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Wednesday, September 2, 2009

हिन्दी ब्लोगिंग को अस्वच्छ करने आ गया "स्वच्छ संदेश: हिन्दोस्तान की आवाज़"

आम तौर पर मैं फालतू बहस का मुद्दा बन जाने वाला पोस्ट लिखने से बचने की कोशिश करता हूँ पर पिछले कुछ दिनों से देख रहा हूँ हिन्दी ब्लोगिंग को अस्वच्छ करने के लिए एक ब्लोग "स्वच्छ संदेश: हिन्दोस्तान की आवाज़" अवतरित हो गया है जिसमें संदेश तो अस्वच्छ होते हैं और आवाज इस्लाम की।

इस ब्लोग के मालिक मियाँ सलीम के पास सिर्फ दो ही काम रह गए हैं पहला इस्लाम को येन-केन-प्रकारेण दूसरे लोगों पर थोपना और दूसरा ऊल-जलूल लेख लिख कर और टिप्पणियाँ कर के लोगों को भड़काना। ये बात अलग है कि ये खुद ही नहीं जानते कि क्या लिख रहे हैं, अपनी ही बात को खुद काटते हैं। इनके एक लेख का शीर्षक है "मांसाहार क्यूँ जायज़ है? Non-veg is allowed, even in hindu dharma?" तो दूसरे लेख का शीर्षक है "मांसाहार जायज़ नहीं है, यह एक राक्षशी कृत्य है. Non-veg is not-permitted, its an evil task" है। (दोनों शीर्षक कॉपी पेस्ट किए गये हैं अतः हिज्जों की गलती को अनदेखा करें)। अब भला इन शीर्षकों से क्या समझा जाए? यही तो समझा जायेगा कि लिखने वाला बावला है।

ये कहते हैं कि ये इस्लाम का प्रचार कर रहे हैं। तो करो ना प्रचार, किसने मना किया है? पर इस्लाम को जबरन दूसरों पर थोपने की कोशिश तो मत करो। हम मानते हैं कि सभी धर्म मानव जाति के कल्याण के लिए हैं, किसी धर्म का किसी धर्म से किसी प्रकार का झगड़ा नहीं है। तो तुम अपने धर्म के हिसाब से चलो और हमें अपने धर्म के अनुसार चलने दो।

छत्तीसगढ़ी में एक कहावत है "रद्दा में हागै अउ आँखी गुरेड़ै" अर्थात् रास्ते में हग रहा है और मना करने वाले को आँखें दिखाता है। यह छत्तीसगढ़ी कहावत मियाँ सलीम पर सौ फी सदी लागू होता है। ऊल-जलूल लेख लिखने और टिप्पणियाँ करने याने कि रास्ते में हगने का इन्होंने ठेका लिया हुआ है। कहीं पर भी हिन्दू शब्द, हिन्दू देवी देवताओं के नाम आदि दिख भर जाए कि ये वहाँ पहुँच जायेंगे और टिपियाना शुरू कर देंगे। ऐसे किसी भी पोस्ट में टिप्पणी के रूप में अपनी टांग अड़ाना ये अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझते हैं। समझाने से समझते तो हैं नहीं और बेशर्म ये इतने हैं कि इन्हें किसी भी प्रकार की बात नहीं लगती।

ये स्वयं को इस्लाम और कुरआन के विशेषज्ञ तो बताते ही हैं, साथ ही साथ खुद को वेद-पुराण आदि के भी प्रकाण्ड पण्डित भी दर्शाते हैं। इनकी निगाहों में हम हिन्दू इतने मूर्ख हैं कि हमने अपने ही धर्मग्रंथ पढ़े ही नही हैं और ये इतने ज्ञानी हैं कि अपने धर्मग्रंथ के साथ ही हमारे धर्मग्रंथों को भी पढ़ते रहते हैं। ये हमें हमारे ही धर्मग्रंथ सिखाना-पढ़ाना चाहते हैं। अवतार शब्द का अर्थ तो ये जानते नहीं और हमें हमारे ही अवतारों के बारे में बताते हैं। ये समझते हैं कि अवतार सिर्फ ईश्वर का होता है। इन्हें नहीं पता कि अवतार मनुष्य का भी होता है, अवतार मनोविकारों का भी होता है। गोस्वामी तुलसीदास आदिकवि वाल्मीकि के अवतार थे और ये स्वयं "नफरत" के अवतार हैं। वेद और पुराण के उन उद्धरणों को इन्होंने रट लिया जो कि इन्हें इस्लाम विचारधारा से मेल खाते हुए से लगते हैं।

इन्हें यह नहीं पता है कि हिन्दू धर्म और संस्कृति अनेक प्रकार के विचारधाराओं का मेल है। इसमें जहाँ एकेश्वरवाद है वहीं बहुईश्वरवाद भी है। जहाँ निर्गुण ब्रह्म है वहीं सगुण ब्रह्म भी है। जहाँ ईश्वरीय सत्ता को स्वीकार करने वाले आध्यात्मिक ऋषिगण हैं वहीं चार्वाक जैसा ईश्वररीय सत्ता को अस्वीकार करने वाला भौतिकवादी ऋषि भी है। और इन्हें यह भी नहीं मालूम कि हम हिन्दू जितना सम्मान आध्यामिक ऋषि को देते हैं, भौतिवादी ऋषि के लिए भी हमारे हृदय में उतना ही आदर है।

कुछ और जानें या न जानें पर हमारे धर्मग्रंथों से अपने मतलब की बातें खोज लेना अच्छी प्रकार से जानते हैं। हमारे धर्मग्रंथों से एकेश्वरवाद, निर्गुण ब्रह्म जैसी विचारधाराओं, जो कि इस्लाम विचारधारा से मिलते हैं, को ढूँढ निकालते हैं और उन्हीं अपने मतलब की बातों के सहारे हमें ज्ञान देने का प्रयास करते हैं। ये यह भी दर्शाते हैं कि इन्हें हमारे धर्म की हमसे अधिक चिंता है, किस फिल्म में हमारे धर्म से सम्बन्धित बातों को गलत रूप फिल्माया गया था। कहने का तात्पर्य है कि ये बुड्ढे को मूतना सिखाना चाहते हैं।

इन्हें अच्छी तरह से पता है कि कोई इनकी बात को नहीं मानने वाला है इसलिए जनाब कैरानवी को अपनी हाँ में हाँ मिलाने के लिए सहायक बना रक्खा है।

हम जानते हैं कि गंदगी में यदि पत्थर फेकेंगे तो गंदगी के छींटे हमें ही लगेंगे पर हमें गंदा करने के लिए गंदगी बन जाने में भी इन्हें किसी प्रकार का परहेज नहीं है। ये ऐसी गंदगी हैं जो चाहते हैं कि हम उन पर पत्थर फेंकें, ये हमें जानबूझ पत्थर फेंकने के लिए उकसाते हैं।

ज्ञानी यदि ज्ञानी से मिले तो काम की बातें होती हैं और मूर्ख मूर्ख से मिलता है तो जूतमपैजार होती है इसीलिए कहा गया हैः

ज्ञानी से ज्ञानी मिले, हो गई अच्छी बात।
मूरख से मूरख मिले, हो गई दो दो लात॥

पर यदि ज्ञानी मूरख से मिलता है तो मूरख खुद को उससे बड़ा ज्ञानी सिद्ध करने की ही कोशिश करता है क्योंकि अगर सिद्ध न भी हो पाए तो उसका क्या बिगड़ना है? है तो वह आखिर मूरख ही।

मैं अपने सभी ब्लोगर बन्धुओं से आग्रह करता हूँ कि इस गंदगी में पत्थर फेंक कर खुद को गंदा न करें। न तो इनके ब्लोग पर जाकर टिप्पणी ही करें और न ही अन्य ब्लोग में इनके द्वारा की गई टिप्पणी का जवाब देने में अपना वक्त बरबाद करें। इनका ध्येय ही है कि हम इनसे उलझते रहें, तो इन्हें इनके ध्येय में सफल न होने दें। इनका सोशल बायकाट करें।

और मैं जानता हूँ कि मियाँ सलीम को ज्योहीं पता चलेगा कि उनके लिए एक नया आफत का परकाला अवतरित हो गया है त्योंही मेरे इस ब्लोग में अवश्य आयेंगे ऊल-जलूल टिप्पणी करने के लिए और या अपने पहले या फिर बाद में कैरानवी मियाँ को भी भेजेंगे। तो उनसे भी गुजारिश है कि अल्लाह ने जरा भी अक्ल दिया है तो आपसी नेकनीयती को खतम करने जैसा नापाक काम छोड़ कर कुछ इन्सानियत का भला करने वाला शबाब का काम करो। हजरत! तालीमयाफ्ता हो तो इतना तो समझते हो कि प्यार से प्यार बढ़ता है और नफरत से नफरत। तो प्यार और भाईचारा को बढ़ाओ ना, नफरत क्यों फैलाते हो? तुम्हारे ही ब्लोग में आकर एक नेकबख्त शख्स ने तुम्हें यह लिंक दिया था, पता नहीं तुम उस लिंक में गए कि नहीं, यदि नहीं गए हो तो अब जाकर देखो कैसे होते हैं अच्छे विचार! हिन्दी में ब्लोगिंग कर रहे हो तो कुछ अपना भला करो, कुछ जग का भला करो, कुछ हिन्दी का भला करो, हिन्दी ब्लोगिंग को अस्वच्छ तो मत करो।