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Tuesday, May 31, 2011

कितने नाम जानते हैं आप विष्णु के?

अमरकोष के अनुसार भगवान विष्णु के निम्न नाम हैं:
  • विष्णु
  • नारायण
  • कृष्ण
  • गोविन्द
  • दामोदर
  • हृषीकेश
  • केशव
  • माधव
  • जनार्दन
  • गरुड़ध्वज
  • पीताम्बर
  • अच्युत
  • उपेन्द्र
  • चक्रपाणि
  • चतुर्भुज
  • पद्मनाभ
  • मधुरिपु
  • वासुदेव
  • त्रिविक्रम
  • देवकीनन्दन
  • श्रीपति
  • पुरुषोत्तम
  • वनमाली
  • विश्वम्भर
  • पुण्डरीकाक्ष
  • वैकुण्ठ (या बैकुण्ठ)
  • दैत्यारि

  • विष्णु के शंख का नाम है - पाञ्जन्य
  • विष्णु के चक्रर का नाम है - सुदर्शन
  • विष्णु के गदा का नाम है - कौमोदकी
  • विष्णु के तलवार का नाम है - नन्दक
  • विष्णु की मणि का नाम है - कौस्तुभ

Monday, May 30, 2011

क्या आप भारत के विषय में इन बातों को जानते हैं?

  • कि भारत कम्प्यूटर सॉफ्टवेयर उत्पादों के विश्व के बड़े निर्यातकों में से एक है तथा भारत  90 से भी अधिक देशों को सॉफ्टवेयर निर्यात करता है।
  • कि भारत में लगभग 300,000 मस्जिदें हैं। मस्जिदों की यह संख्या समस्त मुस्लिम देशों के मस्जिदों की संख्या से भी अधिक है।
  • कि भारत में यहूदी ईसा पूर्व 200 तथा ईसाई ईसा पश्चात् 52 से रहते चले आ रहे हैं।
  • कि योग का जन्म भारत में लगभग 5,000 वर्ष पूर्व हुआ था।
  • की भारत के तिरुपति तीर्थस्थान में प्रतिदिन औसतन 30,000 दर्शनार्थी आत हैं और मन्दिर की दान से प्राप्त आमदनी लगभग 6 मिलियन यू.एस. डालर प्रतिदिन है।
  • अंग्रेजो के सत्ता में आने से पूर्व भारत विश्व का सर्वाधिक धनाड्य देश था।
  • कि भारत के ऋषि बोधायन ने 6 शताब्दी में "पाई" का मान ज्ञात कर लिया था।
  • कि बौद्धक खेल शतरंज का आविष्कार भारत में हुआ था।
  • कि भारत की सभ्यता विश्व की प्राचीनतम सभ्यताओं में से एक है।
  • कि भारत विश्व का सबसे बड़ा गणतन्त्र है।
  • कि विश्व के सबसे बड़े देशों में भारत का स्थान 6वाँ है।
  • कि भारत ने अपने 1,00,000 वर्षों के इतिहास में कभी किसी देश पर आक्रमण नहीं किया।

Sunday, May 29, 2011

हिन्दी कहावतें तथा लोकोक्तियाँ - 29 (Hindi Proverbs)

सिंह के वंश में उपजा स्यार

अर्थः बहादुरों की कायर सन्तान।

सिर फिरना

अर्थः उल्टी-सीधी बातें करना।

सीधे का मुँह कुत्ता चाटे

अर्थः सीधेपन का लोग अनुचित लाभ उठाते हैं।

सुनते-सुनते कान पकना

अर्थः बार-बार सुनकर तंग आ जाना।

सूत न कपास जुलाहे से लठालठी

अर्थः अकारण विवाद।

सूरज धूल डालने से नहीं छिपता

अर्थः गुण नहीं छिपता।

सूरदास की काली कमरी चढ़े न दूजो रंग

अर्थः स्वभाव नहीं बदलता।

सेर को सवा सेर

अर्थः बढ़कर टक्कर देना।

सौ दिन चोर के, एक दिन साह का

अर्थः चोरी एक न एक दिन खुल ही जाती है।

सौ सुनार की एक लोहार की

अर्थः सुनार की हथौड़ी के सौ मार से भी अधिक लुहार के घन का एक मार होता है।

हज्जाम के आगे सबका सिर झुकता है

अर्थः गरज पर सबको झुकना पड़ता है।

हड्डी खाना आसान पर पचाना मुश्किल

अर्थः रिश्वत कभी न कभी पकड़ी ही जाती है।

हर मर्ज की दवा होती है

अर्थः हर बात का उपाय है।

हराम की कमाई हराम में गँवाई

अर्थः बेईमानी का पैसा बुरे कामों में जाता है।

हर्रा लगे न फिटकरी रंग आए चोखा

अर्थः बिना कुछ खर्च किए काम बनाना।

हाथ सुमरनी पेट कतरनी

अर्थः ऊपर से अच्छा भीतर से बुरा।

हाथी के दाँत खाने के और दिखाने के और

अर्थः भीतर और बाहर में अंतर होना।

हाथी निकल गया दुम रह गई

अर्थः थोड़े से के लिए काम अटकना।

हिजड़े के घर बेटा होना

अर्थः असंभव बात।

होनहार बिरवान के होत चीकने पात

अर्थः अच्छे गुण आरम्भ में ही दिखाई देने लगते हैं।

Saturday, May 28, 2011

रोचक छत्तीसगढ़ी हाने अर्थात् छत्तीसगढ़ी लोकोक्तियाँ

जब जीवन का यथार्थ ज्ञान नपे-तुले शब्दों में मुखरित होता है तो वह लोकोक्ति बन जाता है याने कि लोकोक्ति एक प्रकार से "गागर में सागर" होता है। छत्तीसगढ़ी में लोकोक्ति को "हाना" के नाम से जाना जाता है। छत्तीसगढ़ी भाषा में बहुत से सुन्दर हाना हैं जिन्हें उनके हिन्दी अर्थसहित जानकर आपको बहुत आनन्द आयेगा। यहाँ पर हम कुछ ऐसे ही रोचक छत्तीसगढ़ी हाना उनके हिन्दी अर्थ सहित प्रस्तुत कर रहे हैं:
  • "तेली के तेल होथे, त पहाड़ ल नइ पोतें" अर्थात् यदि तेली का तेल मुफ्त में मिल जाए तो पहाड़ को नहीं पोता जाता याने कि दूसरे के धन का गलत इस्तेमाल नहीं करना चाहिए।
  • "पटके म मेछा उखानना" अर्थात् किसी ने किसी को पटक दिया तो किसी दूसरे ने पटकाए हुए आदमी की मूछें उखाड़ ली याने कि दूसरे का कार्य का श्रेय स्वयं ले लेना।
  • "चलनी में दूध दुहय अउ करम ला दोष दै" अर्थात् खुद गलत काम करना और किस्मत को दोषी ठहराना।
  • "अपन मरे बिन सरग नइ दिखय" अर्थात् स्वयं किये बिना कोई कार्य नहीं होता।
  • "कठवा के बइला" अर्थात् मूर्ख होना।
  • "रद्दा में हागै अउ आँखी गुरेड़ै" अर्थात् रास्ते में हगना और मना करने वाले को आँखें दिखाना याने कि "उल्टा चोर कोतवाल को डाँटै"।
  • "घर के जोगी जोगड़ा आन गाँव के सिद्ध" अर्थात् घर के ज्ञानी को नहीं पूछना और दूसरे गाँव के ज्ञानी को सिद्ध बताना याने कि आप कितने ही ज्ञानी क्यों न हों घर में आपको ज्ञानी नहीं माना जाता।
  • "अपन पूछी ला कुकुर सहरावै" अर्थात् अपनी तारीफ स्वयं करना याने कि अपने मुँह मियाँ मिट्ठू बनना।
  • "अड़हा बैद परान घातिया" अर्थात् नीम-हकीम खतरा-ए-जान।
  • "उप्पर में राम-राम तरी में कसाई" अर्थात् मुँह में राम बगल में छुरी।
  • "आज के बासी काल के साग अपन घर में काके लाज!" अर्थात् अपने घर में रूखी-सूखी खाने में काहे की शर्म।
  • "करनी दिखय मरनी के बेर" अर्थात् किये गये अच्छे या बुरे कर्मों की परीक्षा मृत्यु के समय होती है।
  • "खेलाय-कुदाय के नाव नइ गिराय पराय के नाव" अर्थात् भले काम की प्रशंसा न करना और छोटी सी गलती को भी उछाल देना।
  • "कउवा के रटे ले बइला नइ मरय" अर्थात् कौवा के रटने से बैल मर नहीं जाता याने कि किसी के कहने से किसी की मृत्यु नहीं होती।
  • "जादा मीठा में कीरा परथे" अर्थात् बहुत अधिक नजदीकी वैमनस्य का कारण बन जाती है।
  • "देह म नइ ए लत्ता, जाए बर कलकत्ता" अर्थात् डींग हाँकना याने कि "घर में नहीं दाने, बुढ़िया चली भुनाने"।
  • "मूड़ ले बड़े आँखी" अर्थात् मुख्य कार्य से सहायक कार्य का बड़ा हो जाना।
  • "खातू परै त खेती, नइ त नदिया के रेती" अर्थात् खाद न पड़ने पर खेत भी नदी रेत के समान होता है।
  • "खेती अपन सेती" अर्थात् दूसरे के भरोसे खेती नहीं हो सकती।
  • "हुरिया देना" अर्थात् ललकारना।
  • "आगी मूतना" अर्थात् दबंगता या अन्याय करना।
  • "छानी में होरा भूँजना" अर्थात् अत्याचार करना।
  • "एती ओती करना" अर्थात् बगलें झाँकना।
  • "चुचुवा के रहना" अर्थात् निराश होना।
  • "लोटा थारी बेचना" अर्थात् गरीबी में बर्तन-भांडे बिक जाना।
  • "ठेठरी होना" अर्थात् सूखकर काँटा होना।
  • "खटिया म पचना" अर्थात असाध्य रोगी होना।
  • "खटिया उसलना" अर्थात् मृत्यु हो जाना।

Wednesday, May 25, 2011

हिन्दी कहावतें तथा लोकोक्तियाँ - 28 (Hindi Proverbs)

लिखे ईसा पढ़े मूसा

अर्थः अपठनीय लिखावट।

लेना एक न देना दो

अर्थः कुछ मतलब न रखना।

लोहा लोहे को काटता है

अर्थः प्रत्येक वस्तु का सदुपयोग होता है।

वहम की दवा हकीम लुकमान के पास भी नहीं है

अर्थः वहम सबसे बुरा रोग है।

विष को सोने के बरतन में रखने से अमृत नहीं हो जाता

अर्थः किसी चीज़ का प्रभाव बदल नहीं सकता।

शैकीन बुढि़या मलमल का लहँगा

अर्थः अजीब शौक करना।

शक्करखोरे को शक्कर मिल ही जाता है

अर्थः जुगाड़ कर लेना।

सकल तीर्थ कर आई तुमडि़या तौ भी न गयी तिताई

अर्थः स्वाभाव नहीं बदलता।

सख़ी से सूम भला जो तुरन्त दे जवाब

अर्थः लटका कर रखनेवाले से तुरन्त इंकार कर देने वाला अच्छा।

सच्चा जाय रोता आय, झूठा जाय हँसता आय

अर्थः सच्चा दुखी, झूठा सुखी।

सबेरे का भूला सांझ को घर आ जाए तो भूला नहीं कहलाता

अर्थः गलती सुधर जाए तो दोष नहीं कहलाता।

समय पाइ तरूवर फले केतिक सीखे नीर

अर्थः काम अपने समय पर ही होता है।

समरथ को नहिं दोष गोसाई

अर्थः समर्थ आदमी का दोष नहीं देखा जाता।

ससुराल सुख की सार जो रहे दिना दो चार

अर्थः रिश्तेदारी में दो चार दिन ठहरना ही अच्छा होता है।

सहज पके सो मीठा होय

अर्थः धैर्य से किया गया काम सुखकर होता है।

साँच को आँच नहीं

अर्थः सच्चे आदमी को कोई खतरा नहीं होता।

साँप के मुँह में छछूँदर

अर्थः कहावत दुविधा में पड़ना।

साँप निकलने पर लकीर पीटना

अर्थः अवसर बीत जाने पर प्रयास व्यर्थ होता है।

सारी उम्र भाड़ ही झोका

अर्थः कुछ भी न सीख पाना।

सारी देग में एक ही चावल टटोला जाता है

अर्थः जाँच के लिए थोड़ा सा नमूना ले लिया जाता है।

सावन के अंधे को हरा ही हरा सूझता है

अर्थः परिस्थिति को न समझना।

सावन हरे न भादों सूखे

अर्थः सदा एक सी दशा।

Tuesday, May 24, 2011

मदन कामदेव का मन्दिर - असम का खजुराहो


गुवाहाटी से लगभग 40 कि.मी. दूर, राष्ट्रीय राजमार्ग 52 पर, मदन कामदेव का मन्दिर स्थित है जहाँ की आंशिक रूप ध्वस्त हो चुकी मूर्तियाँ कामदेव तथा उनकी पत्नी रति की कथा को आज भी जीवन्त बना रही हैं। असम के खजुराहो के नाम से सम्बोधित किए जाने वाले मदन कामदेव मन्दिर के विषय में कम लोग ही जानते हैं क्योंकि यह मन्दिर सघन वन के भीतर वृक्षों से छुपा हुआ है। यह मन्दिर खजुराहो और कोणार्क के मन्दिरों की शैली में बना हुआ है। असम के पुरातत्व विभाग के अनुसार इस मन्दिर का निर्माण 10वी से 12वीं शताब्दी के मध्य हुआ था।

माना जाता है कि भगवान शंकर के द्वारा तृतीय नेत्र खोलने पर भस्म हो गए कामदेव का इस स्थान पर पुनर्जन्म तथा उनकी पत्नी रति के साथा पुनः मिलन हुआ था।



उल्लेखनीय है कि कामदेव को निम्न नामों से भी जाना जाता हैः
  • मदन
  • मन्मथ
  • प्रद्युम्न
  • कन्दर्प
  • अनंग
  • काम
  • मनसिज (मनोज)
  • रतिपति
  • मकरध्वज
  • विश्वकेतु
  • मीनकेतन
  • दर्पक
  • पञ्चशर
  • स्मर
  • शंबरारि
  • कुसुमेषु
  • अनन्यज
  • पुष्पधन्वा

Sunday, May 22, 2011

तब याद हमें भी कर लेना

आँचल में सजा लेना कलियाँ जुल्फों में सितारे भर लेना
ऐसे ही कभी जब शाम ढले तब याद हमें भी कर लेना

आया था यहाँ बेगाना सा चल दूँगा कहीं दीवाना सा
दीवाने की खातिर तुम कोई इल्जाम न अपने सर लेना

रस्ता जो मिले अन्जान कोई आ जाए अगर तूफान कोई
अपने को अकेला जान के तुम आँखों में न आँसू भर लेना

फिल्म फिर वही दिल लाया हूँ का यह गाना मेरे पसंदीदा गीतों में से है। इसके गीतकार है मज़रूह सुल्तानपुरी और संगीतकार ओ.पी. नैयर!

Saturday, May 21, 2011

मोगरे की महक... खुले आकाश में झिलमिलाते तारे... और आँगन में रात्रि विश्राम...

समय कैसे बीत जाता है, पता ही नहीं चल पाता। चालीस-पैंतालीस साल का लम्बा अरसा गुजर गया पर लगता है कि अभी कल ही की तो बात है जबकि इन्हीं गर्मी के दिनों में मैं शाम का धुंधलका होते ही भगवान भास्कर के प्रखर ताप से तप्त घर के आँगन को ठण्डा करने के लिए उसमें बाल्टी-बाल्टी पानी डाला करता था। पानी के आँगन की भूमि के स्पर्श करते ही भाप का भभूका-सा उठने लगता था। ज्यों-ज्यों पानी अधिक पड़ते जाता था, भाप निकलना कम होते जाता था और दस-बारह बाल्टी पानी डाल लेने पर भाप निकलना बिल्कुल बंद हो जाता था। घण्टे-डेढ़ घण्टे के भीतर ही आँगन इतना ठण्डा हो जाता था कि उसकी शीतलता में उस भीषण गर्मी की रात में आराम से सोया जा सकता था। आँगन में खाटें बिछा दी जाती थीं और रात्रि भोजन के पश्चात् कुछ घूमने-घामने के बाद घर के सभी सदस्य अपनी-अपनी खटिया पर पड़ जाया करते थे। उन दिनों रायपुर सीमेंट-कंक्रीट का जंगल नहीं बना था, कम से कम हमारी पुरानी बस्ती क्षेत्र में तो प्रायः खपरैल वाले मकान ही थे इसलिए रात्रि के बढ़ने की गति के साथ हवा में ठण्डक भी बढ़ती जाती थी। हाँ नवतपा के दिनों में जब ग्रीष्म अपने चरम पर पहुँचने लगता था तो रात्रि में वायु का प्रवाह एकदम से थम जाया करता था और तब खटिया में पड़े-पड़े हाथ पंखा लेकर डुलाना मजबूरी बन जाया करती थी क्योंकि मेरे घर में उन दिनों बिजली का केवल एक ही टेबल-फैन हुआ करता था जो कि घर्र-घर्र करके घूमने के बावजूद भी घर के सभी सदस्यों को को हवा देने के लिए बिल्कुल ही अपर्याप्त था।

आँगन के एक कोने में एक छोटी सी फुलवारी थी जिसमें हमारे बाबूजी गुलाब और मोगरे लगाया करते थे। मैं उस फुलवारी के पास ही स्टूल रखकर उस पर टेबल-फैन रखकर चला दिया करता था। टेबल-फैन की हवा यद्यपि गर्मी को शान्त करने के लिए अपर्याप्त होती थी किन्तु मोगरे के फूलों की महक को हम तक पहुँचाने में अवश्य ही कारगर होती थी। मोगरे की उस भीनी-भीनी महक से अभिभूत मैं घण्टों आँगन के ऊपर खुले आकाश में झिलमिलाते तारों को देखा करता था। ध्रुव तारा तो खैर दिखाई न दे पाता था किन्तु अन्य तारों के सहित सप्तर्षि तारों को देखना मुझे बहुत ही भला लगता था। रात में जब कभी भी नींद खुलती थी, सप्तर्षियों को देखना मैं नहीं भूला करता था क्योंकि उनकी परिवर्तित स्थिति से मैं अनुमान लगा लिया करता था कि रात्रि कितनी बीत चुकी है। ब्राह्म मुहूर्त आने तक सप्तर्षियों की स्थिति रात्रि के आरम्भ की स्थिति के बिल्कुल विपरीत हो जाया करती थी।

और आज वही ग्रीष्म ऋतु है कि मैं अपने कमरे में कूलर की हवा में सोता हूँ जहाँ न तो मोगरे की महक है, न खुला आकाश और न वो झिलमिलाते तारे, हाँ उन दिनों की यादें अवश्य हैं।

Friday, May 20, 2011

भारत की सुन्दरतम सड़कें

कार्बेर्ट पार्क पाथवे
नुमालीगढ़, आसाम
डलहौजी
नैनीताल, उत्तरांचल
अल्मोड़ा, उत्तरांचल
ऊटी
गुलमर्ग

मनाली दर्रा

Thursday, May 19, 2011

ऐसे भी होती है कमाई

बात फरवरी 2009  की है, मैंने क्लिकबैंक.कॉम में एक उत्पाद देखा जो कि फेमिनाइजेशन हिप्नोसिस से सम्बन्धित था। मुझे लगा कि विषय लोगों को रुचने वाला है इसलिए इस उत्पाद का एफिलिएट बनकर तथा उसे बेचकर कमाई की जा सकती है।  यहाँ पर मैं यह बता दूँ कि क्लिकबैंक.कॉम इन्टरनेट में एक ऐसी साइट है जहाँ पर केवल डिजिटल उत्पाद बेचे जाते हैं, आप किसी भी उत्पाद को प्रमोट करने के लिए उसका एफिलिएट बन सकते हैं और उसे बेच कर पैसे कमा सकते हैं।

हाँ तो मैं फेमिनाइजेशन हिप्नोसिस का एफिलिएट बन गया। अब मैं सोचने लगा कि इसे प्रमोट कैसे किया जाए। आजकल व्हीडियो मार्केटिंग का बहुत अधिक चलन है इसलिए मैंने भी व्हीडियो मार्केटिंग करने की योजना बनाई। किन्तु मेरे सामने दिक्कत यह थी मुझे व्हीडियो बनाने के विषय में कुछ भी पता नहीं था। मैंने व्हीडियो बनाने के विषय में नेट में कुछ खोजबीन की तथा विन्डोज मूव्ही मेकर्स से व्हीडियो बनाने के विषय में कुछ पोस्ट पढ़े। उसके बाद मैंने एक छोटा सा व्हीडियो बनाया जो कि मात्र 56 सेकंड का था। मैंने यूट्यूब में जाकर उस व्हीडियो को प्रकाशित कर दिया तथा विवरण में अपना एफिलिएट लिंक डाल दिया।

मुझे उम्मीद नहीं थी कि उस व्हीडियो के तरफ किसी का ध्यान जाएगा किन्तु आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि आज तक मेरे उस व्हीडियो को 17000 से भी अधिक लोगों ने देखा है। विश्वास न हो रहा हो तो आप स्वयं यूट्यूब में जाकर मेरे उस व्हीडियो को देख ले, लिंक है - http://www.youtube.com/watch?v=EzF5TRiFWps

व्हीडियो के विवरण में मेरा एफिलिएट लिंक है http://tinyurl.com/akuy2l और इस लिंक से मुझे सन् 2009, 2010 तथा 2011 में क्रमशः $450, $150 और $27 की कमाई हुई। उत्पाद ज्यों-ज्यों पुराना होते जाता है, कमाई भी कम होने लगती है। अब आज मैंने क्लिकबैंक के एक नये उत्पाद के लिए फिर एक व्हीडियो बनाकर यूट्यूब में डाला है जिसका लिंक है - http://www.youtube.com/watch?v=SwmMbX4vLjc देखें अब इस व्हीडियो से कितनी सफलता मिलती है।

आप भी इस तरीके को आजमा सकते हैं, हो सकता है किस्मत साथ दे और आपकी कमाई शुरू हो जाए। मेरी शुभकामनाएँ आपके साथ है।

Wednesday, May 18, 2011

अपने शरीर के विषय में आप कितना जानते हैं?

  • आपका शरीर 24 घण्टे में 23040 बार श्वास-प्रश्वास क्रिया करता है और 438 घनफुट हवा श्वास में लेता है।
  • आपका शरीर 24 घण्टे में 750 मांस पेशियों को उपयोग में लाता है।
  • आपका शरीर 24 घण्टे में 70 लाख मस्तिष्क कोशिकाओं को व्यायाम देता है।
  • आपका शरीर 24 घण्टे में 85.6 केलोरी ताप छोड़ता है।
  • आपका शरीर 24 घण्टे में 450 घनफुट/टन शक्ति तैयार करता है।
  • आप 24 घण्टे में लगभग 4800 शब्द बोलते हैं।
  • आप 24 घण्टे में लगभग 1.5 से 2 लिटर पानी पीते हैं।
  • आपका शरीर 24 घण्टे में लगभग 1.43 पॉइन्ट पसीना निकालता है।
  • आपके शरीर के भीतर आपका खून 24 घण्टे में 16.80 करोड़ मील यात्रा करता है।
  • आपका हृदय 24 घण्टे में 1,03,689 बार धड़कता है।
  • एक सामान्य व्यक्ति के शरीर में औसतन 5-6 लिटर खून होता है।
  • खून की गति 65 कि.मी. प्रति घण्टा होती है।
  • मुख से मलद्वार तक पाचन संस्थान की नली की लम्बाई 32 फुट होती है; छोटी आँत 22 फुट और बड़ी आँत 8 फुट होती है।

Tuesday, May 17, 2011

तेरी रातों के लिए दिल को जलाया हमने

हुस्न और इश्क में संसार का शाश्वत सत्य है। ये दोनों अर्थात् हुस्न और इश्क एक दूसरे के बिना अधूरे हैं फिर भी इन दोनों में कभी टकराव होता है, कभी अनबन होती है, कभी चुहलबाजी होती है और अन्ततः दोनों सदा के लिए एक दूसरे के होकर रह जाते हैं।

हुस्न और इश्क के अहं के टकराव को बहुत ही सुन्दर और सटीक लफ्ज़ दिए हैं महान शायर मज़रूह सुल्तानपुरी ने!

(हुस्न)

ज़ुल्फ की छाँव में चेहरे का उजाला लेकर
तेरी वीरान-सी रातों को सजाया हमने

(इश्क)

मेरी रातों में जलाये तेरे जल्वों ने चराग
तेरी रातों के लिए दिल को जलाया हमने

ये तेरे गर्म से लब, ये तेरे जलते रुख़सार
देख हमको के बनाया है इन्हें दिल का क़रार
कैसे अंगारों को सीने से लगाया हमने
तेरी रातों के लिए दिल को जलाया हमने

(हुस्न)

हम ने हर दिल को सिखाया है धड़कने का चलन
देके उल्फत की तड़प, देके मोहब्बत की जलन
तुझसे दीवाने को इन्सान बनाया हमने
तेरी वीरान-सी रातों को सजाया हमने

(इश्क)

सीख ले रस्म-ए-वफ़ा हुस्न भी दीवानों से
दास्तां अपनी भरी है इन्हीं अफ़सानों से
रख दिया सर को जहाँ फिर न उठाया हमने
तेरी रातों के लिए दिल को जलाया हमने

और मज़रूह साहब के इन शानदार लफ्ज़ों को मधुर धुन में ढाल कर अमर कर दिया प्रसिद्ध संगीतकार ओ.पी. नैयर जी ने!

फिल्म फिर वही दिल लाया हूँ के इस गाने को यदि आप डाउनलोड करना चाहें तो लिंक है

ज़ुल्फ की छाँव में…..

Monday, May 16, 2011

भूली-बिसरी यादें

कालचक्र घूमने के साथ ही साथ किसी बात की स्मृति भी धूमिल पड़ते जाती है। जीवन की महत्वपूर्ण घटनाएँ भी समय बीतने के साथ मस्तिष्क के गहरे गर्त में समा जाती है और हम उन्हें भूल जाया करते हैं। किन्तु कभी-कभी ऐसा भी होता है कि बरसों से भूली हुई कोई बात अचानक अवचेतन मस्तिष्क के गर्त से उभरकर चेतन में वापस आ जाती है।

ईश्वर ने मनुष्य के मनुष्य के मस्तिष्क को विचित्र रूप से रचा है। हर पल, हर क्षण मस्तिष्क के भीतर विचार बुलबुले की भाँति उठते रहते हैं, ऐसा एक भी क्षण नहीं होता जबकि मस्तिष्क विचारशून्य हो। प्रायः चेतन और अचेतन मस्तिष्क से ही उठने वाले विचारों के ये बुलबुले हमारे भीतर कौंधते रहते है, विचारों के बुलबुले तो अवचेतन मस्तिष्क से भी उठते रहते हैं किन्तु अत्यन्त गहराई में होने के कारण वे ऊपर तक नहीं आ पाते। हाँ कभी कोई बुलबुला सतह तक आ जाए तो वही हमारी भूली-बिसरी याद बन कर रह जाता है।

इस पोस्ट के उपरोक्त पंक्तियों को लिखने के लिए इसलिए सूझा क्योंकि आज एक पुराना फिल्मी गीत, जिसे कभी मैं बहुत पसन्द करता था पर बाद में बिल्कुल ही भूल गया था, अचानक याद आ गया - वो गीत है फिल्म भूत बंगला का "ओ मेरे प्यार आजा..."। राहुल देव बर्मन की बनाई यह धुन मुझे बहुत ही पसन्द है, लीजिए आप भी सुनिए, उम्मीद है कि आपको भी पसन्द आएगा।

Sunday, May 15, 2011

हिन्दी कहावतें तथा लोकोक्तियाँ - 27 (Hindi Proverbs)


मुँह में राम बगल में छुरी

अर्थः ऊपर से मित्र भीतर से शत्रु।

मुँह माँगी मौत नहीं मिलती

अर्थः अपनी इच्छा से कुछ नहीं होता।

मुफ्त की शराब काज़ी को भी हलाल

अर्थः मुफ्त का माल सभी ले लेते हैं।

मुल्ला की दौड़ मस्जिद तक

अर्थः सीमित दायरा।

मोरी की ईंट चौबारे पर

अर्थः छोटी चीज का बड़े काम में लाना।

म्याऊँ के ठोर को कौन पकड़े

अर्थः कठिन काम कोई नहीं करना चाहता।

यह मुँह और मसूर की दाल

अर्थः औकात का न होना।

रंग लाती है हिना पत्थर पे घिसने के बाद

अर्थः दु:ख झेलकर ही आदमी का अनुभव और सम्मान बढ़ता है।

रस्सी जल गई पर ऐंठ न गई

अर्थः घमण्ड का खत्म न होना।

राजा के घर मोतियों का अकाल?

अर्थः समर्थ को अभाव नहीं होता।

रानी रूठेगी तो अपना सुहाग लेगी

अर्थः रूठने से अपना ही नुकसान होता है।

राम की माया कहीं धूप कहीं छाया

अर्थः कहीं सुख है तो कहीं दुःख है।

राम मिलाई जोड़ी, एक अंधा एक कोढ़ी

अर्थः बराबर का मेल हो जाना।

राम राम जपना पराया माल अपना

अर्थः ऊपर से भक्त, असल में ठग।

रोज कुआँ खोदना, रोज पानी पीना

अर्थः रोज कमाना रोज खाना।

रोगी से बैद

अर्थः भुक्तभोगी अनुभवी हो जाता है।

लड़े सिपाही नाम सरदार का

अर्थः काम का श्रेय अगुवा को ही मिलता है।

लड्डू कहे मुँह मीठा नहीं होता

अर्थः केवल कहने से काम नहीं बन जाता।

लातों के भूत बातों से नहीं मानते

अर्थः मार खाकर ही काम करने वाला।

लाल गुदड़ी में नहीं छिपते

अर्थः गुण नहीं छिपते।

Saturday, May 14, 2011

कुछ रोचक वैज्ञानिक तथ्य

  • प्रकाश की गति 186,000 मील प्रति सेकंड है।
  • सूर्य से पृथ्वी तक आने में प्रकाश को 8 मिनट 17 सेकंड लगते हैं।
  • पृथ्वी अपनी धुरी पर 1000 मील प्रति घण्टे की गति से घूमती है और अन्तरिक्ष में 67,000 मील प्रति घण्टे की गति से चक्कर लगाती है।
  • प्रतिवर्ष दस लाख भूकंप पृथ्वी को कँपाते हैं।
  • अब तक गिरे ओलों में सबसे बड़े ओले, जो कि बांग्लादेश में सन् 1986 में गिरा था, का वजन 1 किलो था।
  • गाज गिरने के कारण प्रतिवर्ष लगभग 1000 लोग मरते हैं।
  • वैज्ञानिक जानारी के अनुसार पृथ्वी का जन्म 4.56 अरब वर्ष पहले हुआ था।
  • DNA की खोज Swiss Friedrich Mieschler ने सन् 1869 में की थी।
  • वाट्सन (Watson) और क्रिक (Crick) ने सन् 1953 में DNA की आण्विक संरचना सुनिश्चित की थी।
  • थर्मामीटर की खोज सन् 1607 में गैलेलियो (Galileo) ने की थी।
  • आवर्धक लैंस (magnifying glass) की खोज इंग्लिशमैन रोगर बैकन  (Englishman Roger Bacon) ने सन् 1250 में की थी।
  • बारूद (dynamite) का आविष्कार अल्फ्रेड नोबल (Alfred Nobel) ने सन्  1866 में किया था।
  • भौतिक शास्त्र के लिए नोबल पुरस्कार प्रथम बार सन् 1895 में विल्थेलम रोन्टगन (Wilhelm Rontgen) को एक्स-रे की खोज के लिए मिला था।
  • क्रिश्चन बर्नाड (Christian Barnard) ने सन् 1967 में पहली बार हृदय प्रतिरोपण (heart transplant) किया था।
  • एक विद्युत पैदा करने वाली मछली  650 वोल्ट तक बिजली पैदा कर सकती है।
  • मनुष्य के पेट में पाया जाने वाला टेपवर्म (tapeworm) नामक कृमि  22.9 मीटर तक लंबा हो सकता है।
  • चिंपांजी  300 अलग अलग संकेतों को समझने की बुद्धि रखते हैं।
  • एबोला वायरस (Ebola virus) से इन्फेक्टेड प्रति 5 व्यक्तियों में स 4 की मृत्यु हो जाती है।
  • मनुष्य के शरीर में 60,000 मील लम्बी रक्त नलिकाएँ होती हैं।
  • एक रक्त कोशिका को सम्पूर्ण शरीर का एक चक्कर लगाने के लिए लगभग 60 सेकंड का समय लगता है।
  • टेलीफोन के आविष्कारक अलेक्जेंडर ग्राहम बेल (Alexander Graham Bell) की मृत्यु के पश्चात उनके पार्थिव शरीर को दफनाते समय उन्हे श्रद्धांजलि देने के उद्देश्य से सम्पूर्ण  US में  1 मिनट के लिए टेलीफोन सिस्टम को बंद रखा गया था।
  • ब्रह्माण्ड में 100 अरब आकाश गंगाएँ हैं।
  • चुम्बन लेने की अपेक्षा हाथ मिलाने में अधिक जर्म्स स्थानान्तरित होते हैं।
  • आकाश से गिरने वाली वर्षा की बूंदों की गति 18 मील प्रति घण्टे तक होती है।

Thursday, May 12, 2011

आम के आम गुठलियों के दाम

आम... अंबिया... कैरी....

एक समय था कि मेरे घर में कच्चे आमों के ढेर लगे रहते थे इन दिनों में और मेरी माँ तथा दादी उनका अचार बनाने की प्रक्रिया में व्यस्त रहती थीं। स्वयं के अठारह पेड़ों से तोड़ कर लाए जाते थे ये आम। चकरी (पत्थर की छोटी चक्की) में माँ सरसों दलती थीं और दादी दले हुए सरसों को सूप में डालकर उनका छिलटा अलग करती रहती थीं। फिर लाल मिर्च, नमक, करायत आदि मसाले कूटे जाते थे तथा तराजू में मसालों को निश्चित अनुपात में तौल कर मिलाया जाता था। सरौते के द्वारा कुछ कैरियों के टुकड़े कर दिए जाते थे पर अधिकतर आमों का भरवाँ अचार बनाने के लिए सिर्फ दो फाँकों मे ही विभक्त किया जाता था जो कि नीचे से जुड़े होते थे। सूजे के द्वारा भीतर की गुठली निकाल कर ठूँस-ठूँस कर अचार का मसाला भरा जाता था उनके भीतर। आज न माँ हैं, न दादी, न हमारे वो आम के पेड़ और न उस प्रकार से घर में अचार बनाने की प्रक्रिया। बहुएँ अब भरवाँ अचार बनाती ही नहीं।

अचार बनाने का कार्य तो मई जून में होता था किन्तु अप्रैल माह में रामनवमी के दिन आम के अपरिपक्व फलों का "गुराम" अवश्य ही बनाया जाता था, चाशनी में डुबोकर पकाए गए गुराम के बिना भगवान राम के जन्मोत्सव की खुशी अधूरी मानी जाती थी।

अप्रैल माह में गर्मी की शुरवात होते ही आम फलों का आवक शुरू हो जाता है,  बाजार में जहाँ देखो आम ही आम नजर आने लगते हैं, कच्चे और पक्के दोनों ही प्रकार के। अब भला किसका जी न ललचा जाएगा आमों को देखकर! शायद हर किसी के जी को ललचा देने के इस गुण के कारण ही आम को फलों का राजा माना गया है। जहाँ कच्चे आमों को देख कर मुँह में पानी भरने लगता है वहीं पक्के आमों को देखकर उनके लाजवाब और बेमिसाल स्वाद की कल्पना अनायास मन में घर करने लगती है।

भारत में आम कितने प्राचीन काल से लोकप्रिय है इसका अन्दाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वेदों में आम को विलास का प्रतीक बताया गया है, शतपथ ब्राह्मण में इस फल का उल्लेख मिलता है, आदिकाल से हवन में होम करने के लिए आम्रवृक्ष की लकड़ियों का ही प्रयोग किया जाता है, कालिदास ने अपने नाटकों में इसका गुण गाया है, सिकन्दर ने इसकी सराहना की है और मुगल बादशाह अकबर को तो आम इतने पसन्द थे कि उन्होंने दरभंगा में आम के एक लाख वृक्षारोपण किया था। आज भी अकबर का वह आम का बगीचा लाखी बाग के नाम से जाना जाता है।

आज भी भारत में मांगलिक कार्यों के लिए आम की लकड़ी, पत्ते और फलों को शुभ माना जाता है।

जहाँ कच्चे आम का अचार, मुरब्बा, चटनी आदि बना कर उसे लम्बे अरसे के लिए सुरक्षित किया जाता है वहीं पके आमों का अमरस या अमावट बनाकर।

आम की प्रजातियाँ भी अनेक प्रकार की होती हैं जिनमें से प्रमुख हैं - हापुस या अलफांजो, नीलम, सुन्दरी, तोतापरी, लंगड़ा, दसहरी, चौसा आदि। अलग-अलग प्रजातियों के आम की मँहक और स्वाद भी अलग-अलग होते हैं। प्रमुख प्रजातियों के अलावा देश के हरेक हिस्से में आम की अलग-अलग स्थानीय प्रजातियाँ भी पाई जाती हैं।

आम न केवल भारत का राष्ट्रीय फल है और भारत में प्रतिवर्ष एक करोड़ टन से भी अधिक आम, जो कि संसार के कुल आम उत्पादन का लगभग 52% है, पैदा होता है बल्कि समस्त उष्ण कटिबंध के फलों में सर्वाधिक लोकप्रिय फल है। उल्लेखनीय है कि यदि आम के पेड़ को अनुकूल जलवायु मिले तो आम का वृक्ष पचास-साठ फुट तक ऊँचा हो जाता है।

बाजार में आम देखकर उसके विषय में कुछ अधिक जानकारी प्राप्त करने की इच्छा हुई तो थोड़ा गूगलिंग कर लिया जिससे जानकारी तो मिली ही और यह पोस्ट भी बन गई, तो इसे ही कहते हैं "आम के आम और गुठलियों के दाम"।

Wednesday, May 11, 2011

लोभिया ला लबरा ठगे

"लोभिया ला लबरा ठगे" छत्तीसगढ़ी का एक "हाना" अर्थात् लोकोक्ति है जिसका अर्थ है "लोभी व्यक्ति को झूठा आदमी ठग लेता है"।

देखा जाए तो यह लोभ या लालच संसार की सबसे बुरी बला है। चारे की लालच में मछली बंशी में फँस कर जान गवाँ देती है, दाने की लालच में पक्षी जाल में फँस जाते हैं, सहज में भोजन पाने के लालच में वन्य पशु भी मनुष्य की गिरफ्त में आ जाते हैं।

किन्तु यह भी ध्रुव सत्य है कि संसार का प्रत्येक व्यक्ति लोभी या लालची होता है, लालच या लोभ प्राणीमात्र की स्वाभाविक मानसिकता है। और प्राणीमात्र की इस कमजोरी का ही फायदा उठा कर मनुष्य मछली, पक्षी, वन्य पशुओं आदि को फाँस लेता है।

मनुष्य न केवल अन्य प्राणियों के बल्कि मनुष्यों के भी लालच की मानसिकता का फायदा उठाता है चारे के रूप में "फोकट" या "मुफ्त" शब्द का इस्तेमाल करके। वास्तव में "फ्री", "मुफ्त", "फोकट" जैसे शब्द अचूक हथियार हैं लोगों के भीतर की लालच को उभारने के लिए। ये शब्द लोगों को बरबस ही आकर्षित कर लेते हैं। मुफ्त में मिलने वाली चीज को छोड़ देना कोई भी पसंद नहीं करता। वो कहते हैं ना “माले मुफ्त दिले बेरहम”। किन्तु इस मुफ्त पाने के चक्कर में हम लोगों को कितना लूटा जाता है यह बहुत कम लोगों को ही पता होगा।

बाजार में आप "दो साबुन खरीदने पर एक साबुन बिल्कुल मुफ्त!" जैसी स्कीम रोज ही देखते होंगे। और इस स्कीम को जान कर हम खुश हो जाते हैं यह सोचकर कि एक साबुन हमें मुफ्त मिल रहा है, परिणामस्वरूप हम एक के बजाय तीन साबुन खरीद लेते हैं। तीन साबुन की फिलहाल हमें कतइ जरूरत नहीं है फिर भी हम तीन साबुन खरीद लेते हैं। क्यों? सिर्फ लालच में आकर। किन्तु हमें यह पता होना चाहिए कि जिसने हमें दो साबुन की कीमत में तीन साबुन दिए हैं उसने घाटा खाने के लिए दुकान नहीं खोला है, उसने हमसे कुछ न कुछ कमाया ही है। उसने अपनी कमाई के लिए हमारी लालच की मानसिकता का लाभ उठाते हुए हमें बेवकूफ बनाया है।

कैसे बेवकूफ बनाया है उसने?

मान लीजिये एक साबुन की कीमत पन्द्रह रुपये हैं तो दो साबुन के दाम अर्थात् तीस रुपये में आपको तीन साबुन मिलते हैं। जरा सोचिये, साबुन बनाने वाली कम्पनी बेवकूफ तो है नहीं जो कि बिना किसी लाभ के साबुन बेचेगी। तीस रुपये में तीन साबुन बेचने पर भी उसे लाभ ही हो रहा है। इसका स्पष्ट अर्थ यह है कि एक साबुन का मूल्य मात्र दस रुपये हैं। तो इस हिसाब से कम्पनी को साबुन का दाम पन्द्रह रुपये से कम करके दस रुपये कर देना चाहिये। पर कम्पनी दाम कम न कर के आपको एक मुफ्त साबुन का लालच देती है और आप लालच में आकर एक साबुन के बदले तीन साबुन खरीद लेते हैं जबकि दो अतिरिक्त खरीदे गये साबुनों की आपको फिलहाल बिल्कुल आवश्यकता नहीं है। यदि कम्पनी ने दाम कम कर दिया होता तो आप दस रुपये में एक ही साबुन खरीदते और बाकी बीस रुपये का कहीं और सदुपयोग करते। इस तरह से दाम न घटाने का कम्पनी को एक और फायदा होता है वह यह कि यदि आप केवल एक साबुन खरीदेंगे तो आपको पन्द्रह रुपये देने पड़ेंगे। इस प्रकार से सिर्फ एक साबुन खरीदने पर मुनाफाखोर कम्पनी आपके पाँच रुपये जबरन लूट लेगी। बताइये यह व्यापार है या लूट?

भाई मेरे, यदि साबुन बिल्कुल मुफ्त है तो मुफ्त में दो ना, चाहे कोई दो साबुन खरीदे या ना खरीदे। ये दो साबुन खरीदने की शर्त क्यों रखते हो?

विडम्बना तो यह है कि अपनी गाढ़ी कमाई की रकम को लुटाने के लिये हम सभी मजबूर हैं क्योंकि सरकार ऐसे मामलों अनदेखा करती रहती है। इन कम्पनियों से सभी राजनीतिक दलों को मोटी रकम जो मिलती है चन्दे के रूप में।

सच बात तो यह है कि फ्री या मुफ्त में कोई किसी को कुछ भी नहीं देता। किसी जमाने में पानी मुफ्त मिला करता था पर आज तो उसके भी दाम देने पड़ते हैं।

यदि कोई कुछ भी चीज मुफ्त में देता है तो अवश्य ही उसका स्वार्थ रहता है उसमें।

Tuesday, May 10, 2011

आवारा..... लोफर.....

आवारा..... लोफर.....  कहाँ गे रेहे अतेक घाम में? (कहाँ गए थे इतनी धूप में?)

ये शब्द होते थे मेरी दादी माँ के। बचपन के दिनों में स्कूल में गर्मी की छुट्टियों के दौरान दोपहर में जब मैं घर से चुपचाप दादी की आँख बचाकर निकल जाया करता था तो वापस घर आने पर दादी की ये डाँट मुझे सुननी पड़ती थी। आज न दादी है और न वो बचपन किन्तु दो शब्द अब भी हैं - आवारा..... लोफर.....

"आवारा" शब्द का अर्थ है बिना किसी उद्देश्य के इधर-उधर भटकना। आवारा का अर्थ प्रायः बदमाश के रूप में भी लिया जाता है। आवारा के लिए अंग्रेजी में लोफर (loafer) शब्द है जिसे हिन्दी भाषा में भी अपना लिया गया है।

आवारा शब्द की लोकप्रियता का अन्दाज इसी से लगाया जा सकता है कि विष्णु प्रभाकर जी ने "आवारा मसीहा" उपन्यास लिख दिया, राज कपूर ने "आवारा" फिल्म बना दी, हमारे ब्लोगर बंधु संजीत त्रिपाठी जी ने "आवारा बंजारा" ब्लोग ही बना दिया।

फिल्मी गीतकारों ने भी आवारा शब्द का खूब इस्तेमाल किया है, यथा -

आवारा हूँ... या गर्दिश में हूँ आसमान का तारा हूँ....
है अपना दिल तो आवारा....
इतना न मुझसे तू प्यार बढ़ा के मैं इक बादल आवारा...

आवारा से आवारगी शब्द बना है, लीजिए सुनिए "आवारगी" उनमान का गज़ल "आवारगी में हद से गुजर जाना चाहिये..."

Monday, May 9, 2011

हम भारतवासी इतने भी कृतघ्न नहीं हैं कि.....

अब साल में कम से कम एक दिन तो ऐसा आता है जिस दिन 'मदर' भी खुश रहती है और 'सन्स' एण्ड 'डाटर्स' भी। नहीं तो साल भर तो 'ममी' के खटर-पटर लगा ही रहता है। 'मदर' तो गिफ्ट मिलने से जितना खुश होती है उससे भी अधिक यह सोच कर खुश होती है कि चलो कम से कम एक दिन के लिए मुझे याद किया या याद करने का दिखावा तो किया जाता है।

पहले जब 'माताएँ' हुआ करती थीं तो मातृ ऋण भी हुआ करता था।  "मनुस्मृति" में तो कहा गया है "उपाध्याओं से दस गुना श्रेष्ठ आचार्य, आचार्य से सौ गुना श्रेष्ठ पिता और पिता से सहस्त्र गुना श्रेष्ठ माता का गौरव होता है। माता की कृतज्ञता से संतान सौ वर्षो में भी मुक्त नहीं हो सकती"। मातृ ऋण से उबरना किसी भी प्रकार से नहीं हो सकता था। 'मदर' या 'ममी' का किसी प्रकार का उधार हम पर नहीं होता फिर भी हम मदर्स डे के दिन उन्हें गिफ्ट देकर खुश कर लेते हैं। कितने खराब थे पुराने संस्कार जिसमें हम माता, पिता, गुरु आदि के ऋणी हुआ करते थे और कितने अच्छे हैं आधुनिक संस्कार जिनमें हम उनके ऋणी होने के बजाय गिफ्ट आदि देकर उन्हें ही अपना ऋणी बना लेते हैं। इसी कारण से तो आज पुराने संस्कार खत्म होते जा रहे हैं और नये संस्कार हमारे भीतर घर करते जा रहे हैं।

वैसे भी हम भारतवासी वात्सल्य, स्नेह, प्रेम की अमृत धाराएँ प्रदान करने वाली माता के मातृ-ऋण को भले ही भूल जायें, पर हम इतने कृतघ्न भी नहीं है कि साल में एक दिन मदर्स डे मनाकर अपनी माँ को खुश भी ना कर सकें।

Sunday, May 8, 2011

पतित को पशु कहना कहाँ तक उचित?

पतित शब्द का मूल है "पतन" और इसका अर्थ है गिरा हुआ। एक भ्रष्ट व्यक्ति, चाहे वह नेता हो या अफसर, नैतिक रूप से गिरा हुआ ही होता है याने कि पतित होता है। प्रायः लोग इनकी तुलना कुत्ते से करते हैं। किन्तु यह तुलना क्या उचित है? क्या कुत्ते का आचरण भ्रष्ट व्यक्ति के आचरण जैसा होता है? वास्तव में देखा जाए तो भ्रष्ट व्यक्ति की तुलना कुत्ते से करना कुत्ते का अपमान है। क्या विचार है आपका? पतित को पशु कहना कहाँ तक उचित है?

मैथिलीशरण गुप्त जी के शब्दों में -

करते हैं हम पतित जनों में, बहुधा पशुता का आरोप;
करता है पशु वर्ग किन्तु क्या, निज निसर्ग नियमों का लोप?
मैं मनुष्यता को सुरत्व की, जननी भी कह सकता हूँ,
किन्तु पतित को पशु कहना भी, कभी नहीं सह सकता हूँ॥

(पंचवटी खण्डकाव्य से)

Saturday, May 7, 2011

यह पोस्ट मैं लिख रहा हूँ मन के अधीन होकर किन्तु मन पर नियन्त्रण रखने के लिए

अजित गुप्ता जी के पोस्ट मन से पंगा कैसे लूँ, यह अपनी ही चलाता है पढ़कर इच्छा हुई कि इस विषय पर मैं भी एक पोस्ट लिखूँ, वो कहते हैं ना "खरबूजे को देखकर खरबूजा रंग बदलता है"। हाँ तो मेरी भी इच्छा होने लगी इस विषय पर पोस्ट लिखने की और मैं यह अच्छी प्रकार से समझता हूँ कि यह "इच्छा होना" भी मन का ही एक खेल है, मैं अपने मन के अधीन होकर ही यह पोस्ट लिख रहा हूँ।

यह मन मुझे ही नहीं हर किसी को अपने अधीन बनाना चाहता है, बड़े-बड़े दिग्गज इस मन के अधीन रहे हैं। यह ययाति का मन ही था जिसने उसे अपने पुत्र को अपनी वृद्धावस्था देकर उसके यौवन को स्वयं लेने के लिए विवश किया, यह विश्वामित्र का मन ही था जिसने उसे वसिष्ठ के कामधेनु को शक्तिपूर्वक ले लेन के लिए प्रयास करने के लिए विवश किया, यह युधिष्ठिर का मन ही था जिसने द्यूत में द्रौपदी तक को दाँव में लगाने के लिए विवश किया।

मन ने सदैव ही मनुष्य को कमजोर बनाया है। मन के कारण ही मनुष्य अपने कर्तव्य से विमुख होता है। इसी मन ने अर्जुन को कमजोर बनाकर गांडीव को भूमि पर रख देने और अपने कर्तव्य से विमुख होने के लिए विवश कर दिया था।

अर्जुन को तो विषम स्थिति से उबारने के लिए तो श्री कृष्ण थे किन्तु हम जैसे अकिंचन जन को उबारने के लिए कौन है?

यद्यपि आज हमें उबारने के लिए कृष्ण नहीं हैं किन्तु गीता के रूप में उनकी वाणी अवश्य हमारे पास उपलब्ध है। मन को नियन्त्रित करने के लिए गीता का अध्ययन बहुत ही प्रभावशाली है। मैं तो सभी लोगों से इतना ही कहूँगा कि यदि वे गीता का अध्ययन करें तो अवश्य ही अपने मन को नियन्त्रण में रखने में सक्षम होंगे। यदि आप संस्कृत नहीं समझ सकते तो गीता के हिन्दी टीका को ही पढ़ जाएँ, आपको अवश्य ही लाभ होगा।

Friday, May 6, 2011

जिस तिथि का प्रत्येक पल शुभ मुहूर्त हो वह तिथि है अक्षय तृतीया!

भारतीय परम्परा के अनुसार मांगलिक कार्यों को मुहूर्त में आरम्भ किया जाता है। शुभ मुहूर्त हर तिथि को हमेशा नहीं होता किन्तु आदिकाल से हिन्दुओं में यह मान्यता चली आ रही है कि वैशाख माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया एक ऐसी तिथि है जिसका प्रत्येक पल शुभ मुहूर्त होता है इसीलिए इस तिथि को अक्षय तृतीया के नाम से जाना जाता है। अक्षय तृतीया हिन्दुओं का एक प्रमुख त्यौहार है जिसे कि आखा तीज के नाम से भी जाना जाता है। माना जाता है कि इस दिन जो भी शुभ कार्य किये जाते हैं, उनका अक्षय फल मिलता है। अक्षय तृतीया एक विशिष्ट तिथि है जो निम्न तथ्यों को अपने में समेटे हुए है -
  • सतयुग और त्रेता युग का प्रारंभ इसी तिथि से हुआ था।
  • भगवान विष्णु ने नर-नारायण, हयग्रीव और परशुराम जी के रूप में इसी तिथि को अवतार लिया था।

  • ब्रह्माजी के पुत्र अक्षय कुमार का आविर्भाव इसी तिथि को हुआ था।
  • इसी दिन महाभारत का युद्ध समाप्त हुआ था और द्वापर युग का समापन भी इसी दिन हुआ था।
  • हिन्दुओं के प्रमुख तीर्थ स्थलों में से एक बद्रीनारायण के कपाट प्रतिवर्ष इसी तिथि से ही खुलते हैं।
  • इस दिन से शादी-ब्याह करने की शुरुआत हो जाती है।

  • इस दिन पितरों को किया गया तर्पण तथा पिन्डदान अथवा किसी और प्रकार का दान, अक्षय फल प्रदान करता है।
  • मान्यता है कि इस दिन बिना कोई पंचांग देखे कोई भी शुभ व मांगलिक कार्य जैसे विवाह, गृह-प्रवेश, वस्त्र-आभूषणों की खरीददारी या घर, भूखंड, वाहन आदि की खरीददारी से संबंधित कार्य किए जा सकते हैं। अक्षय तृतीया पर सोना खरीदना शुभ माना जाता है।
  • अक्षय तृतीया को छत्तीसगढ़ में 'अकती' त्यौहार के रूप में मनाते हैं। इसी दिन से खेती-किसानी का वर्ष प्रारम्भ होता है। इसी दिन पूरे वर्ष भर के लिये नौकर लगाये जाते हैं। शाम के समय हर घर की कुँआरी लड़कियाँ आँगन में मण्डप गाड़कर गुड्डे-गुड्डियों का ब्याह रचाती हैं।

Thursday, May 5, 2011

अच्छा बनना चाहते हो तो पहले विशिष्ट बनो

अंग्रेजी की एक लोकोक्ति हैः

You don't have to be different to be good. You have to be good to be different.

अर्थात् "अच्छा" बनने के लिए "विशिष्ट" बनना आवश्यक नहीं है बल्कि "विशिष्ट" बनने के लिए "अच्छा" बनना आवश्यक है।

राम के लिए शबरी "विशिष्ट" थी क्योंकि वह "अच्छी" थी, इसीलिए तो राम ने शबरी के द्वारा दिए गए कंद-मूल-फल को प्रेमपूर्वक खाया और उनकी प्रशंसा भी की -

कंद मूल फल सरस अति दिए राम कहुँ आनि।
प्रेम सहित प्रभु खाए बारंबार बखानि॥
तुलसीदास

कृष्ण के लिए सुदामा "विशिष्ट" थे क्योंकि वे "अच्छे" थे, तभी तो सुदामा की दीन दशा देखकर कृष्ण की आँखें अश्रुपूरित हो गईं -

देखि सुदामा की दीन दसा, करुना करिके करुनानिधि रोये।
पानी परात को हाथ छुयो नहिं, नैंनन के जल सौं पग धोये॥
नरोत्तमदास

किन्तु मैं भी कैसा मूर्ख हूँ जो यह नहीं समझता कि ये सब अतीत की बाते हैं। आज के युग में इन बातों का कुछ भी महत्व नहीं है, ये सब बकवास हैं। हो सकता है कि अतीत काल में "अच्छा" व्यक्ति को "विशिष्ट" समझ लिया जाता हो किन्तु वर्तमान समय में तो "विशिष्ट" होने के लिए "अच्छा" होना कतई जरूरी नहीं है बल्कि "अच्छा" बनने के लिए पहले "विशिष्ट" बनाना आवश्यक है। "अच्छे" लोगों का सारा देश आदर करता है; मोहनदास करमचंद गांधी ने अहिंसा के बल पर देश को स्वतन्त्र दिला दी थी इसलिए वे "विशिष्ट" थे और चूँकि वे "विशिष्ट" थे इसलिए "अच्छे" भी थे इसीलिए तो सारा देश उन्हें "बापू" और "महात्मा गांधी" कहकर उनका सम्मान करता है। सुभाष चन्द्र बोस ने क्रान्ति के बल पर देश को स्वतन्त्र करना चाहा इसलिए वे "विशिष्ट" नहीं बन पाए और इसी कारण से वे केवल बंगाल तक ही सिमट कर रह गए, सारे देश में उन्हें गांधी जैसा सम्मान नहीं मिल सका। यह बात अलग है कि अंग्रेजों ने अहिंसक आन्दलनों के कारण नहीं बल्कि अपनी विवशता के कारण भारत को छोड़ा, तभी तो 1947 में ब्रिटिश प्रधानमन्त्री लॉर्ड एटली ने हाऊस ऑफ कामन्स में कहा था "हमने भारत को इसलिए छोड़ा क्योंकि हम भारत में ज्वालामुखी के मुहाने पर बैठे थे"। अब ज्वालामुखी के मुहाने को अहिंसा तो खोल नहीं सकती, हाँ क्रान्ति में अवश्य ही उसे खोलने की ताकत है। खैर हमें क्या? यदि लोग कहते हैं कि देश में स्वतन्त्रता अहिंसा से आई तो हम मान लेते हैं कि ऐसा ही हुआ होगा। भावनाओं में बह कर मैं शायद विषय से भटक रहा हूँ। तो मैं कह रहा था कि आज के जमाने में "विशिष्ट" व्यक्ति ही "अच्छा" व्यक्ति होता है। राहुल गांधी नेहरू वंश के कुलदीपक हैं इसलिए "विशिष्ट" हैं और "विशिष्ट" हैं तो "अच्छे" भी हैं। ओसामा भी विशिष्ट व्यक्ति हैं, तभी तो दिग्विजयसिंह उन्हें "ओसामा जी" कह कर सम्मानित करना चाहते हैं। बाबा रामदेव को शायद पता नहीं है कि विदेशी बैंकों में जमा देश के काले धन को वापस लाने के लिए लम्बे अरसे से प्रयास करने से वे "विशिष्ट" नहीं बन जाएँगे, उन्हें पता होना चाहिए कि "विशिष्ट" बनने के लिए गांधीवादी तरीका अपनाना पड़ता है, अब देखिए ना "अन्ना" जी ने गांधीवादी तरीका अपनाया तो कितने कम समय में "विशिष्ट" बन गए!

आज प्रत्येक व्यक्ति चाहता है कि लोग उसे विशिष्ट मानें और साथ ही अच्छा भी मानें। हम ब्लोगर भी इसके अपवाद नहीं हैं इसीलिए तो अपने पोस्टों पर टिप्पणियों की भरमार चाहते हैं, हिन्दी ब्लोग्स की विशेषता अधिक संख्या में उसके पाठकों की संख्या नहीं वरन अधिक से अधिक टिप्पणियाँ पाना है। यदि हमारे ब्लोग्स में सौ के स्थान पर हजार, लाख या करोड़ पाठक क्यों न आ जाएँ, हम विशिष्ट नहीं बन सकते, विशिष्ट तो हम तभी बन सकेंगे जब हमें अधिक से अधिक संख्या में टिप्पणियाँ मिलेंगी। और यह कहने की तो आवश्यकता ही नहीं होनी कि "विशिष्ट" व्यक्ति अपने आप ही "अच्छा" बन जाता है।

इसलिए यदि अच्छा बनना चाहते हो तो पहले विशिष्ट बनो!

कहा भी गया है -

घटं भिन्द्यात् पटं छिन्द्यात् कुर्याद्रासभरोहण।
येन केन प्रकारेण प्रसिद्धः पुरुषो भवेत्॥

घड़े तोड़कर, कपड़े फाड़कर या गधे पर सवार होकर, चाहे जो भी करना पड़े, येन-केन-प्रकारेण प्रसिद्धि प्राप्त करना चाहिए याने कि विशिष्ट बनाना चाहिए।

Wednesday, May 4, 2011

गूगल अर्थ में आभासी पर्यटन (Virtual Tour)

किसी स्थान का चित्र मात्र देख लेने से वह सन्तुष्टि नहीं होती जो उस स्थान में घूमकर प्रत्यक्ष रूप में उसे देखने से होता है। लोग प्रायः किसी स्थान को प्रत्यक्ष रूप से देखकर उसका आनन्द उठाने के लिए पर्यटन की योजना बनाते हैं। अनेक बार ऐसी परिस्थितियाँ आती हैं कि हम अपने पर्यटन की योजना को सफल नहीं बना पाते। ऐसे ही अवसरों के लिए आधुनिक तकनीक ने विहंगम चित्र (panoramic images) की सुविधा प्रदान कर रखी है। http://www.360cities.net/ विश्व के अनेक स्थानों के विहंगम चित्र प्रस्तुत करती है और गूगल अर्थ के फीचरों में से एक है। इतना सब लिखने का मतलब है कि आप अपने घर बैठे ही गूगल अर्थ के द्वारा प्रसिद्ध स्थानों के 360 अंश तक घूम जाने वाले चित्रों का अवलोकन कर सकते हैं जिससे आपको उन स्थानों में प्रत्यक्ष घूमने का आभास होगा।

उदाहरण के लिए इण्डिया गेट नई दिल्ली का विहंगम चित्र नीचे प्रस्तुत है। (चित्र को घुमाने के लिए उस पर एक बार क्लिक करके अपने माउस के स्क्रोल अथवा कीबोर्ड के एरो कीज का प्रयोग करें।)


India Gate, South Side in New Delhi

Tuesday, May 3, 2011

दिल्ली जाना - रोजमर्रा की जिन्दगी से अलग होना

दिल्ली जाने के लिए आमंत्रण और निमंत्रण दोनों ही बहुत पहले से ही मिले हुए थे। उहापोह में था कि दिल्ली जाऊँ या न जाऊँ। भीषण गर्मी में 1383 कि.मी. की यात्रा करना आसान नहीं लग रहा था इसलिए दिल्ली न जाने का विकल्प ही भारी पड़ रहा था। अन्ततः निश्चय यही कर लिया था कि न जाऊँ। किन्तु ललित शर्मा, खुशदीप सहगल और रवीन्द्र प्रभात के आग्रह ने मेरे निश्चय को अडिग न रहने दिया और सहसा दिल्ली जाने की योजना बन गई। साथ में जा रहे थे ललित शर्मा, पाबला जी, संजीव तिवारी और अल्पना देशपाण्डे जी।

चूँकि मेरा आरक्षण सबसे आखरी में हुआ था, मुझे सभी से अलग-थलग सीट मिली थी किन्तु सीट थी खिड़की के पास वाली। पूरे एक दिन और रात की यात्रा थी, शुक्रवार सुबह 7.50 बजे से आरम्भ होने वाली। यात्रा के दौरान पुस्तक पढ़ना या प्राकृतिक दृश्यों को देखना बहुत भाता है। रायपुर से डोंगरगढ़ तक मैदानी क्षेत्र है जहाँ आकर्षक प्राकृतिक दृश्य दिखाई नहीं देते इसलिए पहले ही अनेक बार पढ़ी हुई देवकीनन्दन खत्री जी की कृति "चन्द्रकान्ता सन्तति" को पुनः पढ़ता रहा। डोंगरगढ़ से आमगाँव तक पहाड़ी और जंगली क्षेत्र हैं जिसमें वसन्त ऋतु में टेसू के फूलों की भरमार रहती है किन्तु अभी पतझड़ होने के कारण केवल पत्रविहीन वृक्ष ही दिखाई दे रहे थे।


पत्रविहीन वृक्ष तो सतपुड़ा की पहाड़ी और जंगलों में भी थे किन्तु वहाँ पर लाल फूलों से लदे हुए गुलमोहर के पेड़ों की बहुलता होने के कारण आँखों को उनका बहुत ही स्वादिष्ट भोजन प्राप्त हो रहा था। पीलिमायुक्त श्वेत पत्ते वाले महुआ के पेड़ इस भोजन के साथ स्वादिष्ट चटनी का काम कर रहे थे। वापसी यात्रा सतपुड़ा वाले मार्ग न होकर एक अन्य मार्ग से थी किन्तु उस मार्ग में मनेन्द्रगढ़ की पहाड़ियों और जंगलों ने मनमोहक दृश्य प्रदान किए।


दिल्ली में आयोजन कैसा रहा, वहाँ क्या हुआ आदि के विषय में बहुत कुछ लिखा जा चुका है इसलिए मैं सिर्फ इतना ही कहूँगा कि वहाँ पर मुझे बहुत सारे ब्लोगर साथियों से मिलकर बहुत प्रसन्नता हुई। और सुनीता शानू बहन का स्नेहिल आतिथ्य तो मेरे लिए अविस्मरणीय ही बन गया। कुल मिलाकर दिल्ली जाना मेरे लिए रोजमर्रा की जिन्दगी से अलग होना ही रहा।

 
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