Friday, February 29, 2008

साईं बाबा (36)

लेखकः स्व. श्री हरिप्रसाद अवधिया

महासमाधि की पूर्व सूचना

सन्त भगवान के अवतार होते हैं। उन्हें संसार की किसी भी वस्तु में तिल भर भी मोह नहीं रहता। यहाँ तक कि वे अपने शरीर से भी अलग रहते हैं। उनके शरीर तो "निज इच्छा निर्मित तनु" होते हैं। वे स्वेच्छा से शरीर धारण करते और बिना कष्ट के उसे त्याग देते हैं। साईं बाबा ने भी यही किया था।

महा समाधि लेने के दो वर्ष पूर्व सन् 1916 ई. में दशहरे (सीमोल्लंघन) के दिन साईं बाबा अपने भक्तों से धिरे हुये मस्जिद में बैठे थे। शाम का समय था। अचानक साईं बाबा को सीमा-रहित क्रोध आ गया। उन्होंने अपने सिर का कपड़ा, कफनी, लंगोट आदि को उतार कर अपने शरीर से अलग कर दिया और पूरी तरह से निर्वस्त्र हो कर सबके सामने धूनी के साने क्रोध में विकराल बने खड़े रहे। यह देख कर वहाँ उपस्थित सभी लोग डर से थर थर काँपने लगे। साईं बाबा ने अपने शरीर से निकाले हुये अपने सभी कपड़ों को जलती हुई धूनी में डाल दिया। जब कपड़े जलने लगे तब धूनी की आग की लपटें बहुत तेज और प्रकाशपूर्ण हो गई। उनकी आँखें लाल हो गईं और वे क्रोध में चिल्लाये, "तुम लोग गौर से देखो कि मैं हिन्दू हूँ कि मुसलमान।"

वहाँ उपस्थित भक्त लोग काँप रहे थे। बाबा के समीप जाने का साहस किसी में नहीं था। कुछ समय बाद साईं बाबा का कुष्ठ रोगी भक्त भागो जी शिन्दे हिम्मत करे बाबा के नजदीक गया और उनकी कमर में एक लंगोट बांधने में सफल हो गया और बोला, "बाबा यह सब क्या है? आज दशहरा का त्यौहार है।" अपने सटके (लकड़ी) से जमीन को पीटते हुये बाबा ने कहा, "यह मेरा सीमोल्लंघन का दिन है।" इस तरह साईं बाबा ने दो साल पहले अपने 'सीमोल्लंघन' अथवा दशहरे के दिन अपने महासमाधि की पूर्वसूचना दे दी थी पर किसी ने नहीं समझा और ध्यान नहीं दिया।

साईं बाबा का क्रोध शान्त हो ही नहीं रहा था। कम से कम ग्यारह बजे रात तक बाबा शान्त नहीं हुये और लोगों को सन्देह होने लगा कि आज बाबा की चावड़ी यात्रा का जुलूस निकलेगा या नहीं। एक घण्टे के बाद साईं बाबा की स्थिति शान्त और सामान्य हो गई और वे चावड़ी जाने के लिये कपड़े पहन कर तैयार हो गये।

(क्रमशः)

Thursday, February 28, 2008

साईं बाबा (35)

लेखकः स्व. श्री हरिप्रसाद अवधिया

चावड़ी यात्रा समारोह

साईं बाबा रात को बारी बारी से दो अलग स्थानों में सोया करते थे - एक द्वारका माई मस्जिद में और दूसरा चावड़ी में। वे एक रात मस्जिद में सोते थे दूसरी रात चावड़ी के एक कक्ष में। चावड़ी एक इमारत का नाम था। वहाँ एक या दो कमरे थे। चावड़ी मस्जिद से बहुत दूर नहीं थी। दस दिसम्बर 1909 से भक्तों ने चावड़ी में साईं बाबा की नियमित पूजा करना प्रारम्भ कर दिया। जिस दिन साईं बाबा शयन करने के लिये चावड़ी जाते थे उस दिन का समारोह दर्शनीय होता था।

उस दिन शाम से ही लोग झुण्ड बना कर मस्जिद के सामने जमा हो जाते थे और कुछ घण्टे तक मण्डप में भजन गाते थे। लोगों के पीछे तुलसी वृन्दावन के दाहिनी ओर एक छोटा सा सुन्दर रथ खड़ा रहता था। रथ के सामने साईं बाबा खड़े रहते थे। रथ तथा साईं बाबा के बीच भजन गाने वाले भक्त रहते थे। भजन गाने वाली महिलाएँ और पुरुष ठीक समय पर उपस्थित हो जाते थे। हाथों में ताल, करताल, ढोलक, मृदंग, खंजरी और कई तरह के वाद्य यंत्र होते थे। साईं बाबा सबके केन्द्र और चुम्बक थे जो अपने सभी भक्तों को आकर्षित करके रखते थे।

बाहर खुली जगह में कुछ भक्त मशालों को ठीक करत थे, कुछ लोग पालकी की सजावट करते थे और कुछ लोग हाथों में बेत और छड़ी लिये "साईं बाबा की जय" बोलते थे। मस्जिद का कोना तोरण-पताका और झण्डियों से सजाया जाता था। मस्जिद के चारों ओर जलती हुई मशालों की रोशनी की जाती थी।

साईं बाबा के घोड़े का नाम "श्याम कर्ण" था। श्याम कर्ण घोड़ा पूरी तरह से सज-धज कर बाहर खड़ा रहता था। तब तात्या पाटिल कुछ लोगों के साथ आता था और साईं बाबा को तैयार रहने के लिये कहता था। साईं बाबा तब तक अपने आसन पर शान्त बैठे रहते थे। तात्या पाटिल आकर उनकी बगल में हाथ डाल कर उन्हें उठाता था। तात्या साईं बाबा को मामा कहता था। सचमुच में साईं बाबा और तात्या पाटिल का रिश्ता बहुत अधिक गहरा, नजदीकी और हार्दिक था।

साईं बाबा अपने शरीर पर हमेशा की तरह कफनी पहने रहते थे। वे अपने 'सटका' (लकड़ी) उठा कर अपने बगल में दबा कर रख लेते थे। अपनी चिलम और तम्बाखू रखने के बाद अपने कन्धे पर एक कपड़ा डाल कर तैयार हो जाते थे। तब तात्या साईं बाबा के शरीर पर सुनहरी जरी से सुसज्जित सुन्दर 'शेला' डालता था। इसके बाद बाबा अपने दाहिने पैर के अंगूठे से पीछे रखे हुये ईंधन के गट्ठे को थोड़ा सा हटा कर जलते हुये लैम्प को अपने दाहिने हाथ से बुझा कर चावड़ी के लिये प्रस्थान करते थे।

तब लोग सभी प्रकार के बाजे बजाते थे जिनमें तासे, मृदंग, वीणा, झांझ, मंजीरा, शहनाई, तुरही, ढोलक आदि शामिल रहते थे। बाजे के साथ साथ लोग भगवान तथा साईं बाबा का भजन गाते और साईं बाबा की जयजयकार करते हुये जुलूस के रूप में साईं बाबा के साथ चलते थे। कुछ लोग खुशी से रास्ते पर नाचते थे। पुरुष और महिलाएँ साईं बाबा का गुणगान करते हुये उनकी लीलाओं को भजन के रूप में गाते हुये चलते थे। कुछ लोग अपने हाथों में झण्डे और पताके रखे रहते थे।

जब साईं बाबा मस्जिद की सीढ़ियों पर आते थे तब मालदार साईं बाबा के नाम की घोषणा करते थे। बाहर सड़क पर जलती हुई मशअलों की रोशनी रहती थी और रंग-बिरंगी आतिशबाजियाँ चलाई जाती थीं। साईं बाबा के दोनों ओर दो आदमी चँवर लिये खड़े रहते थे और दूसरे लोग बाबा को पंखा झलते थे। रास्त पर एक के बाद दूसरा पाँवड़ा बिछाया जाता था जिन पर भक्तों के हाथों का सहारा ले कर साईं बाबा चलते थे। तात्या पाटिल साईं बाबा का बायाँ हाथ पकड़ता था और म्हालासपति दाहिना हाथ थामता था। इस प्रकार साईं बाबा चावड़ी जाते थे।

पूरी तरह से सजा हुआ बाबा का श्याम कर्ण घोड़ा जुलूस का नेतृत्व करता था। चावड़ी यात्रा में श्याम कर्ण घोड़ा सबसे आगे चलता था। श्याम कर्ण के पीछे गाड़ियाँ, पैदल चलने वाले भक्त और संगीत तथा भजन गाने वाले भक्तों की भीड़ चलती थी। भक्तों के द्वारा अविराम गति से गाये जाने वाले और "श्री हरि" के भजन तथा साईं बाबा के यश के भजन एवं जयजयकार की अविराम ध्वनि आकाथ को चीर देती थी। इस प्रकार जुलूस जब कोने पर पहुँचता था तब जुलूस में शामिल होने वाले सभि लोग अत्यन्त प्रसन्न हो जाते थे।

मोड़ पर आने के बाद साईं बाबा चावड़ी की ओर मुँह करके खड़े हो जाते थे। उस समय वे अद्भुत और ईश्वरीय ज्योति से देदीप्यमान हो जाते थे। उस समय ऐसा लगता था कि साईं बाबा उषाकाल की ज्योति से जगमगा रहे हों अथवा सूर्योदय की दिव्य ज्योति उनके अंग-प्रत्यंग से नकल रही हो। साईं बाबा उस समय अपने मन की पूरी एकाग्रता से ध्यानावस्थित हो कर उत्तर दिशा की ओर से बुला रहे हों। उस समय साईं बाबा कुछ समय तक अपनी दाहिनी भुजा को ऊपर उठाते और नीचे ले जाते थे। तभी सब वाद्य यंत्र एक साथ सबसे उत्तम संगीत बजाते थे। उसी समय काका साहब दीक्षित चांदी की तश्तरी में लाल गुलाल से सने हुये फल और फूलों की पंखुड़ियाँ ले कर बाबा के सामने आते और बाबा के शरीर पर बाबा बार गुलाल और फूल छिड़कते थे और साईं बाबा की मुख-मुद्रा अतिरिक्त सुन्दरता और अधिक ज्योति से चमकती थी। सभी उपस्थित लोग अपने हृदय के छकते तक अपनी आँखों से साईं बाबा के उस अलौकिक रूप को पीते थे। उसी समय कभी कभी म्हालासपति ऐसे नाचना शुरू कर देता था जैसे उस पर देवता की शक्ति सवार हो गई हो। परन्तु सभी यह देख कर अचरज में डूब जाते थे कि साईं बाबा के ध्यान में तिल भर भी विघ्न नहीं पड़ता था।

हाथ में लालटेन ले कर तात्या पाटिल साईं बाबा के बायीं तरफ चलता था। साईं बाबा के लम्बे कपड़े का छोर अपने हाथ में उठाये दाहिनी ओर भगत म्हालासपति चलता था। क्या ही सुन्दर जुलूस होता था और भक्ति की कैसी सुन्दर अभिव्यक्ति होती थी! उसे देखने और उसका रसास्वादन लेने के लिये शिरडी के नर-नारी, गरीब-अमीर झुण्ड के झुण्ड एकत्र होते थे। मोड़ से आगे साईं बाबा बहुत ही धीमी गति से आगे चलते थे। भक्त गण उनके दोनों ओर भक्ति और प्रेम से बाबा के साथ साथ चलते थे। चारों ओर व्याप्तआनन्दमय वातावरण में जुलूस चावड़ी पहुँचता था। वे दिन और वे दृश्य अब लुप्त हो चुके हैं। अब या भविष्य में उन दिनों और दृश्यों को मन की आँखों के सामने गहरे ध्यान से दृष्टिगोचर कर हम अपने मन और हृदय में प्रेम और आनन्द का अनुभव कर सकते हैं।

चावड़ी की सजावट पहले से ही कर ली जाती थी। चावड़ी के कमरे की भीतरी छत (सीलिंग) सुन्दर और एकदम सफेद थी। कमरे में बड़े बड़े दर्पण लटके थे और छत में तरह तरह के लैम्प लगे हुये थे। चावड़ी के उस कमरे में पहुँचने पर तात्या आगे जाता था और एक आसन बिछाता था तथा उसके एक किनारे पर दीवाल से टिका कर एक बड़ी गोल तकिया रखता था। उस आसन पर तिकिये के सहारे साईं बाबा को बैठाता था। इसके साथ ही साईं बाबा को आग्रहपूर्वक सुन्दर अंगरखा पहनाता था। फिर बाबा के भक्त कई तरह से उनकी पूजा करते थे। वे साईं बबा के उनके सिर पर रत्नजटित मुकुट पहनाते थे। उस मुकुट के ऊपर कीमती तुर्रा लगा रहता था। भक्त लोग साईं बाबा के मस्तक पर हीना मिश्रित चन्दन लगाते थे। वे तिलक "वैष्णव तिलक" होते थे अर्थात् माथे पर बीच में गोल बिन्दी और बिन्दी को छूती हुई चन्दन की दो खड़ी रेखाएँ खींचते थे। वे साईं बाबा के अलौकिक चमचमाते हुये चेहरे को अपने हृदय के छकते तक लम्बे समय के लिये अपलक नेत्रों से देखा करते थे। साथ ही लोग बाबा से डरते भी थे कि कहीं वे अपने सिर पर रखे हुये रत्नों के मुकुट को सिर से निकाल कर फेंक न दें। इसलिये लोग बाबा के सिर पर रखे हुये मुकुट को बार बार बदल देते थे। वास्तव में बाबबा तो निस्पृहता के अवतार थे। उनको संसार की कीमती से कीमती के लिये न तो मोह था और न तिल भर भी आसक्ति। किन्तु अन्तर्यामी साईं बाबा अपने भक्तों की श्रद्धा, प्रेम, भक्ति और आत्म समर्पण को अच्छी तरह जानते थे। इसलिये वे भक्तों के आनन्द के लिये लीलाएँ करते थे। अपने उस श्रृंगार के कारण साईं बाबा अद्भुत रूप से सुन्दर दिखाई देते थे।

नाना साहब निमोनकर अत्यन्त सुन्दर लोलक जैसे गोलाकार खुला हुये छत्ता पकड़े रहते थे। बापू साहब जोग चांदी की थाली में साईं बाबा के चरण धोते थे और लोगों को अर्ध्य बाँटते थे तथा विधि-विधान से साईं बाबा की पूजा करते थे। तब साईं बाबा की भुजाओं पर घिसे हुये चन्दन का लेप करते थे और बाबा को पान (ताम्बूल) देते थे। साईं बाबा आसन (गद्दी) पर बैठे रहते थे। उस समय तात्या और दूसरे भक्त खड़े रहते थे और साईं बाबा के चरणों पर गिर कर उन्हें प्रणाम करते थे। भक्त लोग उनके दोनों ओर चँवर डुलाते और पंखे झलते थे।

शामा चिलम तैयार करके लाता था और उसे तात्या के हाथ में दे देता था। तात्या चिलम को फूँक मार कर आग की लपट निकालता था और फिर उस जलती हुई चिलम को साईं बाबा के हाथ में दे देता था। चिलम पी लेने के बाद बाबा उस चिलम को म्हालासपति को देते थे। फिर वहाँ उपस्थित सभी लोग बारी बारी से उस चिलम को पीते थे। साईं बाबा तो पूर्ण रूप से विरक्त और अनासक्त थे। इसलिये वे हीरे-जवाहरात के हार और अन्य रत्नों के हार-श्रृंगार की दूसरी मूल्यवान वस्तुओं की तिल भर भी परवाह नहीं करते थे। उन्हें अत्यन्त ही तुच्छ समझते थे किन्तु अपने भक्तों के प्रति अपने सच्चे प्रेम के कारण और प्रेम तथा श्रद्धा से भरे हुये भक्तों का मन रखने के लिये भक्तों को अपनी भावना के अनुसार काम करने देते थे जिससे भक्त गण प्रसन्न रहें।

अन्त में बापू साहब जोग समस्त विधि-विधान के साथ साईं बाबा की आरती करते थे। उस समय सभी संगीत-वाद्य मंगल गीत बजाते थे। जब रात्रि की यह सन्ध्या आरती हो जाती थी तब भक्त गण साईं बाबा को साष्टांग दण्डवत् प्रणाम कर उनसे आज्ञा ले एक के बाद एक अपने अपने घर चले जाते थे।

जब चिलम भर कर साईं बाबा को देने और बाबा को गुलाब जल प्रदान करने के बाद तात्या पाटिल घर जाने के लिये उठता था तब साईं बाबा उससे प्रेमपूर्वक कहते थे कि 'मेरी रक्षा करो। अगर जाना चाहते हो तो जवो पर रात को किसी भी समय आ जाना और मेरे बारे में पता लगा लेना।' सकारात्मक उत्तर दे कर तात्या चावड़ी छोड़ कर अपने घर चला जाता था। तब साईं बाबा अपने बिस्तर स्वयं लगाते थे। वे एक के ऊपर एक पचास से साठ तक सफेद चादर बिछाते थे और उसी बिछौने पर शयन करते थे।

(क्रमशः)

Wednesday, February 20, 2008

साईं बाबा (34)

लेखकः स्व. श्री हरिप्रसाद अवधिया

भभूत अथवा ऊदी की शक्ति

जामनेर का चमत्कार

लगभग सन् 1904-05 में नाना साहब चान्दोरकर खानदेश जिले के जामनेर में मामलतदार थे। जामनेर शिरडी से 100 मील से अधिक दूर है। उनकी पुत्री मैना ताई उस समय गर्भवती थी और उस जजकी होने वाली थी। वह अपने पिता चान्दोरकर के पास ही जामनेर में थी। उसकी दशा बहुत ही गम्भीर थी और दो या तीन दिनों से वह प्रसव पीड़ा से कष्ट पा रही थी। नाना साहब ने सभी प्रकार के उपचार कराये पर सब व्यर्थ गया। तब उन्होंने साईं बाबा को स्मरण किया और उनसे सहायता मांगी।

उधर शिरडी में रामगिर बुवा ने खानदेश में स्थित अपने पैतृक घर में जाने की इच्छा की। साईं बाबा रामगिर बुवा को बापूगिर बुवा कहते थे। साईं बाबा ने रामगिर उर्फ बापूगिर बुवा को अपने पास बुलाया और उसे कुछ समय के लिये जामनेर में जा कर नाना साहब चान्दोरकर के पास रुकने के लिये कहा।

रामगिर उर्फ बापूगिर बुवा ने साईं बाबा को बताया कि उसके पास केवल जलगाँव तक ही रेल टिकट लेने लायक रुपये हैं इसलिये जलगाँव से 30 मील दूर जामनेर तक जा पाना सम्भव नहीं हो पायेगा। साईं बाबा ने रामगिर को आश्वासन दिया कि वह चिन्ता न करे, जामनेर तक जाने की सुविधा उसे मिल जावेगी। उसके बाद बाबा ने शामा को कह कर माधव आदकर के द्वारा रची गई आरती की एक प्रति तैयार करने के लिये कहा और उस प्रति को भभूत के साथ नाना साहब चान्दोरकर को जामनेर में देने के लिये रामगिर बुवा को दे दिया।

रामगिर बुवा ने शिरडी से प्रस्थान किया और लगभग दो बज कर पैंतालीस मिनट के समय रात को जलगाँव पहुँच गया। उस समय उसके पास केवल दो आने बचे थे और उसकी दशा बहुत खराब थी। तभी किसी ने कहा, "शिरडी का बापूगिर बुवा कौन है?" वह उसके पास गया और बोला, "मैं बापूगिर बुवा हूँ।" उस व्यक्ति ने बताया कि वह चान्दोरकर के द्वारा उसे लेने के लिये भेजा गया चपरासी है।

उस चपरासी ने रामगिर बुवा को एक बहत ही अच्छे तांगे पर बैठाया जिसमें दो बहुत ही अच्छे घोड़े जुते हुये थे। चपरासी के साथ एक तांगा चलाने वाला भी था। तांगा तेजी के साथ दौड़ने लगा। सबेरे वे लोग एक छोटे नाले के पास पहुँच गये। वहाँ पहुँच कर तांगेवाले ने तांगा रोका और घोड़ों को पानी पिलाने के लिये तांगे से अलग किया। चपरासी की दाढ़ी-मूछ और वर्दी देख कर रामगिर बुवा को सन्देह हुआ कि यह मुसलमान है और इसलिये उसका दिया हुआ नाश्ता खाने में हिचकिचाया। उसको पेशोपेश में देख कर चपरासी ने कहा, "मैं हिन्दू हूँ और गढ़वाल जिले का रहने वाला क्षत्रिय हूँ। यह नाश्ता नाना साहब ने उसके लिये भेजा है। इसे खाने में संकोच करने की कोई आवश्यकता नहीं है।" नाश्ता करने के बाद दोनों तांगे में बैठ कर आगे चले और वे उषाकाल में जामनेर पहुँच गये। रामगिर बुवा लघुशंका के लिये तांगे से उतरा और कुछ ही मिनट के बाद वापस आने पर यह देख कर विस्मित रह गया कि वहाँ पर तांगा, घोड़ा, तांगे वाला और चपरासी कोई भी नहीं था।

रामगिर बुवा नाना साहब चान्दोरकर के घर पहुँचा और साईं बाबा के द्वारा दिये गये आरती और भभूत दे दी। उस समय मैना ताई की दशा बहुत ही गम्भीर थी और सब उसके बारे में चिन्ता कर रहे थे। नाना साहब ने अपनी पत्नी को बुलाया और उसके हाथ में भभूत दे कर उसे पानी में घोल कर मैना ताई को पिला देने के लिये कहा, साथ ही आरती गाने के लिये भी कहा। चान्दोरकर ने सोचा कि साईं बाबा की सहायता समयोचित है और साईं बाबा की कृपा से वह सहायता मिली थी। थोड़ी ही देर में नाना साहब चान्दोरकर को सूचना मिली कि प्रसव उचित और सुरक्षित ढंग से हो गया है और खतरा टल गया है।

जब रामगिर बुवा ने नाना साहब चान्दोरकर को तांगा और नाश्ता भेजने के लिये धन्यवाद दिया तब वे अचरज में पड़ गये और बोले, "मैंने तो किसी को नहीं भेजा था। मुझे तो मालूम भी नहीं था कि शिरडी से कोई आ रहा है।"

(क्रमशः)

Monday, February 18, 2008

साईं बाबा (33)

लेखकः स्व. श्री हरिप्रसाद अवधिया

धूनी और भभूत या ऊदी

साईं बाबा अपने निवास स्थान द्वारकामाई मस्जिद में हमेशा धूनी जलाया करते थे। वह धूनी दिन-रात जलती रहती थी। साधु-सन्तों में से कुछ धूनी जलाते हैं किन्तु साईं बाबा के द्वारा जलाई गई धूनी अद्भुत और दिव्य थी। शिरडी में वही धूनी निरन्तर और अनवरत रूप से जलायी जा रही है। धूनी जलाना, अग्नि में हवन करना अग्निहोत्री ब्राह्मण का कर्तव्य और कर्म है। साईं बाबा के द्वारा प्रज्वलित धूनी से यह स्पष्ट और प्रमाणित है कि वे अवश्य ही अग्निहोत्री ब्राह्मण थे।

साईं बाबा दक्षिणा लेते थे। दक्षिणा से जो मिलता था उसका बहुत बड़ा हिस्सा दान में दे देते थे। दक्षिणा के पैसे से ही वे लकड़ी खरीदते थे जिसको धूनी में जलाते थे। लकड़ी जल जाने के बाद धूनी में भभूत या ऊदी रह जाती थी। धूनी की वह भभूत बहुत लाभदायक होती थी। वह भभूत लोगों के शारीरिक कष्ट और मानसिक बीमारियों को दूर कर देती थी। साईं बाबा के दर्शन करने के लिये कई भक्त आते थे। जब कोई भक्त साईं बाबा से विदा ले कर जाने लगता था तब बाबा उसे प्रसाद के रूप में भभूत देते थे। किसी भक्त के माथे पर वे भभूत लगा कर उसके सिर पर अपने वरद हस्त रख कर आशीर्वाद देते थे। साईं बाबा कभी प्रसन्न मन से अत्यन्त मधुर स्वर में गाते थे। उनके गीत की प्रथम पंक्ति होती थी - "रमते राम आओ जी आओ जी, उदिया की गोनिया लाओ जी।" भभूत से कई भयानक बीमारियाँ ठीक हो जाती थीं। आज भी उनकी धूनी की भभूत बीमारों को स्वस्थ कर देती है।

भभूत अथवा ऊदी की शक्ति

बिच्छू का डंक

नासिक निवासी नारायण मोतीराम जानी साईं बाबा का भक्त था। वह साईं बाबा के दूसरे भक्त रामचन्द्र वामन मोडक के पास नौकर के रूप में काम कर अपनी जीविका चलाता था। एक बार नारायण मोतीराम जानी अपने मां के साथ साईं बाबा के दर्शन करने के लिये शिरडी आया। उस समय स्वयं बाबा ने उसकी मां से कहा कि उसका लड़का दूसरे की नौकरी छोड़ दे और स्वतंत्र रूप से अपने रोजगार शुरू कर दे। नारायण जानी ने नौकरी छोड़ दी और अपने मां के साथ नासिक में "आनन्दाश्रम" नाम से छात्रावास चलाने लगा। उसका छात्रावास जल्दी ही पनप गया और उसको पर्याप्त आमदनी होने लगी।

एक बार नारायण राव के एक मित्र को बिच्छू ने डंक मार दिया। जहाँ पर बिच्छू ने डंक मारा था उस हिस्से में असह्य पीड़ा होने लगी। नारायण राव डंक वाले स्थान पर लगाने के लिये भभूत ढूंढने लगा पर उसे भभूत नहीं मिली। तब वह साईं बाबा के चित्र के सामने खड़ा हो गया और उनसे सहायता करने की प्रार्थना की। साईं बाबा का नम लिये चित्र के सामने जलती हुई अगरबत्ती से एक चुटकी भभूत निकाली। साईं बाबा की धूनी की भभूत समझते हुये उसे जहाँ दर्द हो रहा था वहाँ पर लगा दिया। जैसे ही नारायण ने वह भभूत लग कर अपनी उंगली हटायी वैसे ही दर्द गायब हो गया। दोनों ही व्यक्ति आश्चर्य-चकित हो गये और बहुत अधिक प्रसन्न हुये। साईं बाबा की धूनी की भभूत में ऐसी शक्ति आज भी है।

गिल्टी वाला प्लेग

एक बार बम्बई (वर्तमान मुंबई) के बान्द्रा के निवासी साईं बाबा के एक भक्त को पता लगा कि किसी दूसरी जगह रहने वाली उसकी लड़की को प्लेग हो गया है और गिल्टियाँ भी निकल आई हैँ। उस समय उसके पास बाबा की धूनी की भभूत नहीं थी। उसने नाना साहब चान्दोरकर के पास भभूत भेजने के लिये सूचना भेजी। नाना साहब चान्दोरकर उस समय अपने पत्नी के साथ कल्याण जा रहे थे। थाना स्टेशन में वह सन्देश वाहक नाना साहब चान्दोरकर से मिला। वे समाचार तो पा गये पर उस समय उनके पास भी भभूत नहीं थी। इसलिये उन्होंने जमीन से कुछ मिट्टी उठाई, साईं बाबा का ध्यान किया और प्रार्थना करने के बाद उस मिट्टी को अपने पत्नी के माथे पर लगा दिया। उस भक्त ने चान्दोरकर के काम को देखा और जब वह अपनी लड़की के घर गया तो पाया कि उसकी लड़की की गिल्टी वाले प्लेग की बीमारी और गिल्टियाँ गायब हो चुकी हैं और वह एकदम स्वस्थ हो गई है।

हर्दा का सज्जन

मध्य प्रदेश में हर्दा नाम का शहर था जहाँ एक वृद्ध सज्जन को मूत्राशय में पथरी की बीमारी हो गई। पथरी की बीमारी में आपरेशन कर पथरी को बाहर निकालते हैं। लोगों ने हर्दा के उस वृद्ध सज्जन को आपरेशन के द्वारा पथरी को बाहर निकलवा लेने की राय दी।

वह सज्जन बूढ़ा और कमजोर था। उसमें शल्य चिकित्सा कराने के लिये मनोबल नहीं था। उसका कष्ट जल्दी ही दूसरे तरीके से दूर होने वाला था। हर्दा का इनामदार उस समय वहाँ आया था। वह साईं बाबा का भक्त था और उसके पास शिरडी की धूनी की भभूत का संग्रह हमेशा रहता था। मित्र के द्वारा सिफारिश किये जाने पर उस रोगी का पुत्र इनामदार के पास से कुछ भभूत मांग लाया और उसे पानी में घोल कर अपने पिता को पिला दिया। पाँच मिनट के भीतर वह भभूत उस वृद्ध के भीतर एकत्र हुआ और उसकी पथरी उसमें घुल गई। घुली हुई पथरी पेशाब के सा बाहर निकल गई। वह वृद्ध जल्दी ही स्वस्थ हो गया। भभूत में आज भी ऐसी अद्भुत शक्ति है और हमेशा रहेगी।

(क्रमशः)

Saturday, February 16, 2008

साईं बाबा (32)

लेखकः स्व. श्री हरिप्रसाद अवधिया

शीघ्र ब्रह्म ज्ञान

एक अत्यन्त ही अधिक सम्पन्न व्यक्ति था (दुर्भाग्य से उसका नाम और पता अज्ञात है)। वह बहुत धनवान था। उसके पास अटूट धन-सम्पत्ति, कई घर, खेत, जमीन-जायदाद और बहुत से नौकर-चाकर थे। उसे किसी बात की कमी नहीं थी। जब साईं बाबा का यश उसके कानों तक पहुँचा तब एक दिन उसने अपने एक मित्र से कहा, "मुझे किसी बात की कमी नहीं है। इसलिये मैं शिरडी जाउंगा और साईं बाबा से ब्रह्म ज्ञान मांगूंगा। अगर मुझे ब्रह्म ज्ञान मिल जाता है तो मैं अवश्य ही अधिक सुखी हो जाउँगा।" उसके मित्र ने उसे समझाया कि 'ब्रह्म' को जानना सरल नहीं है और विशेष रूप से तुम जैसे लालची के लिये जो हमेशा धन, पत्नी और बच्चों में लिप्त रहता है। ब्रह्म ज्ञान की खोज में कौन तुम्हें सन्तुष्ट करेगा। तुम दान में एक पैसा भी तो नहीं देते हो।

अपने मित्र की सलाह पर ध्यान न देते हुये उस धनी व्यक्ति ने आने-जाने का (दोनों ओर का) किराया तय कर एक तांगे से शिरडी पहुँचा। वह मस्जिद में गया, साईं बाबा को साष्टांग दण्डवत् प्रणाम किया और बोला, "बाबा, यह सुन कर कि जो लोग यहाँ आते हैं उन सबको आप ही ब्रह्म का दर्शन करा देते हैँ, मैं भी अपने दूर के निवास स्थान से आया हूँ। मैं यात्रा से बहुत थक गया हूँ। यदि आपके पास से मुझे ब्रह्म ज्ञान मिल जाता है तो मेरा कष्ट सफल हो जावेगा।"

साईं बाबा ने कहा, "मेरे प्यारे मित्र, उतावला मत होवो। मैं तुमको तुरन्त ब्रह्म दिखा दूंगा। मेरे सभी काम नकद होत हैं, उधारी नहीं। कई लोग मेरे पास आते हैं और मुझसे धन, स्वास्थ्य, सम्मान, ऊँचा पद, बीमारी से छुटकारा और दूसरे सांसारिक पदार्थ मांगते हैं। क्वचित व्यक्ति मेरे पास ब्रह्म ज्ञान मांगने के लिये आता है। उन आदमियों की कमी नहीं है जो सांसारिक वस्तुएँ मांगते हैं पर मैं उस क्षण को भाग्यशाली और शुभ मानता हूँ जब तुम्हारे समान व्यक्ति आते और मुझसे ब्रह्म ज्ञान देने का आग्रह करते हैं। इसलिये मैं तुम्हें ब्रह्म के सभी उपकरणों और उलझनों के साथ 'ब्रह्म' दिखाउंगा।

यह कह कर बाबा ने उसे ब्रह्म दिखाना प्रारम्भ किया। उन्होंने उसको वहाँ बैठाया और दूसरी बातों तथा विषयों में लगा दिया। इस तरह से उन्होंने उसे थोड़े समय के लिये अपने मूल प्रश्न को भूलने में लगा दिया। फिर उन्होंने एक लड़के को बुलाया और उसे नन्दू मारवाड़ी के पास जा कर उससे पाँच रुपये उधारी मांग कर लाने को कहा। लड़का बाहर गया और कुछ ही देर बाद वापस आ कर बोला, "नन्दू नहीं है। उसके घर में ताला लगा हुआ है।" तब बाबा ने उसको बाला जी किराने वाले के पास से उधार मांग कर लाने को कहा। इस बार भी लड़का असफल रहा। यह प्रयोग दो या तीन बार दुहराया गया पर सफलता नहीं मिली।

साईं बाबा तो स्वयं ब्रह्म के सगुण अवतार थे। तब कोई यह पूछ सकता है कि पाँच रुपये की एकदम तुच्छ राशि क्यों चाह रहे थे और उसके लिये इतनी उठा-पटक क्यों कर रहे थे? सचमुच में बाबा को उस नगण्य राशि की कोई आवश्यकता नहीं थी। वे अवश्य ही यह भी जानते थे कि नन्दू और बाला जी नहीं मिलेंगे। ऐसा मालूम पड़ता है कि उन्होंने ब्रह्म पाने के लिये आये हुये उन व्यक्ति की परीक्षा लेने के लिये यह तरीका अपनाया। उस सज्जन की जेब में उस समय नोटों का पुलिन्दा था। यदि उसकी सचमुच ही ब्रह्म देखने की हार्दिक इच्छा होती तो जिस समय बाबा पाँच रुपये उधार लेने के लिये प्रयत्न कर रहे थे उस समय वह चुपचाप मूक दर्शक बने नहीं बैठा रहता और अपने पास से रुपये निकाल कर दे दिया होता। उसे मालूम था कि बाबा अपने वचन का पालन अवश्य करेंगे और उधार ली हुई रकम वापस कर देंगे। तो भी वह निश्चय नहीं कर सका और उसने उधार नहीं दिया। ऐसा आदमी बाबा से संसार की सबसे बड़ी वस्तु 'ब्रह्म ज्ञान' लेना चाहता था।

कोई भी दूसरा आदमी जिसके हृदय में साईं बाबा के प्रति प्रेम और भक्ति होती तो वह केवल देखता नहीं रहता किन्तु वह पाँच रुपये निकाल कर दे दिया होता। उसने न तो पैसा ही दिया और न चुप ही बैठा रहा किन्तु अधीर हो गया क्योंकि वह वापस जाने की जल्दी में था। उसने कहा, "मुझे जल्दी ब्रह्म दिखाइये।" साईं बाबा ने जवाब दिया, "मेरे मित्र, इस स्थान पर बैठ कर तुम्हें ब्रह्म दिखाने के लिये जो काम मैंने किया उसे तुमने नहीं समझा। थोड़े में वह यह है कि ब्रह्म देखने के लिये पाँच चीजें समर्पित करनी पड़ती हैं - (1) पंच प्राण (प्राण, अपान, सपान, उदान और व्यान), (2) पंच ज्ञानेन्द्रियाँ, (3) मन, (4) बुद्धि और (5) अहंकार। ब्रह्म ज्ञान अथवा आत्म ज्ञान का मार्ग इतना कठिन है जितना तलवार की धार पर चलना।

तब साईं बाबा ने ब्रह्म ज्ञान विषय पर लम्बा प्रचन दिया जो संक्षेप में इस प्रकार है - ब्रह्म ज्ञान या आत्म ज्ञान के लिये योग्यताएँ चाहिये। अपने जीवन काल में सभी लोग ब्राह्म ज्ञान का अनुभव नहीं करते। इसके लिये कुछ गुण पूरी तरह से जरूरी हैं:-

(1) मुमुक्षत्व:- मुमुक्ष या मुक्त होने की तीव्रतम इच्छा रखने वाले ही ब्रह्म ज्ञान पा सकते हैं। जो यह सोचते हैं कि मैं माया-जाल में फँसा हूँ - मुझे अवश्य ही माया के बन्धन से छूटना ही चाहिये, जो अपने लक्ष्य को प्राप्त कर लेने के लिये किसी की परवाह न करते हुये दृढ़तापूर्वक तपस्या और साधना करता है वही आध्यात्मिक जीवन के योग्य होता है।

(2) विरक्ति या वैराग्य:- जो इस संसार की और दूसरी दुनिया की वस्तुओं और सुखों की इच्छा नहीं रखता वही ब्रह्म ज्ञान का अधिकारी होता है। जब तक किसी के मन में लौकिक और पारलौकिक सुखों के प्रति लगाव है तब तक कोई भी ब्रह्म ज्ञान पाने का अधिकारी हो ही नहीं सकता।

(3) अन्तर्मुखता:- ईश्वर के द्वारा हमारी इन्द्रियों की रचना इस प्रकार की गई है कि उनकी प्रकृति और प्रवृति बाहर जाने और घूमने की है। इसलिये आदमी हमेशा बाहर ही देखता है - अन्तर्मुखी नहीं होता। जो आत्मज्ञान और अमरत्व चाहता है उसे अवश्य ही अन्तर्दृष्टि करके अपनी आत्मा को ही देखना ही होगा।

(4) निष्पाप मन:- जब तक कोई व्यक्ति दुष्टता नहीं छोड़ता, गलत काम करने से नहीं रुकता और पूरी तरह सा अपने आपको शान्त नहीं रखता तब तक वह ज्ञान प्राप्त कर लेने के बाद भी उस ज्ञान के द्वारा आत्म ज्ञान नहीं पा सकता।

(5) सही आचरण:- जब तक कोई व्यकति सचाई का जीवन नहीं बिताता तब तक वह ईश्वर का दर्शन नहीं कर सकता।

(6) प्रेयस की अपेक्षा श्रेयस को स्वीकार करना:- स्थितियाँ दो प्रकार की होती हैं - प्रेयस और श्रेयस। प्रेयस का अर्थ है सांसारिक सुख का जीवन और श्रेयस का अर्थ है 'अच्छाई'। श्रेयस अध्यात्म की ओर ले जाता है और प्रेयस संसार की ओरढकेलता है। ये दोनों अपने आपको स्वीकार कराने के लिये आदमी के मन में आते हैं। उस मनुष्य को दोनों में से एक को ग्रहण करने के लिये सोचना पड़ता है। बुद्धिमान मनुष्य सांसारिक सुख की अपेक्षा अच्छाई और अध्यात्म (श्रेयस) को अधिक पसन्द करता है परन्तु जो व्यक्ति बुद्धिमान नहीं है वह मनुष्य लोभ और मोह के कारण प्रेयस अथवा क्षणिक सांसारिक सुख को चुन लेता है।

(7) मन और इन्द्रियों पर नियंत्रण:- शरीर रथ है और आत्मान उसका स्वामी है। बुद्धि सारथी है। मन लगाम है। इन्द्रियों से शरीर रूपी रथ में जुते हुये घोड़े हैं और इन्द्रयों के द्वारा ग्रहण की जाने वाली वस्तुएँ मार्ग हैं जिनको समझ नहीं है, जिनका मन सीमित नहीं है और जिनकी इन्द्रियाँ रथ में जुते हुये खराब घोड़ों के समान वश में नहीं है और अनियंत्रित हैं वे गन्तव्य स्थान तक नहीं पहुँचते अर्थात् ब्रह्म ज्ञान नहीं पाते किन्तु जन्म-मरण के चक्र में घूमते रहते हैं। इसके विपरीत जिसको समझ है, जिसका मन नियंत्रित है और जिसका मन रथ में जुते हुये अच्छे घोड़े के समान नियंत्रित है वह अपने गन्तव्य ब्रह्म ज्ञान या आत्म साक्षात्कार तक पहुँचता है अर्थात् ब्रह्म ज्ञान प्राप्त करता है और जन्म-मृत्यु के बन्धन से मुक्त हो जाता है। फिर उसका पुनर्जन्म नहीं होता। ऐसा ज्ञानी विष्णु लोक में पहुँच जाता है।

(8) मन की शुद्धता:- जब तक कोई व्यक्ति निर्लिप्त रह कर, सन्तोषजनक और निष्काम रूप से अपने जीवन काल में निर्धारित अपने कर्तव्यों का पालन नहीं करता है तब तक उसका मन शुद्ध नहीं होता और जब तक मन शुद्ध नहीं होता तब तक वह ब्रह्म ज्ञान प्राप्त नहीं कर सकता। केवल शुद्ध मन में ही विवेक और वैराग्य जागृत होता है और उसे आत्म ज्ञान तक ले जाता है। जब तक अहंकार का नाश नहीं हो जाता, लोभ से छुटकारा नहीं मिल जाता और मन इच्छा-रहित नहीं हो जाता तब तक ब्रह्म ज्ञान प्राप्त करना असम्भव है। यह विचार कि - "मैं शरीर हूँ - बहुत बड़ी माया और इन्द्रजाल तथा जन्म-मरण के बन्धन का कारण है। इसलिये यदि तुम आत्म ज्ञन पाना चाहते हो तो इस विचार और मोह को एकदम छोड़ दो।

(9) गुरु की आवश्यकता:- आत्म ज्ञान इतना सूक्ष्म और रहस्यमय है कि कोई भी व्यक्ति कभी भी अपने स्वयं के व्यक्तिगत प्रयास से ब्रह्म ज्ञान प्राप्त नहीं कर सकता। इसलिये जिस गुरु ने स्वयं आत्म ज्ञान प्राप्त कर लिया है उस गुरु की सहायता नितान्त आवश्यक और अनिवार्य है। जो ज्ञान कठिन परिश्रम और प्रयास करके भी दूसरे नहीं दे सकते उसे सद्गुरु की कृपा और सहायता से प्राप्त कर लेना सरल हो जाता है क्योंकि सद्गुरु जिस मार्ग से चल कर आत्म ज्ञान तक स्वयं पहुँचा है उसी मार्ग से अपने शिष्य को ले जा सकता है।

(10) ईश्वर की कृपा:- अन्त में ईश्वर की कृपा सबसे अधिक आवश्यक है। जब परमात्मा किसी पर प्रसन्न हो जाता है तब वह उसे विवेक और वैराग्य दे देता है।

इस बातचीत के बाद साईं बाबा उस सज्जन की ओर मुड़े जो ब्रह्म देखने आया था और बोले, "महाशय जी, आपकी जेब में दस दस रुपये के रूप में 250) हैं। साईं बाबा की सर्वज्ञता देख कर वह व्यक्ति बहुत प्रभावित हुआ और बाबा के चरणों पर गिर कर क्षमा और आशीर्वाद मांगा। तब बाबा ने उससे कहा, "अपने ब्रह्म अर्थात् नोटों के पुलिन्दे को ठीक से मोड़ कर अपने जेब में छिपा लो। जब तक तुम अपने लोभ से छुटकारा नहीं पावोगे तब तक तुम वास्तविक ब्रह्म को नहीं पावोगे। जब तक किसी का मन धन-सम्पत्ति, सन्तान और अपनी सांसारिक प्रगति में लिप्त है तब तक वह ब्रह्म ज्ञान पाने की आशा कैसे कर सकता है? धन का मोह भ्रम जाल से भरे हुये अहंकार के रूप में मगरमच्छ से भरा हुआ गहरा भँवर है। जो इच्छारहित है केवल वही अकेले अहंकार और लोभ के उस भँवर को पार कर सकता है। लोभ और ब्रह्म दो अलग अलग स्तम्भ हैं। वे दोनों अनादि काल से नित्य एक दूसरे के विपरीत हैं। जहाँ लोभ है वहाँ विचार और ब्रह्म का ध्यान करने के लिये कोई गुंजाइश नहीं है। मेरा खजाना भरा हुआ है और मैं किसी को भी वह दे सकता हूँ। किन्तु मुझे देखना पड़ता है कि जो मैं देता हूँ, उसे पाने के लिये वह योग्य पात्र है या नहीं। अगर तुम मेरी बात सावधानी से सुनते हो तो तुम्हें अवश्य ही लाभ होगा। इस मस्जिद में बैठ कर मैं कभी कोई झूठ नहीं बोलता।

साईं बाबा ने अपने उपदेश समाप्त किया। उस समय दूसरे भक्त भी वहाँ बैठे थे। जैसे किसी अतिथि के आने पर उसे जो उत्तम भोजन कराया जाता है वही भोजन उस समय घर के लोगों को भी खिलाया जाता है वैसे ही उस धनवान व्यक्ति को साईं बाबा ने जो आध्यात्मिक भोजन कराया उसका आस्वादन उन सब लोगों ने भी किया जो उस समय मस्जिद में उपस्थित थे। साईं बाबा का आशीर्वाद पाने के बाद उस धनवान व्यक्ति के सहित सभी सन्तुष्ट को कर चले गये।

(क्रमशः)

Wednesday, February 13, 2008

साईं बाबा (31)

लेखकः स्व. श्री हरिप्रसाद अवधिया

साईं बाबा और संस्कृत ज्ञान

बात उन दिनों की है जब शिरडी में द्वारकामाई मस्जिद में भीड़ बहुत अधिक नहीं लगती थी। उन दिनों किसी को विश्वास नहीं होता था कि साईं बाबा संस्कृत के प्रकाण्ड पण्डित हैं। उनके परम प्रिय भक्त नाना साहब चान्दोरकर संस्कृत बहुत अच्छी तरह जानते थे। उन्होंने गीता पर कई भाष्यों का अध्ययन किया था और उन्हें गर्व था कि वे संस्कृत के अच्छे विद्वान हैं। वे भी यही समझते थे कि साईं बाबा संस्कृत नहीं जानते हैं।

एक दिन साईं बाबा और चान्दोरकर अकेले बात कर रहे थे। चान्दोरकर साईं बाबा के चरण दबा रहे थे और कुछ गुनगुना रहे थे। साईं बाबा पूछ बैठे, "नाना, क्या गुनगुना रहे हो?"

चान्दोरकर बोले, "मैं संस्कृत के एक श्लोक का पाठ कर रहा हूँ।"

"कौन सा श्लोक?"

"भगवत्गीता से है।"

"जरा जोर से पाठ करो।"

नाना साहब चान्दोरकर ने जोर से पाठ किया -

"तद्विद्धि प्रणिपतेन परिप्रश्नेन सेवया।
उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्व दर्शिनः॥"
(गीता, अध्याय 4, श्लोक 14)

बाबा - नाना, क्या तुम इस श्लोक का अर्थ समझते हो?

नाना - हाँ।

बाबा - यदि तुम समझते हो तो मुझे बताओ।

नाना - इसका अर्थ यह है कि गुरु को साष्टांग दण्डवत प्रणाम करते हुये, गुरु की सेवा करते हुये, उनसे प्रश्न करते हुये सीखो कि यह ज्ञान क्या है। तब सद्वस्तु (ब्रह्म) का सत्य ज्ञान प्राप्त किये हुये ज्ञानी तुम्हें ज्ञान का उपदेश देंगे।

बाबा - मैं श्लोक के पूरे पद का इस तरह से संग्रह किया हुआ सारांश नहीं चाहता। मुझे प्रत्येक शब्द का व्याकरणिक प्रभाव, महत्व और अर्थ बताओ।

तब नाना साहब ने साईं बाबा को एक एक शब्द समझाया।

बाबा - नाना, क्या केवल साष्टांग दण्डवत् प्रणाम करना पर्याप्त है?

नाना - मैं 'प्रणिपात' शब्द का अर्थ साष्टांग दण्डवत् प्रणाम करने के सिवाय दूसरा नहीं जानता।

बाबा - 'परिप्रश्न' क्या है?

नाना - प्रश्न पूछना।

बाबा - प्रश्न का क्या अर्थ है?

नाना - वही, प्रश्न पूछना।

बाबा - यदि 'परिप्रश्न' और 'प्रश्न' का एक ही अर्थ है तो व्यास ने 'परि' उपसर्ग क्यों लगाया? क्या उसका सिर फिर गया था?

नाना - मैं 'परिप्रश्नेन' शब्द का दूसरा कोई अर्थ नहीं जानता।

बाबा - 'सेवा' शब्द से किस प्रकार की सेवा का तात्पर्य है?

नाना - वही जो हम लोग हमेशा करते हैं।

बाबा - क्या ऐसी सेवा पर्याप्त है?

नाना - मैं नहीं जानता कि 'सेवा' शब्द का इससे और अधिक क्या महत्व है।

बाबा - अगली पंक्ति 'उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं' में 'ज्ञानं' के स्थान पर दूसरा कोई और शब्द रख कर पढ़ सकते हैं?

नाना - हाँ 'अज्ञानं' रख कर भी पढ़ सकते हैं।

बाबा - 'ज्ञानं' के बदले 'अज्ञानं' शब्द ले लेने से क्या इस श्लोक का कोई अर्थ निकलता है?

नाना - नहीं। शांकर भाष्य में ऐसी कोई श्लोक रचना नहीं है।

बाबा - अगर शांकर भाष्य में नहीं है तो कोई हर्ज नहीं। यदि 'ज्ञानं' के स्थान पर 'अज्ञानं' रख देने से उसका बेहतर मतलब निकलता है तो क्या कोई आपत्ति है?

नाना - मैं नहीं समझता कि 'अज्ञानं' शब्द रख देने से शब्दों की व्याख्या, पदच्छेद, अन्वय और अर्थ कैसे कर सकते हैं।

बाबा - कृष्ण अर्जुन को ज्ञानी या तत्वदर्शी के पास जा कर साष्टांग दण्डवत करने, परिप्रश्न और सेवा करने का निर्देश क्यों देते हैं जब कि कृष्ण स्वयं 'तत्वदर्शन' और 'ज्ञान' ही हैं?

नाना - हाँ, वे थे तो। लेकिन मैं इसे नहीं समझ सकता हूँ कि कृष्ण ने अर्जुन को ज्ञानियों के पास जाने का निर्देश क्यों दिया।

बाबा - नाना, क्या तुम जैसा संस्कृत का विद्वान भी इसे नहीं समझ पा रहा है?

नाना चान्दोरकर की अब तक अवमानना हो चुकी थी। उनके गर्व का सिर नीचा हो चुका था। तब साईं बाबा ने समझाना शुरू किया।

(1) ज्ञानी के सामने केवल साष्टांग दण्डवत् प्रणाम करना ही पर्याप्त नहीं है। हमें सद्गुरु के प्रति पूर्ण रूप से शरणागति में जाना ही पड़ेगा।

(2) केवल प्रश्न करना ही पर्याप्त नहीं है। गुरु या सद्गुरु को किसी कारण से, अथवा उनसे आलस्यवश गलत उत्तर मिल जाने पर उनसे तर्क-वितर्क करने के उद्देश्य से ही प्रश्न करना कदापि वांछित नहीं है वरन सदैव अनुचित और अवांछनीय है। प्रश्न अवश्य गम्भीर होना चाहिये। मोक्ष या आध्यात्मिक प्रगति के लिये ही प्रश्न किया जाना चाहिये। यही 'परिप्रश्नेन' का अर्थ है।

(3) सेवा करते समय यह भावना रखना कि सेवा करते या न करने के लिये हम स्वतंत्र हैं - ऐसा सोच कर सेवा करना सेवा ही नहीं है। सेवा करने वाले को अवश्य ही अपने मन में यह भावना रखनी चाहिये कि मैं अपने शरीर का मालिक नहीं हूँ। शरीर गुरु का है, उस पर मेरा कोई अधिकार ही नहीं क्योंकि शरीर गुरु को समर्पित हो चुका है और केवल गुरु की सेवा करने के लिये ही यह शरीर जीवित है।

अगर यह किया जाय तो सद्गुरु तुम्हें दिखावेंगे कि श्लोक में आया हुआ शब्द 'अज्ञानं' क्या है।

नाना साहब चान्दोरकर की समझ में नहीं आया कि गुरु 'अज्ञान' की शिक्षा देता है।

तब बाबा ने समझाने के लिये कहा कि - 'ज्ञान' अथवा 'आत्मज्ञान' का उपदेश अपने भीतर के 'अज्ञान' का नाश करने पर ही प्रभावशील हो सकता है और 'अज्ञान' का नाश करने के लिये उसे जानना आवश्यक है। साईं बाबा ने इसे स्पष्ट करने के लिये गीता पर सन्त ज्ञानेश्वर के भाष्य का यह उदाहरण दिया -

(1) मग अज्ञान निमालिया मीच एक असे अपैसया सनिद्र स्वप्न गेलिया। आपण जसें

(2) ते अज्ञान जे समूल तुटे। तैं भ्रान्ती चें मसैरे फिटे।

गीता के श्लोक 18-66 पर भाष्य करते हुये सन्त ज्ञानेश्वर कहते हैं कि "ओ अर्जुन, यदि अज्ञान और नींद हटा दिये जावें तो तुम स्वयं ही तो हो। अंधेरे को दूर हटा देना ही प्रकाश है। 'द्वैत' की भावना मिटा देना ही तो 'अद्वैत' है। जब कभी हम 'द्वैत' को मिटाने की बात करते हैं तब हम 'अद्वैत' के बारे में ही तो बोलते हैं। जब कभी हम अंधेरे को मिटा देने की बात करते हैं तब हम प्रकाश की ही बात करते हैं। यदि हमें 'अद्वैत' का अनुभव करना है तब अपने भीतर रहने वाली 'द्वैत' भावना का उन्मूलन करना ही होगा। वही 'अद्वैत' की स्थिति है। द्वैत में रहने वाला ऐसा कौन है जो अद्वैत के बारे में बात कर सकता है। जब तक कोई अद्वैत की स्थिति में प्रवेश नहीं कर जाता तब तक यदि वह बोले भी तो कोई उस स्थिति को कैसे जान सकता है।

शिष्य भी वस्तव में सद्गुरु के समान ही है - ज्ञान का सदेह स्वरूप है। सद्गुरु और शिष्य दोनों के बीच प्रकृति, ऊँचे आत्मज्ञान की प्राप्ति, मानवीय शक्ति से ऊपर अलौकिक और दैवी सत्व, प्रतियोगिता से परे क्षमता तथा ऐश्वर्य योग (दैवी शक्ति) का अन्तर रहता है। सद्गुरु निर्गुण सच्चिदानन्द होते हैं। वास्तव में सद्गुरु मानव जाति के उत्थान करने और संसार को ऊपर उठाने के लिये मनुष्य का शरीर धारण किया हुआ होता है किन्तु उनकी यथार्थ निर्गुण प्रकृति इससे तिल भर भी नष्ट नहीं होती। उनका अस्तित्व अथवा 'सत्य', दैवी शक्ति और बुद्धि कभी भी कम न हो कर ज्यों की त्यों रहती है। वास्तव में शिष्य का भी यही स्वरूप होता है परन्तु वह अनेक जन्मों के संस्कारों के कारण अज्ञान से ढँका रहता है। यही अज्ञान उसे इस दृष्टि से अलग रखता है कि वह 'शुद्ध' और 'चैतन्य' है। भगवान श्री कृष्ण ने कहा है कि "अज्ञानेन आवृतं ज्ञानं तेन मुह्यान्ति जन्तवः" (गीता, अध्याय 5, श्लोक 16)। उस पर संस्कार पड़ा रहता है कि मैं जीव हूँ और तुच्छ प्राणी हूँ। गुरु को, अज्ञान की जड़ों को समूल उखाड़ फेंकना और उपदेश तथा निर्देश देना पड़ता है। जो शिष्य अनन्त जन्म जन्मान्तरों से माया-जाल में फँसा हुआ इन विचारों से जकड़ा रहता है कि मैं तुच्छ प्राणी हूँ, निर्बल और निर्धन हूँ, सैकड़ों जन्म से अज्ञान में पड़े हुये उस शिष्य के उसी अज्ञान का निवारण करने के लिये सद्गुरु उसे शिक्षा देते हुये बताते हैं कि "तुम ईश्वर हो, तुम शक्तिशाली, ऐश्वर्य सम्पनाना तथा शक्तिमान हो। तब कहीं वह शिष्य अत्यल्प मात्रा में समझता है की मैं ईश्वर हूँ। माया के इन्द्रजाल का यह स्थायी भ्रम कि मैं शरीर हूँ, मैं प्राणी अर्थात् जीव हूँ, ईश्वर मुझसे भिन्न है - एक भूल है जो असंख्य पूर्व जन्मों से चला आ रहा है। इस पर आधारित कर्मों से उसने सुख, दुःख और इन दोनों का मिश्रण प्राप्त किया है। इस मूल कारण , माया और भूल को हटाने के लिये वह अवश्य ही जाँच-पड़ताल शुरू करे। अज्ञान कैसे उत्पन्न हुआ? वह कहाँ है? इसे ही शिष्य को दिखा देना गुरु का उपदेश है। निम्न बातें अज्ञान के दृष्टांत हैं:-

1. मैं जीव (प्राणी) हूँ।
2. मैं शरीर हूँ।
3. ईश्वर, संसार और जीव अलग अलग हैं।
4. मैं ईश्वर नहीं हूँ।
5. यह नहीं जानना कि शरीर आत्मा नहीं है।
6. यह नहीं जानना कि ईश्वर, संसार और जीव एक ही हैँ।

जब तक ये भूलें उसकी नजर में नहीं लायी जातीं तब तक शिष्य यह नहीं सीख सकता कि परमात्मा, जीव, संसार और शरीर क्या हैं, वे आपस में एक दूसरे से कैसे जुड़े हुये हैं, क्या वे एक दूसरे से भिन्न हैं या फिर ये सब एक ही हैं। इसी सबकी शिक्षा देना और शिष्य के अज्ञान का नाश कर देना ही ज्ञान या अज्ञान के निर्देश हैं। जीव को ज्ञान की शिक्षा क्यों दी जाय जब कि जीव स्वयं ज्ञानमूर्ति है? उपदेश तो उसे केवल उसकी भूल दिखाने और उसका अज्ञान नष्ट करने के लिये है।

साईं बाबा ने आगे यह भी जोड़ दिया कि (1) 'प्रणिपात' में समर्पण की भावना निहित है (2) समर्पण अवश्य ही तन, मन, धन का होना चाहिये। (3) श्री कृष्ण के द्वारा अर्जुन को दूसरे ज्ञानियों की ओर क्यों संकेत किया गया? इसका कारण यह है कि सद् भक्त हर वस्तु को वासुदेव के रूप में स्वीकार करता है। स्वयं भगवान श्री कृष्ण ने कहा है कि कोई भी गुरु शिष्य के लिये श्री कृष्ण ही होगा। इसका प्रमाण है कि -

"उदाराः सर्व एवैते ज्ञानी आत्मैव मे मतम्।
आस्थितः स हि युक्तात्मा मामेवानुत्तमां गतिम्॥"
(गीता, अध्याय 7, श्लोक 18)

अर्थात् श्री कृष्ण कहते हैं कि "सभी ज्ञानी श्रद्धा सहित मेरा भजन करने के कारण उत्तम हैं, परन्तु ज्ञानी तो साक्षात् मेरा स्वरूप ही है। शिष्य गुरु को वासुदेव के रूप में स्वीकार करेगा और श्री कृष्ण गुरु और शिष्य दोनों को ही अपने प्राण और आत्मा के रूप में स्वीकार करते हैं। श्री कृष्ण जानते हैं कि ऐसे भक्त और सद्गुरु हैं। इसीलिये वे अर्जुन को उनकी ओर निर्देशित करते हैं जिससे उन ज्ञानियों की महानता बढ़े और सबको ज्ञात हो सके।

(क्रमशः)

Monday, February 11, 2008

साईं बाबा (30)

लेखकः स्व. श्री हरिप्रसाद अवधिया

अन्य प्राणियों के प्रति

शेर को मुक्ति

शिरडी में एक अद्भुत घटना घटी। एक बड़ी सी ग्रामीण गाड़ी आई और द्वारकामाई मस्जिद के सामने रुकी। उस पर एक शेर बंधा हुआ था। उस शेर का चेहरा भयानक था। वह कष्ट और दर्द से पीड़ित था। तीन दरवेश उस शेर का लोगों के सामने प्रदर्शन कर पैसा कमाया करते थे। शेर जब बीमार पड़ गया तब वे उसका इलाज कराने के लिय जगह जगह घूम रहे थे।

उन दरवेशों ने साईं बाबा का नाम सुना और वे उसे गाड़ी में रख कर मस्जिद ले आये कि साईं बाबा उसे ठीक कर देंगे। शेर को देख कर मस्जिद के सामने लोगों की भीड़ लग गई। शेर जंजीर से बंधा था। वह बहुत बेचैन था। तीनों दरवेश मस्जिद के भीतर गये और साईं बाबा से बात की। बाबा ने शेर को अपने सामने लाने के लिये कहा।

शेर जैसे ही मस्जिद की सीढ़ी पर आया वैसे ही साईं बाबा के चेहरे और शरीर के अलौकिक प्रकाश को देख कर चकाचौंध हो गया और उसने अपना सिर झुका लिया। साईं बाबा ने उस शेर को और उस शेर ने साईं बाबा को देखा। शेर अपने पिछले पैरों पर खड़ा हो गय और साईं बाबा को बड़े प्रेम से देखता रहा। शेर ने अपनी पूँछ का गुच्छा हिलाया, तीन बार अपने पूँछ को जमीन पर पटका और गिर कर मर गया। वह शेर अपने पिछले जन्म में उन दरवेशों का कर्जदार था और अपने प्रदर्शन के द्वारा उनको पैसे दिलाता था। जैसे ही कर्ज से मुक्ति मिली वैसे ही वह शेर साईं बाबा की कृपा से मुक्त हो गया।

वीर भद्रप्पा और चेन बसप्पा

साईं बाबा ने एक दिन अपने भक्तों को एक घटना सुनाई। वे बोले, "एक दिन मैं नाश्ता करने के बाद घूमने निकला। टहलते टहलते मैं एक नदी के किनारे पहुँच गया। मैं थक गया था पर नदी में हाथ-पैर धोने और नहाने के बाद तरोताजा हो गया। वहाँ एक रास्ता था जिसके दोनों ओर छायादार पेड़ लगे थे। ठंडी हवा चल रही थी। एक जगह बैठ कर साईं बाबा चिलम पीने की तैयारी करने लगे। वे चकमक पत्थर से आग निकाल कर चिलम जलाने वाले ही थे कि उन्हें एक मेंढक की दुःख से भरी हुई 'टर्र टर्र' की आवाज सुनाई दी। उसी समय एक राहगीर आया, साईं बाबा को प्रणाम किया, उन्हें अपने घर चलने का निमंत्रण दिया और उनके बाजू से बैठ गया।

मेंढक की करुण 'टर्र टर्र' की आवाज फिर सुनाई दी और उस राहगीर को जिज्ञासा हुई कि बात क्या है? उसने बाबा से पूछा। साईं बाबा ने बताया कि वह मेंढक अपने कर्मों का फल भोग रहा है। उसे एक साँप ने अपने मुँह में पकड़ लिया है और निगल रहा है। उस मुसाफिर ने स्वयं उस दृष्य को देखना चाहा। वह नदी के किनारे गया, उस करुण दृष्य को देखा और वापस आ कर बताया कि दस या पन्द्रह मिनट में वह साँप मेंढक को निगल जावेगा। साईं बाबा ने कहा, "मैं उस मेंढक का रक्षक हूँ। मेरे रहते उसे कुछ नहीं होगा।"

चिलम पी लेने के बाद साईं बाबा और वह मसाफिर उस जगह गये जहाँ साँप मेंढक को निगल रहा था। साईं बाबा ने उन दोनों को सम्बोधित करते हुये कहा, "ओ वीर भद्रप्पा, क्या तुम्हारे शत्रु चेन बसप्पा ने अब तक अपने कर्मों के लिया पश्चाताप नहीं किया है जो तुम उससे बदला ले रहे हो? वीर भद्रप्पा, तुम्हारा जन्म साँप की योनि में हुआ है और चेन बसप्पा मेंढक बन गया है। धिक्कार है तुम्हें जो इस योनि में भी दुश्मनी कर रहे हो।"

साईं बाबा की बात सुनते ही साँप ने मेंढक को तुरन्त छोड़ दिया और नदी के पानी में कूद कर चला गया। मेंढक भी झाड़ी में कहीं छिप गया। यह देख कर उस मुसाफिर को आश्चर्य हुआ। सही बात यह थी कि साईं बाबा उन दोनों के दो पूर्व जन्म की बात जानते थे और चेन बसप्पा ने उनसे अपने रक्षा करने के लिये प्रार्थना की थी।

('साईं सत् चरित' ग्रंथ के अध्याय 47 में वीर भद्रप्पा और चेन बसप्पा के पिछले दो जन्मों की कथा विस्तार से दी गई है।)

(क्रमशः)

Sunday, February 10, 2008

साईं बाबा (29)

लेखकः स्व. श्री हरिप्रसाद अवधिया

अन्य प्राणियों के प्रति

छिपकली बहिनें

एक बार साईं बाबा मस्जिद में बैठे थे। उनके सामने एक भक्त बैठा था। उसी समय मस्जिद की दीवाल पर एक छिपकली ने 'चिक् चिक्' की आवाज की। उस भक्त ने साईं बाबा से जिज्ञासा वश पूछा कि छिपकली की वह आवाज शकुन की है या अपशकुन की? साईं बाबा ने उत्तर दिया कि छिपकली बहुत ही अधिक खुश है क्योंकि उसे देखने और मिलने के लिये औरंगाबाद से उसकी बहिन आ रही है।

वह भक्त विशेष रूप से कुछ समझ नहीं सका और चुपचाप बैठा रहा। तुरन्त ही साईं बाबा के दर्शन करने के लिये औरंगाबाद से एक घुड़सवार आया। मस्जिद के बाहर उसका घोड़ा अड़ गया जबकि वह आदमी कुछ और आगे जाना चाहता था। वह घुड़सवार वहीं उतर गया और कंधे पर चने की बोरी लाद कर उसे मस्जिद के दरवाजे पर पटका। बोरी का मुँह खुल गया और उसमें से एक छिपकली बाहर निकल कर मस्जिद की दीवाल पर चढ़ वहाँ चली गई जहाँ पहली वाली उसके बहिन छिपकली 'चिक् चिक्' कर रही थी।

साईं बाबा ने उस भक्त से उन दोनों छिपकलियों को ध्यान से देखते रहने के लिये कहा। औरंगाबाद से आई हुई छिपकली बड़े स्नेह से अपनी बहिन के पास गई। दोनों ने मुँह से मुँह लगा कर एक दूसरी का चुम्बन लिया। वे 'चिक् चिक्' करती हुई गोल-गोल घूमती रहीं, नाचती रहीं और आपस में प्रेम करती रहीं। साईं बाबा अन्तर्यामी, त्रिकालज्ञ और सर्वज्ञ थे। पशु-पक्षी और सभी प्राणियों में एक ही आत्मा देखते थे।

दो बकरे बन्धु

एक बार साईं बाबा लेण्डी नाले से लौट रहे थे। रास्ते में एक गड़रिया बकरे-बकरियों का झुण्ड ले जा रहा था। उनमें से दो बकरों ने साईं बाबा का ध्यान अपनी ओर खींचा। वे बड़े स्नेह से उनके पास गये और उन दोनों बकरों को बड़े प्रेम से थपथपाया, सहलाया और बाहों में ले कर उनको अपने हृदय से लगा लिया। अन्त में गड़रिये से उन दोनों को 32 रुपयों में खरीद कर मस्जिद में ले आये। उनके इस काम से सभी भक्त चकित हो गये। उनको मालूम था कि एक बकरे का दाम 3 रुपये या अधिक से अधिक 4 रुपये होगा। वे समझ रहे थे कि गड़रिया ने बाबा को ठग लिया। पर किसी में कुछ कहने की हिम्मत नहीं थी। अन्त में बाबा के भक्त शामा और तात्या कोते पाटिल ने कह ही दिया कि हम ठग लिये गये। बाबा ने कहा, "मेरे आगे पीछे कोई है तो नहीं। मैं पैसे का क्या करूंगा? इसलिये खर्च कर दिया।" फिर साईं बाबा ने अपने पास से पैसे दे कर चार सेर दाल खरीदी और उन दोनों बकरों को खिला दिया।

इतना हो चुकने के बाद साईं बाबा बोले, "शामा और तात्या, तुम लोग समझ रहे थे कि मैं ठग लिया गया हूँ। लेकिन ऐसी बात नहीं है। तुम लोग ध्यान से उन दोनों बकरों के बारे में सुनो। अपने पूर्व जन्म में वे दोनों आदमी थे और सगे भाई भी। वे दोनों मेरे साथी थे और उनको मेरे साथ मेरे बाजू से बैठने का सौभाग्य मिला था। पहले वे दोनों भाई एक दूसरे को बहुत प्यार करते थै पर बाद में वे दोनों एक दूसरे के कट्टर दुश्मन हो गये।। बड़ा भाई सुस्त और निकम्मा था पर छोटा भाई मिहनती था और उसने खूब पैसा कमाया। बड़ा भाई अपने छोटे भाई को जान से मार डालना चाहता था। इसके लिये उसने कई उपाय किये पर छोटा भी सावधान रहता था। अन्त में बड़े भाई ने अपने छोटे के सिर पर लाठी से मारा और उसी समय छोटे भाई ने अपने बड़े भाई को कुल्हाड़ी से मार दिया। नतीजा यह हुआ कि दोनों भाई एक साथ ही मर गये। ये दोनों बकरे वही दोनों भाई हैं। जब वे झुण्ड के साथ मेरे बाजू से निकले तब मैंने तुरन्त उनको पहचान लिया। मैं उन्हें खिलाना-पिलाना और आराम देना चाहता था। इसीलिये मैंने अपने सब पैसे देकर उन दोनों बकरों को खरीद लिया।

वास्तव में सन्त लोग परम कृपालु होते हैं।

(क्रमशः)

Saturday, February 9, 2008

साईं बाबा (28)

लेखकः स्व. श्री हरिप्रसाद अवधिया

भविष्य वाणी निरस्त

नाना साहब डेंगले नाम के एक बड़े ज्योतिषी ने एक दिन बापू साहब बूटी से कहा, "आज का दिन आपके लिये अशुभ और अनिष्टकारी है। आज आपके जीवन को खतरा है।" यह भविष्य वाणी सुन कर बापू साहब बूटी बहुत बेचैन हो गये। नित्य की भाँति जब वे साईं बाबा के दर्शन करने के लिये मस्जिद में आये तब बाबा ने उनसे कहा, "यह नाना क्या कहता है? उसने आज तुम्हारी मृत्यु की भविष्य वाणी की है। तुम्हें घबराने और डरने की कोई जरूरत नहीं है। उसे बहादुरी से बता दो कि मौत तुम्हें नहीं ले जायेगी।"

उसी दिन शाम के समय जब बापू साहब बूटी शौच के लिये अपने शौचालय में गये तब वहाँ उन्होंने एक काला विषैला साँप देखा। उन्होंने अपने नौकर को एक बड़ी लाठी लाने के लिये कहा। जब वह लाठी ले कर आया तब उसने साँप को दूर जाते हुये देखा। साँप जल्दी ही गायब हो गया। इस प्रकार साईं बाबा ने ज्योतिषी डेंगले की भविष्य वाणी को निरस्त कर दिया - "भाविहिं मेटि सकैं त्रिपुरारी।"

दूर हट, नीच उतर

एक बार शामा के हाथ की कनिष्ठा उंगली को एक जहरीले साँप ने काट दिया और उसके शरीर में विष फैलने लगा। शिरडी में विठोबा का मन्दिर था जहाँ सर्प दंश का इलाज किया जाता था। कुछ लोग शामा को वहाँ ले जाना चाहते थे पर शामा का एक मात्र सहारा तो साईं बाबा ही थे। वह दौड़ता हुआ मस्जिद की ओर गया और मस्जिद की सीढ़ियों पर चढ़ने लगा। तभी साईं बाबा क्रोध से गरज उठे, "उतर, उतर, दूर हट, नीचे उतर।" सुन कर शामा सन्न रह गया। उसने सोचा कि मस्जिद और बाबा के चरण ही मेरे रक्षक हैं। जब बाबा ही भगा रहे हैं तब मेरा कहाँ ठिकाना? उसके पैर वहीं जकड़ गये और वह खड़ा रह गया। पर सचाई कुछ और ही थी। वास्तव में साईं बाबा ने साँप के जहर को "दूर हट, नीचे उतर" कह कर फटकारा था न कि शामा को।

साईं बाबा कुछ ही क्षणों में शान्त हो कर ध्यान मग्न हो गये। यह देख कर शामा मस्जिद के भीतर जा कर उनके चरणों के पास बैठ गया। बाबा ने आँखें खोलीं और शान्त तथा मधुर स्वर में बोले, "शामा, डरो मत। तिल भर भी फिकर मत करो। बाहर मत निकलना।" शामा के घर चले जाने पर साईं बाबा ने तुरन्त तात्या कोते पाटिल और काका साहब दीक्षित को उसके घर यह निर्देश दे कर भेजा कि वह जो इच्छा हो वह खा सकता है, घर के भीतर इधर-उधर टहल सकता है पर कभी भी लेटे और सोये नहीं। साईं बाबा के निर्देशों का अक्षरशः पालन किया गया और शामा भयंकर जहरीले सर्प दंश से बचा लिया गया।

(क्रमशः)

Friday, February 8, 2008

साईं बाबा (27)

लेखकः स्व. श्री हरिप्रसाद अवधिया

सामयिक चेतावनी

अब्दुल अमीर शक्कर कोराले गाँव का रहने वाला था। वह जाति से कसाई था और बान्द्रा में कमीशन एजेण्ट का काम करता था। एक बार उसको गठिया की बीमारी हो गई और वह बहुत दर्द होने लगा। तब उसे भगवान की याद आई। वह शिरडी आया और साईं बाबा से ठीक कर देने की प्रार्थना की। बाबा ने उसे चावड़ी में रहने को कहा।

साईं बाबा एक दिन द्वारकामाई मस्जिद में और दूसरे दिन चावड़ी में बारी बारी से सोते थे। इसलिये अब्दुल अमीर शक्कर का बाबा से आसानी से सम्पर्क हो जाता था। एक रात साईं बाबा चावड़ी में थे। अब्दुल अमीर शक्कर भी वहीं था। आधी रात को साईं बाबा चिल्लाये, "ओ अब्दुल, कोई शैतान प्राणी मेरे बिस्तरे के बाजू से टकरा रहा है। अब्दुल लालटेन ले कर आया और रोशनी में बाबा के बिस्तर को देखा और अच्छी तरह से जाँच की पर कुछ नहीं पाया।

साईं बाबा ने उससे सभी तरफ अच्छी तरह से जाँच करने को कहा और अपने सटके से जमीन को मारने लगे। यह देख कर अब्दुल अमीर शक्कर ने समझ लिया कि बाबा साँप घुस आने का सन्देह कर रहे हैं।

तभी साईं बाबा ने अब्दुल के तकिया के पास कुछ सरकते हुये देखा। उन्होंने लालटेन नजदीक लाने को कहा और रोशनी में कुण्डली मार कर बैठे और अपने फण को ऊपर नीचे करते हुये साँप को देखा। वह साँप तुरन्त मार डाला गया। सामयिक चेतावनी ने अब्दुल अमीर शक्कर की रक्षा की।

बिच्छू और साँप

साईं बाबा के निर्देश से काका साहब दीक्षित प्रतिदिन सन्त एकनाथ महाराज के दो ग्रंथ - भागवत और भावार्थ रामायण - पढ़ते थे। जब ग्रंथों का पठन होता रहता था तब अन्य श्रोताओं के साथ हेमाद पन्त भी सुनते थे। एक बार जब हनुमान जी के द्वारा, अपनी माता के निर्देशानुसार, भगवान श्री राम की महत्ता की जाँच करने की कथा चल रही थी तब सभी श्रोता मुग्ध और स्तब्ध हो गये। उसी समय एक बड़ा बिच्छू उछल कर हेमाद पन्त के दाहिने कन्धे पर उनकी उपरना (धोती का उपरला हिस्सा) पर बैठ गया पर उसे किसी ने नहीं देखा। भगवान की कथा दत्त चित्त हो कर सुनने वाले की रक्षा भगवान स्वयं करते हैं। अचानक हेमाद पन्त की नजर अपने दाहिये कन्धे पर पड़ गई। वह बिच्छू वहाँ एकदम निश्चल होकर शान्त बैठा था मनो वह भी कथा सुन रहा हो। हेमद पन्त ने अपने उपरने के दोनों छोरों को मोड़ कर बिच्छू को भीतर रख बाहर फेंक दिया।

दूसरी बार कुछ लोग दीक्षित बाड़ा की दूसरी मंजिल पर शाम के अंधेरे में बैठे थे। तभी खिड़की के छेद से एक साँप भीतर आ गया और खिड़की की चौखट पर कुण्डली मार कर बैठ गया। सरसराहट की आवाज सुन कर दिया लाया गया। साँप रोशनी में चकाचौंध हो गया पर बैठा ही रहा और अपने सिर ऊपर नीचे करता रहा। लोग लाठी और डण्ड़े से उस पर वार करने उसकी ओर झपटे पर अड़चन और रुकावट की जगह पर बैठे रहने के कारण प्रहार नहीं कर सके। आदमियों की आहट और कोलाहल से वह साँप जिस छेद से भीतर आया था उसी से बाहर चला गया।

(क्रमशः)

Thursday, February 7, 2008

साईं बाबा (26)

लेखकः स्व. श्री हरिप्रसाद अवधिया

सर्पदंश से मुक्ति

भक्त को पूर्व सूचना

सरदार काका साहब मिरीकर का बेटा बाला साहब मिरीकर कोपरगाँव का मामलतदार था। वह दौरे पर चितली गाँव जा रहा था। रास्ते में वह साईं बाबा के दर्शन के लिये शिरडी आया। मस्जिद में जाकर उसने साईं बाबा को साष्टांग दण्डवत प्रणाम किया। साईं बाबा और बाला साहब के बीच कुशल क्षेम की तथा इतर बातें होती रहीं। साईं बाबा ने उसे चेतावनी देने के स्वर में कहा, "क्या तुम हमारी द्वारकामाई को जानते हो?" कुछ समझ न सकते के कारण बाला साहब मिरीकर चुप रह गया। बाबा आगे कहते गये, "यही (मस्जिद) हमारी द्वारकामाई है जहाँ तुम बैठे हो। यह खतरों और चिन्ताओं को दूर कर उन बच्चों की रक्षा करती है जो इसकी गोद में बैठते हैं। इस मस्जिद की अधिष्ठात्री देवी द्वारकामाई बहुत दयालु है। यह सरल हृदय भक्तों की माता है और संकट में उनकी रक्षा करेगी। इसकी गोद में जो एक बार बैठ जाता है उसके सभी कष्ट समाप्त हो जाते हैं। जो इस मस्जिद माई की छाया में विश्राम करता है उसे आनन्द मिलता है।"

जब बाला साहब मस्जिद से जाने लगा तब साईं बाबा ने उसे भभूत दी और अपने रक्षक हाथ उसके सिर पर रखा। उन्होंने फिर कहा "क्या तुम लम्बा बाबा याने सर्प को जानते हो?" और उन्होंने अपने बायें हाथ की मुट्ठी कसी और उसे दाहिनी कुहनी के नजदीक लाते हुये मुट्ठी खोल कर हथेली को साँप के फण की तरह हिलाते हुये कहा, "वह बहुत भयानक है पर द्वारकामाई के बच्चों का वह क्या बिगाड़ सकता है? जब मस्जिद की अधिष्ठात्री देवी द्वारकामाई रक्षा करती है तब साँप क्या कर सकता है?"

जितने लोग वहाँ उपस्थित थे वे साईं बाबा के इस काम और मिरीकर के सन्दर्भ में कही गई बात को जानने के लिये आतुर हो गये किन्तु इस विषय में बाबा से पूछने का साहस किसी को नहीं हुआ। बाला साहब मिरीकर ने साईं बाबा को प्रणाम किया और जाने लगा। साईं बाबा ने शामा (माधव राव देशपाण्डे) को बुलाया और मिरीकर के साथ चितली जाने को कहा। शामा बाला साहब मिरीकर के पास आया और उसे बताया कि 'बाबा की आज्ञानुसार मैं आपके साथ चितली जाउंगा।" मिरीकर ने जवाब दिया, "तुम्हें साथ चलने की जरूरत नहीं है क्योंकि इससे असुविधा होगी। शामा ने वापस आ कर साईं बाबा को मामलतदार मिरीकर की बात बताई। साईं बाबा बोले, "ठीक है, मत जावो। हमारा तात्पर्य अच्छाई करने का है और अच्छा करेंगे। जो कुछ नियति में है वह होगा ही।"

इसी बीच बाला साहब ने फिर से सोचा और शामा को साथ चलने के लिये कहा। फिर साईं बाबा से विदा ले कर शामा और बाला साहब ने एक तांगे में बैठ कर प्रस्थान किया। वे रात को नौ बजे चितली पहुँचे और मारुति मन्दिर में डेरा जमाया। उस समय आफिस में काम करने वाले नहीं आये थे इसलिये चटाई पर बैठ कर बाला साहब अखबार पढ़ने लगा। उसका उपरना (धोती की चादर) उसकी कमर से नीचे फैली हुई थी। उसके एक हिस्से में चुपचाप आ कर एक साँप कुण्डली मार कर बैठ गया। उसे किसी ने नहीं देखा। वह सरसराहट की आवाज करता हुआ सरकने लगा। उसकी सरसराहट की आवाज चपरासी ने सुनी और तुरन्त लालटेन लिये हुये वहाँ पहुँचा। साँप को देख कर वह 'साँप साँप' चिल्लाने लगा। बाला साहब डर से काँपने लगा। शामा भी आश्चर्य-चकित रह गया। तब वहाँ उपस्थित लोग और शामा डण्डे तथा लाठियाँ ले आये। साँप बाला साहब की कमर से सरक कर नीचे जमीन पर आया और मार डाला गया। इस तरह साईं बाबा की भविष्यवाणी और चेतावनी सच हुई और संकट टल गया। बाला साहब मिरीकर का साईं बाबा के प्रति आस्था और गहरा हो गया।

(क्रमशः)

Wednesday, February 6, 2008

साईं बाबा (25)

लेखकः स्व. श्री हरिप्रसाद अवधिया

शिरडी की विशेषताएँ

साईं बाबा के जीवन काल में

साईं बाबा की महासमाधि के पहले शिरडी की एक विचित्र विशेषता थी। वास्तव में वह विशेषता शिरडी छोड़ने के लिये बाबा की आज्ञा लेने, आज्ञा मानने या आज्ञा की अवहेलना करने की थी। साईं बाबा के दर्शन करने के लिये लोग आते थे पर शिरडी छोड़ कर वापस जाने के लिये उन्हें साईं बाबा की अनुमति लेनी पड़ती थी। यदि बाबा ने शिरडी नहीं छोड़ने के लिये कह पर किसी ने उनकी आज्ञा की अवहेलना कर शिरडी छोड़ दी तो वह अवश्य ही किसी विपत्ति में पड़ जाता था। इसी प्रकार साईं बाबा ने शिरडी छोड़ने को कहा तो तुरन्त छोड़ देना वांछित था। इसके दो उदाहरण प्रस्तुत किये जा रहे हैं।

तात्या कोते पाटिल

एक बार तात्या कोते पाटिल को अपने दो घोड़े फंदे हुये तांगे से कोपरगाँव का बाजार जाना था। वह जल्दी से मस्जिद आया, साईं बाबा को प्रणाम किया और कोपरगाँव बाजार जाने की आज्ञा मांगी। बाबा बोले, "जल्दी मत करो, कुछ देर रुको, बाजार उठ जाने दो, फिर चले जाना।" पर तात्या पाटिल की आतुरता देखकर उन्होंने कहा, "कम से कम अपने साथ शामा (माधव राव देशपाण्डे) को ले जावो।" पर तात्या ने बाबा की बात नहीं मानी और अकेले ही कोपरगाँव बाजार के लिये अपना तांगा चला दिया।

तांगे में फंदे हुये दो घोड़ों में से एक तीन सौ रुपये का था और वह बड़ा चंचल तथा बेचैन था। सावल कुँए को पार करने के बाद वह घोड़ा तेजी से दौड़ने लगा। उसकी कमर में मोच आ गई और वह गिर पड़ा। नतीजा यह हुआ कि तांगा उलट गया। तात्या को ज्यादा चोट नहीं आई पर उसने साईं बाबा की आज्ञा का उल्लंघन करने के बारे में अवश्य सोचा।

एक यूरोपियन महाशय

एक बार बम्बई से एक यूरोपियन सज्जन साईं बाबा के दर्शन करने के लिये शिरडी आया। वह साथ में नाना साहब चान्दोरकार के पास से अपना परिचय पत्र लाया था। उसे एक तम्बू में आराम से ठहराया गया। वह साईं बाबा के सामने घुटने टेक कर उनका हाथ चूमना चाहता था। इसके लिये उसने मस्जिद में जा कर बाबा का हाथ चूमने के लिये तीन बार प्रयत्न किया पर बाबा ने उसे ऐसा करने से रोक दिया। उससे बाहर खुले आंगन में बैठ कर बाबा के दर्शन करने को कहा गया। इस प्रकार से होने वाले व्यवहार से वह यूरोपियन अप्रसन्न हो गया और उसने शिरडी छोड़ कर तुरन्त वापस चले जाने का किया। वह साईं बाबा से अलविदा कहने के लिये आया पर बाबा ने उसे रुकने और दूसरे दिन जाने को कहा। लोगों ने भी यूरोपियन महाशय से बाबा की आज्ञा मान लेने की प्रार्थना की पर वह किसी की भी बात न मान कर तांगे में बैठा और शिरडी छोड़ दी।

पहले घोड़े ठीक से दौड़ते रहे पर जब सावल कुँए से तांगा आगे बढ़ा तब सामने से एक सवार आता हुआ दिखा। उसे देख कर घोड़े डर गये और तेज दौड़ने लगे। परिणाम यह हुआ कि तांगा उलट गया और वह यूरोपियन महाशय नीचे गिर कर घिसटता हुये कुछ दूरी तक चला गया। लोगों ने उसे तुरन्त कोपरगाँव के अस्पताल में भर्ती कराया।

(क्रमशः)

Tuesday, February 5, 2008

साईं बाबा (24)

लेखकः स्व. श्री हरिप्रसाद अवधिया

शिरडी की विशेषताएँ

शिरडी का क्षेत्रीय परिचय

महाराष्ट्र राज्य में अहमद नगर जिले के कोपरगाँव तालुका में शिरडी स्थित है। साईं बाबा के समय में शिरडी एक गाँव था। अब वह नगर हो गया है। नगर हो या कस्बा, पर तीर्थ होने के नाते शिरडी 'धाम' है। शिरडी गोदावरी नदी के दक्षिण में है। मनमाड़ स्टेशन से शिरडी के लिये बस जाती है। शिरडी के उत्तर में नीम गाँव और दक्षिण में कोपरगाँव है। शिरडी से इन दोनों स्थानों की दूरी लगभग समान है नीम गाँव पहुँचने पर शिरडी धाम दिखाई देता है।

शिरडी भक्तों की दृष्टि में

साईं बाबा के भक्त पवित्र धाम शिरडी को 'द्वारका पुरी' मानते हैं। द्वारका पुरी हो या न हो पर वहाँ 'द्वारकामाई मस्जिद' बाबा के समय में द्वारका पुरी ही थी जहाँ स्वयं मुरली मनोहर साईं बाबा के रूप में विराजमान थे। वहाँ के कण कण में परब्रह्म परमात्मा सगुणोवतार साईं बाबा की चरण-धूलि पड़ी थी। साईं सतचरित के रचयिता श्री हेमाद पन्त ने शिरडी की विशेषता बताते हुये लिखा है कि 'शिरडी धाम भक्तों के लिये पण्ढरपुर, जगन्नाथ, द्वारका, काशी, रामेश्वर, बद्री-केदार, नासिक, त्र्यम्बकेश्वर, उज्जैन, महाकालेश्वर, महाबलेश्वर, गोकर्ण बन गया था।'

शिरडी को द्वारका पुरी मानने के सम्बन्ध में थाणा के निवर्तमान मामलतदार श्री बी.व्ही. देव की खोज थी कि शिरडी धाम पण्ढरपुर की सीमा के अन्तर्गत आता है। पण्ढरपुर द्वारका का सबसे अन्तिम छोर है। शिरडी पण्डरपुर के उत्तर में होने के कराण द्वारका है। उन्होंने स्कन्द पुराण से यह श्लोक उद्धृत किया है कि -

चतुर्णामपि यत्र द्वाराणि सर्वतः।
अतः द्वारावतीत्युक्ता विद्वद्धिस्तत्ववेदिभिः॥

अर्थात् जहाँ ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र के लिये धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष चारों पुरषार्थ प्राप्त करने के लिये द्वार खुले हों वह स्थान 'द्वारावती' है। शिरडी में साईं बाबा की द्वारकामाई मस्जिद के द्वार चारों वर्णों, अस्पर्श्यों, कोढ़ियों आदि सभी लोगों के लिये खुले रहते थे। एक बार स्वयं साईं बाबा ने कहा था कि डाकोरनाथ का डाकोर, विट्ठल का पण्ढरपुर और रणछोड़ की द्वारका यहीं शिरडी में है। इस प्रकार स्वयं साईं बाबा ने शिरडी की विशेषता पर प्रकाश डाला था।

(क्रमशः)

Monday, February 4, 2008

साईं बाबा (23)

लेखकः स्व. श्री हरिप्रसाद अवधिया

शिरडी की विशेषताएँ

शिरडी तीर्थ स्थान

साईं बाबा का निवास स्थान होने और वहाँ ही उनका समाधि मन्दिर स्थित होने के कारण शिरडी तीर्थ स्थान बन गया है। साईं बाबा के समाधि मन्दिर में उनकी मूर्ति का दर्शन कर नित्य हजारों लोग अपनी मनोकामना पूरी करते हैं। ऐसा नहीं है कि सन् 1918 में साईं बाबा के महासमाधि लेने और उनका समाधि मन्दिर बनने के बाद शिरडी तीर्थ स्थान बना हो। साईं बाबा के जीवन काल में ही भक्त गण शिरडी को पावन तीर्थ स्थल मानते थे। गौली बुवा नाम के एक तीर्थयात्री भक्त थे जिनका वचन इस तथ्य का साक्ष्य है।

गौली बुवा का कथन

गौली बुवा एक तीर्थयात्री था जो प्रति वर्ष पण्ढरपुर की यात्रा कर विट्ठल भगवान के दर्शन करता था। उसकी उमर 95 वर्ष की थी। पन्ढरीनाथ के दर्शन करने के बाद गौली बुवा साईं बाबा के दर्शन करने के लिये शिरडी आता था। वह साईं बाबा के सामने बैठ कर उन्हें अपलक नेत्रों से देखा करता था। वह शिरडी को तीर्थ स्थान और साईं बाबा को पण्ढरीनाथ विट्ठल भगवान मानता था। साईं बाबा के बारे में गौली बुवा का कथन था कि 'यही गरीबों और असहायों के भगवान पण्ढरीनाथ के अवतार हैं।' इसी प्रकार इसी भावना से सभी भक्त साईं बाबा के जीवन काल में उनके दर्शन करने के लिये शिरडी को तीर्थ स्थान मान कर वहाँ आते थे।

साईं बाबा की चरण पादुका

सन् 1912 में बम्बई का डॉक्टर राम राव कोठारे अपने कम्पाउण्डर और भाई कृष्णा जी अलीबागकर नाम के मित्र के साथ साईं बाबा के दर्शन करने के लिये शिरडी आया। दर्शन करने के बाद उसका कम्पाउण्डर और भाई कृष्णा जी अलीबागकर सगुन मेरु नायक और जी.के. दीक्षित से मिले। तीनों ने सोचा कि सईं बाबा के शिरडी में नीम के पेड़ के नीचे प्रकट होने के स्मारक के रूप में वहाँ चबूतरे पर साईं बाबा की चरण पादुका की स्थापना कर दी जाये।

चरण पादुका बनवा कर शिरडी के खण्डोवा मन्दिर के उपासनी महाराज दिखाई गई। उपासनी महाराज ने उस चरण पादुका में कुछ सुधार किये और उस पर कमल का फूल, शंख और चक्र बनाये। नीम पेड़ का महत्व और साईं बाबा की योग शक्ति का महत्व दर्शाने के लिये यह श्लोक खोद कर अंकित कर दिया गया कि -

"सदा निम्बवृक्षस्य मूलाधिवसात्।
सुधास्रविणं तिक्तमपि प्रियं नम्॥
तरुं कल्पवृक्षाधिकं साश्चयन्तम्।
नमामीश्वरं सद्गुरुं साईंनाथम्॥"

अर्थात् "मैं सद्गुरु साईंनाथ को प्रणाम करता हूँ जिन्होंने नीम वृक्ष के नीचे सदा बैठ कर उके कड़वे पत्तों को अपने अमृत वचनों से मीठा बना दिया। यह नीम वृक्ष कल्पतरु से भी उत्तम है।"

इसके बाद साईं बाबा से अनुमति ली गई। उन्होंने कहा कि सावन की पूर्णिमा (रक्षाबन्धन) के दिन चबूतरे पर नीम वृक्ष के पास चरण पादुका लगा दी जाय। सावन पूर्णिमा के दिन ग्यारह बजे दिन को जुलूस और बाजे के साथ जी.के. दीक्षित पादुका को अपने सिर पर रख कर द्वारकामाई मस्जिद लाये। साईं बाबा ने पादुका को स्पर्श करके कहा, "यह प्रभु की पादुका है।" पदुका नीम वृक्ष के चबूतरे पर लगा दी गई। साईं बाबा अधिकतर पादुका के पास नीम पेड़ के नीचे चिन्तन करते हुये बैठे रहते थे। यह शिरडी की बहुत बड़ी विशेषता है।

(क्रमशः)

Sunday, February 3, 2008

साईं बाबा (22)

लेखकः स्व. श्री हरिप्रसाद अवधिया

भक्तों के अनुभव

व्यक्तिगत अनुभव

रामभक्त डॉक्टर

अहमदनगर में दादा साहब नाम का एक डॉक्टर था। वह भगवान श्री राम का परम भक्त था। एक बार वह डॉक्टर अपने किसी मामलतदार मित्र के साथ शिरडी आया। मामलतदार साईं बाबा का भक्त था। उसने डॉक्टर को साईं बाबा का दर्शन करने के लिये मस्जिद चलने को कहा। डॉक्टर बोला कि वह मुसलमान के सामने सिर नहीं झुकायेगा। उसने सुन रखा था कि साईं बाबा मुसलमान हैं। मामलतदार ने उससे मस्जिद चलने का आग्रह यह कहते हुये किया कि साईं बाबा को प्रणाम करने के लिये उस पर कोई दबाव नहीं डालेगा। डॉक्टर मस्जिद जाने के लिये तैयार हो गया।

मामलतदार और डॉक्टर दोनों ही साईं बाबा के दर्शन करने के लिये मस्जिद गये। वहाँ पहुँचने पर डॉक्टर सबसे आगे चला और साईं बाबा के पास पहुँच कर उन्हें साष्टांग दण्डवत प्रणाम किया। यह देख कर सबको आश्चर्य हुआ। लोगों ने उस राम भक्त डॉक्टर से पूछा कि अपने विचार और निश्चय के विरुद्ध आपने ऐसा क्यों किया तो उसने बताया कि आसन पर स्वयं भगवान श्री राम पीत वस्त्र पहने, मुकुट धारण किये और हाथों में धनुष बाण लिये हुये बैठे थे। उसने साईं बाबा को बार बार देखा तो उसे एक बार श्री राम और दूसरी बार साईं बाबा दिखाई देते थे। दोनों के दर्शन उसे एक के बाद एक लगातार होते रहे। वह हैरान हो गया। उसके मन से सब भेदभाव मिट गये और वह साईं बाबा का भक्त हो गया। उसने कहा, "यह मुसलमान हो ही नहीं सकता। यह तो परब्रह्म का 'योगावतार' है।"

बाला गनपत शिम्पी

साईं बाबा के एक भक्त बाला गनपत शिम्पी को मलेरिया हो गया। उसने तरह तरह की दवाएं लीं और उपचार कराये पर उसका ज्वर हटता ही नहीं था। बीमारी असाध्य हो गई। उसकी पत्नी और वह चिन्तित रहने लगे। बाला जी गनपत शिम्पी और उसकी पत्नी ने साईं बाबा की शरण में जाने का निश्चय किया।

दोनों शिरडी गये और साईं बाबा के दर्शन कर उन्हें अपना कष्ट बताया। बाबा ने रोग से छुटकारा पाने का विचित्र उपाय बताया। उन्होंने तात्या कोते पाटिल को दही और भात लाने को कहा। वह ले आया। साईं बाबा ने बाला गनपत शिम्पी से कहा, "दही और भात को मिला दो, बाहर लक्ष्मी मन्दिर के पास जावो और वहाँ एक काले कुत्ते को यह दही-भात खिला दो। काला कुत्ता तुम्हें मन्दिर के पास मिलेगा।

दही-भात को ले कर पति-पत्नी लक्ष्मी मन्दिर के पास गये। वहाँ उन्हें एक काला कुत्ता दिखाई दिय जो उन दोनों को देख कर पूँछ हिलाने लगा। बाला जी गनपत शिम्पी ने उस कुत्ते के सामने दही-भात रख दिया। कुत्ते ने खाया और खाते ही मुँह फेर कर जंगल में भाग गया। आश्चर्य है कि इसके बाद बाला जी गनपत शिम्पी का मलेरिया ज्वर हट गया।

बापू साहब बूटी

नागपुर के श्रीमान बापू साहब बूटी को एक बार पेचिस की बीमारी हो गई। साथ ही कै भी होने लगी। उनकी आलमारी तरह तरह की दवाइयों से भर गई पर उनकी बीमारी हट ही नहीं रही थी। उल्टी और दस्त के कारण वे इतना कमजोर हो गये कि साईं बाबा के दर्शन करने भी नहीं जा सकते थे। साईं बाबा ने उन्हें मस्जिद में बुलवा कर अपने सामने बैठाया और बोले, "ध्यान रखो अब तुम्हें दस्त नहीं होगा और कै भी जरूर बन्द हो जावेगी।" साईं बाबा के शब्दों में इतनी शक्ति थी कि बापू साहब बूटी की दोनों बीमारियाँ भाग गईं।

दूसरे मौके पर बापू साहब बूटी को हैजा हो गया। उन्हें बहुत तीखी प्यास लगी जो शान्त ही नहीं हो रही थी। उपचार से कोई लाभ नहीं हुआ। तब वे साईं बाबा की शरण में गये। बाबा ने उनको बादाम, अखरोट और पिश्ते को शक्कर मिले दूध में औंटा कर काढ़ा बनाने और पीने को कहा। कोई भी डाक्टर इस काढ़े को हैजे की बीमारी में सांघातिक मानेगा पर श्रीमान बापू साहब बूटी ने वह काढ़ा पिया और उसकी बीमारी दूर हो गई।

(क्रमशः)

Saturday, February 2, 2008

साईं बाबा (21)

लेखकः स्व. श्री हरिप्रसाद अवधिया

भक्तों के अनुभव

व्यक्तिगत अनुभव

जो अनुभव अलग अलग समय पर अलग अलग व्यक्तियों को हुये वे व्यक्तिगत अनुभव की श्रेणी में आते हैं। यों तो अनेक व्यक्तियों को साईं बाबा की कृपा और चमत्कारों के अनुभव हुये और आज भी हो रहे हैं पर उनमें से कुछ प्रमुख व्यक्तिगत अनुभवों का ही विवरण देना सम्भव है।

डॉक्टर पण्डित की पूजा

तात्या साहब नूलकर का एक मित्र डॉक्टर पण्डित था। एक बार वह साईं बाबा के दर्शन करने के लिये आया। बाबा को प्रणाम करने के बाद वह मस्जिद में ही रुक गया। साईं बाबा ने उसे दादा भट्ट के घर जा कर रुकने को कहा। जब डॉक्टर पण्डित दादा भट्ट के घर गया तब उसका हार्दिक स्वागत किया गया। दादा भट्ट साईं बाबा के भक्त थे। वे साईं बाबा की पूजा किया करते थे। जब वे थाली में पूजा की सामग्री ले कर पूजा करने के लिये मस्जिद गये तब डॉक्टर पण्डित भी उनके साथ गया। वहाँ पहुँच कर दादा भट्ट ने बाबा की पूजा की। उनकी थाली में घिसा हुआ चन्दन था पर उन्होंने बाबा को चन्दन नहीं लगाया। अर्ध्य, पाद्य, धूप, आरती और नैवेद्य से पूजा सम्पन्न की। चन्दन न लगाने का कारण यह था कि बाबा के मस्तक पर चन्दन लगाना वर्जित था। केवल म्हालासपति ही बाबा के गले में चन्दन लगाता था।

दादा भट्ट के बाद डॉक्टर पण्डित ने भी पूजा की। वह सरल हृदय का व्यक्ति था। वह दादा भट्ट की थाली से चन्दन ले कर साईं बाबा के मस्तक पर त्रिपुण्ड लगाने लगा। बाबा भी चुपचाप शान्त बैठे चन्दन से त्रिपुण्ड लगवाते रहे। यह देख कर सभी चकित हो गये क्योंकि साईं बाबा अपने मस्तक पर किसी से भी चन्दन लगवाते ही नहीं थे।

उसी दिन शाम को दादा भट्ट ने साईं बाबा से कहा, "आप तो अपने माथे पर चन्दन लगवाने में आपत्ति करते हैं पर आपने डॉक्टर पण्डित को अपने माथे पर चन्दन कैसे लगाने दिया? बाबा ने उत्तर दिया, "डॉक्टर पण्डित मुझे अपने गुरु घोपेश्वर का रघुनाथ महाराज या काका पुराणिक मानता है और मुझ पर इसी रूप में विश्वास करता है। मेरे माथे पर चन्दन लगाते समय उसकी श्रद्धा और भावना थी कि वह अपने गुरु के माथे पर चन्दन लगा रहा है। इसीलिये मैं आपत्ति नहीं कर सका। डॉक्टर पण्डित से पूछने पर उसने साईं बाबा के कथन की पुष्टि की।

नासिक के मुले शास्त्री

नासिक के निवासी मुले शास्त्री कट्टर और रूढ़िवादी अग्निहोत्री ब्राह्मण थे। उन्होंने छः शास्त्रों का अध्ययन किया था। वे प्रसिद्ध ज्योतिषी तथा हस्तरेखा के ज्ञाता थे। एक बार मुले शास्त्री नागपुर के प्रतिष्ठित श्रीमान बापू साहब बूटी से मिलने शिरडी आये। मिलने के बाद बूटी, मुले और दूसरे लोग साईं बाबा के दर्शन करने द्वारकामाई मस्जिद गये। दर्शन के बाद मुले शास्त्री ने साईं बाबा की हस्त रेखा देखने की इच्छा प्रकट की। उन्होंने साईं बाबा को अपने हाथ दिखाने के लिये कहा किन्तु बाबा टाल गये।

मुले शास्त्री बाड़े में लौट आये और स्नान किया, पवित्र वस्त्र धारण किया और अपना अग्निहोत्र कर्मकाण्ड करना प्रारम्भ किया। उधर हमेशा की तरह साईं बाबा ने लेण्डी नाले की ओर प्रस्थान किया। उस समय उन्होंने साथ के लोगों से गेरू रख लेने के लिये निर्देश देते हुये कहा, "आज हम गेरुआ वस्त्र धारण करेंगे।" बाबा के कहने का तात्पर्य किसी की समझ में नहीं आया।

लेण्डी नाले से जब साईं बाबा लौटे तब उनकी मध्याह्न आरती की तैयारी हो रही थी। बाड़े में बापू साहब जोग ने मुले शास्त्री से पूछा, "बाबा की मध्याह्न आरती में चलेंगे क्या?" शास्त्री ने उत्तर दिया कि वे दोपहर के बाद बाबा के दर्शन करेंगे। मस्जिद में साईं बाबा जल्दी से अपने आसन पर बैठ गये और भक्तों ने उनकी पूजा और आरती की। तब साईं बाबा ने कहा, "नासिक से आये नये ब्राह्मण से दक्षिणा मांग लावो।"

बापू साहब बूटी दक्षिणा लाने के लिये मुले शास्त्री के पास स्वयं बाड़े में गये और उन्हें बाबा के सन्देश सुनाया। सुन कर शास्त्री उद्विग्न हो गये और उन्होंने अपने मन में सोचा, "मैं एक विशुद्ध अग्निहोत्री ब्राह्मण हूँ। मैं दक्षिणा क्यों दूँ? बाबा महान सन्त हो सकते हैँ पर मैं उनका आश्रित तो नहीं हूँ।" पर वे दक्षिणा देने से इन्कार भी नहीं कर सके क्योंकि साईं बाबा बापू साहब जैसे करोड़पति के जरिये दक्षिणा मंगा रहे थे।

बहुत कुछ सोचने के बाद मुले शास्त्री ने अपना दैनिक कर्मकाण्ड अधूरा छोड़ा और बापू साहब बूटी के साथ मस्जिद को चले। वे स्वयं को पवित्र और मस्जिद को अपने विपरीत समझ रहे थे। मस्जिद पहुँच कर वे कुछ दूरी पर खड़े रहे और वहीं से दोनों हाथ जोड़ कर साईं बाबा की ओर कुछ फूल फेंके पर उन्होंने देखा कि साईं बाबा वहाँ नहीं हैं और उनके आसन पर उनके (मुले शास्त्री के) स्वर्गवासी गुरु घोलप स्वामी बैठे हैं। यह देख कर मुले शास्त्री आश्चर्य में डूब गये। यह कैसे हो सकता है! मस्जिद में उनके गुरु? और वह भी स्वर्गवासी? कुछ समय के लिये वे अवाक् रह गये। क्या यह सपना है? नहीं। वे तो पूरी चेतना के साथ जागृत अवस्था में थे। निश्चय करने के लिये उन्होंने अपने आपको चिकोटी काटी पर यह एकदम प्रत्यक्ष था कि उनके स्वर्गवासी गुरु घोलप स्वामी ही बैठे थे।

अन्त में सभी शंकाओं और भ्रमों को दूर कर मुले शास्त्री तेजी से आगे बढ़े और मस्जिद में प्रवेश कर अपने गुरु के चरणों पर गिर गये। फिर उठ कर हाथ जोड़े खड़े रहे। लोग लउस समय साईं बाबा की आरती गा रहे थे। सभी प्रकार के अहंकार और शुद्ध-अशुद्ध की भावना और आडम्बर को दूर फेंक कर सच्चे हृदय से मुले शास्त्री ने अपने गुरु के चरणों पर गिर कर दुबारा साष्टांग दण्डवत किया और आँखें मूंदे रहे। जब वे उठे और आँखें खोली तो देखा कि उसी आसन पर बैठे साईं बाबा मुस्कुरा कर उनसे दक्षिणा मांग रहे हैं। साईं बाबा की प्रसन्न मुद्रा और अदम्य शक्ति देख कर मुले शास्त्री अपने आपको भूल गये। वे इतने अधिक प्रसन्न हुये कि उनकी आँखों से आनन्द के आँसू बहने लगे। उन्होंने साईं बाबा को फिर प्रणाम किया और दक्षिणा दी। उन्होंने कहा, "मेरी सब शंकाएँ मिट गई हैँ। मैने अपने गुरु के दर्शन किये।"

अब मुले शास्त्री सहित सबको बाबा के इस कथन का मर्म समझ में आया कि 'गेरू लावो, आज हम गेरुआ वस्त्र धारण करेंगे।'

(क्रमशः)

Friday, February 1, 2008

साईं बाबा (20)

लेखकः स्व. श्री हरिप्रसाद अवधिया

भक्तों के अनुभव

सामूहिक अनुभव

साईं बाबा की दया और चमत्कारों के जो अनुभव एक साथ अनेक व्यक्तियों को हुये उनकी परिगणना सामूहिक अनुभव में की जा सकती है। यहाँ पर ऐसे तीन सामूहिक अनुभव पर प्रकाश डाला जा रहा है।

आटे का चमत्कार

शिरडी में प्रायः सभी लोग साईं बाबा के भक्त थे। बाबा अपने भक्तों का बड़ा ध्यान रखते थे और उनकी रक्षा करने के लिये सदा तत्पर रहते थे। सन् 1910 के आसपास शिरडी के चारों ओर विसूचिका का भयंकर प्रकोप हुआ। लोग बड़ी संख्या में मरने लगे। सैकड़ों मील तक हैजे का आतंक छा गया। गाँव के गाँव श्मशान जैसे बन गये। शिरडी के लोग भी घबरा गये किन्तु उनकी रक्षा करने के लिये साईं बाबा ने उपाय सोच लिया था।

एक दिन सबेरे साईं बाबा ने मुँह हाथ धोया और चक्की से गेहूँ पीसने की तैयारी की। उन्होंने फर्श पर बोरा बिछाया और उस पर चक्की रखी। चक्की के मुँह में गेहूँ डाल कर चक्की की खूँटी पकड़ पीसने लगे। बोरे पर चक्की के चारों ओर आटा निकलने लगा। पर्याप्त मात्रा में आटा हो जाने पर बाबा ने भक्तों से कहा कि वे उस आटे को शिरडी की सीमा के चारों तरफ डाल दें। भक्तों ने वैसा ही किया और आटे की रेखा हैजा रूपी रावण के लिये लक्ष्मण रेखा बन गई। शिरडी में कहीं पर भी किसी को भी विसूचिका नहीं हुई।

आटे के द्वारा हैजे को रोक देने के चमत्कार की बात चारों तरफ फैल गई। आटा अथवा "विसूचिका निरोधक पावडर" लेने के लिये दूसरे गाँवों से हजारों लोग शिरडी आने लगे। साईं बाबा चक्की चलाते रहे, आटा बाँटते रहे और हैजे का नामोनिशान मिटाते रहे। जहाँ जहाँ और जिस जिस घर में वह आटा गया वहाँ से हैजा छू मन्तर हो गया। उस समय की अंग्रेज सरकार भी साईं बाबा का यह चमत्कार देख कर दंग रह गई।

धूनी की ज्वाला

साईं बाबा तो मायापति परब्रह्म परमात्मा थे। प्रकृति पर उनका पूरा नियंत्रण था। अग्नि, वायु, जल, पृथ्वी, आकाश उनके अंकुश में थे। उनकी द्वारकामाई मस्जिद में रात-दिन धूनी जलती रहती थी। एक दिन दोपहर के समय साईं बाबा के साथ लोग धूनी के पास बैठे थे। अचानक धूनी में आग की प्रचण्ड लपट निकली और वह ज्वाला छत के आड़े खम्भे (राफ्टर) को छूने लगी। यह देख कर लोग भयभीत हो गये पर किसी में साहस नहीं था कि वह बाबा से धूनी में पानी डाल कर ज्वाला को शान्त करने का अनुरोध करे।

अन्तर्यामी साईं बाबा जल्दी ही जान गये कि क्या हो रहा है। उन्होंने अपने डण्डा (सटका) उठाया और सामने के खम्भे को यह कहते हुये मारना शुरू किया कि 'नीचे उतरो, शान्त हो जावो।' सटके के प्रत्येक आघात पर ज्वाला नीचे उतरी गई और कुछ ही क्षणों में धूनी की आग सामान्य हो गई।

बवण्डर और वृष्टि शान्त

एक बार शिरडी में शाम के समय भयानक झंझावत उठा। आकाश में काले काले बादल उमड़-घुमड़ कर छा गये। तेज आंधी चलने लगी। बादल गरजने लगे। रह रह कर बिजली कौंधने लगी और मूसलाधार वृष्टि होने लगी। थोड़ी ही देर में चारों तरफ पानी की बाढ़ आ गई। लोग त्राहि त्राहि करने लगे। प्रकृति का कोप शान्त होने के बदले बढ़ता ही जा रहा था।

शिरडी के सभी लोग, पशु-पक्षी आदि तक भी डर कर मस्जिद में आ गये। लोगों ने साईं बाबा से रक्षा करने की प्रार्थना की। बाबा को दया आई। वे बाहर आये और मस्जिद के दरवाजे पर खड़े हो कर आकाश की ओर देखते हुये गरज कर कहा, "बन्द करो और अपने क्रोध शान्त करो।" कुछ ही क्षणों में वर्षा बन्द हो गई और आंधी रुक गई। बादल छँट गये और चन्द्रमा निकल आया। लोग साईं बाबा की जयजयकार करते हुये अपने अपने घर चले गये। द्वापर में परब्रह्म साईं बाबा ने ही इन्द्र के कोप से ब्रज की रक्षा की थी।

(क्रमशः)

 
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