Wednesday, April 13, 2011

क्या धर्म में आध्यात्मिकता का स्थान भौतिकता ने ले लिया है?

कल समस्त भारत में हर्षोल्लास का माहौल था, हर्ष और उल्लास था भगवान श्री रामचन्द्र जी के जन्म दिवस अर्थात् रामनवमी मनाने का! स्थान-स्थान पर भंडारे का आयोजन था, जगह-जगह हलुआ आदि मिष्ठान्न बाँटे जा रहे थे। मेरा बेटा भी पूर्ण अपनी निष्ठा से लोगों में हलुआ बाँटने में तल्लीन था। राम के प्रति उसकी इस निष्ठा को देखकर मैं सोचने लगा कि आज के युवाओं में अभी तक अपने धर्म और आदर्श के प्रति आस्था मरी नहीं है।

किन्तु ऐसा प्रतीत होता है कि यह आस्था केवल हर्षोल्लास मनाने तक ही सीमित है। हर्षोल्लास एक भौतिक सुख है और चूँकि यह किसी धार्मिक त्यौहार को मनाने से प्राप्त होता है इसलिए हम धर्म को मान रहे हैं। हम धर्म को मान रहे हैं भौतिकता प्राप्त करने के लिए, न कि अध्यात्म के लिए। धर्म में आध्यात्मिकता का स्थान भौतिकता ने ले लिया है। आज का युवा राम और कृष्ण के आदर्शों को न जानता है और न ही जानना चाहता है, यदि जान भी जाए तो उन आदर्शों का अनुगमन तो कदापि नहीं करना चाहता। राम ने अपने पिता की आज्ञा का अनुसरण करके चौदह वर्ष वन में रहकर बिताए, एक राजकुमार होने पर भी तपस्वियों-सा जीवन व्यतीत किया। किन्तु आज एक पिता अपने पुत्र को आज्ञा देने की स्थिति में ही नहीं है, यदि आज्ञा दे भी दे तो पुत्र उसे मानने से ही इन्कार कर देगा और उल्टे पिता को ही सीख देने लगेगा कि आप कुछ समझते तो हैं नहीं! पुत्र पिता से अधिक समझदार हो गया है। ऐसी बात नहीं है कि पहले पुत्र पिता से अधिक समझदार नहीं हुआ करते थे, अवश्य ही हुआ करते थे क्योंकि यह प्रकृति का नियम है कि बाद में आने वाली पीढ़ी अपनी पहली पीढ़ी से अधिक बुद्धिमान होती है। राम भी अपने पिता दशरथ से अधिक बुद्धिमान थे। किन्तु उन्होंने पिता की आज्ञा का अनुसरण किया और आज पिता की आज्ञा की अवहेलना होती है।

क्या कारण है आखिर इस प्रकार के अन्तर आने का?

इसका कारण सिर्फ हमारी शिक्षा है। पहले माता-पिता, गुरु आदि के प्रति सम्मान और निष्ठा की शिक्षा दी जाती थी किन्तु आज ऐसी शिक्षा का लोप हो चुका है। शिक्षा से संस्कार बनते हैं और संस्कार से विचार। यही कारण है कि आज हमें जिस प्रकार की शिक्षा मिलती है उसी के अनुरूप हमारे विचार बन गए हैं। आज की शिक्षा हमे अपने माता-पिता, गुरुजनों आदि के प्रति निष्ठा और सम्मान का भाव रखना नहीं सिखाती इसलिए आज हम उनकी अवहेलना करने लग गए हैं। हम अपने देश की महान शिक्षा को, जिसने भारत को विश्वगुरु कहलाने का श्रेय प्रदान किया था, भूल चुके हैं और पाश्चात्य शिक्षा के पीछे अंधे होकर भागे जा रहे हैं। हमारी प्राचीन शिक्षा अध्यात्म का पाठ सिखाती थी किन्तु आधुनिक शिक्षा केवल भौतिकता का पाठ सिखाती है। यही कारण है कि येन-केन-प्रकारेण हम सिर्फ भौतिक सुख ही प्राप्त करने में लिप्त हो चुके हैं। हमारा सिद्धान्त ही बन गया है -

घटं भिन्द्यात् पटं छिन्द्यात् कुर्याद्रासभरोहण।
येन केन प्रकारेण प्रसिद्धः पुरुषो भवेत्॥


(घड़े तोड़कर, कपड़े फाड़कर या गधे पर सवार होकर, चाहे जो भी करना पड़े, येन-केन-प्रकारेण प्रसिद्धि प्राप्त करना चाहिए।)

भौतिक सुख प्राप्त करने के लिए धन का होना आवश्यक है, धन के बिना आप भौतिक सुख प्राप्त नहीं कर सकते, बंगला, कार, बाइक, टीव्ही, फ्रीज जैसी वस्तुएँ, जो कि भौतिक सुख प्राप्त करने के साधन हैं, धन के बिना प्राप्त नहीं हो सकतीं। अतः धन प्राप्त करना ही हमारे जीवन का मुख्य उद्देश्य हो गया है भले ही इसके लिए हमें कुछ भी न क्यों करना पड़े। धन् प्राप्त करने के इसी उद्देश्य ने आज देश को भ्रष्टाचार के गर्त में धकेल कर रख दिया है।

4 टिप्पणियाँ:

सुज्ञ said...

सही निष्कर्ष है।
धर्म में आध्यात्मिकता का स्थान भौतिकता ने ले लिया है।

प्रवीण पाण्डेय said...

यही तो समस्या है अब।

arvind said...

सही निष्कर्ष

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

हम मतलब की ही बात पढ़ते और सीखते हैं..

 
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