Tuesday, June 28, 2011

जनता की याददाश्त और हिन्दी ब्लोग पोस्ट - दोनों ही की उम्र मात्र 24 घंटे

परसों डीजल, गैस और मिट्टीतेल का दाम बढ़ने पर कितना हंगामा हुआ। विभिन्न चैनलों पर दिन भर इस विषय पर बहस चलते रहे। मँहगाई बढ़ने की चर्चा चलती रही। रूलिंग पार्टी दाम बढ़ाने के अपने इस कृत्य को जायज ठहराती रही और विपक्ष नाजायज। मँहगाई के इस मुद्दे पर जनता के भीतर आक्रोश भरते रहा।

पर दूसरे ही दिन मीडिया को नए समाचार मिल गए दिखाने के लिए इसलिए दाम बढ़ने और मँहगाई बढ़ने का मुद्दा चैनलों से नदारद तथा इसके साथ ही जनता का आक्रोश गायब। सब कुछ सामान्य हो गया क्योंकि जनता की याददाश्त बेहद ही कमजोर होती है, मात्र चौबीस घंटों में ही वह सब कुछ भूल जाती है, यहाँ तक कि अपने ऊपर हुए अन्याय और अत्याचार तक को भी। और जनता याद भी रखे तो कैसे? उसे तो अपने परिवार पालने के लिए कोल्हू के बैल के माफिक जुटे रहना पड़ता है अपने काम में। यदि कोई एक बार काम में लग जाए तो दुनिया-जहान सब कुछ भूल ही जाता है।

जनता की कमजोर याददाश्त होने के साथ ही एक अन्य और कमजोरी है - वह है आसानी के साथ उसका ध्यान बँटा लिया जाना। काले धन के मुद्दे से उसका ध्यान बँटाना है तो उसके ध्यान को अनशनकर्ता के द्वारा महिलाओं के वस्त्र पहनने या उसके भगोड़ा होने की ओर खींच दो। बस जनता काले धन के मुद्दे को भूल कर व्यक्तिविशेष के क्रियाकलाप को मुद्दा बना लेती है।

जनता की इन दोनों कमजोरियों का सबसे अधिक नुकसान जनता को ही मिलता है और सबसे अधिक फायदा मिलता है तथाकथित राजनीतिक दलों और मीडिया को।

ईश्वर करे कि जनता की स्मरणशक्ति हमेशा कमजोर ही रहे नहीं तो उसके भीतर का आक्रोश ही उसे मार डालेगा। भलाई इसी में है कि जनता हमेशा पिसती ही रहे और उसे अपनी मुट्ठी में रखने वाले तिकड़मी हमेशा ऐश करते रहें, सो भी जनता के ही कमाए पैसों से!

जय जनता जनार्दन!

वैसे जनता की याददाश्त की उमर की तरह से ही हिन्दी ब्लोग पोस्टों की उमर भी चौबीस घंटे ही होती है। चौबीस घंटे बीते नहीं कि पोस्ट का महत्व समाप्त।  कई बार तो ब्लोगर स्वयं भी भूल जाता है कि कुछ दिन पहले उसने क्या पोस्ट किया था।

फिर भी कहा जाता है (जनता की कमजोर याददाश्त के कारण) देश की भी तरक्की हो रही है और (हिन्दी ब्लोग पोस्टों के अल्पायु होने के कारण) हिन्दी की भी!
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