लेखः के.आर. मीना
भरतपुर
कांई थारो करयो रे कसूर
सही है सरकारें आर्थिक मदद के अलावा कर क्या सकती हैं। वे जो परम्पराएँ हैं, जो बेटी वालों से दुश्मन-सा व्यवहार करती हैं। वो जो झूठी शान है जो बेटियों के पिता को झुकने पर मजबूर करती है, उन्हें कौन बंद करेगा? अगर आर्थिक प्रोत्साहन से बेटियां बराबरी का दर्जा पा सकतीं तो भला पैसे वाले, पढ़े-लिखे लोगों में बेटों की बेजा चाह क्यों होती? आखिर पूरा समाज और वो माँएँ, जो इस समूची सृष्टि की निर्माता हैं, बेटी को बचाने, उसे मान दिलाने कब आगे आयेंगी?
सात वार, नौ त्यौहार
राजस्थान पूरे देश में एक अलग ही उदहारण है। बेटी के घर वालों को बेटे वाले दुश्मन की तरह देखते हैं। बड़े और गढ़े हुए छोटे-मोटे त्योहारों पर भी बेटे वालों को झोली भरकर मिठाई चाहिए। सास का बेस, ससुर के कपड़े। जेठ का सूट, जेठानी की साड़ी। बगल वाली उस चाची का भी बेस, जिससे 10 साल से बोलचाल बंद है। अनगिनत लिफाफे- देवर का पाँच सौ का, दोस्तों के दो-दो सौ के। ये क्या है? क्यों है? कौन रोकेगा? कहा जाता है, बेटे को पढाया-लिखाया है। हमारे भी अरमान हैं। तो क्या बेटी और बेटी वालों के अरमान मर गये? उन्होंने भी सोचा होगा - भले, अपने जैसे समधी मिलें। जब इतना सब कुछ हर त्यौहार पर सालों साल मांगते रहेंगे, तो आप भले कैसे हुए?
झुके कौन?
मानसिकता यह भी है कि बेटी पैदा हुई तो शादी होगी। बेटे वालों के आगे झुकना होगा। इसलिए या तो बेटी को पैदा ही नहीं होने देते। या पैदा होने के बाद मार देते हैं। या नहीं मारते तो अच्छी शिक्षा नहीं देते। बेटा अच्छे, मँहगे स्कूल में। ....और बेटी सरकारी स्कूल में। क्यों? हैरत देखिए- अपनी बेटी के लिए सबकुछ अच्छा चाहने वाली माँ ही सास बनकर बहू के घरवालों को उम्र भर इसलिए कोसती रहती है कि देवर के दोस्तों का एक लिफाफा (लिफाफे में बंद कुछ रूपये-पैसों के रूप में दी जाने वाली भेंट या विदाई) कम पड़ गया था। हो सकता कि यह कु-व्यवस्था पुरुषों ने ही शुरू की हो। लेकिन महिलाएँ इन्हें धर्म मानकर इनका पालन करती रहीं हैं जिससे महिला ही महिला कि दुश्मन बनती गई और आज भी बनी हुई है।
यही हाल रहा तो सृष्टि को, वंश को आगे बढ़ाने वाली माँ ही एक दिन चीख कर कहेगी कि मुयी कोख न होती तो मैं दुनिया के सारे झंझटों से आजाद हो जाती। तब क्या होगा? सृष्टि का। वंश का। सास के बेस का। जेठ-जेठानी के कपड़ों का। देवर के लिफाफे और दूल्हे की कार का? जरा सोचिए। ठहर कर एक मिनिट तो सोचिए। बेटियाँ भी बेटों से बढ़ कर होती हैं। उन्हें मत मारिए। उनका मान कीजिए। आप बहुत बड़े हो जाएँगे। अपनी बेटियों की नजर में। दुनियां की नजर में। खुद की नजर में।
Online English Test 1
1 hour ago
8:44 AM
जी.के. अवधिया








2 टिप्पणियाँ:
यह मानसिकता धीरे धीरे बदलनी होगी।
I AGREE TO PRAVIN BHAI SAHAB .
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