Tuesday, September 8, 2009

कुत्ते से क्या बदला लेना कुत्ते ने गर काटा


विचित्र प्राणी होता है कुत्ता। ऊपर वाले ने विशेष तौर पर रचा है इसे, इंसान याने कि मनुष्य के सहायक के रूप में। कुत्ते वहीं पाये जाते हैं जहाँ इंसान रहते हैं। जंगली कुत्ते नहीं पाये जाते क्योंकि कुत्ता इंसान के बिना रह ही नहीं सकता।

कुत्ता एक वफादार प्राणी होता है। एक बार टुकड़ा डाल दो और यह आपका वफादार बन जाता है। बाद में कभी टुकड़ा नहीं भी डालोगे तो भी यह जीवनपर्यन्त आपका वफादार बना रहता है। वैसे तो टुकड़ा पाकर वफादार बनने की प्रवृति इंसान में भी पाई जाती है पर जब तक टुकड़ा डालते रहो तभी तक इंसान वफादार रहता है। टुकड़ा डालना बंद और इंसान का गुर्राना शुरू।

इंसान अपने इस सहायक का भरपूर फायदा उठाता है। प्रायः इन्सान सत्ता प्राप्त करने के लिए कुत्तों की पूरी पूरी सहायता लेता है और यदा-कदा सत्ता को बनाए रखने के लिए खुद ही कुत्ता बन जाता है। कभी कभी मन में सवाल उठने लगता है कि क्या सत्ता और कुत्ता एक दूसरे के पूरक हैं? खैर हों तो क्या और न हों तो क्या! हमें क्या लेना देना है। हमें तो सत्ता मिलने से रही।

अक्सर लोग भ्रष्ट नेता और अफसरों को कुत्ता कह देते हैं। पर जरा सोचिये कि ऐसे लोगों को किसने अधिकार दे दिया इस तरह से कुत्तों का अपमान करने का? कभी किसी कुत्ते ने इन पर मानहानि का दावा कर दिया तो लेने के देने पड़ जायेंगे।

वैसे तो कुत्ता इंसान को काटता नहीं, वह अच्छी तरह से समझता है कि जब भौंकने से ही काम चल जाता है तो फिर काटा क्यों जाए। पर परिस्थितिवश यदि कभी कुत्ता इंसान को काट दे तो इंसान उसे उलटे काट कर बदला भी नहीं ले सकता। इसीलिए एक फिल्मी गीत में कहा गया है "कुत्ते से क्या बदला लेना कुत्ते ने गर काटा, कुत्ते को गर तुमने काटा क्या थूका क्या चाटा"

कुत्तों में इंसान नहीं पाये जाते पर इंसानों में कुत्ते अवश्य पाये जाते हैं। अब इस बात का और अधिक खुलासा क्या करना कि कहाँ और कैसे पाये जाते हैं। हमरे सुधी पाठक स्वयं समझदार हैं।

कुत्ता योनि एक महान योनि है। इसकी महानता का अंदाज इसी से लगाया जा सकता है कि जब धर्म को अपना रूप बदलने की नौबत आई थी तो उन्होंने कुत्ते के रूप को ही सर्वथा उचित समझा था। जब से धर्म ने कुत्ते का रूप धारण किया था तब से आज तक कुछ कुत्ते स्वयं धर्म नहीं तो कम से कम धर्म का मर्मज्ञ तो अवश्य ही समझते हैं। एक बार हमने कुत्तों के धर्मगुरु को टुकड़ा डाल दिया था। बस वह हमारा वफादार बन गया और कुत्तों ने जो बातें आज तक किसी को नहीं बताई थीं उन्हें भी हमें बता दिया। उसने हमें बताया कि कुत्तों में भी कुत्ताचार्य होते हैं जो अलग अलग सूत्रों की व्याख्या अपने अपने हिसाब से करते हैं। कुत्तों के धर्मग्रंथ श्वानस्मृतिरान में एक सूत्र है - "स्वा-भौं मी-भौं सर्व-भौं स्य-भौं" कुत्ताचार्य लोग इस सूत्र का अपने अपने हिसाब से अर्थ लगाते हैं ठीक 'हरि अनन्त हरि कथा अनन्ता' की तरह। कुछ कुत्ताचार्य के अनुसार इसका अर्थ है "स्वामी ही सर्वस्य है" और कुछ के अनुसार "स्वामी ही सर्वस्य नहीं है"। खैर छोड़िये धर्म की बात को। जब कुत्तों की बात चल रही है तो उसे ही जारी रखा जाये।

वैसे तो कुत्तों के बहुत से प्रकार हैं पर मुख्य प्रकार दो ही हैं विदेशी नस्ल का कुत्ता और देसी कुत्ता। भारत में विदेशी नस्ल के कुत्तों को चाव से पाला जाता है, इंसान को दो रोटी मिले मिले पर विदेशी कुत्तों को मँहगे बिस्किट्स जरूर मिलते हैं। देसी कुत्तों को प्रायः आवारा छोड़ दिया जाता है और ये घूरों में से अपना भोजन खोज कर अपना जीवनयापन करते हैं। हम भारतीयों की यह महान परम्परा रही है कि हम विदेशी चीजों को सम्मान की दृष्टि से देखते हैं और देसी चीजों को हेय समझते हैं। चाहे कुत्ता हो या भाषा विदेशी ही श्रेष्ठ समझा जाता है।

और अन्त में सिर्फ इतना बता कर इस पोस्ट को समाप्त करते हैं किः

एक बार हमने ससुराल में अपने साले से कहा, "यार, म्युनिसिपालिटी वालों से कह कर तुम अपनी गली के इन कुत्तों को मरवा क्यों नहीं देते?" तो उसने पूछा, "वो क्यों जीजाजी?" हमने उसे बताया, "अरे भइ, जब भी मैं तुम्हारे यहाँ आता हूँ तो ये कुत्ते मुझे देखते ही भौंकने लगते हैं।" इस पर साले महोदय ने कहा, "होता है जीजाजी होता है, जब भी कोई दूसरे गली का इस गली में आता है..........।"
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