लेखकः स्व. श्री हरिप्रसाद अवधिया
साईं बाबा और संस्कृत ज्ञान
बात उन दिनों की है जब शिरडी में द्वारकामाई मस्जिद में भीड़ बहुत अधिक नहीं लगती थी। उन दिनों किसी को विश्वास नहीं होता था कि साईं बाबा संस्कृत के प्रकाण्ड पण्डित हैं। उनके परम प्रिय भक्त नाना साहब चान्दोरकर संस्कृत बहुत अच्छी तरह जानते थे। उन्होंने गीता पर कई भाष्यों का अध्ययन किया था और उन्हें गर्व था कि वे संस्कृत के अच्छे विद्वान हैं। वे भी यही समझते थे कि साईं बाबा संस्कृत नहीं जानते हैं।
एक दिन साईं बाबा और चान्दोरकर अकेले बात कर रहे थे। चान्दोरकर साईं बाबा के चरण दबा रहे थे और कुछ गुनगुना रहे थे। साईं बाबा पूछ बैठे, "नाना, क्या गुनगुना रहे हो?"
चान्दोरकर बोले, "मैं संस्कृत के एक श्लोक का पाठ कर रहा हूँ।"
"कौन सा श्लोक?"
"भगवत्गीता से है।"
"जरा जोर से पाठ करो।"
नाना साहब चान्दोरकर ने जोर से पाठ किया -
"तद्विद्धि प्रणिपतेन परिप्रश्नेन सेवया।
उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्व दर्शिनः॥"
(गीता, अध्याय 4, श्लोक 14)
बाबा - नाना, क्या तुम इस श्लोक का अर्थ समझते हो?
नाना - हाँ।
बाबा - यदि तुम समझते हो तो मुझे बताओ।
नाना - इसका अर्थ यह है कि गुरु को साष्टांग दण्डवत प्रणाम करते हुये, गुरु की सेवा करते हुये, उनसे प्रश्न करते हुये सीखो कि यह ज्ञान क्या है। तब सद्वस्तु (ब्रह्म) का सत्य ज्ञान प्राप्त किये हुये ज्ञानी तुम्हें ज्ञान का उपदेश देंगे।
बाबा - मैं श्लोक के पूरे पद का इस तरह से संग्रह किया हुआ सारांश नहीं चाहता। मुझे प्रत्येक शब्द का व्याकरणिक प्रभाव, महत्व और अर्थ बताओ।
तब नाना साहब ने साईं बाबा को एक एक शब्द समझाया।
बाबा - नाना, क्या केवल साष्टांग दण्डवत् प्रणाम करना पर्याप्त है?
नाना - मैं 'प्रणिपात' शब्द का अर्थ साष्टांग दण्डवत् प्रणाम करने के सिवाय दूसरा नहीं जानता।
बाबा - 'परिप्रश्न' क्या है?
नाना - प्रश्न पूछना।
बाबा - प्रश्न का क्या अर्थ है?
नाना - वही, प्रश्न पूछना।
बाबा - यदि 'परिप्रश्न' और 'प्रश्न' का एक ही अर्थ है तो व्यास ने 'परि' उपसर्ग क्यों लगाया? क्या उसका सिर फिर गया था?
नाना - मैं 'परिप्रश्नेन' शब्द का दूसरा कोई अर्थ नहीं जानता।
बाबा - 'सेवा' शब्द से किस प्रकार की सेवा का तात्पर्य है?
नाना - वही जो हम लोग हमेशा करते हैं।
बाबा - क्या ऐसी सेवा पर्याप्त है?
नाना - मैं नहीं जानता कि 'सेवा' शब्द का इससे और अधिक क्या महत्व है।
बाबा - अगली पंक्ति 'उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं' में 'ज्ञानं' के स्थान पर दूसरा कोई और शब्द रख कर पढ़ सकते हैं?
नाना - हाँ 'अज्ञानं' रख कर भी पढ़ सकते हैं।
बाबा - 'ज्ञानं' के बदले 'अज्ञानं' शब्द ले लेने से क्या इस श्लोक का कोई अर्थ निकलता है?
नाना - नहीं। शांकर भाष्य में ऐसी कोई श्लोक रचना नहीं है।
बाबा - अगर शांकर भाष्य में नहीं है तो कोई हर्ज नहीं। यदि 'ज्ञानं' के स्थान पर 'अज्ञानं' रख देने से उसका बेहतर मतलब निकलता है तो क्या कोई आपत्ति है?
नाना - मैं नहीं समझता कि 'अज्ञानं' शब्द रख देने से शब्दों की व्याख्या, पदच्छेद, अन्वय और अर्थ कैसे कर सकते हैं।
बाबा - कृष्ण अर्जुन को ज्ञानी या तत्वदर्शी के पास जा कर साष्टांग दण्डवत करने, परिप्रश्न और सेवा करने का निर्देश क्यों देते हैं जब कि कृष्ण स्वयं 'तत्वदर्शन' और 'ज्ञान' ही हैं?
नाना - हाँ, वे थे तो। लेकिन मैं इसे नहीं समझ सकता हूँ कि कृष्ण ने अर्जुन को ज्ञानियों के पास जाने का निर्देश क्यों दिया।
बाबा - नाना, क्या तुम जैसा संस्कृत का विद्वान भी इसे नहीं समझ पा रहा है?
नाना चान्दोरकर की अब तक अवमानना हो चुकी थी। उनके गर्व का सिर नीचा हो चुका था। तब साईं बाबा ने समझाना शुरू किया।
(1) ज्ञानी के सामने केवल साष्टांग दण्डवत् प्रणाम करना ही पर्याप्त नहीं है। हमें सद्गुरु के प्रति पूर्ण रूप से शरणागति में जाना ही पड़ेगा।
(2) केवल प्रश्न करना ही पर्याप्त नहीं है। गुरु या सद्गुरु को किसी कारण से, अथवा उनसे आलस्यवश गलत उत्तर मिल जाने पर उनसे तर्क-वितर्क करने के उद्देश्य से ही प्रश्न करना कदापि वांछित नहीं है वरन सदैव अनुचित और अवांछनीय है। प्रश्न अवश्य गम्भीर होना चाहिये। मोक्ष या आध्यात्मिक प्रगति के लिये ही प्रश्न किया जाना चाहिये। यही 'परिप्रश्नेन' का अर्थ है।
(3) सेवा करते समय यह भावना रखना कि सेवा करते या न करने के लिये हम स्वतंत्र हैं - ऐसा सोच कर सेवा करना सेवा ही नहीं है। सेवा करने वाले को अवश्य ही अपने मन में यह भावना रखनी चाहिये कि मैं अपने शरीर का मालिक नहीं हूँ। शरीर गुरु का है, उस पर मेरा कोई अधिकार ही नहीं क्योंकि शरीर गुरु को समर्पित हो चुका है और केवल गुरु की सेवा करने के लिये ही यह शरीर जीवित है।
अगर यह किया जाय तो सद्गुरु तुम्हें दिखावेंगे कि श्लोक में आया हुआ शब्द 'अज्ञानं' क्या है।
नाना साहब चान्दोरकर की समझ में नहीं आया कि गुरु 'अज्ञान' की शिक्षा देता है।
तब बाबा ने समझाने के लिये कहा कि - 'ज्ञान' अथवा 'आत्मज्ञान' का उपदेश अपने भीतर के 'अज्ञान' का नाश करने पर ही प्रभावशील हो सकता है और 'अज्ञान' का नाश करने के लिये उसे जानना आवश्यक है। साईं बाबा ने इसे स्पष्ट करने के लिये गीता पर सन्त ज्ञानेश्वर के भाष्य का यह उदाहरण दिया -
(1) मग अज्ञान निमालिया मीच एक असे अपैसया सनिद्र स्वप्न गेलिया। आपण जसें
(2) ते अज्ञान जे समूल तुटे। तैं भ्रान्ती चें मसैरे फिटे।
गीता के श्लोक 18-66 पर भाष्य करते हुये सन्त ज्ञानेश्वर कहते हैं कि "ओ अर्जुन, यदि अज्ञान और नींद हटा दिये जावें तो तुम स्वयं ही तो हो। अंधेरे को दूर हटा देना ही प्रकाश है। 'द्वैत' की भावना मिटा देना ही तो 'अद्वैत' है। जब कभी हम 'द्वैत' को मिटाने की बात करते हैं तब हम 'अद्वैत' के बारे में ही तो बोलते हैं। जब कभी हम अंधेरे को मिटा देने की बात करते हैं तब हम प्रकाश की ही बात करते हैं। यदि हमें 'अद्वैत' का अनुभव करना है तब अपने भीतर रहने वाली 'द्वैत' भावना का उन्मूलन करना ही होगा। वही 'अद्वैत' की स्थिति है। द्वैत में रहने वाला ऐसा कौन है जो अद्वैत के बारे में बात कर सकता है। जब तक कोई अद्वैत की स्थिति में प्रवेश नहीं कर जाता तब तक यदि वह बोले भी तो कोई उस स्थिति को कैसे जान सकता है।
शिष्य भी वस्तव में सद्गुरु के समान ही है - ज्ञान का सदेह स्वरूप है। सद्गुरु और शिष्य दोनों के बीच प्रकृति, ऊँचे आत्मज्ञान की प्राप्ति, मानवीय शक्ति से ऊपर अलौकिक और दैवी सत्व, प्रतियोगिता से परे क्षमता तथा ऐश्वर्य योग (दैवी शक्ति) का अन्तर रहता है। सद्गुरु निर्गुण सच्चिदानन्द होते हैं। वास्तव में सद्गुरु मानव जाति के उत्थान करने और संसार को ऊपर उठाने के लिये मनुष्य का शरीर धारण किया हुआ होता है किन्तु उनकी यथार्थ निर्गुण प्रकृति इससे तिल भर भी नष्ट नहीं होती। उनका अस्तित्व अथवा 'सत्य', दैवी शक्ति और बुद्धि कभी भी कम न हो कर ज्यों की त्यों रहती है। वास्तव में शिष्य का भी यही स्वरूप होता है परन्तु वह अनेक जन्मों के संस्कारों के कारण अज्ञान से ढँका रहता है। यही अज्ञान उसे इस दृष्टि से अलग रखता है कि वह 'शुद्ध' और 'चैतन्य' है। भगवान श्री कृष्ण ने कहा है कि "अज्ञानेन आवृतं ज्ञानं तेन मुह्यान्ति जन्तवः" (गीता, अध्याय 5, श्लोक 16)। उस पर संस्कार पड़ा रहता है कि मैं जीव हूँ और तुच्छ प्राणी हूँ। गुरु को, अज्ञान की जड़ों को समूल उखाड़ फेंकना और उपदेश तथा निर्देश देना पड़ता है। जो शिष्य अनन्त जन्म जन्मान्तरों से माया-जाल में फँसा हुआ इन विचारों से जकड़ा रहता है कि मैं तुच्छ प्राणी हूँ, निर्बल और निर्धन हूँ, सैकड़ों जन्म से अज्ञान में पड़े हुये उस शिष्य के उसी अज्ञान का निवारण करने के लिये सद्गुरु उसे शिक्षा देते हुये बताते हैं कि "तुम ईश्वर हो, तुम शक्तिशाली, ऐश्वर्य सम्पनाना तथा शक्तिमान हो। तब कहीं वह शिष्य अत्यल्प मात्रा में समझता है की मैं ईश्वर हूँ। माया के इन्द्रजाल का यह स्थायी भ्रम कि मैं शरीर हूँ, मैं प्राणी अर्थात् जीव हूँ, ईश्वर मुझसे भिन्न है - एक भूल है जो असंख्य पूर्व जन्मों से चला आ रहा है। इस पर आधारित कर्मों से उसने सुख, दुःख और इन दोनों का मिश्रण प्राप्त किया है। इस मूल कारण , माया और भूल को हटाने के लिये वह अवश्य ही जाँच-पड़ताल शुरू करे। अज्ञान कैसे उत्पन्न हुआ? वह कहाँ है? इसे ही शिष्य को दिखा देना गुरु का उपदेश है। निम्न बातें अज्ञान के दृष्टांत हैं:-
1. मैं जीव (प्राणी) हूँ।
2. मैं शरीर हूँ।
3. ईश्वर, संसार और जीव अलग अलग हैं।
4. मैं ईश्वर नहीं हूँ।
5. यह नहीं जानना कि शरीर आत्मा नहीं है।
6. यह नहीं जानना कि ईश्वर, संसार और जीव एक ही हैँ।
जब तक ये भूलें उसकी नजर में नहीं लायी जातीं तब तक शिष्य यह नहीं सीख सकता कि परमात्मा, जीव, संसार और शरीर क्या हैं, वे आपस में एक दूसरे से कैसे जुड़े हुये हैं, क्या वे एक दूसरे से भिन्न हैं या फिर ये सब एक ही हैं। इसी सबकी शिक्षा देना और शिष्य के अज्ञान का नाश कर देना ही ज्ञान या अज्ञान के निर्देश हैं। जीव को ज्ञान की शिक्षा क्यों दी जाय जब कि जीव स्वयं ज्ञानमूर्ति है? उपदेश तो उसे केवल उसकी भूल दिखाने और उसका अज्ञान नष्ट करने के लिये है।
साईं बाबा ने आगे यह भी जोड़ दिया कि (1) 'प्रणिपात' में समर्पण की भावना निहित है (2) समर्पण अवश्य ही तन, मन, धन का होना चाहिये। (3) श्री कृष्ण के द्वारा अर्जुन को दूसरे ज्ञानियों की ओर क्यों संकेत किया गया? इसका कारण यह है कि सद् भक्त हर वस्तु को वासुदेव के रूप में स्वीकार करता है। स्वयं भगवान श्री कृष्ण ने कहा है कि कोई भी गुरु शिष्य के लिये श्री कृष्ण ही होगा। इसका प्रमाण है कि -
"उदाराः सर्व एवैते ज्ञानी आत्मैव मे मतम्।
आस्थितः स हि युक्तात्मा मामेवानुत्तमां गतिम्॥"
(गीता, अध्याय 7, श्लोक 18)
अर्थात् श्री कृष्ण कहते हैं कि "सभी ज्ञानी श्रद्धा सहित मेरा भजन करने के कारण उत्तम हैं, परन्तु ज्ञानी तो साक्षात् मेरा स्वरूप ही है। शिष्य गुरु को वासुदेव के रूप में स्वीकार करेगा और श्री कृष्ण गुरु और शिष्य दोनों को ही अपने प्राण और आत्मा के रूप में स्वीकार करते हैं। श्री कृष्ण जानते हैं कि ऐसे भक्त और सद्गुरु हैं। इसीलिये वे अर्जुन को उनकी ओर निर्देशित करते हैं जिससे उन ज्ञानियों की महानता बढ़े और सबको ज्ञात हो सके।
(क्रमशः)