Tuesday, February 28, 2012

जै जै जै शिवशंकर.... ये प्याला तेरे नाम का पिया


"अरे ये तो ठंडाई है, भोलेनाथ का प्रसाद! भांग थोड़े ही है। लीजिए ना!"

अभी शिवरात्रि के दिन लोग ऐसा ही कुछ कह रहे थे उन्हें जो शिव जी के प्रसाद के रूप में भांग मिले ठंडाई को लेने में हिचकिचा रहे थे।

देखा जाए तो भांग का सेवन हिन्दू धार्मिक रिवाज का एक अंग सा बन गया है और प्रायः लोग भांग के सेवन को बुरा या अहितकर नहीं मानते। अंग्रेजी विकीपेडिया के अनुसार ईसा पूर्व लगभग 1000 वर्ष पहले भांग हिन्दू रिवाजों में सम्मिलित हुआ। समय बीतने के साथ-साथ भांग का यह धार्मिक रिवाज एक आम बात सी हो गई। उत्तर भारत में शिव जी की बूटी के रूप में भांग का सेवन सामान्य सी बात है। जो लोग भांग का नियमित सेवन नहीं करते वे लोग भी महाशिवरात्रि, होली आदि पर्व पर भांग के नशे को गलत नहीं मानते। इन पर्वों में भांग की ठंडाई, भांग के पकोड़े, भांग मिश्रित लस्सी तथा आइसक्रीम आदि बनाया जाना सामान्य बात है।

राजस्थान के बीकानेर में तो भांग प्रेमियों के लिए "भैरूँ कुटिया" नामक एक स्थान ही निर्धारित है जहाँ पर प्रतिदिन सैकड़ों की तादाद में भांग प्रेमी लोग इकट्ठे होकर "भंग के तरंग" का मौज लेते हैं। भैरूँ कुटिया में भांग पीने वालों के लिए किसी भी प्रकार का बन्धन नहीं है, वहाँ पर ब्राह्मण, कायस्थ, नाई, मोची, धोबी सभी साथ बैठकर भांग पीते हैं। हरिवंशराय बच्चन जी की पंक्तियाँ "मन्दिर मस्जिद बैर कराते प्रेम बढ़ाती मधुशाला" भैरूँ कुटिया के लिए सर्वथा उपयुक्त लगता है।

बनारस के घाटों में तो किसी भी समय लोगों के समूह को भांग बनाने की प्रक्रिया में लिप्त देखा जा सकता है। सिल और लुढ़िया द्वारा भांग पीसते हुए अनेक समूहों को आप इन घाटों में कभी भी देख सकते हैं। इस प्रकार से पिसे भांग में घी, मसाले, दूध आदि मिलाकर ठंडाई तैयार की जाती है जिसे कि वे लोग अल्कोहल का एक स्वास्थ्यवर्धक विकल्प कहते हैं।

आइये अब जानें कि भांग आखिर है क्या? भांग वास्तव में एक पौधे, जिसे कि वनस्पति शास्त्र में कैनबिस सटाइवा (cannabis sativa) कहा जाता है, के पत्ते होते हैं। यह पौधा अधिकतर पर्वतीय प्रदेशों में पाया जाता है। टनकपुर, रामनगर, पिथौरागढ़, हल्द्वानी, नैनीताल, अल्मोडा़, रानीखेत,बागेश्वर, गंगोलीहाट में बरसात के बाद भांग के पौधे सर्वत्र देखे जा सकते हैं। भांग के पत्ते नशीले होते हैं। भांग के पौधे की छाल से रस्सियाँ बनती हैं तथा डंठल को मशाल के रूप में प्रयोग किया जाता है। पर्वतीय प्रदेश की कुछ जातियों के लोग भांग के रेशे से कुथले और कम्बल भी बनाते हैं।

आयुर्वेद में भांग के पौधे को एक महती औषधि बताया गया है। इससे पेट सम्बन्धी अनेक रोगों का उपचार किया जाता है। ईसा पूर्व 1000 से ही भारत में भांग का प्रचलन रहा है। भोजन के पूर्व भांग का सेवन क्षुधावर्धक (appetizer) का कार्य करता है। साधु सन्त ध्यान को एकाग्र करने के लिए इसका सेवन करते हैं।

किन्तु ध्यान रखें कि भांग का आवश्यकता से अधिक सेवन आपको मुसीबत में भी डाल सकता है क्योंकि कहा गया है "अति सर्वत्र वर्जयेत्"।
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