Sunday, August 30, 2009

हिन्दी ब्लोगिंग - जो पेज पाया ही नहीं गया उसे भी तीन लोगों ने पसंद किया

कौन कहता है कि लोग ब्लोगवाणी में पसंद पर चटका नहीं लगाते? आज तो न खुलने वाले पेज को भी तीन लोगों ने पसंद किया है। और एक चमत्कार यह भी है कि आज ब्लोगवाणी में "आज अधिक पसंद प्राप्त" में ब्लोग "नेहरू और पामेला माउंटबेटन" को दो स्थान मिले हैं, एक बार छः बार पसंद वाला और एक बार तीन बार पसंद वाला। स्क्रीनशॉट देखें:
छः पसंद को क्लिक करने पर निम्न पेज खुलता हैः


और तीन पसंद को क्लिक करने पर "पेज नहीं पाया गया खुलता है"


सोचा था कि नहीं लिखेंगे पर क्या करें जबसे पता चला है कि हमें विद्वान समझा जाता है (समझने वाले की महानता को नमन! वरना हम तो खुद को सठियाया हुआ बुड्ढा ही समझते हैं) तो अपनी विद्वत्ता बघारने का मौका कैसे जाने दें

Saturday, August 29, 2009

अब्लोगस्य कुतो मित्रम्, अमित्रस्य कुतो सुखम्

जैसा कि निम्न श्लोक में कहा गया है कि मित्र के बिना सुख कहाँ? और धन के बिना मित्र कहाँ?

अलसस्य कुतो विद्या, अविद्यस्य कुतो धनम्।
अधनस्य कुतो मित्रम्, अमित्रस्य कुतो सुखम्॥

अर्थात् आलसी के पास विद्या कहाँ? विद्या के बिना धन कहाँ? धन के बिना मित्र कहाँ? और मित्र के बिना सुख कहाँ?

यदि इस श्लोक की रचना के जमाने में ब्लोग होते तो श्लोककर्ता ने "अधनस्य कुतो मित्रम्" के स्थान पर "अब्लोगस्य कुतो मित्रम्" ही लिखा होता क्योंकि धन की सहायता से प्राप्त मित्र सच्चे मित्र हो भी सकते हैं और नहीं भी हो सकते किन्तु ब्लोग के द्वारा सच्चा मित्र ही प्राप्त होता है।

पर अपने लिए तो गाहे बगाहे ये समस्या आती ही रहती है भैयाः

खूब खपाई खोपड़ी, औ खुद खप गए यार।
लिख ना पाए आज कुछ, हम ब्लोगर बेकार॥
हम ब्लोगर बेकार, थक कर अब सिर धुनते हैं।
जाने कैसे लोग, प्रविष्टि-पुष्प चुनते हैं?
बुद्धि हो गई भ्रष्ट, आज तो गए हम ऊब।
लिख ना पाये यार, खपाई खोपड़ी खूब॥

हमसे तो एक बार गलती हो गई अब कान पकड़ते हैं

बिन्दास लिखिए भाई! जैसा जी चाहे वैसा लिखिए। लेखनी आपकी है ब्लोग आपका है।

किसी और ने कुछ लिखा है उसका आप जैसा चाहें अर्थ निकाल सकते हैं, चाहें तो निवेदन समझें, चाहें लिखने वाले की अपनी भाषा के प्रति प्रेम समझें या फिर उसका दूसरों पर रोब जमाना समझें, जो भी चाहें आप समझ सकते हैं क्योंकि समझ भी आपकी है।

अभिव्यक्ति भी आपकी है और अभिव्यक्त करने के लिए भाषा भी आपकी है। आपकी इच्छा है जैसी भाषा में चाहें वैसी भाषा में अभिव्यक्त करें।

हमसे तो एक बार गलती हो गई अब कान पकड़ते हैं, आइंदा ऐसी गलती करने से बचने का पूरा पूरा प्रयास करेंगे।


हाँ पर लिखना हम भी नहीं छोड़ेंगे। चाहे आपको हमारा लिखना अच्छा लगे या न लगे। यह अवश्य प्रयत्न करेंगे कि हमारे लिखने से किसी को बुरा न लगे।

Friday, August 28, 2009

पसंदीदा mp3 गाने मुफ्त में डाउनलोड करें

पिछले महीने एक चाइना मोबाइल सेट खरीद लिया तो इच्छा हुई कि इसमें अपनी पसंद के गाने डाउनलोड कर लिया जाए। मुझे पुरानी फिल्मों के गाने ही पसंद हैं किन्तु मेरे लड़कों और परिचितों के मेरे पसंदीदा गानों की सीडी उपलब्ध नहीं थी। यह सोचकर कि जब अपने पास इंटरनेट की सुविधा उपलब्ध है तो भला गानों के लिए जबरदस्ती रकम क्यों खर्च किया जाये, मैंने नेट में सर्च किया तो मुझे दो साइट्स ऐसे मिले जहाँ पर कि नये-पुराने गानों का जैसे भंडार भरा हो। मैंने वहाँ से अपनी पसंद के गाने अपने कम्प्यूटर में डाउनलोड कर लिए और उन्हें अपने मोबाइल में भी ले आया। नीचे दोनों ही साइट्स के लिंक दे रहा हूँ ताकि आप लोगों को भी इसका फायदा मिल पायेः

http://www.radioreloaded.com/movies/


http://www.mp3hungama.com/music/genre_albums.php?id=3

गाने डाउनलोड करने के लिए उपरोक्त साइट्स में अपना पसंदीदा गाना ढूँढ लें और उसके लिंक पर राइटक्लिक करके यदि आप इंटरनेट एक्प्लोरर इस्तेमाल कर रहे हैं तो "सेव्ह टारगेट ऐज" को और यदि फायरफॉक्स इस्तेमाल कर रहे हैं तो "सेव्ह लिंक ऐज" को क्लिक कर के गाना डाउनलोड कर लें।

और हाँ यदि आपका पसंदीदा गाना उपरोक्त साइट्स में भी न मिलें किन्तु यूट्यूब में उस गाने का व्हीडियो उपलब्ध हो तो उस व्हीडियो को या तो व्हीडियो के रूप में या फिर mp3 में बदल कर भी डाउनलोड किया जा सकता है। इसके लिए आप मेरा "आडियो व्हीडियो मुफ्त डाउनलोड कैसे करें" लेख पढ़ सकते हैं।

Thursday, August 27, 2009

हिन्दी ब्लोग्स में हिज्जों और व्याकरण की गलतियाँ

यह खुशी की बात है कि हिन्दी ब्लोग्स की संख्या दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही हैं। नित नये नये लोग हिन्दी ब्लोगर्स बनते जा रहे हैं। पर जब कभी भी हिन्दी ब्लोग्स में "हम मुर्ख हैं", "बातें कि जाये" आदि पढ़ता हूँ तो मन क्षोभ से भर उठता है। अंग्रेजी के ब्लोग्स तथा वेबसाइट्स में इस बात का पूरा पूरा ध्यान दिया जाता है कि हिज्जों और व्याकरण की गलतियाँ न रह जायें और इसीलिए वहाँ पर ढूँढने से भी गलतियाँ नहीं मिलती।

यह सही है कि सभी हिन्दी ब्लोगर्स की मुख्य भाषा हिन्दी नहीं है इसलिए हिज्जों और व्याकरण की गलतियाँ होनी तो स्वाभाविक ही है। मगर कई बार उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ जैसे हिन्दीभाषी क्षेत्र के ब्लोग्स में भी हिज्जे और व्याकरण की गलतियाँ मिलती हैं। इसका मुख्य कारण सिर्फ यही लगता है कि हम हिन्दीभाषी ब्लोगर्स अपनी प्रविष्टियाँ आनन फानन में बिना जाँचे ही प्रकाशित कर देते हैं। यदि हम अपनी प्रविष्टियाँ प्रकाशित करने के पहले एक बार उसे पढ़ लें तो इस प्रकार की गलतियाँ हो ही नहीं सकती।

हिन्दी को इंटरनेट की प्रमुख भाषाओं में से एक बनाने के लिए हमें उसकी गुणवत्ता पर पूरा पूरा ध्यान रखना ही होगा। इसके लिए हम सभी हिन्दी ब्लोगर्स को संकल्प लेना होगा कि अपनी प्रविष्टि प्रकाशित करने के पूर्व हम सुनिश्चित हो जाएँ कि कहीं कोई हिज्जे या व्याकरण की गलती तो नहीं रह गई है।

Wednesday, August 26, 2009

लिखना कोई बड़ी बात नहीं है, बड़ी बात है उसे लोगों को पढ़वाना

अब अगर कोई ब्लोगर है तो लिखेगा ही। आखिर लिखना कौन सी बड़ी बात है? बड़ी बात तो है लिखे हुए को पढ़वाना। क्या मतलब हुआ लिखने का यदि किसी ने पढ़ा ही नहीं? असली मेहनत तो अपने लिखे को दूसरों को पढ़वाने में लगती है। बड़ी माथा-पच्ची करनी पड़ती है। पाठक जुटाना कोई हँसी खेल नहीं है। ढूँढ-ढूँढ कर सैकड़ों ई-मेल पते इकट्ठे करने होते हैं। लिखने के बाद सभी को ई-मेल से सूचित करना पड़ता है कि मेरा ब्लोग अपडेट हो गया है।

अब आप पूछेंगे कि जब एग्रीगेटर्स आपके लेख को लोगों तक पहुँचा ही देते हैं तो फिर मेल करने की जरूरत क्या है? तो जवाब है - भाई कोई जरूरी तो नहीं है कि सभी लोग एग्रीगेटर्स को देख रहें हों और मानलो देख भी रहें हों तो आपके लेख को मिस भी तो कर सकते हैं। इसलिए जरूरी है कि लोगों को मेल करो।

अब अगर आप कहेंगे कि यदि लेख अच्छा होगा तो लोग पढ़ेंगे ही, चाशनी टपकाओगे तो चीटियाँ तो अपने आप आयेंगी। इसके जवाब में मैं बताना चाहूँगा कि आप पाठकों की नब्ज नहीं पहचानते। आप नहीं जानते कि ये पाठक बड़े विचित्र जीव होते हैं, कुछ भी ऊल-जलूल चीजों को तो पढ़ लेते हैं पर अच्छे लेखों की तरफ झाँक कर देखते भी नहीं। पर पाठकों को अच्छे लेख पढ़वाना हमारा नैतिक कर्तव्य है इसलिए मेल करके उनका ध्यान खींचो, उन्हें सद्‍बुद्धि दो और सही रास्ते पर लाओ।

भाई, ई-मेल तो फोकट में होता है पर जब ई-मेल का जमाना नहीं था तो हमारे कवि मित्र और गुरु लोगों को फोन से अपनी कविता सुनाया करते थे। एक बार जब मैं उनके यहाँ पहुँचा तो वे फोन में कह रहे थे - वर्षा-वर्णन पर मेरी ताजी कविता सुनें, इतना अच्छा लिखा है कि सुनकर आप तुलसीदास जी का "शरद् वर्णन" और "सेनापति" का "ऋतु वर्णन" भूल जायेंगे। तो सुनिये - "बारिश हुई, मेढक टर्राया, सड़कों में भी पानी भर आया ...." दूसरी ओर से आवाज आई - बकवास बन्द कर साले और बता मेरा फोन नंबर तुझे किसने दिया? गुरु बोले - मैं तो अपनी हर कविता लिखने के तत्काल बाद ही फोन में कुछ भी नंबर घुमा देता हूँ और जिसे लग जाए उसे अपनी कविता सुना देता हूँ।

खैर, मुझे तो अपनी उम्र का भी लाभ मिलता है और कुछ पाठक वैसे ही मिल जाते हैं क्योंकि लोग सोचते हैं - वयोवृद्ध ब्लोगर ने लिखा है अवश्य पढ़ना चाहिये (अब मैं तो स्वयं को वयोवृद्ध ही कहूँगा ना भले ही यह अलग बात है कि लोग सोचते हैं कि आज साले बुड़्ढे ने भी लिखा है चलो एक नजर डाल ही लें)। फिर भी मैंने हजारों ई-मेल पते संग्रह कर रखे हैं और उनके द्वारा सभी को अपने लेख के बारे में सूचित करता हूँ। यदि आपको भी कभी मेरा मेल मिल जाए तो आपसे गुजारिश हैं कि न तो उसे मिटाइयेगा और न ही उसका बुरा मानियेगा।

Sunday, August 23, 2009

तीजा - छत्तीसगढ़ की महिलाओं का विशिष्ट दिन

आज भाद्रपद की शुक्ल पक्ष की तृतीया है - अर्थात् हरतालिका तीज, जिसे कि छत्तीसगढ़ में "तीजा" कहा जाता है। आज का दिन छत्तीसगढ़ की महिलाओं के लिए एक विशिष्ट दिन है। समस्त महिलाएँ, चाहे वे कुमारी हों या विवाहित, आज निर्जला व्रत रख कर रात्रि जागरण और गौरी-शंकर की पूजा करेंगी। व्रत-पूजा करके जहाँ विवाहित महिलाएँ अपने लिये अखंड सौभाग्य की कामना करती हैं वहीं कुमारियों का उद्देश्य होता है स्वयं के लिये योग्य वर की प्राप्ति। मान्यता है कि आज के दिन ही शिव-पार्वती का विवाह हुआ था।

छत्तीसगढ़ में तीजा व्रत की अत्यधिक मान्यता है। इस व्रत को मायके में ही आकर रखा जाता है। यदि किसी कारणवश मायके आना नहीं हो पाता तो भी व्रत तोड़ने के लिये मायके से जल और फलाहार का आना आवश्यक होता है क्योंकि इस व्रत को मायके के ही जल पीकर तोड़ा जाता है।

महिलाएँ रात भर जागरण करके भजन-पूजन करती हैं और भोर होने के बाद अपना व्रत तोड़ती हैं।

रात्रि के इस उल्लास के साथ दूसरे दिन विघ्नहर्ता भगवान श्री गणेश जी का आगमन द्विगुणित कर देता है।

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Saturday, August 22, 2009

गणेशोत्सव - धार्मिक-सह-सामाजिक त्यौहार

गणेशोत्सव एक प्रमुख हिन्दू त्यौहार है। यह त्यौहार हिन्दुओं में अत्यन्त लोकप्रिय है तथा सम्पूर्ण भारत में मनाया जाता है।

हिन्दू पंचांग के अनुसार गणेशोत्सव भाद्रपद माह के शुक्लपक्ष चतुर्थी से चतुर्दशी तक मनाया जाता है।

जैसा कि नाम से ही विदित है, गणेशोत्सव के दौरान भगवान श्री गणेश जी, जो कि हिन्दुओं के विशिष्ट देवता हैं, की पूजा की जाती है।

यद्यपि गणेशोत्सव का त्यौहार सम्पूर्ण भारत में मनाया जाता है किन्तु महाराष्ट्र में यह अत्यन्त लोकप्रिय है।

चूँकि भगवान श्री गणेश जी मंगलदायक देवता हैं, इसलिये महाराष्ट्र में उन्हें मंगलमूर्ति के नाम से भी जाना जाता है।

गणेशोत्सव का इतिहास

कहा जाता है कि शिवाजी की माता जीजाबाई ने पुणे के कस्बा गणपति में गणेश जी की स्थापना की थी और पेशवाओं ने गणेशोत्सव को बहुत अधिक बढ़ावा दिया।

मूलतः गणेशोत्सव पारिवारिक त्यौहार था किन्तु बाद के दिनों में लोकमान्य बालगंगाधर ने इस त्यौहार को सामाजिक स्वरूप दे दिया तथा गणेशोत्सव राष्ट्रीय एकता का प्रतीक बन गया।

लोकमान्य बालगंगाधर तिलक के प्रयास से गणेशोत्सव छुआछूत जैसी अनेकों सामाजिक बुराइयों का नाश करने वाला एक सशक्त हथियार बन गया।

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Friday, August 21, 2009

आज मन ठीक नहीं है

कभी-कभी अकारण ही मन उदास हो जाता है। ऐसा मेरे साथ ही नहीं, सभी के साथ होता है। आपने भी अवश्य ही कभी ऐसा महसूस किया होगा। इसके विपरीत कभी-कभी बिना किसी कारण के मन प्रफुल्लित भी होता है। जब मनुष्य प्रफुल्लित होता है तो वह प्रायः आगत के विषय में सोचता है और जब उदास होता है बरबस ही विगत उसकी आँखों के सामने चलचित्र की तरह चलने लगता है। फिर मेरे जैसे उम्रदराज आदमी के लिये तो अतीत का स्मरण बहुत ही आनन्ददायक होता है। वृद्ध लोगों को अतीत की याद करना और वर्तमान में नुक्स निकालना बहुत प्रिय होता है। खैर, मैं वर्तमान में तो चाह कर भी नुक्स नहीं निकालूँगा क्योंकि यह वर्तमान ही है जिसकी वजह से मेरा ये पोस्ट आप लोगों के समक्ष है, अपने अतीत में तो मैं इस प्रकार से आप जैसे प्रेमी लोगों से सम्पर्क कर ही नहीं सकता था। हाँ, मेरी उम्र के अन्य लोगों की तरह मुझे भी अतीत प्यारा लगता है।

तो आज मन कुछ ठीक न होने से मुझे भी अतीत की बहुत सी यादों ने घेर लिया है। बचपन में मुझे मेरी दादी बहुत चाहती थीं। सत्रह वर्ष की उम्र में विधवा हो गई थीं। उस जमाने के चलन के अनुसार भक्ति भाव में डूबे रहना ही उनका जीवन था। मुझे रोज ब्राह्म-बेला में जगा दिया करती थीं। नित्य दूधाधारी मन्दिर में सुबह की आरती, जो कि साढ़े छः-सात बजे हुआ करती थी, में उपस्थित होना उनका नियम था। अपने साथ वे सालों तक मुझे दूधाधारी मन्दिर ले जाती रहीं। मात्र तीसरी कक्षा तक पढ़ी थीं वे, किन्तु रामायण, भागवत का पाठ रोज ही किया करती थीं। 'नरोत्तमदास' रचित "सुदामा चरित" उन्हें अत्यन्त प्रिय था और पूरी तरह से कण्ठस्थ था। मुझे रोज ही पौराणिक कथाएँ सुनाया करती थीं। आज जो संस्कार मुझमें है वह उन्होंने ही मुझे दिया है। मुझमें भी हिन्दू संस्कार कूट कूट कर भरा हुआ है। और इसी कारण से मुझे सुरेश चिपलूनकर जी के लेख बहुत अच्छे लगते हैं (यह अलग बात है कि आक्रामक स्वभाव न होने के कारण मैं वैसे लेख नहीं लिख सकता)।

प्रायमरी स्कूल में गणित मेरा प्रिय विषय था। कक्षा में सबसे पहले सवाल मैं ही हल किया करता था। आज सोचता हूँ कि उस जमाने में सीखे हुये रुपया-आना-पैसा, तोला-माशा-रत्ती, मन-सेर-छँटाक, ताव-दस्ता-रीम आदि के सवाल आज किसी काम के नहीं रहे हैं। प्रायमरी स्कूल में गणित में मुझे चालीस में चालीस अंक मिला करते थे। इसी प्रकार इमला (श्रुतलेख) में भी मुझे सोलह में सोलह अंक मिला करते थे।

प्रायमरी स्कूल के बाद अर्थात् मिडिल स्कूल से लेकर कॉलेज तक मैं हमेशा सेकेण्ड क्लास विद्यार्थी ही रहा। मैं मूलतः विज्ञान का छात्र था, गणित, भौतिकशास्त्र और रसायनशास्त्र मेरे विषय थे। एक साल तक इंजीनियरिंग कॉलेज, रायपुर में भी पढ़ा किन्तु घर की आर्थिक परिस्थिति अच्छी न होने के कारण उसे छोड़ना पड़ा।

हिन्दी कभी भी मेरा मुख्य विषय नहीं रहा किन्तु हिन्दी से मुझे शुरू से ही प्रेम रहा है। शायद इसका कारण यही हो कि मेरे पिताजी ने हिन्दी में एम.ए. किया था और वे हिन्दी के ही शिक्षक थे। हिन्दी का ज्ञान मुझे वंशानुगत ही मिला है। हिन्दी के ब्लोग्स की बढ़ती संख्या देखकर मुझे बहुत खुशी होती है। कभी कभी हिन्दी ब्लोग्स में हिज्जों और व्याकरण की गलतियाँ देख कर अखरता भी है किन्तु यह भी लगता है कि यह तो स्वाभाविक ही है क्योंकि बहुत से ऐसे ब्लोगर भी हैं जिनकी भाषा हिन्दी न होकर कुछ अन्य है। फिर भी, जैसा कि अंग्रेजी तथा अन्य भाषाओं के ब्लोग्स में होता है, हम भी लिखते समय हिज्जों और व्याकरण की गलतियों का ध्यान रखें तो ज्यादा अच्छा होगा।

चलिये, इतना लिखकर मन का गुबार निकल गया और उदासी जाती रही।

Monday, August 17, 2009

लिखता क्या था, अपने आपको ब्लोगर शो करता था

अरे! ये क्या है? बिस्तर पर ये तो मेरा ही पार्थिव शरीर है।

पर मैं तो रात में आराम से सो गया था अब नींद खुलने पर अपने सामने मैं अपने ही मृत शरीर को कैसे देख रहा हूँ? बहुत सोचने पर समझ में आया कि रात में ही किसी समय मेरे प्राण पखेरू उड़ गये थे।

अब मैं अपने ही मृत शरीर को देखते हुए यमदूतों के आने की प्रतीक्षा करने लगा। कुछ देर बाद मेरे लड़के की नींद खुली। मैंने उसे पुकारा किन्तु उसे सुनाई नहीं पड़ा। आखिर सुनाई पड़ता भी कैसे? मैं तो अब आत्मा था। मैं उसे देख-सुन सकता था पर वह मुझे नहीं।

वो तो हकबकाये हुये मेरे मृत शरीर को देख रहा था। कुछ देर के बाद उसे कुछ सूझा और उसने घर के सभी लोगों को जगाना शुरू कर दिया। सभी लोग सुबह-सुबह की मीठी नींद का आनन्द ले रहे थे अतः इस प्रकार नींद में खलल डालना उन्हें अच्छा नहीं लगा और वे कुनमुनाने लग गये।

उन्हें जबरदस्ती उठा कर लड़के ने कहा, "तुम लोगों को कुछ पता भी है? पापा तो रेंग गये।"

"ये क्या कह रहे हैं आप? रात को तो अच्छे भले थे।" बहू ने कहा।

"बिल्कुल ठीक कह रहा हूँ। जाकर देख लो।" यह कह कर लड़का रिश्तेदारों को फोन लगाने लग गया।

घर के लोगों ने मेरे शरीर को बिस्तर से उठा कर उत्तर दिशा की ओर सिर रख कर जमीन पर लिटा दिया। औरतें उस शरीर को चारों ओर घेर कर बैठ गईं।

बहू ने कहा, "अभी-अभी पिछले हफ्ते तो ही ये बिस्तरा खरीदा था बड़े शौक से अपने लिये। इनका बिस्तर कल धोने के लिये गया था इस कारण से ये बिस्तर इनके लिये लगा दिया था। अब तो दान में देना पड़ेगा इस बिस्तर को। बहुत अखरेगा।"

इस पर उसकी चाची-सास अर्थात् मेरे भाई की पत्नी ने कहा, "कोई जरूरत नहीं है नये बिस्तरे को दान-वान में देने की। जल्दी से इसे अन्दर रख दो और वो जो पुराना फटा वाला बिस्तर है उसे यहाँ लाकर कोने में रख दो।"

रिश्तेदार आने शुरू हो गये।

किसी ने कहा, "सुना है कि कुछ लिखते विखते भी थे।"

मेरे मित्रों में से एक ने, जो कि अपने आप को बहुत बड़ा लेखक समझते थे, कहा, "लिखता क्या था, अपने आपको ब्लोगर शो करता था। उसके लिखे को यहाँ कोई पूछता नहीं था इसलिये इंटरनेट में जबरन डाल दिया करता था।"

एक सज्जन बोले, "अब जैसा भी लिखते रहे हों, जो भी करते रहे हों, मरने के बाद तो कम से कम उनकी बुराई तो मत करो।"

मित्र ने कहा, "बुराई कौन साला कर रहा है? अब किसी के मर जाने पर सच्चाई तो नहीं बदल जाती! सच तो यह है कि उम्र भले ही साठ से अधिक की हो गई हो पर बड़प्पन नाम की चीज तो छू भी नहीं गई थी उसे। हमेशा अपनी ही चलाने की कोशिश करता था। एक नंबर का अकड़ू था। जो कोई भी उससे मिलने आ जाता उसे जबरन अपने पोस्ट पढ़वाता था। दूसरों का लिखा तो कभी पढ़ता ही नहीं था। खैर आप मना कर रहे हैं तो अब आगे और मैं कुछ नहीं कहूँगा।"

मेरे लड़के ने कहा, "पापा तो साठ साल से भी अधिक जीवन बिताकर गए हैं यह तो खुशी की बात है। नहीं तो आजकल तो लोग पैंतालीस-सैंतालीस में ही सटक लेते हैं। हमें किसी प्रकार का गम मना कर उनकी आत्मा को दुःखी नहीं करना है, बल्कि लम्बी उमर सफलतापूर्वक जीने के बाद उनके स्वर्ग जाने की खुशी मनाना है। आप लोग बिल्कुल गम ना करें।"

मेरे भाई के लड़के ने कहा, "भैया बिल्कुल सही कह रहे हैं। अब हमें चाचा जी का क्रिया-कर्म बड़े धूम-धाम से करना है। पुराने समय में दीर्घजीवी लोगों की शव-यात्रा बैंड बाजे के साथ होती थी। हम भी बैंड बाजे का प्रबंध करेंगे।"

"पर आजकल तो बैंड बाजे का चलन ही खत्म हो गया है, कहाँ से लाओगे बैंड बाजा?" एक रिश्तेदार ने प्रश्न किया।

"तो फिर ऐसा करते हैं कि डीजे ही ले आते हैं।"

"पर भजन-कीर्तन वाला डीजे कहाँ मिलता है, डीजे का प्रयोग तो लोग नाच नाच कर खुशी मनाने के लिये करते हैं।"

"तो बात तो खुशी की ही है, हम लोग भी शव-यात्रा में नाचते-नाचते ही चलेंगे।"

"पर भाई मेरे! लोग नाचेंगे कैसे? नाचने के लिये तो पहले मत्त होना जरूरी है जो कि बिना दारू पिये कोई हो ही नहीं सकता। अब यह तो शव-यात्रा है, कोई बारात थोड़े ही है जो पहले लोगों को दारू पिलाई जाये?"

"भला दारू क्यों नहीं पिलाई जा सकती? आखिर मरने वाला भी तो दारू पीता था। लोगों को दारू पिलाने से तो उनकी आत्मा को और भी शान्ति मिलेगी।"

"अरे! क्या ये दारू भी पीते थे?" किसी ने पूछा।

"ये दारू भी पीते थे से क्या मतलब? पीते थे और रोज पीते थे। पूरे बेवड़े थे। बेवड़े क्या वो तो पूरे ड्रम थे ड्रम। एक क्वार्टर से तो कुछ होता ही नहीं था उन्हें। और जब दारू उन्हें असर करती थी तो उनके ज्ञान-चक्षु खुल जाते थे। धर्म-कर्म की बातें करते थे। राम और कृष्ण की कथा बताया करते थे। रहीम और कबीर के दोहे कहा करते थे। हम लोग तो भयानक बोर हो जाते थे। अब ये बातें भला पीने के बाद करने की हैं? करना ही है तो किसी की ऐसी-तैसी करो, किसी को गाली दो, किसी को कैसे परेशान किया जा सकता है यह बताओ। सारा नशा किरकिरा कर दिया करते थे।"

"तो तुम क्यों सुनते रहते थे? उठ कर चले क्यों नहीं जाया करते थे?"

"अरे भई, जब उनके पैसे से दारू पीते थे तो उन्हें झेलना भी तो पड़ता था। और फिर जल्दी घर जाकर घरवाली की जली-कटी सुनने से तो इन्हें झेल लेना ही ज्यादा अच्छा था।"

ये बातें चल ही रहीं थी कि बहू ने मेरे लड़के को इशारे अपने पास बुलाया और एक ओर ले जाकर कहा, "ये क्या डीजे, नाचने-गाने और दारू की बात हो रही है? और तुम भी इन सब की हाँ में हाँ मिलाये जा रहे हो। इस सब में तो पन्द्रह-बीस हजार खर्च हो जायेंगे। कहाँ से आयेंगे इतने रुपये?"

"तो तुम क्यों चिन्ता में घुली जा रही हो? तुम्हें खर्च करने के लिये कौन कह रहा है?"

"पर जानूँ भी तो आखिर खर्च करेगा कौन?"

"मैं करूँगा, मैं।" लड़के ने छाती फुलाते हुए कहा।

"वाह! अपने लड़के की खटारी मोटर-सायकल की मरमम्त के लिये पाँच हजार तो हाथ से छूटते नहीं हैं और जो मर गया उसके लिये इतने रुपये निकाले जा रहे हैं। इसी को कहते हैं 'जीयत ब्रह्म को कोई ना पूछे और मुर्दा की मेहमानी'। खबरदार जो एक रुपया भी खर्च किया, नहीं तो मुझसे बुरा कोई नहीं होगा।"

"अरे बेवकूफ, तुम कुछ समझती तो हो नहीं और करने लगती हो बक-बक। इसी को कहते हैं 'अकल नहीं और तनखा बढ़ाओ'। अगर मेरे पास रुपये होते तो मैं भला अपने बेटे को क्यों नहीं देता? पर बाप का अन्तिम संस्कार तो करना ही पड़ेना ना!"

"बेटे के लिये नहीं थे तो बाप के लिये अब कहाँ से आ गये रुपये?"

"बुढ़उ ने खुद दिये थे मुझे पचास हजार रुपये परसों, अपने बैंक खाते में जमा करने के लिये। कुछ कारण से उस दिन मैं बैंक नहीं जा पाया और दूसरे दिन बैंक की छुट्टी थी। उनके और मेरे अलावा और किसी को पता ही नहीं है कि उन्होंने मुझे रुपये दिये थे। अब उन रुपयों में से उन्हीं के लिये अगर पन्द्रह-बीस हजार खर्च कर भी दूँ तो भी तो तुम्हारे और तुम्हारी औलाद के लिये अच्छी-खासी रकम बचेगी। साथ ही साथ समाज में मेरा खूब नाम भी होगा। अब गनीमत इसी में है कि तुम चुपचाप बैठो और मुझे भी अपने बाप का क्रिया-कर्म करने दो।"

फिर लड़के ने वापस मण्डली में आकर कहा, "भाइयों, आप लोगों ने जैसा सुझाया है सब कुछ वैसा ही होगा। डीजे भी आयेगा और दारू भी। बस आप लोग दिलखोल कर पीने और नाचने के लिये तैयार हो जाइये।"

इतने में ही एक आदमी ने आकर कहा, "हमें खबर लगी है कि जी.के. अवधिया जी की मृत्यु हो गई है, कहाँ है उनकी लाश?"

हकबका कर मेरे लड़के ने पूछा, "आपको क्या लेना-देना है उनसे?"

"अरे हमें ही तो ले जाना है उनकी लाश को। मैं सरकारी अस्पताल से आया हूँ उनकी लाश ले जाने के लिये, पीछे पीछे मुर्दागाड़ी आ ही रही होगी। उन्होंने तो अपना शरीर दान कर रखा था।"

वे लोग मेरे शरीर को ले गये और मेरी शव-यात्रा के लिये आये हुये लोगों को बिना पिये और नाचे ही मायूसी के साथ वापस लौट जाना पड़ा।

उनके जाते ही यमदूत मेरे सामने आ खड़ा हुआ और बोला, "चलो, तुम्हें ले जाने के लिये आया हूँ। जो कुछ भी तुमने अपने जीवन में पाप किया है उस की सजा तो नर्क पहुँच कर तुम्हें मिलेगी ही पर अपने ब्लोग में ऊल-जलूल पोस्ट लिखने की, किसी के ब्लोग में, यहाँ तक कि जो लोग तुम्हारे ब्लोग में टिप्पणी किया करते थे उनके ब्लोग में भी, टिप्पणी नहीं करने की सजा तो तुम्हें अभी ही यहीं पर मिलेगी।"

इतना कह कर उसने अपना मोटा-सा कोड़ा हवा में लहराया ही था कि मेरी चीख निकल गई और चीख के साथ ही मेरी नींद भी खुल गई।

आपको माधवराव सप्रे जी की कहानी एक टोकरी भर मिट्टी भी अवश्य ही पसंद आएगी।

Friday, August 14, 2009

कृष्ण एक असाधारण पुरुष

चाहे कोई कृष्ण को अवतार माने या केवल एक ऐतिहासिक पात्र माने पर यह तो मानना ही पड़ेगा कि वे एक असाधारण पुरुष थे। यही कारण है कि पौराणिक कथाओं से लेकर मध्यकालीन कवियों कि रचनाओं तक में वे एक प्रमुख पात्र रहे हैं। उनका व्यक्तित्व इतना असाधारण था कि न केवल हिन्दू बल्कि अन्य धर्मावलम्बियों में भी कृष्ण के भक्त पाये जाते हैं।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भी श्री कृष्ण का विशेष व्यक्तित्व रहा है और इसीलिये भगवान विष्णु के दस अवतारों में से सिर्फ कृष्णावतार को ही पूर्णावतार माना गया है क्योंकि सभी दस अवतारों में सिर्फ श्री कृष्ण ही सोलह कलाओं से परिपूर्ण थे जो कि उन्हें पूर्णत्व प्रदान करता है।

गीता में श्री कृष्ण ने 'कर्म करो और फल की चिंता मत करो' कह कर बहुत ही सरल शब्दों में समस्त मानव जाति को जीवन के गूढ़ रहस्य से परिचय करवा दिया है। वास्तव में उनका यह संदेश किसी जाति, सम्प्रदाय या धर्मविशेष के लिये न होकर समस्त मानव जाति के लिये है।

कृष्ण जैसा अद्भुत तथा महान चरित्र न तो उनके जन्म के पहले ही कभी देखने में आया और न ही बाद में कभी आयेगा। यह चरित्र तो भूतो न भविष्यति बन कर रह गया है। इसी कारण से समस्त विश्व में कृष्ण के अनुयायी पाये जाते हैं।

आपको यह लेख भी अवश्य ही पसंद आयेगा - कृष्ण और राम – असमानता में समानता

Monday, August 10, 2009

क्या कभी आपको ऐसा निमंत्रण मिला है?

मेरे ईमेल के द्वारा मुझे एक निमंत्रण मिला है। निमंत्रण कुछ ऐसा है कि "अपने यहाँ खाना मत, मेरे यहाँ आना मत"। आप भी इस निमंत्रण को देखें:



कैसा लगा निमंत्रण आपको?

यदि आप प्रेमचंद की कहानी 'बड़े भाई साहेब' पढ़ना चाहें तो यहाँ पढ़ सकते हैं

 
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