Saturday, May 7, 2011

यह पोस्ट मैं लिख रहा हूँ मन के अधीन होकर किन्तु मन पर नियन्त्रण रखने के लिए

अजित गुप्ता जी के पोस्ट मन से पंगा कैसे लूँ, यह अपनी ही चलाता है पढ़कर इच्छा हुई कि इस विषय पर मैं भी एक पोस्ट लिखूँ, वो कहते हैं ना "खरबूजे को देखकर खरबूजा रंग बदलता है"। हाँ तो मेरी भी इच्छा होने लगी इस विषय पर पोस्ट लिखने की और मैं यह अच्छी प्रकार से समझता हूँ कि यह "इच्छा होना" भी मन का ही एक खेल है, मैं अपने मन के अधीन होकर ही यह पोस्ट लिख रहा हूँ।

यह मन मुझे ही नहीं हर किसी को अपने अधीन बनाना चाहता है, बड़े-बड़े दिग्गज इस मन के अधीन रहे हैं। यह ययाति का मन ही था जिसने उसे अपने पुत्र को अपनी वृद्धावस्था देकर उसके यौवन को स्वयं लेने के लिए विवश किया, यह विश्वामित्र का मन ही था जिसने उसे वसिष्ठ के कामधेनु को शक्तिपूर्वक ले लेन के लिए प्रयास करने के लिए विवश किया, यह युधिष्ठिर का मन ही था जिसने द्यूत में द्रौपदी तक को दाँव में लगाने के लिए विवश किया।

मन ने सदैव ही मनुष्य को कमजोर बनाया है। मन के कारण ही मनुष्य अपने कर्तव्य से विमुख होता है। इसी मन ने अर्जुन को कमजोर बनाकर गांडीव को भूमि पर रख देने और अपने कर्तव्य से विमुख होने के लिए विवश कर दिया था।

अर्जुन को तो विषम स्थिति से उबारने के लिए तो श्री कृष्ण थे किन्तु हम जैसे अकिंचन जन को उबारने के लिए कौन है?

यद्यपि आज हमें उबारने के लिए कृष्ण नहीं हैं किन्तु गीता के रूप में उनकी वाणी अवश्य हमारे पास उपलब्ध है। मन को नियन्त्रित करने के लिए गीता का अध्ययन बहुत ही प्रभावशाली है। मैं तो सभी लोगों से इतना ही कहूँगा कि यदि वे गीता का अध्ययन करें तो अवश्य ही अपने मन को नियन्त्रण में रखने में सक्षम होंगे। यदि आप संस्कृत नहीं समझ सकते तो गीता के हिन्दी टीका को ही पढ़ जाएँ, आपको अवश्य ही लाभ होगा।
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