Saturday, December 18, 2010

हम.... याने कि करमहीन खेती करे, बैल मरे या सूखा पड़े

शिरीष के सूखे फल की भाँति, जो कि वृक्ष के फूल-पत्ते झड़ जाने तथा पेड़ के ठूँठ जैसा हो जाने के बावजूद भी, पेड़ से लटकते और खड़खड़ाते ही रहता है, हम भी, साठ साल की उम्र पार कर जाने परवाह न करते हुए, ब्लोगिंग और इंटरनेट के संसार रूपी वृक्ष के सूखे फल बनकर लटके ही हुए हैं। साफ जाहिर है कि "कब्र में पाँव लटक रहा है" फिर भी हम "सींग कटा कर बछड़ों में शामिल" हैं। हमें पता है कि "अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता" और "अकेला हँसता भला न रोता भला", फिर भी हम यह सोचकर कि "जब ओखली में सर दिया तो मूसलों से क्या डरना" अपने ब्लोग में अकेले "अपनी ही हाँके जा रहे हैं" क्योंकि यह ब्लोगिंग हमारे लिए "उगले तो अंधा, खाए तो कोढ़ी" याने कि "साँप के मुँह में छुछूंदर" बनकर रह गई है।

पाँच-छः साल पहले स्वेच्छा से सेवानिवृति लेकर अतिरिक्त आमदनी की आशा लेकर नेट की दुनिया में आए थे, शुरू-शुरू में अंग्रेजी ब्लोगिंग से कुछ कमाई की भी, भले ही वह "ऊँट के मुँह में जीरा" जैसी रही हो। किन्तु बाद में फँस गए हिन्दी ब्लोगिंग के चक्कर में और हमारी "गरीबी में आटा गीला" होने लगा क्योंकि इस चक्कर में फँस जाने के बाद ही हमें पता चला कि "इन तिलों में तेल नहीं है"। अब तो आप समझ ही चुके होंगे कि हम सिर्फ यही कहना चाहते हैं कि "आए थे हरि भजन को, ओटन लगे कपास"। हमारे साथ तो अब तक "करमहीन खेती करे, बैल मरे या सूखा पड़े" जैसी ही स्थिति बनी रही है पर हमने भी सोच लिया है "जितना पावे उतना खावे, ना पावे तो भूखे सो जावे" क्योंकि ये हिन्दी ब्लोगिंग तो हमारे पास "आई है जान के साथ पर जाएगी जनाजे के साथ"। इतना पढ़कर अब तो आप यही सोच रहे होंगे कि अजब सनकी बुड्ढा है ये तो, "अपनी-अपनी ढपली, अपना-अपना राग" वाला।

भले ही हमारा ब्लोग "कहीं की ईंट कहीं का रोड़ा, भानमती ने कुनबा जोड़ा" हो पर हम तो "कर लिया सो काम, भज लिया सो राम" का सिद्धान्त अपना कर अपने इस ब्लोग में पोस्ट पेले ही चले जाएँगे। कभी न कभी तो "अंधे को अंधेरे में बड़ी दूर की सूझी" जैसे हमारा भी कोई पोस्ट आप लोगों को पसंद आएगा ही। हम तो सिर्फ यही जानते हैं कि "अटकेगा सो भटकेगा", और फिर "खाली बनिया क्या करे, इस कोठी का धान उस कोठी में धरे"। हो सकता है "कर सेवा तो खा मेवा" जैसे कभी हिन्दी ब्लोगिंग से आमदनी होना भी चालू हो जाए क्योंकि आप तो जानते ही हैं "बिन माँगे मोती मिले, माँगे मिले न भीख"। पर हमें तो यह भी सोचना पड़ता है कि ऐसा होना हमारे लिए "का वर्षा जब कृषी सुखाने" जैसा न हो जाए क्योंकि वैसा समय आने तक कहीं हम लुढ़क ना चुके हों। पर चिंता करने की कोई बात ही नहीं है क्योंकि "आदमी को ढाई गज कफन काफी है"!
Post a Comment