Thursday, March 31, 2011

भारतीयों में राष्ट्रीय भावना खेल भरती है या प्रतिद्वन्द्विता?

क्रिकेट, भारत का राष्ट्रीय खेल न होने के बावजूद भी, आज देश में सर्वाधिक लोकप्रिय खेल है। कल  मार्च  को भारत और पाकिस्तान के मध्य खेले गए क्रिकेट मैच के दौरान प्रत्येक भारतीय के भीतर बसी भारत की जीत की कामना और भारत की जीत के के पश्चात् उनकी जुनून की हद तक पहुँच जाने वाली प्रसन्नता भारतीयों की असीम और अटूट राष्ट्रीय भावना का द्योतक हैं। वास्तव में देखा जाए तो जन-जन के भीतर भारतीयता की भावना भर देने में में क्रिकेट की अपेक्षा भारत-पाकिस्तान की चिरप्रतिद्वन्द्विता की भावना की भूमिका कहीं बहुत अधिक है। वर्तमान पीढ़ी के बहुत कम लोगों को जानकारी होगी कि एक जमाने में भारत-पाकिस्तान के मध्य हॉकी का मैच, विशेषतः विश्वकप में फायनल मैच, प्रत्येक भारतीय को सिर्फ और सिर्फ भारतमय बना दिया करती थी। धीरे-धीरे हॉकी की लोकप्रियता घटते-घटते लोपप्राय हो गई और क्रिकेट की लोकप्रियता बढ़ते-बढ़ते चरम में पहुँच गई किन्तु भारत-पाकिस्तान की चिरप्रतिद्वन्द्विता की भावना ज्यों की त्यों बरकरार ही रही और समस्त भारतीयों के भीतर राष्ट्रीयता की भावना भरने की भूमिका को सतत् रूप से निभाती रही।

Wednesday, March 30, 2011

पतझड़ का सौन्दर्य - मनुष्य को प्रकृति का एक अलौकिक दान!

सुबह-सुबह के सूर्य की किरणें, जो अभी एक माह पहले तक भली लगती थीं, अब प्रखर होकर संतप्त करने लगी हैं। वायु में शीतलता के स्थान पर उष्णता का आभास होने लगा है। यद्यपि पलास और सेमल के पत्रविहीन वृक्ष अभी भी रक्तवर्ण पुष्पों से सुशोभित हैं, किन्तु आम्रवृक्षों की डालियों में अब आम्रमंजरी के स्थान पर आमफल के गुच्छे दृष्टिगत होने लगे हैं। पतझड़ अपना पूर्ण यौवन प्राप्त कर चुका है और पेड़ों के नीचे उनके गिरे हुए पत्तों के ढेर दिखाई देने लगे है। बड़ और पीपल वृक्षों के छोटे-छोटे पके हुए फल टप-टप करके टपकने लगे हैं जिन्हें खाने के लिए नन्हें-नन्हें पक्षियों का झुँड मँडराते रहता है। ये समस्त दृष्य एक प्रकार के सौन्दर्य के प्रती नहीं है तो फिर क्या हैं? यही तो है पतझड़ का सौन्दर्य! मादकता के साथ आलस्य का संगम! वसन्त के अवसान और ग्रीष्म के आरम्भ का सूचक! मनुष्य को प्रकृति का एक अलौकिक दान!

Tuesday, March 29, 2011

मजाल है कि पति की कोई बात पत्नी से छुप जाये!

यदि आप शादीशुदा हैं तो आपको अवश्य ही पता होगा कि पत्नी नाम की प्राणी विलक्षण प्रतिभा से युक्त होती है। पत्नी के पास पति की एक एक बात का लेखा-जोखा रहता है। पत्नी अपने पति की एक-एक बात, एक-एक आदत को अच्छी तरह से जानती है। किस दिन आपकी सेलरी मिलती है, कब ओव्हरटाइम का पेमेन्ट होता है, कब आपको बोनस मिलता है जैसी बातें तो आपकी पत्नी अच्छी प्रकार से जानती ही हैं पर उन्हें इनके अलावा इसका भी ज्ञान रहता है कि आप कब पीकर आये हैं, कब झूठ बोल रहे हैं आदि-आदि इत्यादि। पति अपने बारे में जितना नहीं जानता उससे अधिक पत्नी जानती है उसके विषय में। मजाल है कि पति की कोई बात पत्नी से छुप जाये! कहने का लब्बोलुआब है कि बहुत विचित्र जीव होती है ये पत्नी नाम की प्राणी।

आपके रग-रग से परिचित होने के लिए आपकी पत्नी को बहुत अधिक समय की आवश्यकता नहीं होती, शादी होने के चंद दिनों के भीतर ही वह आपके बारे में सब कुछ जान लेती है। इस बात की एक आपबीती उदाहरण प्रस्तुत कर रहा हूँ।

शादी के पहले ऑफिस जाते समय हमारी माता जी हमारा टिफिन तैयार करती थीं। हमारी खुराक से अधिक खाना रहता था उसमें। मेरा व्यक्तिगत अनुभव है कि प्रायः प्रत्येक ऑफिस में एक न एक सहकर्मी जरूर ऐसा होता है जो कभी भी अपना टिफिन नहीं लाता पर खायेगा जरूर दूसरों की टिफिन से। हमारे टिफिन का अतिरिक्त खाना हमारे एक ऐसे ही सहयोगी के काम आता था। शादी होने के बाद कुछ दिनों तक तो माता जी ही टिफिन तैयार करती रहीं फिर धीरे से इस कार्यभार को हमारी श्रीमती जी ने अपने हाथों में ले लिया। लंच समय में जब हमने टिफिन खोला तो देखा छः पराठों की जगह चार ही पराठे और चाँवल भी रोज की अपेक्षा आधा। इधर हमारे टिफिनविहीन मित्र भी तत्काल आ धमके। खाना खाने की हमारी गति बहुत धीमी है। हम जब तक एक पराठा खतम करते, मित्र ने बाकी तीनों पराठे उदरस्थ कर लिये। चाँवल का भी अधिकतम हिस्सा उनके ही उदर में समा गया। हम तो रह गये भूखे।

ऑफिस से आने पर श्रीमती जी से जब कहा कि खाना कम क्यों रखा था तो जवाब मिला, "कम? कम कहाँ था? क्या मैं नहीं जानती कि आप कितना खाते हैं? मैंने तो अपने हिसाब से कुछ अधिक ही खाना रखा था। लगता है कि आपका खाना दूसरे लोग खा जाते हैं।"

हमने कहा, "हाँ भइ, अब कोई एकाध रोटी खा ले तो क्या फर्क पड़ता है? मना करते अच्छा भी तो नहीं लगता।"

वे बोलीं, "क्यों अच्छा नहीं लगता? क्या आपके मित्रों को तनखा नहीं मिलती? वो अपना खाना खुद क्यों नहीं लाते? अब से आपका इस प्रकार से रोज रोज दूसरों को खाना खिलाना बिल्कुल नहीं चलेगा।"

बताइए अब हम क्या कहते? इधर ऑफिस में हमारे मित्र को तो आदत लगी हुई थी रोज हमारे साथ खाने की, उन्हें क्या पता कि अब हमें भूखे मरना पड़ता है। अन्ततः दो-तीन दिन बाद कह ही दिया, "यार, तुम अपना खाना लाया करो नहीं तो नजदीक के भोजनालय में चला जाया करो।"

इस प्रकार से श्रीमती जी ने हमसे वह कहलवा लिया जो कि शादी के पहले हम कभी भी नहीं कह सकते थे।

शुरू-शुरू में तो हम त्रस्त रहते थे उनके हमारे बारे में सबकुछ जानने की वजह से। हम वे समझते थे कि पति के लिये पत्नी "साँप के मुँह में छुछूंदर" ही होती है जिसे न तो निगलते बनता है और न ही उगलते। पर बाद में धीरे-धीरे इस बात की समझ भी हमें आ ही गई कि पत्नियाँ जहाँ एक तरफ पतियों को अपनी मुट्ठी में रखने का भरपूर प्रयास करती हैं वहीं दूसरी तरफ पति पर आये किसी भी विपत्ति को दूर करने के लिये जी जान तक लगा देती हैं।

जीवन में पति-पत्नी के बीच बहुत सारे तकरार, नोक-झोंक चलते हैं किन्तु यह भी सत्य है कि वे दोनों ही एक-दूसरे के पूरक भी हैं। एक के बिना दूसरे का जीवन अधूरा है। पत्नी पति की प्रेरणा होती है। अनेक उदाहरण मिल जायेंगे इसके और सबसे बड़ा उदाहरण तो तुलसीदास जी का है। यदि रत्नावली ने यह न कहा होता किः

"लाज न आवत आपको, दौरे आयहु साथ।
धिक् धिक् ऐसे प्रेम को, कहा कहौं मैं नाथ॥
अस्थिचर्ममय देह यह, ता पर ऐसी प्रीति।
तिसु आधो रघुबीरपद, तो न होति भवभीति॥"


तो आज हम रामचरितमानस से ही वंचित रहते।

श्री गोपाल प्रसाद व्यास जी ने सही ही लिखा हैः

यदि ईश्वर में विश्वास न हो,
उससे कुछ फल की आस न हो,
तो अरे नास्तिको! घर बैठे,
साकार ब्रह्‌म को पहचानो!
पत्नी को परमेश्वर मानो!


तो साहब, हँसी-ठिठोली, हास-परिहास, घात-प्रतिघात, ब्याज-स्तुति, ब्याज-निंदा तो चलते ही रहते हैं। ये सब न हों तो जीवन में रस ही क्या रह जाता है?

एक बात तो माननी ही पड़ेगी, पत्नी चाहे पति को गुलाम बनाये या चाहे पति की गुलामी करे, होती वह सच्चा साथी है। जीवन के सारे सुख-दुःख में साथ निभाने वाली वही होती है!

'अवधिया' या संसार में, मतलब के सब यार।
पत्नी ही बस साथ दे, बाकी रिश्ते बेकार॥


चलते-चलते

पति, "तुम मेरे रिश्तेदारों की बनिस्बत अपने रिश्तेदारों को ज्यादा प्यार करती हो।"

पत्नी, "गलत! मैं अपनी सास से अधिक तुम्हारी सास को प्यार करती हूँ।"

Monday, March 28, 2011

क्या मेलॉडी मर चुकी है?

आज जिसे भी देखो 'बीट्स', 'रीदम' आदि का दीवाना है। गाने वाला क्या गा रहा है यह समझ में आए या न आए, गीत के बोल का कुछ अर्थ निकले या न निकले पर पाँव और पूरा शरीर थिरकना ही चाहिए। आवाज में मधुरता हो या न हो, भले ही कान ऊँची आवाज से बहरे हो रहे हों, सर शोर से फटा जा रहा हो पर ध्वनि का तीव्र होना आवश्यक है। शोर ही संगीत का पर्याय बन गया है।

पर इस बात को अभी बहुत दिन नहीं बीते हैं कि बीट्स के साथ शरीर थिरकने के स्थान पर मेलॉडी के साथ आत्मा थिरकती थी। सामान्य भारतीय वाद्ययंत्रो की मधुर धुनों के साथ "चली कौन से देश गुजरिया तू सजधज के, जाऊँ पिया के देश ओ रसिया मैं सजधज के..." जैसे बोल सुनकर मन-मस्तिष्क आह्लादित हो उठते थे। "के मर के भी किसी को याद आएँगे, किसी की आँसुओं में मुस्कुराएँगे" सुनकर आँखें नम हो जाती थीं। "चल उड़ जा रे पंछी के अब ये देश हुआ बेगाना" सुनकर लगने लगता था कि आत्मा ही वह पंछी है जिसके लिए यह संसाररूपी देश पराया हो चुका है और आत्मा को संसार छोड़ कर जाना पड़ रहा है। जहाँ "साँस तेरी मदिर-मदिर जैसे रजनीगंधा, प्यार तेरा मधुर मधुर चाँदनी की गंगा" सुनकर हृदय संयोग श्रृंगार रस के सागर में डूब जाता था तो "तुम बिन जीवन कैसा जीवन" सुनते ही वही हृदय वियोग श्रृंगार रस के दरिया में गोते लगाने लगता था।

तब फिल्मी गानों में बोल हुआ करते थे, मेलॉडी हुआ करती थी, मेजर कार्ड्स और माइनर कार्ड्स की हॉरमोनी उस मेलॉडी को और भी मधुर रूप दे दिया करती थी। आज कहाँ गई वो मेलॉडी? क्या मर चुकी है मेलॉडी?

ऐसा माना जाता है कि मेलॉडी भारतीय संगीत की आत्मा है। और ज्ञानियों ने हमें बताया है कि आत्मा अमर है, कभी मरती नहीं है। गीता में श्री कृष्ण कहते हैं:

नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः।
न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः॥


(इस आत्माको शस्त्र काट नहीं सकते, आग जला नहीं सकती, जल गला नहीं सकता और वायु सोख नहीं सकता।)

तो फिर भारतीय संगीत की आत्मा मेलॉडी मर कैसे सकती है?

पर लगता है कि ज्ञान भी अब शाश्वत नहीं रह गया है। समय के साथ हर चीज बदल चुकी है और आत्मा अमर होने के स्थान पर नश्वर हो चुकी है।

नेता हैं पर जनता का ही रक्त चूस रहे हैं और राष्ट्र तक को बेच खा रहे हैं। कहाँ गई उनकी आत्मा?

व्यापारी है किन्तु व्यापार के नाम से ग्राहकों को लूट रहे हैं; उचित मुनाफा लेकर जीवनयापन करने के बदले ग्राहकों को लूट-लूट कर तिजोरी भरना ही उनका उद्देश्य बन गया है? कहाँ गई उनकी आत्मा?

चिकित्सक हैं किन्तु सिर्फ उन्हीं की चिकित्सा करते हैं जो बदले में मोटी रकम दे सके; गरीब चिकित्सा के बिना मर रहे हैं। कहाँ गई उनकी आत्मा?

शिक्षा संस्थान हैं किन्तु विद्या का दान नहीं व्यापार कर रहे हैं। कहाँ गई उनकी आत्मा?

कविताएँ हैं किन्तु काव्यात्मक विकलता नहीं है; क्रौञ्च वध से उत्पन्न करुणा नहीं है। कहाँ गई कविता की आत्मा?

संगीत है किन्तु मेलॉडी नहीं है; शोर-शराबा संगीत ही का पर्याय बन गया है। कहाँ गई संगीत की आत्मा?

इस पोस्ट को पढ़कर आप भी सोच रहे होंगे कि क्या बकवास कर रहा हूँ मैं भी पर क्या करूँ पुराने लोगों को सदैव ही अतीत अच्छा और वर्तमान बहुत बुरा प्रतीत होते रहा है और नये लोगों को पुराने लोग पुराने लोग दकियानूस। यही तो मानव प्रकृति है।

Sunday, March 27, 2011

संक्षिप्त नाम (Abbreviations)

AAFIअमेच्योर एथेलेटिक्स फेडरेशन ऑफ इण्डिया (Amateur Athletics Federation of India)
AASUऑल आसाम स्टूडेंड्स यूनियन (All Assam Students Union)
ABMएंटी बैलेस्टिक मिसाइल (Anti Ballistic Missile)
ACअल्टरनेट करेंट / अशोक चक्र / एयर कंडीशनर / अंटार्टिक क्लब (Alternate Current / Ashok Chakra / Air Conditioner / Antarctic Club)
ACCएंक्ज़िलरी कैडेट कोर (Anxillary Cadet Core)
ADएनो डोमिनी अर्थात् ईसा के जन्म के पश्चात् (Ano Domini - After the birth of Jesus)
ADBएशियन डेव्हलपमेंट बैंक (Asian Development Bank .)
AEREएटामिक एनर्जी रिसर्च इस्टेब्लिशमेंट (Atomic Energy Research Establishment)
AGOCएशियन गेम्स ऑर्गेनाइजेशन कमेटी (Asian Games Organisation Committee)
AICCऑल इण्डिया कांग्रेस कमेटी (All India Congress Committee)
AICTEऑल इण्डिया काउंसिल ऑफ टेक्निकल एजुकेशन (All India Council of Technical Education)
AIDSएक्वायर्ड इम्युनो डिफिसिएंसी सिंड्रोम (Acquired Immuno Deficiency Syndrome)
AIFEऑल इण्डिया फुटबाल फेडरेशन (All India Football Federation)
AIIMSऑल इण्डिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेस (All India Institute of Medical Sciences)
AILएयरोनॉटिक्स इण्डिया लिमिटेड (Aeronautics India Limited)
AIMPLBऑल इण्डिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (All India Muslim Personal Law Board)
AIRऑल इण्डिया रेडियो (All India Radio)
AITUEऑल इण्डिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस (All India Trade Union Congress)
AMएंटी मेरिडियन (Anti Meridian)
ANCअफ्रीकन नेशनल कांग्रेस (African National Congress)
APECएशिया पैसेफिक इकॉनामिक कार्पोरशन (Asia Pacific Economic Cooperation)
APSCआर्मी पोस्टल सर्व्हिसेस कोर (Army Postal Services Core)
ASEANएसोशिएशन ऑफ साउथ ईस्ट एशियन नेशन्स (Association of South East Asian Nations)
ASLVऑगमेंटेड सेटेलाइट लांच व्हेइकल (Augmented Satellite Launch Vehicle)
ASIऑर्कियोलॉजिकल सर्व्हे ऑफ इण्डिया (Archaeological Survey of India)
ASSOCHAM एसोशिएटेड चैम्बर ऑफ कॉमर्स एण्ड इंडस्ट्री (Associated Chamber of Commerce and Industry)
ATSएंटी टेटानुस सीरम (Anti Tetanus Serum)
BAMSबैचलर ऑफ आयुर्वेदिक मेडिसिन एण्ड सर्जरी (Bachelor of Ayurvedic Medicine and Surgery)
BARCभाभा एटॉमिक रिसर्च सेंटर (Bhabha Atomic Research Centre)
BBCब्रिटिश ब्राडकॉस्टिंग कार्पोरेशन (British Broadcasting Corporation)
BCबिफोर क्राइस्ट अर्थात् ईसवी पूर्व (Before Christ)
BCCIबोर्ड ऑफ कंट्रोल फॉर क्रिकेट इन इण्डिया (Board of Control for Cricket in India)
BELभारत इलेक्ट्रानिक्स लिमिटेड (Bharat Electronics Limited)
BHELभारत हैवी इलेक्ट्रनिक्स लिमिटेड (Bharat Heavy Electronics Limited)
BIFRबोर्ड ऑफ इंडस्ट्रिअल फाइनेंस एण्ड रिकंस्ट्रक्शन (Board of Industrial Finance and Reconstruction)
BIMSTECबांग्लादेश, इण्डिया, म्याँमार, श्री लंका, थाइलैंड इकॉनामिक कार्पोरेशन (Bangladesh, India, Myanmar, Sri Lanka, Thailand Economic Cooperation)
BISब्यूरो ऑफ इण्डियन स्टैन्डर्डस (Bureau of Indian Standards)
B Pharmaबैचलर ऑफ फॉर्मेसी (Bachelor of Pharmacy)
BSFबॉर्डर सिक्यूरिटी फोर्स (Border Security Force)
CADकमांड एरिया डेव्हलपमेंट (Command Area Development)
CAGकान्ट्रोलर एण्ड ऑडिटर जनरल (Comptroller and Auditor General)
CAREकोऑपरेटिव्ह फॉर अमेरिकन रिलीफ एव्हरीव्हेयर (Cooperative for American Relief Everywhere)
CASEकमीशन फॉर अल्टरनेटिव्ह सोर्स ऑफ एनर्जी (Commission for Alternative Sources of Energy)
CBIसेन्ट्रल ब्यूरो ऑफ इन्व्हेस्टीगेशन (Central Bureau of Investigation)
CBSEसेन्ट्रल बोर्ड ऑफ सेकेण्डरी एजुकेशन (Central. Board of Secondary Education)
CCEAकैबिनेट कमेटी आन इकॉनामिक अफेयर्स (Cabinet Committee on Economic Affairs)
CCSकैबिनेट कमेटी आन सिक्यूरिटी (Cabinet Committee on Security)
C-DACसेन्टर फॉर डेव्हलपमेंट ऑफ एडव्हांस कम्प्यूटिंग (Centre For Development of Advance Computing)
CDMAकोड डिव्हीजन मल्टीपल एक्सेस (Code Division Multiple Access)
CDRIसेन्ट्रल ड्रग रिसर्च इंस्टीट्यूट (Central Drug Research Institute)
CDSकंपल्सरी डिपॉजिट स्कीम (Compulsory Deposit Scheme)
CHOGMकॉमनवेल्थ हेड्स ऑफ गव्हर्नमेंट मीटिंग (Commonwealth Heads of Government Meeting)
CIDक्रिमिनल इन्व्हेस्टिगेशन डिपार्टमेंट (Criminal Investigation Department)
CISFसेन्ट्रल इंडस्ट्रियल सिक्यूरिटी फोर्स (Central Industrial Security Force)
CITUसेन्टर ऑफ इण्डियन ट्रेड यूनियन्स (Centre of Indian Trade Unions)
CNGकम्प्रेस्ड नेचुरल गैस (Compressed Natural Gas)
CODसेन्ट्रल ऑर्डिनेंस डिपो (Central Ordnance Depot)
COFEPOSAकन्जर्व्हेशन ऑफ फॉरेन एक्स्चेंज एण्ड प्रिव्हेंशन ऑफ स्मगलिंग एक्ट (Conservation of Foreign Exchange and Prevention of Smuggling Act)
CPOसेन्ट्रल पासपोर्ट ऑर्गेनाइजेशन (Central Passport Organisation)
CPRIसेन्ट्रल पॉवर रिसर्च इंस्टीट्यूट (Central Power Research Institute)
CRPFसेन्ट्रल रिजर्व्ह पोलिस फोर्स (Central Reserve Police Force)
CRRकैश रिजर्व्ह रेशिओ (Cash Reserve Ratio)
CSIRकाउंसिल ऑफ साइंटिफिक एण्ड इंडस्ट्रियल रिसर्च (Council of Scientific and Industrial Research)
CSOसेन्ट्रल स्टेटिकल ऑर्गेनाइजेशन (Central Statistical Organisation)
CVCसेन्ट्रल व्हिजिलेंस कमीशन (Central Vigilance Commission)
DFDRडिजिटल डाटा रेकॉर्डर अर्था्त ब्लैक बॉक्स (Digital Flight Data Recorder - Black box)
DIGडेपुटी इंस्पेक्टर जनरल (Deputy Inspector General)
D.Lit.डॉक्टर ऑफ लिटरेचर (Doctor of Literature)
DMडिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट (District Magistrate)
DMKद्रविड़ मुनेत्र कड़गम (Dravida Munetra Kazhagam)
DNAडाइ-ऑक्सीरिबो-न्यक्लिक एसिड (Di-oxyribo-Nucleic Acid)
DPSAडीप पिनिट्रेशन स्ट्राइक एयरक्राफ्ट (Deep Penetration Strike Aircraft)
DRDOडिफेन्स रिसर्च एण्ड डेव्हलपमेंट ऑर्गेनाइजेशन (Defence Research and Development Organisation)
DTHडाइरेक्ट तो होम (Direct to Home)
DVDडिजिटल व्हर्स्टाइल डिस्क (Digital Versatile Disk)
ECGइलेक्ट्रो कॉर्डियोग्रा (Electro Cardiogram)
EPABXइलेक्ट्रानिक प्राइव्हेट आटोमेटिक ब्रांच एक्सचेंज (Electronic Private Automatic Branch Exchange)
ERDAएनर्जी रिसर्च एण्ड डेव्हलपमेंट एडमिनिस्ट्रेशन (Energy Research and Development Administration)
EVMइलेक्ट्रानिक व्होटिंग मशीन (Electronic Voting Machine)
EXIM Bankएक्पोर्ट-इम्पोर्ट बैंक ऑफ इण्डिया (Export-Import Bank of India)
FAOफूड एण्ड एग्रीकल्चर ऑर्गेनाइजेशन (Food and Agriculture Organisation)
FBIफेडरल ब्यूरो ऑफ इन्व्हेस्टीगेशन (Federal Bureau of Investigation (USA)
FCIफूड कार्पोरेशन ऑफ इण्डिया / फर्टिलाइजर कार्पोरेशन ऑफ इण्डिया (Food Corporation of India / Fertilizer Corporation of India)
FDRफ्लाइट डाटा रेकॉर्डर अर्थात् ब्लैक बॉक्स (Flight Data Recorder - Black Box)
FERAफॉरेन एक्स्चेंज रेगुलेशन एक्ट (Foreign Exchange Regulation Act)
FEMAफॉरेन एक्स्चेंज मैनेजमेंट (Foreign Exchange Management Act)
FICCIफेडरेशन ऑफ इन्डिया चैम्बर्स ऑफ कॉमर्स एण्ड इंडस्ट्री (Federation of India Chambers of Commerce and Industry)
FIPBफॉरेन इन्व्हेस्टमेंट प्रमोशन बोर्ड (Foreign Investment Promotion Board)
FIRफर्स्ट इन्फॉर्मेशन रिपोर्ट (First Information Report)
FRSफेलो ऑफ द रॉयल सोसाइटी (Fellow of the Royal Society)
FTIIफिल्म्स एण्ड टेलिविजन इंस्टीट्यूट ऑफ इण्डिया (Films and Television Institute of India)
GAILगैस अथॉरिटी ऑफ इण्डिया लिमिटेड (Gas Authority of India Limited)
GICजनरल इन्स्योरेंस कॉर्पोरेशन (General Insurance Corporation)
GMTग्रीनविच मीन टाइम (Greenwich Mean Time)
GNLFगोरखा नेशनल लिबरेशन फ्रंट (Gorkha National Liberation Front)
GNPग्रास नेशनल प्रोडक्ट (Gross National Product)
GPFजनरल प्रॉव्हिडेंट फंड (General Provident Fund)
GPOजनरल पोस्ट ऑफिस (General Post Office)
GPSग्लोबल पोस्टिंग सिस्टम (Global Positioning System)
GSIजियोलॉजिकल सर्व्हे ऑफ इण्डिया (Geological Survey of India)
HACहिन्दुस्तान एल्यूमिनियम कॉर्पोरेशन (Hindustan Aluminium Corporation)
HALहिन्दुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (Hindustan Aeronautics Limited)
HCFहाइयेस्ट कॉमन फैक्टर (Highest Common Factor)
HDFCहाउसिंग डेव्हलपमेंट फायनेंस कॉर्पोरेशन (Housing Development Finance Corporation)
HIVह्युमन इम्यनो-डिफिसियेंसी वायरस (Human Immuno-deficiency Virus)
HMTहिन्दुस्तान मशीन टूल्स (Hindustan Machine Tools)
HUDCOहाउसिंग एण्ड अर्बन डेव्हलपमेंट कॉर्पोरेशन (Housing and Urban Development Corporation)
HYVSहाई यील्ड व्हेरायटी सीड्स (High Yield Variety Seeds)
IAAIइन्टरनेशनल एयरपोर्ट अथॉरिटी ऑफ इण्डिया (International Airport Authority of India)
lACइण्डियन एयरलाइन्स कॉर्पोरेशन (Indian Airlines Corporation)
IAEAइन्टरनेशनल एटॉमिक एनर्जी एजेंसी (International Atomic Energy Agency)
IARIइण्डियन एग्रीकल्चर रिसर्च इंस्टीट्यूट (Indian Agricultural Research Institute)
IBRDइन्टरनेशनल बैंक फॉर रिकंस्ट्रक्शन एण्ड डेव्हलपमेंट अर्थात् वर्ल्ड बैंक (International Bank for Reconstruction and Development (World Bank))
ICARइण्डियन काउंसिल ऑफ एग्रिकल्चर रिसर्च (Indian Council of Agricultural Research)
ICBMइन्टर कॉन्टिनेन्टल बैलिस्टिक मिसाइल (Inter Continental Ballistic Missile)
ICCइन्टरनेशनल क्रिकेट काउंसिल (International Cricket Council)
ICJइन्टरनेशनल कोर्ट ऑफ जस्टिस (International Court of Justice)
ICMRइण्डियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (Indian Council of Medical Research)
IDBIइंडस्ट्रियल डेव्हलपमेंट बैंक ऑफ इण्डिया (Industrial Development Bank of India)
IDOइन्टरनेशनल डिफेंस ऑर्गेनाइजेशन (International Defence Organisation)
IDPLइण्डियन ड्रग्स एण्ड फॉर्मस्युटिकल्स लिमिटेड (Indian Drugs and Pharmaceuticals Limited)
IFAइण्डियन फुटबाल एसोशिएसन (Indian Football Association)
IFCIइन्डस्ट्रिअल फायनेंस कॉर्पोरेशन ऑफ इण्डिया (Industrial Finance Corporation of India)
IFFIइन्टरनेशनल फिल्म फेस्टिव्हल ऑफ इण्डिया (International Film Festival of India)
lISइण्डियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंसेस (Indian Institute of Sciences)
lITइण्डियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (Indian Institute of Technology)
IMAइण्डियन मिलिटरी एकाडमी (Indian Military Academy)
INSइण्डियन नेव्हल शिप (Indian Naval Ship)
INSATइण्डियन नेशनल सैटेलाइट (Indian National Satellite)
INTERPOLइन्टरनेशनल पोलिस ऑर्गेनाइजेशन (International Police Organisation)
INTUCइण्डियन नेशनल ट्रेड यूनियन कांग्रेस (Indian National Trade Union Congress)
IOCइन्टरनेशनल ओलम्पिक कमेटी / इण्डियन ऑयल कॉर्पोरेशन (International Olympic Committee / Indian Oil Corporation)
IPCइण्डियन पेनल कोड (Indian Penal Code)
IQइंटेलिजेंट कोशेंट (Intelligence Quotient)
IRCइन्टरनेशनल रेड क्रॉस (International Red Cross)
ISBइण्डियन स्टैन्डर्ड ब्यूरो (Indian Standard Bureau)
ISPइन्टरनेट सर्व्हिस प्रोव्हाइडर (Internet Services Provider)
ISROइण्डियन स्पेस रिसर्च ऑर्गेनाइजेशन (Indian Space Research Organisation)
ISTइण्डियन स्टैन्डर्ड टाइम (Indian Standard Time)
ITDCइण्डियन टूरिज्म डेव्हलपमेंट कॉर्पोरेशन (Indian Tourism Development Corporation)
ITUCइण्डियन ट्रेड यूनियन कांग्रेस (Indian Trade Union Congress)
KGकिंडर गार्टेन (Kinder Garten)
LASERलाइट एम्प्लिफिकेशन बाय स्टिमुलेटेड एमिशन ऑफ रेडियेशन (Light Amplification By Stimulated Emission of Radiation)
LICलाइफ इन्स्युरेंस कॉर्पोरेशन ऑफ इण्डिया (Life Insurance Corporation of India)
LLBबैचलर ऑफ लॉ (Bachelor of Law)
LLMमास्टर ऑफ लॉ (Master of Law)
LMGलाइट मशीन गन (Light Machine Gum)
LPGलिक्विफाइड पेट्रोलियम गैस (Liquefied Petroleum Gas)
LTTEलिबरेशन टाइगर्स तमिल एलम (Liberation Tigers of Tamil Elam)
MAमास्टर ऑफ आर्ट्स (Master of Arts)
MBAमास्टर ऑफ बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन (Master of Business Administration)
MBBSबैचलर ऑफ मेडिसिन एण्ड बैचलर ऑफ सर्जरी (Bachelor of Medicine and Bachelor of Surgery)
MCAमास्टर ऑफ कम्प्यूटर एप्लीकेशन (Master of Computer Application)
MDडॉक्टर ऑफ मेडिसिन (Doctor of Medicine)
MIमिलिटरी इंटेलिजेंस (Military Intelligence)
MISAमेन्टेनेंस ऑफ इन्टरनल सिक्यूरिटी एक्ट (Maintenance of Internal Security Act)
MLAमेम्बर ऑफ लेजिस्लेटिव्ह असेम्बली (Member of Legislative Assembly)
MRCSमेम्बर ऑफ रॉयल कॉलेज ऑफ सर्जन्स (Member of Royal College of Surgeons)
MODVATमॉडिफाइड व्हेल्यु एडेड टैक्स (Modified Value Added Tax)
NABARDनेशनल बैंक फॉर एग्रिकल्चर एण्ड रुरल डेव्हलपमेंट (National Bank for Agricultural and Rural Development)
NACOनेशनल एड्स क्ट्रोल ऑर्गेनाइजेशन (National AIDS Control Organisation)
NAFEDनेशनल एग्रिकल्चरल कोऑपरेटिव्ह मार्केटिंग फेडरेशन (National Agricultural Cooperative Marketing Fedration)
NASAनेशनेल एयरोनॉटिक्स एण्ड स्पेस एडमिनिस्ट्रेशन(National Aeronautics and Space Administration)
NDAनेशनल डिफेंस एकॉडमी (National Defence Academy)
NEFAनार्थ ईस्ट फ्रंटियर एजेंसी (North-East Frontier Agency)
NFDCनेशनल फिल्म डेव्हलपमेंट कॉर्पोरेशन (National Film Development Corporation)
NIDCनेसनल इंडस्ट्रियल डेव्हलपमेंट कॉर्पोरेशन (National Industrial Development Corporation)
NIITनेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ इन्फॉर्मेश टेक्नोलॉजी (National Institute of Information Technology)
NOIDAन्यू ओखला इंडस्ट्रियल डेव्हलपमेंट अथॉरिटी (New Okhla Industrial Development Authority)
NRDCनेशनल रिसर्च एण्ड डेव्हलपमेंट कॉर्पोरेशन (National Research and Development Corporation)
NRIनॉन रेसिडेंट इण्डियन (Non Resident Indian)
NTPCनेशनल थर्मल पॉवर कॉर्पोरेशन (National Thermal Power Corporation)
OGLओपन जनरल लायसेंस (Open General Licence)
ONGCऑयल एण्ड नेचुरल गैस कमीशन (Oil and Natural Gas Commission)
PCIप्रेस काउंसिल ऑफ इण्डिया (Press Council of India)
Ph. Dडॉक्टर ऑफ फिलॉसफी (Doctor of 'Philosophy)
PINपोस्टल इन्डेक्स नंबर (Posial lndex Number)
PMपोस्ट मेरिडियन / प्राइम मिनिस्टर (Post Meridian / Prime Minister)
POTAप्रिव्हेंशन ऑफ टेररिज्म एक्ट (Prevention of Terrorism Act)
PTIप्रेस ट्रस्ट ऑफ इण्डिया (Press Trust of India)
PROपब्लिक रिलेशन्स ऑफीसर (Public Relations Officer)
PTOप्लीज टर्न ओव्हर (Please Turn Over)
PWDपब्लिक वर्क्स डिपार्टमेंट (Public Work's Department)
RADARरेडिओ एंगल डायरेक्शन एण्ड रेंज (Radio Angle Direction and Range)
RAWरिसर्च एण्ड एनालिसिस विंग (Research and Analysis Wing)
RBIरिजर्व्ह बैंक ऑफ इण्डिया (Reserve Bank of India)
RDXरिसर्च डेव्हलप्ड एक्सप्लोजिव्ह (Research Developed Explosive)
RMSरेल्वे मेल सर्व्हिस (Railway Mail Service)
RPMरिव्हाल्युशन्स पर मिनट (Revolutions Per Minute)
RSSराष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (Rashtriya Swayamsevak Sangh)
RTOरीजनल ट्रांसपोर्ट ऑफीसर (Regional Transport Officer)
SAILस्टील अथॉरिटी ऑफ इण्डिया (Steel Authority of India Limited)
SEBIसिक्यूरिटी एक्सचेंज बोर्ड ऑफ इण्डिया (Security Exchange Board of India)
SIDBIस्माल इंडस्ट्रीज डेव्हलपमेंट बैंक ऑफ इण्डिया (Small Industries Development Bank of India)
SLVसैटेलाइट लांच व्हेइकल (Satellite Launch Vehicle)
STDसब्सक्राइबर्स ट्रंक डायलिंग (Subscribers Trunk Dialing)
TCट्रांसफर सर्टिफिकेट (Transfer Certificate)
TELCOटाटा इंजीनियरिंग एण्ड लोकोमोटिव्ह कंपनी (Tata Engineering and Locomotive Company)
TELEXटेलीप्रिंटर एक्सचेंज (Teleprinter Exchange)
TISCOटाटा ऑयरन एण्ड स्टील कंपनी लिमिटेड (Tata Iron and Steel Company Limited)
TTEट्रैव्हलिंग टिकट इक्जामिनर (Travelling Ticket Examiner)
UDCअपर डिव्हीजन क्लर्क (Upper Division Clerk)
UFOअनआइडेन्टीफाइड फ्लाइंग ऑब्जेक्ट (Unidentified Flying Object)
UGCयूनिव्हर्सिटी ग्रांट कमीशन (University Grants Commission)
UNESCOयूनाइटेड नेशन्स इकानामिक सोशियल एण्ड कल्चरल ऑर्गेनाइजेशन (United Nations Economic Social and Cultural Organisation)
UNICEFयूनाइटेड नेशन्स इन्टरनेशनल चिल्ड्रन्स इमरजेंसी फंड (United Nations International Children's Emergency Fund)
UNOयूनाइटेड नेशन्स ऑर्गेनाइजेशन (United Nations Organisation)
UPSअनइन्टरुप्टेड पॉवर सप्लाय (Uninterrupted Power Supply)
UPSCयूनियन पब्लिक सर्व्हिस कमीशन (Union Public Service Commission)
USSRयूनियन ऑफ सोवियत सोशलिस्ट रिपब्लिक (Union of Soviet Socialist Republic)
UTIयूनिट ट्रस्ट ऑफ इण्डिया (Unit Trust of India)
VATव्हैल्यु एडेड टैक्स (Value Added Tax)
VCव्हाइस चांसलर (Vice-Chancellor)
VIPव्हेरी इम्पॉर्टेंट पर्सन (Very Important Person)
VPPव्हेल्यु पेबल पोस्ट (Value Payable Post)
VRSव्हालेंटरी रिटायरमेंट स्कीम (Voluntary Retirement Scheme)
VSNLविदेश संचार निगम लिमिटेड (Videsh Sanchar Nigam Limited)
VSSCविक्रम साराभाई स्पेस सेंटर (Vikram Sarabhai Space Centre)
WHOवर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन (World Health Organisation)
WILLवायरलेस इन लोकल लूप (Wireless in Local Loop)
WTOवर्ल्ड ट्रेड ऑर्गेनाइजेशन (World Trade Organisation)
WWWवर्ल्ड वाइड वेब (World Wide Web)

Saturday, March 26, 2011

धर्म निरपेक्ष!...अर्थात् जिसे धर्म की अपेक्षा ही न हो

(स्व. श्री हरिप्रसाद अवधिया रचित कविता)

मानते हैं कि-
हम धर्म निरपेक्ष देश में रहते हैं
और हर तरह की ज्यादती-
हम लोग ही तो सहते हैं।

धर्म निरपेक्ष!
अर्थात् जिसे धर्म की अपेक्षा ही न हो
याने कि पूरा पूरा अधर्मी
जिन्हें रौंद डालें विधर्मी।

क्या संसद ने ऐसा कोई कानून बनाया है-
कि हम वेद, शास्त्र, उपनिषद्, रामायण-
पढ़ ही नहीं सकते-
फिर हम ऐसा क्यों नहीं करते
कौन हमें रोकता है?
कौन हमारी धार्मिकता को
गहन अन्धकार में झोंकता है?
कोई हृदय पर हाथ रख कर कहे-
कि हम अपने धर्म ग्रंथों को नियमित पढ़ते हैं!
बारम्बार उनका पुनश्चरण करते हैं।
यदि हाँ, तो भारत आज भी-
धर्म निरपेक्ष नहीं धर्म प्राण राष्ट्र है-
और यदि नहीं, तो
निश्चित है कि यह संस्कृति-संस्कार विहीन राष्ट्र है।
हम मर चुके हैं और हमारा जीना,
केवल भीषण त्रास और उपहास है।

कौन रोकता है हमें-
नित्य स्वाध्याय करने से-
और सद् ग्रंथों को छोड़ स्वयं के साथ
घोर अन्याय करने से।
पर हमारा मन ही मर गया है-
पश्चिमी चकाचौंध से भर गया है।
हम एक नई संस्कृति उभार रहे हैं-
ब्राह्म-मुहूर्त में कुत्ते के साथ भ्रमण कर-
श्वान संस्कृति में जीवन को ढाल रहे हैं।
और चार्वाक को भी धिक्कार रहे हैं!
हमारी आत्मा गहरी नींद ले रही है-
हमारी मूर्खता यही सन्देश दे रही है-
कि हमें कोई नहीं रोकता-
हम पतन की आग में भस्म हो रहे हैं,
हमारे सिवाय-
उस आग में हमें और कोई नहीं झोंकता।

हम सब कुछ हैं पर भारतीय नहीं-
हममें संस्कार ही नहीं इसलिये-
वह हमें नहीं टोकता-
पर हमें संभलना चाहिये-
अपने धर्म ग्रंथों को नियमित पढ़ना ही चाहिये,
क्योंकि ऐसा करने से हमें,
कोई नहीं रोकता।

(रचना तिथिः शनिवार 09-04-1981)

Friday, March 25, 2011

तू ऐसा कुछ लिख ही नहीं सकता जो लाखों-करोड़ों को नहीं तो कम से कम हजार लोगों को आकर्षित कर सके

गूगल ने ब्लोगर के डैशबोर्ड पर "आँकड़े" के रूप में एक अच्छी सुविधा हमें प्रदान की है। यह जानने के लिए कि मेरे ब्लोग में कितने लोग आते हैं, मैं प्रायः इस सुविधा का उपयोग करता हूँ किन्तु अपने ब्लोग के ट्रैफिक जानकर मुझे हमेशा असन्तोष ही होता है क्योंकि मेरे ब्लोग में आने वालों की संख्या पिछले अनेक माह से एक सौ से भी कम ही नजर आती है।

ट्रैफिक माह के अनुसारः



ट्रैफिक हर समय के अनुसारः

सोचने लगता हूँ कि आखिर मेरे ब्लोग को पाठक क्यों नहीं मिलते? और इस प्रश्न के उत्तर में मेरे भीतर से आवाज आती है "तू ऐसा कुछ लिख ही नहीं सकता जो लाखों-करोड़ों को नहीं तो कम से कम हजार लोगों को आकर्षित कर सके।"

Thursday, March 24, 2011

पिछले कई सालों से रेजगारी का चलन बंद

देश के अन्य स्थानों के विषय में तो मैं नहीं कह सकता किन्तु छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में पिछले कई सालों से 1, 2, 5, 10, 25 और 50 पैसे वाले सिक्कों का चलन बंद हो चुका है। आठ-दस साल की उम्र वाले रायपुर के बच्चे जानते तक नहीं कि चवन्नी, अठन्नी किस चिड़िया का नाम है, 1, 2, 5 और 10 पैसे की तो बात ही छोड़ दीजिए।


यदि आप किसी दुकानदार से अमूल का दूध पैकेट, जिसका MRP रु.13.50 है, खरीदने जाएँगे तो वह दुकानदार आपको दूध पैकेट रु.13.50 में न देकर रु.14.00 देगा याने कि वह आपसे रु.0.50 जबरन वसूल कर लेगा। यदि आप उससे इस विषय में कुछ भी कहेंगे तो वह या तो आपको साफ-साफ कहेगा कि दूध रु.14.00 में ही मिलेगा, लेना है तो लो नहीं तो मत लो, या फिर आपको टॉफी, माचिस जैसी कोई रु.0.50 मूल्य की वस्तु, जिसकी आपको बिल्कुल ही आवश्यकता नहीं है, थमा देगा। जरा सोचिए कि यदि वह दुकानदार दिन भर में 1000 पैकेट दूध रु.13.50 के बदले रु.14.00 में बेचता है तो उसे रु.500.00 मुफ्त में मिल जाते हैं, दूसरे शब्दों में वह लोगों की गाढ़ी मेहनत की कमाई से रु.500.00 लूट लेता है। यह तो सिर्फ दूध पैकेट का उदाहरण है, रोजमर्रा की बहुत सारी वस्तुएँ हैं जिनकी कीमत रुपयों के साथ पैसों में भी है और उन वस्तुओं के लिए उपभोक्ताओं को हमेशा अधिक कीमत चुकानी पड़ती है। बहस झंझट से हर आदमी बचना चाहता है इसलिये अधिकतर लोग खुदरा पैसों की चिन्ता नहीं करते और दुकानदार को वो खुदरा पैसे मुफ्त में मिल जाते हैं। बहस झंझट से हर आदमी बचना चाहता है इसलिये अधिकतर लोग खुदरा पैसों की चिन्ता नहीं करते और दुकानदार को वो खुदरा पैसे मुफ्त में मिल जाते हैं।

सन् 2004 में मैं परिवार के साथ पचमढ़ी भ्रमण के लिये गया था तो उस समय महाराष्ट्र में मुझे खरीदी के समय वापसी में चवन्नी, अठन्नी आदि खुदरा सिक्के मिले थे। आज भी वे सिक्के मेरे पास बेकार पड़े हैं क्योंकि वे छत्तीसगढ़ में नहीं चलते। अब उसे यदि चलाना है तो मुझे छत्तीसगढ़ से बाहर जाना होगा।

आश्चर्य की बात तो यह है कि यह लूट आज तक न तो शासन प्रशासन को दिखाई पड़ी और न ही कभी मीडिया ने इस पर आवाज उठाई।

और अब तो एक रुपये तथा दो रुपयों के सिक्के भी बाजार से गायब होते जा रहे हैं और उनके बदले में टॉफी जैसी कोई अवांछित वस्तु उपभोक्ताओं के हाथ में जबरन थमा दी जाती हैं।

Wednesday, March 23, 2011

अमर शहीद भगत सिंह

आज ही के दिन अर्थात् 23 मार्च 1931 को अमर शहीद भगत सिंह को फाँसी दी गई थी।

ऐसा कौन भारतीय होगा जिसने अमर शहीद भगत सिंह (Shaheed Bhagat Singh) का नाम न सुना होगा। वे भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम के अत्यन्त प्रतापी एवं प्रभावशाली क्रान्तिकारी थे। भगत सिंह का जन्म 28 सितम्बर सन् 1907 को पंजाब के लायलपुर जिले में जाट परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम सरदार किशन सिंह संधू तथा माता का नाम विद्यावती था। बचपन से ही भगत सिंह को क्रान्ति से कितना लगाव था इस बात का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि किशोरावस्था में ही उन्होंने यूरोपियन क्रान्तिकारी आन्दोलन (European revolutionary movements) का गहन अध्ययन कर लिया था। वे अनेक क्रान्तिकारी संगठनों से जुड़े रहे थे।

भगत सिंह के पितामह अर्जुन सिंह स्वामी दयानन्द सरस्वती के हिन्दू सुधारवादी संस्था आर्य समाज के अनुयायी थे। उनके चाचा अजीत सिंह और स्वर्ण सिंह के साथ ही साथ उनके पिता भी, करतार सिंह गरेवाल तथा हर दयाल जैसे स्वतन्त्रता संग्राम सेनानियों की पार्टी, गदर पार्टी के सदस्य थे। अजीत सिंह 1925 की काकोरी ट्रेन डकैती के लंबित मामले में फँसे होने के कारण फारस भागने के लिए विवश हुए जबकि स्वर्ण सिंह को 19 दिसम्बर 1927 को फांसी दी गई।

भगत सिंह के उम्र के अन्य बच्चों की तरह से, भगत सिंह का दाखिला लाहौर के खालसा स्कूल में नहीं नहीं करवाया गया क्योंकि उनके दादा को उस स्कूल के पदाधिकारियों की अग्रेज भक्ति स्वीकार नहीं थी, बल्कि उनकी शिक्षा-दीक्षा दयानन्द एंग्लो वैदिक हाई स्कूल में सम्पन्न हुई। 13 वर्ष की उम्र में भगत सिंह गांधी जी के अनुयायी बनकर उनके असहयोग आन्दोलन में शामिल हो गए तथा अपनी स्कूल की किताबों तथा ब्रिटिश आयतित वस्त्रों को खुले आम जलाकर अपना असहयोग प्रदर्शित किया। किन्तु चौरी चौरा के ग्रामीणों के द्वारा पोलिसवालों की हत्या की वजह से गांधी जी के द्वारा आन्दोलन वापस ले लेने के कारण भगत सिंह गांधी जी की अहिंसा वाली नीति से असहमत तथा असंतुष्ट हो गए तथा सशस्त्र क्रान्ति में लिप्त हो गए।

भगत सिंह अत्यन्त कुशाग्र बुद्धि तथा अध्ययनशील विद्यार्थी थे। सन् 1923 में पंजाब हिन्दी साहित्य सम्मेलन द्वारा आयोजित निबन्ध प्रतियोगिता जीत कर ख्याति प्राप्त की तथा सम्मेलन के सचिव प्रोफेसर भीम सेन विद्यालंकार को प्रभावित किया। हिन्दी तथा पंजाबी काव्यों में उनकी अत्यतधिक रुचि रही थी। तरुणावस्था में उन्होंने लाहौर के नेशनल कालेज में दाखिला लिया किन्तु, घर के लोगों द्वारा अल्प वय में उनके विवाह की योजना के कारण, वे घर छोड़ कर भाग गए तथा नौजवान भारत सभा ("Youth Society of India") के सदस्य बन गए। बाद में उन्होंने प्रोफेसर विद्यालंकार की प्रेरणा से हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोशिएसन, जिसके रामप्रसाद बिस्मिल, चन्द्रशेखर आजाद और अशफ़ाक उल्ला जैसे क्रान्तिकारी नेता थे, की सदस्यता ग्रहण कर ली। सन् 1926 के अक्टूबर माह में दशहरा के दिन लाहौर में बम विस्फोट हुआ और उसके आरोप में भगत सिंह गिरफ्तार कर लिए गए किन्तु गिरफ्तारी पाँच हफ्ते बाद रु.60,000 की जमानत पर जेल से छूट गए।

भगत सिंह ने शिवराम राजगुरु, जय गोपाल और सुखदेव थापर आदि क्रान्तिकारियों के साथ मिलकर लाला लाजपत राय के हत्यारे पुलिस अफसर स्कॉट की हत्या की योजना बनाई किन्तु गलतफहमी की वजह से स्कॉट के बदले सॉन्डर्स नामक अन्य पुलिस अधिकारी मारा गया। भारतीयों को जागृत करने के उद्देश्य से भगत सिंह ने दत्त के साथ मिलकर 8 अप्रैल 1929 को असेम्बली में "इंकलाब जिन्दाबाद" का नारा लगाते हुए बम फेंका। चूँकि बम फेंकने का उद्देश्य केवल भारतीयों को जागृत करना था, उस बम से किसी प्रकार की जानोमाल की हानि नहीं हुई किन्तु अपने उद्देश्य में सफलता पाने के लिए भगत सिंह ने स्वयं को गिरफ्तार करवा दिया।

23 मार्च 1931 को अंग्रेज सरकार द्वारा अन्यायपूर्वक भगत सिंह को फाँसी के तख्ते पर लटका दिया गया। कानून उन्हें 24 मार्च 1931 को फाँसी की सजा दी जानी थी किन्तु वह सजा एक दिन पहले ही दे दी गई क्योंकि लोगों का ऐसा मानना है कि अगले दिन तक उनकी फाँसी की सजा रद्द हो जाने वाली थी। यह भी कहा जाता है कि गांधी जी के प्रयास से भगत सिंह को फाँसी की सजा से बचाया जा सकता था जिसके लिए गांधी जी पर चौतरफा दबाव भी था। इस सन्दर्भ में गांधी जी का कहना था कि उन्होंने भगत सिंह को बचाने के लिए बहुत प्रयास किया किन्तु वे अपने प्रयास में सफल नहीं हो पाए जबकि तत्कालीन बहुत सारे लोगों का मानना था कि गांधी जी भगत सिंह की क्रान्तिकारी गतिविधियों से अत्यधिक क्षुब्ध थे इसलिए उन्होंने उन्हें बचाने के लिए पूरी तरह से प्रयास नहीं किया। सच क्या है यह आज भी अंधेरे के गर्त में ही है।

Tuesday, March 22, 2011

भक्तिरस के दोहे

लंका में गरजे रावना, अवधपुरी भगवान।
सात समुंदर बीच में, गरज रहे हनुमान॥

लंका में शंका भयो, राम टिकोना दीन।
खबरदार रे रावना, हनुमत बीड़ा लीन॥

राम नाम अइसन हवै, जस कदली के रंग।
धोये से वो ना धुलै, जाय जीव के संग॥

राम कटारी कृष्ण बाण, गुर गोविंद तलवार
ये तीनों हिरदय बसे, कबहुँ ना होवे हार

चंदा तजे ना चांदनी, सूरज तजे ना धाम।
बादल तजे ना श्यामता, भक्त तजे ना राम॥

योगी में शंकर बड़े और भोगी में भगवान।
दानी में हरिश्चंद्र बड़े, बलि में बड़े हनुमान॥

मोर मुकुट कटि काछनी, पीताम्बर उरमाल।
वो मानिक मो मन बसो, सदा बिहारी लाल॥

राधे जू के बदन में, बसत चालीसा चोर।
दस हंसा दस हंसिनी, दस चातक दस मोर॥

वृंदावन के वृक्ष को, मर्म ना जाने कोय।
डाल पात फल फूल में, श्री राधे राधे होय॥

राधे जी के बदन में, बेंदी अति छवि देत।
मानो फूलि केतकी, भंवर वासना लेत॥

आवो प्यारे मोहना, पलक चाप धरि लेहु।
मैं ना देखू किसी और को, तोहि ना देखन देहु॥

राधे प्यारी लाडिली, मेरी ओर तू देख।
मैं तोहि राखूँ नैन में, जिमि काजल की रेख॥

भजन करो भोजन करो, गावो ताल तरंग।
ये मन मेरो लागे रहे, पारवती शिव संग॥

Monday, March 21, 2011

आमन्त्रण और निमन्त्रण

आमन्त्रण और निमन्त्रण दो शब्द हैं जिनका मोटे रूप में अर्थ होता है बुलावा। किन्तु जिज्ञासा उत्पन्न होती है कि आखिर इन दोनों में अन्तर क्या है। यदि कोई कहता है कि "आप सादर आमन्त्रित है" और कोई दूसरा कहता है कि "आपको निमन्त्रण पत्र भेज दिया गया है, कृपया आइयेगा अवश्य" तो दोनों कथनों में कुछ न कुछ तो फर्क होना चाहिए ना!

जी हाँ दोनों शब्दों में फर्क है जिसे कि पाणिनि सूत्र में इस प्रकार से बताया गया हैः

निमन्त्रणम् = नियतरूपेण आह्वानं, नियोगकरणम् ।

अर्थात् निमन्त्रण के प्रयोग का अर्थ है कि बुलाए गया व्यक्ति महत्वपूर्ण है और उसके आने से आयोजन की सफलता अधिक हो जाती है।

आमन्त्रणम् = कामचारेण आह्वानम् आगच्छेत् वा न वा ।

अर्थात् आमन्त्रण के प्रयोग का अर्थ है कि औपचारिकतावश बुलाया गया है, उसके आने या न आने से आयोजन की सफलता में कुछ विशेष अन्तर नहीं पड़ता।

Saturday, March 19, 2011

मोहे रहि-रहि मदन सतावै पिया बिना नींद नहिं आवै

टेसू के पेड़ों ने अपने पत्र-पल्लव के वस्त्रों को त्याग कर रक्तवर्ण पुष्प-गुच्छों से अपना श्रृंगार कर लिया है। सेमल के गगनचुम्बी वृक्षों पर भी पत्तों के स्थान पर केवल लाल-लाल फूल ही दृष्टिगत होने लगे हैं। खेतो ने सरसों के पीतवर्ण फूलों से स्वयं को आच्छादित कर लिया है। आसमान भी पीले-पीले पतंगों से सुसज्जित हो गया है। जिस तरफ भी दृष्टि जाती है, वसन्त की छटा ही दिखाई पड़ती है। वसन्त का यह सौन्दर्य समस्त संज्ञायुक्त तथा संज्ञाहीन चर-अचर प्राणियों को अपनी मर्यादा त्याग कर काम के वशीभूत होने के लिए विवश कर रहा है। वृक्षों की डालियाँ लताओं की और झुकने लगीं हैं और नदियाँ उमड़-उमड़ कर समुद्र की ओर दौड़ने लगीं हैं। जहाँ प्रेमी-युगल अति प्रसन्न हैं वहीं एक विरहन, जिसका प्रिय परदेस में है, अपनी व्यथा से व्यथित हैः

नींद नहि आवै पिया बिना नींद नहि आवै।
मोहे रहि-रहि मदन सतावै पिया बिना नींद नहि आवै॥

सखि लागत मास असाढ़ा, मोरे प्रान परे अति गाढ़ा,
अरे वो तो बादर गरज सुनावै, परदेसी बलम नहि आवै।
पिया बिना नींद नहि आवै॥

सखि सावन मास सुहाना, सब सखियाँ हिंडोला ताना,
अरे तुम झूलव संगी-सहेली, मैं तो पिया बिना फिरत अकेली।
पिया बिना नींद नहि आवै॥

सखि भादों गहन गंभीरा, मोरे नैन बहे जल-नीरा,
अरे मैं तो डूबत हौं मँझधारे, मोहे पिया बिना कौन उबारे।
पिया बिना नींद नहि आवै॥

सखि क्वाँर मदन तन दूना, मोरे पिया बिना मन्दिर सूना,
अरे मैं तो का से कहौं दुःख रोई, मैं तो पिया बिना सेज ना सोई।
पिया बिना नींद नहि आवै॥

सखि कातिक मास देवारी, सब दियना बारै अटारी,
अरे तुम पहिरौ कुसुम रंग सारी, मैं तो पिया बिना फिरत उघारी।
पिया बिना नींद नहि आवै॥

सखि अगहन अगम अंदेसू, मैं तो लिख-लिख भेजौं संदेसू,
अरे मैं तो नित उठ सुरुज मनावौं, परदेसी पिया को बुलावौं।
पिया बिना नींद नहि आवै॥

सखि पूस जाड़ अधिकाई, मोहे पिया बिन सेज ना भाई,
अरे मोरे तन-मन-जोबन छीना, परदेसी गवन नहि कीन्हा।
पिया बिना नींद नहि आवै॥

सखि माघ आम बौराए, चहुँ ओर बसंत बिखराए,
अरे वो तो कोयल कूक सुनावै, मोरे पापी पिया नहिं आवै।
पिया बिना नींद नहि आवै॥

सखि फागुन मस्त महीना, सब सखियन मंगल कीन्हा,
अरे तुम खेलव रंगे गुलालै, मोहे पिया बिना कौन दुलारै।
पिया बिना नींद नहि आवै॥

मोहे रहि-रहि मदन सतावै पिया बिना नींद नहि आवै॥
पिया बिना नींद नहि आवै॥

Friday, March 18, 2011

काहे को सताय, बाली उमर लरकैया

काहे को सताय, काहे को सताय,
बाली उमर लरकैया।

बारा बरस के उमरिया,
राधा ललिता आय, राधा ललिता आय,
चन्द्रावली और विशाखा,
जल भरने को जाय, जल भरने को जाय,
बाली उमर लरकैया।

काखर फोरै गगरिया,
काखर चूमे गाल, काखर चूमे गाल,
काखर फारै चुनरिया,
यशोदा जी के लाल, यशोदा जी के लाल
बाली उमर लरकैया।

काहे को सताय, काहे को सताय,
बाली उमर लरकैया।

राधा के फोरै गगरिया,
ललिता के चूमे गाल, ललिता के चूमे गाल,
चन्द्रावली के चुनरिया,
यशोदा जी के लाल, यशोदा जी के लाल
बाली उमर लरकैया।

काहे को सताय, काहे को सताय,
बाली उमर लरकैया।

Thursday, March 17, 2011

बाँसुरिया में टोना डारे

क्या बाँस की बनी छोटी सी बाँसुरी के द्वारा भी जादू टोना किया जा सकता है? कहा जाता है कि जब कृष्ण बाँसुरी बजाते थे तो हर कोई मुग्ध होकर सब कुछ भूल जाता था, यहाँ तक कि स्वयं को भी। यह टोना नहीं था तो क्या था। तभी तो फाग में कहा गया हैः

बाँसुरिया में टोना डारे, बाँसुरिया में टोना रे लाल!
सुन्दर श्याम सलोना रे लाल!

घर घर दूध-दही माँगत हैं
लिए हाथ में दोना रे लाल।

बाँसुरिया में टोना डारे, बाँसुरिया में टोना रे लाल!
सुन्दर श्याम सलोना रे लाल!

कृष्ण कभी बाँसुरी बजाते थे तो कभी मुरली। बाँसुरी जहाँ बाँस की बनी होती है वहीं मुरली सोने, चाँदी, पीतल जैसे किसी धातु की बनी हो सकती है। बाँसुरी हो या मुरली, जब कृष्ण बजाते थे तो उसमें अलौकिक आकर्षण होता था और उसकी धुन के समक्ष गोपियों-ग्वालों को अपना स्वयं का घर आँगन तक नहीं भाता थाः

मुरली वाले मोहना मुरली नेक बजाय।
तेरो मुरली मन हरो घर-अँगना न सुहाय॥

कृष्ण मुरली तो बजाते थे गोकुल में किन्तु उसकी धुन का जादू मथुरा तक असर कर दिया करता थाः

मुरली धुन नेक बजाया हो सँवरिया मोह लिए सब ग्वालनियाँ।

काहेन के तोरे मूरलिया
काहेन बंद लगाय हो सँवरिया मोह लिए सब ग्वालनियाँ।

सोनेन के तोरे मूरलिया
रेशम बंद लगाय हो सँवरिया मोह लिए सब ग्वालनियाँ।

कहँवा बाजे मूरलिया
कहँवा शब्द सुनाय हो सँवरिया मोह लिए सब ग्वालनियाँ।

गोकुल बाजे मूरलिया
मथुरा शब्द सुनाय हो सँवरिया मोह लिए सब ग्वालनियाँ।

होली की मस्ती में जब उपरोक्त फागों को ताल धमाल में गाया जाता है तो सुनने वाले झूम उठते हैं।

Wednesday, March 16, 2011

हरि को नचन सिखावैं राधा प्यारी

जहाँ हिन्दी भक्ति साहित्य को गोप-गोपियों, ग्वालों और कृष्ण के आत्मिक प्रेम का वर्णन रसमय बनाता है, वहीं उनका यह अलौकिक प्रेम फागुन के महीने में होली के माहौल को एक अद्भुत मस्ती भी प्रदान करता है। यदि भक्त-कवियों द्वारा रचित भजनों में इस अलौकिक प्रेम का वर्णन श्रोता के भीतर श्रद्धा और भक्ति के भाव उत्पन्न करते हैं तो 'बैजनाथ', 'पल्टू हीरामन', 'चन्द्रसखी' जैसे फाग-गीतकारों द्वारा रचित फागों में वही वर्णन भंग की तरंग और होली के माहौल से मस्त होकर फाग-गीत गाने तथा सुनने वालों को ऐसी मस्ती से भर देता है कि उनके पग अनायास ही ताल-धमाल की थाप सुनते ही धिरकने लग जाते हैं।

'बैजनाथ' की रचना तो कृष्ण को सीधे-सीधे "मन का काला" ही करार देता हैः

मिला बन में मुरलियावाला सखी, मिला बन में मुरलिया वाला सखी।

कोई कहे देखो मोहन हैं आए,
कोई कहे नन्दलाला सखी।
मिला बन में मुरलिया वाला सखी।

धर पिचकारी खड़े ग्वाल सब
कोई धरे है गुलाला सखी।
मिला बन में मुरलिया वाला सखी।

सारी साड़ी मेरो भिगोए,
देखो नन्द का लाला सखी।
मिला बन में मुरलिया वाला सखी।

'बैजनाथ' कहे श्याम सलोना,
लेकिन मन का काला सखी।
मिला बन में मुरलिया वाला सखी।

और 'पल्टू हीरामन' लिखते हैं

होरी खेलत घनश्यामा बिरिज में होरी खेलत घनश्यामा।

श्याम के संग में सकल पदारथ,
राधा के संग सुख-सामां।
बिरिज में होरी खेलत घनश्यामा।

श्याम के संग में गोकुल के ग्वाला,
राधा के संग बृजवामा।
बिरिज में होरी खेलत घनश्यामा।

'पल्टू हीरामन' रंग उड़े रे,
लाल भए गोकुल ग्रामा।
बिरिज में होरी खेलत घनश्यामा।

इसी प्रकार से 'चन्द्रसखी' बताते हैं कि किस प्रकार से कृष्ण को राधा ने नृत्य सिखायाः

नचन सिखावैं राधा प्यारी हरि को नचन सिखावैं राधा प्यारी।

जमुना पुलिन निकट वंशीवट,
शरद रैन उजियारी।
हरि को नचन सिखावैं राधा प्यारी।

रूप भरे गुन छड़ी हाथ लिए,
डरपत कृष्ण मुरारी।
हरि को नचन सिखावैं राधा प्यारी।

'चन्द्रसखी' भजु बालकृष्ण छवि,
हरि के चरण बलिहारी।
हरि को नचन सिखावैं राधा प्यारी।

धन्य है यह गोप-गोपियों, ग्वालों और श्री कृष्ण का अद्भुत, अलौकिक और आत्मिक प्रेम!

Tuesday, March 15, 2011

यशोदा जी के लाल, यशोदा जी के लाल, मोरी गगरिया भर दे


यशोदा जी के लाल, यशोदा जी के लाल
मोरी गगरिया भर दे

मोरी गगरिया भर देऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽ
मोरी गगरिया भर दे

यशोदा जी के लाल, यशोदा जी के लाल
मोरी गगरिया भर दे

इक तो जमुना गहरी
दूजे ऊँचे रे करार, दूजे ऊँचे रे करार
पावों में पायल झनके
जिया धड़के हमार, जिया धड़के हमार
मोरी गगरिया भर दे

मोरी गगरिया भर देऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽ
मोरी गगरिया भर दे

यशोदा जी के लाल, यशोदा जी के लाल
मोरी गगरिया भर दे

राधा पूछे मोहन से
सुनो प्यारे मेरी बात, सुनो प्यारे मेरी बात
गगरी भरौनी का लेबे
ये तो करले करार, ये तो करले करार
मोरी गगरिया भर दे

मोरी गगरिया भर देऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽ
मोरी गगरिया भर दे

यशोदा जी के लाल, यशोदा जी के लाल
मोरी गगरिया भर दे

टीपः उपरोक्त गीत एक फाग-गीत है, मेरी स्वरचित रचना नहीं।

Monday, March 14, 2011

भारत को भारत रहने दो

(स्व. श्री हरिप्रसाद अवधिया रचित कविता)

तुलसी का सन्देश यही है
सियारम मय जग को जानो,
अपने भीतर सबको देखो
सबमें अपने को पहचानो।

स्वाति बूंद है राम रमापति
उसके हित चातक बन जावो,
आत्म-शक्ति जागेगी तुममें
राम-भक्त जो तुम हो जावो।

भौतिकता में रावण पलता
आध्यात्मिकता में श्री राम,
राम-राज का सुख चाहो तो
मत जगने दो मन में काम।

काम-अर्थ के चक्कर में तुम
धर्म-मोक्ष को भूल गये हो,
अति अनाचार के झूले में
रावण के संग झूल गये हो।

"मानस" पढ़ कर निज मानस में
तुलसी की ही स्मृति जगने दो,
आदर्श राम का जागृत कर
भारत को भारत रहने दो

(रचना तिथिः 04-08-1995)

Sunday, March 13, 2011

हिन्दी कहावतें तथा लोकोक्तियाँ - 21 (Hindi Proverbs)

प्रस्तुत हैं हिन्दी की कुछ लोकोक्तियाँ तथा मुहावरे और उनके अर्थ। उनके अर्थ मैंने अपनी अल्पबुद्धि के अनुसार बनाए हैं और उनमें त्रुटि की सम्भावना है अतः यदि आपको त्रुटियाँ नजर आएँ तो कृपया टिप्पणी करके सही अर्थ बताने का कष्ट करें।

दीवार के भी कान होते हैं

अर्थः सतर्क रहना चाहिए।

दुधारू गाय की लात सहनी पड़ती है

अर्थः जिससे लाभ होता है, उसकी धौंस भी सहनी पड़ती है।

दुनिया का मुँह किसने रोका है

अर्थः बोलने वालों की परवाह नहीं करनी चाहिए।

दुविधा में दोनों गए माया मिली न राम

अर्थः दुविधा में पड़ने से कुछ भी नहीं मिलता।

दूल्हा को पत्त़ल नहीं, बजनिये को थाल

अर्थः बेतरतीब काम करना।

दूध का दूध पानी का पानी

अर्थः न्याय होना।

दूध पिलाकर साँप पोसना

अर्थः शत्रु का उपकार करना।

दूर के ढोल सुहावने

अर्थः देख परख कर ही सही गलत का ज्ञान करना।

दूसरे की पत्तल लंबा-लंबा भात

अर्थः दूसरे की वस्तु् अच्छी लगती है।

देसी कुतिया विलायती बोली

अर्थः दिखावा करना।

देह धरे के दण्ड हैं

अर्थः शरीर है तो कष्ट भी होगा।

दोनों हाथों में लड्डू

अर्थः सभी प्रकार से लाभ ही लाभ।

दो लड़े तीसरा ले उड़े

अर्थः दो की लड़ाई में तीसरे का लाभ होना।

धनवंती को काँटा लगा दौड़े लोग हजार

अर्थः धनी आदमी को थोड़ा सा भी कष्ट हो तो बहुत लोग उनकी सहायता को आ जाते हैं।

धन्ना सेठ के नाती बने हैं

अर्थः अपने को अमीर समझना।

धर्म छोड़ धन कौन खाए

अर्थः धर्मविरूद्ध कमाई सुख नहीं देती।

धूप में बाल सफ़ेद नहीं किए हैं

अर्थः अनुभवी होना।

धोबी का गधा घर का ना घाट का

अर्थः कहीं भी इज्जत न पाना।

धोबी पर बस न चला तो गधे के कान उमेठे

अर्थः शक्तिशाली पर आने वाले क्रोध को निर्बल पर उतारना।

धोबी के घर पड़े चोर, लुटे कोई और

अर्थः धोबी के घर चोरी होने पर कपड़े दूसरों के ही लुटते हैं।

धोबी रोवे धुलाई को, मियाँ रोवे कपड़े को

अर्थः सब अपने ही नुकसान की बात करते हैं।

Saturday, March 12, 2011

शबरी के बेर

(स्व. श्री हरिप्रसाद अवधिया रचित खण्ड-काव्य)

भारत के दक्षिण भागों में,
फैले थे बीहड़ वन-खण्ड।
दण्डक-वन कहलाते थे वे,
जीव-जन्तु थे वहाँ प्रचण्ड॥1॥

छा कर पत्तों की कुटी वहाँ,
ऋषि-मुनि सुख से रहते थे।
भक्ति तपस्या परमेश्वर की,
निशिदिन सब मिल करते थे॥2॥

बुढ़िया भिल्लिनि भी एक वहाँ,
मुनियों के सँग रहती थी।
बेच-बेच कर लकड़ी वन की,
निज-निर्वाह वह करती थी॥3॥

बतला सकता है क्या कोई,
क्या था उस भिल्लिनि का नाम?
सुनो उसे शबरी कहते थे,
जपती सदा राम का नाम॥4॥

शूद्रा थी, पर भक्त बड़ी थी,
बूढ़ी थी और बाल पके थे।
लटक रही थी मुख पर झुर्री,
युग कपोल भी पिचके थे॥5॥

आश्रम के सब बच्चे उसको,
"नानी-नानी" कहते थे।
बड़े प्रेम से उसकी बातें,
हँसी-खुशी से सुनते थे॥6॥

बूढ़ी होने पर भी उसकी,
ताकत ज्यों की त्यों ही थी।
इसीलिये कामों में उसके,
बिजली की-सी फुर्ती थी॥7॥

सुना एक दिन जब शबरी ने,
'वन में आवेंगे श्री राम।
मुनयों के सँग उसको भी प्रभु,
दर्शन देंगे ललित ललाम'॥8॥

उस दिन से गाया करती थी,
"मेरे घर आवेंगे राम।
सँग में सीता लक्ष्मण होंगे,
साधु वेश में अति अभिराम॥9॥

देखूँगी मैं उनको छक कर,
जन्म सुफल निज जानूंगी।
पूजा करके भोग लगा कर,
पद रज ले सुख मानूंगी"॥10॥

लगी इकट्ठा करने तब से,
वन के मीठे-मीठे बेर।
बड़े प्रेम से प्रभु को देने,
बड़े-बड़े वे सुन्दर बेर॥11॥

बेर तोड़ती थी पेड़ों से,
फिर करती थी सोच-विचार।
"मीठे होंगे या खट्टे ये,
कैसे हो मुझको इतबार?"॥12॥

एक युक्ति झट सोची उसने,
'चख कर क्यों न करूँ पहचान।
चखने से से ही हो सकता है,
खट्टे और मीठे का ज्ञान'॥13॥

बस! फिर क्या था उन बेरों को,
चख कर रखना शुरू किया।
रक्खा मीठे बेरों को ही,
खट्टे को सब फेंक दिया॥14॥

इधर अयोध्या में दशरथ ने,
सोचा-"अब मैं वृद्ध हुआ।
राज्य सौंप दूँ रामचन्द्र को,"
सोच नृपति मन-मग्न हुआ॥15॥

किन्तु कैकेयी ने तिकड़म कर,
माँगे दशरथ से दो वर।
पहले में-'राजा भरत बने-
राज-दण्ड को धारण कर'॥16॥

फिर माँगा वरदान दूसरा-
'निज राज-वेश को तज कर-
राम चला जावे दण्डक वन,
साधु-वेश को धारण कर'॥17॥

लक्ष्मण-सीता सहित राम तब,
पूज्य पिता की आज्ञा से।
रोते सबको त्याग चले वन,
पावन पुरी अयोध्या से॥18॥

छाया गहरा शोक अवध में,
सुख को दुःख ने जीत लिया।
अन्धकार ने पुर-प्रकाश पर,
महा भयानक राज्य किया॥19॥

पर्ण कुटी से सीता जी का,
रावण ने अपहरण किया।
चुरा दुष्ट ने वैदेही को,
प्रभु को दारुण कष्ट दिया॥20॥

लक्ष्मण के सँग सीता जी के,
अन्वेषण में राम चले।
कण्टक-मय पथरीले पथ पर,
सहते दोनों घाम चले॥21॥

समाचार शबरी ने पाये,
आश्रम ढिग आये हैं राम,
दौड़ी आई मारग में झट,
तजकर आश्रम के सब काम॥22॥

लिपट गई पैरों से प्रभु के,
हाँफ रही थी वह प्रति क्षण।
आँसू नयनों से बहते थे,
डूब रहा था सुख में मन॥23॥

उठा लिया झट उसे राम ने,
और अभय वरदान दिया।
रामचन्द्र ने पतित जनों का,
ऐसा पावन मान किया॥24॥

बोली प्रभु से गद् गद होकर,
"प्रभु मैं भिल्लिनि हूँ अति नीच।
किन्तु पुण्य से पूर्व जन्म के,
रहती हूँ मुनियों के बीच॥25॥

दर्शन की आशा से मैंने,
अब तक घट में प्राण रखे।
धन्य-धन्य नयनों को मेरे,
जिनने सुन्दर रूप लखे॥26॥

मेरे आश्रम तक न चलोगे,
क्या जगदीश्वर दीनानाथ?
चल कर पावन कर दो मुझको,
अनुज लखन को लेकर साथ"॥27॥

विहँसे प्रभु लक्ष्मण को लख कर,
लक्ष्मण भी तब मुसकाये।
प्रेम भरे, मीठे, शबरी के,
वचन राम को अति भाये॥28॥

शबरी ले सानन्द राम को,
आ पहुँची निज आश्रम में।
हुआ सफल था जीवन उसका,
मुक्ति मिली थी जीवन में॥29॥

पद-प्रक्षालन कर दोनों के,
बैठा कुश के आसन में।
पूजा की जी भर कर उसने,
ललक-ललक छिन-छिन मन में॥30॥

बोली, "भोग लगाने को मैं,
लेकर आती हूँ कुछ बेर।
चले न जाना, हाँ, देखो तुम,
यदि हो जावे मुझको देर॥31॥

इतना कह कक्ष दूसरे में,
गई तुरत हँसती-हँसती।
और बेर की हाँड़ी लेकर,
आई झट गरती पड़ती॥32॥

पत्तल पर रख दिये बेर वे,
और लगी कहने शबरी-
"मीठे हैं सब खा लो इनको,
आवेदन करती शबरी॥33॥

बोली वह फिर बड़े गर्व से,
"खट्टा इनमें एक नहीं।
देख चुकी हूँ चख कर इनको,
मेरा रहा विवेक सही"॥34॥

खाये राघव ने बेर सभी,
प्रेम-भाव से सने हुये।
आग्रह कर-कर रही खिलाती,
वश में उसके राम हुये॥35॥

खाते-खाते मुसकाते थे,
करते बेरों का गुण-गान।
कैसे मीठे हैं सुन्दर भी,
मन के भावों के हैं दान॥36॥

सौभाग्य उदित था शबरी का,
मिला रंक को सुर-तरु था।
ईश्वर ही वश में थे उसके,
खेल भक्ति का अनुपम था॥37॥

जीवन सार्थक किया राम ने,
नीच भीलनी शबरी का।
मिटे कष्ट सब जन्म-मरण के,
दिव्य रूप था शबरी का॥38॥

बड़े प्रेम से खाते थे प्रभु,
करते सीता जी की याद।
भाव भरे जूठे बेरों में,
मिला उन्हें अमृत का स्वाद॥39॥

खिला-खिला कर बेर उन्हें वह,
फूली नहीं समाती थी।
देख-देख मुख-चन्द्र राम का,
बनी चकोरी जाती थी॥40॥

Friday, March 11, 2011

फाग में फूहड़ता या फाग भक्ति रस से सराबोर?

वसन्त ऋतु अपनी युवावस्था को प्राप्त कर चुका है। चहुँ ओर शीतल-मन्द-सुगन्धित बयार बह रही है। आम्रवृक्ष बौर से लद चुके हैं और आम के बौर की सुगन्ध मन में मादकता उत्पन्न कर रही है। टेसू और सेमल के वृक्षों ने पत्र-पल्लव का परिधान त्याग कर रक्त-वर्ण पुष्पों से अपना श्रृंगार कर लिया है। वातावरण कोयल की कूक से गुंजायमान हो रही है। अनंग (बिना अंग के) होने बाद भी कामदेव जन-जन के मन-मस्तिष्क में वास करने लग गए हैं।



ऐसी ही मादकता ने "सेनापति" की लेखनी को लिखने पर विवश कर दिया था किः

बरन बरन तरु फूले उपवन वन,
सोई चतुरंग संग दल लहियतु है।
बंदी जिमि बोलत विरद वीर कोकिल है,
गुंजत मधुप गान गुन गहियतु है॥
आवे आस-पास पुहुपन की सुवास सोई
सोने के सुगंध माझ सने रहियतु है।
सोभा को समाज सेनापति सुख साज आजु,
आवत बसंत रितुराज कहियतु है॥


ज्यों-ज्यों दिन बीत रहे हैं, होली का त्यौहार निकट आते जा रहा है। होलिका दहन का माहौल बनते जा रहा है। होली का माहौल हो और मन-मस्तिष्क में फाग ना गूँजे तो वह होली का माहौल कैसा? आज की आपाधापी में तो फाग सिर्फ होली के समय एक दो दिन ही गाये जाते हैं किन्तु हमारे बचपन के दिनों में वसन्त पंचमी के दिन से ही फाग गाने की शुरुवात हो जाती थी जो कि रंग पंचमी तक चलती थी। हम झांझ, मंजीरों, नगाड़ों आदि के ताल धमाल में डूब जाया करते थे। जहाँ फाग फूहड़ भी होते थे वहीं फाग भक्ति रस से सराबोर भी हुआ करते थे। होली त्यौहार से लगभग आठ दिन पूर्व से फूहड़ फागों को गाने का दौर शुरू हो जाता था किन्तु उसके पहले और होलिकोत्सव के पश्चात भक्ति रस से सराबोर फाग ही गाए जाते थे।

प्रस्तुत है कृष्णभक्ति के भाव से सराबोर दो फाग गीतः

(१)

आज श्याम संग सब सखियन मिलि ब्रज में होली खेलै ना
हाँ प्यारे ललना ब्रज में होली खेलै ना

इत ते निकसी नवल राधिका उत ते कृष्ण कन्हाई ना
हाँ प्यारे ललना उत ते कृष्ण कन्हाई ना
हिल मिल फाग परस्पर खेलैं शोभा बरनि ना जाई ना
आज श्याम संग सब सखियन मिलि ब्रज में होली खेलै ना

बाजत झांझ मृदंग ढोल डफ मंजीरा शहनाई ना
हाँ प्यारे ललना मंजीरा शहनाई ना
उड़त गुलाल लाल भये बादर केसर कीच मचाई ना
आज श्याम संग सब सखियन मिलि ब्रज में होली खेलै ना

(२)

जाने दे जमुना पानी मोहन जाने दे जमुना पानी
मोऽहन जाने दे जमुना पानी

रोज के रोज भरौं जमुना जल
नित उठ साँझ-बिहानी
मोऽहन जाने दे जमुना पानी

चुनि-चुनि कंकर सैल चलावत
गगरी करत निसानी
मोऽहन जाने दे जमुना पानी

केहि कारन तुम रोकत टोकत
सोई मरम हम जानी
मोऽहन जाने दे जमुना पानी

हम तो मोहन तुम्हरी मोहनिया
नाहक झगरा ठानी
मोऽहन जाने दे जमुना पानी

ले चल मोहन कुंज गलिन में
हम राजा तुम रानी
मोऽहन जाने दे जमुना पानी

चन्द्रसखी भजु बालकृष्ण छवि
हरि के चलन चित लानी
मोऽहन जाने दे जमुना पानी

Thursday, March 10, 2011

टिप्पणी तो करा दीजिये

मुझको ब्लोगर बना दीजिये
मेरी रचना पढ़ा दीजिये

अच्छा लिखूँ मैं या ना लिखूँ
टिप्पणी तो करा दीजिये

लोकली मैं छपूँ ना छपूँ
नेट पर तो छपा दीजिये

पोस्ट चोरी का है ये मेरा
मत किसी को बता दीजिये

मूल गज़ल

लज़्ज़त-ए-गम बढ़ा दीजिये
आप यूँ मुस्कुरा दीजिये

कीमत-ए-दिल बता दीजिये
खाक लेकर उड़ा दीजिये

चांद कब तक गहन में रहे
आप ज़ुल्फें हटा दीजिये

मेरा दामन अभी साफ है
कोई तोहमद लगा दीजिये

आप अंधेरे में कब तक रहें
फिर कोई घर जला दीजिये

एक समुन्दर ने आवाज दी
मुझको पानी पिला दीजिये

मूल गजल सुनें:

Wednesday, March 9, 2011

हिन्दू धर्म में विज्ञान

इस सार्वभौम सत्य को झुठलाया नहीं जा सकता कि अस्तित्व रक्षा हेतु मनुष्य की तीन आधारभूत आवश्यकताएँ होती हैं - भोजन, वस्त्र और निवास याने कि रोटी, कपड़ा और मकान! और जब मनुष्य की ये तीनों आधारभूत आवश्यकताएँ पूरी हो जाती हैं तो स्वाभाविक रूप से वह मनोरंजन खोजने लगता है। किन्तु मनोरंजन की प्राप्ति हो जाने पर भी उसकी मानसिक मानसिक प्यास नहीं बुझ पाती। उसके मस्तिष्क में "मैं कौन हूँ?", "जीवन का उद्देश्य क्या है?", "मुझे शान्ति और प्रसन्नता कैसे प्राप्त होगी?" जैसे अनेक प्रश्न उठने लगते हैं। ये सारे प्रश्न ही धर्म को जन्म देते हैं। शान्ति और आनन्द की यह खोज ही मनुष्य को अध्यात्म और धर्म की ओर आकर्षित करते हैं। इस संसार और ब्रह्माण्ड को देखकर स्वाभाविक रूप से मनुष्य को जिज्ञासा होने लगती है कि इनका निर्माण किसने किया? वह एक एक अलौकिक महान शक्ति (supernatural power), जिसने इस संसार को बनाया, के अस्तित्व के होने की अवधारणा बना लेता है जिसे कि परमात्मा, ईश्वर, भगवान, अल्ला, खुदा, गॉड जैसे नामों से जाना जाता है। वास्तव में देखा जाए तो मनुष्य का इतिहास उसका स्वयं का इतिहास न होकर अलौकिक महान शक्ति (supernatural power) की खोज का ही इतिहास है।

मनुष्य की बुद्धि ही मनुष्य को पशु-पक्षी आदि अन्य प्राणियों से अलग कर देता है। मनुष्य की यह बुद्धि ही ऐसे प्रश्नों को जन्म देती है जिनसे धर्म का जन्म होता है और यह धर्म ही मनुष्य को अन्य प्राणियों से श्रेष्ठ बना देता हैः

आहारनिद्राभयमैथुनं च सामान्यमेतत् पशुभिर्नराणाम्।
धर्मो हि तेषां अधिकोविशेषो धर्मेण हीनाः पशुभिः समानाः॥


आहार, निद्रा, भय और मैथुन मनुष्य और पशु दोनों ही के स्वाभाविक आवश्यकताएँ हैं (अर्थात् यदि केवल इन चारों को ध्यान में रखें तो मनुष्य और पशु समान हैं), केवल धर्म ही मनुष्य को पशु से श्रेष्ठ बनाता है। अतः धर्म से हीन मनुष्य पशु के समान ही होता है।

अपनी इसी श्रेष्ठता के कारण हमारे पूर्वज ऋषि-मुनियों ने आज से कई हजारों साल पहले अनेक गूढ़ रहस्यों को जान लिया था। उन्होंने समझ लिया था कि मनुष्य मात्र एक देह नहीं होता किन्तु वास्तव में मनुष्य के भीतर एक अति सूक्ष्म रूप में एक शक्ति होती है जिसे कि आत्मा कहा जाता है। उन्होंने इस गूढ़ रहस्य को भी समझ लिया था कि यह आत्मा ब्रह्माण्ड के प्रत्येक वस्तु में व्याप्त रहती है, अर्थात् मनुष्य के भीतर सूक्ष्म रूप में पूर्ण ब्रह्माण्ड होता है। इसीलिए ईशावास्योपनिषद में कहा गया हैः

ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्।
तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम्॥


इस ब्रह्माण्ड मे जो कुछ भी गतिशील अर्थात चर अचर पदार्थ है, उन सब मे ईश्‍वर अपनी गतिशीलता के साथ व्‍याप्‍त है उस ईश्‍वर से सम्‍पन्‍न होते हुये तुम त्‍याग भावना पूर्वक भोग करो। आसक्‍त मत हो कि धन अथवा भोग्‍य पदार्थ किसके है? अर्थात् किसी के भी नही है। अत: किसी अन्‍य के धन का लोभ मत करो क्‍योकि सभी वस्‍तुऐं ईश्‍वर की है।

ऊपर बताया गया है कि धर्म से हीन मनुष्य पशु के समान ही होता है। केवल धर्म ही मनुष्य को पशु से अलग करता है। तो प्रश्न यह उठता है कि आखिर धर्म है क्या? धर्म शब्द की उत्पत्ति "धृ" क्रिया से हुई है जिसका अर्थ है "धारण करना", अतः जो धारण करे वही धर्म है, इसी को संस्कृत में इस प्रकार कहा गया है - धरति इति धर्मः"। महाभारत में भी इसी बात को दुहराया गया हैः

धारणाद्धर्ममित्याहुः धर्मो धारयते प्रजाः।
यस्याद्धारणसंयुक्तं स धर्म इति निश्चयः॥


"धर्म" शब्द की उत्पत्ति "धारण" शब्द से हुई है (अर्थात् जिसे धारण किया जा सके वही धर्म है), यह धर्म ही है जिसने समाज को धारण किया हुआ है। अतः यदि किसी वस्तु में धारण करने की क्षमता है तो निस्सन्देह वह धर्म है।

हमारे प्राचीन ऋषियों ने, जो वास्तव में दार्शनिक, चिंतक तथा वैज्ञानिक होते थे, अनेक प्रकार के खोज तथा आविष्कार किए थे। उदाहरण के लिए, उन्होंने खोज लिया था कि मनुष्य का मस्तिष्क सतत् कार्य करते रहता है। यहाँ तक कि मनुष्य के सोते समय भी उसका मस्तिष्क नहीं सोता और कार्य करता ही रहता है जिसके परिणाम स्वप्न होते हैं। हमारे पूर्वजों ने अनेक प्रकार के अन्वेषण करके यह खोज निकाला कि यदि किसी प्रकार से मस्तिष्क को कार्य करने से रोक दिया जाए तो उस अवस्था में एक अद्भुत् शान्ति की प्राप्ति होती है। अपनी इस शुद्धतम अवस्था में मनुष्य परमात्मा के अत्यन्त निकट पहुँच जाता है। इस अवस्था को ही योग की अवस्था कहा जाता है जिसे कि महर्षि पतञ्जलि ने योगसूत्र में "योगश्चित्तवृतिनिरोधः" कह कर बताया है, अर्थात मस्तिष्क को विचार तरंगों से हीन कर देना ही योगावस्था है।

यद्यपि हम आज केवल भौतिक सुख-सुविधा के साधन प्रदान करने वाले खोजों तथा आविष्कारों को ही विज्ञान की संज्ञा देते है, किन्तु हमारे ऋषियों की आत्मा-परमात्मा, योग-ध्यान आदि सम्बन्धित खोज और आविष्कार निःसन्देह विज्ञान ही है। ऐसी बात नहीं है कि हमारे पूर्वजों ने केवल अध्यात्मिक विज्ञान में उपलब्धियाँ प्राप्त की थीं बल्कि भौतिक विज्ञान में भी वे आज से भी कहीं बहुत आगे थे। जिन खोजों और आविष्कारों को हम आज पाश्चात्य वैज्ञानिकों की उपलब्धि मानते हैं उनके विषय में हमारे पूर्वज हजारों साल पहले ही जानते थे, जैसे कि आज जिसे पाइथागोरस का साध्य कहा जाता है उसका प्रयोग बोधायन ने पाइथागोरस से हजारों साल पहले अपने शुल्बसूत्र में किया था, पृथ्वी की परिधि की माप, सूर्य से पृथ्वी की दूरी आदि की सही सही गणना हमारे ऋषियों ने हजारों साल पहले ही कर लिया था।

हमारे प्राचीन ग्रंथों में अनेक गूढ़ रहस्य छुपे हुए हैं! आज आवश्यकता है शोध करके उन रहस्यों को खोज निकालने की।

Tuesday, March 8, 2011

नारी शक्ति को नमन!

आज हम दूसरों के पीछे भागने वालों में सबसे आगे हो चुके हैं जिसका परिणाम है कि हम दूसरों के देखा देखी साल भर अनेक प्रकार के दिवस मनाते हैं और उसी क्रम में आज अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस मना रहे हैं। भारत में कभी किसी प्रकार का महिला दिवस मनाने का रिवाज नहीं रहा किन्तु भारत ने प्राचीन काल से ही नारी की शक्ति को पहचाना है और उसे देवी के रूप में प्रतिष्ठित किया है। यह तो मानना ही पड़ेगा कि एक दिवस मनाकर महिला के महत्व को स्वीकारने का दिखावा करने और बिना किसी प्रकार का दिवस मनाए महिला की शक्ति और महत्व को सच में स्वीकार करने में जमीन आसमान का अन्तर है। जो भी कार्य हृदय से किया जाता है उसके लिए किसी प्रकार का दिवस मनाकर दिखावा करने की कोई जरूरत नहीं होती।

अत्यन्त प्राचीन युग से ही भारतवर्ष में महिलाओं का उच्च स्थान रहा है। वे लक्ष्मी, सरस्वती, दुर्गा, काली आदि देवियों के रूप में पूजी जाती रही हैं। पतञ्जलि तथा कात्यायन की कृतियों में स्पष्ट उल्लेख है कि वैदिक युग में शिक्षा के क्षेत्र में महिलाओं का समानाधिकार था। ऋग् वेद की ऋचाएँ बताती हैं कि महिलाओं को अपना वर चयन करने का पूर्ण अधिकार था और उनका विवाह पूर्ण वयस्क अवस्था में हुआ करता था। नारी पुरुष से अधिक शक्तिशाली थी, है और रहेगी। शिव में सामर्थ्य नहीं था महिषासुर के वध का, सिर्फ काली ही उसे मार सकती थी। महिषासुर वध कथा में महिषासुर बुराई का प्रतीक है। ये कथा संदेश देती है कि बुराई को दूर करने में पुरुष की अपेक्षा नारी अधिक सक्षम है।

दुर्भाग्य से कालान्तर में हमारे देश में विदेशियों का नियन्त्रण हो गया और उस नियन्त्रण के प्रभाव से हम अपनी प्राचीन शिक्षा एवं संस्कृति को भुलाते चले गए जिसका परिणाम यह हुआ कि भारतीय समाज में महिलाओं का दर्जा, पूर्व की भाँति उच्च न रहकर, अलग-अलग समय में अलग-अलग तरह का हो गया। मध्यकाल तो महिलाओं की सामाजिक प्रतिष्ठा का पतन का ही काल बनकर रह गया। बाल विवाह, सती प्रथा, विधवा-विवाह का निषेध आदि कुप्रथाएँ मध्ययुग की ही देन हैं। भारतीय उपमहाद्वीप में मुसलमानों का अधिकार हो जाने पर परदा प्रथा और राजपूतों के पराजय ने जौहर प्रथा को जन्म दिया।

इन सबके बावजूद भी महान महिलाओं का उदय होता ही रहा। रजिया सुल्तान दिल्ली की गद्दी पर बैठकर पूरे हिन्दुस्तान की मलिका बनीं। गोंड महारानी दुर्गावती ने 15 वर्षों तक शासन किया। चाँद बीबी ने मुगलों के आक्रमण से अहमदनगर की रक्षा की। ऐसे और भी कितने ही उदाहरण मिल जायेंगे।

ब्रिटिश काल में राजा राममोहन राय, ईश्वर चंद्र विद्यासागर, ज्योतिराव फुले जैसे लोग नारी की स्थिति को पुनः सँवारने के प्रयास में जुट गये। सन् 1829 में राजा राममोहन राय के प्रयास से सती प्रथा का अन्त हुआ। ईश्वर चंद्र विद्यासागर ने विधवाओं की स्थिति में सुधार तथा विधवा विवाह का आरम्भ के लिये जेहाद छेड़ दिया परिणामस्वरूप सन् 1856 में विधवा पुनर्विवाह अधिनियम बना।

स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात् भारतीय महिलाओं की स्थिति में द्रुत गति से सुधार होना आरम्भ हो गया। वे शिक्षा, संस्कृति, विज्ञान, तकनीकी, राजनीति, मीडिया, सर्विस सेक्टर आदि सभी क्षेत्रों में समान रूप से भाग लेने लगीं। औरतों तथा पुरुषों का पूर्ण रूप से समान दर्जा हो गया।

सदियों से नारी, कहीं प्रत्यक्ष तो कहीं परोक्ष रूप में, पुरुष की प्रेरणा रही है। इतिहास साक्षी है कि पुरुष के द्वारा किये गये प्रत्येक महान कार्य के पीछे उसकी प्रेरणा नारी ही रही है। यदि रत्नावली ने “लाज न आवत आपको…” न कहा होता तो हम आज “रामचरितमानस” जैसे पावन महाकाव्य से वंचित रह जाते। नारी के द्वारा किसी व्यक्ति, समाज और यहाँ तक कि राष्ट्र के विचारों में आमूल परिवर्तन कर देने का प्रत्यक्ष उदाहरण शिवाजी की माता जिजाजी हैं।

Monday, March 7, 2011

आज अगर तुलसी आयें तो

(स्व. श्री हरिप्रसाद अवधिया रचित कविता)

आज अगर तुलसी आयें तो,
सन्देश नहीं दे पायेंगे;
लुप्त देख सद्ग्रंथों को,
आश्चर्यचकित रह जायेंगे।

विनय पत्रिका के बदले में,
घोर अवज्ञा वे पायेंगे;
'मानस' के देश निकाले पर,
भौचक्के से रह जायेंगे।

रामचन्द्र पर रावण का ही,
सब ओर विजय वे पायेंगे;
ऐसे में तुलसी भी कैसे,
शक्ति, शील, सौन्दर्य जगायेंगे!

अंग्रेजी द्वारा हिन्दी की,
घोर उपेक्षा ही पायेंगे;
तब तो तुलसी भी सोचेंगे,
कल हिन्दी को बिसरायेंगे।

लोप भारती का लख तुलसी,
अकुलायेंगे, पछतायेंगे;
जैसे आयेंगे भारत में,
वैसे ही वापस जायेंगे।

(रचना तिथिः 04-08-1985)

Sunday, March 6, 2011

संस्कृत सुभाषित - हिन्दी अर्थ - 11

सुभाषित शब्द "सु" और "भाषित" के मेल से बना है जिसका अर्थ है "सुन्दर भाषा में कहा गया"। संस्कृत के सुभाषित जीवन के दीर्घकालिक अनुभवों के भण्डार हैं।

पात्रे त्यागी गुणे रागी संविभागी च बन्धुषु।
शास्त्रे बोद्धा रणे योद्धा स वै पुरुष उच्यते॥१०१॥


जो उचित पात्र के लिए त्याग करता है, दूसरों के गुणों को स्वीकार करता है, अपने सुख-दुःख को बन्धु-बान्धव के साथ बाँटता है, शास्त्रों से ज्ञान ग्रहण करता है, युद्ध में वीरता का प्रदर्शन करता है, उसे ही सच्चे अर्थ में पुरुष कहा जाता है।

कोकिलानां स्वरो रूपं स्त्रीणां रूपं पतिव्रतम्।
विद्या रूपं कुरूपाणां क्षमा रूपं तपस्विनाम्॥१०२॥ पंचतंत्र


कोयल का सौन्दर्य उसकी मधुर स्वर है, स्त्री का सौन्दर्य पातिव्रत है, कुरूप व्यक्ति का सौन्दर्य विद्या है और तपस्वी का सौन्दर्य क्षमा है।

विद्या मित्रं प्रवासेषु भार्या मित्रं गृहेष च।
व्याधितस्यौषधं मित्रं धर्मो मित्रं मृतस्य च॥१०३॥ महाभारत


प्रवासी के लिए विद्या मित्र होता है, गृहस्थ के लिए पत्नी मित्र होती है, रोगग्रस्त के लिए औषधि मित्र होता है और मृतक के लिए धर्म मित्र होता है।

मूलं भुजंगैः शिखरं विहंगैः शाखां प्लवंगैः कुसुमानि भृंगैः।
आश्चर्यमेतत् खसुचन्दनस्य परोपकाराय सतां विभूतयः॥१०४॥


चन्दन वृक्ष के जड़ में सर्प लिपटे रहते हैं, शिखर पर पक्षी विश्राम करते हैं शाखा पर वानर झूलते हैं और फूलों पर भ्रमर मँडराते हैं, अर्थात चन्दन वृक्ष सदैव दूसरों का कल्याण करता है। इसी प्रकार से सज्जन सदैव दूसरों का हित ही करते हैं।

न कश्चित् कस्यचिन्मित्रं न कश्चित् कस्यचित् रिपुः।
अर्थतस्तु निबध्यन्ते मित्राणि रुपवस्तथा॥१०५॥


न तो कोई किसी का मित्र ही होता है और न ही कोई किसी का शत्रु होता है, परिस्थियाँ ही व्यक्ति को मित्र अथवा शत्रु बनने को विवश करती हैं।

अज्ञः सुखं आराध्यः सुखतरं आराध्यते विशेषज्ञः।
ज्ञानलवदुर्विदग्धं ब्रह्मापि नरं न रंजयति॥१०६॥


अज्ञानी को को आसानी के साथ सिखाया तथा समझाया जा सकता है और उससे भी अधिक आसानी के साथ पूर्ण ज्ञान रखने वाले को सिखाया तथा समझाया जा सकता है किन्तु ज्ञानी होने का दम्भ रखने वाले अल्पज्ञानी को ब्रह्मा भी सिखा तथा समझा नहीं सकते।

अव्यकरणमधीतं भिन्न्द्रोण्या तरगिणीतरणम।
भेषजमपथ्यसहितं त्रयमिदमकृतं वरं न कृतं॥१०७॥


व्याकरण के बिना अध्ययन करना, पेंदे में छेद वाले नाव से नदी पार करना और पथ्य के बिना औषधि का सेवन करना, ये तीन कार्य ऐसे हैं जिसे करने से न करना ही अच्छा है।

शैले शैले न माणिक्यं मौक्तिकं न गजे गजे।
साधवो न हि सर्वत्र चन्दनं न वने वने॥१०८॥ हितोपदेश


प्रत्येक पत्थर माणिक नहीं होता, प्रत्येक हाथी में मुक्ता नहीं होता, प्रत्येक स्थान में साधु नहीं होते और प्रत्येक वन में चन्दन वृक्ष नहीं होते। (अर्थात सद्गुण दुर्लभ होते हैं।)

गुणी गुणं वेत्ति न वेत्ति निर्गुणो बली बलं वेत्ति न वेत्ति निर्बलः।
पिको वसन्तस्य गुणं न वायसः करी च सिंहस्य बलं न मूषकः॥१०९॥


गुणी व्यक्ति ही दूसरे गुणी व्यक्ति के गुण का आकलन कर सकता है, निर्गुण नहीं। बलवान व्यक्ति ही दूसरे बलवान व्यक्ति के बल का आकलन कर सकता है, निर्बल नहीं। कोयल ही वसन्त का आकलन कर सकती है, कौआ नहीं। हाथी ही सिंह की शक्ति का आकलन कर सकता है, चूहा नहीं।

कन्या वरयते रूपं माता वित्तं पिता श्रुतम्।
बान्धवाः कुमिच्छिन्ति मिष्टान्नं चेतरे जनाः॥११०॥


कन्या अपने पति के रूपवान होने की इच्छा रखती है, कन्या की माता अपने जामाता के धनवान होने की इच्छा रखती है, कन्या का पिता अपने दामाद के बुद्धिमान होने की इच्छा रखता है, कन्या के भाई कन्या के पति के कुलीन होने की इच्छा रखते हैं और अन्य लोग केवल मिष्टान्न की इच्छा रखते हैं। (अर्थात एक ही व्यक्ति से-अलग अलग लोग अलग-अलग कामना रखते हैं।)

Saturday, March 5, 2011

आयोलाल! झूलेलाल! - आज चेटीचंड महोत्सव


भारत!

याने कि विभिन्न धर्मों, समुदायों और जातियों के समावेश!

भारत! अर्थात् वह देश जहाँ सभी लोग एक-दूसरे की मान्यताओं, धारणाओं, परम्पराओं आदि को आदर और महत्व देते हैं। होली हो, दीपावली हो, ईद हो, क्रिसमस हो, चाहे किसी धर्म का त्यौहार क्यों न हो, हमारे देश में इन त्यौहारों को प्रमुखता से मनाया जाता है, गर्व की बात है यह हम भारतवासियों के लिए!

हमारा आर्यावर्त देवभूमि है अर्थात् अवतारों का आविर्भाव स्थल! अलग-अलग समय में अनेक अनेक अवतारों का आविर्भाव हुआ है भारत-भूमि में! इसीलिए तो श्रीमद्भगवद्गीता में श्रीकृष्ण ने कहा हैः

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मान.म सृजाम्यहम्॥

भारत में जब कभी भी धर्म की ग्लानि होती है, किसी न किसी अवतार का आविर्भाव अवश्य होता है। ऐसे ही एक अवतार हैं "झूलेलाल" जिनका आविर्भाव चैत्र शुक्‍ल द्वि‍तीया संवत् 1117 को हुआ था। प्रतिवर्ष चैत्र शुक्‍ल द्वि‍तीया तिथि के रोज, जो कि आज दिनांक 05-03-2011 को है, सम्पूर्ण सिन्धी समाज पूरे देश में भगवान झूलेलाल, जो कि वरुण देव के अवतार माने जाते हैं, का जन्मोत्सव 'चेटीचंड' के रूप में हर्षोल्लास से मनाता है। चेटीचंड महोत्सव से ही सिन्धी समुदाय के 'नूतन वर्ष' का भी शुभारम्भ होता है।

वैसे तो भगवान झूलेलाल से सम्बन्धित अनेक गाथाएँ, किंवदंतियाँ आदि पढ़ने-सुनने को मिलती हैं किन्तु ऐसा प्रतीत होता है कि चेटीचंड महोत्सव मनाने का प्रमुख कारण कुछ और ही है। देखा जाए तो सिंधी समुदाय प्राचीनकाल से ही व्यापार का कार्य करते रहा है। प्राचीनकाल में इन व्यापारियों को अपने व्यापार के लिए जलमार्ग से विभिन्न देशों में जाना पड़ता था क्योंकि अत्यन्त प्राचीनकाल से ही भारत के व्यापारिक सम्बन्ध मलय देश (वर्तमान मलेशिया),  सुमात्रा, जावा (प्राचीन यव द्वीप), मदुरा, बाली, कालीमंथन, जिसे अब बोर्निओ (Borneo) कहा जाता है, कलिंग द्वीप समूह (Philippines),  सुलावेशी (Sulawesi  या Celebes), जय द्वीप (Irian Jaya/New Guinea), सिंहपुर (जो आज सिंगापुर : Singapore कहलाता है) से थे, सिंहपुर तो भारत के लिए पूर्वी नौ-यात्रा का द्वार ही था। ऐसी समुद्र यात्राओं में सिन्धी व्यापारियों को विभिन्न तो कई विपदाओं का सामना करना पड़ता था। चूँकि जल के देवता वरुण हैं, आपदाओं से रक्षा उनकी ही स्तुति एवं प्रार्थना की जाती थी। इसी कारण से वरुण देव अर्थात् झूलेलाल सिंधी लोगों के आराध्य देव बन गए।

सभी को झूलेलाल महोत्सव चेटीचंड की हार्दिक शुभकामनाएँ।

Friday, March 4, 2011

बाली द्वीप का विचित्र हिन्दू रिवाज टाउर केसिंगा (tawur kesanga)

कल 5 मार्च 2011 को बाली द्वीप में निवास करने वाले हिन्दुओं का नया वर्ष आरम्भ होगा जो कि "न्येपी" (Nyepi) के नाम से जाना जाता है। वहाँ के हिन्दुओं में न्येपी से एक दिन पूर्व अर्थात पुराने वर्ष के अन्तिम दिन टाउर केसिंगा (tawur kesanga) नामक एक विचित्र रिवाज का प्रचलन है जिसमें बुराई को पुतले का रूप देकर जलाया जाता है। इस रोज बाली द्वीप के गाँवों में बुराई के प्रतीक के रूप में बाँस, कागज आदि ज्वलनशील वस्तुओं से विशाल पुतले बनाये जाते हैं जिनकी आकृति दैत्य, असुर, प्रेत, पिशाच आदि जैसे होती है। वहाँ के लोग इन पुतलों को ओगो-ओगो (Ogoh-Ogoh) कहते हैं। यह ओगो-ओगो भूतकाल का प्रतीक होता है जिसे कि गाँव के समस्त लोगों की उपस्थिति में शाम को जला दिया जाता है। यह रिवाज भारत में होलिका दहन के रिवाज जैसा ही है।


 उल्लेखनीय है कि इंडोनेशिया संसार का सबसे बड़ा मुस्लिम आबादी वाला देश है पर बाली द्वीप में हिन्दुओं की आबादी अधिक है।

Thursday, March 3, 2011

वैशेषिक दर्शन - धर्म का एक वैज्ञानिक रूप

अनेक विद्वानों ने धर्म की अनेक परिभाषाएँ दी हैं किन्तु महान भारतीय दार्शनिक कणाद भौतिक तथा आध्यात्मिक रूप से "सर्वांगीण उन्नति" को ही धर्म मानते हैं। अपने वैशेषिक दर्शन में वे कहते हैं - "यतो भ्युदयनि:श्रेय स सिद्धि:स धर्म:" (जिस माध्यम से अभ्युदय अर्थात्‌ भौतिक दृष्टि और आध्यात्मिक दोनों ही दृष्टि से सभी प्रकार की उन्नति प्राप्त होती है, उसे ही धर्म कहते हैं।) और अभ्युदय कैसे हो यह बताते हुए महर्षि कणाद कहते हैं - ‘दृष्टानां दृष्ट प्रयोजनानां दृष्टाभावे प्रयोगोऽभ्युदयाय‘ (गूढ़ ज्ञान प्राप्त करने हेतु प्रत्यक्ष देखने या अन्यों को दिखाने के उद्देश्य से किए गए प्रयोगों से अभ्युदय का मार्ग प्रशस्त होता है।)

महर्षि कणाद आज के वैज्ञानिकों की भाँति प्रयोगों पर ही जोर देते हैं, वे एक महान दार्शनिक होते हुए भी प्राचीन भारत के एक महान वैज्ञानिक भी थे। उनकी दृष्टि में द्रव्य या पदार्थ धर्म के ही रूप थे। आइंस्टीन के "सापेक्षता के विशेष सिद्धान्त (special theory of relativity) के प्रतिपादित होने के पूर्व तक आधुनिक भौतिक शास्त्र द्रव्य और ऊर्जा को अलग अलग ही मानता था किन्तु महर्षि कणाद ने आरम्भ से ही ऊर्जा को भी द्रव्य की ही संज्ञा दी थी इसीलिए तो उन्होंने अग्नि याने कि ताप  (heat) को तत्व ही कहा था। कणाद के वैशेषिक दर्शन के अनुसार पदार्थ छः होते हैं- द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, विशेष और समवाय। महर्षि कणाद के दर्शन के अनुसार संसार की प्रत्येक उस वस्तु को जिसका हम अपने इन्द्रियों के माध्यम से अनुभव कर सकते हैं को इन्हीं छः वर्गो में रखा जा सकता है।

सर्वप्रथम उन्होंने ही परमाणु की अवधारणा प्रतिपादित करते हुए कहा था कि परमाणु तत्वों की लघुतम अविभाज्य इकाई होती है जिसमें गुण उपस्थित होते हैं और वह स्वतन्त्र अवस्था में नहीं रह सकती। वैशेषिक दर्शन में बताया गया है कि अति सूक्ष्म पदार्थ अर्थात् परमाणु ही जगत के मूल तत्व हैं। कणाद कहते हैं कि परमाणु स्वतन्त्र अवस्था में नहीं रह सकते इसलिए सदैव एक दूसरे से संयुक्त होते रहते हैं, संयुक्त होने के पश्चात् निर्मित पदार्थ का क्षरण होता है और वह पुनः परमाणु अवस्था को प्राप्त करता है तथा पुनः किसी अन्य परमाणु से संयुक्त होता है, यह प्रक्रिया निरन्तर चलती रहती है। एक प्रकार के दो, तीन .. परमाणु संयुक्त होकर क्रमशः ‘द्वयाणुक‘ और ‘त्रयाणुक‘... का निर्माण करते हैं। स्पष्ट है कि द्वयाणुक ही आज के रसायनज्ञों का ‘बायनरी मालिक्यूल‘ है। कणाद का वैशेषिक दर्शन स्पष्ट रूप से तत्वों के रासायनिक बन्धन को दर्शाता है।

महर्षि कणाद ने इन छः वर्गों के अन्तर्गत् आने वाले द्रव्यों के भी अनेक प्रकार बताए हैं। उनके दर्शन के अनुसार द्रव्य नौ प्रकार के होते हैं - पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, काल, दिशा, आत्मा, परमात्मा और मन। यहाँ पर विशेष ध्यान देने योग्य बात यह है कि महर्षि कणाद ने आकाश, काल और दिशा को हजारों वर्ष पूर्व ही द्रव्य की ही संज्ञा दे दी थी और आज आइंस्टीन के "सापेक्षता के विशेष सिद्धान्त (special theory of relativity) से भी यही निष्कर्ष निकलता है।


आज आत्मा, परमात्मा और मन के अस्तित्व को स्वीकार नहीं किया जाता किन्तु वैशेषिक दर्शन का अध्ययन करने पर ऐसा प्रतीत होता है कि आत्मा, परमात्मा, मन इत्यादि को भी ताप, चुम्बकत्व, विद्युत, ध्वनि जैसे ही ऊर्जा के ही रूप ही होने चाहिए। इस दिशा में अन्वेषण एवं शोध की अत्यन्त आवश्यकता है।

इस ब्रह्माण्ड में पाए जाने वाले समस्त तत्व आश्चर्यजनक रूप से हमारे शरीर में भी पाए जाते हैं और यह तथ्य वैशेषिक दर्शन में बताए गए इस बात की पुष्ट है कि "द्रव्य की दो स्थितियाँ होती हैं - एक आणविक और दूसरी महत्‌; आणविक स्थिति सूक्ष्मतम है तथा महत्‌ यानी विशाल व्रह्माण्ड। ऐसा प्रतीत होता है कि प्राचीन भारत के वैज्ञानिकों ने इस तथ्य को ध्यान में रखकर अपने शरीर को ही प्रयोगशाला का रूप दिया रहा होगा और इस प्रकार से अपने शरीर का अध्ययन कर के समस्त ब्रह्माण्ड का अध्ययन करने का प्रयास किया रहा होता।

Wednesday, March 2, 2011

महाशिवरात्रि के पावन पर्व में गूगल (इंडिया) सर्च भी शिवमय


भारत में त्यौहारों की बहुलता भारत की विशिष्टता है। हिन्दू पञ्चांग में वर्ष का प्रत्येक दिन का किसी न किसी पर्व से जुड़ा होता है अर्थात् भारत में वर्ष का प्रत्येक दिन कोई न कोई पर्व होता है। वर्ष के प्रत्येक दिन का कोई न कोई पर्व होना भारत की समृद्धि का प्रतीक है क्योंकि समृद्ध जन ही तो खर्च करके पर्व मना सकते हैं वरना "नंगा नहायेगा क्या और निचोड़ेगा क्या?"

मजे की बात तो यह है कि हमारे त्यौहार गूगल सर्च को भी त्यौहारमय बना देते हैं। आपको यह जानकर शायद आश्चर्य हो कि आज गूगल (इंडिया) सर्च में निम्न विषयों (टॉपिक्स) की सर्वाधिक खोज हुई हैः
1. shiv bhajan
2. mahashivratri sms
3. shivratri sms
4. lord shiva songs
5. om namah shivaya
6. shiva stotram
7. sivarathri sms
8. manjunatha songs
9. shiv chalisa
10. mahashivratri songs
11. shivaratri songs
12. lingashtakam
13. siva stuthi
14. telugu devotional songs
15. manjunatha songs free download
16. mahashivratri message
17. happy shivratri
18. shivaratri wishes
19. shivaratri messages
20. samarpan meditation

यह रही इस पोस्ट के लिखने से लगभग पौन घंटे पूर्व अपडेट की गई गूगल (इंडिया) ट्रेंड्स साइट का स्क्रीनशॉटः


तो बना दिया न महाशिवरात्रि के पावन पर्व ने गूगल (इंडिया) सर्च भी शिवमय!

Tuesday, March 1, 2011

वर्तमान युग का पहला हवाई जहाज भारत में बना था

आज राइट बंधु को हवाई जहाज के आविष्कार के लिए श्रेय दिया जाता है क्योंकि उन्होंने 17 दिसम्बर 1903 हवाई जहाज उड़ाने का प्रदर्शन किया था। किन्तु बहुत कम लोगों को इस बात की जानकारी है कि उससे लगभग 8 वर्ष पहले सन् 1895 में संस्कृत के प्रकाण्ड पण्डित शिवकर बापूजी तलपदे ने "मारुतसखा" या "मारुतशक्ति" नामक विमान का सफलतापूर्वक निर्माण कर लिया था जो कि पूर्णतः वैदिक तकनीकी पर आधारित था। पुणे केसरी नामक समाचारपत्र के अनुसार श्री तलपदे ने सन् 1895 में एक दिन  (दुर्भाग्य से से सही दिनांक की जानकारी नहीं है) बंबई वर्तमान (मुंबई) के चौपाटी समुद्रतट में उपस्थित कई जिज्ञासु व्यक्तियों, जिनमें भारतीय अनेक न्यायविद्/राष्ट्रवादी सर्वसाधारण जन के साथ ही महादेव गोविंद रानाडे और बड़ौदा के महाराज सायाजी राव गायकवाड़ जैसे विशिष्टजन सम्मिलित थे, के समक्ष अपने द्वारा निर्मित "चालकविहीन" विमान "मारुतशक्ति" के उड़ान का प्रदर्शन किया था। वहाँ उपस्थित समस्त जन यह देखकर आश्चर्यचकित रह गए कि टेक ऑफ करने के बाद "मारुतशक्ति" आकाश में लगभग 1500 फुट की ऊँचाई पर चक्कर लगाने लगा था। कुछ देर आकाश में चक्कर लगाने के के पश्चात् वह विमान धरती पर गिर पड़ा था। यहाँ पर यह बताना अनुचित नहीं होगा कि राइट बंधु ने जब पहली बार अपने हवाई जहाज को उड़ाया था तो वह आकाश में मात्र 120 फुट ऊँचाई तक ही जा पाया था जबकि श्री तलपदे का विमान 1500 फुट की ऊँचाई तक पहुँचा था। दुःख की बात तो यह है कि इस घटना के विषय में विश्व की समस्त प्रमुख वैज्ञानिकों और वैज्ञानिक संस्थाओं/ संगठनों पूरी पूरी जानकारी होने के बावजूद भी आधुनिक हवाई जहाज के प्रथम निर्माण का श्रय राईट बंधुओं को दिया जाना बदस्तूर जारी है और हमारे देश की सरकार ने कभी भी इस विषय में आवश्यक संशोधन करने/करवाने के लिए कहीं आवाज नहीं उठाई (हम सदा सन्तोषी और आत्ममुग्ध लोग जो है!)। कहा तो यह भी जाता है कि संस्कृत के प्रकाण्ड पण्डित एवं वैज्ञानिक तलपदे जी की यह सफलता भारत के तत्कालीन ब्रिटिश शासकों को फूटी आँख भी नहीं सुहाई थी और उन्होंने बड़ोदा के महाराज श्री गायकवाड़, जो कि श्री तलपदे के प्रयोगों के लिए आर्थिक सहायता किया करते थे, पर दबाव डालकर श्री तलपदे के प्रयोगों को अवरोधित कर दिया था। महाराज गायकवाड़ की सहायता बन्द हो जाने पर अपने प्रयोगों को जारी रखने के लिए श्री तलपदे एक प्रकार से कर्ज में डूब गए। इसी बीच दुर्भाग्य से उनकी विदुषी पत्नी, जो कि उनके प्रयोगों में उनकी सहायक होने के साथ ही साथ उनकी प्रेरणा भी थीं, का देहावसान हो गया और अन्ततः सन् 1916 या 1917 में श्री तलपदे का भी स्वर्गवास हो गया। बताया जाता है कि श्री तलपदे के स्वर्गवास हो जाने के बाद उनके उत्तराधिकारियों ने कर्ज से मुक्ति प्राप्त करने के उद्देश्य से "मारुतशक्ति" के अवशेष को उसके तकनीक सहित किसी विदेशी संस्थान को बेच दिया था।


श्री तलपदे का जन्म सन् 1864 में हुआ था। बाल्यकाल से ही उन्हें संस्कृत ग्रंथों, विशेषतः महर्षि भरद्वाज रचित "वैमानिक शास्त्र" (Aeronautical Science) में अत्यन्त रुचि रही थी। वे संस्कृत के प्रकाण्ड पण्डित थे। पश्चिम के एक प्रख्यात भारतविद् स्टीफन नैप (Stephen-Knapp) श्री तलपदे के प्रयोगों को अत्यन्त महत्वपूर्ण मानते हैं। एक अन्य विद्वान श्री रत्नाकर महाजन ने श्री तलपदे के प्रयोगों पर आधारित एक पुस्तिका भी लिखी हैं।



श्री तलपदे का संस्कृत अध्ययन अत्यन्त ही विस्तृत था और उनके विमान सम्बन्धित प्रयोगों के आधार निम्न ग्रंथ थेः

महर्षि भरद्वाज रचित् वृहत् वैमानिक शास्त्र
आचार्य नारायण मुन रचित विमानचन्द्रिका
महर्षि शौनिक रचित विमान यन्त्र
महर्षि गर्ग मुनि रचित यन्त्र कल्प
आचार्य वाचस्पति रचित विमान बिन्दु
महर्षि ढुण्डिराज रचित विमान ज्ञानार्क प्रकाशिका

हमारे प्राचीन ग्रंथ ज्ञान के अथाह सागर हैं किन्तु वे ग्रंथ अब लुप्तप्राय-से हो गए हैं। यदि कुछ ग्रंथ कहीं उपलब्ध भी हैं तो उनका किसी प्रकार का उपयोग ही नहीं रह गया है क्योंकि हमारी दूषित शिक्षानीति हमें अपने स्वयं की भाषा एवं संस्कृति को हेय तथा पाश्चात्य भाषा एवं संस्कृति को श्रेष्ठ समझना ही सिखाती है।

 
Design by Free WordPress Themes | Bloggerized by Lasantha - Premium Blogger Themes | fantastic sams coupons