Monday, December 27, 2010

हम कुछ भी तो नहीं कर सकते

पिछले डेढ़ दो साल के भीतर पेट्रोलियम उत्पादों के दाम चार बार बढ़े। पर हम क्या कर सकते हैं?

हम कुछ भी तो नहीं कर सकते।

दाल न मिलने पर आदमी प्याज के साथ रोटी खा लेता था भले ही प्याज काटने पर आँख से आँसू निकलते थे पर अब प्याज की कीमत सुनते ही आँख से आँसू निकलने लगते हैं। प्याज की कीमत आसमान छू रही है। पर हम क्या कर सकते हैं?

हम कुछ भी तो नहीं कर सकते।

टमाटर की लाली से हमारा मोहभंग हो गया है क्योंकि टमाटर खरीदने का अब हममें साहस नहीं रह पाया है। टमाटर के दाम सुनकर अब हम टमाटर खाने की इच्छा को भीतर ही भीतर कहीं दफन कर देते हैं। टमाटर के दाम इतने बढ़ चुके हैं की हम खरीद नहीं सकते। पर हम क्या कर सकते हैं?

हम कुछ भी तो नहीं कर सकते।

दाल खाना तो पहले ही मुहाल हो गया था, अब रोटी के भी लाले पड़ने लगे हैं। गेहूँ का दाम बढ़ गया है। पर हम क्या कर सकते हैं?

हम कुछ भी तो नहीं कर सकते।

हम तो जनता-जनार्दन हैं। वोट देकर सरकार बनाते हैं। फिर वही सरकार हमें महँगाई के गर्त में धकेलती चली जाती है। पर हम सब तो जनता होने के नाते निरीह प्राणी हैं। हम कर ही क्या सकते हैं?

हम कुछ भी तो नहीं कर सकते।
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