Tuesday, October 19, 2010

स्वप्न वासवदत्ता - अंक 1 (संस्कृत नाटक का संपादित सरल हिन्दी रूपान्तर)

स्वप्नवासवदत्ता महाकवि भास रचित छः अंकों का रोचक संस्कृत नाटक है जिसका हिन्दी रूपान्तर यहाँ प्रस्तुत किया जा रहा है। किसी नाटक का रूपान्तर करने का यह मेरा प्रथम प्रयास है अतः त्रुटियाँ होने की बहुत अधिक सम्भावनाएँ हैं। आशा करता हूँ कि आप उन त्रुटियों पर विशेष ध्यान नहीं देंगे।

इस नाटक की कथावस्तु को समझने के लिए कुछ पूर्व प्रसंग को जानना जरूरी है जो इस प्रकार हैः

स्वप्नवासवदत्ता के नायक पुरुवंशीय राजा उदयन हैं। वे वत्स राज्य राज्य के अधिपति थे। कौशाम्बी उनकी राजधानी थी। उन दिनों राजगृह मगध राज्य की राजधानी थी और वहाँ का राजा अजातशत्रु का पुत्र दर्शक था। अवन्ति राज्य की राजधानी उज्जयिनी थी तथा वहाँ के राजा प्रद्योत थे। महाराज प्रद्योत का सैन्य-बल अत्यन्त विशाल था और इसीलिये उन्हें महासेन के नाम से भी जाना जाता था।

महाराज उदयन के पास घोषवती नामक एक दिव्य वीणा थी। उनका वीणा-वादन अपूर्व था। एक बार राजा प्रद्योत के अमात्य शालंकायन ने छल करके उदयन को बन्दी बना लिया। उदयन के वीणा-वादन की ख्याति सुनकर प्रद्योत ने उन्हे अपनी पुत्री वासवदत्ता के लिये वीणा-शिक्षक नियुक्त कर दिया। वीणा सीखने-सिखाने के बीच, उदयन और वासवदत्ता एक दूसरे के प्रति आकर्षित हो गये।

इधर उदयन के मन्त्री यौगन्धरायण उन्हें कैद से छुड़ाने के प्रयास में थे। यौगन्धरायण के चातुर्य से उदयन, वासवदत्ता को साथ ले कर, उज्जयिनी से निकल भागने में सफल हो गये और कौशाम्बी आकर उन्होंने वासवदत्ता से विवाह कर लिया।

उदयन वासवदत्ता के प्रेम में इतने खोये रहने लगे कि उन्हें राज-कार्य की सुधि ही नहीं रही। इस स्थिति का लाभ उठा कर आरुणि नामक उनके क्रूर शत्रु ने वत्स राज्य पर आक्रमण करके उसे जीत लिया।

आरुणि से उदयन के राज्य को वापस लेने के लिये उनके मन्त्री यौगन्धरायण और रुम्णवान् प्रयत्नशील हो गये। किन्तु बिना किसी अन्य राज्य की सहायता के आरुणि को परास्त नहीं किया जा सकता था। वासवदत्ता के पिता प्रद्योत उदयन से नाराज थे और यौगन्धरायण को उनसे किसी प्रकार की उम्मीद नहीं थी।

यौगन्धरायन को ज्योतिषियों के द्वारा पता चलता है कि मगध-नरेश की बहन पद्मावती का विवाह जिन नरेश से होगा वे चक्रवर्ती सम्राट हो जायेंगे। यौगन्धरायण ने सोचा कि यदि किसी प्रकार से पद्मावती का विवाह उदयन से हो जाये तो उदयन को अवश्य ही उनका वत्स राज्य आरुणि से वापस मिल जायेगा साथ ही वे चक्रवर्ती सम्राट भी बन जायेंगे।

यौगन्धरायण भलीभाँति जानते थे कि उदयन अपनी पत्नी वासवदत्ता से असीम प्रेम करते हैं और वे अपने दूसरे विवाह के लिये कदापि राजी नहीं होंगे। अतएव उन्होंने वासवदत्ता और रुम्णवान् के साथ मिलकर एक योजना बनाई। प्रस्तुत नाटक इसी योजना पर आधारित है अतः योजना के विषय में जानने के लिए पढ़ें:

स्वप्न वासवदत्ता - अंक 1 (संस्कृत नाटक का संपादित सरल हिन्दी रूपान्तर)

मुख्य पात्रों का परिचयः

सूत्रधार - नाटक का संचालक, उदयन - वत्स देश का राजा, वासवदत्ता - उदयन की पटरानी, पद्मावती - उदयन की द्वितीय पत्नी, यौगन्धरायण - उदयन का प्रधान सचिव तथा अन्य

(सूत्रधार का प्रवेश)

सूत्रधारः नवोदित चन्द्र के वर्ण वाली, आसव से शक्ति सम्पन्न, पद्म के संयोग से परिपूर्ण तथा वसन्त सी कमनीय बलराम जी की भुजाएँ आपकी रक्षा करें!

(नेपथ्य से) आर्य, हटें, हटें! मार्ग छोड़ दें!

सूत्रधारः यह कोलाहल कैसा? समझा! राजकन्या के सेवक, मगधराज के अनुचर तपोवनवासियों को धृष्टतापूर्वक हटा रहे हैं।

(सूत्रधार का प्रस्थान)

दो भट: (प्रवेश करके) आर्य, मार्ग छोड़ दें! आर्य, हटें! आर्य, हटें! आर्य, मार्ग छोड़ दें!

(यौगन्धरायण और वासवदत्ता का क्रमशः परिव्राजक और अवन्तिका के रूप में प्रवेश)

यौगन्धरायण: (ध्यान से सुनने का प्रदर्शन करते हुए) आश्चर्य! घोर आश्चर्य! आश्रमवासियों को भी हटाया जा रहा है! फलाहार से ही सन्तुष्ट, धीर, वक्कलधारी तपस्वियों के साथ यह धृष्टता क्यों की जा रही है? यह कौन अभिमानी, विनयरहित, उन्मत्त, चंचल जन है जो तपोवन में भी आज्ञा देकर गाँव जैसा व्यवहार कर रहा है?

वासवदत्ताः आर्य! यह कौन है जो तपस्वियों को हटा रहा है?

यौगन्धरायणः देवि! वही जो स्वयं को धर्म के मार्ग से हटा रहा है।

वासवदत्ताः आर्य! तपस्वियों के साथ मुझ तक को भी हटाया जा रहा है।

यौगन्धरायणः देवि! अनजाने देवताओं से भी इसी प्रकार का व्यवहार होता है।

वासवदत्ताः आर्य! मार्ग की क्लांति भी मुझे उतना क्लांत नहीं कर रही है जितना कि यह अपमान मुझे दुःखी कर रहा है।

यौगन्धरायणः देवि! कभी आपमें भी ऐसी ही सामर्थ्य थी जिसे आपने त्याग दिया है। किन्तु आप चिन्तित न हों क्योंकि काल के पहिए की तीलियों की तरह जगत् का भाग्य भी घूमता है। पति के विजित होने पर आप पुनः प्रशंसित होंगी।

दोनों भटः आर्य, मार्ग छोड़ दें! आर्य, हटें!

(कंचुकी का प्रवेश)

कंचुकीः हे भट! आश्रमवासियों को इस प्रकार से न हटाओ। अपने इस कृत्य के लिए राजा पर दोषारोपण न कर देना। तपस्वियों के प्रति कठोरता कदापि उचित नहीं है। नगर के अपमान से बचने के लिए ही ये मनस्वी वनों में निवास कर रहे हैं।

दोनों भटः ऐसा ही होगा आर्य!

(भटों का प्रस्थान)

यौगन्धरायणः अहा! यह तो समझदार प्रतीत होता है। पुत्री! आओ, इसके पास चलें।

वासवदत्ताः आपका कथन उचित है आर्य!

यौगन्धरायण: (पास पहुँचकर कंचुकी से) आश्रमवासियों को मार्ग से हटाया क्यों जा रहा है?

कंचुकीः ओह! तपस्वी?

यौगन्धरायणः (अपने आप से) तपस्वी! स्वयं के लिए यह संबोधन तो उचित प्रतीत होता है! किन्तु अभ्यस्त न होने के कारण मन को रुचता नहीं।

कंचुकीः आर्य! हमारे महाराज की भगिनी पद्मावती आश्रम में पधार रही हैं। हमारे महाराज की माता महादेवी आश्रम में निवास करती हैं और वे उन्हीं के दर्शनों के लिए आई हैं। वे कुछ दिनों के लिए आश्रम में निवास भी करना चाहती हैं।

यौगन्धरायणः (अपने आप से) अहा! मगधराज की कन्या पद्मावती के लिए तो पुष्पभद्र जैसे भविष्यक्ताओं ने घोषणा की है कि ये हमारे स्वामी की रानी होंगी। स्वामी की भावी पत्नी के प्रति मेरे मन में ममता का भाव उदय हो रहा है!

वासवदत्ताः (अपने आप से) राजपुत्री के प्रति मेरे मन में भगिनी सा स्नेह हो रहा है।

(पद्मावती का अपने परिजनों एवं चेटी के साथ प्रवेश)

चेटीः पधारें राजकुमारी! पधारें! आश्रम में प्रवेश करें!

(तपस्विनी का प्रवेश)

तपस्विनीः आश्रम में आपका स्वागत् है राजकुमारी!

वासवदत्ताः (अपने आप से) अहा! यही राजकुमारी हैं! इनका रूप तो इसके अभिजात्य के ही अनुकूल है!

पद्मावती: (तपस्विनी से) आर्ये! प्रणाम!

तपस्विनीः चिरंजीव भव! प्रवेश करो पुत्री! आश्रम को अपना घर ही समझो!

पद्मावतीः धन्यवाद आर्ये! आश्वस्त हुई। आपके आदर से अनुग्रहीत हुई।

वासवदत्ताः (अपने आप से) अहा! जितना सुन्दर इसका रूप है, उतनी ही सुन्दर इसकी वाणी भी है!

चेटीः सौभाग्यशाली हैं हमारी राजकुमारी! इनसे अपने पुत्र के विवाह हेतु संदेश लेकर उज्जयिनी के राजा प्रद्योत ने अपना दूत भेजा है।

वासवदत्ताः (अपने आप से) इससे तो यह मेरी आत्मीय ही हुई।

तपस्विनीः राजकुमारी का रूप ही है आदर के पात्र! जितना महान मगधराज का कुल है उतना ही महान उज्जयिनी के राजा का कुल भी है।

पद्मावतीः आर्य! मैं तपस्वियों को भेंट अर्पण कर अनुग्रहीत हुआ चाहती हूँ। अतः उन्हें सूचित करें कि जिन्हें जिस वस्तु की आवश्यकता हो, भेंटस्वरूप मुझसे स्वीकार करें।

कंचुकीः जैसी आपकी इच्छा। हे आश्रमवासियों, सुनो, सुनो मगधराज की कन्या आप लोगों को धर्मार्थ भेंट देकर अनुग्रहीत होना चाहती हैं। अपनी आवश्यकता बताएँ। किसे कलश की आवश्यकता है? कौन वस्त्रादि की इच्छा रखता है? अध्ययन पूर्ण करने के पश्चात् किसे गुरु-दक्षिणा देने हेतु धन की आवश्यकता है? जो भी आपकी आवश्यकताएँ हैं, बताएँ। राजकुमारी आपकी इच्छा-पूर्ति करके अनुग्रहीत होना चाहती हैं।

यौगन्धरायणः (अपने आप से) कार्यसिद्धि हेतु अच्छा अवसर प्राप्त हुआ। (प्रकट) मुझे कुछ आवश्यकता है।

पद्मावती: (अपने आप से) इस आश्रम के समस्त निवासी सन्तुष्ट हैं। अवश्य ही यह याचक यहाँ का निवासी नहीं है वरन कोई आगन्तुक है।

कंचुकीः आर्य! आपको जो भी चाहिए, कहें।

यौगन्धरायणः मुझे धन, भोग अथवा वस्त्र की आवश्यकता नहीं है। मैंने यह काषाय वस्त्र आजीविका हेतु धारण नहीं किया है। यह मेरी भगिनी है, इसका पति विदेश गया है। मैं चाहता हूँ कि राजकुमारी मेरी भगिनी को कुछ काल तक अपने साथ रखकर इसका परिपालन करें। निश्चय ही धर्मप्रिय राजकन्या मेरी भगिनी के चरित्र की रक्षा करेंगी।

वासवदत्ताः (अपने आप से) आर्य यौगन्धरायण मुझे राजकुमारी के साथ छोड़ने की इच्छा कर रहे हैं। ऐसा ही हो क्योंकि आर्य का कोई भी कार्य निष्प्रयोजन नहीं होता।

कंचुकीः देवि! इनका मनोरथ पूर्ण करना तो अत्यन्त दुष्कर है। भला इसे कैसे स्वीकार किया जा सकता है? क्योंकि धन का दान तो सुगमतापूर्वक किया जा सकता है, प्राण और तप भी सुखपूर्वक दिए जा सकते हैं किन्तु थाती की रक्षा करना अत्यन्त दुष्कर कार्य है।

पद्मावतीः आर्य! इच्छापूर्ति करने की घोषणा करने पश्चात् याचक की इच्छापूर्ति के विषय में सोच-विचार करना निरर्थक है। अतः इनका कार्य सम्पन्न करें।

कंचुकीः देवि! आपके वचन आपके अनुकूल ही हैं।

चेटीः स्वामी कि सत्यवादिनी कन्या चिरंजीवी हों।

तपस्विनीः भद्रे चिरंजीवी हों।

चेटीः देवि! आपके वचन के अनुसार ही कार्य होगा। (यौगन्धरायण के पास जाकर) आर्य! राजकुमारी ने आपकी भगिनी का परिपालन करना स्वीकार कर लिया है।

यौगन्धरायणः मैं देवि का अनुग्रहीत हुआ। (वासवदत्ता को सम्बोधन करके) पुत्री, देवि के समीप जाओ।

वासवदत्ताः (अपने आप से) अब तो कोई उपाय नहीं रह गया। मेरा दुर्भाग्य! जाना ही होगा।

पद्मावतीः आर्य! अब आपकी भगिनी हमारी हुईं।

तपस्विनीः आकृति से तो यह भी राजपुत्री ही जान पड़ती हैं।

चेटीः सत्यवचन! मुझे भी प्रतीत होता है कि इन्होंने सुदिन देखे हैं।

यौगन्धरायणः (स्वगत्) मन्त्रियों के साथ मन्त्रणा करके जो निश्चय किया था वैसा ही हुआ। मेरा आधा भार कम हुआ। जिन ज्योतिषियों ने स्वामी की विपत्ति की घोषणा की थी उन्होंने ही यह भी भविष्यवाणी की है कि मगध की राजकुमारी पद्मावती स्वामी की महिषी होंगी। ऋषियों के वचन मिथ्या नहीं हो सकते। जब स्वामी अपने राज्य को पुनः विजित कर लेंगे तो देवि को मैं उन्हें लौटा दूँगा। मगध की राजपुत्री ही मेरा साक्ष्य होंगी।

(ब्रह्मचारी का प्रवेश)

ब्रह्मचारीः (आकाश की ओर देखकर) द्वितीय प्रहर हो चुका। मैं अत्यन्त क्लांत अनुभव कर रहा हूँ। कहाँ विश्राम करूँ? (तपोवन की ओर देखकर) इस स्थान पर हिरण निर्भीक विचरण कर रहे हैं। फल-फूलों से लदे वृक्ष दृष्टिगोचर हो रहे हैं। गौंएँ भी दिखाई दे रहे हैं और स्थान-स्थान से हवन का धुआँ उठता दिख रहा है। अवश्य ही यह तपोवन है। अस्तु, प्रवेश करके देखूँ (प्रवेश करता है)।

यह मनुष्य तो आश्रमवासी सा प्रतीत नहीं होता, (दूसरी ओर देख कर) किन्तु तपस्वी भी दृष्टिगत हो रहे हैं। इन तपस्वियों के पास जाने में कोई हानि नहीं है, किन्तु यहाँ तो स्त्रियाँ भी हैं।

कंचुकीः निःसंकोच प्रवेश करें। आश्रम तो सभी के लिए है। आतिथ्य स्वीकार करें।

ब्रह्मचारीः (जल पीकर) धन्यवाद! जल पीकर क्लांति से मुक्ति मिली।

यौगन्धरायणः श्रीमान् कहाँ से आ रहे हैं और आपका गन्तव्य कहाँ है? आपका निवासस्थान कौन सा है?

ब्रह्मचारीः श्रीमान्! मैं राजगृह का निवासी हूँ। वर्तमान में मैं वेद के विशेष अध्ययन हेतु वत्स देश के लावाणक नामक गाँव में रहता हूँ।

वासवदत्ताः (स्वगत्) लावाणक नाम सुनकर तो मेरे सन्ताप में वृद्धि होने लग गया।

यौगन्धरायणः तो आपका विद्याध्ययन पूर्ण हो गया?

ब्रह्मचारीः अभी नहीं।

यौगन्धरायणः फिर आपके चले जाने का क्या प्रयोजन है?

ब्रह्मचारीः वहाँ एक अत्यन्त दारुण घटना हो गई।

यौगन्धरायणः कैसी दारुण घटना?

ब्रह्मचारीः वहाँ उदयन नामक राजा रहता था।

यौगन्धरायणः राजा उदयन का नाम तो मैंने भी सुना है। फिर क्या हुआ?

ब्रह्मचारीः उज्जयिनी नरेश की वासवदत्ता नामक कन्या उनकी परमप्रिय पत्नी थीं।

यौगन्धरायणः होंगी। फिर?

ब्रह्मचारीः राजा के शिकार खेलने जाने पर गाँव में आग लग जाने के कारण वे जल गईं।

वासवदत्ताः (स्वगत्) असत्य! मैं अभागिनी तो अब भी जीवित हूँ।

यौगन्धरायणः फिर?

ब्रह्मचारीः उनकी रक्षा के प्रयास में राजा का यौगन्धरायण नामक सचिव भी आग में कूद पड़े।

यौगन्धरायणः अच्छा! उसके बाद।

ब्रह्मचारीः लौटकर उनकी मृत्यु का समाचार पाकर राजा उदयन दुःखी होकर उसी अग्नि में प्राण देने के लिए उद्यत तो गए तब बड़े यत्न के साथ मन्त्रियों ने उन्हें रोका।

वासवदत्ताः (स्वगत्) जानती हूँ! आर्यपुत्र के अपने प्रति प्रेम को समझती हूँ।

यौगन्धरायणः फिर क्या हुआ?

ब्रह्मचारीः तब राजा अपनी पत्नी के जलने से बचे हुए वस्त्रों तथा आभूषणों को हृदय से लगाकर अचेत हो गए।

सब एक साथः हा दुर्दैव!

वासवदत्ताः (स्वगत्) अब आर्य यौगन्धरायण को सन्तोष हुआ!

चेटीः (राजकुमारी पद्मावती से) भद्रदारिके, आर्या रो रही हैं।

पद्मावतीः अत्यन्त कोमल स्वभाव की हैं।

यौगन्धरायणः (राजकुमारी से) आपका कथन सत्य है! मेरी भगिनी अत्यन्त भावुक स्वभाव की है। (ब्रह्मचारी को सम्बोधित करके) फिर क्या हुआ?

ब्रह्मचारीः फिर शनैः शनैः राजा सचेत हुए।

पद्मावतीः प्रसन्नता की बात है कि वे जीवित हैं। उनका मूर्छित होना सुनकर मेरा हृदय शून्य हो गया था।

यौगन्धरायणः उसके बाद?

ब्रह्मचारीः तब भूमि में गिरने के कारण मलिन शरीर एव वस्त्र वाले राजा "हा वासवदत्ता!" "हा वासवदत्ता" "हा शिष्ये!" "हा अवन्तिकुमारी!" कहकर विलाप करने लगे। पत्नी के वियोग में अत्यन्त दुःखी हो गए। धन्य है वासवदत्ता जिन्हें उनके पति प्राणो से अधिक प्रेम करते हैं। पति-स्नेह के कारण वे जल कर भी नहीं जलीं।

यौगन्धरायणः श्रीमान्! क्या उनके किसी मन्त्री ने उन्हें पकृतिस्थ करने का प्रयास नहीं किया?

ब्रह्मचारीः उनके रुम्णवान् नामक सचिव ने उन्हें प्रकृतिस्थ करने का प्राणपण से प्रयास किया। रुम्णवान् ने राजा का अनुसरण करके आहार त्याग दिये। दिन-रात यत्नपूर्व राजा की सेवा करते रहे। यदि राजा के प्राण निकल जाते तो अवश्य ही रुम्णवान् ने भी अपना प्राण त्याग दिया होता।

वासवदत्ताः (स्वगत्) भाग्यवश आर्यपुत्र उचित व्यक्ति की सेवा में हैं।

यौगन्धरायणः (स्वगत्) अहा! रुम्णवान् को भारी भार वहन करना पड़ रहा है। मैं जिस भार को वहन कर रहा हूँ उसमें कुछ आराम तो है किन्तु रुम्णवान् को आराम कहाँ? क्योंकि स्वामी तो पूर्णतः उन्हीं पर निर्भर हैं। (ब्रह्मचारी को सम्बोधन कर के) तो क्या राजा अब पूर्णतः स्वस्थ हैं?

ब्रह्मचारीः इस बात से तो मैं अनभिज्ञ हूँ। जब "यहाँ उसके साथ रहा", "यहाँ उसके साथ बात किया", "यहाँ उसके साथ क्रीड़ा की" कहकर विलाप करते राजा को उनके मन्त्री यत्नपूर्वक गाँव से बाहर ले गए तो वह गाँव चन्द्रमा और तारों से रहित आकाश की तरह अनाकर्षक हो गया और मैं भी गाँव को त्यागकर चला आया।

तपस्विनीः जिस राजा की आगंतुक भी प्रशंसा करते हैं वह राजा अवश्य ही गुणवान होगा!

चेटीः स्वामिकन्ये! क्या वह राजा किसी अन्य स्त्री को स्वीकार कर सकता है?

पद्मावतीः (स्वगत्) मेरे हृदय में भी यही प्रश्न उठ रहा है।

ब्रह्मचारीः आज्ञा दें! मुझे प्रस्थान करना है।

यौगन्धरायणः प्रस्थान करें। आपका मनोरथ सिद्ध हो।

ब्रह्मचारीः तथास्तु!

(ब्रह्मचारी का प्रस्थान)

यौगन्धरायणः देवि की अनुमति पाकर मैं भी प्रस्थान करना चाहता हूँ।

पद्मावतीः आर्य! आपकी अनुपस्थिति में आपकी भगिनी उत्कण्ठित होंगी।

यौगन्धरायणः वे उतकण्ठित नहीं होंगी क्योंकि उन्हें उचित परिपालन मिल गया है। (कंचुकी की ओर देखकर) मैं चला।

कंचुकीः सहर्ष जाएँ! पुनः दर्शन दें।

यौगन्धरायणः तथास्तु।

(यौगन्धरायण का प्रस्थान)

कंचुकीः (राजकुमारी से) अब हमें भी प्रस्थान करना चाहिए।

पद्मावतीः (तपस्विनी से) आर्ये! वन्दे।

तपस्विनीः चिरंजीवी भव पुत्री! तुम्हें अपने सदृश पति प्राप्त हो।

वासवदत्ताः आर्ये! प्रणाम।

तपस्विनीः सौभाग्यवती भव! तुम्हें तुम्हारा पति शीघ्र मिले।

वासवदत्ताः अनुग्रहीत हुई।

कंचुकीः प्रस्थान करें भद्रे! इधर चलें। अहा! भगवान भास्कर अस्ताचल को प्रस्थान कर रहे हैं। पक्षी बसेरा कर रहे हैं। स्थान-स्थान पर हवनाग्नि प्रज्वलित है और सुगंधित धुआँ उठ रहे हैं! मुनिजन तर्पण कर रहे हैं!

(सभी का प्रस्थान)
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