसंबर 2012 को एक क्षुद्र ग्रह धरती से टकराएगा। परिणामस्वरूप भयानक भूकंप आयेंगे, ज्वालामुखी फटेगी, सुनामी जैसी आपदा आयेगी और भी न जाने क्या क्या होंगे। इतना व्यापक विनाश होगा कि भूमण्डल से जीवन समाप्तप्राय हो जायेगा।

इस धारणा के कारण

मुख्य कारण है माया (या मायान) कैलेंडर! करीब 250 से 900 ईसा पूर्व माया नामक एक प्राचीन सभ्यता स्थापित थी। ग्वाटेमाला, मैक्सिको, होंडुरास तथा यूकाटन प्रायद्वीप में इस सभ्यता के अवशेष खोजकर्ताओं को मिले हैं। ऐसी मान्यता है कि माया सभ्यता के काल में गणित और खगोल के क्षेत्र उल्लेखनीय विकास हुआ था। अपने ज्ञान के आधार पर माया लोगों ने एक कैलेंडर बनाया था। कहा जाता है कि उनके द्वारा बनाया गया कैलेंडर इतना सटीक निकला है कि आज के सुपर कम्प्यूटर भी उसकी गणनाओं में 0.06 तक का ही फर्क निकाल सके और माया कैलेंडर के अनेक आकलन, जिनकी गणना हजारों सालों पहले की गई थी, सही साबित हुए हैं। माया सभ्यता के लोगों की मान्यता थी कि जब उनके कैलेंडर की तारीखें खत्म होती हैं, तो धरती पर प्रलय आता है और नए युग की शुरुआत होती है और अवशेष में प्राप्त माया कैलेंडर की अन्तिम तारीख 21 दिसंबर 2012 है। इसीलिये माना जा रहा है कि 21 दिसंबर 2012 को पृथ्वी का विनाश हो जायेगा। फ्रांसीसी भविष्यवक्ता माइकल द नास्त्रेदम्स की 2012 में धरती के खत्म होने की एक भविष्यवाणी इस धारणा को और भी बलवती बना रही है।

इंटरनेट पर एक चर्चा यह भी है कुछ तथाकथित वैज्ञानिकों के अनुसार प्लेनेट एक्स निबिरू नामक एक ग्रह दिसंबर 2012 में धरती के अत्यन्त निकट से गुजरेगा और पृथ्वी से उसके टकरा जाने की बहुत अधिक सम्भावना है। यह टक्कर ठीक उसी प्रकार की टक्कर होगी जिसने पृथ्वी से डायनासॉर का नामोनिशान मिटा दिया था। यह भी कहा जा रहा है कि 2012 में सूर्य हमारी आकाशगंगा (मिल्की-वे) के ठीक मध्य से अलाइन करेगा। ऐसा 26 हजार साल में पहली बार होगा। फलस्वरूप बेइंतिहा ऊर्जा उत्पन्न होगी जिससे धरती अपनी धुरी से भी हट सकती है।

हॉलीवुड में तो 20 करोड़ अमेरिकी डॉलर की लागत वाली 2012 नामक फिल्म भी बन गई। रोनाल्ड एमरिच द्वारा निर्देशित यह फिल्म 13 नवम्बर को दुनियाभर में एक साथ रिलीज भी कर दी गई हैं और अब बेतहाशा बिजनेस कर रही है।

क्या कहते हैं वैज्ञानिक इस बारे में

दुनिया भर के वैज्ञानिक इस धारणा को मात्र कपोल कल्पना ही मान रहे हैं। वे 2012 में किसी क्षुद्र ग्रह के पृथ्वी से टकराने की आशंका से भी इनकार कर रहे हैं। नासा को भी इस प्रकार की किसी घटना घटने का विश्वास नहीं है। नासा के प्रमुख वैज्ञानिक और 'आस्क द एस्ट्रोबायलॉजिस्ट' के चीफ डॉ. डेविड मॉरिसन का कहना है कि प्लेनेट एक्स निबिरू नामक किसी ग्रह, जिसके 2012 दिसंबर को पृथ्वी से टकराने की बात की जा रही है, का कोई अस्तित्व ही नहीं है।

हमारा भी यही तर्क है कि यदि माया सभ्यता के लोगों को पृथ्वी के विनाश के विषय में ज्ञात था तो उन्हें स्वयं अपनी सभ्यता के नष्ट होने के विषय में क्यों किसी प्रकार जानकारी नहीं थी?


चलते-चलते

काल करे सो आज कर आज करे सो अब्ब।
पल में परलय होयगी बहुर करेगा कब्ब॥

-------------------------------------------------
"संक्षिप्त वाल्मीकि रामायण" का अगला पोस्टः

वालि-राम संवाद - किष्किन्धाकाण्ड (5)

Friday, November 20, 2009

जनाब मोहम्मद उमर कैरानवी, ये है जवाब तुम्हारी टिप्पणी का!

चर्चा पान की दुकान पर बलॉग में हमारे पोस्ट "हिन्दू विवाह याने कि पति और पत्नी के बीच जन्म-जन्मांतरों का सम्बंध" में हमने तुम या तुम्हारे धर्म के विरुद्ध कुछ भी नहीं लिखा है फिर भी तुमने निम्न टिप्पणी कीः


Mohammed Umar Kairanvi November 19, 2009 4:44 PM

मि. अवधिया कभी बैंक से छुटटी लेके अदालतों में गए हो, वहां पता लगेगा इतना अटूट संबंध होना कितना दुख देता है, बहुत कुछ कह सकता हूं, चेतावनी और सांकल देखने आया था, दूसरे धर्म का नाम लिए बिना अपनी बात कह सकते हो तो कह लो अन्‍यथा ब्लागजगत जाने है, एक ही अपनी तरह का पागल है, 3 हफते से अधिक कभी नहीं लगते यह आप अच्‍छी तरह जानो हो किसमें, जो जवाब ही नहीं देता सवाल को ही हमेशा के लिए समाप्‍त कर देता है

पान की दुकान पर अपना बहुत पैसा बर्बाद होता है, इस पर तो सांकल भी नहीं लगी, समझ गये होंगे
तुमने जिस धमकी वाली भाषा में टिप्पणी की है उसकी वजह से हमें मजबूर होना पड़ा है तुम्हारी ही तरह की भाषा का प्रयोग करते हुए तुम्हारी टिप्पणी का जवाब देने के लिये। ब्लॉगजगत क्या जाने हैं और क्या नहीं जाने हैं यह हम भी जानते हैं और तुमसे ज्यादा अच्छी तरह से जानते हैं। हमें तुमसे सीखने की जरूरत नहीं है। दूसरे धर्म का नाम हम लें या न लें यह हमारी मर्जी की बात है, जो हमारी मर्जी होगी हम वही करेंगे। अगर तुम समझते हो कि तुम अपनी तरह के एक ही पागल हो तो यह भी जान लो कि हम भी अपनी तरह के एक ही सठियाये हुए बुड्ढे हैं। पागलों के डॉक्टर हैं हम! तुम जैसे कितने ही पागलों को ठीक कर दिया है।

मि. कैरानवी! हम शान्तिप्रिय लोग हैं, अमन-चैन बनाये रखना अपना फर्ज समझते हैं। पर तुम यह समझने की भूल मत कर बैठना कि गांधी की तरह से हम एक गाल पर थप्पड़ मारने वाले को अपना दूसरा गाल दिखाने वाले लोग हैं। हम तो थप्पड़ मारने के लिये उठने वाले हाथ को, हमारे गाल तक पहुँचने के पहले, ही तोड़ देने वाले लोग हैं। हम किसी से जानबूझ कर उलझते नहीं पर यदि कोई हमसे जबरन उलझने की कोशिश करे तो हम उसकी इस कोशिश का मुँहतोड़ जवाब देना भी जानते हैं।हम दोस्तों पर जान छिड़क सकते हैं तो दुश्मनों के छक्के भी छुड़ा सकते हैं। तुमने सिर्फ हमारी दोस्ती देखी है, दुश्मनी नहीं देखी। दुश्मनों के पेंदे पर लात जमाना और उन्हें जुतियाना हमें हमें अच्छी तरह से आता है। और हम निहायत ही जुदा किस्म से जुतियाते हैं, गिन कर पूरे सौ जूते लगाने का हमारा नियम है पर गुस्से में अन्ठानबे तक गिनते-गिनते गिनती ही भूल जाते हैं और हमें फिर से एक दो से गिनती शुरू करनी पड़ती है।

हिन्दी ब्लॉगजगत में अपना आतंकवाद फैलाने की अपनी जुर्रत बंद कर दो। हम किसी भी धर्म की बुराई नहीं करते किन्तु तुम्हारी धमकी की वजह से अपने धर्म के विषय में कहने सुनने से भी अपने आप को नहीं रोक सकते। तुम्हारा आतंक यहाँ नहीं चलने वाला है। ये ब्लॉग जगत है। यहाँ तुम लोगों को सपोर्ट करने वाला न तो कोई राजनीतिबाज है और न ही यहाँ कोई सेक्युलरिज्म है।

तुम जैसे दो चार सिरफिरे लोगों की वजह से हम अपने समस्त मुसलमान दोस्तों की भावनाओं को ठेस नहीं पहुँचाना चाहते। हमारे मुसलमान भाई भी अच्छी तरह से समझते हैं कि ये जवाब सिर्फ तुम्हारे और तुम्हारे जैसे चंद और सिरफिरे लोगों के लिये ही है।

जैसा बोओगे वैसा ही काटोगे इसलिये प्रेम प्यार ही बोने की कोशिश करो, नफ़रत फैलाने की कोशिश मत करो। प्यार के बदले में प्यार मिलता है और नफ़रत के बदले में नफ़रत ही मिलती है।

उम्मीद है कि आगे से किसी के भी किसी पोस्ट पर इस प्रकार की धमकी भरी टिप्पणी करना बंद कर दोगे। और नहीं, तो तुम जैसे लोगों के लिये हम और अलबेला जी ही काफी हैं।

Thursday, November 19, 2009

गूगल सर्च इंजिन का विशिष्ट प्रयोग कैसे करें?

किलोमीटर को मील में बदलने के लिये:
सर्च बॉक्स में इस प्रकार से टाइप करें - 10 km in mile

फैरनहीट को सेल्सियश में बदलने के लिये:
सर्च बॉक्स में इस प्रकार से टाइप करें - 25F to C

इंच को सेंटीमीटर में बदलने के लिये:
सर्च बॉक्स में इस प्रकार से टाइप करें - 5 inch in cm

किसी स्थान का समय जानने के लियेः
सर्च बॉक्स में इस प्रकार से टाइप करें - what time is it Raipur

दो देशों की करेंसी की तुलना करने के लियेः
सर्च बॉक्स में इस प्रकार से टाइप करें - 30 usd in inr

मौसम का विवरण जानने के लियेः
सर्च बॉक्स में इस प्रकार से टाइप करें - Raipur weather

फ्लाइट स्टेटस पता करने के लियेः
सर्च बॉक्स में इस प्रकार से टाइप करें - name of airlinne flight number

केलकुलेटर के तौर पर प्रयोग करने के लिये
सर्च बॉक्स में कोई भी गणितीय एक्सप्रेसन टाइप करें जैसे कि - 5*23 + 3*44 - 87

[गूगल सर्च इंजन जोड़ (+), घटाना (-), गुणा (*), भाग (/), घात (^), और वर्गमूल (sqrt) की गणना कर सकता है।]

परिभाषाएँ जानने के लियेः
सर्च बॉक्स में इस प्रकार से टाइप करें - define: website


--------------------------------------------------
"संक्षिप्त वाल्मीकि रामायण" का अगला पोस्टः

राम-सुग्रीव वार्तालाप - किष्किन्धाकाण्ड (3)

Wednesday, November 18, 2009

करो काम केलकुलेटर से पर ज्ञान को अपने मत भूलो

आधुनिक टेक्नोलॉजी ने हमें बहुत फायदा पहुँचाया है। घंटों में होने वाले कार्य अब मिनटों में होने लगे हैं। पर क्या हम अपने ज्ञान को लुप्त भी होने नहीं दे रहे हैं? मैं देखता हूँ कि आज किसी को यदि दो छोटी संख्याओं जैसे कि 12 और 10 को जोड़ना है तो वह तत्काल केलकुलेटर उठा लेता है। बचपन में हम ऐसे जोड़ को मनगणित कहा करते थे और मन ही मन इसे जोड़कर तत्काल उत्तर बता देते थे। मनगणित का बाकायदा पीरियड हुआ करता था जिसमें मनगणित के सिद्धांत बताया जाता था। हमें बताया जाता था कि यदि 48 और 47 को जोड़ना है तो, चूँकि ये दोनों संख्याएँ 50 की नजदीकी हैं इसलिये, पहले 50 और 50 को जोड़ो और फिर योग 100 में (50 - 48) + (50 - 47) याने कि 2 + 3 = 5 को घटा कर उत्तर 95 बता दो। इसी प्रकार के मनगणित तथा व्यवहार गणित के अनेक सिद्धान्त हमें सिखाये गये थे।

तो मैं कह रहा था कि हम अपने ज्ञान को भुलाते चले जा रहे हैं। आज बच्चों को पहाड़ा याद नहीं रहता क्योंकि वे केलकुलेटर का प्रयोग करने लग गये हैं। आज यदि किसी से यह प्रश्न कर दिया जाये कि बिना केलकुलेटर का प्रयोग किये बताइये कि 123456789072 में किन किन अंकों का पूरा-पूरा भाग चला जायेगा और किनका नहीं तो यह एक बहुत कठिन प्रश्न हो जायेगा। इसी पोस्ट में मैं बताउँगा कि इस प्रश्न का उत्तर बहुत ही सरलता के साथ दिया जा सकता है।

केलकुलेटर का प्रयोग करना अवश्य ही अच्छी बात है किन्तु पहाड़ा याद न करने को तो अच्छी बात नहीं कहा जा सकता। कभी-कभी हमें ज्ञान को याद रखने के लिये ही गणित के जोड़, घटाना, गुणा और भाग जैसे कुछ सरल प्रश्नों को बिना केलकुलेटर की सहायता के हल करना चाहिये। विद्याधन ऐसी सम्पत्ति है जिसे न खर्चने पर वह घट जाता है और खर्चने पर बढ़ते जाता है, कहा भी गया हैः

सरस्वती के भण्डार की बड़ी अपूरब बात।
ज्यों खरचे त्यों त्यों बढ़े बिन खरचे घट जात॥

मुझे याद है कि आज से मात्र 35-40 साल पहले ही हमारे बैंक में हमारे लिये केलकुलेटर उपलब्ध नहीं था और हमें 30 से 40 संख्याओं को जोड़ना पड़ता था। क्लर्क के किये गये इस प्रकार के गणितीय कार्य की अधिकारी जाँच किया करते थे। मेरे किये गये जोड़ में किसी प्रकार की गलती न मिल पाये इसके लिये मैं जोड़ने के बाद उसे फिर से जोड़ कर खुद ही जाँच लेता था, और जाँचते समय संख्याओं को उलटी ओर से जोड़ता था याने कि पहली बार ऊपर से नीचे की ओर जोड़ता था और जाँचते वक्त उन्हीं संख्याओं को नीचे से ऊपर की ओर जोड़ता था। ऐसा करने का एक फायदा यह था कि यदि मैंने पहली बार गलती से बारह और पाँच सत्रह के स्थान पर अठारह या सोलह जोड़ दिया हो तो उलटी ओर से जोड़ने से उस गलती के दुहराने का अवसर ही नहीं रह पाता था।

अब आते हैं हम उस प्रश्न पर जिसका उल्लेख ऊपर आया है। हमें पता लगाना है कि 123456789072 में किन किन अंकों का पूरा-पूरा भाग जा सकता है।

इसके लिये निम्न नियमों को देखें

यदि किसी संख्या का आखरी अंक सम अर्थात् 0, 2, 4, 6 या 8 है तो उस पूरी संख्या में 2 का पूरा-पूरा भाग चला जायेगा। चूँकि 123456789072 का अंतिम अंक याने कि 2 सम है इसलिये इस संख्या में 2 का पूरा-पूरा भाग चला जायेगा।

यदि किसी संख्या के सभी अंको के योग में 3 का पूरा-पूरा भा चला जाता है तो उस पूरी संख्या में भी 3 का भाग पूरा-पूरा चला जायेगा। संख्या 123456789072 के अंकों के योग (1 + 2 + 3 + 4 + 5 + 6 + 7 + 8 + 9 + 0 + 7 + 2 =) 54 या (5 + 4 =) 9 में 3 का पूरा-पूरा भाग चला जाता है अतः इसमें 3 का पूरा-पूरा भाग चला जायेगा।

यदि किसी संख्या के अन्तिम दो अंकों से बनी संख्या में 4 का पूरा-पूरा भाग चला जाता है तो उस पूरी संख्या में भी 4 का पूरा-पूरा भाग चला जायेगा। संख्या 123456789072 के अंतिम दो अंको वाली संख्या 72 में 4 का पूरा-पूरा चला जाता है अतः 123456789072 में भी 4 का पूरा-पूरा भाग चला जायेगा।

यदि किसी संख्या का आखरी अंक 0 या 5 है तो उस पूरी संख्या में 5 का पूरा-पूरा भाग चला जायेगा। चूँकि 123456789072 का अंतिम अंक 2 है इसलिये इस संख्या में 5 का पूरा-पूरा भाग नहीं जायेगा।

यदि किसी संख्या में 2 और 3 दोनों का ही पूरा-पूरा भाग चला जाता है तो उस संख्या में का 6 का पूरा-पूरा भाग चला जायेगा। ऊपर हम देख चुके हैं कि संख्या 123456789072 में 2 और 3 दोनों का ही पूरा पूरा भाग चला जाता है अतः 6 का भी पूरा-पूरा भाग चला जायेगा।

सात के लिये कोई नियम नहीं है।

यदि किसी संख्या के अन्तिम तीन अंकों से बनी संख्या में 8 का पूरा-पूरा भाग चला जाता है तो उस पूरी संख्या में भी 8 का पूरा-पूरा भाग चला जायेगा। संख्या 123456789072 के अंतिम तीन अंको वाली संख्या 072 में 8 का पूरा-पूरा भाग चला जाता है अतः 123456789072 में भी 8 का पूरा-पूरा भाग चला जायेगा।

यदि किसी संख्या के सभी अंको के योग में 9 का पूरा-पूरा भा चला जाता है तो उस पूरी संख्या में 3 का भाग पूरा-पूरा चला जायेगा। संख्या 123456789072 के अंकों के योग (1 + 2 + 3 + 4 + 5 + 6 + 7 + 8 + 9 + 0 + 7 + 2 =) 54 या (5 + 4 =) 9 में 9 का पूरा-पूरा भाग चला जाता है अतः पूरी संख्या में भी 9 का पूरा-पूरा भाग चला जायेगा।


चलते-चलते

1 रु. = 100 पैसा
या 1 रु. = 10 पैसा × 10 पैसा (10 पैसा = 1/10 रु. याने कि रुपये का दसवाँ भाग)
या 1 रु. = 1/10 रु. × 1/10 रु.
या 1 रु. = 1/100 रु. (1/10 रु. = 1 पैसा याने कि रुपये का सौंवा भाग)
या 1 रु. = 1 पैसा

इस प्रकार से सिद्ध होता है कि एक रुपया बराबर एक पैसा होता है।

वैसे इसमें एक गलती है क्योंकि एक रुपया बराबर एक पैसा हो ही नहीं सकता। यदि आप गलती पकड़ लें तो अपनी टिप्पणी में अन्य लोगों को भी बता दें।

------------------------------------------------------
"संक्षिप्त वाल्मीकि रामायण" का अगला पोस्टः

राम-सुग्रीव मैत्री - - किष्किन्धाकाण्ड (2)

Tuesday, November 17, 2009

लड़की भगाकर अर्थात् हरण करके उससे विवाह करने का चलन पौराणिक काल से चला आ रहा है

मेरे मित्र के साले महोदय अपने पड़ोस की कन्या को लेकर भाग गये। यह लगभग डेढ़ साल पहले की बात है। मित्र के ससुराल वाले मेरे मित्र को बहुत मानते हैं इसलिये इस मामले में क्या करना है इस बात का निश्चय उन्हें ही करना था। उन्होंने सारा किस्सा मुझे बताया और इस मामले में मेरी सलाह माँगी। उन्होंने बताया कि तीन दिनों तक छिपे रहने के बाद उनके साले ने अपने घर से सम्पर्क स्थापित कर बता दिया है कि वह कहाँ है। अन्तर्जातीय मामला है। लड़की वाले धनी और सम्पन्न हैं और बुरी तरह से बिफड़े हुए भी हैं किन्तु बहुत खोज करवाने के बाद भी उन्हें अपनी लड़की और मित्र के साले का पता नहीं चल सका है। अब इस मामले में क्या करना चाहिये।

मैंने कहा कि भाई यदि लड़का और लड़की सचमुच शादी करना चाहते हैं तो उनकी शादी कर ही देनी चाहिये। इस मामले में जाति-पाँति देखना बेकार है। मेरे कहने से मित्र के ससुराल वाले उनकी शादी करवाने के लिये तैयार हो गये। पूरी सावधानी बरतते हुए आर्यसमाज में उन दोनों का विवाह करा दिया गया और लड़की वालों को भनक भी नहीं लगी। शादी हो जाने पर लड़की वाले भड़के तो बहुत किन्तु कुछ भी नहीं कर पाये और आज वह दम्पति सुखी गृहस्थ जीवन बिता रहा है।

यह तो हुआ किस्सा। किन्तु इस प्रकार से विवाह करने का चलन हमारे यहाँ पौराणिक काल से चला आ रहा है। कृष्ण और विदर्भ के राजा भीष्मक की पुत्री रुक्मणी एक दूसरे पर आसक्त थे। रुक्मणी का विवाह चेदिराज शिशुपाल के साथ करना तय हो गया तो कृष्ण रुक्मणी को हर लाये अर्थात् भगा लाये और उससे विवाह कर लिया।

इसी प्रकार अर्जुन और कृष्ण की बहन सुभद्रा एक दूसरे से प्रेम करते थे किन्तु सुभद्रा के बड़े भाई बलराम नहीं चाहते थे कि उनका विवाह हो। कृष्ण की सलाह के अनुसार ही अर्जुन सुभद्रा को भगा लाये याने कि हर लाये और विवाह किया।

वत्स राज्य के पुरुवंशीय राजा उदयन भी अवन्ति राज्य की राजकुमारी वासवदत्ता को हर लाये थे और उनसे विवाह किया था, संस्कृत के महाकवि भास ने तो उदयन और वासवदत्ता की प्रेमकथा पर "स्वप्नवासवदत्ता", "प्रतिज्ञायौगन्धरायण" जैसे नाट्यों की रचना कर डालीं। पृथ्वीराज के द्वारा संयोगिता को भगा कर विवाह करने के विषय में आप तो सभी जानते ही हैं।

इन सभी उदाहरणों से स्पष्ट है कि लड़की भगाकर उससे शादी करने का चलन पौराणिक काल से चला आ रहा है।


चलते-चलते

विवाह के बाद विदा होते समय वर अत्यन्त खुश रहता है और कन्या खूब रोती है।

और एक बार विदा हो जाने के बाद कन्या जीवन भर खुश होती है और वर जीवन भर रोता है।

----------------------------------------------------------
"संक्षिप्त वाल्मीकि रामायण" का अगला पोस्टः

पम्पासर में राम हनुमान भेंट - किष्किन्धाकाण्ड (1)

Monday, November 16, 2009

होशियारी दिखाने के चक्कर में हम अपना ही कबाड़ा कर जाते हैं

हम में से अधिकतर लोग प्रायः खुद को होशियार समझते हैं पर कभी-कभी हमारी होशियारी ही हमारा कबाड़ा कर देती है। इसी से सम्बन्धित आपको अपना एक संस्मरण सुनाता हूँ।

हमारे बैंक के प्रशिक्षण केन्द्र में व्यवहार विज्ञान (behavioral science) का सेशन था।

प्रशिक्षक ने आते ही कहा कि देखिये जब कभी भी हमें कुछ आदेश दिया जाता है तो हमें दिये गये आदेश के अनुसार ही काम करना चाहिये न कि अपने हिसाब से। आप लोग क्या आदेश के अनुसार ही काम करते हैं?

हम सभी प्रशिक्षार्थियों का उत्तर था 'जी हाँ'।

इसके पश्चात् प्रशिक्षक महोदय हमें 'टीमवर्क' (teamwork) और 'लीडरशिप' (leadership) के विषय में बताने लगे। जब सेशन समाप्त होने में पन्द्रह-बीस मिनट शेष रह गये तो उन्होंने कहा कि अब हम आप लोगों का व्यवहार विज्ञान से सम्बन्धित एक टेस्ट लेंगे। आपको एक पर्चा दिया जा रहा है और उसमें जैसा लिखा है आपको वैसा ही करना है।

इतना कह कर उन्होंने हम सभी को एक-एक परचा दे दिया गया। परचे में लिखा था -

आपको निम्न लिखित कार्य करने हैं:

1. नीचे दिये गये पैराग्राफ को पढ़ें।

2. पैराग्राफ को पढ़ने के पश्चात् उसके नीचे दिये गये साठ प्रश्नों को पढ़ें।

3. सारे प्रश्नों को पढ़ लेने के बाद उन प्रश्नों का, जो कि उसी पैरा से सम्बन्धित हैं, इस परचे के साथ दिये गये उत्तर पुस्तिका में उत्तर दें।

4. अधिक से अधिक अंक प्राप्त करना अपेक्षित है।

5. आपको ये कार्य तीन मिनट में करने हैं।

मैंने पैराग्राफ को ध्यान से पढ़ा। पैरा पढ़ने में दो मिनट व्यतीत हो गये। फिर मैंने पहले प्रश्न को पढ़ा। बहुत ही सरल प्रश्न था, बिल्कुल पहली क्लास के बच्चों से किया जाने वाला प्रश्न जैसा, जिसका आसानी के साथ उत्तर दिया जा सकता था। अधिक से अधिक अंक पाने थे और मेरे पास एक मिनट से भी कम समय बचा था इसलिये मैंने तत्काल प्रश्न का उत्तर लिख दिया। फिर दूसरा, तीसरा, चौथा उत्तर लिखते चला गया। मैंने चौबीसवें प्रश्न का उत्तर लिखा ही था कि तीन मिनट पूरे होने की घंटी बज गई और उत्तर पुस्तिका वापस देना पड़ा।

मैं बहुत खुश हो रहा था कि क्योंकि अन्य लोगों से मैं अधिक तेज हूँ इसलिये मैंने चौबीस प्रश्नों के उत्तर दे दिये हैं। बाकी लोग तो मुश्किल से पन्द्रह-सोलह प्रश्नों के उत्तर दे पाये होंगे। सबसे अधिक अंक मुझे ही मिलना है।

प्रशिक्षक महोदय ने सरसरी रूप से हम सभी के परचों को दो-तीन मिनट में ही देख लिया और घोषणा कर दी कि आप लोगों में से किसी को भी एक भी अंक नहीं मिला है, सबके अंक जीरो हैं।

हम सभी आश्चर्य में आ गये। ऐसा कैसे हो सकता है?

हमें आश्चर्यचकित देख कर प्रशिक्षक महोदय मुस्कुरा कर बोले, "आप लोगों को एक भी अंक इसलिये नहीं मिल पाया क्योंकि आप में से किसी ने भी पैराग्राफ को पढ़ने के बाद पूरे प्रश्नों को नहीं पढ़ा जबकि परचे में साफ लिखा था कि पहले सभी प्रश्नों को पढ़ें फिर उसके बाद ही उत्तर देना शुरू करें। बताइये किसी ने भी पूरे प्रश्नों को पढ़ा था क्या?"

हम लोगों को मानना पड़ा कि किसी ने भी पूरे प्रश्नों को नही पढ़ा था।

प्रशिक्षक महोदय बोले, "परचा अभी भी आप लोगों के ही पास है, अब पढ़ लीजिये।"

जब मैंने पढ़ा तो उनसठवें प्रश्न के नीचे लिखा था "उपरोक्त सारे प्रश्न निरस्त किये जा रहे हैं, आप को सिर्फ अन्तिम प्रश्न का उत्तर देना है"

जाहिर है कि अन्तिम प्रश्न का उत्तर हममें से किसी ने भी नहीं दिया था इसलिये हमें एक भी अंक नहीं मिले।


चलते-चलते

प्रशिक्षण केन्द्र में प्रशिक्षक महोदय एडजस्टमेंट एंट्री के विषय में बता रहे थे। विषय को समझाने के बाद उन्होंने पूछा किस सब लोग समझ गये ना? और सभी लोगों ने कह दिया कि हाँ समझ गये।

इस पर प्रशिक्षक महोदय ने पूछा, "रुपीज फिफ्टी थाउजेंड डिपॉजिटेड बाय मि. युसुफ इज़ इरोन्यूअसली क्रेडिटेड इनटू द अकाउन्ट ऑफ मि. इस्माइल, देन व्हाट विल बी?"

एक प्रशिक्षार्थी ने जवाब दिया, "इस्माइल विल इस्माइल सर!!!"

---------------------------------------------------------
"संक्षिप्त वाल्मीकि रामायण" का अगला पोस्टः

शबरी का आश्रम - अरण्यकाण्ड (18)

Sunday, November 15, 2009

खब्त-खोपड़ी-खाविन्द हूँ तेरा, जीवन भर तुझको झेला हूँ

हे आर्यावर्त की आधुनिक आर्या!
हे विकराले! हे कटुभाषिणी!
हे देवि! हे भार्या!

पाणिग्रहण किया था तुझसे
सोच के कि तू कितनी सुन्दर है,
पता नहीं था
मेरी बीबी मेरी खातिर
"साँप के मुँह में छुछूंदर है"

निगल नहीं पाता हूँ तुझको
और उगलना मुश्किल है
समझा था जिसको कोमलहृदया
अब जाना वो संगदिल है

खब्त-खोपड़ी-खाविन्द हूँ तेरा
जीवन भर तुझको झेला हूँ
"पत्नी को परमेश्वर मानो"
जैसी दीक्षा देने वाले गुरु का
सही अर्थ में चेला हूँ

बैरी है तू मेरे ब्लोगिंग की
क्यूँ करती मेरे पोस्ट-लेखन पर आघात है?
मेरे ब्लोगिंग-बगिया के लता-पुष्प पर
करती क्यों तुषारापात है?

हे विकराले! हे कटुभाषिणी!
हे देवि! हे भार्या!

बस एक पोस्ट लिखने दे मुझको
और प्रकाशित करने दे
खाली-खाली हृदय को मेरे
उल्लास-उमंग से भरने दे
तेरे इस उपकार के बदले
मैं तेरा गुण गाउँगा
स्तुति करूँगा मैं तेरी
और तेरे चरणों में
नतमस्तक हो जाउँगा।

चलते-चलते

रात भर ड्यूटी करने बाद थका हारा पुलिसवाला पति घर आकर सो गया। अभी झपकी भी नहीं लगी थी कि उसकी पत्नी ने उसके जेब से सौ की पत्ती मार दिया। पर पुलिसवाला आखिर पुलिसवाला था तत्काल उसने चोरी पकड़ ली।

बीबी से बोला, "मैं तुम्हारा पति बाद में हूँ, पुलिसवाला पहले हूँ। जल्दी से निकाल दो चोरी का माल।"

बीबी बोली, "अजी, छोड़िये भी, चोरी के माल में से आधा आप रख लीजिये और मामला निबटाइये।"

----------------------------------------------------------
"संक्षिप्त वाल्मीकि रामायण" का अगला पोस्टः

कबन्ध का वध - अरण्यकाण्ड (17)

Saturday, November 14, 2009

खाना पसंद न आये तो क्राकरी-चम्मच मत पटकना

बात बहुत पुरानी है। एक बार बनवारी लाल जी को किसी काम से इंग्लैंड जाना पड़ा। काम जरूरी था अतः वहाँ पहुँचते ही बिना कुछ खाये पिये काम में लग गये। काम खत्म होते होते पूरा दिन बीत गया। सही सही काम हो जाने के बाद ध्यान आया कि काम के चक्कर में खाना भी नहीं खाया है। भूख बहुत जम के लगी थी इसलिये सीधे होटल के डायनिंग हाल में गये। वेटर ने मीनू ला कर रख दिया। बनवारी लाल जी बेचारे अंग्रेजी पढ़ना जानते नहीं थे पर बताना भी नहीं चाहते कि उनको अंग्रेजी पढ़नी नहीं आती इसलिये एक ट्रिक से काम लिया। मीनू के कुछ आयटमों में पेंसिल से निशान लगा दिया और इशारे से बता दिया कि निशान वाले आयटम्स ले आओ।

इत्तिफ़ाक की बात है कि जिन सात-आठ खाने के आयटम्स में उन्होंने निशान लगाया था वे सारे के सारे सूप थे।

वेटर ने सभी सूप लाकर टेबल पर रख दिया। बनवारी लाल जी को आश्चर्य हुआ कि सभी चीजें पानी जैसी क्यों हैं। खैर यह सोच लिया कि ये अंग्रेज लोग भारत जैसा लज़्ज़तदार खाना क्या जानेंगे, ऐसा ही खाना खाते होंगे। एक सूप को एक चम्मच चखा और अजब सा मुँह बना कर छोड़ दिया। अब सूप स्वादिष्ट तो होता नहीं है और वे, दिन भर के भूखे, बेचारे बिना स्वाद वाला खाना खा ही नहीं सकते थे। एक एक कर के सभी सूपों को चखा और आखिर में गुस्से से चम्मच को क्राकरी पर जोर से पटक कर अपने कमरे में आकर भूखे ही सो गये। कमरे में आने पर दरवाजे पर भी गुस्सा उतारा था और उसे भड़ाक से बंद किया था। जोर से दरवाजा बंद करने से उनके कमरे का नंबर प्लेट पलट कर उलटा हो गया और कमरे का नंबर 6 की जगह 9 हो गया।

इधर 9 नंबर कमरे में जो सज्जन ठहरे थे उन्हें पिछले तीन चार दिनों से मोशन नहीं हो रहा था। होटल के डॉक्टर हर प्रकार की दवा दे चुके थे और किसी दवा ने काम नहीं किया था। अब डॉक्टर उन्हें एनीमा देना चाहते थे किन्तु वो सज्जन इसके लिये तैयार न थे। डॉक्टर ने होटल के मैनेजर से जाकर वाकया बताया और कहा कि यदि एनीमा नहीं दिया गया तो वो सज्जन मर भी सकते हैं और होटल की बहुत बदनामी हो सकती है। मैनेजर ने कहा अपने साथ चार हट्टे-कट्टे वेटरों को ले जाइये और जबरदस्ती उन्हें को एनीमा दे दीजिये। डॉक्टर ने कहा कि मेरी ड्यूटी का शिफ्ट खत्म हो गया है और मैं जा रहा हूँ। दूसरे शिफ्ट के डॉक्टर आ चुके हैं उनसे यह काम करवा लीजिये।

दूसरा डॉक्टर चार वेटर्स को लेकर बनवारी लाल जी के कमरे में आये क्योंकि उनके कमरे का नंबर 9 हो चुका था। वेटर्स ने बनवारी लाल जी के हाथ पैरों को कस के पकड़ लिया, मुँह में कपड़ा ठूँस दिया ताकि वे चिल्ला न सकें और डॉक्टर ने एनीमा दे दिया। अपना काम करके वे चलते बने। बनवारी लाल जी बेचारे क्या कर सकते थे? आह-ऊह करते रात बिताया उन्होंने और सबेरे के फ्लाइट से वापस भारत आ गये।

उनके इस यात्रा के बाद बीस-बाइस साल बीत गये। एक दिन उनका भांजा उनके पास आया और बोला कि उसे इंग्लैंड जाना है वहाँ के बारे में उसे सब कुछ समझा दे ताकि उसे किसी प्रकार की तकलीफ न हो।

बनवारी लाल जी ने कहा, "और सब तो ठीक है भांजे, बस इतना ध्यान रखना कि यदि खाना पसंद न आये तो क्राकरी-चम्मच मत पटकना। क्राकरी-चम्मच पटकने पर अंग्रेज रात को भयंकर सजा देते हैं।"

Friday, November 13, 2009

मुझे मिले ब्लोगवाणी पसंद ने फूलकर कुप्पा कर दिया मुझे ... पर क्या यह वास्तव में खुशी की बात है?

यह तो अब सभी जानते हैं कि आज सुबह के मेरे पोस्ट "एक ब्लोगवाणी पसंद का सवाल ..." को बहुत ज्यादा पसंद मिली। क्यों? क्योंकि अधिकतर लोग यही समझे कि मैंने अधिक पसंद पाने के लिये मतलब आत्मतुष्टि पाने के लिये यह पोस्ट लिखा था। वो लोग यह समझे कि मैं उनसे अपने पोस्ट के पसंद बटन को क्लिक करने का अनुरोध कर रहा हूँ और उन्होंने मुझे दान के रूप में पसंद दे दिया, जी हाँ दान के रूप में। और टिप्पणी में जता भी दिया कि ले तू भी क्या याद रखेगा, दिया तुझे दान।

पर मुझे दुःख है कि मेरे उस पोस्ट का आशय बहुत कम लोगों ने समझा। हो सकता है कि मैं ही समझाने में असफल रहा होऊँ यद्यपि मैंने स्पष्ट लिखा थाः

यह सब मैं अपने पोस्ट को पसंद करवाने के लिये नहीं कह रहा हूँ बल्कि उन सभी पोस्टों के बारे में कह रहा हूँ जिन्हें आप पढ़ कर पसंद करते हैं और टिप्पणी भी करते हैं। आपकी टिप्पणी से सिर्फ ब्लोगर को तुष्टि मिलती है किन्तु आपके पसंद बटन को क्लिक करने से न सिर्फ ब्लोगर को तुष्टि मिलती है वरन ब्लोगवाणी की लोकप्रियता भी बढ़ती है।

मैं जो चाहता था वह नहीं हुआ। मुझे तो बहुत सारे पसंद मिले किन्तु अन्य कई अच्छे पोस्ट्स को जो पसंद मिलनी थी नहीं मिली। उदाहरण के लिये एक पोस्ट "बाजारीकरण या आजादी------- (मिथिलेश दुबे)" का स्क्रीनशॉट दे रहा हूँ।

स्क्रीनशॉट से स्पष्ट है कि यह पोस्ट आज सुबह नौ बज कर बयालीस मिनट में ब्लोगवाणी में आया था। मेरे स्क्रीनशॉट लेते समय याने कि शाम को छः बज कर चार मिनट तक इस पोस्ट को उन्तीस लोग पढ़ चुके थे और पाँच टिप्पणियाँ भी आ चुकी थीं। किन्तु पसंद बटन पर मात्र दो चटके लगे थे। पाँच टिप्पणीकर्ताओं में एक मैं भी था। टिप्पणी करने के बाद मैंने स्क्रीनशॉट लिया और फिर तीसरा चटका लगाया। टिप्पणियों के हिसाब से यह पोस्ट कम से कम पाँच पसंद का हकदार तो बनता है। मुझे विश्वास है कि यह पोस्ट बहुत लोगों को अवश्य ही पसंद आया होगा।

इस पोस्ट के द्वारा मैं यदि अपनी बात समझाने में सफल होता हूँ तो यह मेरा सौभाग्य होगा।

एक ब्लोगवाणी पसंद का सवाल है बाबा ... जो दे उसका भी भला जो न दे उसका भी भला

कल हमने भेजे याने कि खोपड़ी पर लिखने के लिये खूब खोपड़ी खपाया,
उसे लिखने के लिये दो घंटे की मशक्कत के बदले सिर्फ छः ब्लोगवाणी पसंद ही पाया,
इतनी कम पसंद?
क्या हम इतने गये गुजरे हैं?
ये सब सोच कर हमारा भेजा भन्नाया

अरे! ये तो कविता बनती जा रही है। नहीं भाई, मैं कवि नहीं हूँ इसलिये मैं कविता की और लाइने लिख कर आपको बोर नहीं करूँगा।

मैं तो सिर्फ यह जानना चाहता हूँ कि आखिर लोग किसी पोस्ट को पसंद करते हैं तो पसंद बटन पर एक चटका लगाने में कंजूसी क्यों कर जाते हैं? क्या जाता है उनका पसंद बटन पर एक क्लिक करने में? न तो इसके लिये जेब से रुपया खर्च करना पड़ता है और न ही कोई समय गवाँना पड़ता है।

टिप्पणियाँ मिल जाती हैं पर पसंद नहीं मिलता। बताइये भला, यह भी कोई बात हुई?

यह सब मैं अपने पोस्ट को पसंद करवाने के लिये नहीं कह रहा हूँ बल्कि उन सभी पोस्टों के बारे में कह रहा हूँ जिन्हें आप पढ़ कर पसंद करते हैं और टिप्पणी भी करते हैं। आपकी टिप्पणी से सिर्फ ब्लोगर को तुष्टि मिलती है किन्तु आपके पसंद बटन को क्लिक करने से सिर्फ ब्लोगर को तुष्टि मिलती है वरन ब्लोगवाणी की लोकप्रियता भी बढ़ती है।

ब्लोगवाणी और इसके पसंद बटन की लोकप्रियता बढ़ने पर गूगल को भी इसे अंग्रेजी के डिग, टेक्नोराटी आदि की तरह महत्व देना पड़ेगा। यह मापदंड बन जायेगा हिन्दी ब्लोग की लोकप्रियता का। अधिक पसंद किये जाने वाले पोस्टों को सर्च इंजिन्स में प्रमुख स्थान मिलने लगेंगे। अंग्रेजी के डिग बटन में तो सैकड़ों से हजारों की संख्या में चटके लगते हैं इसी कारण से गूगल सहित अन्य सभी सर्च इंजिन्स की नजरों में डिग का महत्व है। हमें भी यह प्रयास करना है कि ब्लोगवाणी पसंद का भी महत्व डिग, टेक्नोराटी जैसा हो जाये।

तो पसंद आने वाली पोस्टों में आप चाहे टिप्पणी करें या न करें पर पसंद बटन पर चटका लगाना कभी भी न भूलें। ऐसा करके आप ब्लोगर को प्रोत्साहन तो देंगे ही साथ ही साथ हिन्दी ब्लोग्स को आगे बढ़ाने में भी आपका योगदान हो जायेगा। पर चटका उसी पोस्ट के लिये लगायें जो आप को पसंद हो, जो पोस्ट आपको पसंद नहीं हैं उस पर चटका लगाना पसंद बटन का दुरुपयोग होगा।

चलते-चलते

आज के हमारे इस पोस्ट का शीर्षक पढ़ कर कैसा लगा? यही ना कि हमने मांगने वाला स्टाइल अपनाया आज। और आप तो जानते ही हैं

रहिमन वे नर मर चुके जो कछु मांगन जाहि।
उन ते पहिले वे मुए जिन मुख निकसत नाहि॥


-------------------------------------------------


"संक्षिप्त वाल्मीकि रामायण" का अगला पोस्टः

राम की वापसी और विलाप - अरण्यकाण्ड (15)

Thursday, November 12, 2009

विचित्र वस्तु है आपका मस्तिष्क याने कि दिमाग याने कि खोपड़ी याने कि भेजा

आपका मस्तिष्क याने कि दिमाग याने कि खोपड़ी याने कि भेजा वास्तव में विचित्र वस्तु है। बड़े कमाल का बनाया है ईश्वर ने इसको।

अब देखिये ना, आपको कहीं जाना है इसलिये आप अल्मारी खोलते हैं और कपड़ों के अंबार में से झट से एक जोड़ कपड़ा निकाल लेते हैं तैयार होने के लिये। एक पल भी तो नहीं लगा आपको। पर इस एक पल से भी कम समय में आपके दिमाग ने क्या किया? उसने सोचा कि आपको कहाँ जाना है? उस स्थान में कौन लोग होंगे, पुरुष ही पुरुष होंगे या महिलाएँ ही महिलाएँ होंगी या फिर पुरुष और महिलाएँ दोनों ही होंगे? उन लोगों को मेरा कौन सा जोड़ा अधिक प्रभावित करेगा? जहाँ जाना है वहाँ किस रंग के कपड़े फबेंगे? कहने का लब्बोलुआस यह कि जहाँ जाना है वहाँ किस प्रकार के कपड़े में जाना उपयुक्त होगा? ये सब बातें सोच कर और उचित निर्णय ले लेने के बाद आपका दिमाग आपके हाथ को आदेश देता है कि फलाँ जोड़ा निकाल ले। जरा याद करें कि जब आप किसी शादी-ब्याह या बारात में जाते हैं तो आपका हाथ भड़कीले प्रकार का वस्त्र निकालता है और यदि अपने बड़े साहब के पास किसी काम से जाना होता है तो आपका हाथ शोबर टाइप का जोड़ा निकालता है।

ऐसा भी होता है कि राह में चलते-चलते आपको साँप दिख जाता है और आप फौरन रुक जाते हैं? आप तो फौरन रुक गये किन्तु इस फौरन समय में आपकी खोपड़ी ने क्या किया? उसने आपकी आँखों से सन्देश प्राप्त किया क्योंकि आपकी आँखें देख सकती हैं किन्तु पहचान नहीं सकतीं कि क्या चीज है इसलिये जो भी देखा है उसे सन्देश के रूप में आपकी खोपड़ी को भेज देती हैं। तो आपकी खोपड़ी ने आँखों से प्राप्त सन्देश पर विचार किया और निर्णय लिया कि खतरा है। खतरे का आभास होते ही आपके पैरों को सन्देश भेजा कि रुक जाओ।

विचित्र है आपका मस्तिष्क! आप अपने मित्रों से वार्तालाप कर रहे हैं। आप कुछ बोल रहे हैं और कोई मक्खी आकर बैठ जाती है आपके नाक पर। पर आप मक्खी के इस दुस्साहस को भला कैसे सहन कर सकते हैं? आप तो "नाक पर मक्खी नहीं बैठने देने" वाले व्यक्ति हैं! एक तरफ आप मक्खी के दुस्साहस को सहन नहीं करना चाहते तो दूसरी ओर बोलते-बोलते रुकना भी नहीं चाहते। और आपका मस्तिष्क आपकी दोनों इच्छाएँ पूरी कर देता है। आपकी जुबान तो बोलते ही रहती है और हाथ मक्खी को उड़ा देती है। आप दो कार्य एक साथ कर डालते हैं। कैसे? आपका चेतन मस्तिष्क (conscious) आपकी जुबान को बोलने का सन्देश भेजते ही रहती है और आपका अचेतन मस्तिष्क (semi-conscious) आपके हाथ को सन्देश भेज देता है मक्खी उड़ाने के लिये।

अक्सर आपका भेजा खराब भी होता है और आप बरस पड़ते हैं किसी पर। किसी ने आपसे कुछ कहा जिसे आपके कानों ने सुना। कान नहीं जानता कि क्या कहा गया है इसलिये वह सन्देश के रूप में कही गई बात को आपके भेजे तक भेज देता है। भेजा उस सन्देश को समझकर जान जाता है कि आपको कुछ अपशब्द कहा गया है। बस फिर क्या है? तत्काल आपका भेजा खराब हो जाता है। वह आपकी जुबान को सन्देश भेज देता है कि तू भी सामने वाले पर बरस। और अगर भेजा ज्यादा ही खराब हो गया तो आपके हाथों और लातों को सन्देश भेज देता है कि ....

अभी तक तो हम आपके मस्तिष्क याने कि दिमाग याने कि खोपड़ी याने कि भेजे की बात कर रहे थे। चलिये अब कुछ हमारे दिमाग की भी बात कर लेते हैं। हमारा दिमाग तो सिड़ी दिमाग है। हर विषय को जान लेना चाहता है पर एक भी विषय को सही सही नहीं जान पाता। वो कहते हैं ना "जैक ऑफ ऑल एण्ड मास्टर ऑफ नन"! कुछ ऐसा ही है हमारा दिमाग भी। हमें गुस्सा आता है अपनी श्रीमती जी पर और हमारा दिमाग गुस्सा निकालवाता है खुद अपने पर। हमें खाना खाना बंद करवा देता है। अब हमारे न खाने से भला श्रीमती जी को क्या फर्क पड़ता है? नहीं जी, ये हमारा दिमाग बहुत शातिर है, जानता है कि मुझे कुछ तकलीफ होगी तो मेरी श्रीमती जी दुःखी होंगी। चालाकी के साथ अपना गुस्सा उतार लेता है घरवाली को दुःख देकर।

तो कहाँ तक बात करें भाई इस मस्तिष्क याने कि दिमाग याने कि खोपड़ी याने कि भेजे की! और अधिक झेलवायेंगे आपको तो आप हमारे ब्लॉग को बंद कर के भाग जायेंगे। इसलिये बस इतना ही।

चलते-चलते

भेजे के उस दुकान में हर रेंज का भेजा उपलब्ध था। सभी के रेट भी लिखे हुए थे। अलग-अलग भेजों के रेट डेढ़ सौ रुपये से ढाई सौ रुपये प्रति किलो तक अलग-अलग थे। पर एक भेजे का रेट लिखा था एक लाख रुपये प्रति किलो।

हमने दुकानदार से पूछ लिया, "इसका रेट इतना अधिक क्यों है?"

"अरे साहब! ये विवाहित पुरुषों का भेजा है, बड़ी मुश्किल से मिलता है। पति के जीवनकाल में ही पत्नियाँ उनका पूरा भेजा चाट चुकी होती हैं।"


------------------------------------------------------
"संक्षिप्त वाल्मीकि रामायण" का अगला पोस्टः

रावण-सीता संवाद - अरण्यकाण्ड (14)

Wednesday, November 11, 2009

क्या वो भूत था या महज एक भ्रम? (अन्तिम भाग)

मेरे किस्से को सुनकर सुब्रमणियम साहब ने कहा, "अवधिया! आई हैव नॉट टोल्ड यू मॉय एक्पीरियंस, आय हैव गॉन थ्रू सम पीक्युलियर फीलिंग्स इन दिस गेस्ट हाउस। मैं सोचा कि तुम डर जायेगा इसलिये नहीं बताया पर अब बताता है। द व्हेरी फर्स्ट डे एट दिस गेस्ट हाउस ........ बैंक से आने के बाद तुम घूमने चला गया और मैं अपना पैग बनाने लगा। पैग डालते समय मुझे ऐसा लगा कि किसी ने दरवाजे को धक्का दिया है। मैं दरवाजे को देखा तो वो हल्का सा हिल भी रहा था। मैं सोचा कि कोई चोर तो नहीं आया इसलिये पैग छोड़कर मैं गलियारे में आया। वहाँ कोई नहीं था। जल्दी से जाकर मैं सीढ़ी को देखा। उधर भी कोई नहीं था (गोलाकार होने के कारण पूरी सीढ़ी ऊपर से नीचे तक दिखती थी)। फिर मैं बाथरूम को भी देखा वहाँ भी कोई नहीं था।

"मैं सोचा मेरा कनफ्युजन था। वापस आकर मैं फिर पैग बनाया और पीने लगा। थोड़ी देर में फिर किसी ने दरवाजे को हल्का धक्का दिया। इस बार भी मैं पूरा चेक किया। उस दिन के बाद ऐसा मेरे साथ कई बार हुआ। मैं साफ फील किया कि किसी ने दरवाजे को पुश किया है। एक दिन मैं कनफ्युज हो सकता था पर रोज रोज नहीं हो सकता।"

इतना बताकर वे मुझसे बोले, "देखो अवधिया, मेरा एज फिफ्टी टू इयर्स हो रहा है बट मैं कभी भूत नहीं देखा। अगर यहाँ कोई भूत है तो मैं देखना चाहता हूँ। वो इसलिये कि यहाँ जो भी है वो हार्मफुल नहीं है। वो हार्मफुल होता तो अब तक हमको बहुत हरास किया होता। उसने ऐसा नहीं किया। अब तुम बोलेगा कि आप यहाँ रह कर देखो साहब तो मैं ऐसा नहीं कर सकता। तुम साथ देगा तो मैं तुम्हारे हिम्मत से और तुम मेरे हिम्मत से दोनों रह सकता है। बोलो यहाँ रहना है या कही और शिफ्ट करना है?"

मैंने सोचा जब ये बावन साल का होकर यहाँ रहने की हिम्मत कर सकते हैं तो मैं तीस साल का होने पर भी क्यों नहीं कर सकता? मैंने वहाँ रहने के लिये अपनी मंजूरी दे दी।

मेरी मंजूरी पाकर उन्होंने कहा, "पर तुम इस बात को इधर के किसी भी स्टाफ को बिल्कुल मत बताना, नहीं तो वो लोग जबरन हमें यहाँ से शिफ्ट कर देंगे। हम लोगों को यहाँ तीन हफ्ते रहना है जिसमें से पाँच दिन हो चुके हैं। वो लोग जान गये तो हमें यहाँ नहीं रहने देंगे।"

मैंने उनकी यह शर्त भी मान ली।

हम दोनों वहीं रहने लगे। वह कमरा हॉलनुमा था और हम दोनों के पलंग के बाद भी कमरे बहुत बड़ा हिस्सा खाली था। सुब्रमणियम साहब मस्त जीव थे। पीने खाने के बाद उन्हें तत्काल नींद आ जाती थी और वे खर्राटे भरने लगते थे। मैं पुस्तक पढ़ते रहता था रात में। पर लाइट बंद करने के बाद महसूस होता था कि कोई कमरे के खाली हिस्से में परेशान सा इधर से उधर और उधर से इधर चहलकदमी कर रहा है। कदमों की बिल्कुल स्पष्ट आवाज सुनाई देता था मुझे। सुबह चार बजे ही सुब्रमणियम साहब की नींद खुल जाती थी पर लाइट गोल रहने के कारण कमरे में वही घुप्प अंधेरा रहता था और सुब्रमणियम साहब मुझे बताते थे कि वे भी उस चहलकदमी को सुबह का उजाला होने तक स्पष्ट अनुभव करते थे।

नियत समय में काम पूर्ण करने के लिये मैंने बैंक के एक टाइपिंग मशीन को भी वहीं मँगवा लिया और खिड़की के साथ लगी टेबल पर उसे लगवा दिया। कई बार टाइप करते करते खिड़की के पास से किसी के निकलने की सरसराहट भी महसूस किया था मैंने। दरवाजे को धक्का लगा भी मैंने कई बार महसूस किया।

एक दो दिन ही हमें कुछ भय लगा फिर हम अभ्यस्त से हो गये। मैं और सुब्रमणियम साहब अपने वार्तालाप में उस प्राणी को, यदि वहाँ कोई रहा हो तो, अपने मित्र के रूप में सम्बोधित करते थे। इस प्रकार से वहाँ रहने का अन्तिम दिन आ गया। आखरी दिन कुछ डिस्कस करने, और कर्ट्‌सी के नाते भी, शाखा प्रबंधक शर्मा जी भी हमारे गेस्ट हाउस में आ गये। सुब्रमणियम साहब ने उन्हें ड्रिंक आफर किया और वे भी तैयार हो गये। सुब्रमणियम साहब ने उन्हें अपनी कुर्सी दे दी बैठने के लिये और खुद बिस्तर पर बैठकर दोनों के लिये पैग बनाने लगे कि अचानक शर्मा साहब की नजरें दरवाजे के तरफ उठ गईं।

तपाक से सुब्रमणियम साहब बोल उठे, "मिस्टर शर्मा! व्हाट फॉर यू आर लुकिंग एट द डोर?"

शर्मा जी बोले, "सर, आय थिंक समबडी हैज पुश्ड द डोर।"

सुब्रमणियम साहब ने कहा, "आय जस्ट वान्टेड टू लिसन दिस फ्रॉम यू।"

इतना कह कर, क्योंकि अगले रोज हमें जलपाईगुड़ी से विदा लेना था, उन्होंने शर्मा साहब को पूरा किस्सा बता दिया। सुनकर शर्मा साहब आश्चर्यचकित रह गये। वे बोले, "सर, हमारे यहाँ बंगाल में भूतों के बहुत से किस्से सुने जाते हैं पर इस गेस्ट हाउस के विषय में कोई ऐसी वैसी बात मैंने कभी नहीं सुनी। वैसे पिछले तीन सालों से यहाँ कोई नहीं ठहरा है। शायद इसी बीच यहाँ किसी आत्मा का वास हो गया हो। आप लोगों ने इतने दिनों तक मुझे कुछ भी नहीं बताया। बताया होता तो मैं आप लोगों को यहाँ किसी भी हालत में रहने नहीं देता। आप लोग आज मेरे घर चल कर रहें।"

उन्होंने बहुत जोर दिया पर हम नहीं माने। हम लोगों ने उन्हें सन्तुष्ट कर दिया कि आज तो रात भर हमें काम करना है और गैस बत्ती का भी प्रबन्ध कर लिया है। गैसबत्ती तो रात भर जलेगी। वैसे भी इतने दिनों तक हमारा कुछ भी अहित नहीं हुआ तो अब क्या होगा! चिन्ता करने की कोई जरूरत नहीं है।

दूसरे दिन हमने जलपाईगुड़ी छोड़ दिया और हमारा वह प्यारा दोस्त वहाँ अकेले रह गया।

आज भी मैं सोचता हूँ कि वो कोई भूत था या महज वहम था? और यदि वहम था तो तीन तीन व्यक्तियों, याने कि मैं, सुब्रमणियम साहब और शर्मा जी, को कैसे हुआ?


चलते-चलते

ट्रेन के उस कूपे में उसके साथ एक और व्यक्ति व्यक्ति बैठा था।

उसने अपने उस अपरिचित साथी से पूछ लिया, "क्या आप भूत के होने पर विश्वास करते हैं?"

उसने उत्तर दिया, "हाँ!"

और उत्तर देते ही वह गायब हो गया।

---------------------------------------------------
"संक्षिप्त वाल्मीकि रामायण" का अगला पोस्टः

जटायु वध - अरण्यकाण्ड (13)

 
Design by Free WordPress Themes | Bloggerized by Lasantha - Premium Blogger Themes | fantastic sams coupons