Tuesday, March 25, 2008

गूगल विज्ञापनों में हिन्दी शीर्षक

बहुत दिनों के बाद आज मैंने अपने हिंदी वेबसाइट को खोल कर देखा और यह देख कर बड़ी खुशी हुई कि उसमें प्रकाशित गूगल विज्ञापनों के शीर्षक हिन्दी में हैं। जी हाँ अब 'Ads by Google' के स्थान पर "गूगल द्वारा विज्ञापन" शीर्षक वाले विज्ञापन आने लगे हैं यकीन हो रहा हो तो नीचे का स्क्रीन शाट देखें:
चलिये, अन्तर्जाल के सफर में हमारी हिन्दी ने एक और सीढ़ी तय कर लिया।

किन्तु जब मैंने हिन्दी के चिट्ठों को देखा तो उनमें अभी भी अंग्रेजी शीर्षक वाले गूगल विज्ञापन प्रकाशित हो रहे हैं। उम्मीद है कि जल्दी ही हिन्दी चिट्ठों में हिन्दी शीर्षक वाले गूगल विज्ञापन आने लगेंगे।

Saturday, March 22, 2008

रंग

(स्व. श्री हरिप्रसाद अवधिया रचित कविताएँ)

रंग जमना, रंग उड़ना, रंग फीका पड़ना,
रंग में भंग हो जाना -
आजकल मामूली बात है
दुनिया के जंग में रंग की घात है,
अमीरों का दिन ही दिन -
और गरीबों की रात ही रात है।

रंग से घबरा गये सूरदास,
उन्होंने अनुभव किया कि -
काले रंग पर कोई रंग चढ़ता ही नहीं,
पर आज काले पर सफेदी ही सफेदी चढ़ी है,
स्वतंत्र भारत में काले की ही महिमा बड़ी है,
काला बाजारी, काले कारनामे,
काले झण्डे, ब्लैकमेल का खेल,
घी की जगह जमा हुआ तेल,
कला धन, काला मन,
सब ओर काले रंग की उभारें आ गई हैं
बदनीयती के दलदल में दुनिया समा गई है।
सूरदास आज होत तो देखते कि -
सभी रंगों पर कालिमा छा गई है।

लाल-पीला होना सभी जानते हैं
जमाने के रंग को सभी पहचानते हैं
रं बदलने में गिरगिट को गुरु मानते हैं
पर ;ॐ शान्ति' कह कर -
लड़ाई के रंग-ढंग को सभी टालते हैं
यही दुरंगी दुनिया है -
जहाँ कपट-कुरंग को सभी पालते हैं।

(रचना तिथिः 27-07-1983)

भंग की तरंग में

पंख बिना उड़ जाऊँ उल्लू के संब में,
बहुरंगी चाल चलूँ गिरगिट के रंग में,
सिकन्दर को पछाड़ूं हिटलरी उमंग में,
झूम झूम उछलूंगा अनोखे ढंग में।

ठहाके लहाऊंगा प्रसंग-अप्रसंग में,
बातें खूब करूंगा भोले के संग में,
अति भोजन कर लूंगा भूख के उछंग में,
पेड़े-बर्फी-लड्डू नाचेंगे अंग में।

डिस्को डांस करूंगा डूब कर अनंग में,
दंग करूंगा जग को ऊधम-हुड़दंग में,
नहीं रहूँगा अनपढ़ हिन्दी के संग में,
अंग्रेजी बोलूंगा भंग की गरंग में।

(रचना तिथिः 14-11-1989)

Thursday, March 13, 2008

ऋतुराज वसन्त

(स्व. श्री हरिप्रसाद अवधिया रचित कविता)

निर्मल नभ, मन्द पवन,
पुष्प-गन्ध की व्यापकता,
खग-कलरव, उन्मन भव,
मत्त मदन की मादकता।

अलि गण गुंजन, मुकुलित चुम्बन,
अमराई में मंजरि जाल,
रक्तिम टेसू, अग्नि अन्देशू,
विरह वह्नि की भीषण ज्वाल।

सरसों का पीताम्बर,
अभ्रहीन नीलाम्बर,
उन्मन उन्मन सबका मन,
शीतल निर्झर, कोकिल का स्वर,
ऋतु वसन्त का अनमोल रतन।

(रचना तिथिः रविवार 15-02-1981)

Monday, March 10, 2008

वसन्त की बहार

(स्व. श्री हरिप्रसाद अवधिया रचित कविता)

ऋतुराज है -
वासन्ती साज है,
वसन्त पर हमें नाज है,
प्रकृति के मंच पर -
नया संगीत नया साज है।

मौर लगे आम्र वृक्ष -
भीनी मादक महक से -
मुग्ध करते मन को,
शीतल-मन्द-सुगन्धित बयार के हल्के झोंके
पुलकित और उमंगित करते तन को।

सरसों के पीले खेत,
अलसी के अलसाये नीले फूल,
टेसू के लाल लाल चमकते झुण्ड,
सेमल के पत्रविहीन वृक्ष पर आकर्षक पुष्प,
प्रकृति के ये सब नये परिधान -
सौन्दर्य गागर छलकाते हैं,
'सेनापति' और 'पद्माकर' की स्मृति जगाते हैं।

महुए के नशीले फूल,
मधुमास की उठती हल्की धूल,
कोपलों से भरे सरिता के दुकूल,
मदहोशी, ऋतु के अनुकूल,
वसन्त की यह साज-सज्जा,
गूंजते भ्रमर और पुष्प के प्रेम में -
न संकोच, न अनावश्यक लज्जा।

कोयल की मधुर तान में -
छिड़ता ऋतुराज का संगीत,
मदन वसन्त का और -
वसन्त मदन का मीत
वसन्त पंचमी से होलिका दहन तक,
करते सब श्रृंगार में ही बातचीत।

(रचना तिथिः शनिवार 30-01-1982)

राजिम मेला

(स्व. श्री हरिप्रसाद अवधिया रचित छत्तीसगढ़ी कविता)

चल संगवारी राजिम मेला
घूमघाम के आबोन जी,
महानदी में पुन्नी नहा के
राजिम लोचन के दरसन पाबोन जी।

कुलेसर नाथ के दरसन करबोन
महादेव ला नहवाबोन जी,
लोमस रिसी के आस्रम जा के
अपन भाग सहराबोन जी।

चल संगवारी ........

सोनतिरिथ घाट में जाबोन
बहुते-च पुन्न कमाबोन जी,
मेला-ठेला में घूम के संगी
धक्का-मुक्की खाबोन जी।

चल संगवारी ........

सूपा-सरकी आये हो ही
बिसा बिसा के लाबोन जी,
वोही सरकी में बइठ के भइया
अड़बड़ सुख ला पाबोन जी।

चल संगवारी ........

तेंदू चार-चिरौंजी लेबोन
पिड़िया के परसाद चढ़ाबोन जी,
मेला के होटल में संगी
हाफ चाय पी आबोन जी।

चल संगवारी ........

मन हो ही तौ रेंहट झूलबोन
गम्मत से मन बहलाबोन जी,
अभनपुर के पेड़ा लाबोन अउ
माई-पिल्ला खाबोन जी।

चल संगवारी ........

छत्तिसगढ़ के बड़का मेला
राजिम में भर जाथै जी,
दुरिहा दुरिहा के रींगी-चींगी
उंहचे जिनिस बेचाथै जी,
कुछ लेबोन-देबोन अउ मन बहलाबोन
तब छत्तिसगढ़िया कहलाबोन जी।

चल संगवारी ........

(रचना तिथिः 07-02-1982)

साईं बाबा (40)

लेखकः स्व. श्री हरिप्रसाद अवधिया

अन्तर्यामी साईं बाबा (3)

साईं बाबा योगी थे। चौबीसों घण्टे उनकी सहज समाधि लगी रहती थी। वे यौगिक क्रियाओं में पूर्ण पारंगत थे। उन्हें खण्ड योग का पूरा पूरा ज्ञान था। खण्ड योग के द्वारा योगी अपने अंगों को अपने शरीर से अलग अलग कर फिर से जोड़ लेता है। साईं बाबा बैठे बेठे ही अन्तर्धान हो जाते और फिर प्रकट हो जाते थे। साईं बाबा के पास उनके दर्शन करने, उपदेश लेने और वेदान्त का ज्ञान प्राप्त करने के लिये योगी, अग्निहोत्री ब्राह्मण, साधक और मुमुक्ष लोग आते थे। बड़े बड़े शिक्षित लोग उनके भक्त थे। उनके लिये अमीर और गरीब में कोई भेद नहीं था। साईं बाबा के दिनचर्या का कोई ठोस रूप निश्चित नहीं था। वे केवल भक्तों के और जन समुदाय के कल्याण के लिये ही काम करते थे। उन्हें पूरे विश्व के कल्याण की चिन्ता रहती थी। वे भक्तों को उनके मन की कल्पना के अनुरूप ही दर्शन देते थे। वे "जाकी रही भावना जैसे, प्रभु मूरति देखी तिन तैसी" के अनुसार अपने भक्तों को विट्ठल, श्री हरि, राम, कृष्ण और अन्य देवी-देवताओं के रूप में दर्शन दे कर उनके मन में धर्म, गुरु और ज्ञान के प्रति आस्था, विश्वास और श्रद्धा देते थे।

उनके जीवन काल में ही कई लोगों ने उनके अवतारी होने का रहस्य जान लिया था। कुछ सन्तों ने भी उन्हें अच्छी तरह से पहचान लिया था। वे ब्रह्माण्ड के केन्द्र थे। मनुष्य जीवन का एकमात्र उद्देश्य है मोक्ष प्राप्त कर जन्म-मरण के बन्धन और कष्ट से मुक्ति पाना। जन्म-मरण के चक्र से छुटकारा तभी ही मिल सकता है जब भगवान की कृपा होगी। सन् 1918 और 1997 (लेख लिखने का वर्ष) के बीच बहुत कुछ परिवर्तन हुआ है। आज सन् 1997 में यह कहना कठिन है कि आज भगवान को कितने लोग मानते हैं और कितने लोग सच्चे हृदय से धर्म की ओर झुके हुये हैं। पहले सन्त-महात्मा पावस ऋतु में जगह जगह चातुर्मास किया करते थे - क्या आज वही परिस्थिति है? रामचरित मानस पठन के लिये आयोजन किये जाते थे। लोगों की प्रवृति धार्मिक थी। अब तो लगता है कि ईश्वर को भूल जाने में ही लोग जीवन की सार्थकता समझने और मानने लगे हैं। स्वार्थ सर्वत्र प्रबल हो गया है।१ पाप ही पुण्य माना जाने लगा है। जो जितना ही अधिक धूर्त है वही सज्जन समझा जाने लगा है। भ्रष्टाचार सर्वत्र व्याप्त है। समाचार पत्रों के पन्ने भ्रष्टाचार, अनाचार, बलात्कार, हत्या, अपहरण आदि महापापों के समाचारों से भरे पड़े रहते हैं। स्वार्थी ही परमार्थी कहलाने लगे हैं। अध्यात्म की बात कोई करता हुये नहीं जान पड़ता। भौतिक वाद अनन्त काल से धर्म प्राण भारत को निगल रहा है।

जुए के क्षेत्र का विस्तार बढ़ गया है। लोग लगभग अधम, असुर और अभिमानी हो गये हैं। रक्षक ही भक्षक बनते जा रहे हैं। जब कोई धर्म और परमात्मा की बातें करता है तब लोग उसका मखौल उड़ाते हुये से जान पड़ते हैं। क्या भगवान अब अवतार लेने और धर्म की संस्थापना करने के तैयार नहीं है? ऐसा प्रतीत होता है कि अब धार्मिक वातावरण शायद नहीं उभरेगा। भगवान को तो सब कुछ मालूम है तो भी वह अवतार क्यों लेगा? परमात्मा तो माया से अलिप्त है और आज संसार में झूठ, फरेब और माया तथा असत्य का ताण्डव हो रहा है। यह सब कुछ अन्तर्यामी साईं बाबा को ज्ञात है। वे सब कुछ सुधार सकते हैं किन्तु आवश्यकता है भगवान, सन्त, गुरु और धर्म के प्रति श्रद्धा रखने की। कहा नहीं जा सकता कि भगवान दानवता से परिपूर्ण वर्तमान कृत्रिम मानवता का सर्वनाश करने वाले हैं या अपनी शरण में आये हुये मानवों के द्वारा मानवता की रक्षा करने वाले हैं। अन्ततः ईश्वर की इच्छा ही प्रबल होती है - ईश्वरेच्छा गरीयसी।

(समाप्त)

Sunday, March 9, 2008

साईं बाबा (39)

लेखकः स्व. श्री हरिप्रसाद अवधिया

अन्तर्यामी साईं बाबा (2)

साईं बाबा की मूर्ति पूजा, कर्म बन्धन, कर्म मार्ग, कर्म फल और पुनर्जन्म पर पूर्ण आस्था थी। वे गुरु भक्ति के प्रबलतम समर्थक थे। ध्यान योग में प्रति पल निमग्न रहते थे। उन्होंने स्वयं बारह वर्ष तक तपस्या की थी और तपस्या के प्रबल पक्षपाती थे। वेदान्त के तो वे मूर्तिमान स्वरूप ही थे।

चराचर सृष्टि साईं बाबा के वश में थी। वे सर्वत्र एक ही आत्मा के दर्शन करते थे। प्रकृति तो चैतन्य के अधीन रहती है। इसीलिये उन्होंने पानी से दिये जला दिये। संसार के समस्त प्राणी साईं बाबा के अनुशासन में थे। हिन्दू धर्म में अग्नि की बड़ी महिमा बतायी गई है। ऋग्वेद तो "अग्निमीले पुरोहितं........" से ही प्रारम्भ होता है। साईं बाबा अग्नि के उपासक अग्निहोत्री ब्राह्मण थे। इसीलिये रात दिन धूनी जलाये रखते थे। वे साधक और सिद्ध की स्थिति को पार कर सुजान बन गये थे। भगवान शंकर की भाँति साईं बाबा भी भाग्यरेखा को मिटा कर अपने भक्तों के संकट दूर कर देते थे। उन्होंने शिरडी में भूमि गत तप-स्थली में अपने गुरु वेंकुश स्वामी के सानिध्य में बारह वर्ष तक कठिन तपस्या की थी।

साईं बाबा ने लोगों का मन धर्म के वास्तविक तत्व में लगाने के लिये कई चमत्कार भी किये। वे तो स्वयं मायापति त्रिलोकीनाथ भगवान थे। उनके लिये कुछ भी असम्भव नहीं था। अपने निवास के लिये उन्होंने जीर्णशीर्ण पुरानी मस्जिद को चुना पर उसका नाम रखा 'द्वारका माई' मस्जिद। यह भी भगवान साईं बाबा की लीला और कौतूहल ही था कि बाबा की कृपा से वह मस्जिद, मन्दिर जैसे बन गई। वहाँ धूनी जलने लगी, श्री हरि की पूजा और आरती की जाने लगी, शंख बजाये जाने लगे, कीर्तन होने लगा, साईं बाबा की अमृत वाणी गूंजने लगी, कृष्णाष्टमी और रामनवमी के त्यौहार मनाये जाने लगे। साईं बाबा का हर काम हिन्दू संस्कृति के अनुसार होता था। उनकी हर बात उपदेश पूर्ण होती थी।

साईं बाबा सदैव अपने भक्तों का ध्यान रखते और उनके दुःखों और कष्टों का निवारण करते थे। साईं बाबा अन्तर्यामी थे। वे बहिर्यामी तो हैं ही। हम भगवान को अपने से बाहर देखने का प्रयास करते हैं पर अपने भीतर झाँक कर, ध्यान लगा कर अपने अन्तर्यामी परमात्मा को भूल कर भी नहीं देखते। मनुष्य जीवन की असफलता का मूल कारण यही ही है। 'अनतर्यामी' को समझाते हुये भगवान श्री कृष्ण ने गीता में कहा है कि, "ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशे अर्जुन तिष्ठति", अर्थात् हे अर्जुन! परमात्मा सबके हृदय में निवास करते हैं। साईं बाबा ऐसे ही अन्तर्यामी थे। इसीलिये जब कभी कोई साईं बाबा से मिलने आता था तब वे बना बताये ही उसका नाम और आने का प्रयोजन जान लेते थे। अन्तर्यामी होने के कारण वे सर्वज्ञ थे। साईं बाबा गुरु और गुरु भक्ति के पूर्ण पक्षपाती थे। उनका मत था कि सद्गुरु के द्वारा मार्गदर्शन कराये बिना कदम कदम पर भटक जाने का भय बना रहता है। वे जानते थे कि "राखैं गुरु जो कोप विधाता।" इतना ही नहीं, उन्होंने स्वयं तात्या कोते पाटिल की मौत को अपने ऊपर ले कर उसके प्राण बचाये।

(क्रमशः)

Thursday, March 6, 2008

साईं बाबा (38)

लेखकः स्व. श्री हरिप्रसाद अवधिया

अनतर्यामी साईं बाबा (1)

साईं बाबा अन्तर्यामी हैं। वे आत्मा हैं, परमात्मा हैं, परब्रह्म हैं। आत्मा का अस्ततित्व कभी मिटता नहीं। साईं बाबा तो मायापति त्रिलोकीनाथ ही हैं। वे परब्रह्म परमात्मा के अवतार थे। भगवान के अवतार होने का उद्देश्य होता है। गीता में भगवान ने अपने अवतार लेने के उद्देश्य पर प्रकाश डालते हुये स्वयं कहा है कि -

"यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानं अधर्मस्य तदात्मानं सृजान्यहम्॥"

और

"परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।
धर्म संस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे॥"

अर्थात् जब अधर्म बढ़ जाता है, धर्म का ह्रास होने लगता है तब मैं अवतरित होता हूँ।

साधुओं की रक्षा और दुष्टों का विनाश कर धर्म की संस्थापना करने के लिये मैं अवतार लेता हूँ।

भगवान का अवतार तीन प्रकार का होता हैः- 1. नित्यावतार, 2. नैमित्तिक अवतार और 3. युगावतार।

1. नित्यावतारः सन्त महात्मा एवं समस्त जीव नित्यावतार में गिने जाते हैं। सन्त भगवान का स्मरण करते रहते हैं। जो महुष्य साधना कर साधक बन जाता है उसे लम्बी तपस्या के बाद आत्म-दर्शन हो जाता है। प्रत्येक के भीतर "ईश्वर अंश जीव अविनाशी का निवास होने के कारण वह भगवान का नित्यावतार होता है।

2. नैमित्तिक अवतारः कुछ जीवन्मुक्त आत्माएँ अपनी इच्छा से शरीर धारण कर किसी आध्यात्मिक कार्य को सम्पन्न करने के "निमित्त" से पृथ्वी पर अवतार लेती हैं और अपना काम सम्पन्न कर वापस चली जाती हैं। भगवान के ऐसे अवतार को नैमित्तिक अवतार कहते हैं। साईं बाबा इसी श्रेणी के अवतार ज्ञात होते हैं।

3. युगावतारः "सम्भवामि युगे युगे" में युग शब्द का प्रयोग किया गया है। "राम" और "कृष्ण" युगावतार थे। युगावतार से तात्पर्य होता है भगवान का वह अवतार जो पृथ्वी का भार दूर करता है, अन्यायियों और अत्याचारियों का संहार कर युग परिवर्तित करता और धर्म का उत्थान कर उसकी संस्थापना करता है।

ऐसा जान पड़ता है कि बीसवीं शताब्दी के पहले और उन्नीसवीं शताब्दी के अन्तिम दशक में वैष्णव धर्म में कुछ अस्थिरता आ गई थी जिसे दूर करने के निमित्त परब्रह्म ने साईं बाबा के रूप में अवतार लिया। वे स्वयं पूर्ण रूप से वैष्णव थे और कई रीतियों और कार्यों से उन्होंने वैष्णव धर्म की संस्थापना की - उनका पूरा जीवन ही इस तथ्य का स्वयं प्रमाण है। एक सच्चे वैष्णव के समान बाबा की मूर्ति पूजा में पूर्ण विश्वास था पर वे वेद वाणी के अनुसार निर्गुण ब्रह्म पर ही पूर्ण आस्था रखते थे। निराकार ब्रह्म को साकार मान कर फिर अन्तिम रूप से निराकार ब्रह्म में जीवन मुक्त हो कर लीन रहना और अन्त में महासमाधि लगा कर ब्रह्मलीन हो जाना ही हिन्दू धर्म का व्यावहारिक आधार है। आरम्भ से अन्त तक की प्रक्रिया अथवा साधना, ध्यान, नवधा भक्ति, पूजा-अर्चना-आरती, स्वाध्याय में निहित है। अन्तर्यामी साईं बाबा का पूरा जीवन ही इन्हीं तथ्यों पर आधारित था। वे पूजा और आरती का विशेष ध्यान रखते थे। एक सच्चा वैष्णव स्वयं को कभी भी परमात्मा नहीं कहता है। वेदान्ती, आत्म साक्षात्कार करने वाले साईं बाबा ने लोक कल्याण के लिये अपने को प्रभु से पृथक और भगवान को अपने से ऊँचा और अलग समझ कर भक्ति मार्ग का प्रचार करते रहे। उन्होंने तात्या कोते पाटिल को निमित्त बना कर शिरडी में लगभग सभी मन्दिरों का जीर्णोद्धार कराया। श्री हरि और उनका कीर्तन साईं बाबा के अत्यन्त प्रिय थे। श्रमद्भागवत, भगवद्गीता और विष्णु सहस्रनाम उनके प्रिय वैष्णव ग्रंथ थे।

(क्रमशः)

Sunday, March 2, 2008

साईं बाबा (37)

लेखकः स्व. श्री हरिप्रसाद अवधिया

महासमाधि में प्रवेश

सन् 1918 का दुखःद वर्ष आ पहुँचा। अट्ठाइस सितम्बर 1918के दिन साईं बाबा के ऊपर हल्के से बुखार का आक्रमण हुआ। ज्वर दो या तीन दिनों तक रहा परन्तु उसके बाद से साईं बाबा ने अन्न-जल त्याग दिया और दिनों दिन अशक्त होने लगे। ज्यों ज्यों बाबा की शक्ति क्षीण होत जाती थी त्यों त्यों उनके भक्त चिन्तित और दुःखी होत जा रहे थे। इन दिनों साईं बाबा को लक्ष्मी बाई शिन्दे की सेवा बहुत याद आ रही थी। लक्ष्मी बाई शिन्दे मस्जिद में दिन-रात काम करती थी और साईं बाबा की सेवा में लगी रहती थी। भगत म्हालासपति, तात्या और लक्ष्मी बाई के प्रति बाबा की इतनी असीम कृपा थी कि ये तीनों को ही रात के सामय मस्जिद में प्रवेश करनी का अधिकार था। एक दिन शाम के समय जब साईं बाबा तात्या के साथ बैठे थे तब वहाँ लक्ष्मी बाई आई और बाबा को प्रणाम किया। साईं बाबा ने उससे कहा, "लक्ष्मी, मैं बहुत भूखा हूँ।" लक्ष्मी बोली, "बाबा थोड़ा ठहरिये, मैं अभी आपके लिये रोटी ले कर वापस आती हूँ।" वह कुछ ही देर में साईं बाबा के लिये रोटी और सब्जी बना कर लाई और साईं बाबा के सामने रख दिया। बाबा ने रोटी और सब्जी को उठाया और एक कुत्ते को दे दिया। तब लक्ष्मी ने पूछा, "यह क्या है बाबा? मैं जल्दी से दौड़ कर रसोई घर में गई और आपके लिये रोटी-सब्जी बना कर लाई। आपने एक कौर भी नहीं खाया और सब एक कुत्ते को दे दिया।" साईं बाबा ने उत्तर दिया, "तुम व्यर्थ में क्यों दुःखी हो रही हो। कुत्ते की क्षुधा शान्त होना ही मेरी ही भूख की तृप्ति होना है। कुत्ता भले ही दूसरा प्राणी दिखता हो पर उसमें भी तो आत्मा है। भूख तो सबको समान रूप में लगती है। जिसके पास वाणी है वह बता सकता है पर जिसके पस वाक् शक्ति नहीं है वह चुप रह जाता है। निश्चित रूप से याद रखौ कि जो भूखे को भोजन देता है वह यथार्थ में उस भोजन से मेरी ही सेवा करता है। इसे स्वयं सिद्ध जानो। स्वयं न खा कर भूखे कुत्ते को रोटी-सब्जी दे देना तो तुच्छ बात है। इसके लिये तुम दुःखी क्यों होती हो?" इस प्रकार साईं बाबा ने एक महान आध्यात्मिक सत्य को व्यक्त किया और बिना किसी की भावना को ठेस पहुँचाये इस आध्यात्मिक सत्य के व्यावहारिक रूप का प्रदर्शन किया। उस समय से लक्ष्मी बाई साईं बाबा को भक्ति, स्नेह और श्रद्धा से प्रतिदिन दूध और रोटी देने लगी। साईं बाबा उसे स्वीकार कर प्रशंसा करते हुये खा लेते थे। बाबा उस दिन भोजन में से कुछ खा लेते थे और शेष को लक्ष्मी बाई केहाथ से राधाकृष्णा माई के पास भेज देते थे। वह साईं बाबा के उस प्रसाद को बड़े स्वाद के साथ खा लेती थी। रोटी का यह तथ्य सिद्ध करता है कि साईं बाबा सभी प्राणियों को स्वयं में और स्वयं को सभी प्राणियों में देखते, जानते और व्यवहार में मानते थे।

साईं बाबा के निर्वाण या सीमोल्लंघन अथवा महासमाधि का दिन था 15 अक्टूबर 1918, दशहरे का दिन। महासमाधि के पूर्व साईं बाबा को लक्ष्मी बाई शिन्दे की सेवा याद आ रही थी। उन्होंने अपनी जेब से पहले पाँच रुपये निकाल कर लक्ष्मी बाई को दान के रूप में दिये। तुरन्त बाद ही उन्होंने लक्ष्मी बाई को चार रुपये और दिये। इस प्रकार साईं बाबा ने लक्ष्मी बाई शिन्दे को दान के रूप में कुल नौ रुपये दिये। लक्ष्मी बाई धनवान महिला थी। उसे रुपयों की कोई कमी नहीं थी परन्तु साईं बाबा ने तो उसे नौ रुपये नवधा भक्ति के प्रतीक के रूप में दिये थे जिससे उसके मन में साईं बाबा के प्रति हमेशा गहरी और दृढ़ भक्ति बनी रहे। लक्ष्मी बाई ने बाबा का दिया हुआ नवधा भक्ति के प्रतीक वह दान रख लिये और उसे सदैव स्मरण करती रही।*

महासमाधि लेने के पहले साईं बाबा ने एक और सावधानी की। वे नहीं चाहते थे कि उनकी महासमाधि के क्षण में उनके प्रिय भक्त दुःखी हों। इसलिये उन्होंने उन लोगों को मस्जिद छोड़ कर बाड़ा में चले जाने और भोजन करने के बाद वापस आने का आदेश दिया। मस्जिद छोड़ कर बाड़ा में चले जाने में उन्हें असमंजस हुआ किन्तु साईं बाबा का आदेश जो था। इसलिये भारी मन और बोझिल कदम से वे बाड़ा में चले गये। फिर भी लक्ष्मी बाई शिन्दे, बया जी, लक्ष्मण लाला, शिम्पी, नाना साहब निमोनकर और शामा मस्जिद में ही रहे। बाबा की महासमाधि का समय समीप आ रहा था किन्तु उनकी चेतना ज्यों की त्यों बनी हुई थी। वे अपनी अन्तिम घड़ी तक चैतन्य बने रहे और लोगों को साहस और धीरज न छोड़ने का आदेश देते रहे। उन्होंने अपने संसार छोड़ने का ठीक ठीक समय किसी को नहीं बताया।

शामा मस्जिद की सीढ़ी पर बैठा था। लक्ष्मी बाई शिन्दे को नौ रुपये देने के बाद साईं बाबा ने कहा, "मुझे मस्जिद में अच्छा नहीं लग रहा है। मुझको बूटी के दगड़ी (पत्थर) में ले चलो। वहाँ मुझे ठीक लगेगा।" इन अन्तिम शब्दों को कहने के बाद बाबा बया जी के शरीर पर झुक गये और अन्तिम श्वाँस ली। वे मरणशील शरीर और नश्वर संसार को छोड़ कर महासमाधि में प्रविष्ट हो गये। वे ब्रह्मलीन हो गये। वह मंगलवार का दिन था। दोपहर के 2.30 बजे थे और दिनांक था 15 अक्टूबर 1918।

भागो जी शिन्दे ने देखा कि बाबा की श्वाँस उखड़ गई है। उसने नाना साहब निमोनकर को बताया जो नीचे बैठे हुये थे। नाना साहब कुछ पानी ले आये और साईं बाबा के मुँह में डाला। पानी मुँह से बाहर निकल आया। तब निमोनकर जोर से विलाप करते हुये बोले, "ओह देव!" बाबा अपनी आँख खोलते और अत्यन्त धीमे स्वर में "आह" कहते हुये-से मालूम पड़े पर यह निमोनकर का भ्रम था क्योंकि साईं बाबा तो सदा के लिये शरीर त्याग चुके थे।

साईं बाबा के निधन का समाचार आग की लपटों की तरह फैल गया। जो लोग साईं बाबा के आदेश से बाड़े में चले गये थे उनका मन और ध्यान मस्जिद की ओर ही लगा था। वे भोजन कर रहे थे पर उनसे खाया नहीं जा रहा था। भोजन समाप्त करने के पहले ही वहाँ समाचार पहुँचा कि साईं बाबा अपना नश्वर शरीर त्याग चुके हैं। सुनते ही लोगों ने थालियाँ सरका दीं। वे सब आँसू बहाते हुये मस्जिद की ओर दौड़े। वहाँ पहुँच कर उन लोगों ने देखा कि साईं बाबा बया जी की गोद में निर्जीव पड़े हैं। वे न तो जमीन पर गिरे थे और न अपने बिस्तर पर ही लेटे थे। सन्त लोग स्वयं ही अपने शरीर का निर्माण करते हैं, निश्चित उद्देश्य ले कर संसार में आते हैं और अपना कार्य समाप्त कर स्वेच्छा से शरीर त्याग कर संसार से चले जाते हैं। मस्जिद में लोग शोक-मग्न हो गये थे। प्रत्येक की आँखों से आँसू की धारा बह रही थी। कुछ लोग जोर जोर से रो रहे थे और कुछ अपने आपको सान्त्वना दे रहे थे। मस्जिद के बाहर शिरडी के निवासी उमड़ उमड़ कर इकट्ठा हो रहे थे - मानो दुःख और शोक के बादल उमड़ आये हों।

साईं बाबा के भक्त गण विचार कर रहे थे कि साईं बाबा के शरीर को कहाँ दफनायें। इस दिशा में लोग तरह तरह के विचार व्यक्त कर रहे थे। उन दिनों रामचन्द्र पाटिल शिरडी के मुख्य अधिकारी थे। उन्होंने शिरडी के निवासियों को अपने दृढ़तम निर्णय सुनाते हुये कड़े संकल्प के स्वर में कहा, "साईं बाबा का शव बाड़े में ही दफनाया जावेगा और कहीं भी नहीं।"

मंगलवार को साईं बाबा ने महासमाधि ली थी और दूसरे ही बुधवार की रात को अन्तिम प्रहर में साईं बाबा ने लक्ष्मण मामा जोशी से उनके समपने में आ कर कहा, "जल्दी से उठो। बापू साहब सोचता है कि मैं मर गया हूँ और इसलिये वह नहीं आवेगा। तुम सबेरे की आरती (कक्कड़ आरती) और पूजा करो।" लक्ष्मण मामा गाँव के ज्योतिषी और शामा के मामा थे। वे एक कट्टर ब्राह्मण थे और प्रतिदिन सबेरे साईं बाबा की पूजा करते थे। उसके बाद वे गाँव के सभी देवी-देवताओं की पूजा करते थे। उनका साईं बाबा में पूर्ण विश्वास था। स्वप्न में साईं बाबा को देखने और उनकी अनुमति पाने के बाद लक्ष्मण मामा पूजा की सब सामग्री ले कर आये और मौलवियंो के विरोध की परवाह न करते हुये उन्होंने मस्जिद में जा कर विधि-विधान से साईं बाबा की प्रभात पूजा की और प्रभात आरती करने के बाद घर वापस चले गये। दोपहर के समय पूजा की सामग्री ले कर लोगों के साथ बापू साहब जोग आये और उन्होंने हमेशा की तरह साईं बाबा की मध्याह्न पूजा और आरती की।

बाड़ा में ही साईं बाबा के शव को दफनाने का निश्चय किया गया। मंगलवार की शाम से ही लोगों ने बाड़े के मध्य भाग में स्थित गर्भ-गृह को खोदना प्रारम्भ कर दिया। मंगलवार को ही शाम के समय राहट से एक पुलिस सब इंस्पेक्टर आया। दूसरे स्थानों से दूसरे अधिकारी भी आ गये। उन लोगों ने बाड़े का निरीक्षण किया और साईं बाबा के पार्थिव शरीर को वहीं गड़ाने की अनुमति दे दी। दूसरे दिन बम्बई से अमीर भाई और कोपरगाँव से मामलतदार भी आ गये। बाला साहब भाटे और बाबा के एक महान भक्त उपासी के द्वारा ाईं बाबा के शव के कर्मकाण्ड किये गये। बुधवार के दिन सन्ध्या समय साईं बाबा की शव-यात्रा निकाली गई और उनका शव बाड़े में लाया गया। प्रोफेसर नार्के ने अवलोकन किया कि छत्तीस घण्टे के बाद भी साईं बाबा का शव नरम था। उनके अंग अकड़े नहीं थे। उनकी कफनी बना फाड़े निकाल ली गई।

साईं बाबा का मृत शरीर गर्भ गृह में गड़ा दिया गया। बाबा मुरलीधर बन गये, बाड़ा मन्दिर बन गया और शिरडी एक महान तीर्थ स्थान।

* साईं बाबा के द्वारा दिये गये उस दान के दो अर्थ निकाले गये हैं - 1. नवधा भक्ति का प्रतीक और 2. भक्त के नौ गुण।

नवधा भक्तिः

"श्रवणं कीर्तनं विष्णोः स्मरणं पाद सेवनं।
अर्चनं वन्दनं दास्यं सख्यमात्म निवेदनं॥"

अर्थात् (1) श्रवण (2) कीर्तन (3) स्मरण (4) चरण सेवा (5) अर्चन (6) वन्दना (7) दास्य भाव (8) सखा भाव (9) आत्म-निवेदन।

भक्त के नौ गुणः

"अमान्यमत्सरो दक्षो निर्ममो दृढ़सौहृदः।
असत्वरोऽर्थ जिज्ञासुरनसूयुरमोघवाक्ः

अर्थात् (1) अमानी (2) अमत्सर (3) दक्ष (निपुण) (4) दृढ़ सौहार्द्र (5) निर्मम (6) असत्वर (7) जिज्ञासु (8) असूय (9) अमोधवाक्


(क्रमशः)

 
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