Monday, June 22, 2009

लिखना हमें आता नहीं अरु बन गये ब्लोगरदास

चलिये आज मैं अपना किस्सा बता ही दूँ। किस्से का सारांश है

आये थे हरि भजन को ओटन लगे कपास।
लिखना हमें आता नहीं अरु बन गये ब्लोगरदास॥

अब उपरोक्त दोहे में मात्रा सही है या नहीं यह देखने का कष्ट मत करियेगा क्योंकि मैं पहले ही कह चुका हूँ कि 'लिखना तो आता नहीं...'।

अक्टूबर 2004 में अपनी नौकरी से स्वैच्छिक सेवा निवृति ले लेने के बाद मेरे पास समय ही समय था, साथ ही कम्प्यूटर और इन्टरनेट कनेक्शन भी था। सुन रखा था कि नेट से कमाई करने के बहुत सारे तरीके हैं। तो सारा समय मैं इस चक्कर में इन्टरनेट को खंगालते रहता था। खंगालते खंगालते पता चला कि हिन्दी ब्लोगिंग नाम की भी एक चिड़िया होती है। बस क्या था ब्लोगर में एक खाता खोल लिया। अब समस्या यह थी कि 'लिखना तो...', पर जब अपना एक ब्लोग बना ही लिया है तो कुछ न कुछ पोस्ट करना भी जरूरी है। सोचा कि किस्सा हातिमताई या सिंहासन बत्तीसी या फिर बैताल पच्चीसी आदि को अपने ब्लोग में डाला जाये। पर लगा कि इन कहानियों की ओर भला आजकल कौन तवज्जो देने वाला है?

फिर ध्यान में आया कि मैं नहीं लिख सकता तो क्या हुआ, मेरे स्वर्गीय पिताश्री के तो बहुत सी रचनाएँ मेरे पास है। पिताजी को अपने जमाने के पत्र पत्रिकाओं में छपते तो अवश्य थे किन्तु उन्हे उसके बावजूद भी सन्तुष्टि नहीं थी। वे अपनी रचनाओं को स्वतंत्र रूप से प्रकाशित देखना चाहते थे। एक बार अपने उपन्यास धान के देश में को स्वयं प्रकाशक बन कर प्रकाशित भी किया। पुस्तक तो खैर क्या बिकी हाँ घड़ी चेन आदि सभी बिक गये। तो मैंने उसी उपन्यास को अपने ब्लोग में डालना शुरू कर दिया। फिर उनकी कविताओं को। फिर उनकी अन्य रचनाओं को। पर एक दिन वह भी आ गया कि मेरे पास अपने ब्लोग में डालने के लिये उनकी एक भी रचना नहीं बची।

ब्लोगिंग का नशा अब तक लत बन चुकी थी। क्या करें? जबरदस्ती जो मन में आये लिखना शुरू कर दिया और आज तक ब्लोगर बने हुये हैं।

5 टिप्पणियाँ:

AlbelaKhatri.com said...

aapko toh bahut accha likhna aata hai saheb !
waah waah kya baat hai !

राज भाटिय़ा said...

अजी हमारे यहां भी ड्रा राम चंद्र मिश्रा जी आये, ओर बातो बातो मे मेरा ब्लांग बना दिया, नाम भी नही सोचा... बोले जल्दी बातो क्या लिखू, पता नही केसे केसे अजीब से नाम जेहन मै आये फ़िर हमारे मुंह से निकला पराया देश लिख दो, बन गया ब्लांग,लिखे क्या ? बोले कुछ भी लिख दो ? बस तब से हम कुछ भी लिख देते है, जो मन को अच्छा लगे,
तो जनाब आप भी अपने मन की अपने आसपास की, यानि कुछ भी लिख दे, क्योकि हम लेखक तो है नही, बस युही मजाक मे जब ब्लांग बनाया तो लिखे, दुनिया मै जो देखे लिख दे, दिल का बोझ जो किसी को नही कह सकते यहां लिख दे.
धन्यवाद

मुझे शिकायत है
पराया देश
छोटी छोटी बातें
नन्हे मुन्हे

Udan Tashtari said...

बने रहिये जी!! कुछ न कुछ तो उतर ही आयेगा. :)

Anil Pusadkar said...

जमे रहिये अवधिया जी।आप जैसे बुजुर्गो की भी तो हम नये नवाडियों को ज़रूरत होती है।

राकेश सिंह said...
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