Monday, October 5, 2009

कांग्रेस और मुस्लिम तुष्टिकरण

कांग्रेस के इतिहास को देखें तो स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है कि कांग्रेस ने सदा ही मुस्लिम तुष्टिकरण को बढ़ावा दिया है। सन् 1885 में, अंग्रेजी शासन व्यवस्था में भारतीयों की भागीदारी दिलाने के उद्देश्य से, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना हुई। यह भारतीयों की संस्था थी। भारतीय का अर्थ है भारत में निवास करने वाला, चाहे वह हिन्दू हो या मुसलमान या अन्य। किन्तु कांग्रेस के सदस्यों में मुसलमानों की संख्या बहुत ही कम थी। मुसलमानों को कांग्रेस से जोड़ने के लिए कांग्रेस ने बहुत प्रयास किए। सुरेन्द्रनाथ बैनर्जी के लिखे अनुसार - ”हम इस महान राष्ट्रीय कार्य में अपने मुसलमान देशवासियों का सहयोग प्राप्त करने के लिए जी-तोड़ प्रयास कर रहे हैं। कभी-कभी तो हमने मुसलमान प्रतिनिधियों को आने-जाने का किराया तथा अन्य सुविधाएं भी प्रदान कीं।सन् 1887 में बदरुद्दीन तैयबजी, 1896 में सहिमतुल्ला सायानी, सन् 1919 में मोहम्मद बहारदुर, जो कि मुसलमान थे, कांग्रेस के अध्यक्ष भी बने किन्तु भारत के अधिकतर मुसलमान फिर भी कांग्रेस से नहीं जुड़ पाए।

शुरुवात में तो कांग्रेस से भारतीय मुस्लिमों को जोड़ने का सिर्फ प्रयास ही होता रहा किन्तु सन् 1915 में गांधी जी के आ जाने और गांधीवादी कांग्रेस बन जाने के बाद से मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति का कांग्रेस में पदार्पण हुआ। उस समय तक कांग्रेस दो आन्तरिक दलों - गरम दल और नरम दल - में बँट चुका था। गांधी जी ने गोपाल कृष्ण गोखले वाला नरम दल को अपने लिए चुना था। बहुत ही जल्दी वे नरम दल के बड़े नेता बन गए और उनकी लोकप्रियता दिनों दिन बढ़ने लग गई। कांग्रेस एक प्रकार से गांधीवादी कांग्रेस बन गया। गांधीवादी कांग्रेस में 'महात्मा गांधी' और 'गांधी जी' शब्द कांग्रेस का पर्याय बन गए। गांधी जी के विचार कांग्रेस की नीति बन गई। (और स्वतन्त्रता प्राप्ति के उपरान्त कांग्रेस की नीति, जो कि गांधी जी के विचारों पर आधारित थी, राष्ट्र की नीति बन गई।) गांधी जी ‘हिन्दू-मुस्ल्मि एकता’ के नाम से हमेशा मुस्लिम तुष्टिकरण को ही जोर देते रहे। पर उन्हें अपने इस कार्य में कभी भी वांछित सफलता नहीं मिली। भारतीय मुसलमानों की कुल जनसंख्या के मुश्किल से चार प्रतिशत लोग ही शायद कांग्रेस से जुड़ पाये होंगे। प्रत्येक असफलता के साथ गांधी जी की मुस्लिम तुष्टिकरण वाली जिद बढ़ते ही जाती थी। गांधी जी के लाख प्रयास करने के बावजूद भी भारतीय मुस्लिम कांग्रेस से न जुड़ सके।

गांधी जी ने मुसलमानों का तुष्टिकरण करके उन्हें अपने पक्ष में करने के लिए कट्टरवादी नेताओं का साथ देना तक उचित समझा इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है खिलाफत आन्दोलन। खिलाफत आन्दोलन के विषय में आचार्य विष्णुकांत शास्त्री की पुस्तक के कुछ अंश ज्ञानदत्त जी के पोस्ट "आचार्य विष्णुकान्त शास्त्री उवाच" में उद्धृत हैं जिसका स्क्रीनशॉट मैं नीचे दे रहा हूँ:

इन अंशों को पढ़ने से स्पष्ट रूप से ज्ञात हो जाता है कि गांधी जी का खिलाफत आन्दोलन सिर्फ मुस्लिम तुष्टिकरण के सिवा और कुछ नहीं था। गांधी जी का विचार था कि तुर्की के खलीफा, जो कि मुसलमान थे, को गद्दी से उतारे जाने का विरोध करने से भारत के मुसलमान खुश होकर कांग्रेस के पक्ष में आ जायेंगे। जबकि मुस्लिम लीग के नेता जिन्ना ने ही खिलाफत आन्दोलन का विरोध यह कह कर किया था कि "तुर्की के खलीफा को किसी ने गद्दी से उतार दिया, तो इससे भारत के मुसलमानों का क्या लेना-देना है।" देखें http://khabar.ndtv.com/2009/08/25094428/Suderson-on-Jinnah.html

दरअसल उस समय तक मुस्लिम लीग के सदस्य शिक्षित मुसलमान थे, वे दकियानूस नहीं थे और अच्छी तरह से समझते थे कि तुर्की के खलीफा से भारत के मुसलमानों का कुछ भी लेना देना नहीं है खलीफा के समर्थन से कट्टवादियों को ही फायदा होगा। इसीलिए वे खिलाफत आन्दोलन से दूर रहे।

इस खिलाफत आन्दोलन के कारण मालाबार (केरल) में भयानक मोपला नरसंहार हुआ। हताश मुसलमानों ने अपना सारा आक्रोश हिन्दुओं पर उतारा। सारे देश में दंगों की लहरें उमड़ पड़ी और हिन्दुओं को भारी नुकसान उठाना पड़ा। बावजूद इन सबके गांधी जी ने (6 दिसम्बर 1924 के) ‘यंग इण्डिया’ अंक में लिखा: ”हिन्दू-मुस्लिम एकता" किसी भी तरह चरखा-कताई से कम महत्वपूर्ण नहीं है। यह हमारे जीवन की श्वास-रेखा है।”

फिर देश का विभाजन हुआ। विभाजन के समय पाकिस्तान छोड़कर भारत आने वाले हिन्दुओं पर जो अत्याचार हुए वह किसी से भी छुपा हुआ नहीं है किन्तु उस अत्याचार के विषय में गांधी जी ने कभी भी कुछ नहीं कहा, मौन धारण किये रहे। जब मुसलमानों के अत्याचार से आक्रोशित होकर हिन्दुओं ने भी वैसा ही कदम उठाना शुरू किया तब गांधी जी को दिखाई देने लग गया कि मुसलमानों पर अत्याचार हो रहे हैं और हिन्दुओं के इस अत्याचार को रोकने के लिए उनका मौन टूट गया। उन्हें मुस्लिमों पर हुए अत्याचार तो नजर आये पर हिन्दुओं पर हुए अत्याचार कभी भी नहीं दिखा। यहाँ पर यह उल्लेखनीय है कि उन दिनों गांधी जी का कहे को कांग्रेस का कहा माना जाता था। गांधी जी ही कांग्रेस थे।

बंकिम चन्द्र रचित गीत "वन्दे मातरम्" को सितम्बर १९०५ में कांग्रेस अधिवेशन में राष्ट्रगीत का दर्जा दे दिया गया था (हिन्दी विकीपेडिया) किन्तु मुसलमानों ने यह कह कर कि "मुस्लिम धर्म किसी व्यक्ति या वस्तु की पूजा करने को मना करता है और इस गीत में वस्तु की वन्दना की गयी है" इसका विरोध किया परिणामस्वरूप "जनगणमन" राष्ट्रगीत बना दिया गया। यह तुष्टिकरण नहीं है तो क्या है?

गांधी जी ने तो तुष्टिकरण के लिए भाषा तक को नहीं छोड़ा। मुसलमानों की भाषा उर्दू थी और अधिकतर हिन्दुओं की भाषा हिन्दी। गांधी जी ने कथितहिन्दू-मुस्लिम एकता" के लिए "बादशाह राम" और "बेगम सीता" वाली एक नई "हिन्दुस्तानी भाषा" ईजाद किया। इस हिन्दुस्तानी भाषा को कुछ समय के लिए स्कूलों के पाठ्यक्रम में भी शामिल किया गया पर यह हमारा और हिन्दी का सौभाग्य है कि उस भाषा का जोरदार विरोध हुआ और उसे पाठ्यक्रम से निकाल दिया गया। गांधी जी ने अपनी ईजाद की गई हिन्दुस्तानी में राम को 'बादशाह' और सीता को 'बेगम' तो बना दिया पर वे मोहम्मद साहब को कभी भी श्री या श्रीमान मोहम्मद नहीं बना पाये।

स्वतन्त्र भारत के प्रथम आम चुनाव में कांग्रेस को भारतीय जनसंघ जैसे हिन्दू राष्ट्रवादी पार्टियों से भय लगने लगा इसलिए वो फिर मुस्लिमों की तरफ झुकी। ‘सेक्युलरिज्म’ पर जोर दिया गया। पण्डित जवाहरलाल नेहरू हिन्दू धर्म को हेय दृष्टि से देखते थे। वे स्वयं मानते थे कि वे संयोग से ही हिन्दू हैं। कांग्रेस में हिन्दू प्रवृत्ति वाले लोगों, जैसे कि राजेन्द्र प्रसाद, सरदार वल्लभभाई पटेल, पीडी टण्डन, केएम मुंशी आदि, से उन्हें परेशानी रहा करती थी। नेहरू की मृत्यु पर सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने कहा था कि नेहरू जन्म से ब्राह्मण, शिक्षा में यूरोपीय और आस्था में मुसलमान थे। सरदार वल्लभ भाई पटेल ने नेहरू को भारत का राष्ट्रवादी मुसलमान बताया था।

कांग्रेस सरकार ने 1959 में मुस्लिमों की हज सब्सिडी शुरू की थी। यह हज सब्सिडी आखिर है क्या? हिन्दुओं को तीर्थयात्रा के लिए क्यों सब्सिडी नहीं दी जाती? यह तो सभी जानते हैं कि राजीव सरकार ने, शाहबानो जजमेंट को ताक पर रख कर, मुस्लिम महिला (तलाक के अधिकार का संरक्षण) अधिनियम 1986 पारित किया।

वोट बैंक को ध्यान में रखकर और राजनैतिक स्वार्थ के लिए तुष्टिकरण की नीति अपनाना आखिर कहाँ तक उचित है?
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