Thursday, February 24, 2011

पर पत्नी को नाराज भी तो नहीं कर सकते....


यदि आपने कल का हमारा पोस्ट पढ़ा है तो आज के पोस्ट का शीर्षक पढ़ कर अवश्य ही आप सोच रहे होंगे कि हमारी श्रीमती जी ने जरूर हमारी खिंचाई की है और अब हमने उन्हें खुश करने के लिए यह पोस्ट लिखा है। हम जानते हैं कि आप कभी गलत नहीं सोच सकते इसलिए बताए देते हैं कि कल इधर पोस्ट प्रकाशित हुआ और उधर पड़ोस से वे वापस आईं। पूरा पोस्ट पढ़ लिया। अब वे इतनी कमअक्ल तो वे हैं नहीं कि सब कुछ पढ़ लेने के बाद भी न समझें कि उनपर भरपूर आक्षेप हुआ है। आखिर पुराने जमाने की ग्रेजुएट हैं भइया।

अब इससे पहले कि वे रौद्ररूप धारण करके कहना आरम्भ करें कि “हे आर्यपुत्र! इस ब्लोगिंग ने आपकी बुद्धि को भ्रष्ट कर दिया है। आप विक्षिप्त होते जा रहे हैं....." आदि आदि, हमने भी उनके क्रोध को शान्त करने का तरीका सोच लिया। आखिर पत्नी को नाराज भी तो नहीं किया जा सकता न! यदि नाराज होकर वे हमें छोड़कर तत्काल मायके चले जाएँ तो हो गई ना हमारी छुट्टी। जब साक्षात् भगवान विष्णु के अवतार श्री रामचन्द्रजी पत्नी वियोग से दुःखी रहे तो हमारे जैसे लोगों की क्या औकात है कि पत्नी के बिना चैन से रह पायें?

किन्तु कई बार ऐसा भी होता है कि पत्नी अपने पति पर कभी डायरेक्ट आक्षेप नहीं करती। जैसे कि पत्नी यदि हँसे वहाँ तक तो ठीक है पर यदि मुख पर आँचल दे के हँसे तब तो फिर ऊपर वाला ही मालिक है। समझ लीजिये कि आपकी पूरी किरकिरी हो चुकी है या फिर होने वाली है। अब देखिये न, माता पार्वती जी भी तो अपने स्वामी भगवान शंकर के सम्मुख मुख में आँचल दे कर हँस रही हैं:

"भभूत लगावत शंकर को अहि-लोचन मध्य परौ झरि कै।
अहि की फुँफकार लगी शशि को तब अमृत बूँद गिरौ चिरि कै।
तेहि ठौर रहे मृगराज तुचाधर तब गर्जत भे वे चले उठि कै।
सुरभी सुत वाहन भाग चले तब गौरि हँसीं मुख आँचल दै॥"


अर्थात् पार्वती जी के द्वारा भगवान शंकर के ललाट में भभूत लगाते समय जरा सा भभूत झर कर (शिव जी के वक्ष से लिपटे हुये सर्प की आँखों में) पड़ा। (आँखों में भभूत पड़ जाने के कारण निकली हुई) सर्प की फुँफकार (भगवान शंकर के माथे में शोभित) चन्द्रमा को लगी और (फुँफकार लगने से चन्द्रमा के काँप जाने से उसके भीतर स्थित) अमृत बूँद छलक कर गिरा। वहाँ पर (शिव जी के आसन के रूप में) मृगचर्म था जो कि (गिरे हुये अमृत के प्रभाव से जीवित होकर) उठ कर गर्जना करते हुये चला। (सिंह की गर्जना सुन कर) गाय का पुत्र बैल जो कि शंकर जी का वाहन है भागा तब गौरी जी अपने मुख पर आँचल दे कर हँसीं। (मानो कह रही हों देखो मेरे वाहन से डर कर आपका वाहन कैसे भाग रहा है! - पार्वती जी का एक रूप दुर्गा होने से सिंह उनका वाहन हुआ।)

तो साहब, हँसी-ठिठोली, हास-परिहास। घात-प्रतिघात, ब्याज-स्तुति, ब्याज-निंदा तो चलते ही रहते हैं। ये सब न हों तो जीवन में रस ही क्या रह जाता है?

एक बात तो माननी ही पड़ेगी, पत्नी चाहे पति को गुलाम बनाये या चाहे पति की गुलामी करे, होती वह सच्चा साथी है। जीवन के सारे सुख-दुःख में साथ निभाने वाली। वैसे भी जग विदित है कि संसार में निस्वार्थ भाव से सिर्फ दो लोग ही साथ निभाते हैं और वे हैं (1) माँ और (2) पत्नी। माँ का साथ तो पत्नी के साथ की अपेक्षा स्वाभाविक रूप से कम कम ही मिल पाता है अतः जीवन के अन्तिम क्षणों तक साथ केवल पत्नी ही निभाती है। तो बन्धु, पत्नी पुराण की नसीहत को याद रखकर यदि आप पत्नी से मधुर सम्बन्ध बनाये रखेंगे तो मैं गारंटी के साथ कह सकता हूँ कि हमेशा सुखी ही रहेंगे।

'अवधिया' या संसार में, मतलब के सब यार।
पत्नी ही बस साथ दे, बाकी रिश्ते बेकार॥

(नोटः मूलतः हम कवि नहीं हैं इसलिए उपरोक्त दोहे में मात्रा की गलती हमारे लिए क्षम्य है, हम जानते हैं कि दोहे के प्रथम और तृतीय चरणों में तेरह-तेरह और द्वितीय तथा चतुर्थ चरणों में ग्यारह-ग्यारह मात्राएँ होनी चाहिए किन्तु हमारे इस दोहे के प्रथम और तृतीय चरणों में चौदह-बारह और द्वितीय तथा चतुर्थ चरणों में ग्यारह-बारह मात्राएँ हैं।)
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