Wednesday, January 5, 2011

ठण्ड से ठिठुराता हुआ शिशिर

प्रकृति ने भाँति-भाँति के पुष्पों से अपना श्रृंगार कर लिया है। भारतवर्ष के प्रहरी हिमालय के क्षेत्रों में गिरे हुए हिमकणों ने हिमशिला का रूप धारण कर लिया है। वायव्य (उत्तर-पश्चिम) दिशा से तीव्र गति से प्रवाहित होती हुई शीतल समीर की लहरों ने आर्यावर्त को अपने आगोश में समेट लिया है जिसके परिणामस्वरूप लोग ठण्ड से ठिठुरने लगे हैं। यद्यपि प्रचण्ड शीत ने भगवान भास्कर की किरणों की प्रखरता को विनष्टप्राय कर दिया है फिर भी सूर्य-किरणों का स्पर्श प्रिय लगने लगा है। अग्नि की ऊष्मा आकर्षित करने लगी है। पृथ्वी अन्नपूर्णा बन गई है और गोरस की नदियाँ बहने लगी हैं।

उपरोक्त बातें इस बात का द्योतक हैं कि हेमन्त ऋतु के प्रस्थान के साथ ही शिशिर ऋतु का आगमन हो चुका है।

शिशिर ऋतु में फूलों के पौधे फूलों से लद जाते हैं। बाजार में नर्सरी से बिकने वाले पुष्पयुक्त पौधों की भरमार दिखाई देने लगती है। सब्जियों के पौधे तथा लताएँ अपने उत्पादन की चरम स्थिति में पहुँच जाती है। बाजार सब्जियों से पट-सा जाता है। भोजन अत्यन्त सुस्वादु लगने लगता है और रसना उसका रस लेते हुए अघाती तक नहीं है। जठराग्नि इतनी तेज हो जाती है कि कुछ भी और कितना भी खाओ, सब पच जाता है।

शिशिर ऋतु की अपनी अलग ही प्राकृतिक विलक्षणता है जिसका वर्णन 'सेनापति' अलौकिक रूप से इस प्रकार करते हैं

सिसिर में ससि को सरूप वाले सविताऊ,
घाम हू में चाँदनी की दुति दमकति है।
सेनापति होत सीतलता है सहज गुनी,
रजनी की झाँईं वासर में झलकति है॥
चाहत चकोर सूर ओर दृग छोर करि,
चकवा की छाती तजि धीर धसकति है।
चंद के भरम होत मोद है कुमुदिनी को,
ससि संक पंकजनी फूलि न सकति है॥


अर्थात - शिशिर ऋतु में सूर्य भी चन्द्रमा के स्वरूप वाला हो जाता है और धूप में चाँदनी का भास होने लगता है। 'सेनापति' कहते हैं कि इस ऋतु में शीतलता सौ गुनी बढ़ जाती है जिसके कारण दिन में भी रात्रि का आभास सा होने लगता है। सूर्य को चन्द्रमा समझकर चकवा पक्षी उसी की ओर देखने में मग्न हो जाता है और चकवी की छाती धड़कने लगती है। कुमुदनी भी सूर्य को चन्द्र समझकर मुदित हो खिल उठती है और कमल सूर्य के चन्द्र होने की शंका के कारण खिल नहीं पाता।
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