Wednesday, July 6, 2011

समय बीतते जाता है रिवाजें बदलती जाती हैं

वक्त बीतने के साथ ही साथ रीति-रिवाजें भी बदलती चली जाती हैं। एक समय था जबकि मेरे समाज में किसी का जन्म दिन सिर्फ हिन्दू तिथि के अनुसार ही मनाया जाता था, अंग्रेजी तिथि को कोई भी व्यक्ति उन दिनों किसी प्रकार का भी महत्व नहीं देता था। जन्म दिन मनाया भी जाता था तो बेहद सादगी के साथ। आँगन में आटे से रंगोली बना दी जाती थी,  रिश्तेदारों तथा परिचितों को निमन्त्रण दे दिया जाता था, उन्हें प्रेमपूर्वक सोहारी-बरा खिलाकर तृप्त किया जाता था और वे बच्चे को आशीर्वाद दे कर चले जाया करते थे। गिफ्ट आदि देने का कोई आडम्बर नहीं, बड़ों का आशीर्वाद को ही सबसे बड़ा उपहार माना जाता था।

और आज मेरे अपने घर में ही यदि किसी का जन्मदिन मनाना है तो अंग्रेजी तिथि और अंग्रेजी परम्परा के अनुसार मनाया जाता है, केक काटकर।

आज ये बातें इसीलिए याद आ गईं क्योंकि आज आषाढ़ शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि है जो कि मेरी दादी के लिए विशेष दिन था क्योंकि आज के दिन ही वे उस पुरानी प्रथा के अनुसार मेरा जन्मदिन मनाया करती थीं।

आज दादी भी नहीं रहीं और वह प्रथा भी।
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