Monday, April 4, 2011

स्वागत् हिन्दू नववर्ष!

गत हिन्दू वर्ष की अन्तिम अमावस्या की अंधेरी रात व्यतीत हो चुकी है। विक्रम विक्रम संवत् 2068 तथा शक संवत् 1933 के प्रथम दिवस अर्थात् चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के ऊषाकाल में भगवान भास्कर की प्रथम किरण ने भारतभूमि का स्पर्श कर लिया है। इसके साथ ही हिन्दू नववर्ष का आगमन हो चुका है। हिन्दू नववर्ष के स्वागत में पलाश के द्रुम चटक रक्तवर्ण पुष्पों से सुसज्जित हो गए हैं, आम्रमंजरियाँ आमफलों में परिवर्तित हो चुकी है, वृक्षों के कठोर सूखे पर्णों ने अपना स्थान त्याग दिया है और नवजात शिशु के गात की भाँति कोमल नव-पल्लवों ने उनका स्थान ले लिया है, पंकिल सलिल से सराबोर सरोवरों में पंकज खिल उठे हैं जिन पर गीत गाते हुए भ्रमर मँडराने लगे हैं, नववर्ष का नवप्रभात खगों के कलरव से कलरवयुक्त होने लगा है, धरा ने हरीतिमा का परिधान धारण कर सौन्दर्यमयी श्रृंगार कर लिया है, अम्बर धवल प्रकाश से सुशोभित होने लगा है, प्रकृति शक्तिरूपा होने लगी है, मन्दिरों के ऊपर के पावन पताके शीतल-मन्द-समीर के प्रवाह में मन्द-मन्द फहराने लगे हैं, उनके भीतर मधुर घण्टों की ध्वनि गूँज रही है तथा बाहर भक्तजनों की भीड़ बढ़ने लगी है!

वसन्त नवरात्रि का प्रारम्भ हो चुका है, शक्तिरूपी देवियों के मन्दिरों में असंख्य घृत एवं तैल ज्योति प्रज्वलित हो चुके हैं! शाक्त भक्त प्रार्थना करने लगे हैं

शरणागत दीनार्त परित्राण परायणे।
सर्वस्यार्त हरे देवि नारायणि नमो नमः॥

आज सृष्टि अपना एक अरब पंचानबे करोड़ अंठावन लाख पच्यासी हजार एक सौ बारहवाँ जन्म-दिवस मना रही है! इस मधुमास के आज ही के दिन भगवान श्री राम ने सिंहासनारूढ़ होकर राम-राज्य की स्थापना की थी।

इस हिन्दू नववर्ष का हम सभी के लिए मंगलमय और कल्याणकारी होने का संकेत इस बात से मिल ही चुका है कि इसने अपने आगमन से पूर्व ही हमें विश्वविजेता बनने का उपहार दे दिया है!
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