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Tuesday, August 31, 2010

क्या हलषष्ठी उन दिनों की यादगार भी है जिन दिनों मनुष्य को कृषि कार्य नहीं आता था?

भारतीय तीज-त्यौहारों में हलषष्ठी जिसे हरछठ के नाम से जाना जाता है के दिन सिर्फ ऐसे खाद्य पदार्थों का सेवन किया जाता है जो बगैर हल चली भूमि से पैदा हुई हो। ऐसा प्रावधान शायद उन दिनों की यादगार में तो नहीं बनाया गया था जिन दिनों में मनुष्य खेती करना नहीं जानता था?

हरछठ का त्यौहार प्रायः सम्पूर्ण उत्तर भारत में मनाया जाता है। भाद्रपक्ष कृष्ण षष्ठी की तिथि को, जिस दिन श्री कृष्ण के अग्रज बलराम जी का जन्म हुआ था, पुत्रवती माताएँ अपनी सन्तान की मंगल कामना करते हुए हरछठ का व्रत रखती हैं और व्रतभंग करने के लिए उन वस्तुओं का ही प्रयोग करती हैं जो कि बगैर जोती हुई जमीन से पैदा हुई हों। इस त्यौहार का सम्बन्ध श्री बलराम जी से भी जोड़ा जाता है जिनका एक नाम हलधर भी है। ऐसा प्रतीत होता है कि बलराम जी ने अपने काल में अवश्य ही कृषि कार्य में विशिष्ट प्रयोग किया रहा होगा।

इस वर्ष भाद्रपक्ष की षष्ठी तिथि दो दिनों में बँट गई है जिसके कारण आधे लोगों ने हरछठ का त्यौहार कल ही मना लिया था और शेष आधे लोग आज मना रहे हैं।

Monday, August 30, 2010

चोर और बेईमान कहलाने से तो अच्छा है कि हम किसी पोस्ट को पढ़ें ही मत

एक बहुत बड़ा बोझ-सा लद गया है हमारे हृदय में। हमें लग रहा है कि हम बहुत बड़े चोर और बेईमान हैं। रोज अनेक पोस्टों को पढ़ते हैं पर टिप्पणी किसी-किसी में ही करते हैं और ऐसा करने को अब चोरी और बेईमानी की संज्ञा मिल गई है। पोस्टों को पढ़ने और टिप्पणी ना करने के अलावा एक उससे भी बड़ा अपराध हम करते रहे हैं वह यह कि हमारे कुछ मित्र, जो न तो ब्लोगर ही हैं और ना ही इंटरनेट यूजर, जब हमसे मिलने आते हैं तो हम उन्हें भी हमारी पसंद की पोस्टों को पढ़वा देते हैं और हमें बहुत खुशी होती है यह देखकर कि उन पोस्टों को पढ़कर उन्हें भी आनन्द मिलता है। पर इस प्रकार से तो हमने अपने उन बेचारे मित्रों को भी चोर और बेईमान बना दिया क्योंकि उन्हें तो यह भी पता नहीं होता कि टिप्पणी क्या चीज होती है।

हमारे द्वारा टिप्पणी ना किए जाने के भी कई कारण हैं। कई बार तो पोस्टों को पढ़कर हमें लगने लगता है कि हम भैंस हैं और हमारे सामने बीन बजा दी गई है। अब पुरानी कहावत है कि "भैंस के आगे बीन बजे और भैंस लगे पगुराय", सो पगुराने के सिवा हम कुछ कर ही नहीं पाते। विद्वान ब्लोगर महोदय या महोदया ने तो ज्ञान की बहुत अच्छी वर्षा की होती है अपने पोस्ट में पर हमारा बर्तन ही बहुत छोटा होता है जिसमें ज्ञानरूपी वर्षा का पानी भर सके। कई बार टिप्पणी करने की इच्छा होने के बावजूद भी जीवन-यापन के लिए जरूरी मगर टिप्पणी करने की तुलना में तुच्छ कामों में जुट जाते हैं। ऐसे ही और भी बहुत से कारण हैं।

अब तो हमें यह भी लगने लग रहा है कि यदि प्रिंट मीडिया में भी हम कुछ पढ़ें तो लेखक या प्रकाशक का मोबाइल नंबर खोजकर उन्हें अपनी प्रतिक्रिया से अवगत करावें और संपर्क नंबर ना मिलने पर चिट्ठी लिखकर टिप्पणी करें।

सचमुच यह ब्लोगरों के साथ बहुत बड़ा अन्याय हो रहा है कि पाठक उनके पोस्ट पर टिप्पणी नहीं करते। ब्लोगर तो पोस्ट लिख कर अपने पाठकों पर कितना बड़ा उपकार करते हैं और पाठक इतने बेवकूफ होते हैं कि एक छोटी सी टिप्पणी भी नहीं करते। बहुत बेइंसाफी है ये।

भौतिक शास्त्र में कार्य की परिभाषा के अनुसार कार्य तब होता है किसी वस्तु पर बल लगाने से उस वस्तु का स्थान परिवर्तन हो, किसी दीवार पर ताकत लगाने को कार्य नहीं कहा जा सकता क्योंकि कार्य का कुछ परिणाम ही नहीं निकला। इसी प्रकार से पोस्ट लिखने के बाद पाठक आ जाने को कार्य नहीं माना जा सकता, वह कार्य तो भी कहलाएगा जब उस पोस्ट में टिप्पणियाँ आ जावें।

अस्तु, अब तक तो हमसे अनजाने में चोरी हो गई पर अब जानबूझ कर ऐसा नहीं करेंगे। चोर और बेईमान बनने से अच्छा तो यही होगा कि हम पोस्टों को पढ़ना ही छोड़ दें।

Sunday, August 29, 2010

अविधिया जी, आखिर रहोगे आप पुरातनपंथी ही

नवप्रयोगानन्द जी साहित्य की समस्त विधाओं में निपुण हैं। वैसे तो वे निबन्ध, कथा-लघुकथा, उपन्यास, कविता आदि सभी विधाओं में लिखते हैं, पर स्वयं को कवि कहलाना अधिक पसन्द करते हैं।

कल जब उनसे हमारी मुलाकात हुई तो अभिवादन के आदान-प्रदान के पश्चात् उन्होंने हमसे कहा, "यह बताइये अवधिया जी कि जब लोटे को पानी में डुबाते हैं तो लोटा पानी में जाता है या पानी लोटे में?"

उनका प्रश्न सुनकर हम अकचका कर उनका मुख देखने लग गए। कुछ देर तक हमारी अकचकाहट का आनन्द लेने के बाद वे मुस्कुरा कर बोले, "चलिए अब यह बताइये कि माला फूलों से बनती है कि फूल माला में होते हैं?"

हमें कुछ सूझा नहीं तो हमने कहा, "आप यह सब पूछ क्यों रहे हैं?"

"हम पूछ नहीं रहे हैं बल्कि आपको बताना चाहते हैं कि हम अपने लेखन में कुछ नए प्रयोग करने जा रहे हैं जिनके अन्तर्गत ऐसी बातें होंगी जो हमें भ्रमित करती हैं।"

"वाह-वाह नवप्रयोगानन्द जी! ऐसे प्रयोगों से तो आप बिल्कुल ही नई क्रान्ति ला देंगे साहित्य-जगत में! अच्छा कोई नई कविता लिखी कि नहीं अभी?"

"अभी तो नहीं लिखी है पर कुछ पंक्तियाँ सूझ रही हैं हमें।"

"तो सुनाइए ना हमें उन पंक्तियों को।"

उन्होंने कहा,

"भूख आदमी को कवि बना देता है
भूखा होने पर चाँद भी उसे रोटी सा नजर आता है।"

हमने कहा, "वाह! वाह!! चाँद की उपमा रोटी से! इन पंक्तियों में तो उपमालंकार स्पष्ट झलक रहा है!"

वे भौंचक-से होकर हम हमसे पूछने लगे, "ये उपमालंकार क्या होता है?"

"भई, काव्य के अंगों में से एक अलंकार भी होता है, जिस प्रकार से गहनों से नारी की सुन्दरता बढ़ जाती है उसी प्रकार से अलंकारों से काव्य के सौन्दर्य में वृद्धि होती है। अलंकार के प्रकारों में एक उपमालंकार भी होता है। जब दो वस्तुओं में अन्तर रहते हुए भी आकृति एवं गुण की समता दिखाई जाय, तो उसे उपमालंकार कहते है। जैसे 'राधा वदन चन्द्र सों सुन्दर' में राधा के मुख और चन्द्रमा में समानता बताई गई है। आप भी तो चांद और रोटी में समानता बता रहे हैं अपनी पंक्तियों में। तो यह उपमालंकार का उदाहरण हुआ।"

हमने कहना जारी रखा, "आप अब मुक्त कविताएँ लिखना छोड़कर छंदबद्ध कविताएँ लिखना शुरू कर के उनमें गणों का प्रयोग शुरू कर दीजिए। आपसे प्रेरणा पाकर और भी कवि छंदबद्ध रचना करने लगेंगे।"

"अब ये गण क्या होता है?" उन्होंने हमसे पूछा।

"वर्णिक छंदों में तीन वर्णों के समूह को एक गण कहा जाता है। गण 8 प्रकार के होते हैं - यगण (।ऽऽ), मगण (ऽऽऽ), तगण (ऽऽ।), रगण (ऽ।ऽ), जगण (।ऽ।), भगण (ऽ।।), नगण (।।।) और सगण (।।ऽ)। इन्हें आसानी से याद करने के लिए एक सूत्र बना लिया गया है- यमाताराजभानसलगा। सूत्र के पहले आठ वर्णों में आठ गणों के नाम हैं। जिस गण की मात्राओं का स्वरूप जानना हो उसके आगे के दो अक्षरों को इस सूत्र से ले लें जैसे ‘भगण’ का स्वरूप जानने के लिए ‘भा’ तथा उसके आगे के दो अक्षर- ‘न स’ = भानस (ऽ।।)। इस भगण में ही तो रसखान ने लिखा हैः

धूरि भरे अति शोभित श्याम जू तैसि बनी सिर सुंदर चोटी।
खेलत खात फिरै अंगना पग पैजनियाँ कटि पीरि कछौटी॥
वा छवि को रसखान बिलोकत वारत काम कलानिधि कोटी।
काग के भाग कहा सजनी हरि हाथ से ले गयो माखन रोटी॥"

अपनी बात पूरी करके हमने उनकी ओर देखा तो वे जोर की जमुहाई ले रहे थे।

जमुहाई लेकर उन्होंने कहा, "अविधिया जी, आखिर रहोगे आप पुरातनपंथी ही। आजकल के जमाने में इन चीजों को पूछता ही कौन है? हम तो कविता लिखते हैं अभिव्यक्ति के लिए... रस-छंद-अलंकार से भला हमें क्या लेना-देना है?"

इतना कह कर वे उठकर चलते बने।

Saturday, August 28, 2010

हमारे किसी पोस्ट में यदि कोई टिप्पणी करे - 'केवल आपकी लेखनी ही ऐसा चमत्कार कर सकती है!' तो क्या हम फूल के कुप्पा नहीं होंगे?

हमारे परिचित एक व्यापारी बन्धु हैं जो प्रायः हमसे अंग्रेजी में अपने व्यापार से सम्बन्धित पत्र लिखवाया करते हैं। पत्र लिखने के एवज में वे हमें हमारा पारश्रमिक तो देते ही हैं पत्र लिखवाने के पहले वे हमें मुफ्त में ही तारीफ के कुछ शब्द दे देते हैं जैसे कि 'अवधिया जी, आपसे परिचय होने के पहले भी मैंने बहुत लोगों से लेटर लिखवाया है पर आपकी लेटर ड्राफ्टिंग की बात ही कुछ और है!' अब इसका हम पर प्रभाव यह पड़ता है कि हम बड़े ही मनोयोग से उनकी चिट्ठी-पत्रियों को अच्छा से अच्छा बनाने में जुट जाते हैं, आखिर अपनी तारीफ गुदगुदाती जो है हमें!

उन व्यापारी बन्धु से परिचय के कुछ दिनों बाद ही हमें पता चल गया था कि जिस किसी से भी उन्हें कुछ काम करवाना होता है, काम करवाने के पहले उनके कसीदे अवश्य ही पढ़ते हैं। ऐसा कर के वे न केवल अपने काम को बहुत अच्छी प्रकार से करवा लेते हैं बल्कि काम के बदले दिए जाने वाले पारश्रमिक को भी कम करवा लेते हैं याने कि काम करने वाला कम दाम में भी अच्छा काम कर दिया करता है।

अपनी तारीफ भला किसे अच्छी नहीं लगती?

अब हमारे किसी पोस्ट में यदि कोई टिप्पणी करे 'केवल आपकी लेखनी ही ऐसा चमत्कार कर सकती है!' तो क्या फूल के कुप्पा नहीं होंगे? अब यह बात अलग है कि इस टिप्पणी से पता ही नहीं चलता कि टिप्पणीकर्ता ने हमारे पोस्ट को पढ़कर टिप्पणी की है या बगैर पढ़े हुए। पर कोई हमारे पोस्ट को पढ़कर टिप्पणी करे या बगैर पढ़े, हमें उससे क्या मतलब है? हमें तो टिप्पणी चाहिए क्योंकि सरस्वती-पुत्र जो ठहरे हम! तारीफ पाना तो हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है।

तारीफ का एक अन्य रूप नाम होना है। यदि किसी नामधारी लेखक ने अपनी पुस्तक प्रकाशित किया है और उसमें सहयोगकर्ताओं की सूची में हमारा नाम दे दिया है तो हम खुश हो जाते हैं जबकि हम स्वयं किसी पुस्तक को पढ़ते हैं तो सहयोगकर्ता की सूची या उन पुस्तकों की सूची जहाँ से प्रसंग लिया गया है आदि की तरफ झाँकते तक नहीं। जब हम फिल्म देखते हैं तो शायद ही फिल्म की पूरी कॉस्टिंग को पढ़ते हों पर वह आदमी अवश्य ही खुश होता है जिसका नाम उस कॉस्टिंग में होता है। आदमी तो अपने नाम का भूखा होता है क्योंकि नाम होना ही उसकी तारीफ होना होता है।

संसार में शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति होगा जिसे अपनी तारीफ अच्छी ना लगती हो। आजकल तो एक प्रकार से चलन भी बन गया है अपनी तारीफ करवाने का, भले ही वह तारीफ झूठी ही क्यों ना हो।

हमारे हिसाब से तो मुँह पर की जाने वाली तारीफें प्रायः झूठी ही हुआ करती हैं और पीठ पीछे की जाने वाली तारीफों में अधिकतर सच्ची!

Friday, August 27, 2010

मुस्लिम आक्रमणकारियों ने तो सिर्फ भारत को लूटा पर अंग्रेजों ने भारत को न केवल लूट कर दरिद्र बनाया बल्कि उसकी संस्कृति और सभ्यता का भी नाश कर दिया

मुस्लिम आक्रमणकारियों ने तो भारत की अपार सम्पदा में से उसके सिर्फ एक छोटे से हिस्से को ही लूटा था। उनकी लूट के बावजूद भी सत्रहवीं शताब्दी के के अन्त तक भारत संसार का सर्वाधिक धनाड्य देश था। किन्तु भारत दरिद्र बना अंग्रेजों के लूट के कारण। प्लासी के युद्ध से वाटरलू के युद्ध तक अर्थात् सन् 1757 से 1815 तक, लगभग एक हजार मिलियन पाउण्ड याने कि पन्द्रह अरब रुपया शुद्ध लूट का भारत से इंग्लैंड पहुँच चुका था। इसका सीधा-सीधा अर्थ यह हुआ कि अट्ठावन साल तक ईस्ट इंडिया कंपनी के नौकर प्रति वर्ष लगभग पचीस करोड़ रुपये भारतवासियों से लूटकर अपने देश ले जाते रहे। समस्त संसार के इतिहास में ऐसी भयंकर लूट की मिसाल अन्य कहीं नहीं मिलती। इस लूट मुकाबले महमूद गज़नवी और मोहम्मद गोरी की लूट तो एकदम ही नगण्य है।

भारत से लूटे गए इसी धन से इंग्लैंड के लंकाशायर और मनचेस्टर में भाफ के इंजिनों से चलने वाले अनेक कारखाने उन्नत हुए। इस भयंकर लूट के कारण ही इंग्लैंड में नई-नई ईजादों को फलने और अनेक कारखानों को खुलने का अवसर मिला। इस लूट के कारण ही इंग्लैंड की आय दिन-ब-दिन बढ़ती चली गई और उसी हिसाब से भारत दरिद्र होता चला गया। परिणामस्वरूप उन्नीसवीं शताब्दी के अन्त तक भारत के सारे उन्नत उद्योग-धन्धे सिर्फ कहानी बनकर रह गए और सौ बरस पहले जो भारत संसार का सर्वाधिक धनी देश था, संसार का सबसे निर्धन देश बन गया।

इंग्लैंड की बढ़ती हुई महत्वाकांक्षा की पूर्ति में भारत के उन्नत और लाभदायक उद्योग-धन्धे बाधा बनकर खड़े थे इसलिए इन उद्योग-धन्धों का सत्यानाश करने के उद्देश्य से ही सन् 1813 में नया चार्टर तैयार किया गया। तत्कालीन ब्रिटिश गवर्नर जनरल हेस्टिंग्ज ने इस चार्टर एक्ट की सहायता से भारत के प्राचीन व्यापार और उद्योग-धन्धों को तहस-नहस कर डाला। जिस गति से भारत के उद्योग-धन्धे खत्म होते चले गए उसी गति से इंग्लैंड में नए-नए उद्योग-धन्धे शुरू होते चले गए जिनके लिए कच्चा माल भारत से ही सस्ते दरों में खरीद कर ले जाया जाता था और उन कारखानों के उत्पादों को भारत में ही लाकर भारी दामों में बेचा जाता था।

अगले लगभग सौ सालों में भारत में किसानों का लगभग सर्वनाश हो गया, पुराने खानदान गारत हो गए, अदालतों की कार्यवाहियों को पेचीदा बनाकर न्याय को मँहगा बना दिया गया। वास्तविकता तो यह थी कि अंग्रेजों को टैक्स न पटा पाने वाली भारतीय गरीब जनता के लिए उस काल में न्यायालय के द्वार ही बन्द कर दिए गए थे, उनके लिए न कानून था न इन्साफ! उस काल की पुलिस अत्याचार की नमूना थी। गाँव की पंचायतों का नाश कर डाला गया था और वहाँ की पाठशालाएँ तोड़ डाली गईं थीं। सुलभ जीवन के लिए जीवन के सारे धन्धों में कुशल, सुसभ्य भारतीयों को उन्हीं के देश में अयोग्य, असहाय और नालायक करार देकर सदा के लिए नीच बना दिया गया था। इतना ही नहीं उन्हें शराबी और दुराचारी तक बनाया जा रहा था। सन् 1833 में पुनः चार्टर एक्ट को बदल कर देशी रियासतों को हड़प कर अंग्रेजी राज्य में मिलाया जाने लगा था।

भारत में अंग्रेजी सरकार को और भी मजबूत करने के लिए गवर्नर जनरल की कौंसिल में लॉ मेम्बर का नया पद बना कर मेकॉले को भेजा गया जो कि एक निर्धन घराने का व्यक्ति था किन्तु अपनी योग्यता से लॉर्ड के पद तक पहुँच चुका था। बत्तीस वर्ष की अवस्था में ही वह विचारशील, उत्साही और बुद्धिमान व्यक्ति माना जाने लगा था। लॉर्ड मैकॉले ने भारत आकर देखा कि अंग्रेजों की करतूत के कारण हिन्दुस्तान में करोड़ों नन्हे-मुन्ने बच्चे, जिन्हें पाठशालाओं में शिक्षा ग्रहण करने की जरूरत थी, माँ-बाप के पेट भरने के लिए उनके साथ मेहनत-मजदूरी कर रहे हैं किन्तु बावजूद इसके भारत शिक्षा-प्रचार के मामले में यूरोप के समस्त देशों में अग्रणी ही बना हुआ था। असंख्य ब्राह्मण अध्यापक अपने घरों में लाखों विद्यार्थियों को मुफ्त शिक्षा देते थे। भारत के बड़े-बड़े नगरों में जहाँ उच्च संस्कृत-साहित्य की शिक्षा के लिए विद्यापीठ बने हुए थे वहीं उर्दू-फारसी की शिक्षा के लिए अनेक मक़तब और मदरसे भी कायम थे। छोटे-छोटे गाँवों में भी ग्राम-पंचायतों के नियन्त्रण में पाठशालाएँ चला करती थीं। डा-वेल नामक एक प्रसिद्ध मिशनरी, जो मद्रास में पादरी रह चुके थे, ने तो यहाँ की शिक्षा-व्यवस्था से प्रभावित होकर इंग्लिस्तान में भी भारतीय प्रणाली के अनुसार शिक्षा देना आरम्भ कर दिया था।

लॉर्ड मैकॉले को भारत की यह शिक्षा-प्रणाली चुभने लग गई और उसने एक ऐसी शिक्षा-प्रणाली बनाकर, जो कि भारतीयों को अपनी संस्कृति और सभ्यता से दूर ले जाए और उनमें राष्ट्रीय भावना पैदा ही ना होने दे, अंग्रेजी शासन को भेज दिया। अंग्रेजी शासन ने उस शिक्षा-प्रणाली को सहर्ष स्वीकार कर लिया और भारत में तत्काल लागू भी कर दिया।

दुःख की बात तो यह है कि आज तक हमारे देश की शिक्षा-नीति कमोबेश वही बनी हुई है जिसे कि लॉर्ड मैकॉले ने बनाया था परिणामस्वरूप आज हम तथा हमारे बच्चे अपनी संस्कृति और सभ्यता को हेय दृष्टि से देखते हैं।

Thursday, August 26, 2010

मैं एक हिन्दी ब्लोगर - अपंग, असहाय और निर्धन

मै एक हिन्दी ब्लोगर हूँ। 03-09-2007 को अपना हिन्दी ब्लोग बनाकर मैंने अपना पहला पोस्ट लिखा था और तब से आज तक मात्र कुछ माह को छोड़कर अपने ब्लोग में प्रायः रोज ही एक पोस्ट लिखते चला आ रहा हूँ।

क्यों लिखता हूँ मैं? क्या उद्देश्य है पोस्ट लिखने के पीछे मेरा?

आज जब ऐसे सवाल मेरे मन में उठते हैं तो याद आता है कि जब मैंने अपना हिन्दी ब्लोग बनाया था तो उस समय मेरे पास बहुत सारे उद्देश्य थे। मसलन अपने पोस्ट के माध्यम से अच्छी अच्छी जानकारी देना विशेषतः भारतीय संस्कृति और सभ्यता के विषय में, नेट में हिन्दी को बढ़ावा देकर हिन्दी की सेवा करना और साथ ही साथ हिन्दी ब्लोगिंग से कुछ कमाई कर के स्वयं भी लाभ लेना। पर आज सोचता हूँ तो लगता है कि ऐसा कुछ भी तो नहीं कर पाया मैं। मुझे पता ही नहीं चला कि कब मेरे उद्देश्य बदल कर ढेर सारी टिप्पणियाँ पाना और संकलकों के हॉटलिस्ट में ऊपर ही ऊपर चढ़ते जाना बन गए। आज मैं टिप्पणियों के पैबन्द और संकलकों की बैसाखी पाकर अत्यन्त ही सन्तुष्ट जीव बन गया हूँ।

मैं जानता हूँ कि नेट में आने वाले करोड़ों हिन्दीभाषियों में से मुझे शायद ही कोई पढ़ता है पर क्यों ना बनूँ मैं सन्तुष्ट जीव? आखिर कुछ ऐसे लोग भी तो हैं जो मुझे पढ़ते हैं या फिर पढ़ने का दिखावा ही कर लेते हैं। क्या यह कम है मेरे लिए? आज तक मैंने जो कुछ भी लिखा है यदि मैंने उसे स्तर के पत्र-पत्रिकाओं में छपने भेजा होता तो अवश्य ही मेरी वे सब रचनाएँ वहाँ की कचरा पेटी की शोभा बढ़ाती होतीं और कहाँ मिलते मुझे पढ़ने वाले? तो क्यों ना बनूँ मैं सन्तुष्ट जीव?

मुझे सन्तुष्ट रहना है इसलिए यही सोचा करता हूँ कि हिन्दी में बहुत सारे महान साहित्यकार हुए हैं पर क्या किसी की भी रचना कभी 'बेस्टसेलर' बनी है? क्या किसी ने 'मैक्सिम गोर्की' के "द मदर", 'चार्ल्स डिकन्स' के "अ टेल ऑफ टू सिटीज़" आदि जैसी पुस्तकें हिन्दी में लिखी हैं जिनके पाठक संसार भर में हैं? संसार की बात छोड़ें, अपने ही देश में ही 'जयशंकर प्रसाद' की "कामायनी", 'मैथिलीशरण गुप्त' जी के "साकेत" जैसी रचनाओं को कितने लोग पढ़ते हैं? घर में "रामचरित मानस" रहने पर भी किसने उसे पूरा पढ़ा है? तो फिर यदि मेरे लिखे को कोई पढ़ने वाला नहीं है तो इससे क्या फर्क पड़ जाता है? क्यों ना रहूँ मैं सन्तुष्ट? मुझे टिप्पणियाँ मिलती हैं, संकलकों के हॉटलिस्ट में मेरा पोस्ट ऊपर चढ़ता है यह क्या कम है मेरे लिए?

और लोग क्यों टिप्पणियाँ करते हैं यह तो मैं नहीं कह सकता पर मैं हर रोज हिन्दी के सैंकड़ों नहीं तो कम से कम पचास-साठ पोस्टों में जाकर इसलिए टिप्पणियाँ किया करता हूँ कि मुझे भी कम से कम पन्द्रह-बीस टिप्पणियाँ मिल जाए। "आप हर मरतबा एक बकवाइस लिखकर पाटक का टाइम खोटी करती है। बकवाइस बंद किरिए। ऐहसान होगी." जैसी टिप्पणियाँ पाकर भी मैं खुश होता हूँ! ऐसी टिप्पणियों को न मिटा कर मैं हिन्दी भाषा पर और खुद पर भी उपकार करता हूँ। इसे मिटा दूँगा तो हिन्दी में की गई एक टिप्पणी कम हो जाएगी और टिप्पणियाँ कम होने से नेट में हिन्दी का वर्चस्व कैसे बढ़ेगा? इसे मिटा दूँगा तो हॉटलिस्ट में मेरा पोस्ट नीचे उतर आएगा; और सबसे बड़ी बात तो यह है कि इसे मिटा दूँगा तो मुझ पर अपनी आलोचना न सह पाने का इल्जाम भी लग जाएगा। तो आखिर क्यों मिटाऊँ मैं इसे? आखिर ये टिप्पणियाँ ही तो हैं जो मुझे गुदगुदाती हैं और मेरे पोस्ट को संकलकों के हॉटलिस्ट में ऊपर चढ़ा कर मुझे संतुष्टि प्रदान करती हैं।

मैं अपंग हूँ क्योंकि मैं अपने दम पर आगे नहीं बढ़ सकता। पर क्या हुआ? संकलकों की बैसाखी तो है मेरे पास! मैं निर्धन हूँ क्योंकि मेरे पास ऐसी लेखन क्षमता का धन नहीं है जो हजारों-लाखों की संख्या में पाठक जुटा सके। पर क्या हुआ? टिप्पणी देने वाले तो हैं मेरे पास! मैं असहाय हूँ क्योंकि मैं चाहकर भी अपनी इस स्थिति से उबर नहीं सकता। पर क्या हुआ? सन्तुष्ट और आत्ममुग्ध तो हूँ मैं!

Wednesday, August 25, 2010

रिश्तों में दरार

प्रभा प्रशान्त से कह रही थी, "भैया, इस बार मैं राखी में सिर्फ आपको बुलाउँगी, प्रकाश भैया को नहीं?"

और जब प्रशान्त अपने छोटे भाई प्रकाश से मिला तो प्रकाश कहने लगा, "भैया इस बार मैं राखी में प्रभा बहन के घर, अगर वो बुलाएगी भी तो भी, नहीं जाउँगा।"

एक समय था जब प्रशान्त, प्रकाश और प्रभा के बीच आपस में इतना प्यार था कि एक दूसरे के बिना रह नहीं पाते थे। पर आज उनके रिश्तों में दरार आ गया है।

सही बात तो यह है कि आज कमोबेश हर परिवार में आपसी रिश्तों में दरार देखने को मिल जाता है। भाई-भाई, भाई-बहन, बाप-बेटे जो कभी एक-दूसरे पर जान छिड़कते थे के बीच वैमनस्य की गहरी खाई खुदी हुई दिखाई देती है।

क्यों होता है ऐसा?

क्यों आता है रिश्तों में दरार?

Tuesday, August 24, 2010

रक्षा बन्धन भाई-बहन का त्यौहार या पुरोहित-यजमान का?

हमें आज भी याद है कि बचपन में प्रतिवर्ष रक्षा बन्धन अर्थात् श्रावण शुक्ल पूर्णिमा के दिन हमारे पिता जी सुबह से ही पुरोहित जी की प्रतीक्षा करने लगते थे। उस रोज पुरोहित जी हमारे घर आकर सबसे पहले पिताजी के हाथ में और उसके बाद हम बच्चों के हाथ में रक्षा बन्धन का पीला धागा बाँधा करते थे। रक्षा बन्धन बाँधते समय वे निम्न मन्त्र पढ़ा करते थेः

येन बद्धो बलि: राजा दानवेन्द्रो महाबल:।
तेन त्वामभिबध्नामि रक्षे मा चल मा चल॥"


अर्थात् जिस प्रकार से दानवों के दानवीर राजा बलि के हाथ में बँधे हुए रक्षा बन्धन ने उनकी रक्षा की थी उसी प्रकार से मैं तुम्हारे हाथ में रक्षा बन्धन बाँध रहा हूँ जो तुम्हारी रक्षा करे!

उन दिनों छत्तीसगढ़ में रक्षा बन्धन को पुरोहित और यजमान का त्यौहार माना जाता था, भाई-बहन का नहीं। भाई-बहन का त्यौहार भाई-दूज, जो कि लक्ष्मीपूजा के बा आने वाले दूज अर्थात् कार्तिक शुक्ल द्वितीया का दिन होता था, को ही माना जाता था। रक्षा बन्धन के विषय में मान्यता थी कि उस दिन पुरोहित के द्वारा यजमान के हाथों में बाँधा गया रक्षा बन्धन वर्ष-पर्यन्त यजमान की रक्षा करता है।

पुरोहित और यजमान का यह त्यौहार भाई-बहन के त्यौहार में कब और कैसे परिणित हो गया इस विषय में विशेष जानकारी नहीं मिलती। ऐसा प्रतीत होता है कि इस त्यौहार का रूपान्तर करने में हिन्दी फिल्मों का बहुत अधिक योगदान है। रक्षा बन्धन के विषय में बहुत सारी दन्तकथाएँ प्रचलित हैं किन्तु पहली बार कब किस बहन ने अपने भाई के हाथ में राखी बाँधी यह अज्ञात है।

एक किंवदन्ती के अनुसार देवताओं और दैत्यों के युद्ध के लिए जाते समय इद्राणी ने अपने पति इन्द्र के हाथों में पीले धागे के रूप में रक्षा बन्धन बाँधा था। यह तो पत्नी के द्वारा पति को रक्षा बन्धन बाँधना था, जिसका प्रचलन नहीं हो पाया। एक और पौराणिक कथा के अनुसार यमुना ने अपने भाई यम के हाथों रक्षा बन्धन बाँधा था। लगता है कि इसी कथा ने रक्षा बन्धन को भाई-बहन के त्यौहार का रूप दिया होगा।

यह भी कहा जाता है कि द्रौपदी ने अपनी तथा अपने पतियों की रक्षा के लिए कृष्ण को रक्षा बन्धन बाँधा था। एक और कथा के अनुसार लक्ष्मी जी ने दानवीर दानव राजा बलि को रक्षा बन्धन बाँध कर अपना भाई बनाया था।

ऐतिहासिक दन्तकथा यह भी है कि राजा पोरस ने जब सिकन्दर को युद्ध में हरा दिया था तो सिकन्दर की पत्नी ने पोरस को राखी बाँध कर अपना भाई माना था।

अस्तु, वर्तमान में तो रक्षा बन्धन पुरोहित-यजमान का त्यौहार न होकर पूर्ण रूप से भाई-बहन का ही त्यौहार बन चुका है।

Monday, August 23, 2010

अंग्रेजों ने भारत को जीता नहीं था, भारत तो उन्हें सेंत-मेंत में ही मिल गया था

जिस प्रकार से मोहम्मद बिन कासिम और मोहम्मद गोरी जैसे आक्रमणकारियों में बाहर से आकर भारत पर हमला किया था क्या उसी प्रकार से कभी किसी अंग्रेज योद्धा ने अपनी सेना के साथ आकर भारत पर आक्रमण किया था?

उपरोक्त प्रश्न का उत्तर केवल नहीं में ही मिलता है। वास्तविकता तो यही है कि इंग्लैंड और हिन्दुस्तान के बीच कभी कोई लड़ाई हुई ही नहीं।

अब प्रश्न यह उठता है कि जब इंग्लैंड ने कभी भारत पर आक्रमण ही नहीं किया तो फिर आखिर वह भारत का स्वामी कैसे बन बैठा?

ऐसे प्रश्न जब मेरे मष्तिस्क में उठते हैं तो मुझे खुद पर खीझ आने लगती हैं कि क्यों मुझे कभी इतिहास में रुचि नहीं रही? अपने विद्यार्थी काल में क्यों मुझे गणित जैसा विषय सरल और इतिहास जैसा विषय दुरूह लगा करता था? विश्व का इतिहास न सही, क्यों मैंने भारत का इतिहास तक को कभी नहीं पढ़ा?

अस्तु, मानव-मष्तिस्क अत्यन्त विचित्र है! जब इसके भीतर प्रश्न कुलबुलाने लगते हैं तो यह अधीर हो जाता है उनके उत्तर पाने के लिए। तो उपरोक्त प्रश्न का उत्तर जानने के लिए मैंने भारत के इतिहास से सम्बन्धित सामग्री खोज कर खंगालना शुरू किया तो बहुत सी विचित्र बातें जानने को मिलीं। सच तो यह है कि मुझे भारत का इतिहास ही अत्यन्त विचित्र लगने लगा।

पन्द्रहवीं शताब्दी में जब वास्को-डि-गामा भारत पहुँचा तो उसने जाना कि भारत को "सोने की चिड़िया" यों ही नहीं कहा जाता। भारत के पास अपार सम्पदा का भण्डार था। भारत की अथाह और अतुलनीय सम्पदा को देखकर उसकी आँखें चौंधिया गईं। उसने जब वापस जाकर यहाँ के वैभव के बारे में यूरोप को बताया तो यूरोपीय लोगों का मुँह में पानी आने लग गया और परिणामस्वरूप हिन्द महासागर यूरोपीय समुद्री डाकुओं से पट गया। सोलहवीं शताब्दी में यूरोप के विभिन्न देशों के समुद्री डाकू भारत के व्यापारी जहाजों को, जो कि भारत के ही एक समुद्री तट से दूसरे समुद्र तट में जाकर भारत में ही व्यापार किया करते थे, लूटते रहे। पुर्तगालियों ने तो मंगलौर, कंचिन, लंका, दिव, गोआ और बम्बई के टापू को अपने अधिकार में ही ले लिया।

पुर्तगाल और स्पेन भारतीय जहाजों को लगभग दो सौ साल तक लूटते रहे और इस लूट की सम्पत्ति से मालामाल हो गए। किन्तु इंग्लैंड का भारत से पहली बार  सम्पर्क सत्रहवीं शताब्दी में ही हुआ क्योंकि उसके पास भारत आने के रास्ते का नक्शा नहीं था। रानी एलिजाबेथ के शासनकाल में सर फ्रांसिस ड्रेक नामक एक डाकू, जो कि 'समुद्री कुत्ते' के नाम से विख्यात था, एक पुर्तगालियों के जहाज को लूट लिया तो उसमें उसे लूट के माल के साथ भारत आने का समुद्री नक्शा भी मिल गया। इस नक्शे के मिल जाने कारण ही ईंस्ट इंडिया कंपनी की नींव का पहला पत्थर डाला गया।

भारतीय जलमार्ग के नक्शे के मिल जाने के लगभग तीस साल बाद सन् 1608 में अंग्रेजों का 'हेक्टर' नामक एक जहाज सूरत के बन्दरगाह में आकर लगा। जहाज का कप्तान का नाम हाकिन्स था जो कि पहला अंग्रेज था जिसने भारत की भूमि पर कदम रखा था। उन दिनों भारत में बादशाह जहांगीर तख्तनशीन थे। उल्लेखनीय बात यह है कि सैकड़ों वर्षों तक लुटते चले आने के बाद भी भारत की सम्पदा उस समय तक भी अपार थी, इतनी अथाह कि कोई भी माई का लाल उसका अनुमान तक नहीं लगा सकता था। हाकिन्स ने आगरा जाकर इंग्लिस्तान के बादशाह जेम्स प्रथम का पत्र और सौगात बादशाह को भेंट की। आगरा की विशाल अट्टालिकाएँ, नगर का वैभव और बादशाह जहांगीर के ऐश्वर्य को देखकर उसकी आँखें चुँधिया गईं। ऐसी शान का शहर उसने अपने जीवन में कभी देखा ही नहीं था, देखना तो दूर उसने ऐसे वैभवशाली नगर की कभी कल्पना भी नहीं की थी।

अस्तु, बादशाह ने उस अंग्रेज अतिथि की खूब खातिरदारी की और न केवल अंग्रेजों को सूरत में कोठी बनाने तथा व्यापार करने का फर्मान जारी किया बल्कि यह भी इजाजत दे दी कि मुगल दरबार में अंग्रेज एलची रहा करे। कुछ दिनों बाद सर टॉमस रो को इंग्लिस्तान के बादशाह ने मुगल-दरबार में अपना पहला एलची बनाकर भेज दिया, जिसने अंग्रेज व्यापारियों के लिए और भी सुविधाएँ प्राप्त कर लीं। अंग्रेजों को कालीकट और मछलीपट्टनम में भी कोठियाँ बनाने की इजाजत मिल गई। अंग्रेजों की प्रार्थना पर भारत के बादशाह ने यह फर्मान भी जारी कर दिया कि अपनी कोठी के अन्दर रहने वाले कम्पनी के किसी मुलाजिम के कसूर करने पर अंग्रेज स्वयं उसे दण्ड दे सकते हैं। यह एक विचित्र बात थी क्योंकि अंग्रेजों ने अपने साथ अपने देश से किसी नौकर को नहीं लाया था बल्कि उन्होंने भारतीयों को ही अपना नौकर बना कर रख लिया था। इस प्रकार से इस फर्मान के तहत अंग्रेजों को अपने भारतीय नौकरों का न्याय करने और उन्हें सजा देना का अधिकार मिल गया। फर्मान जारी करते वक्त उस बादशाह ने सपने में भी नहीं सोचा रहा होगा कि एक दिन ये अंग्रेज बादशाह के उत्तराधिकारी तक को दण्ड दने लगेंगे और यदि उनका विरोध किया जाएगा तो वे प्रजा का संहार कर डालेंगे तथा बादशाह के उत्तराधिकारी को बागी कहकर आजीवन कैद कर लेंगे।

सन् 1612 में अंग्रजों ने अपनी पहली कोठी सूरत में बनवाया और स्थल मार्ग से आगरा और दिल्ली के बीच व्यापार शुरू कर दिया। बाद में उन्होंने पटना और मछलीपट्टनम, जो कि उन दिनों गोलकुण्डा राज्य के अन्तर्गत बन्दरगाह था, में भी कोठियाँ बनवा डालीं। व्यापार के बढ़ने के साथ ही साथ बालासोर, कटक, हरिहरपुर आदि में भी अंग्रेजों की कोठियाँ बन गईं। विजयनगर के महाराज से जमीन माँग कर अंग्रेजों ने मद्रास में सेंट जार्ज का किला भी बनवा लिया। इस प्रकार से मुगल-राज्य से बाहर अंग्रेजों का एक स्वतन्त्र केन्द्र स्थापित हो गया।

अंग्रेजों का धन्धा मुनाफे में चलने लगा। वे भारत से कच्चे रेशम, रेशम के बने कपड़े, उम्दा किस्म का शोरा सस्ते में खरीद कर अपने देश में बेचने लगे और उनके देश से भेजे गए सोने-चाँदी की भी भारत में अच्छी खपत होने लगी। सन् 1661 में इंग्लैंड के राजा चार्ल्स द्वितीय ने ईस्ट इंडिया कंपनी को भारत में अपना सिक्का चलाने, रक्षा के लिए फौज रखने, किले बनाने और आवश्यकता पड़ने पर लड़ाई लड़ने के भी अधिका प्रदान कर दिए। यह एक बहुत ही विचित्र बात थी कि जिस भारत पर इंग्लैंड के राजा का किसी भी प्रकार का अधिकार नहीं था, उसी भारत पर व्यापार करने वाली अंग्रेजी कंपनी को इंग्लैंड के राजा ने राजनैतिक अधिकार दे दिया और यहाँ के सत्ताधारियों के कान में जूँ भी नहीं रेंगी। यही वह अधिकार था जिसने बाद में भारत में अंग्रेजों की सत्ता स्थापित की।

यह भी एक चमत्कारिक बात है कि ईस्ट इंडिया कंपनी ब्रिटिश सरकार की प्रतिनिधि नहीं थी, उसे भारत और चीन में व्यापार करने का ही इजारा मिला था, किन्तु इस कंपनी ने अपने निजी धन-जन से भारत के भागों को हथियाना शुरू कर दिया। और मजे की बात तो यह है कि उनका निजी धन-जन भी भारत की ही थी याने कि भारत से कमाई गई रकम से भारत के लोगों को ही सैनिक बना कर भारतीय लोगों पर ही आक्रमण करना। इस प्रकार से उस काल में भारत की बीस करोड़ जनता पर ब्रिटेन के मात्र सवा करोड़ निवासियों का वर्चस्व होने की शुरुवात हो गई।

स्पष्ट है कि भारत को अंग्रेजों ने नहीं हराया, भारत ने ही खुद को अंग्रेजों के लिए हरा दिया। भारत अंग्रेजों को सेंत-मेंत में ही मिल गया, बिल्कुल जमीन में पड़े अमूल्य हीरे की तरह। इसका मुख्य कारण था कि भारत में किसी एकछत्र सम्राट का आधिपत्य नहीं था। और सही कहा जाए तो भारत में राष्ट्रीयता की भावना नहीं थी।

राष्ट्रीय भावना न होने की अपनी कमजोरी के कारण भारत हजार से भी अधिक वर्षों तक विदेशियों का गुलाम बना रहा। क्या हम अपनी कमजोरी को कभी समझ पाए हैं? आज भी तो हम क्षेत्रीयता और भाषा के नाम पर लड़ मरने के लिए कटिबद्ध हो जाते हैं।

Sunday, August 22, 2010

संकलक, पाठक और टिप्पणियाँ

संकलक एक इंटरनेट से सम्बन्धित शब्द है। संकलकों का काम होता है किसी एक विषय या भाषा के ब्लोग्स को एक स्थान पर दिखाना। जैसे कि समाचार संकलक समाचारों को एक ही स्थान पर दिखाते हैं तो हिन्दी भाषा के संकलक हिन्दी ब्लोग्स को एक स्थान पर! संकलकों का उद्देश्य होता है ब्लोग्स में पाठक भेजना।

जहाँ किसी ब्लोग में संकलकों से पाठक आते हैं वहीं अन्य तरीकों से भी आते हैं जैसे कि ब्लोग का अनुसरण कर के या विभिन्न सर्च इंजिनों में सर्च कर के। किसी पोस्ट में आने वाले पाठकों में से कुछ पाठक पोस्ट को पढ़कर चले जाते हैं, कुछ लोग अपनी टिप्पणी भी करते हैं और ऐसा भी होता है कि कई पाठक पोस्ट को बिना पढ़े भी चले जाते हैं।

यह आवश्यक नहीं है कि जो लोग टिप्पणी करते हैं वे किसी संकलक से ही पोस्ट में आए हों, वे कहीं पर से भी आए हो सकते हैं। मान लीजिए किसी संकलक ने किसी पोस्ट में कुल 31 पाठक भेजे और उस पोस्ट में 37 टिप्पणियाँ हैं। अब जिस संकलक ने पोस्ट में पाठक भेजे हैं वह अपने डिफॉल्ट हॉटलिस्ट में पोस्ट में की गई टिप्पणियों की संख्या को दर्शाता है तो क्या यह उचित है? संकलक से पोस्ट में जाने वाले 31 पाठकों में से कुछ ने ही तो टिप्पणी की होगी और शेष टिप्पणियाँ अन्य प्रकार से आए पाठकों की होगी। तो क्या यह 31 पाठक भेज कर 37 टिप्पणियों का श्रेय लेना नहीं है? और इसके उलटे उस संकलक ने किसी पोस्ट में 96 पाठक भेजे हैं किन्तु उस पोस्ट में मात्र 3 टिप्पणियाँ है तो उस पोस्ट को अपने डिफॉल्ट हॉटलिस्ट में न दिखाना क्या उस पोस्ट के साथ अन्याय नहीं है? संकलक के द्वारा भेजे गए पाठकों के आधार पर ही संकलक की डिफॉल्ट हॉटलिस्ट नहीं होनी चाहिए?

वैसे भी संकलकों का कार्य पोस्ट में महज पाठक भेजना होता है टिप्पणियाँ करवाना नहीं।

Saturday, August 21, 2010

रेल्वे के एक टिकट के साथ फ्लाइट का एक टिकट मुफ्त

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आपको शायद पता हो कि यात्रा.कॉम का रेल्वे टिकट बुकिंग के लिए इण्डियन रेल्वे कैटरिंग एण्ड टूरिज्म कार्पोरेशन लिमिटेड IRCTC, जो कि आनलाइन रेल्वे टिकट बुकिंग के लिए भारत की सबसे बड़ी ईकामर्स साइट है, के साथ अनुबन्ध है और यात्रा.कॉम के माध्यम से आसानी के साथ घर बैठे ही रेल्वे टिकट बुकिंग कराया जा सकता है।

आनलाइन रेल्वे बुकिंग के अपने बिजनेस को प्रमोट करने के लिए यात्रा.कॉम ने सीमित समय के लिए एक स्कीम जारी किया है जिसके तहत प्रत्येक रेल्वे टिकट के आनलाइन बुकिंग के साथ एक डोमेस्टिक फ्लाइट टिकट बिल्कुल मुफ्त देने का आफर है।

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Friday, August 20, 2010

ठगों के गिरोह - जो रेशमी रूमाल को अस्त्र बना कर बगैर रक्तपात किए हत्या कर दिया करते थे

आज ठगी का अर्थ किसी को बहला-फुसला कर या धोखा देकर लूट लेने से लगाया जाता है याने कि ठग का अर्थ वही समझा जाता है जो कि अंग्रेजी के शब्द 'चीट' (cheat) का होता है। किन्तु अठारहवीं शताब्दी में भारत में ठगों के गिरोह हुआ करते थे जो कि अपनी साहसिक, रोमांचकारी किन्तु हत्या के घृणित कृत्य किया करते थे। उन दिनों इन ठगो के गिरोहों का व्यापक जाल सम्पूर्ण भारत में कन्याकुमारी से कश्मीर तक फैला हुआ था। इन गिरोहों में पाँच-दस व्यक्तियों से लेकर सैकड़ों व्यक्ति तक हुआ करते थे जिनमें हिन्दू और मुसलमान दोनों ही शामिल रहते थे। स्त्रियाँ भी इन गिरोहों का सदस्य होती थीं। उस काल में आज की तरह रेल-मोटर जैसी सुविधाएँ न होने के कारण लोग काफिला बना कर रथों, बैलगाड़ियों, घोड़ों, ऊँटों आदि जानवरों पर सवार होकर तथा पैदल चल कर यात्रा किया करते थे। साथ के सामान को ढोने के लिए गधों और खच्चरों का इस्तेमाल किया जाता था। काफिले के लोगों की संख्या के अनुसार एक से अधिक ठगों के गिरोह मिलकर ठगी का धन्धा किया करते थे।

यद्यपि इन ठगों के गिरोहों में मुसलमान भी हुआ करते थे किन्तु इन ठगों की इष्ट काली देवी हुआ करती थी। सम्भवतः ठगी का आरम्भ तान्त्रिकों से हुआ था और इसीलिए उनका धर्म-विश्वास तान्त्रिक ढंग पर था। ठगों के पूजा-स्थल गोपनीय हुआ करते थे। ये ठग प्रायः बगैर रक्तपात किए हत्या किया करते थे। इनका हत्या करने का ढंग भी अपनी तरह का अनूठा था। इनका मुख्य अस्त्र एक रेशमी रूमाल हुआ करता था, जिसमें एक मंसूरी पैसा बंधा रहता था। अपने रेशमी रूमाल को वे इस सफाई के साथ अपने शिकार के गले में डालते थे कि वह पैसा शिकार के टेंटुए से कस जाता था और क्षण भर में ही बलवान से बलवान आदमी की ऐसी मृत्यु हो जाया करती थी कि वह 'चीं' तक न कर पाता था। शिकारों की संख्या चाहे सौ-दो सौ ही क्यों ना हो, संकेत होने पर एक ही क्षण में सभी के गले में फाँसी लग जाती थी।

ठगों के ये गिरोह सैनिक पद्धति पर संगठित हुआ करते थे तथा उनमें भिन्न-भिन्न पदाधिकारी भी होते थे। पदाधिकारियों के आधीन अलग-अलग दल होते थे जिनके विभिन्न प्रकार के काम नियत होते थे। 'सोथा' नामक दल के सदस्यों का कार्य होता था भद्रवेश में सम्पन्न लोगों की तरह यात्रा करना तथा मुसाफिरों को अपनी वाक्‍‌पटुता के जाल में फँसा कर उनसे हेल-मेल करके उनके काफिलों में शामिल हो जाना। 'सोथा' दल के किसी काफिले में शामिल हो जाने के बाद 'भटोट' नामक दल भी 'सोथा' की सहायता से उस काफिले में शामिल हो जाया करता था। 'भटोट' दल के सदस्यों का कार्य शिकार के गले में पैसे बंधे रेशमी रूमाल से फाँसी डालना। गिरोह के नए रंगरूटों के दल को 'कबूला' कहा जाता था और इनका काम मुर्दों को रफा-दफा करना हुआ करता था। शिकार को फाँसी लगाते समय उनकी सहायता के लिए तत्पर रहने वालों के दल को 'समासिया' कहा जाता था। 'लगाई' नाम के दल के लोगों का काम होता था फाँसी के लिए नियत स्थान के पास पहले से ही कब्रें खोद कर तैयार रखना। कहाँ पर कौन आकर काफिले में शामिल होगा और किस स्थान पर शिकारों को फाँसी दी जाएगी ये सारी बातें पूर्व से ही योजनाबद्ध हुआ करती थीं। फाँसी देने के लिए संकेत नियत रहता था, दल के सरदार के द्वारा संकेत देने को 'झिलूम देना' कहा जाता था। जहाँ पर शिकारों को फाँसी देना होता था उस स्थान पर डेरा डलवा दिया जाता था। फाँसी देने का समय नियत होता था और उस समय काफिले के प्रत्येक व्यक्ति के साथ एक-एक ठग हो जाया करते थे। ज्योंही सरदार "पान लाओ" जैसी कोई पूर्व-नियत बात कहकर झिलूम देता था, शिकारों के गले फाँसी से कस जाया करते थे।

इन ठगों के अनेक प्रकार के समुदाय हुआ करते थे। "मेघपूना" नामक ठगों का एक समुदाय केवल बच्चों के अपहरण का कार्य किया करता था। अवसर आने पर विभिन्न समुदाय एक साथ मिलकर काम किया करते थे। अपढ़ तथा गँवार लोगों के साथ पढ़े-लिखे व्यक्ति भी ठगों के इन गिरोहों में हुआ करते थे।

देखा जाए तो अठारहवीं शताब्दी का वह काल भारत के लिए सर्वत्र अराजकता का काल था। बादशाह का पतन हो चुका था और राजे और नवाब अपने राज्य को बढ़ाने के लिए एक दूसरे से युद्ध किया करते थे। पिण्डारी और रुहेले के दल सरे आम गाँवों और कस्बों को लूट लिया करते थे और ठग सैकड़ों तथा हजारों की तादाद में लोगों की हत्या कर दिया करते थे। राजाओ-नवाबों के आपसी युद्ध का फायदा अंग्रेजों ने खूब उठाया और भारत के अधिपति बन बैठे थे। ठगों के इन गिरोहों ने ये अंग्रेज शासकों के नाक में दम कर रखा था इसलिए अंग्रेजी शासन ने ठगों के गिरोहों के उन्मूलन को अपना प्रथम लक्ष्य बना लिया था और कर्नल स्लीमेन (colonel slimane) की अध्यक्षता में बने ठग उन्मूलन कमीशन ने चुन-चुन कर ठगों का सफाया कर डाला।

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सूचनाः

यात्रा एवं पर्यटन से सम्बन्धित जानकारी देने के उद्देश्य से मैंने "यात्रा एवं पर्यटन" नामक एक नया ब्लोग बनाया है और आशा करता हूँ वह आप सभी को पसंद आयेगा।

देखें "यात्रा एवं पर्यटन" का पहला पोस्ट - मांडू (माण्डवगढ़)

Thursday, August 19, 2010

अपना अलेक्सा रैंक देखा तो पता चला की हमारा ब्लोग 31 जुलाई 2000 से आनलाइन है

हम ब्लोग की दुनिया में कब, क्यों और कैसे आए यह बिल्कुल भूल चुके हैं। आज एकाएक विचार आया कि अपने ब्लोग का अलैक्सा रैंक देख लिया जाए। देखा तो पाया कि अलैक्सा में हमारे ब्लोग का विश्व रैंक 408,205 और भारत रैंक 39,420 है। हमारे लिए यह एक संतुष्टि की बात थी किन्तु अधिक प्रसन्नता यह देखकर हुई कि हमारा ब्लोग हमारा ब्लोग 31 जुलाई 2000 से आनलाइन है; हम तो भूल ही चुके थे कि हमने अपना ब्लोग कब बनाया था।



यदि आप अपने ब्लोग का अलैक्सा रैंक देखना चाहें तो http://www.alexa.com/ में जाकर देख सकते हैं।

अपना अलैक्सा रैंक देख लेने के बाद उत्सुकता हुई कि जाने माने ब्लोग्स के भी अलैक्सा रैंक देखा जाए, जिसका परिणाम यह प्राप्त हुआः

ब्लोगचिट्ठा जगत सक्रियताअलैक्सा विश्व रैंकिंगअलैक्सा भारत रैंकिंग
ताऊ डॉट इन1357,76638,787
उडन तश्तरी2493,35551,392
मानसिक हलचल3561,64867,046
लोक संघर्ष41,672,515257,948
हिन्दी युग्म5213,30416,611
ज्ञान दर्पण6173,98714,569
हिन्दी ब्लाग टिप्स7448,90256,969
फ़ुरसतिया8770,58099,378
छींटे और बौछारें9512,89356,374
ललित डॉट कॉम10358,75129,459


याने कि अलेक्सा रैकिंग के अनुसार उपरोक्त ब्लोग्स का क्रम हुआः

क्रमांकब्लोगविश्व रैंकिगइंडिया रैंकिग
1.ज्ञान दर्पण173,98714,569
2.हिंदी युग्म213,30416,611
3.ताऊ डॉट इन357,76638,787
4.ललित डॉट कॉम358,75129,459
5.उड़न तश्तरी493,35551,392
6.हिन्दी ब्लाग टिप्स448,90256,969
7.छींटे बौछारें512,89356,374
8.मानसिक हलचल561,64867,046
9.फ़ुरसतिया770,58099,378
10.लोक संघर्ष1,672,515257,948

तुलसी का पुनः भारत आगमन

(स्व. श्री हरिप्रसाद अवधिया रचित कविता)

भक्ति के प्रभाव से निष्कपट मुक्ति भाव से
संत तुकाराम सदेह स्वर्ग को सिधारे
किन्तु तुलसीदास समय के अन्तराल को
पार कर सदेह ही भारत में पुनः पधारे
सम्वत् सोलह सौ अस्सी बाद सन (उन्नीस सौ) पच्यासी में
धर्म दशा देखने पहुँचे दिल्ली द्वारे
जनता के मन में 'मानस' के प्रति कुछ रहे न रहे
गूँज रहे थे धर्म निरपेक्षता के नारे।

फिर तुलसीदास ने काशी में जा कर देखा
तो अपनी धर्म नगरी को ज्यों का त्यों पाया
लेकिन रह गये दंग रंग देख पण्डों का
फैली थी सब तरफ भंग दण्ड की माया
और प्रयागराज के भरद्वाज आश्रम में
रामायण के बदले 'सत्यकथा' को पाया
भक्ति प्रदर्शित करती थीं महिलाएँ सब
परम पवित्र थी उनकी कंचन काया।

अपने ही कलियुग वर्णन को तुलसी ने
यत्र-तत्र-सर्वत्र साकार रूप में देखा
भारत में धोती-साड़ी गायब थी जनता की
लगा न सके वे पेंट-कोट ब्लाउज का लेखा
सोचा तुलसी ने अंग्रेजी में मानस लिख दूँ
जिसमें कहीं भी न पाई जावे लक्ष्मण रेखा
काम हमारा यह होगा भारत के हित में
गड़ रहा जहाँ नित कान्वेण्ट का मेखा।

अपनी इस भारत यात्रा में तुलसी जी ने
देखे अनगिनती डिप्लोमेटिक रावण
हर घर में थी अशोक वाटिका सुशोभित
थिरक रहा था दहेज दैत्य का नर्तन
'मोहि कपट छल छिद्र न माया' कह कर
लाद दिया था मानव पर रूखा बन्धन
इसीलिये गायब थे तुलसी के राम यहाँ
पनप रहा था प्रवंचना का काला धन

सन्तों को बने असन्त देखा दास तुलसी ने
गाते अपनी डफली पर अपना राग
आतंक, त्रास, उग्रता, पशुता और नीचता,
जगा चुके थे सभी अपना अपना भाग
पुण्य भूमि में सन्तों को भी दुष्टों ने ललकारा
विचरण करते तुलसी ने देखे अनेकों नाग
अपने ही वर्णित कलियुग वर्णन को साकार देख
तुलसीदास चले गये भारत को त्याग।

(रचना तिथिः 22-08-1985)

Tuesday, August 17, 2010

अमूमन हम सभी झूठ बोलते हैं।

हमारे मोबाइल की घंटी बजी। अरे यह तो गुप्ता जी की काल है। तीन माह पहले हमने तीन दिनों के भीतर वापस करने का वादा करके जो उनसे पाँच सौ रुपये उधार लिए थे, जरूर उसी के लिये फोन किया होगा। हमने लड़के को मोबाइल देते हुए उससे कहा, "बेटे, गुप्ता अंकल को कह दो कि पापा घर में नहीं हैं।"

जी हाँ, अमूमन हम सभी झूठ बोलते हैं। कोई कर्ज के तगादे से बचने के लिए झूठ बोलता है, कोई अपने बॉस या अधिकारी से अपनी गलती छिपाने के लिए झूठ बोलता है तो कोई महबूबा की नजरों में चढ़ने के लिए झूठ बोलता है। फिल्म "जॉनी मेरा नाम" का एक संवाद याद आ रहा है जिसमें देवानंद ने ऐसा ही एक झूठ बोला थाः

"..... लेकिन जब दरवाजा खुला तो मैं दंग रह गया। दो हसीन आँखें मुझे देख रही थीं और दिल धड़क-धड़क कर कह रहा था कि जॉनी बेटे तरी मंजिल यही पर है, लेकिन याद रख कि अगर इन्हे मालूम हो गया कि तू चोर है, उचक्का है, छोटी छोटी चोरयों के इल्जाम में जेल जा चुका है और हाल ही में जेल तोड़कर आया है तो इन आँखों मे तेरे लिए सिवाय नफरत के कुछ भी ना होगा .... बस फिर क्या था बात बात में मुँह से झूठ निकलने लगा..."

कभी परिस्थितियाँ हमें विवश करती हैं झूठ बोलने के लिये तो कभी हमारे ही बनाये नियम-कायदे हम से झूठ बोलवाते हैं।

हमारे जीवन में ऐसी अनेकों परिस्थितियाँ आती हैं कि झूठ बोलना हमारे लिये मज़बूरी हो जाती है। अब जरा सोचिये कि आप अपनी प्रेमिका (यदि आप महिला हैं तो प्रेमी समझ लें) से छुप कर मिलने जा रहे हैं। इस बीच रास्ते में यदि कोई परिचित मिल जाये और पूछे कि कहाँ जा रहे हो तो क्या करेंगे आप? झूठ ही तो बोलेंगे न?

नियम-कानून का तो कहना ही क्या। ये तो हमसे सबसे ज्यादा झूठ बोलवाते हैं। छुट्टी के लिये आवेदन पत्र में आप कारण 'परिवार के साथ सिनेमा जाना है' तो नहीं लिख सकते न? 'तबियत खराब है' जैसा कोई झूठा कारण ही लिखना पड़ेगा। हम एक ऐसे सज्जन को जानते हैं जिन्होंने छुट्टियाँ लेने के लिये अपने ससुराल पक्ष के अनेकों रिश्तेदारों को मार डाला है। जबकि जानने वाले जानते हैं कि अभी तक उनकी शादी ही नहीं हुई है। पता नहीं जब उनकी शादी होगी तो फिर क्या झूठ बोलकर छुट्टी लेंगे?

कुछ लोगों को दूसरों की परेशानी देख कर मजा आता है। ऐसे लोग दूसरों से इसलिये झूठ बोल देते हैं ताकि वे परेशान हो जायें और उनकी परेशानी का आनन्द उठाया जा सके।

हमारे परिचितों में एक सज्जन तो ऐसे हैं जो सिर्फ झूठ ही बोलते हैं। लगता है कि कभी भूल से वे सच बोल देंगे तो उनका खाना ही हजम नहीं होगा या फिर डॉक्टर ने उन्हें सच बोलने से मना किया हुआ है।

इस झूठ ने तो धर्मराज युधिष्ठिर को भी नहीं छोड़ा था। उन्हें 'अश्वत्थामा हतो' कहना ही पड़ा था। यह बात अलग है कि बाद में 'नरो वा कुंजरो' कह कर उन्होंने अपने झूठ की लीपा-पोती कर दी थी।

झूठ का एक और रूप भी होता है - बात को इस प्रकार से गोल-गोल कहना कि उसका स्पष्ट अर्थ ही न निकले। झूठ के इस रूप का प्रयोग व्यापक तौर से होता है। और भला क्यों न हो। जब देवर्षि नारद जी ने विश्वमोहिनी से ब्याह करने की कामना से भगवान विष्णु से उनका रूप माँगा था तो विष्णु जी ने भी तो झूठ के इसी रूप का प्रयोग किया था -

"कुपथ माग रुज ब्याकुल रोगी। बैद न देइ सुनहु मुनि जोगी॥
एहि बिधि हित तुम्हार मैं ठयऊ। कहि अस अंतरहित प्रभु भयऊ॥"


उपरोक्त सभी झूठों के अलावा एक झूठ और भी होता है - वह है किसी के कल्याण के लिये झूठ बोलना और इस प्रकार के झूठ को पावन झूठ की संज्ञा दी जा सकती है।

Monday, August 16, 2010

टिप्पणी और पठन के खेल निराले मेरे भैया .....

आज दिनांक 16-08-10 को सुबह लगभग 9.15 बजे चिट्ठाजगत के धड़ाधड़ टिप्पणियाँ और धड़ाधड़ पठन हॉट लिस्टः

क्र.धड़ाधड़ टिप्पणियाँधड़ाधड़ पठन
1.जिसे सर झुकाती है हिंन्द सारी .......स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनओं [35]ये आजादी भी कोई आजादी है लल्लू! [66]
2.स्वाधीनता दिवस पर … क्या यही है स्वतंत्रता! [21]ग़ुरबत के हिस्से की चिल्हर धूप लॉकर में रख छोड़ी है जिन्होंने...! [65]
3.सफ़र [19]वर्ष के श्रेष्ठ ब्लोगर का सम्मान,वर्ष की श्रेष्ठ महिला ब्लोगर का सम्मान [57]
4.नया सफ़र ........एक नए चेहरे के [18]स्वतंत्रता की नई चादर फिर से बुननी होगी… [57]
5.स्वतंत्रता की नई चादर फिर से बुननी होगी… [16]रिविज़न ज़िन्दगी [53]
6.आज़ादी ..... [16]साहित्य में अश्लीलता की छौंक...... छिनरपन वाली 'फँसा-फँसी'........रेणु जी का बावनदास......और हमारी बौद्धिक अय्याशीयों के बीच परोसी गई एक साहित्यिक थाली............सतीश पंचम [53]
7.“अपनी आजादी” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”) [15]"चिरकुटाई की डेमोक्रेसी' [52]
8.मुद्दतों बाद…. [15]मैं नत-मस्तक हूँ .... [47]
9.स्वाधीनता दिवस पर … आज का ही दिन बस स्वतंत्र है! [14]चिंदी-चिंदी बीनती, फिर भी नहीं हताश [44]
10.क्या हम आज एक-दूसरे को बधाई देने के हक़दार है...खुशदीप [14]मुझमे तुम सा... [44]
11.तुलसी जयन्ती पर युगद्रष्टा कवि को श्रद्धा सुमन: कबीर तुलसी श्रीराम त्रयी और मानस का बोनस -2 [14]जन्म कुंडली देखे बिना पता करे , सरकारी नौकरी का योग [41]
12.वन्दे मातरम्... [14]सूनापन [41]
13.मुझमे तुम सा... [14]हिंदी ब्‍लॉग जगत के सभी लेखकों और पाठकों को स्‍वतंत्रता दिवस की असीम शुभकामनाएं ..... [40]
14.दिस प्रोग्राम इस स्पोन्सर्ड बाय...........! [13]वन्दे मातरम्... [39]
15.हम सिर्फ बोलते जाते हैं [13]ऐसे आंदोलनों का दबना अब मुश्किल [39]
16.आप सभी को स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनये। [13]बिहारक सभ जिला सूखाग्रस्त घोषित... [37]
17.चिंदी-चिंदी बीनती, फिर भी नहीं हताश [13]कुछ वतन की बात करें [37]
18.राष्ट्रीयता अस्मिता और आजादी की वर्षगाँठ [13]स्वाधीनता दिवस पर … क्या यही है स्वतंत्रता! [36]
19.ब्लॉगिंग का एक साल और आपका साथ (1)...खुशदीप [12]नया सफ़र ........एक नए चेहरे के [34]
20.मैं नत-मस्तक हूँ .... [12]आप सभी को स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनये। [34]
21.पन्द्रह अगस्त - कुछ यादें मेरी..कुछ नयी बातें, कुछ पुरानी बातें [12]स्वतंत्रता दिवसक हार्दिक शुभकामना... [34]
22.साहित्य में अश्लीलता की छौंक...... छिनरपन वाली 'फँसा-फँसी'........रेणु जी का बावनदास......और हमारी बौद्धिक अय्याशीयों के बीच परोसी गई एक साहित्यिक थाली............सतीश पंचम [11]ब्लॉगिंग का एक साल और आपका साथ (1)...खुशदीप [33]
23.ग़ुरबत के हिस्से की चिल्हर धूप लॉकर में रख छोड़ी है जिन्होंने...! [11]क्या हमारा मन आज़ाद है ? - सतीश सक्सेना [33]
24.सूनापन [11]Sacrifices of muslim ulema हज़रत मौलाना क़ासिम नानौतवी साहब रहमतुल्लाह अलैह ने तैयार की थी फ़ौज - Anwer Jamal [33]
25.मेला फिर! [11]परमात्मा की पुकार [32]
26.हिन्दुस्तान है हमारा, हम है इसकी शान, दिल [11]पन्द्रह अगस्त - कुछ यादें मेरी..कुछ नयी बातें, कुछ पुरानी बातें [32]
27.ये आजादी भी कोई आजादी है लल्लू! [10]क्या हम आज एक-दूसरे को बधाई देने के हक़दार है...खुशदीप [31]
28.स्वतंत्रता के छह दशक-क्या खोया क्या पाया -राजीव तनेजा [9]तुम हो स्वतंत्र तुम हो स्वतंत्र [31]
29.Sacrifices of muslim ulema हज़रत मौलाना क़ासिम नानौतवी साहब रहमतुल्लाह अलैह ने तैयार की थी फ़ौज - Anwer Jamal [9]ये देश बस दो ही दिन याद आता है....अमित [31]
30.बुढापा, कोई लेवे तो थने बेच दूं॥[9]पिन कोड 273010, एक अधूरा प्रेमपत्र - 12 [31]
31.ये साकी से मिल, हम भी क्या कर चलेकि प्यास [9]जिसे सर झुकाती है हिंन्द सारी .......स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनओं [31]
32.रिविज़न ज़िन्दगी [9]आज़ादी ..... [31]
33.सितारों की महफ़िल में आज श्री समीर लाल समीर जी [8]बाऊजी : एक स्वयंनिर्मित व्यक्तित्व आज [31]
34.आतंकवादी की फरमाईश पर ग़ज़ल-2 [8]मेला फिर! [30]
35.स्‍वतंत्रता दिवस विशेषांक :-२ - ब्‍लॉग4वार्ता - शिवम् मिश्रा [8]पवन के कार्टून... [30]
36.क्या हमारा मन आज़ाद है ? - सतीश सक्सेना [8]आधी आबादी की इन्साफ की लड़ाई और शबाना आजमी [29]
37.हिंदी ब्‍लॉग जगत के सभी लेखकों और पाठकों को स्‍वतंत्रता दिवस की असीम शुभकामनाएं ..... [7]हम सिर्फ बोलते जाते हैं [29]
38.जन्म कुंडली देखे बिना पता करे , सरकारी नौकरी का योग [7]आइए दीर्घायु व कैंसर से मुक्ति के लिए धूम्रपान करें. [28]
39.पीर पराई समझ सको तो जीवन भर आजाद रहोगे..वरना तुम बर्बाद रहोगे. [6]“अपनी आजादी” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”) [28]
40.वन्दे मातरम [6]हिन्दुस्तान है हमारा, हम है इसकी शान, दिल [28]

हॉटलिस्ट तो एक ही संकलक के हैं किन्तु पहले हॉटलिस्ट का पहला नंबर का पोस्ट दूसरे हॉटलिस्ट में 31वें नंबर पर है जबकि दूसरे हॉटलिस्ट का पहला नंबर का पोस्ट पहले हॉटलिस्ट में 27वें नंबर पर है।

चलते-चलते

भारत कब स्वतन्त्र हुआ था?

कल स्वतन्त्रता दिवस के अवसर पर सहारा चैनल ने एक सर्वे किया जिसमें सार्वजनिक स्थानों में उपस्थित या राह चलते आदमियों से कुछ प्रश्न किए गये जो कि राष्ट्र, फिल्म, क्रिकेट आदि से सम्बन्धित थे।

परिणाम आश्चर्यजनक था! फिल्मों तथा क्रिकेट से सम्बन्धित कठिन से कठिन सवालों का जवाब अधिकतर लोगों ने आसानी के साथ दे दिया किन्तु राष्ट्र से सम्बन्धित प्रश्नों के उत्तर वे नहीं दे पाये।

उदाहरण के लिये कुछ प्रश्न तथा दिए गए उत्तरः

प्र. हमारा देश कब आजाद हुआ था?
उ. आज के दिन ही आजाद हुआ था किन्तु किस वर्ष यह हमें नहीं पता।

प्र. महात्मा गांधी की पत्नी का क्या नाम था?
उ. नहीं मालूम।

प्र. "जय जवान जय किसान" नारा किसने दिया था।
उ. नहीं पता।

Sunday, August 15, 2010

ये आजादी भी कोई आजादी है लल्लू!

हजार से अधिक सालों से लुटती रही है भारत माता। परतन्त्रता की बेड़ियों में जकड़ी जाने के पूर्व भी अनेक बार उसे यवन और तुर्क लूट कर चले गए, फिर वह परतन्त्रता की बेड़ियों में जकड़ी गई और उस दौरान मुगलों और मलेच्छों ने लूटा और अब जबकि आजादी मिल चुकी है तो उसे उसके अपने ही (क)पूत उसे लूट कर उसकी धन-सम्पदा को विदेश (स्विस बैंकों) में भेज रहे हैं।

शायद लुटते रहना ही भारत माता की नियति है!

सन् 712 में मोहम्मद बिन कासिम ने सिंध पर आक्रमण कर उसे लूटा।

सन् 1000-1027 के बीच महमूद गज़नवी ने सोमनाथ मन्दिर, जो कि सैकड़ों देवदासियों के घुँघरूओं की ध्वनि से सदा गुंजित रहता था और जिसके ऐश्वर्य तथा वैभव की महिमा दिग्-दिगन्त तक फैल गई थी, पर 17 बार आक्रमण कर उसे लूटा।

सन् 1175 में मुल्तान पर आक्रमण कर मोहम्मद गोरी ने उसे लूटना शुरू किया और अन्ततः उसने उसे परतन्त्रता की बेड़ियाँ में ही जकड़ दिया।

अनेक बार लुटने के बावजूद भी भारत माता की अकूत धन सम्पदा में किंचित मात्र भी कमी नहीं आई। सोने की चिड़िया कहलाती थी वह! दूध-दही की नदियाँ बहती थीं उसकी भूमि में! रत्नगर्भा वसुन्धरा थी उसके पास! शाहजहाँ और औरंगजेब का जमाना आने तक न जाने कितने बार लुट चुकी थी वह पर उसकी अपार सम्पदा वैसी की वैसी ही बनी हुई थी। इस बात का प्रमाण यह है कि दुनिया का कोई भी इतिहासज्ञ शाहजहाँ की धन-दौलत का अनुमान नहीं लगा सका है। उसका स्वर्ण-रत्न-भण्डार संसार भर में अद्वितीय था। तीस करोड़ की सम्पदा तो उसे अकेले गोलकुण्डा से ही प्राप्त हुई थी। उसके धनागार में दो गुप्त हौज थे। एक में सोने और दूसरे में चाँदी का माल रखा जाता था। इन हौजों की लम्बाई सत्तर फुट और गहराई तीस फुट थी। उसने ठोस सोने की एक मोमबत्ती, जिसमें गोलकुण्डा का सबसे बहुमूल्य हीरा जड़ा था और जिसका मूल्य एक करोड़ रुपया था, मक्का में काबा की मस्जिद में भेंट की थी। लोग कहते थे कि उसके पास इतना धन था कि फ्रांस और पर्शिया के दोनों महाराज्यों के कोष मिलाकर भी उसकी बराबरी नहीं कर सकते थे। सोने के ठोस पायों पर बने हुए तख्त-ए-ताउस में दो मोर मोतियों और जवाहरात के बने थे। इसमें पचास हजार मिसकाल हीरे, मोती और दो लाख पच्चीस मिसकाल शुद्ध सोना लगा था, जिसकी कीमत सत्रहवीं शताब्दी में तिरपन करोड़ रुपये आँकी गई थी। इससे पूर्व इसके पिता जहांगीर के खजाने में एक सौ छियानवे मन सोना तथा डेढ़ हजार मन चाँदी, पचास हजार अस्सी पौंड बिना तराशे जवाहरात, एक सौ पौंड लालमणि, एक सौ पौंड पन्ना और छः सौ पौंड मोती थे। शाही फौज अफसरों की दो हजार तलवारों की मूठें रत्नजटित थीं। दीवाने-खास की एक सौ तीन कुर्सियाँ चाँदी की तथा पाँच सोने की थीं। तख्त-ए-ताउस के अलावा तीन ठोस चाँदी के तख्त और थे, जो प्रतिष्ठित राजवर्गी जनों के लिए थे। इनके अतिरिक्त सात रत्नजटित सोने के छोटे तख्त और थे। बादशाह के हमाम में जो टब सात फुट लम्बा और पाँच फुट चौड़ा था, उसकी कीमत दस करोड़ रुपये थी। शाही महल में पच्चीस टन सोने की तश्तरियाँ और बर्तन थे। वर्नियर कहता है कि बेगमें और शाहजादियाँ तो हर वक्त जवाहरात से लदी रहती थीं। जवाहरात किश्तियों में भरकर लाए जाते थे। नारियल के बराबर बड़े-बड़े लाल छेद करके वे गले में डाले रहती थीं। वे गले में रत्न, हीरे व मोतियों के हार, सिर में लाल व नीलम जड़ित मोतियों का गुच्छा, बाँहों में रत्नजटित बाजूबंद और दूसरे गहने नित्य पहने रहती थीं।

पन्द्रहवीं शताब्दी में वास्को-डि-गामा के भारत पहुँचने के साथ ही भारत के अकूत धन-सम्पदा की ख्याति यूरोपीय देशों में पहुँच गई और हिन्द महासागर यूरोपीय समुद्री डाकुओं से भर गया। सोलहवीं और सत्रहवीं शताब्दियों में यूरो के सभी देशों के साहसिकवर्गी लोग और व्यापारी हिन्द महासागर में अपने पुश्तैनी डाकेज़नी का धंधा करने लगे। ज्यों-ज्यों भारतीय व्यापार की वृद्धि होती गई, त्यों-त्यों विभिन्न यूरोपीय समुद्री डकैत हिन्द महासागर में भरते चले गए।

सत्रहवीं शताब्दी के आरम्भ में पुर्तगालियों ने भारत में लूट-खसोट करना शुरू कर दिया और बम्बई के टापू, मंगलौर, कंचिन, लंका, दिव, गोआ आदि को हथिया कर उनके मालिक बन बैठे। भारतीय जलमार्ग के नक्शे मिलने के तीस साल बाद सन् 1608 में पहला अंग्रेजी जहाज 'हेक्टर' सूरत की बन्दरगाह पर आकर लगा। उन दिनों सूरत का बन्दरगाह भारतीय विदेशी व्यापार का बड़ा भारी केन्द्र था। जहाज का कप्तान हाकिन्स पहला अंग्रेज बच्चा था जिसने प्रथम बार भारत की भूमि का स्पर्श किया। उसके बाद तो अंग्रेजों ने व्यापार का बहाना कर के भारत में ऐसा लूट-खसोट मचाना शुरू किया की ईस्ट इंडिया कंपनी इस देश की मालिक ही बन बैठी। सही अर्थों में भारत माता को इन फिरंगियों ने ही लूटा और इस अकूत धन-सम्पदा की स्वामिनी को दरिद्रता की श्रेणी में लाकर रख दिया।

बावजूद इस सब के आज भी भारत माता के पास कुछ भी कमी नहीं है किन्तु अब इसे इसके स्वयं के बेटे, जिन्होंने इसके टुकड़े तक कर डाले, ही लूट रहे हैं।

अपनी आजादी को देखकर आज भारत माता के मन में यही विचार उठते होंगे कि "ये आजादी भी कोई आजादी है लल्लू!"

(इस पोस्ट में महत्वपूर्ण जानकारी और आँकड़े आचार्य चतुरसेन के उपन्यास "सोना और खून" से साभार लिए गए हैं।)

Saturday, August 14, 2010

14 अगस्त - आज के दिन ही देश के टुकड़े हुए थे

विभाजन पूर्व भारत

(चित्र नेशनल ज्योग्रफिक से साभार)

विभाजन पश्चात् भारत

(चित्र स्रोतः http://www.columbia.edu/itc/mealac/pritchett/00maplinks/modern/maps1947/aftermax.gif)

महात्मा गांधी ने विभाजन के पूर्व हिन्दुओं से अनुरोध किया था कि वे अपना घर बार छोड़ कर कहीं न जाएँ क्योंकि देश का विभाजन नहीं होगा। भरी सभा में उनका कथन था - "यदि पाकिस्तान बनेगा तो मेरी लाश पर बनेगा"

(चित्र स्रोतः http://www.hindu.com/th125/gallery/thim001.htm)

विभाजन के दौरान हुए दंगों में मारे गये लोगों की लाशों का ढेर

(चित्र स्रोतः http://news.bbc.co.uk/2/shared/spl/hi/pop_ups/06/south_asia_india0s_partition/html/7.stm)

दंगों में मारे गये लोगों का सामूहिक अग्नि संस्कार

(चित्र स्रोतः http://news.bbc.co.uk/2/shared/spl/hi/pop_ups/06/south_asia_india0s_partition/html/9.stm)

पाकिस्तान से भारत आने वाली रेलगाड़ी

(चित्र स्रोतः http://www.hindu.com/th125/gallery/thim004.htm)

दिल्ली से पाकिस्तान जाने वाली रेलगाड़ी

(चित्र स्रोतः http://en.wikipedia.org/wiki/File:Train-to-pakistan-delhi1947.jpg)

शरणार्थी शिविर

(चित्र स्रोत http://www.columbia.edu/itc/mealac/pritchett/00routesdata/1900_1999/partition/camps/camps.html)

एक और शरणार्थी शिविर

(चित्र स्रोत http://www.columbia.edu/itc/mealac/pritchett/00routesdata/1900_1999/partition/camps/camps.html)

पंजाब उच्च न्यायालय के एक न्यायमूर्ति श्री जी.डी. खोसला की पुस्तक ‘‘The stern Reckoning’’ पुस्तक से कुछ उद्धरण:

गाड़ियाँ भर-भरकर निर्वासितों के दल हिन्दुस्तान आने लगे। उसका ब्यौरा भी हृदय विदीर्ण करने वाला है। वह भयाक्रान्त मानवता का बड़ा प्रवाह बह रहा था। डिब्बों में साँस लेने जितना भी स्थान न था। डिब्बों की छत पर बैठकर भी लोग आते थे। पश्चिमी पंजाब के मुसलमानों का आग्रह था कि लोगों का स्थानान्तरण होना चाहिए, परन्तु वह इतने सीधे, बिना किसी छल के हो, यह उन्हें नहीं भाता था। इन हिन्दुओं के जाते समय भयानकता, क्रूरता, पशुता अमानुषता, अवहेलना आदि भावों का अनुभव मिलना ही चाहिए, ऐसी उनकी सोच थी। उसी के अनुसार उनका व्यवहार था।

(छेदक 12 ए 9)

किसी स्टेशन पर गाड़ी घण्टों ठहरती थी। उस विलम्ब का कोई कारण न था। पानी के नल तोड़ दिए गए थे। अन्न अप्राप्य किया जाता था। छोटे बच्चे भूख और प्यास से छटपटा कर मरते थे। यह तो सदा का अनुभव बना था। एक अधिकृत सूचना के अनुसार माता-पिताओं ने अपने बच्चों को पानी के स्थान पर अपना मूत्र दिया, किन्तु यह भी उनके पास होता तो ! निर्वासितों पर हमले हुआ करते थे। उनको ले जाने वाले ट्रक और लारियाँ रास्ते में रोकी जाती थीं। लड़कियाँ भगायी जाती थीं। जो युवावस्था में थीं, ऐसी लड़कियों पर बलात्कार हुआ करते थे। वे भगायी भी जाती थीं और दूसरे लोगों की हत्या की जाती थी। यदि कोई पुरुष बच जाए, उसे अपने प्राण बच गए, यह मानकर ही संतुष्ट रहना पड़ता था।

(छेदक 12 ए 10)

निर्वासितों का काफिला झुण्ड की भाँति चल रहा था। वृद्ध पुरुषों तथा स्त्रियों का चलते-चलते दम घुट जाता था। वे मार्ग के किनारे मरने के लिए ही छोड़े जाते थे। काफिला आगे बढ़ जाता था। उनकी देखभाल करने का किसी के पास समय न होता था। रास्ते शवों से भरे थे। शव गल जाते थे। उनसे दुर्गन्ध फैलती थी। कुत्ते और गिद्ध उन्हें अपना भोजन बनाते थे। ऐसे समूह मानो मनुष्य की पराभूत चित्त की, शोक विह्वल और अगनित मन की अन्त्ययात्रा ही थी।

(छेदक 12 ए 11)

अल्पसंख्यकों का बरबस निष्कासन करना, यही मुस्लिम लीग और पाकिस्तान की रचना को प्रोत्साहित करने वालों का मन्तव्य था। अतएव उन लोगों से सद्व्यवहार, सहानुभूति अथवा सुविधाओं की अपेक्षा करना अर्थहीन था। उनके सैनिक और आरक्षीगण (पुलिस) उनके यात्रारक्षी दल प्रायः मुसलमान थे। उनसे निर्वासितों को रक्षण मिलना असंभव ही था। निर्वासितों को भी उन पर विश्वास न था। क्योंकि उन्हें रक्षण देने की अपेक्षा, अपने धर्मबन्धुओं द्वारा चलाए लूटपाट के अभियान में हाथ बंटाने का उन्हें अधिक मोह हुआ करता था।

(छेदक 12 ए 12)

पश्चिमी पंजाब से आई निर्वासितों की गाड़ियों पर कई हमले हुआ करते थे, किन्तु 14 अगस्त, 1947 के पश्चात् जो हमले हुए, वे अत्यधिक क्रूरतापूर्वक थे। सितम्बर में झेलम जिले के पिंडदादनखान गाँव से चल पड़ी गाड़ियों पर तीन स्थानों पर आक्रमण हुए। दो सौ स्त्रियों को या तो मारा गया या भगाया गया था। वहाँ से निकली गाड़ी पर वजीराबाद के पास हमला हुआ। वह गाड़ी सीधे रास्ते से लाहौर जाने के बजाय टेढ़े रास्ते सियालकोट की ओर घुमायी गयी। यह सितम्बर में हुआ। अक्टूबर में सियालकोट से आने वाली एक गाड़ी पर ऐसा ही अत्याचारी प्रयोग किया गया, किन्तु जनवरी, 1948 में बन्नू से निकली गाड़ी पर गुजरात स्थानक पर विशेष रूप से क्रूर हमला हुआ। हिन्दुओं का घोर संहार हुआ। उसी गाड़ी पर खुशाब स्थानक पर भी हमला हुआ। सरगोधा और लायलपुर के रास्ते वह गाड़ी सीधी लाहौर लाई जाने के बजाय खुशाब, मालकवाल, लालामोसा गुजरात और वजीराबाद जैसे दूर के मार्ग से लाहौर लाई गई। बिहार का सैनिकदल यात्रारक्षा के लिए नियुक्त किया गया था, उन पर भी शस्त्रधारी पठानों ने हमला किया था, गोलियाँ बरसायी थीं। यात्रारक्षी दल ने प्रत्युत्तर में गोली चलायी, किन्तु शीघ्र ही उनका गोला बारुद समाप्त हो गया। जैसे ही पठानों को यह भान हुआ, तीन सहस्त्र पठानों ने गाड़ी पर हमला कर दिया। पाँच सौ लोगों को कत्ल कर दिया। यात्री अधिकतर बन्नू की ओर के थे और उनमें से कुछ धनवान थे। उनको लूट लिया गया। यह सब जनवरी, 1948 में हुआ।

(छेदक 12 ए 13)

(कोटेड सामग्री http://pustak.org/bs/home.php?bookid=4418 से साभार)

देश का विभाजन एक दुर्भाग्यपूर्ण घटना थी। विभाजन एक ऐसा घाव है जो हमेशा हमेशा के लिए नासूर बन कर रह गया है।

Friday, August 13, 2010

हिन्दू-मुस्लिम में परस्पर प्रेम और सौहार्द्र

इतिहास गवाह है कि हिन्दू-मुस्लिम में परस्पर प्रेम और सौहार्द्र हमेशा था और आज भी है! इस प्रेम और सौहार्द्र का एक बेमिसाल मिसाल देते हुए आचार्य चतुरसेन जी अपने उपन्यास "सोना और खून" में लिखते हैं:

रात को मियाँ पलंग पर दराज़ हुए तो उनका खास खिदमतगार पीरू पलंग के पाँयते बैठकर उनके पैर दबाने लगा। हमीद ने पेचवान जँचा कर रख दिया। मियाँ ने हुक्के में एक-दो कश लिए और हमीद को हुक्म दिया कि छोटे मियाँ जग रहे हों तो उन्हे जरा भेज दो।

बड़े मियाँ का सन्देश पाकर छोटे मियाँ ने आकर पिता को आदाब किया। बड़े मियाँ ने हुक्के की नली मुँह से हटाकर कहा, "अहमद, कल अलसुब्बह ही मुक्तेसर चलना है। तुम भी चले चलना जरा।"

"मेरा वहाँ क्या काम है?"

."काम नहीं, चौधरी बहुत याद करते हैं तुम्हें। जब-जब जाता हूँ तभी पूछते हैं। भई एक ही नेक-खसलत रईस हैं।"

"लेकिन अब्बा हुजूर, मुझे तो वहाँ जाते शर्म आती है।"

"शर्म किसलिए बेटे?"

"हम लोग उनके कर्जदार हैं, और इस बार भी आप इसी मकसद से जा रहे हैं।"

"तो क्या हुआ! सूद उन्हें बराबर देते हैं और रियासत पर कर्जा लेते हैं। फिर चौधरी ऐसे शरीफ हैं कि आँखें ऊँची कभी करते देखा नहीं। हमेशा 'बड़े भाई' कहते हैं। ........ और हाँ, एक टोकरा अमरूद और सफेदा, उम्दा चुनकर रख लेना मियाँ पीरू, तुम चले जाओ अभी इसी वक्त बाग में।"

पीरू सिर झुकाकर चला गया। अहमद ने कुछ नाराजी के स्वर में कहा, "आप नौकरों के सामने भी ...."

छोटे मियाँ पूरी बात न कह सके, बीच में ही बड़े मियाँ ने मीठ लहजे में कहा, "पीरू तो नौकर नहीं है। घर का आदमी है। खैर, तो तैयार रहना। और हाँ, वह गुप्ती भी ले चलना।"

"वह किसलिए?"

"चौधरी को नज़र करूँगा। उम्दा चीज है।"

"उम्दा चीजें घर में भी तो रहनी चाहिए।"

"मगर दोस्तों को सौगात भी तो उम्दा ही जानी चाहिए।"

"दोस्ती क्या, चौधरी समझेगा मियाँ कर्ज के लिए खुशामद कर रहे हैं।"

"तौबा, तौबा, ऐसा भला कहीं हो सकता है! चौधरी एक ही दाना आदमी है। चलो तो तुम, मिलकर खुश होओगे।"

छोटे मियाँ जब जाने लगे तो बड़े मियाँ ने टोककर कहा, "अमां जरा रघुवीर हलवाई के यहाँ कहला भेजना - मिठाई अभी भेज दे। कल ही मैंने कहला दिया था, तैयार रखी होगी। सुबह तो बहुत देर हो जाएगी।

बड़े मियाँ देर तक हुक्का पीते रहे। पीरू मियाँ आकर फिर पैर दबाने लगे। पैर दबाते-दबाते पीरू ने कहा हुजूर बस, अब तो हज को चल ही दीजिए। आपके तुफैल से गुलाम को भी ज़ियारत नसीब हो जाएगी।"

"मियाँ पीरू, हज की मैं दिली तमन्ना रखता हूँ। मगर दिल मसोसकर रह जाता हूँ। सोचता हूँ, साहबजादा घर-बार संभाल लें, उनकी शादी हो जाए तो बस मैं चल ही दूँ।"

...........

...........

(पीरू बोला) ...... जब तक हुजूर का साया उनके सर पर है, उन्हें किस बात का गम है! इसी से शायद वे बेफिक्रे हैं।"

"लेकिन भई, मैं भी अब पचासी को पार कर चुका। सुबह का चिराग हूँ।"

"तौबा, तौबा, यह क्या कल्मा ज़बान पर लाए हुजूर! जी चाहता है अपना मुँह पीट लूँ। हुजूर का दम गनीमत है।"

बड़े मियाँ हँस दिए। उन्होंने कहा, "तैयारी कर दो पीरू! जरा दिन गर्माए तो बस चल ही दें। ...."

...........

...........

चौधरी बीमार थे। दिल्ली दे कोई हकीम उनका इलाज कर रहे थे। उन्हें जब बड़े मियाँ की आमद की सूचना दी गई तो उन्होंने अपने पलंग के पास ही बुला लिया। छोटे मियाँ को देखकर चौधरी खुश हो गए। साहब-सलामत के बाद चौधरी ने कहा, "आपको मैं याद ही कर रहा था। शायद आजकल में आदमी भेजकर बुलवाता।"

"तो आपने तो खबर भी नहीं दी, इस कदर तबीयत खराब हो गई। अब इंशाअल्लाताला जल्द सेहत अच्छी हो जाएगी, मगर अहतियात शर्त है। हकीम साहब क्या फर्माते हैं? आदमी तो लायक मालूम देते हैं।"

जी हाँ, बीस सालों से मेरे यहाँ इलाज करते हैं। हज़रत बादशाह सलामत के भी ये ही तबीब हैं हकीम नज़ीरअली साहब।"

"जानता हूँ आलिम आदमी हैं। सुना है बड़े नब्बाज़ हैं।"

"लेकिन वे इलाज ही तो कर सकते हैं, जिन्दगी में पैबन्द तो लगा नहीं सकते।"

"यह आप क्या फर्मा रहे हैं!"

"बस अब मेरा आखरी वक्त है। इस गिदोनवा में सिर्फ एक आप मेरे हमदर्द हैं। बिटिया सयानी हो गई है, इसके हाथ पीले हो जाते तो इतमीनान से मरता। अब भगवान मर्जी।"

"लेकिन चौधरी, आप इस कदर पस्तहिम्मत क्यों हो रहे हैं? आ जल्द अच्छे हो जाएँगे।"

"खैर, तो आपसे मेरी एक आरजू है। आप मेरे बड़े भाई हैं, अब इस घर की देखभाल आप पर ही छोड़ता हूँ। नादान बच्चे हैं, आप ही को उनकी सरपरस्ती करनी होगी। सब भाई समझदार और दाना आदमी हैं, उम्मीद है खानदान को दाग न लगने पाएगा, सिर्फ आपका साया सर पर रहना चाहिए।"

"उस घर से भी ज्यादा यही घर मेरा है चौधरी, आप किसी बात की फिक्र मत कीजिए। क्या साहबजादी की बात कहीं लगी है?"

"अभी नहीं। उसे तो बस पढ़ने की ही धुन लग रही है। बेगम समरू जब से तशरीफ लाई हैं, उसका सिर फिर गया है। बेगम ने ही उसे पढ़ाने को एक अंग्रेज लेडी रखवा दी है। देखता हूँ उसकी सोहबत में वह नई-नई बातें सीखती जा रही है। मगर बिना माँ की लड़की है। सात भाइयों में अकेली! सभी की आँखों का तारा। इसी से हम लोग कोई उसकी तबीयत के खिलाफ काम करना नहीं चाहते।"

"यही हाल छोटे मियाँ का है। हज़रत सलामत के कहने से इसे फिरंगियों के मिशन कालेज में दाखिल किया था। अब अंग्रेजी पढ़कर नई दुनिया की नई बातें करता है।"

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इसी वक्त मंगला हाथ में दूध का गिलास लेकर कमरे में आ गई। ......

कमरे में बाहरी आदमियों आदमियों को देख वह ठिठकी, और मुँह फेरकर लौट चली। पर चौधरी ने क्षीण स्वर में कहा, "चली आओ बेटी, चली आओ; दादाजान हैं, पहचाना नहीं! .... । चाचाजान भी हैं बेटी, उन्हें नमस्कार करो।"

मंगला ने हाथ जोड़कर नमस्कार किया। चौधरी ने कहा, "दो गिलास दूध और ले आ बेटी, दादा और चाचा के लिए।"

मंगला तेजी से चली गई। दोनों हाथों में दो गिलास दूध भरकर ले आई। उसके साथ ही एक खिदमतगार बड़े-से थाल में गुड़ के गिंदोड़े भरकर मियाँ के सामने रख गया।

...........

...........

(चौधरी ने कहा) ".........खैर, यह कहो इस वक्त तकलीफ कैसे की?"

"यों ही चला आया। बिटिया को देखने को दिल बेचैन था। छोटे मियाँ भी आपको सलाम करना चाहते थे।"

"होनहार हैं, ज़हीन हैं, ईश्वर ने चाहा तो नेकनामी और इज़्ज़त का वह रुतबा हासिल करेंगे कि जिसका नाम .....।" चौधरी ने प्रेम से छोटे मियाँ की ओर देखा। उनका हाथ पकड़कर अपने पलंग के पास खींच गोद में बिठा लिया। बड़े मियाँ ने कहा, "चौधरी चाचा को मुकर्रर सलाम करो बेटे।"

छोटे मियाँ ने अदब से खड़े होकर चौधरी को सलाम किया। 'जीते रहो, जीते रहो!' चौधरी ने प्रेम-विभोर होकर कहा।

...........

...........

"...... क्या मालगुजारी अदा हो गई?"

"अभी कहाँ, वह रुपया जो आपके यहाँ से उस दिन आया था, दूसरे एक जरूरी काम में खर्च हो गया। लेकिन चौधरी, आप इस वक्त परेशान न हों। कुछ इन्तजाम हो ही जाएगा। अभी तो आप अपनी सेहत पर ध्यान दीजिए।"

लेकिन चौधरी ने इसका कोई जवाब नहीं दिया। थोड़ी देर इधर-उधर की बातें हुईं। .....

खाने का वक्त हुआ। दोनों ने खाना खाया।

तीसरे पहर जब वे चौधरी के पलंग के पास रुखसत लेने पहुँचे, तो चौधरी ने एक कागज उनके हाथ में थमा दिया। बड़े मियाँ ने देखा - तमाम कर्जे की भरपाई की चुकता रसीद थी। बड़े मियाँ ने आश्वर्यचकित होकर चौधरी की ओर देखकर कहा, "यह क्या चौधरी?"

"बस, दुलखो मत बड़े भाई! साहबज़ादे पहली बार मेरी ड्योढ़ी आए हैं। यह उनकी नज़र है।"

"लेकिन यह तो तमाम कर्जे की भरपाई रसीद है!"

"तो क्या हुआ? आपकी सखावत ने तो सारी रियासत को रेहन रख दिया। अब छोटे मियाँ को मेरी तरफ से यह छोटा-सा नज़राना है।"

"यह न हो सकेगा चौधरी, यह भी कोई इन्साफ है! तौबा, तौबा!"

चौधरी की आँखों में पानी भर आया। उन्होंने कहा, "बड़े भाई, मेरे साथ इस कदर सख्ती! ऐसी बेरुखी! आप तो कभी ऐसे न थे। भला सोचो तो, हमारे आपके बीच कोई फर्क है। मैंने तो कभी उस घर को अपने घर से अलग नहीं समझा। जैसे मुझे अपने बच्चों का ख्याल है, वैसे ही छोटे मियाँ का भी है। फिर यह मेरा आखरी वक्त है। छोटे मियाँ को मैं कैसे छूँछे हाथ रहने दे सकता हूँ।"

"तो जमींदारी पर ही क्या मौकूढ है? खुदा ने चाहा तो उसे कम्पनी बहादुर की कोई अच्छी-सी नौकरी मिल जाएगी।"

"मिल जाएगी तो अच्छा ही है। मगर बाप-दादों की जायदाद से भी तो मियाँ को बरतरफ नहीं किया जा सकता।"

"कौन बरतरफ करता है, चौधरी! तुम्हारा रुपया मय सूद चुकता करके जमींदारी छूट जाएगी, तब वही मालिक होगा।"

"अच्छी बात है, रसीद तो आप रख लीजिए। जब रुपया हो उसे मेरी तरफ से छोटे मियाँ की शादी में दुलहिन को दहेज दे दीजिएगा।"

"यह तो वही बात हुई।"

"तो दूसरी बात कहाँ से हो सकती है!"

"खैर, तो आप जानिए और छोटे मियाँ, मैं तो मंजूर नहीं कर सकता।"

"तो छोटे मियाँ को हुक्म दे दीजिए।"

"नहीं, हुक्म भी नहीं दे सकता।"

"अच्छा साहबज़ादे, यह कागज तुम रख लो।"

".... आप इसरार न कीजिए। और यह रसीद अपने पास ही रखिए। अब्बा हुजूर जब आपका रुपया ब्याज समेत चुकता कर देंगे, तो यह रसीद ले लेंगे।"

"तो बेटे, तुम अपने इस बूढ़े चाचा की इतनी-सी बात टालते हो।"

"चाचाजान, यह ऊसूल की बात है।"

"बेटे, तुम जानते हो, मैं बूढ़ा आदमी हूँ, कमजोर हूँ, बीमार हूँ; मेरा दिल टूट जाएगा। अगर तुम यह कागज न लोगे।"

बड़े मियाँ ने कहा, "चौधरी, छोटी रकम नहीं है, चालीस हजार से ऊपर की रकम होगी। आखिर खुदा के सामने मैं क्या जवाब दूँगा?"

"तो तुमने मेरा दिल तोड़ दिया बड़े भाई," चौधरी ने कातर कण्ठ से कहा।

बड़े मियाँ की भी आँखें भीग गईं, उन्होंने कहा़, "खैर, एक वादा करें तो मैं मियाँ को रसीद लेने की इज़ाजत दे सकता हूँ।"

"कैसा वादा?"

"कि जब भी रुपये का बन्दोबस्त हो जाए, रुपया आप ले लेंगे।"

"खैर यही सही। अच्छा सम्भालिए।"

"यह क्या?"

"यह दो तोड़े हैं, मालगुजारी भी अदा कर दीजिए और हज भी कर आइए। कम हो तो खबर भेज दीजिए, रुपया पहुँच जाएगा।"

"लेकिन ....."

"लेकिन क्या बड़े भाई!" उन्होंने खिदमतगार को पुकारकर कहा, "तोड़े रथ में रख आ। और दो सवार साथ जाकर बड़े मियाँ को पहुँचा आएँ। लो बेटे सम्भाल कर रखो।" उन्होंने ने रसीद छोटे मियाँ के हाथ में दे दी। तीनों ही आदमियों की आँखें गीली थीं। बड़ी देर तक सन्नाटा रहा। छोटे मियाँ ने कहा, "अब्बा हुजूर, वह गुप्ती आप चाचाजान को नज़र करने लाए थे न!"

...........

...........

.... (चौधरी के बेटे) सुरेन्द्रपाल ने पीछे से पुकारा, "यह क्या तायाजी, आप जा रहे हैं, बिना मेरी इजाजत लिए ही।"

बड़े मियाँ रथ में चढ़ते-चढ़ते ठिठक गए, उन्होने कहा, "बड़ी गलती हुई बेटा! लेकिन इजाजत दे दो। सूरज छिप रहा है और सर्दी की रात है, पहुँचते-पहुँचते अन्धेरा हो जाएगा।"

"आपको इजाजत दे सकता हूँ, मगर भाई साहब को नहीं।"

"ये फिर आ जाएँगे, अभी तो छुट्टियाँ हैं।"

"यह नहीं हो सकता। मैं आज इन्ही के लिए तमाम दिन परेशान रहा हूँ।"

"परेशान क्यों रहे बेटे?"

"शिकार के बन्दोबस्त में। कछार में एक नया शेर आया है। .....। आदमखोर है। उधर गाँवों में उसने बहुत नुकसान किया है। बस, सुबह आप आए तो मैंने तय कर लिया कि भाई साहब और मैं शिकार करेंगे उसका। अब सब बन्दोबस्त हो गया है। और आप खिसक रहे हैं चुपचाप। यह नहीं हो सकेगा।" उसने आगे बढ़कर छोट मियाँ का हाथ पकड़ लिया। शेर की शिकार की बात सुनकर छोटे मियाँ का कलेजा उछलने लगा। कभी शेर का शिकार नहीं किया था। यों बन्दूक का निशाना अच्छा लगाते थे। कभी-कभी शिकार भी करते थे। मगर मुर्गाबियों और हिरनियों का। सुनकर खुश हो गए। उन्होंने मुस्कुराकर बड़े मियाँ की ओर देखा।

बड़े मियाँ ने कहा, "तो बेटे, रह जाओ दो दिन भाई के पास।"

बड़े मियाँ चले गए। छोटे मियाँ को खींचकर सुरेन्द्रपाल अपने कमरे में ले गए। दोनों की समान आयु थी। रात-भर में दोनों तरुण पक्के दोस्त हो गए।

...........

...........

सुरेन्द्रपाल ने कहा, "शर्त बदो।"

"कैसी शर्त?"

"शेर अगर तुम्हारी गोली से मरे तो मैं यह अँगूठी तुम्हें नज़र करूँगा। लेकिन यदि मेरी गोली सर हुई तो बोलो तुम मुझे क्या दोगे?" सुरेन्द्र ने हँस कर कहा।

...........

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छोटे मियाँ ने हँसकर कहा, "अच्छी बात है। मेरे पास एक चीज है, अगर शेर तुम्हारी गोली से मरा तो मैं वह चीज तुम्हें नज़र करूँगा।"

"वह क्या चीज है? दिखाओ पहले!"

"नहीं, दिखाउँगा नहीं। छोटी-सी चीज है। मुमकिन है तुम्हारी अँगूठी के बराबर कीमती हो। लेकिन तुम्हें वह कबूल करनी होगी।"

...........

...........

दोनों दोस्त हरबे-हथियार से लैस हो बैठे। हाँका हुआ। शेर की दहाड़ सुनकर छोटे मियाँ के हाथ-पाँव फूल गए, उनसे निशाना नहीं सधा, गोली खता हो गई। सुरेन्द्रपाल की गोली ने शेर का काम तमाम कर दिया। खुशी-खुशी दोनों दोस्त मंच से उतरे। शिकार की नाप-तोल की। घर आए। जब छोटे मियाँ चलने लगे तो उन्होंने कहा, "शर्त नज़राना हाजिर करता हूँ।"

"अरे मैं तो भूल ही गया था। अब जाने दो भाईजान। हकीकत में, अपने यह अँगूठी तुम्हें नज़राने के तौर पर देना चाहता था। शिकार की शर्त का महज बहाना था।"

"यह न होगा, शर्त पूरी करना फर्ज है। यह लीजिए।"

उन्होंने जेब के भीतर हाथ डालकर वह रसीद निकाली ‌र सुरेन्द्पाल के हाथ पर रख दी।
आज भी हिन्दू-मुस्लिम में परस्पर प्रेम और सौहार्द्र के बेमिसाल नमूने देखने को मिलते हैं। वे एक दूसरे के भलाई के लिए कुछ भी करने के लिए तैयार रहते हैं। अलगाववादी और आतंकवादी तो क्या, दुनिया की कोई भी ताकत इस प्रेम और सौहार्द्र को खत्म नहीं कर सकती।

Thursday, August 12, 2010

क्या हिन्दी ब्लोग्स कभी व्यावसायिक हो पाएँगे?

ब्लोग याने कि वेबलॉग की शुरुवात हुई थी निजी किन्तु सार्वजनिक दैनन्दिनी के रूप में। अंग्रेजी ब्लोग्स की बात करें तो यह कहा जा सकता है बहुत ही तेजी के साथ उनकी की लोकप्रियता बढ़ती चली गई। लोकप्रियता बढ़ने के साथ ही साथ निजी-सार्वजनिक दैनन्दिनी वाले उनके रूप में भी परिवर्तन होता चला गया और वे व्यावसायिक होते चले गए। आज अंग्रेजी के प्रायः ब्लोग्स पूर्ण रूप से व्यावसायिक हैं। अंग्रेजी ब्लोग्स की व्यावसायिकता ने 'वर्क एट होम', 'वर्क फ्रॉम होम', 'फायर योर बॉस' आदि नई मान्यताओं को जन्म दिया। अनेक लोग अपनी नौकरी छोड़कर सफल व्यावसायिक ब्लोगर्स बन गए!

हिन्दी ब्लोग्स के साथ ऐसी बात नहीं रही, उन्हें उस प्रकार से लोकप्रियता नहीं मिल पाई जिस प्रकार से अंग्रेजी ब्लोग्स को मिली। वास्तव में हिन्दी जानने वाले नेट यूजर्स की एक बहुत बड़ी संख्या आज भी हिन्दी ब्लोग्स के अस्तित्व से ही अन्जान है। हिन्दी ब्लोग्स सर्च इंजिनों में अपनी पहचान नहीं बना पाए, उन्हें सदैव एग्रीगेटरों के सहारे की आवश्यकता बनी रही है। यही कारण है कि ब्लोगवाणी जैसे लोकप्रिय एग्रीगेटर के बंद हो जाने का अवसाद आज भी अधिकतर हिन्दी ब्लोगर्स के भीतर बना हुआ है। एग्रीगेटर्स के सहारे टिके होने के कारण हिन्दी ब्लोग्स को प्रायः हिन्दी ब्लोगर्स ही पढ़ते हैं। प्रायः सामान्य नेट यूजर्स की रुचि एग्रीगेटर्स में नहीं  नहीं होती, वे सर्च इंजिनों में अपने रुचि के विषयों को ही खोजते हैं। इसी कारण से हिन्दी ब्लोग्स के पाठकों की कमी बनी रहती है जिसके कारण से हिन्दी ब्लोग्स में व्यावसायिकता की क्षमता नहीं बन पाती।

तो क्या कभी हिन्दी ब्लोग्स कभी व्यावसायिक हो पाएँगे?

हमारा तो मानना है कि अवश्य बन पाएँगे यदि हिन्दी ब्लोगर्स पाठक बढ़ाने के उद्देश्य से पाठकों की रुचियों को ध्यान में लेखन करें। टिप्पणियों की संख्या के बादले पाठकों की संख्या को अधिक महत्वपूर्ण समझें। जाने-अनजाने में हम ब्लोगरों और हमारे एग्रीगेटरों ने ही टिप्पणियों को महत्वपूर्ण बना दिया है। चिट्ठाजगत यदि 'धड़ाधड़ टिप्पणियाँ' के बदले धड़ाधड़ पठन को डीफॉल्ट हॉटलिस्ट बना दे याने कि मुख्य हॉट लिस्ट में अधिक टिप्पणियाँ पाने वाले ब्लोग्स के स्थान पर अधिक पढ़े जाने वाले ब्लोग्स दिखाई देने लगें तो ब्लोगरगण टिप्पणियाँ बढ़ाने की अपेक्षा पाठक बढ़ाने की ओर अधिक ध्यान देने लग जायेंगे। ऐसा करने से कई प्रकार के तिकड़म कर के टिप्पणी बढ़ाने वाले भी हतोस्साहित होंगे तथा चिट्ठाजगत के साख में भी वृद्धि होगी।

कुछ लोगों को यह भी लग सकता है कि आखिर हम हिन्दी ब्लोग्स की तुलना अंग्रेजी ब्लोग्स से क्यों करते हैं? इस प्रश्न का उत्तर बहुत ही सरल है। स्वयं को जानने के लिए हमें तुलना करनी ही पड़ती है, यदि हम तुलना ना करें तो न तो कभी हम स्वयं को जान पायेंगे और न ही कभी आत्म-मुग्धता से हमें मुक्ति मिल पायेगी। तुलना ही है जो कि हमें उन्नति की ओर अग्रसर करती है।

Wednesday, August 11, 2010

साग-सब्जी-तरकारी-भाजी

सोच रहा हूँ कि आज क्या लिखूँ अपने पोस्ट में? कुछ भी नहीं सूझ रहा है और खीझ रहा हूँ खुद पर। क्या हर रोज कुछ ना कुछ लिखना जरूरी है? न लिखूँ तो क्या फर्क पड़ जायेगा? और लिखता हूँ तो भी क्या फर्क पड़ जाता है? कुछ लोग पढ़ लेते हैं तो कुछ लोग 'वाह वाह' भी कर देते हैं। पर फर्क कुछ नहीं पड़ता। हिन्दी की गलतियाँ देख कर अनुस्वार और चन्द्रबिन्दु के बारे में लिखा तो क्या लोगों ने सही हिन्दी लिखना शुरू कर दिया? सोचता हूँ कि क्या एक मैंने ही हिन्दी का ठेका ले रखा है? अकेला चना भाड़ फोड़ सकता है क्या?

जब देखो तब किसी ना किसी बात से कुढ़ता रहता हूँ। लोगों को अंग्रेजी के बारह महीनों के नाम याद हैं पर हिन्दू वर्ष के बारह महीनों के नाम याद नहीं। कितनी ही बार कितने ही लोगों को बता चुका हूँ कि हिन्दू वर्ष के बारह महीनों के नाम हैं - चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ (जेठ), आषाढ़ श्रावण (सावन), भाद्रपक्ष (भादों), आश्विन (क्वार), कार्तिक, मार्गशीष (अगहन), पूस, माघ, फाल्गुन (फागुन)। पर क्या फायदा? कोई याद रखने की कोशिश भी करता है क्या? आज के बच्चे हिन्दी की गिनती नहीं जानते, पूछते हैं कि अड़सठ याने कि सिक्सटी एट ही होता है ना? जब हिन्दी की गिनती ही नहीं आती तो पहाड़ा याद रखने का तो सवाल ही नहीं पैदा होता। हमारी संस्कृति दिनों-दिन रसातल में जाती जा रही है। अच्छे संस्कारों में कमी आती जा रही है। ऐसी ही बहुत सारी बातें सोच-सोच कर कुढ़ता हूँ। पूरी तरह से सठिया गया हूँ। अपनी ही हाँकते रहता हूँ। कई बार दूसरों को सीख दी है "जैसी चले बयार पीठ तैसी कर लीजे" पर जमाने के साथ खुद को कभी भी नहीं बदल पाया। जानता हूँ कि खुद को तो बदला जा सकता है, जमाने को नहीं। पर बार-बार जमाने को ही बदलने की नाकाम कोशिश करता हूँ। यह भी जानता हूँ कि ऐसा करना मूर्खता है पर जान-बूझ कर बार-बार मूर्खता करता हूँ और लोगों की नजर में बुरा भी बनता हूँ। अपने पोस्ट में ही नहीं बल्कि अपने मिलने वालों से बात-चीत करते समय भी कुछ न कुछ उपदेश-सा दे दिया करता हूँ। मेरे सामने तो वे मेरी उम्र का लिहाज कर के मेरी हाँ में हाँ मिला देते हैं पर पीठ पीछे जरूर यही कहते होंगे - 'स्साला खूँसट बुड्ढा, हमेशा होशियारी झाड़ते रहता है'।

"अब जरा कम्प्यूटर के सामने से हटिए और जाकर सब्जी ले आइए।"

मेरी सोच का सिलसिला टूटता है। पर क्षण भर बाद सोच का एक नया सिलसिला शुरू हो जाता है। सब्जी शब्द सुनकर याद आ जाता है कि एक फिल्म के किसी संवाद में "आलू की भाजी" का जिक्र था। मराठी में सब्जी को भाजी ही कहा जाता है जबकि हमारे यहाँ पालक, मेथी, बथुआ, चौलाई आदि को ही भाजी कहा जाता है। भाजी याने कि सिर्फ पत्ते वाली सब्जियाँ। अचानक सोचने लगता हूँ कि आखिर सब्जी शब्द कैसे बना होगा? क्या करना है मुझे यह जानकर कि सब्जी शब्द क्यों और कैसे बना? मैं कोई भाषाविद् हूँ क्या? अपनी सोच को झटकने की कोशिश करता हूँ पर सोच है कि चिपक कर रह गई है। उर्दू में 'हरा' को 'सब्ज' कहा जाता है, जरूर सब्जी शब्द सब्ज से ही बना होगा। सब्जी याने कि हरे रंग की सब्जियाँ - मटर, सेम आदि! तो फिर साग और तरकारी क्या होता है? शायद जो सब्जी नहीं होती याने कि हरे रंग की नहीं होती उसे तरकारी कहते हैं - आलू, टमाटर आदि। और साग? लगता है कि साग शब्द का प्रयोग शायद सब्जी-भाजी-तरकारी सभी के मेल के लिये किया जाता है, मांसाहार के लिए भी। अपने इस विश्लेषण से न तो पूर्णतः संतुष्ट हूँ और न असंतुष्ट।

"अजी, गए नहीं अभी तक?"

मेरी तन्द्रा टूटती है। उठ जाता हूँ सब्जी लाने जाने के लिए। सोच में अभी भी घूम रहा है साग-सब्जी-तरकारी-भाजी!

Tuesday, August 10, 2010

टोनही मंत्र सिद्ध करने का दिन - हरेली

अमावस की घोर अंधेरी रात! घोर अंधेरा! नदी के उस पार श्मशान में बार-बार बंग-बंग करके जलती-बुझती कोई चीज!

छत्तीसगढ़ में शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति होगा जिसने कभी ऐसे दृश्य के बारे में ना सुना हो। उस जलती-बुझती चीज को टोनही बरना कहा जाता है। बताया जाता है कि प्रतिवर्ष हरेली अर्थात् श्रावण कृष्ण अमावस्या की रात्रि को टोनही औरतें जादू-टोना करने वाली औरतें अपना मंत्र सिद्ध करती हैं। उनका मंत्र ढाई अक्षरों का होता है जिसे सिद्ध करने के लिए वे हरेली की रात्रि को निर्वस्त्र होकर श्मशान-साधना करती हैं। मंत्र सिद्ध करते समय उनके मुँह में एक प्रकार की जड़ी होती है जिसके कारण उनके मुँह से टपकने वाली लार अग्नि के समान प्रज्वलित होते जाती है। एक जमाने में जब कभी भी छत्तीसगढ़ के किसी गाँव में हैजे का प्रकोप हुआ करता था तो उस प्रकोप को गाँव में लाने का आरोप इन टोनही औरतों पर अवश्य रूप से लग जाया करता था।

आज छत्तीसगढ़ में टोनही की अवधारणा तो समाप्तप्राय हो चुकी है किन्तु इनका डर शायद अभी भी बाकी है। यही कारण है कि आज के दिन प्रत्येक घर के दरवाजों में नीम की पत्तियों वाली छोटी-छोटी डंगाले टंगी हुई दिखाई देती हैं। रायपुर में तो आटो रिक्शा तक में भी नीम की ये डालियाँ टंगी हुई दिखाई दे रही हैं। वास्तव में हम अंध-विश्वास को तो दूर कर लेते हैं किन्तु अंध-विश्वास के कारण भय को अपने भीतर से नहीं भगा पाते। अज्ञात का डर मनुष्य को आरम्भ से ही सताता रहा है और शायद अन्त तक सताता ही रहेगा।

हरेली को छत्तीसगढ़ में एक विशिष्ट त्यौहार के रूप में मनाया जाता है। यह हिन्दू वर्ष (चैत्र-फाल्गुन) का प्रथम त्यौहार है जबकि होली अन्तिम! हरेली के दिन छत्तीसगढ़ में गाँव का बैगा गाँव की रक्षा करने के लिए ग्राम-देवता की पूजा करता है जिसके आयोजन के प्रत्येक ग्रामवासी सहयोग-राशि प्रदान करता है। दिन में त्यौहार की खुशियाँ मनाई जाती है किन्तु रात्रि को अत्यन्त भयावह माना जाता है।

Monday, August 9, 2010

एक पोस्ट फिल्मी गीतों भरा

फिल्मी गीतों पर आधारित यह एक हल्का-फुल्का पोस्ट है यारों बकवास लगे तो मुझे ना दोष देना और बोर लगे तो आगे पढ़ना छोड़ देना!

यदि आप याद करने की कोशिश करेंगे तो आपको याद आयेगा कि आपके जीवन में एक समय ऐसा था जब न किसी प्रकार की फिक्र थी न चिंता। था तो सिर्फ आह्लाद! वसन्त हो या पतझड़, प्रसन्नता के आवेग में नीला अम्बर झूमता सा प्रतीत होता था - झूमे रे नीला अम्बर झूमे....! उम्र के उस पड़ाव में किसी ने ऐसा जादू डाल रखा था कि मन का मोर मतवाला होकर नृत्य करने लगता था - मन मोर हुआ मतवाला किसने जादू डाला रे....! जीवन के इस मौज में बाइक लेकर इस बस्ती से उस बस्ती गाते हुए घूमा करते थे - बस्ती बस्ती पर्वत पर्वत गाता जाये बंजारा लेकर दिल का इकतारा....। किसी की मुस्कुराहटों पर निसार हो जाने, किसी के दर्द को अपना लेने, किसी के लिये दिल में प्यार होने को ही आप जिन्दगी समझा करते थे - किसी की मुस्कुराहटों पे हो निसार किसी का दर्द हो सके ले उधार किसी के वास्ते हो तेरे दिल में प्यार जीना इसी का नाम है....। आपको अपना दिल आवारा लगा करता था और पता ही नहीं था कि वह कब किस पर आ जायेगा - है अपना दिल तो आवारा न जाने किस पे आयेगा....

ऐसे में न जाने कब यौवन ने अपना जादू चलाया और मदन ने आपके हृदय में अधिकार जमा लिया। कहीं पर आपको आपकी सपनों की रानी दिखाई पड़ गई। किशोरावस्था और यौवनावस्था की उस वयःसन्धि उसकी यही हसरत हुआ करती थी कि वह पंछी बनकर आकाश में उड़ जाये - पंछी बनूँ उड़ती फिरूं मस्त गगन में....! आपका हृदय उसकी ओर खिंचते चला गया। आपको पूर्ण रूप से आभास था कि उसका हृदय भी आपके लिये आतुर रहा करता है पर न तो आप उस तक जा पाते थे और न ही वो आपको बुला पाती थी - हम से आया न गया उनसे बुलाया ना गया फासला प्यार में दोनों से मिटाया ना गया....। पर एक दिन जाने कैसे आपने क्या कह दिया और उसने क्या सुन लिया कि बात बन गई - जाने क्या तूने कही जाने क्या मैंने सुनी बात कुछ बन ही गई....!

अब तो आप प्रतिदिन उसके घर का चक्कर लगाने लगे। उसके घर की खिड़की के पास पहुँचने पर आपके होठों से अपने आप सीटी की आवाज निकल उठती थी। आपके सपनों की रानी यह देख कर कह उठती थी - शाम ढले खिड़की तले तुम सीटी बजाना छोड़ दो....। पर आप कहाँ मानने वाले थे? पहुँच ही जाया करते थे आँखें चार करने के लिये और नैनों के मिलते ही चैन उड़ जाया करता था - नैन मिले चैन कहाँ....

उसे भी यही लगने लग गया था कि किसी ने उसे अपना बना कर मुस्कुराना सिखा दिया है - किसी ने अपना बना के मुझको मुस्कुराना सिखा दिया....। उसके होठ मुस्कुरा उठते थे, कंगना खनक उठता था और उसकी सखियाँ कह उठती थीं - जानू जानू रे काहे खनके है तोरा कंगना....!

दोनों का मेल-मिलाप बढ़ता गया! दोनो का जीवन प्यार भरी घड़ियाँ बन गईं - जिंदगी प्यार की दो चार घड़ी होती है....। दोनों के दिलों के तार धड़कने लगे थे - धड़कने लगी दिल की तारों की दुनिया....। आप उससे उसके प्यार के विषय में पूछ बैठते थे और वह कह उठती थी - मुहब्बत ऐसी धड़कन है जो समझाई नहीं जाती....। आप उससे अपने प्यार को कभी ना भुलाने का वादा करने के लिए कहा करते थे - ये वादा करो चांद के सामने भुला तो ना दोगे मेरे प्यार को....

आप तनहा होते थे तो आपके हृदय के द्वार पर कोई अपनी पायल की झंकार लिये आ जाया करता था - कौन आया मेरे मन के द्वारे पायल की झंकार लिये....

दिन-रात बेकरारी बनी रहती थी और मिलन होने पर ही बड़ी मुश्किल से करार आता था - बड़ी मुश्किल से दिल की बेकरारी को करार आया....। उसे एक अनजाना सा डर भी बना रहा करता था कि कहीं आप उसे छोड़ तो नहीं देंगे और वह आपसे कह उठती थी - चले जाना नहीं नैन मिलाके सैंया बेदर्दी....। जब कभी भी आप उसकी नजरों से छुप जाया करते थे वह प्यार के अनोखे दर्द से तड़प उठा करती थी - छुप गया कोई रे दूर से पुकार के दरद अनोखे हाय दे गया प्यार के....। अपने सामने आपको न पाकर उसे यही लगता था - जो दिल में खुशी बन कर आये वो दर्द बसा कर चले गये....। प्यार की शीतल जलन ने आप दोनों का चैन और आराम को छीन लिया था - हम प्यार में जलने वालों को चैन कहाँ आराम कहाँ....

और फिर अचानक आपको उससे दूर जाना पड़ गया था। उसने समझा था कि आप बहाना बना कर उससे दूर चले गए हैं - जाना था हमसे दूर बहाने बना लिये अब तुमने कितनी दूर ठिकाने बना लिये....। दिन-रात उसका हृदय सिर्फ आप को ही पुकारा करता था कभी वह कहती थी - आन मिलो आन मिलो श्याम साँवरे.... तो कभी - आ लौट के आजा मेरे मीत तुझे मेरे गीत बुलाते हैं....। शाम की तनहाइयाँ उसके गम को और भी बढ़ा दिया करती थी - ये शाम की तनहाइयाँ ऐसे में तेरा गम....। आपके पास ना होने से उसे चांद का निकलना भी न भाता था - चांद फिर निकला मगर तुम ना आये जला फिर मेरा दिल करूँ क्या मैं हाये....। अपनी अटारी पर बदरी को देखकर उसका दिल कह उठता था - जा री जा री ओ कारी बदरिया मत बरसो री मोरी अटरिया परदेस गये हैं सँवरिया....। उसे तो लगने लग गया था कि आपने उसे भुला दिया है - मोहे भूल गये साँवरिया....। आपकी जुदाई के गम में वह बरबस गुनगुना उठती थी - तेरी याद में जल कर देख लिया अब आग में जल कर देखेंगे....

उससे दूर के कारण आपका दिल भी रो उठता था - आज तुमसे दूर होकर ऐसे रोया मेरा प्यार चाँद रोया साथ मेरे रात रोई बार बार....। आपका दिल बार बार बस उसे ही पुकारा करता था - आ जा रे अब मेरा दिल पुकारा रो रो के गम भी हारा....। उसके इंतजार में आपकी जिन्दगी दर्द बन चुकी थी - आ जा के इंतजार में जाने को है बहार भी तेरे बगैर जिन्दगी दर्द बन के रह गई....। आपको सिर्फ यही लगा करता था - हम तुझसे मुहब्बत करके सनम हँसते भी रहे रोते भी रहे....

और फिर आप फिर वापस आए थे। जब आप शहर की सीमा में स्थित नदी के उस पार पहुँचे थे तो प्रसन्नता से वह कह उठी थी - उस पार साजन इस पार सारे ले चल ओ माझी किनारे....। उसकी आँखों की प्यास बुझ गई थी - घर आया मेरा परदेसी प्यास बुझी मेरे अखियन की....। आपके घर वापस आ जाने पर उसका जिया मचलने लगा था - जबसे बलम घर आये जियरा मचल मचल जाये....

फिर अन्ततः आपका प्यार परवान चढ़ा था। वो छोड़ बाबुल का घर मोहे पी के नगर आज जाना पड़ा.... कहते हुए आपके घर आ गई थी और अपने जनम को सफल बनाने के लिये आपसे अनुरोध किया था - आज सजन मोहे अंग लगालो जनम सफल हो जाये....

चलते-चलते

पोस्ट में उल्लेखित गीतः

  1. झूमे से नीला अम्बर झूमे.... (गायक/गायिका - लता मंगेशकर, तलत महमूद, संगीत - सलिल चौधरी, गीतकार - शैलेन्द्र, फिल्म - एक गाँव की कहानी, प्रदर्शन वर्ष -1957)
  2. मन मोर हुआ मतवाला किसने जादू डाला रे.... (गायक/गायिका -  सुरैया, संगीत - सचिन देव बर्मन, गीतकार - नरेन्द्र शर्मा, फिल्म - अफसर, प्रदर्शन वर्ष - 1950)
  3. बस्ती बस्ती पर्वत पर्वत गाता जाये बंजारा लेकर दिल का इकतारा.... (गायक/गायिका - बंजारा मोहम्मद रफी, संगीत - मदन मोहन, गीतकार - साहिर लुधियानवी, फिल्म - रेल्वे प्लेटफार्म, प्रदर्शन वर्ष -1955)
  4. किसी की मुस्कुराहटों पे हो निसार किसी का दर्द हो सके ले उधार किसी के वास्ते हो तेरे दिल में प्यार जीना इसी का नाम है.... (गायक/गायिका - मुकेश, संगीत - शंकर जयकिशन, गीतकार - शैलेन्द्र, फिल्म - अनाड़ी, प्रदर्शन वर्ष -1959)
  5. है अपना दिल तो आवारा न जाने किस पे आयेगा.... (गायक/गायिका - हेमन्त कुमार, संगीत - सचिन देव बर्मन, गीतकार - मजरूह सुल्तानपुरी, फिल्म - सोलवाँ साल, प्रदर्शन वर्ष -1958)
  6. उड़ती फिरूं मस्त गगन में.... (गायक/गायिका - लता मंगेशकर, संगीत - शंकर जयकिशन, गीतकार - हसरत जयपुरी, फिल्म - चोरी चोरी, प्रदर्शन वर्ष -1956)
  7. हम से आया न गया उनसे बुलाया ना गया फासला प्यार में दोनों से मिटाया ना गया.... (गायक/गायिका - तलत महमूद, संगीत - मदन मोहन, गीतकार - राजेन्द्र कृशन, फिल्म - देख कबीरा रोया, प्रदर्शन वर्ष -1957)
  8. जाने क्या तूने कही जाने क्या मैंने सुनी बात कुछ बन ही गई.... (गायक/गायिका - गीता दत्त, संगीत - सचिन देव बर्मन, गीतकार - साहिर लुधियानवी, फिल्म - प्यासा, प्रदर्शन वर्ष -1957)
  9. शाम ढले खिड़की तले तुम सीटी बजाना छोड़ दो.... (गायक/गायिका - चीतलकर, लता मंगेशकर, संगीत - सी.रामचन्द्र, गीतकार - राजेन्द्र कृशन, फिल्म - अलबेला, प्रदर्शन वर्ष -1951)
  10. नैन मिले चैन कहाँ.... (गायक/गायिका - लता मंगेशकर, मन्ना डे, संगीत - शंकर जयकिशन, गीतकार - शैलेन्द्र, फिल्म - बसंत बहार, प्रदर्शन वर्ष -1956)
  11. किसी ने अपना बना के मुझको मुस्कुराना सिखा दिया.... (गायक/गायिका - लता मंगेशकर, संगीत - शंकर जयकिशन, गीतकार - शैलेन्द्र, फिल्म - पतिता, प्रदर्शन वर्ष -1953)
  12. जानू जानू रे काहे खनके है तोरा कंगना.... (गायक/गायिका - आशा भोंसले, गीता दत्त, संगीत - सचिन देव बर्मन, गीतकार - शैलेन्द्र, फिल्म - इंसान जाग उठा, प्रदर्शन वर्ष -1959)
  13. जिंदगी प्यार की दो चार घड़ी होती है.... (गायक/गायिका - हेमन्त कुमार, लता मंगेशकर, संगीत - सी. रामचन्द्र, गीतकार - राजेन्द्र कृशन, फिल्म - अनाकली, प्रदर्शन वर्ष -1953)
  14. धड़कने लगी दिल की तारों की दुनिया.... (गायक/गायिका - आशा भोंसले, महेन्द्र कपूर, संगीत - एन दत्ता, गीतकार - साहिर लुधियानवी, फिल्म - धूल का फूल, प्रदर्शन वर्ष -1959)
  15. मुहब्बत ऐसी धड़कन है जो समझाई नहीं जाती.... (गायक/गायिका - लता मंगेशकर, संगीत - सी. रामचन्द्र, गीतकार - हसरत जयपुरी, फिल्म - अनारकली, प्रदर्शन वर्ष -1953)
  16. ये वादा करो चांद के सामने भुला तो ना दोगे मेरे प्यार को.... (गायक/गायिका - लता मंगेशकर, मुकेश, संगीत - शंकर जयकिशन, गीतकार - हसरत जयपुरी, फिल्म - राजहठ, प्रदर्शन वर्ष -1956)
  17. कौन आया मेरे मन के द्वारे पायल की झंकार लिये.... (गायक/गायिका - मन्ना डे, संगीत - मदन मोहन, गीतकार - राजेन्द्र कृशन, फिल्म - देख कबीरा रोया, प्रदर्शन वर्ष -1957)
  18. बड़ी मुश्किल से दिल की बेकरारी को करार आया.... (गायक/गायिका - शमशाद बेगम, संगीत - नौशाद, गीतकार - जां निसार अख्तर, फिल्म - नग़मा, प्रदर्शन वर्ष -1953)
  19. चले जाना नहीं नैन मिलाके सैंया बेदर्दी.... (गायक/गायिका - लता मंगेशकर, संगीत - हुस्नलाल भगतराम, गीतकार - राजेन्द्र कृशन, फिल्म - बड़ी बहन, प्रदर्शन वर्ष - 1950)
  20. छुप गया कोई रे दूर से पुकार के दरद अनोखे हाय दे गया प्यार के.... (गायक/गायिका - लता मंगेशकर, संगीत - हेमन्त कुमार, गीतकार - राजेन्द्र कृशन, फिल्म - चम्पाकली, प्रदर्शन वर्ष -1957)
  21. जो दिल में खुशी बन कर आये वो दर्द बसा कर चले गये.... (गायक/गायिका - लता मंगेषकर, संगीत - हुस्नलाल भगतराम, गीतकार - राजेन्द्र कृशन, फिल्म - बड़ी बहन, प्रदर्शन वर्ष - 1950)
  22. हम प्यार में जलने वालों को चैन कहाँ आराम कहाँ.... (गायक/गायिका - लता मंगेशकर, संगीत - मदन मोहन, गीतकार - राजेन्द्र कृशन, फिल्म - जेलर, प्रदर्शन वर्ष -1958)
  23. जाना था हमसे दूर बहाने बना लिये अब तुमने कितनी दूर ठिकाने बना लिये.... (गायक/गायिका - लता मंगेशकर, संगीत - मदन मोहन, गीतकार - राजेन्द्र कृशन, फिल्म - अदालत, प्रदर्शन वर्ष -1958)
  24. आन मिलो आन मिलो श्याम साँवरे.... (गायक/गायिका - गीता दत्त, मन्ना डे, संगीत - सचिन देव बर्मन, गीतकार - साहिर लुधियानवी, फिल्म - देवदास, प्रदर्शन वर्ष -1955)
  25. आ लौट के आजा मेरे मीत तुझे मेरे गीत बुलाते हैं.... (गायक/गायिका - लता मंगेशकर, संगीत - एस एन त्रिपाठी, गीतकार - भरत व्यास, फिल्म - रानी रूपमती, प्रदर्शन वर्ष -1957)
  26. ये शाम की तनहाइयाँ ऐसे में तेरा गम.... (गायक/गायिका - लता मंगेशकर, संगीत - शंकर जयकिशन, गीतकार - शैलेन्द्र, फिल्म - आह, प्रदर्शन वर्ष -1953)
  27. आ जाओ तड़पते हैं अरमां अब रात गुजरने वाली है.... (गायक/गायिका - लता मंगेशकर, संगीत - शंकर जयकिशन, गीतकार - हसरत जायपुरी, फिल्म - आवारा, प्रदर्शन वर्ष -    1951)
  28. चांद फिर निकला मगर तुम ना आये जला फिर मेरा दिल करूँ क्या मैं हाये.... (गायक/गायिका - लता मंगेशकर, संगीत - सचिन देव बर्मन, गीतकार - मजरूह सुल्तानपुरी, फिल्म - पेइंग गेस्ट, प्रदर्शन वर्ष -1957)
  29. जा री जा री ओ कारी बदरिया मत बरसो री मोरी अटरिया परदेस गये हैं सँवरिया.... (गायक/गायिका - लता मंगेशकर, संगीत - सी. रामचन्द्र, गीतकार - राजेन्द्र कृशन, फिल्म - आजाद, प्रदर्शन वर्ष -1955)
  30. मोहे भूल गये साँवरिया.... (गायक/गायिका - लता मंगेशकर, संगीत - नौशाद, गीतकार - शकील बदाँयूनी बैजू, फिल्म - बावरा, प्रदर्शन वर्ष -1953)
  31. तेरी याद में जल कर देख लिया अब आग में जल कर देखेंगे.... ( लता मंगेशकर, संगीत - हेमन्त कुमार, गीतकार - राजेन्द्र कृशन, फिल्म - नागिन, प्रदर्शन वर्ष -1954)
  32. आज तुमसे दूर होकर ऐसे रोया मेरा प्यार चाँद रोया साथ मेरे रात रोई बार बार.... (गायक/गायिका - मुकेश, संगीत - उषा खन्ना, गीतकार - अन्जान, फिल्म - दायरा, प्रदर्शन वर्ष -1953)
  33. आ जा रे अब मेरा दिल पुकारा रो रो के गम भी हारा.... (गायक/गायिका - लता मंगेशकर, मुकेश, संगीत - शंकर जयकिशन, गीतकार - हसरत जयपुरी, फिल्म - आह, प्रदर्शन वर्ष -1953)
  34. आ जा के इंतजार में जाने को है बहार भी तेरे बगैर जिन्दगी दर्द बन के रह गई.... (गायक/गायिका - लता मंगेशकर, मोहम्मद रफी, संगीत - शंकर जयकिशन, गीतकार - शैलेन्द्र, फिल्म - हलाकू, प्रदर्शन वर्ष -1956)
  35. हम तुझसे मुहब्बत करके सनम हँसते भी रहे रोते भी रहे.... (गायक/गायिका - मुकेश, संगीत - शंकर जयकिशन, गीतकार - हसरत जायपुरी, फिल्म - आवारा, प्रदर्शन वर्ष -1951)
  36. उस पार साजन इस पार सारे ले चल ओ माझी किनारे.... (गायक/गायिका - लता मंगेशकर, संगीत - शंकर जयकिशन, गीतकार - हसरत जयपुरी, फिल्म - चोरी चोरी, प्रदर्शन वर्ष -1956)
  37. घर आया मेरा परदेसी प्यास बुझी मेरे अखियन की.... (गायक/गायिका - लता मंगेशकर, संगीत - शंकर जयकिशन, गीतकार - शैलेन्द्र, फिल्म - आवारा, प्रदर्शन वर्ष -1951)
  38. जबसे बलम घर आये लता जियरा मचल मचल जाये.... (गायक/गायिका - मंगेशकर, संगीत - शंकर जयकिशन, गीतकार - हसरत जायपुरी, फिल्म - आवारा, प्रदर्शन वर्ष -1951)
  39. छोड़ बाबुल का घर मोहे पी के नगर आज जाना पड़ा.... (गायक/गायिका - शमशाद बेगम, संगीत - नौशाद, गीतकार - शकील बदाँयूनी, फिल्म - बाबुल, प्रदर्शन वर्ष -1950)
  40. आज सजन मोहे अंग लगालो जनम सफल हो जाये.... (गायक/गायिका - गीता दत्त, संगीत - सचिन देव बर्मन, गीतकार - साहिर लुधियानवी, फिल्म - प्यासा, प्रदर्शन वर्ष -1957)